Thursday, November 18, 2021

कहाँ है ग़रीब जनता का इतिहास ?

    (आलेख : स्वराज करुण )
 क्या इतिहास सिर्फ़ वंश परम्परा से चले आए  राजे -महाराजाओं का होना चाहिए ? आम जनता का  इतिहास आख़िर कब लिखा जाएगा ?  कहाँ है गरीबों  के जीवन संघर्षों का इतिहास ? एक अदद कच्चे -पक्के मकान , दो वक्त के भोजन और तन ढँकने के लिए कुछ कपड़ों के जुगाड़ में लगे साधारण लोगों का इतिहास कहाँ है ? 
  पुराने राजाओं , महाराजाओं ,बादशाहों , शहंशाहों की शौर्य गाथाएं भी बड़ी अज़ीब लगती हैं । उनकी लड़ाइयों के कारण भी बड़े हास्यास्पद हुआ करते थे । जैसे -उनमें से किसी  के कानों में अगर किसी  दूसरे राज्य के राजा ,महाराजा की बेटी के अप्रतिम  सौंदर्य की सूचना पहुँच जाए तो  वह पहले तो उस राजा अथवा  महाराजा को खबर भिजवाता था कि अपनी सुन्दर कन्या से मेरी शादी करवा दो ,या फिर युद्ध के लिए तैयार रहो ।  ऐसे अधिकांश मामलों में आक्रमण होना तय रहता था ! 
  अपनी   व्यक्तिगत मनोकामना की पूर्ति और आत्म संतुष्टि के लिए राजा अथवा महाराजा   हजारों सैनिकों को युद्ध की आग में झोंक देता था ।  बचाव पक्ष भी हमले का प्रतिरोध करता था । भयानक संघर्ष होता था ।
 बड़ी संख्या में दोनों पक्षों के सैनिक  बेमौत मारे जाते थे । ये सैनिक गरीब परिवारों के होते थे । अपने मालिक याने कि राजा ,महाराजा के क्षुद्र स्वार्थ की बलिवेदी पर जो अपने मूल्यवान जीवन की आहुति दे देते थे । उनके परिवार बेसहारा हो जाते थे ।
     अच्छा हुआ जो राजाओं ,महाराजाओं और बादशाहों ,शहंशाहों का ज़माना चला गया ,वर्ना उनकी शादियों के नाम पर  कितने ही गरीब और गुमनाम सैनिकों की बलि चढ़ती रहती ।
    जुए के खेल ने  महाभारत करवा दिया । वह भी एक राजघराने के पारिवारिक झगड़े की वजह से हुआ , जिसमें असंख्य गरीब सैनिक मारे गए ।   छोटे - छोटे राज्यों के विस्तार के लिए भी राजाओं के बीच उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के कारण  बड़ी - बड़ी लड़ाइयां हो जाती थी । उनमें मरने  वाले सैनिक राजभक्त कहलाते थे ,  उनकी राजभक्ति के कारण उनके बच्चे अनाथ हो जाते थे । लेकिन इतिहास की इबारतों  में तो  ऐसे ही स्वार्थी  राजाओं और सम्राटों की कथित ' वीर गाथाओं'   का बोलबाला है । उनमें  महिलाओं की वजह से हुए युद्धों  और शिकार कथाओं के प्रसंग तो मिलते हैं ,लेकिन    जनकल्याण का कोई उदाहरण नहीं मिलता  । 
    लगता है - हमारे इतिहास के पन्ने राजे - रजवाड़ों की   बेकार की लड़ाइयों में  मारे गए गरीब  सैनिकों के खून से रंगे हुए हैं ।
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Wednesday, November 17, 2021

एक मरते हुए तालाब की कहानी

 (आलेख : स्वराज करुण)
आज मैं बहुत दुःख के साथ आप लोगों को एक मरते हुए तालाब की कहानी बताने जा रहा हूँ ,जो सामाजिक उपेक्षा और प्रदूषण की वजह से  अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है।आप कह सकते हैं कि जब देश की राजधानी दिल्ली में भारत की सांस्कृतिक नदी यमुना भयानक प्रदूषण का शिकार हो चुकी है , तब ऐसे में वहाँ से हजारों किलोमीटर दूर किसी तालाब की फ़िक्र  कौन करे ?आख़िर  गंगा मैया भी तो प्रदूषण का दर्द झेल रही है । 
      लेकिन अगर हमें अपना जीवन बचाना है तो  अपने देश की नदियों के साथ -साथ  तालाबों का जीवन बचाने के बारे में भी सोचना तो पड़ेगा । गाँवों और शहरों में तालाबों को कभी जन -जीवन का जरूरी हिस्सा माना जाता था। लेकिन अब कई जगहों में उनके अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगा है। कारण यह है कि आधुनिक जीवन शैली का तो विस्तार हो रहा है ,लेकिन जन -चेतना विलुप्त हो रही है। सामाजिक ज़िम्मेदारी की भावना ख़त्म होती जा रही है।

       विशेष रूप से कस्बों और शहरों की अपनी बसाहटों का हर दिन का कचरा और गंदा पानी डाल -डाल कर मनुष्य अपने तालाबों का अस्तित्व मिटाता जा रहा है। छत्तीसगढ़ का  तहसील मुख्यालय पिथौरा कभी एक छोटा गाँव हुआ करता था , बढ़ती आबादी के।कारण अब यह नगर पंचायत है। हो सकता है कि कल यह नगर पालिका बन जाए।  साफ पानी की जरूरत तो उस समय भी सबको होगी। 
   यहाँ कभी लाखागढ़ का तालाब ग्रामीणों की निस्तारी का प्रमुख जरिया था । लाखागढ़ अब एक अलग ग्राम पंचायत है।वर्षों पहले  इस तालाब के किनारे खूब रौनक रहती थी। लाखागढ़ और पिथौरा बस्ती के लोग इसकी पचरी पर आते ,इत्मीनान से बैठते ,एक दूसरे का हालचाल पूछते ,बतियाते  और इसके स्वच्छ जल में डुबकियाँ लगाकर नहाने के बाद अपनी दिनचर्या शुरू करते। 
                           
     इसके  किनारे कभी मुम्बई -कोलकाता राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरता था ,जो अब फोर लेन बन जाने के बाद यहाँ से शिफ़्ट होकर  कस्बे के बाहर चला गया है।  जब राष्ट्रीय राजमार्ग इधर होता था ,तब अन्तर्राज्यीय माल परिवहन में लगी बड़ी -बड़ी ट्रकों के ड्राइवर और खलासी भी इस सरोवर के किनारे कुछ देर बैठकर ,नहाकर अपनी थकान मिटाते और अगले पड़ाव के लिए चल पड़ते थे। इसके उत्तर और दक्षिण ,दोनों किनारों पर खूब चहल -पहल रहती थी।चिन्ता की बात है कि  अब तो इसका अस्तित्व भी विभाजित हो गया है।
    स्थानीय लोग बताते हैं कि ग्राम पंचायत लाखागढ़ के किसी पूर्व सरपंच ने कुछ साल पहले तालाब को दो टुकड़ों में बँटवा दिया। एक हिस्सा लाखागढ़ की तरफ और दूसरा पिथौरा की तरफ। तालाब विभाजन का कोई ठोस कारण कोई नहीं जानता अब यह अपने  सुनहरे दिनों को याद करते हुए अपनी बदहाली और बदकिस्मती पर आँसू बहा रहा है।  प्रदूषण की संक्रामक बीमारी ने इसे अपने शिकंजे में जकड़ लिया है। इसके प्राण  बचाने के लिए  सही उपचार की जरूरत है। 
   सामूहिक श्रमदान इसका एक अच्छा इलाज हो सकता है । सब मिलकर इसकी सफाई कर सकते हैं। इसके किनारों पर अनुपयोगी  प्लास्टिक ,पॉलिथीन और घरों का कूड़ा कचरा डालना बन्द हो , सार्वजनिक नालियों का गंदा पानी इसमें डालना बन्द किया जाए और इसके किनारों पर उगे झाड़ -झंखाड़ और  इसके पानी में फैली जलकुंभियों को जड़ सहित  हटाया जाए ,तब कहीं इसके सुनहरे दिन वापस आ सकते हैं। 
    लेकिन आर्थिक सभ्यता के इस दौर में जब श्रमदान की परम्परा ही समाज से विलुप्त होती जा रही है । तब किसी तालाब के अस्तित्व को विलुप्त होने से भला कौन रोक सकता है ? फिर भी कुछ जाग्रत लोग पहल करें तो बात बन सकती है।  - स्वराज करुण 
(दोनों तस्वीरें : मेरे मोबाइल की आँखों से )

