Thursday, September 2, 2010

क्यों झुक रहा है पहाड़ ?

आखिर इस पहाड़ से
कहाँ गयी हरियाली ,
जो कल तक उसकी बांहों में
फ़ैली हुई थी -धमनियों और शिराओं में
दौड़ते खून की तरह ?
कहाँ गए पेड़ ,कहाँ गई लताएं ?
किसने कर लिया एक समूचे
जंगल का अपहरण ?
कौन पी गया पहाड़  की  धमनियों का
सारा खून ?
जवाब क्यों नहीं मिलता ?
मौन क्यों है मानसून ?
हवाएं दस्तक देकर लौट
जाती हैं-दरवाजे पर ,
खुलते नहीं द्वार , स्वागत में उठ कर
मुस्कुराते नहीं शिखर ,
कुछ झुकी हुई नज़र आ रही है
पहाड़ की कमर !
आखिर क्यों झुक रहा है पहाड़ ?
उसकी विशाल बांहों से निकली 
नन्ही बिटिया की तरह चंचल नदी भी
अब इतनी खामोश , इतनी वीरान ,
जैसे आम जनता के अरमान !
किसका था फरमान ,
जिसने छीन ली झरने की संगीत भरी हँसी
और एक मासूम पहाडी मुस्कान ?
पहाड़ क्या अब होगा नहीं आबाद ,                                      
खामोश नदी क्या फिर नहीं सुनाएगी
अपना सुमधुर कल-कल नाद ?
दोस्तों ! ऐसा होगा ज़रूर ,
लेकिन पहले खोज कर तो लाएं उसे
जिसने छीनी पहाड़ की हरियाली .
जिसने किया जंगलों को बर्बाद .
हम सब मिलकर करेंगे उसका हिसाब ,
 इतिहास में लिखेंगे उसका भी अपराध !
                                      -  स्वराज्य करुण

5 comments:

  1. सुन्दर कविता ! सार्थक चिंता !

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  2. बहुत सुन्दर कविता के माध्यम से आपने बहुत सार्थक सवाल उठाएं है .....प्राकृतिक असंतुलन के दुष्परिणाम जो नज़र आरहे है , उनके मद्देनज़र आपकी चिता व्यर्थ नहीं है !
    आपको सपरिवार श्री कृष्णा जन्माष्टमी की शुभकामना ..!!
    बड़ा नटखट है रे .........रानीविशाल
    जय श्री कृष्णा

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  3. जिसने छीनी पहाड़ की हरियाली .
    जिसने किया जंगलों को बर्बाद .
    हम सब मिलकर करेंगे उसका हिसाब ,

    बहुत सुन्दर कविता !

    एक हजार से अधिक स्कूली बच्चों ने लिया पर्यावरण बचाने का संकल्प
    http://ashokbajaj99.blogspot.com/

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  4. paryavaran par dhyaan na dekar hum apne hi pair par kulhaadi maar rahe hain. behad sundar kavita

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