Thursday, November 4, 2021

आधुनिक दानवीर और उसके परम भक्त सुदामा की कथा

               (स्वराज करुण  )
मित्रों  ! आइए ,आज दीवाली के दिन मैं आपको आधुनिक महाभारत के आधुनिक दानवीर और उसके मातहत ,परम भक्त  सुदामा की कथा सुनाता हूँ। वैसे यह कथा ज़्यादा लम्बी नहीं है। इसलिए कृपया धैर्यपूर्वक सुनिए ।
    हस्तिनापुर में दानवीर नामक एक राजकीय पदाधिकारी हुआ करता था। नाम उसका दानवीर जरूर था ,लेकिन काम उसके नाम के बिल्कुल विपरीत था। वह खुद कभी दान -दक्षिणा  नहीं देता था ,बल्कि अपना काम करवाने के लिए आने वाले ही उसे दान -दक्षिणा चढ़ाया करते थे ,तब कहीं उनका काम हो पाता था। यहाँ तक कि उसके मातहत भी अपने काम के लिए उसे दक्षिणा चढ़ाया करते थे। तो 
  एक दिन दानवीर का एक मातहत परम भक्त सुदामा  अपने किसी अटके हुए काम के सिलसिले में उसे  निर्धारित दक्षिणा चढ़ाने पहुँचा । उस दिन दीपावली थी। दानवीर के आलीशान बंगले में भी दीपोत्सव की रंग -बिरंगी तैयारियां चल रही थी।  मातहत को देखते ही दानवीर की बाँछे खिल गयीं। उसने प्रेमपूर्वक उससे कहा --"आओ सुदामा ,आओ !  मैं आज तुम्हें ही याद कर रहा था। "  इतना कहकर उसने सुदामा के हाथों में  रखे प्लास्टिक के थैले को कनखियों से देखा। फिर उससे पूछा -"कहो सुदामा ! कैसे आना हुआ। " इस पर सुदामा ने सकुचाते हुए अपने महीनों से अटके काम के बारे में बताया और कहा - "महाराज! ज्यादा तो नहीं सिर्फ़ 10 हजार रुपये दक्षिणा के लिए किसी से उधार लेकर  लाया हूँ।" इतना कहकर सुदामा ने दानवीर के श्रीचरणों में दक्षिणा की राशि अर्पित कर दी। तब दानवीर ने उसे गले लगाते हुए कहा - " सुदामा !  तुम्हारा काम अब हो गया समझो। बेफिक्र होकर घर चले जाओ। " सुदामा वहाँ से निकल गया। जैसे ही वह दानवीर के बंगले के बाहर पहुँचा ,संतरी ने  दौड़कर उससे कहा --" सर जी ! आपको महाराज याद कर रहे हैं। "  
   सुदामा मुड़कर फिर दानवीर के 'हुज़ूर '  में पहुँचा ,जहाँ वह उसके दिए हुए 10 हजार रुपयों को गिनकर रहा था। पूरा गिन चुकने के बाद उसने नोटों के उस बंडल से एक हजार रुपए निकाले  और सुदामा को प्यार से डाँटते हुए कहा -- "अरे भाई , क्या तुम अपने बीवी ,बच्चों के साथ दीवाली नहीं मनाओगे ?अगर पूरे 10 हजार मुझे दे दोगे तो उनके लिए आज त्यौहार के दिन मिठाईयां  और पटाखे कैसे खरीदोगे ? इसलिए रखो ये एक हजार रुपए और जाओ ,अपने परिवार के साथ दीवाली मनाओ। "  इतना कहकर दानवीर ने सुदामा के हाथों में एक हजार रुपए रख दिए और उसके  कंधों पर हाथ रखकर स्नेह जताया। दानवीर की इस सदाशयता से गदगद होकर सुदामा अपने गाँव लौट गया। इधर दानवीर अपनी बीवी से कह रहा था --चलो , आज दीवाली के दिन 9000 हजार रुपए की आवक तो हुई। उधर सुदामा गाँव पहुँचकर अपने बीवी -बच्चों के सामने साहब की इस   'उदारता 'का बखान किए जा  रहा था । 
    (डिस्क्लेमर  :    दोस्तों ! इस लघु कथा से डीजल ,पेट्रोल की कीमतों में आज की गयी  मामूली कटौती का कोई संबंध नहीं है ,वैसे आप अपने हिसाब से संबंध जोड़ भी सकते हैं ।)--स्वराज करुण

Saturday, October 30, 2021

पहाड़ियों से घिरे गाँव में इतिहास की धड़कनें

         (आलेख : स्वराज्य करुण )
राजे -रजवाड़े तो अब रहे नहीं ,लेकिन धरती के आँचल में , इतिहास के भूले -बिसरे पन्नों में  , समय की सुनामी से टूटे -बिखरे भवनों और किलों के अवशेषों में और जनश्रुतियों में उनके अतीत की यादें आज भी जीवित हैं। दिल इतिहास का भी होता है ,  जिसकी  धड़कनों में मानव सभ्यता के  अतीत की यादें  आज भी धड़कती   रहती हैं। इतिहास के दिल की  इन धड़कनों को हरी -भरी ऊँची पहाड़ियों से घिरे ग्राम कौड़िया में  भी  महसूस किया जा सकता है। लेकिन काल के प्रवाह में ये धड़कनें भी कमज़ोर पड़ती जा रही हैं। क्या एक दिन इतिहास का यह स्पंदन धीमी गति से कमज़ोर होते ,होते एक दिन पूरी तरह बंद हो जाएगा और इतिहास मर जाएगा ? हम प्रार्थना करें कि ऐसा दिन कभी न आए और इतिहास हमेशा जीवित रहे ,ताकि हमारा वर्तमान उससे कुछ सीख सके। 

                            

    आज मैं आपको छत्तीसगढ़ के इस गाँव की संक्षिप्त यात्रा में लिए चलता हूँ। यह महासमुंद जिले के पिथौरा विकासखंड में ग्राम पंचायत पिलवापाली का आश्रित गाँव है। कौड़िया  गोंड और बिंझवार जनजाति बहुल गाँव है। ऐसा माना जाता है कि  बहुत पहले रियासती राजाओं के दौर में यह  राजा करिया धुरवा की राजधानी थी। वह आमात्य गोंड समुदाय के थे।  धुरवा उनका गोत्र था।  यह  उनकी मुख्य कर्मभूमि थी। 

                
           करिया धुरवा के वंशज संतराम गोंड

संतराम गोंड जैसे उनके कुछ वंशज आज भी कौड़िया में रहते हैं ,लेकिन उन्हें अपने इस बहादुर पूर्वज के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं है ,सिवाय इसके , कि यहाँ उनका एक गढ़ (किला )था और उनका  मंदिर यहाँ से करीब 16 किलोमीटर दूर ग्राम अर्जुनी में है और जहाँ हर साल अगहन महीने की पूर्णिमा के दिन विशाल तीन दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है। संतराम हमें यह भी बताते हैं कि कौड़िया गाँव से लगी पहाड़ी के ऊपर राज दरबार के भी अवशेष हैं ,जहाँ पत्थरों पर ' धन ' और 'ऋण ' की आकृतियां भी बनी हुई हैं । समय की कमी थी। इसलिए हम 'राज दरबार ' तक नहीं पहुँच सके ,लेकिन पहाड़ी के एक ओर ऊँचे स्थान पत्थरों से निर्मित सिद्ध बाबा की एक अनगढ़ मूर्ति हमने जरूर देखी। 
                         
                 ग्राम कौड़िया का प्रवेश मार्ग
  कौड़िया गाँव के लोग हमें उस किले को दिखाते हैं ,जो अब समय के तेज प्रवाह में विलुप्त होने के कगार पर है। करिया धुरवा का यह गढ़ आज की स्थिति में एक -दूसरे पर बेतरतीब रखे हुए बड़े -बड़े पत्थरों से घिरा हुआ है और उसकी एक दीवार लगभग आधे किलोमीटर तक जाकर  कौड़िया डोंगरी को स्पर्श करती है।लेकिन यह दीवार भी बीच -बीच में बने मकानों और लोगों की बाड़ियों  आदि के कारण ठीक से नज़र नहीं आती। करिया धुरवा के गढ़ का यह ध्वंसावशेष उनके गौरवशाली अतीत की याद दिलाता है। 
   अंचल के प्रसिद्ध लेखक शिवशंकर पटनायक  ने करिया धुरवा की जीवन गाथा को उपन्यास के साँचे में ढाला है। उनका उपन्यास 'देवी करिया धुरवा 'के नाम से काफी चर्चित भी हुआ है। इस उपन्यास की चर्चा मैंने फेसबुक पर दो दिन पहले 27 अक्टूबर को अपनी पोस्ट में विस्तार से की है।
 बहरहाल ,उनका उपन्यास पढ़कर मैं  जिज्ञासावश अपने मित्र प्रवीण 'प्रवाह' के साथ कल कौड़िया चला गया  था।
वहाँ  स्थित  करिया धुरवा के विलुप्त हो रहे गढ़ में ग्रामीणों ने एक चबूतरा बना दिया है ,जिस पर बहुत प्राचीन शिव लिंग स्थापित है। ग्रामीण उनकी पूजा करते हैं। बाजू में काले पत्थरों से निर्मित एक प्रतिमा रखी हुई है। सूरज की रोशनी ,  हवा और बारिश की बौछारों से इसका क्षरण होता जा रहा है। ध्यान से देखने पर यह उमा -महेश्वर ,(पार्वती महादेव) या अर्ध नारीश्वर  की मूर्ति प्रतीत होती है। इसी गढ़ के परिसर में वृक्ष के नीचे पत्थर की एक लम्बी -आकृति भी शान से खड़ी है। 

                        
गाँव वाले इसे ' पाट -देवी ' मानते हैं ,जो उनके अनुसार ग्राम भुरकोनी से आयी हैं । ग्रामवासी  उमा -महेश्वर के साथ इनकी भी पूजा करते हैं।  लेकिन वनवासियों के इस गाँव के आस -पास कौड़िया डोंगरी के नाम से प्रसिद्ध इन पहाड़ियों के कुछ हिस्सों में वनों की कटाई देखकर पर्यावरण की दृष्टि से चिन्ता भी होती है।हालांकि कौड़िया से लगी पहाड़ियों में हरे -भरे वन अभी पर्याप्त बचे हुए हैं। 
    प्राचीन भारत के इतिहास को जानने समझने के लिए देश के ग्रामीण क्षेत्रों में  बिखरी पुरातात्विक सम्पदाओं को सहेजने की जरूरत है। पुरातत्व विशेषज्ञ कार्बन डेटिंग पद्धति और अन्य तकनीकों से इनका काल निर्धारण कर सकते हैं। करते भी हैं। इसके बावज़ूद व्यवहारिक कठिनाइयों के कारण  पुरातात्विक महत्व के अनेक स्थान और स्मारक अनदेखे और अनछुए रह जाते हैं ,क्योंकि पुरातत्व विभाग की अपनी सीमाएं हैं ,संसाधन भी सीमित हैं। ऐसे में अगर विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के इतिहास विभाग के अध्यापक अपने विद्यार्थियों के साथ ऐसे स्थानों का अध्ययन करें ,अनुसंधान करें तो कई नये ऐतिहासिक तथ्य सामने आ सकते हैं और पुरातत्व विभाग के मार्गदर्शन में  इन पुरावशेषों को ग्राम पंचायतों और स्थानीय निकायों के सहयोग से संरक्षित भी  किया जा सकता है।
 -- स्वराज्य करुण 

Wednesday, October 27, 2021

छत्तीसगढ़ के लोक -देवता पर पहला उपन्यास : देवी करिया धुरवा

             (आलेख : स्वराज करुण )
दुनिया के अधिकांश   ऐसे देशों में जहाँ गाँवों की बहुलता है  और खेती बहुतायत से होती है ,जहाँ नदियों ,पहाड़ों और हरे -भरे वनों का प्राकृतिक सौन्दर्य है , ग्राम देवताओं और ग्राम देवियों की पूजा -अर्चना वहाँ की एक प्रमुख सांस्कृतिक विशेषता मानी जाती है। सूर्य ,चन्द्रमा ,आकाश ,अग्नि , वायु ,जल  और वर्षा की चमत्कारिक प्राकृतिक शक्तियों ने इन्हें भी प्राचीन काल से ही लोक -मानस में देवताओं और देवियों के रूप में प्रतिष्ठित किया। चाहे नील नदी और सहारा रेगिस्तान का देश मिस्र हो या अफ्रीकी महाद्वीप के छोटे -बड़े देश , चाहे एशिया महाद्वीप का चीन हो या भारत , सभी देशों में स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर  तक उनके अपने -अपने देवी -देवता होते हैं। 
       भारतीय संस्कृति में तो प्राचीन काल से ही नदियों , पहाड़ों  और वनों को भी देवी -देवता के रूप में पूजा जाता  है और मानव समाज के प्रति उनके अमूल्य और अतुलनीय योगदान के लिए उनके प्रति आभार प्रकट किया जाता है।  राजतंत्र के जमाने में प्रत्येक राजवंश के स्वयं के कुल देवता और कुल -देवियाँ हुआ करती थी ।
   कुल -देवों और कुल -देवियों की पूजा -परम्परा
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अब तो राजतंत्र नहीं है,लेकिन कुल देवों और कुल देवियों की पूजा की परंपरा उनके यहाँ पीढ़ी दर -पीढ़ी आज भी चली आ रही है। यहाँ तक कि हम जैसे सामान्य मनुष्यों के भी अपने कुल देवता और कुल देवियाँ होती हैं।हमारे यहां  जनजातीय समाजों के भी अपने -अपने आराध्य देव और अपनी -अपनी आराध्य देवियां हैं। कई मनुष्य भी अपनी विलक्षण प्रतिभा ,अपने शौर्य ,अदम्य साहस और लोक हितैषी कार्यों की वजह से समाज में  सम्मानित होकर लोक मानस में देवी-देवता के रूप में स्थापित हो जाते हैं। उन्हें अलौकिक और अतुलनीय शक्तियों का केन्द्र मान लिया  जाता है।   आगे चलकर वे व्यापक जन -आस्था का केन्द्र बन जाते हैं। उन्हें लोक -देवता अथवा लोक -देवी के रूप में लोक -मान्यता मिल जाती है।
  हर गाँव और ग्राम समूहों के अपने देवी -देवता                    ****************
कृषि प्रधान भारत के ग्रामीण परिवेश वाले राज्य छत्तीसगढ़ में भी लगभग हर गाँव के और ग्राम समूहों के अपने देवी -देवता हैं।  हमारे अतीत में कई ऐसी महान विभूतियों ने इस धरती पर जन्म लिया ,जिन्होंने लोक -कल्याण की भावना से देश और समाज के हित में अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित कर दिया और लोक -देवता और लोक -देवी के रूप में जनता के दिलों पर हमेशा के लिए रच -बस गए। 
  छत्तीसगढ़ के लोक देवता करिया धुरवा और उनकी पत्नी करिया धुरविन यानी राजकुमारी देवी कुंअर  की जीवन गाथा इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है ,जिन्हें  महासमुंद जिले की तत्कालीन कौड़िया की ज़मींदारी  रियासत में जनता के बीच और विशेष रूप से आदिवासी समाज में देवी -देवता के रूप में अपार प्रतिष्ठा मिली।  आगे चलकर एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में उन्हें कौड़िया का शासक (राजा ) बनाया गया।  

           अर्जुनी में है करिया धुरवा का मंदिर
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उनका बहुत प्राचीन और इकलौता मंदिर राजधानी रायपुर से तक़रीबन 100 किलोमीटर और तहसील मुख्यालय पिथौरा से लगभग छह किलोमीटर पर ग्राम अर्जुनी में स्थित है । मुम्बई-कोलकाता राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 53 के किनारे ग्राम मुढ़ीपार से होकर अर्जुनी की दूरी सिर्फ़ दो किलोमीटर है। हर साल अगहन पूर्णिमा के मौके पर जन -सहयोग से तीन दिवसीय भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। आम तौर पर यह करिया धुरवा के मंदिर के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ प्रदेश अनेक आंचलिक देवी -देवताओं की जन्म भूमि और कर्म भूमि के रूप में विख्यात है ।
    अंचल के प्रसिद्ध उपन्यासकार शिवशंकर पटनायक की सशक्त लेखनी से करिया धुरवा की जीवन गाथा पहली बार उपन्यास के रूप में सामने आयी है। पिथौरा निवासी श्री पटनायक रामायण और महाभारत के पात्रों पर आधारित कई पौराणिक उपन्यासों के सिद्धहस्त लेखक हैं। जहाँ तक मुझे जानकारी है ,यह छत्तीसगढ़ के किसी लोक -देवता पर केन्द्रित पहला उपन्यास है।  करिया धुरवा इस उपन्यास के नायक हैं ,वहीं इसमें मानसाय और नोहर दस्यु जैसे अत्याचारी खलनायक भी हैं  । किसी भी अत्याचारी खलनायक की तरह उनका भी अंत बहुत बुरा होता है। उपन्यास में जन -कल्याणकारी लोकप्रिय शासकों के रूप में कोसल महाराजा और सिंहगढ़ नरेश  प्रियभान के चरित्र को भी रोचक ढंग से उभारा गया है।  करिया  धुरवा और उनकी पत्नी  देवी कुंअर के नाम पर उपन्यास का शीर्षक 'देवी करिया धुरवा ' रखा गया है।नायिका  देवी कुंअर को इसमें एक जागरूक ,सशक्त और साहसी नारी के रूप में चित्रित किया गया है।
            फ़िल्म निर्माण की संभावना 
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मुझे लगता है कि अनेक रोचक और रोमांचक घटनाओं से परिपूर्ण इस उपन्यास पर एक बेहतरीन फ़ीचर फ़िल्म भी बन सकती है ,बशर्ते छालीवुड के हमारे प्रतिभावान फ़िल्मकार इसके लिए आगे आएं और इसकी संभावनाओं पर विचार करें। 
      किंवदंतियों और कल्पनाओं का भी सहारा
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  लेखक ने उपन्यास को रोचक और प्रेरक बनाने के लिए जहाँ किंवदंतियों लोक -धारणाओं और कल्पनाओं का सहारा लिया है ,वहीं कई प्रसिद्ध लेखकों की पुस्तकों का गहन अध्ययन करके भी उन्होंने कुछ तथ्यों को इसमें अपनी शैली में प्रस्तुत किया है। उपन्यास लिखने के पहले उन्होंने तथ्य -संकलन के लिए  करिया धुरवा मेला समिति के पदाधिकारियों और अंचल के अनेक प्रबुद्ध लोगों और इतिहासकारों से भी चर्चा की थी। उपन्यास के शुरुआती साढ़े छह पन्नों के वक्तव्य में लेखक ने उन सबके प्रति आभार प्रकट किया है। उपन्यासकार का  कहना है कि लोक मान्यताओं के अनुसार यह घटना 200 वर्ष पहले की है। लेकिन इतिहास इस बारे में ख़ामोश है। किसी प्रकार का प्रामाणिक दस्तावेज नहीं था। अतः कोसल राज्य को केन्द्र बिंदु में रखना ही उन्होंने उचित माना।  उपन्यासकार के अनुसार करिया धुरवा एक आदिवासी युवा है। उसके दो भाई कचना धुरवा और सिंगा धुरवा भी हैं। करिया धुरवा एक कुशल और अप्रतिम  शिल्पकार हैं और अदम्य साहस के धनी कुशल योद्धा भी।  वह अच्छे चित्रकार और मूर्तिकार हैं  । उनके भाई कचना भी  एक साहसी और मेधावी युवा  हैं और सिंगा वनौषधियों के अच्छे जानकार और माँ कंकालिन के भक्त हैं। । उपन्यासकार ने अपनी इस कृति के सन्दर्भ में प्रारंभ में यह भी लिखा है कि   करिया धुरवा के  हाथों निर्मित मूर्तियाँ आज भी अर्जुनी सहित आस पास स्थित  सरागटोला ,छिबर्रा, कोकोभाठा ,गतवारी डिपरा और पोटापारा नामक गाँवों में आज भी मौज़ूद हैं।       
               उपन्यासकार शिवशंकर पटनायक 
          कोसल भूमि पर विस्तारित कथानक 
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यह उल्लेख करना भी उचित होगा कि तत्कालीन समय में ,सैकड़ों वर्ष पहले भारत के अन्य भू भागों की तरह छत्तीसगढ़ भी अनेक छोटी -बड़ी रियासतों में बँटा हुआ था। इन रियासतों के भी अपने -अपने पूजनीय देवी -देवता हुआ करते थे। उस समय यह सम्पूर्ण विशाल भू -भाग कोसल और दक्षिण कोसल के नाम से भी जाना जाता था  ।   उपन्यास का ताना -बाना इसी भू -भाग में रचा गया है। मानव सभ्यता का इतिहास हमें बताता है कि  विभिन्न राजनीतिक परिवर्तनों के कारण दुनिया में देशों और प्रदेशों की सीमाएं भी समय -समय पर परिवर्तित होती रहती हैं।उपन्यास का   कथानक तत्कालीन कोसल प्रदेश की छोटी -बड़ी अनेक रियासतों में  फैला हुआ है। इसमें छत्तीसगढ़ के वर्तमान पड़ोसी राज्य ओड़िशा के बूढ़ा सांवर और पाटना गढ़ का भी उल्लेख है और पाटनागढ़ के  आश्रित राज्य पिपौद का भी। बूढ़ा सांवर को राज बोड़ासाम्बर भी कहा जाता है ,जिसका वर्तमान मुख्यालय ओड़िशा के बरगढ़ जिले का पदमपुर कस्बा है ,जोकि एक तहसील मुख्यालय भी है।वहीं पाटनागढ़ भी अब ओड़िशा के बलांगीर जिले का तहसील मुख्यालय है। करिया ,कचना और सिंगा ,तीनों आदिवासी समाज के हैं। लेखक के अनुसार धुरवा उपनाम मध्यवर्ती छत्तीसगढ़ के अंचलों में अधिक प्रचलित है और तीनों  इन अंचलो के जन -मानस के नायक हैं। तीनों भाई आमात्य गोंड समुदाय के है । 
     सिंहगढ़ के  प्रजा -वत्सल राजा प्रियभान 
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  उपन्यास की शुरुआत कोसल राज्य की सिंहगढ़ रियासत के प्रजा वत्सल राजा प्रियभान के आदर्श व्यक्तित्व और न्याय प्रिय तथा लोक कल्याणकारी प्रशासन के वर्णन से होती है। प्रियभान को उनके इस करुणामय व्यक्तित्व के कारण जनता 'संत राजा ' के नाम से सम्बोधित करती है। उपन्यासकार के अनुसार कोसल राज्य की रियासतों में सिंहगढ़ आदर्श था । चित्रोत्पला महानदी के किनारे यह  रियासत सघन वनों और सोना -चाँदी  ,ताम्बा ,लोहा जैसी  बहुमूल्य खनिज सम्पदाओं से परिपूर्ण थी।  यहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य दर्शनीय था। संत राजा की कोई संतान नहीं थी । कठोर तपस्या से उन्हें ठाकुर देवता बूढ़ादेव का आशीर्वाद मिला और कन्या रत्न की प्राप्ति हुई ,जिसका नामकरण देवी कुंअर किया गया। 
              राजकुमारी का अपहरण
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रियासत में एक दिन संत राजा प्रियभान की पुत्री राजकुमारी देवी कुंअर का अपहरण हो जाता है। अपहरण की साजिश राजा के  ही पालित पुत्र चन्द्रभान द्वारा रची जाती है ,जो राजकुमारी को जहरीला प्रसाद खिलाकर बेहोश कर देता है और उसके तत्काल बाद महानदी की लहरों में डोंगी पर घात लगाकर बैठे नोहर नामक दस्यु के लोग उसे अगवा कर लेते हैं । चन्द्रभान सिंहगढ़ की रानी जोतकुंअर के भाई तेज का पुत्र है । तेज के आग्रह पर राजा प्रियभान ने चन्द्रभान को महल में रखकर उसका लालन पालन किया था। बहरहाल ,अपहृत राजकुमारी को बचाने के लिए उसकी सहेली सुकमत महानदी के किनारे किनारे दौड़ लगाती है। तभी महानदी के तट पर स्थित एक गाँव के लोग इस दृश्य को देखकर शोर मचाते हैं । 
          करिया धुरवा की धमाकेदार एंट्री                               **************
तभी उस कोलाहल भरे दृश्य में करिया धुरवा की धमाकेदार एंट्री होती है और वह नदी में छलांग लगाकर पूरी ताकत से डोंगी को रोक लेता है।यह करिया धुरवा का गाँव है। बेहोश राजकुमारी को करिया के निवास में लाया जाता है। करिया के निर्देश पर उनके छोटे भाई सिंगा वनौषधियों से राजकुमारी का उपचार करता है। वह होश में आ जाती है। इसी दरम्यान  वहाँ अचानक नोहर दस्यु के तलवारधारी  लोग आ धमकते हैं।  तीनों भाई अपने अदम्य साहस से उनका मुकाबला करके उन्हें वहाँ से भगा देते हैं। करिया धुरवा राजकुमारी को सुकमत के साथ पालकी में  सिंहगढ़ रवाना किया जाता है। सुरक्षा की दृष्टि से उनके साथ करिया प्रशिक्षित युवा लड़ाकुओं को भेजता है। क्रिया स्वयं घोड़े पर उनके साथ चल रहा होता है। रास्ते में एक बार और नोहर दस्यु के लोग राजकुमारी को अगवा करने के लिए हमला करते हैं,लेकिन करिया अपने अदम्य साहस से मुकाबला करते हुए इस हमले को विफल कर देता है।इस संघर्ष के समय  राजकुमारी भी पालकी से उतर जाती है और  करिया पर पीछे से वार करने की कोशिश कर रहे एक हमलावर को भूमि पर पटक देती है। इसके बाद करिया अपने शौर्य और पराक्रम से  हमलावरों को गाजर मूली की तरह काटने लगता है ।कई हमलावर भाग जाते हैं। राजकुमारी को करिया सुरक्षित ढंग से सिंहगढ़ पहुँचाता है।
    चिंगरोल के अत्याचारी शासक ने किया था 
        कोसल की  18 रानियों का अपहरण 
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  उपन्यास में  करिया धुरवा के शौर्य की दो और घटनाओं का भी वर्णन है ।इनमें से एक घटना उस समय की है ,जब चिंगरोल नामक जमींदारी के अत्याचारी शासक मानसाय ने अपने खुशामदी स्वभाव से कोसल महाराज के पास जाकर झूठ मूठ अपना परिचय करिया धुरवा के मित्र के रूप में दिया और महाराज का विश्वास जीतकर उनके महल में रहने लगा। मानसाय को  वशीकरण विद्या के तहत देवीधरा मंत्र की सिद्धि प्राप्त थी ।एक दिन उसने कोसल नरेश के महल की 18 रानियों पर इस मंत्र का प्रयोग करके उन्हें अपने वश में कर लिया और रात्रि में अपने मित्रों के सहयोग से उन्हें लेकर भाग निकला। रास्ते में कौड़िया रियासत के एक स्थान पर करिया धुरवा प्रकट होता है। वह कोसल नरेश की इन 18 रानियों को मान साय समेत पास के एक बड़े गाँव में ले आता है ।करिया के निर्देशों के  अनुरूप  गाँव की कुछ महिलाएं इन रानियों को सरोवर में नहलाकर  मंत्र -बाधा से मुक्त करती हैं। करिया के ही निर्देश पर गाँव के लोग मानसाय को एक वृक्ष के तने से बांध देते हैं। 
        आज भी है वह गाँव अट्ठारहगुड़ी 
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   करिया धुरवा ने कोसल नरेश की इन सभी 18 रानियों के लिए जनता के सहयोग से वहाँ रहने की व्यवस्था करवाई और उनके लिए स्वयं के खर्च से  अट्ठारह गुड़ियों ( निवासों)  का भी निर्माण करवाया।करिया ने ग्राम प्रधान से कहा कि निवास को मंदिर कहा जाता है।इसे हम आदिवासी गुड़ी कहते हैं। करिया ने यह भी कहा कि आज से कौड़िया राज्य में स्थित यह गाँव इन निर्दोष माताओं के कारण अट्ठारहगुड़ी के नाम से जाना जाएगा। कौड़िया रियासत में आज भी यह गाँव है ,जो वर्तमान पिथौरा तहसील के ग्राम नयापारा (खुर्द )से लगा हुआ है।मानसाय चिंगरोल रियासत का शासक  था। यह रियासत पाटना गढ़ राज्य के अंतर्गत आती  थी।  करिया के सुझाव पर मानसाय को कोसल की राजधानी के कारागार में बंदी बनाकर रखा गया। कोसल नरेश ने उसके अत्याचारों के बारे में चिंगरोल से प्राप्त गंभीर शिकायतों की जाँच करवाने का निर्णय लिया। सिंगा धुरवा ने चिंगरोल पहुँचकर इन शिकायतों की जाँच की ,जो सही पायी गयी।पाटनागढ़ के राजा ने चिंगरोल को अपने नियंत्रण में ले लिया। फिर शासक मानसाय को मौत की सजा दे दी गयी।उस पर कॉल नरेश से मिथ्या कथन ,कपट भाव से रानियों पर देवीधरा मंत्र का प्रयोग करके उनका अपहरण करने ,चिंगरोल की जनता के शोषण और उत्पीड़न के आरोप लगाए गए थे
    करिया ने द्वंद्व युद्ध में किया दस्यु नोहर का अंत 
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 एक अन्य घटना में सम्पूर्ण कोसल प्रदेश  को दस्यु नोहर के आतंक से मुक्त करने के लिए  करिया के सुझाव पर कोसल नरेश ने द्वंद्व युद्ध का आयोजन करने का निर्णय लिया । इसमें नोहर को विजयी होने की स्थिति में राजद्रोह के आरोप से क्षमादान की शर्त रखी गयी। करिया ने नोहर के साथ द्वंद्व युद्ध की पेशकश की। मल्ल युद्ध में तो किसी एक की जीत और किसी एक की हार होती है ,जबकि द्वंद्व युद्ध में दोनों में से किसी एक की मौत तय मानी जाती है।विजयादशमी के दिन कोसल नरेश की उपस्थिति में सिंहगढ़ में हुए  द्वंद्व युद्ध में करिया ने अपने शारीरिक  और मानसिक कौशल से पाशविक शक्ति वाले दस्यु नोहर को मौत के घाट उतार दिया।
 तीनों भाई बनाए गए   तीन रियासतों के राजा 
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इसके बाद सिंहगढ़ के राजभवन में  हुई  एक पारिवारिक बैठक में सिंहगढ़ के राजा प्रियभान ने कोसल नरेश के समक्ष प्रस्ताव रखा कि करिया को कौड़िया उसके भाई कचना को बिंद्रा और सिंगा को भाठा  राज्यों का शासक (राजा) बनाने का प्रस्ताव रखा । कोसल नरेश ने तीनों को इन राज्यों का राजा घोषित करते हुए राजाज्ञा भी जारी कर दी।दरअसल इन तीनों राज्यों में अनेक प्रशासनिक समस्याएं थीं। कोसल नरेश का कहना था कि कौड़िया राज्य (वर्तमान पिथौरा तहसील ) उत्कल राज्यों की सीमा पर होने के कारण काफी संवेदनशील है। बिंद्रा राज्य (वर्तमान जिला - बिंद्रानवागढ़ या गरियाबंद)  के राजा अत्यंत धार्मिक तथा सरल स्वभाव के हैं।अतः यह राज्य शिथिल प्रशासन से ग्रस्त है।कभी भी वाह्य आक्रमण हो सकता है।महानदी के तट से कुछ दूर स्थित भाठा राज्य (वर्तमान भाठापारा तहसील ) का शासक महत्वाकांक्षी और क्रूर है।उसका अधिकांश समय शिकार खेलने में चला जाता है। इन्हीं गंभीर कारणों से तीनों राज्यों का शासन तीनों भाइयों को सौंपा गया।इसके बाद कोसल नरेश के प्रस्ताव पर सिंहगढ़ नरेश प्रियभान ने  राजकुमारी देवी कुंअर का विवाह करिया धुरवा से  कर दिया । दोनों  कौड़िया राज्य पहुँचे। महाराज करिया ने एक महत्वपूर्ण घटना क्रम में पड़ोसी राज्य पिपौद के नशेबाज और विलासी शासक केवराती को बंदी बनाए जाने के बाद भी उसकी पत्नी की प्रार्थना स्वीकार करते हुए उसे क्षमा कर दिया।

   तुम दोनों को  मंदिर में स्थापित किया जाएगा 
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 एक दिन जब कौड़िया महाराज करिया और रानी देवी कुंअर महल में कुछ मंत्रणा कर रहे थे ,तभी वहाँ अचानक एक साधु का आगमन हुआ। साधु ने  दोनों को क्रमशः साक्षात महा काल कालेश्वर बूढा देव और शक्ति स्वरूपा भवानी का अंश बताया और कहा कि तुम दोनों की पूजा मानव करेगा और तुम दोनों को मंदिर में देव और देवी के रूप में स्थापित किया जाएगा। इसके बाद साधु  अपने विश्राम की व्यवस्था करने के लिए कहकर  अदृश्य हो गए। महाराज करिया और देवी कुंअर संशय में पड़ गए कि ये साधु कहीं स्वयं साक्षात ठाकुर देव या महादेव बूढ़ा देव तो नहीं थे ? आज भी तत्कालीन कौड़िया रियासत के ग्राम अर्जुनी में स्थित मंदिर में करिया धुरवा और देवी करिया धुरवाइन यानी देवी कुंअर की पूजा होती है और अगहन महीने की पूर्णिमा के दिन वहाँ तीन दिनों तक विशाल मेले का आयोजन होता है।
            पात्रों के माध्यम से प्रेरक संदेश 
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 आंचलिक भाव -भूमि पर आधारित अपने इस उपन्यास में  पात्रों के माध्यम से कई ऐसे प्रेरक विचार भी पाठकों के सामने आते हैं ,जिनकी प्रासंगिकता आज के समय में और भी अधिक बढ़ जाती है । इनके माध्यम से लेखक ने समाज को प्रेरणादायक संदेश देने का प्रयास किया है। जैसे --बाल्यकाल में सिंहगढ़ नरेश प्रियभान की पुत्री देवी कुंअर का अपने पिता से यह पूछना कि समाज में पुत्रवान भवः जैसा आशीष क्यों दिया जाता है ,जबकि पुत्र और पुत्री ,दोनों ही तो संतान हैं , या फिर गुरु के द्वारा देवी कुंअर से यह कहना कि जब हम मनुष्य अथवा मानव का उल्लेख करते हैं तो इसका आशय ही नर एवं नारी दोनों हैं ,दोनों एक -दूसरे के पूरक हैं और नारी को शिक्षा अनिवार्य रूप से प्राप्त करनी चाहिए ,क्योंकि इसके माध्यम से ही वह मातृकुल और सासू कुल को तार सकती है। 

महिला सशक्तिकरण का प्रतीक देवी कुंअर 
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उपन्यास में राजकुमारी देवी कुंअर के व्यक्तित्व को  तत्कालीन समाज में महिला सशक्तिकरण के लिए काम करने वाली एक जागरूक नारी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह महिलाओं को संगठित करती है। वह घुड़सवारी , तीरंदाजी और खड्ग चालन में भी माहिर है। राज्य की महिलाओं से उसका  जीवंत सम्पर्क रहता है।वह जन -सामान्य के घरों में भी सहजता और आत्मीयता से आती जाती है, उनकी रसोई में जाकर बरा , सोंहारी, ठेठरी ,खुरमी जैसे तरह -तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनाती है।तीज -त्यौहारों में उनके  साथ रहती है। महिलाओं को शिक्षा और संगठन शक्ति का महत्व बताती है। रूढ़ियों और अंध-विश्वासों से बचने की नसीहत देती है ,संस्कारों के साथ आत्मरक्षा के लिए उन्हें तीर ,बरछा और तलवार चलाना भी सिखाती है। वह मदिरापान की सामाजिक बुराई के ख़िलाफ़ भी उन्हें सचेत करती है।
         युद्ध का अर्थ ही सर्वनाश 
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इतना ही नहीं ,बल्कि  उपन्यास में महाराज करिया धुरवा की  छवि एक शांतिप्रिय शासक के रूप में भी उभरती है। वह अपने पड़ोसी राज्य पिपौद के राजा केवराती से  युद्ध नहीं चाहते।  रानी देवी कुंअर से अपने युद्ध विरोधी शांतिप्रिय विचारों को साझा करते हुए वह कहते हैं --" द्वंद्व युद्ध के परिणाम से केवल दोनों प्रतिभागी प्रभावित हो सकते हैं ,किंतु युद्ध का अर्थ  ही सर्वनाश है। एक अपराधी होता है ,किंतु अंसख्य निरपराध ,निर्दोष , राज्य - धर्म के नाम पर दोनों ओर से जीवन के मूल्य पर दंड प्राप्त करते हैं। इसमें भी एक सैनिक अपने प्राणों की आहुति देता है ,किंतु पीड़ित तो पूरा परिवार होता है।मैं भी अनावश्यक युद्ध नहीं चाहता।साथ ही युद्ध को थोपा जाना भी मैं उचित नहीं मानता। मुझे कौड़िया की प्रजा पर शत -प्रतिशत विश्वास है। सैन्य शक्ति की मुझे तनिक भी चिन्ता नहीं है,क्योंकि पिपौद की प्रजा भी युद्ध नहीं चाहती। वास्तविकता यह है कि मै मात्र केवराती के लिए किसी भी मूल्य पर प्रजा के जीवन को युद्ध के माध्यम से अशांत नहीं करना चाहता। " 
     उपन्यास में एक राजा अथवा शासक को कैसा होना चाहिए ,इसे भी कौड़िया महाराज  करिया धुरवा के माध्यम से स्पष्ट किया गया है। वह अपनी रानी से कहते हैं -- "किसी भी राजा अथवा शासक को निजत्व को कभी भी महिमा मंडित कर सर्वोपरि नहीं मान लेना चाहिए। मान-अपमान ,यश -अपयश की व्याख्या करते समय सर्व कल्याण और प्रजा हित का चिंतन आवश्यक है। "
   एकलव्य थे करिया धुरवा के आदर्श 
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लेखक ने उपन्यास में  महाभारत के चर्चित पात्र एकलव्य का भी जिक्र किया है।वैसे एकलव्य के जीवन पर उनका एक उपन्यास अलग से भी है ,लेकिन करिया धुरवा पर केन्द्रित यह  उपन्यास हमें बताता है कि वह (करिया धुरवा ) एकलव्य की जीवन गाथा से बहुत प्रभावित है। इसमें सिंहगढ़ नरेश अपनी पुत्री देवी कुंअर को बताते है कि करिया धुरवा का आदर्श नायक आदिवासी पुरखा पुरुष एकलव्य है। आगे के एपिसोड में कौड़िया के महल में महाराज करिया धुरवा और  उनकी  रानी भी आपसी बातचीत में एकलव्य की चर्चा करते हैं।करिया अपनी रानी से कहते हैं --" देवी ,हम महान व्रती ,तपी और त्यागी एकलव्य के वंशज हैं , जिनका चिंतन हमारा धर्म तथा दर्शन जीवन मंत्र है। तुम्हें स्मरण है न देवी , वनवासी वन -नायक एकलव्य ने ही महाराज युधिष्ठिर से वनवासियों के हित में अनेक राजाज्ञाएँ जारी करायी और प्रथम बार महाराज युधिष्ठिर ने वनवासियों को आदिवासी के रूप में अलंकृत कर सम्बोधित किया था। "  
द्रोणाचार्य ने नहीं मांगा था एकलव्य का अंगूठा 
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 उपन्यास में एक नया तथ्य यह भी उभरकर आया है कि गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से अंगूठा नहीं मांगा था। रानी देवी कुंअर इस संदर्भ में महाराज करिया से कहती हैं -- " भील वनवासी युवक एकलव्य हमारे गौरव हैं।गुरु द्वारा शिक्षा देने से वंचित किए जाने पर भी गुरु माटी प्रतिमा के समक्ष त्याग ,निष्ठा तथा निर्भाव से  समस्त शास्त्र विधाओं में पारंगत होना तथा गुरु के दक्षिणा मांगने के भाव को समझकर ही सीधे हाथ के अंगूठे को काटकर दे देना और गुरु को जन -रोष के कलंक से  मुक्त करते हुए दृढ़ता से कहना कि गुरु ने तो अपने मुख से दक्षिणा मांगी ही नही  थी ,उन्होंने तो अर्जुन की मानसिकता का ही जिक्र किया था ,मैंने ही आशय समझ कर अंगूठा काटकर दे दिया था , गुरु को मानसिक उलझन तथा धर्म संकट से मुक्त करना शिष्य का परम दायित्व होता है , वास्तव में एकलव्य की महानता ही थी।" 

 लोक देवता करिया धुरवा पर आधारित इस प्रथम उपन्यास में और भी कई प्रेरक प्रसंग हैं ,जिनसे पता चलता है कि  करिया धुरवा और रानी देवी कुंअर केवल मूर्तियों के रूप में प्रणम्य नहीं हैं बल्कि मानव के रूप में उनके विचार और उनके कार्य हर किसी के लिए अनुकरणीय हैं ,प्रेरणादायक हैं। लगभग 136 पृष्ठों के इस उपन्यास की प्रवाह पूर्ण भाषा पाठकों को अंत तक बांधकर रखती है। 

   आलेख  -- स्वराज करुण

Sunday, October 10, 2021

गद्य साहित्य के एकांत साधक :छत्तीसगढ़ के शिवशंकर पटनायक

(आलेख : स्वराज करुण )

आम तौर पर साहित्य सृजन में रचनाकार के आस -पास के माहौल का भी बड़ा  योगदान रहता  है। एक ऐसे   इलाके में , जहाँ अधिकांश साहित्यिक गतिविधियां सिर्फ़ कविताओं पर  केन्द्रित रहती हैं  ,वहाँ शिवशंकर पटनायक फिलहाल इकलौते रचनाकार हैं जो गद्य लेखन की साहित्यिक विधा को  पूरी तल्लीनता से आगे बढ़ा रहे हैं। वर्तमान में वह इस अंचल में गद्य-साहित्य के एकांत साधक हैं । उनके अलावा और कोई हो , जो 'छुपे -रुस्तम ' की तरह गद्य लेखन में लगा हो तो मुझे उसकी जानकारी नहीं है। 
  श्री पटनायक छत्तीसगढ़ के महासमुन्द जिले में ग्रामीण परिवेश के  छोटे -से कस्बाई शहर पिथौरा के निवासी हैं । इस   जिले में 5 तहसीलें हैं-महासमुन्द , बागबाहरा  ,पिथौरा ,बसना और सरायपाली । इनमें से महासमुंद को  राष्ट्रीय स्तर के व्यंग्यकार स्वर्गीय लतीफ़ घोंघी के गृह नगर के रूप में भी ख्याति मिली है ,जो गद्य विधा में व्यंग्य लेखन के सशक्त हस्ताक्षर थे और जिनके लगभग 30 व्यंग्य संग्रह प्रकाशित और प्रशंसित हुए हैं। वर्ष 2005 में उनके देहावसान के बाद पूरे जिले में ऐसा माना जा रहा था कि गद्य लेखन और प्रकाशन के क्षेत्र में खालीपन आ  गया है ,लेकिन उन्हीं दिनों और उसके पहले से भी शिवशंकर पटनायक बड़ी खामोशी से कहानियां ,उपन्यास,  निबंध और व्यंग्य लिख रहे थे। 


     सरकारी नौकरी में राजनांदगांव में रहने के दौरान उनका व्यंग्य संग्रह -'क्या आप इज़्ज़त की तलाश में हैं 'शीर्षक से प्रकाशित हुआ था ,जिसमें 10 लेख संकलित हैं।यह उनका इकलौता व्यंग्य संग्रह है। उन्होंने बड़ी संख्या में कहानियों, उपन्यासों और निबंधों की रचना की है। नाट्य लेखन की एकांकी विधा में भी उन्हें महारत हासिल है।
            अब तक सैंतीस ....
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 इन सभी विधाओं में उनकी प्रकाशित ,अप्रकाशित पुस्तकों की संख्या 37 तक पहुँच गयी है।
इनमें से अब तक 28 पुस्तकें  छप चुकी हैं। इनमें  7 कहानी -संग्रह , 9 उपन्यास   दो खंडों में प्रकाशित 5 लघु उपन्यास, एक व्यंग्य संग्रह , तत्व चिन्तन पर आधारित 5 आलेख संग्रह और उनके गृह ग्राम पिथौरा के स्थानीय इतिहास पर आधारित एक पुस्तक शामिल है  जबकि तीन उपन्यासों सहित कुल 5 पुस्तकें अभी प्रकाशन के लिए प्रेस में  हैं। 
   
उनकी प्रकाशित पुस्तकें इस प्रकार हैं
   * कहानी संग्रह -(1)पराजित पुरुष (2)पलायन (3) प्रारब्ध (4)डोकरी दाई (5) बचा ..रे...दीपक (6) अंत एक संत का और (7) मंदिर सलामत है। ये सभी सामाजिक कहानियों के संग्रह हैं। 

* उपन्यास   (1)भीष्म -प्रश्नों की शर -शैय्या पर (2) कालजयी कर्ण (3) एकलव्य (4) कोशल नंदिनी (5) आत्माहुति (6) अग्नि स्नान (7) देवी करिया धुरवा (8) नागफ़नी पर खिला गुलाब और (9) समर्पण 

*लघु उपन्यास---
(1)कुन्ती (2)द्रौपदी(3) अहल्या (4) तारा और (5) मंदोदरी (आदर्श नारियां भाग -1और भाग -2 में प्रकाशित ।
*चिन्तन परक लेख संग्रह -
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 -(1) मनोभाव (2) विकार -विमर्श (3) मानसिक दशा एवं दर्शन (4) नारी -अस्मिता : संकट एवं समाधान और (5) आप मरना क्यों नहीं चाहते । 

*व्यंग्य संग्रह -- क्या आप इज़्ज़त की तलाश में हैं ?
  
* स्थानीय इतिहास -- उनकी एक प्रकाशित पुस्तक 'पिथौरा सौ साल ' में इस इलाके के विगत एक शताब्दी के स्थानीय  इतिहास और सामाजिक -आर्थिक विकास की  झलक मिलती है। 
      
        पाँच पुस्तकें प्रेस में 
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  -(1)उपन्यास -- भगवान श्रीराम के अनुज भरत पर केन्द्रित 'भरत :भातृत्व एवं त्याग का प्रतीक , (2)उपन्यास -- अश्वत्थामा पर केन्द्रित 'नरो वा कुंजरो' और (3) सामाजिक उपन्यास -पतली -सी परत।  इनके अलावा (1) सफ़र ज़िंदगी का : स्मृतियां और घटनाएं और (2) निबंध संग्रह -आत्म -वार्तालाप भी इस वक्त प्रेस में हैं। 
      
         नाट्य साहित्य 
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*अप्रकाशित नाटक  (1) अदालत का फैसला (2) बंग के फूल और (3) अमानत । इनमें से 'बंग के फूल ' का मंचन वर्ष 1971 में इस अंचल के विभिन्न गांवों में हुआ था। यह नाटक वर्ष 1971 में पाकिस्तान की फ़ौजी हुकूमत के ख़िलाफ़ बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान)की जनता के स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित था।  ते थे। 

*अप्रकाशित उपन्यास(1)पुष्कर 

श्री पटनायक के प्रकाशित उपन्यासों में  'कोशल नंदिनी ' मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की माता कौशल्या  और 'अग्नि -स्नान ' लंका नरेश रावण की जीवनी पर आधारित उपन्यास हैं ,जबकि 'आत्माहुति'  में माता कैकेयी के जीवन सफर को उपन्यास के साँचे में ढाला गया है।      
   
       करिया धुरवा :छत्तीसगढ़ के 
        लोक देवता पर पहला  उपन्यास 
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        उपन्यास 'देवी करिया धुरवा ' छत्तीसगढ़ के लोक देवता करिया धुरवा और उनकी धर्म पत्नी की जीवन गाथा है,जो इस प्रदेश के किसी भी लोक देवता के जीवन पर आधारित संभवतः  पहला उपन्यास है। उल्लेखनीय है कि पिथौरा से करीब 6 किलोमीटर पर ग्राम अर्जुनी में करिया धुरवा और माता भगवती का प्राचीन मंदिर है ,जहाँ हर साल अगहन पूर्णिमा के मौके पर तीन दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है।
  
   सचमुच 'कलम के धनी' हैं : कलम से ही लिखते हैं 
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     कम्प्यूटर क्रांति के इस दौर में जब अधिकांश पढ़े -लिखे  लोगों में  कलम से लिखने  की आदत छूटती जा रही  है , दो -चार वाक्य कलम से लिख लेने पर  बहुतों की   उंगलियों में दर्द होने लगता है , तब  यह देखकर और सुनकर किसे आश्चर्य नहीं होगा कि 78 वर्षीय साहित्यकार श्री पटनायक आज भी  लम्बी -लम्बी कहानियां और  बड़े से बड़े उपन्यास अपने हाथ  से लिखते हैं। अब तक प्रकाशित पुस्तकों की उनकी हस्तलिखित  पांडुलिपियां हजारों पन्नों की होंगी । वह फुलस्केप कागज के दोनों ओर  लिखते हैं । 
वास्तव में  ऐसे ही लोग   'कलम के धनी ' होते हैं ,क्योंकि वे कलम से लिखते हैं । उन्हें  प्रेमचंद की तरह 'कलम के सिपाही 'का भी दर्जा दिया जा सकता है। श्री पटनायक  इस अंचल के अकेले ऐसे साहित्यकार हैं ,जिनके साहित्य पर पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर से तीन शोधार्थियों को पीएच-डी. की उपाधि मिल चुकी है और  दो शोधार्थी शोध प्रबंध लिख रहे हैं। 
 
      डोकरी दाई : 'कथा मध्यप्रदेश' में शामिल 
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श्री पटनायक की  एक कहानी 'डोकरी दाई ' को अविभाजित मध्यप्रदेश के कथाकारों पर केन्द्रित वृहद कोश 'कथा मध्यप्रदेश 'के  में शामिल किया गया है।   यह विशाल ग्रंथ पाँच खण्डों में वर्ष 2017 में संतोष चौबे के सम्पादन में विश्व कला एवं संस्कृति केन्द्र ,ग्राम मेहुआ ,जिला -रायसेन द्वारा प्रकाशित किया गया है। यह केन्द्र आईसेक्ट और सी.वी .रमन विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित है।

            जीवन सफ़र की शुरुआत
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   उन दिनों पिथौरा छोटा -सा गाँव था ,जहाँ एक अगस्त 1943 को शिवशंकर पटनायक का जन्म हुआ था।  पिता स्वर्गीय बंशीधर पटनायक और माता स्वर्गीय राजकुमारी पटनायक के इस प्रतिभावान सपूत की प्राथमिक से लेकर हाई स्कूल तक की शिक्षा पिथौरा में हुई। यहीं उन्होंने शासकीय उत्तर बुनियादी शाला में  पहली से आठवीं तक और रणजीत कृषि उच्चतर माध्यमिक शाला में दसवीं (मेट्रिक )तक शिक्षा प्राप्त की। वह 1960 में मेट्रिक पास हुए। साहित्यिक अभिरुचि उनमें स्कूली शिक्षा के दौरान विकसित हो चुकी थी ।
       
        ये भी कोई उम्र है उपन्यास लिखने की ?
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विद्यार्थी  जीवन का एक रोचक किस्सा मुझसे साझा करते हुए उन्होंने बताया कि जब वह नवमीं के छात्र थे ,तब उन्होंने एक सामाजिक उपन्यास 'पुष्कर 'की रचना की थी। हालांकि वह पुस्तक रूप में छप नहीं पायी और अब तो उसकी पांडुलिपि भी उनके पास नहीं है। वर्ष 1958 की घटना है। 
      नवमीं के छात्र द्वारा उपन्यास लिखे जाने की ख़बर किसी अन्य के जरिए जब प्राचार्य श्री उमाचरण तिवारी को मिली तो उन्होंने शिवशंकर पटनायक को बुलाया और पहले तो डाँट लगाकर कहा -"ये भी कोई उम्र है   उपन्यास लिखने की ?  अभी तो बेटा ख़ूब पढ़ाई करो और अपना कैरियर बनाओ। " लेकिन बाद में  प्राचार्य महोदय ने उनका लिखा उपन्यास पढ़कर बड़े स्नेह से उनकी तारीफ़ भी की और शुभकामनाएं दीं। 
      
  "बाहर के किसी  नाटक का मंचन नहीं होगा " 
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पुरानी यादों से जुड़ा एक और दिलचस्प प्रसंग श्री पटनायक ने  मुझसे साझा किया।  वह  उन दिनों स्थानीय रणजीत कृषि उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक थे। स्कूल में होने वाले वार्षिक स्नेह सम्मेलनों में नाटकों का भी मंचन होता था ,जिनमें अध्यापक और विद्यार्थी स्वयं अभिनय किया करते थे। श्री पटनायक बताते हैं कि प्राचार्य श्री उमाचरण तिवारी की  सख़्त हिदायत दी थी बाहर के किसी भी नाटक ,एकांकी या प्रहसन  का मंचन नही होगा।  शिक्षक  स्वयं  लिखें और छात्रों से उसका मंचन करवाएं। उन्होंने शिक्षकों की लेखन प्रतिभा और विद्यार्थियों की अभिनय प्रतिभा को परखने और निखारने के लिए ऐसा रचनात्मक आदेश दिया था। उनके आदेश का सहर्ष पालन होता था। शिक्षक खुद उत्साह के साथ नाटक लिखते थे और अपने छात्रों से उसका मंचन करवाते थे। उन्हीं दिनों बांग्लादेश की जनता पर पाकिस्तानी फ़ौज अमानवीय अत्याचार कर रही थी। बांग्लादेशी अपने वतन की आज़ादी के लिए लड़ रहे थे और भारत -पाकिस्तान युद्ध भी चल रहा था। इस माहौल ने शिवशंकर पटनायक को नाटक 'बंग के फूल ' लिखने के लिए प्रेरित किया।
         
      रिटायरमेंट के बाद अब और
        तेज चल रही कलम 
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     पिथौरा में हाई स्कूल तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद  कॉलेज की पढ़ाई के लिए वह रायपुर चले गए ,जहाँ उन्होंने शासकीय विज्ञान महाविद्यालय में  गणित विषय लेकर बी.एससी. की डिग्री हासिल की। पिथौरा लौटकर रणजीत कृषि उच्चतर माध्यमिक शाला में अध्यापक नियुक्त हुए। अध्यापन कार्य के साथ उन्होंने स्वाध्यायी छात्र के रूप में इतिहास में एम .ए. किया ,फिर बी.एड.। वह  तत्कालीन मध्यप्रदेश लोकसेवा आयोग की परीक्षा में भी शामिल हुए और इसमें सफल होने पर उन्हें वर्ष 1975 में सहकारिता विभाग में सहायक पंजीयक के पद पर नियुक्त किया गया। विभाग में पदोन्नत होते हुए वह वर्ष 2003 में छत्तीसगढ़ शासन के प्रथम श्रेणी राजपत्रित के अधिकारी के रूप में संयुक्त पंजीयक (सहकारिता)के   पद से रायपुर में सेवानिवृत्त हुए। रिटायरमेंट के बाद उनकी कलम  अब और भी तेजी से चल रही है। वह अपने बहुत बड़े पैतृक मकान के छोटे -से कमरे में अपनी पलंग के सामने रखी छोटी -सी टेबल पर खूब जमकर लिखते हैं। 
आलेख और फोटो : स्वराज करुण

Tuesday, September 28, 2021

व्यंग्य - धनुष के बेजोड़ तीरंदाज लतीफ़ घोंघी


       (आलेख : स्वराज करुण )
जिनके व्यंग्य धनुष के नुकीले तीरों ने देश और दुनिया की तमाम तरह की सामाजिक ,आर्थिक विसंगतियों को अपना निशाना बनाया , जिनके व्यंग्य बाण  समय -समय पर  मीठी छुरी की तरह चलकर , हँसी -हँसी में ही लगभग 50 वर्षों तक  भारत के भयानक टाइप भाग्य विधाताओं को घायल करते रहे , हिन्दी व्यंग्य साहित्य के ऐसे बेजोड़  तीरंदाज स्वर्गीय लतीफ़ घोंघी का  आज जन्म दिन है। उन्हें विनम्र नमन । 
     व्यंग्य लेखन की उनकी अपनी एक विशेष शैली थी । वह व्यंग्य के तीर हास्य की चाशनी में डुबोकर चलाया करते थे।  हमारे आस -पास  होने वाली   दिन -प्रतिदिन की घटनाएं और देश -दुनिया के खलनायक जैसे लोग उनके व्यंग्य बाणों की जद में रहा करते थे। 
  लतीफ़ साहब  आधुनिक हिन्दी साहित्य की व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर थे । उन्होंने  महासमुन्द जैसे छोटे कस्बाई शहर में रहकर अपनी सुदीर्घ   साहित्य साधना के जरिए देश -विदेश के हिन्दी संसार में छत्तीसगढ़ का नाम रौशन किया ।  लतीफ़ साहब ने  हिन्दी साहित्य के अनमोल ख़ज़ाने को अपनी एक  बढ़कर एक व्यंग्य रचनाओं के मूल्यवान रत्नों  से समृद्ध बनाया। आज उनका जन्म दिन है।  उन्हें विनम्र नमन ।
                     
    महासमुन्द उनका गृह नगर था।  इसी नगर के पास ग्राम बेलसोंडा में 28 सितम्बर 1935 को उनका जन्म हुआ था। निधन 24 मई 2005 को महासमुन्द में हुआ।   लगभग आधी शताब्दी के  उनके लेखकीय जीवन में विभिन्न  पत्र -पत्रिकाओं में बड़ी संख्या में उनकी रचनाएं नियमित रूप से छपती रहीं।  । देश के अनेक प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थानों से उनके 35 से अधिक व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हुए। इनमें - तिकोने चेहरे (वर्ष 1964),  उड़ते उल्लू के पंख (1968), मृतक से क्षमा याचना सहित (वर्ष 1974), बीमार न होने का दुःख (वर्ष 1977), संकटलाल ज़िंदाबाद (वर्ष 1978),  बुद्धिमानों से बचिए (वर्ष 1988) और मंत्री हो जाने का सपना (वर्ष 1994) भी उल्लेखनीय हैं।  
   मुस्कुराहटों के साथ तिलमिलाहटें उनकी व्यंग्य रचनाओं की विशेषता थी ,जो  किसी भी बेहतरीन व्यंग्य रचना की सफलता के लिए अनिवार्य है । जिसे पढ़कर पाठकों को हँसी तो आए लेकिन व्यवस्था जनित विसंगतियों पर गुस्सा भी आए और  तरह -तरह की विवशताओं में कैद ,परेशान ,हलाकान इंसानों का चित्रण देखकर मन करुणा से भर उठे। वही असली व्यंग्य है। इस मायने में लतीफ़ घोंघी राष्ट्रीय स्तर के  एक कामयाब और शानदार व्यंग्यकार थे।
    वह पेशे से वकील थे ,लेकिन जीवन के पूर्वार्ध में उन्होंने आजीविका के लिए कई काम सीखे ,कई व्यवसाय किए । दर्जी का काम भी किया। सरकारी प्राथमिक स्कूल में अध्यापक की नौकरी की। बाद के वर्षों में वकालत की पढ़ाई करने के बाद अधिवक्ता के रूप में महासमुन्द कोर्ट में प्रेक्टिस करने लगे। साहित्य के अलावा संगीत में भी उनकी गहरी दिलचस्पी थी। गायन ,वादन के शौकीन थे। व्यंग्य लेखक के रूप में उनकी एक बड़ी ख़ासियत यह थी कि वह अपनी किसी भी व्यंग्य रचना की कोई भी कॉपी पहले किसी कागज या रजिस्टर या डायरी में अलग से लिखकर नहीं रखते थे।  उसे  एक ही बार में ,एक ही स्ट्रोक में अपने छोटे-से पोर्टेबल टाइपराइटर पर टाइप कर लेते थे और छपने के लिए भेज देते थे।
   देश के विभिन्न  विश्वविद्यालयों में  उनके व्यंग्य साहित्य पर कई  शोधार्थियों को पी-एच.डी. की उपाधि मिल  चुकी है। छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी ने भी उनके चयनित व्यंग्य लेखों का संकलन प्रकाशित किया है।   आलेख -स्वराज करुण

Saturday, September 25, 2021

माता कौशल्या के जीवन पर पहला उपन्यास : कोशल नंदिनी

पुस्तक चर्चा 
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कोशल नंदिनी : आत्मकथा शैली में 
माता कौशल्या के जीवन पर पहला उपन्यास 
       (आलेख : स्वराज करुण )  
प्राचीन महाकाव्यों के प्रसिद्ध पात्रों पर उपन्यास लेखन किसी भी साहित्यकार के लिए एक चुनौतीपूर्ण और जोख़िम भरा कार्य होता है।चुनौतीपूर्ण इसलिए कि लेखक को उन पात्रों से जुड़े पौराणिक प्रसंगों और तथ्यों का बहुत गहराई से अध्ययन करना पड़ता है। इतना ही नहीं ,बल्कि उसे उन पात्रों की मानसिकता को , उनके भीतर की मानसिक उथल -पुथल को या कह लीजिए कि उनके   मनोविज्ञान को गंभीरता से समझना पड़ता है। घटनाओं से ताल्लुक रखने वाले इलाकों के तत्कालीन भूगोल और वहाँ की तत्कालीन समाज व्यवस्था और संस्कृति की भी जानकारी रखनी पड़ती है।  लिखते समय कथानक से जुड़े तमाम चरित्रों को अपने चिन्तन के साँचे में ढालकर उन्हें अपने भीतर जीना भी पड़ता है। तभी तो उन पात्रों से सम्बंधित घटनाओं को ,उनकी बातचीत को ,उनके संवादों को वह जीवंत रूप में अच्छी  तरह प्रस्तुत कर पाता है। 

 पौराणिक उपन्यासों के लेखक : 
 शिवशंकर पटनायक 
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    पौराणिक उपन्यास लेखन जोख़िम भरा इसलिए भी होता है कि तथ्य और प्रसंग अगर त्रुटिपूर्ण हुए तो लेखक को आलोचना का पात्र बनना पड़ता है।  इन सभी कसौटियों पर देखें तो छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में पिथौरा जैसे छोटे कस्बे के निवासी शिवशंकर पटनायक एक कामयाब उपन्यासकार हैं ,जो लगभग 78 वर्ष की उम्र में भी उत्साह के साथ साहित्य के लिए समर्पित होकर कहानी ,उपन्यास और निबंध जैसी विधाओं में लगातार सृजनरत हैं। 

पटनायक जी ने  रामायण और  महाभारत जैसे प्राचीन भारतीय महाकाव्यों  के अनेक  चर्चित चरित्रों पर कई उपन्यासों की रचना की है ,जिन्हें हिन्दी के  साहित्यिक अभिरुचि सम्पन्न पाठकों का अच्छा प्रतिसाद मिला है।  इनमें (1) भीष्म प्रश्नों की शर -शैय्या पर (2) कालजयी कर्ण ((3) एकलव्य आदि उल्लेखनीय हैं।  रामायण और महाभारत की प्रसिद्ध महिलाओं की जीवन यात्रा को भी उन्होंने अपने उपन्यासों का विषय बनाया है। उनका एक उपन्यास ' आत्माहुति ' माता कैकेयी के जीवन पर आधारित है। अहल्या ,तारा ,मंदोदरी , कुन्ती और द्रौपदी पर केन्द्रित उनके उपन्यास 'आदर्श नारियां ' शीर्षक से दो भागों में प्रकाशित हुए हैं।शिवशंकर पटनायक इसके पहले अपने पौराणिक उपन्यासों की श्रृंखला में दुर्योधन की पत्नी भानुमति पर एक उपन्यास 'नागफ़नी पर खिला गुलाब ' लिख चुके हैं। 
     
    माता कौशल्या की आत्म -कथा : कोशल नंदिनी 
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       इसी तारतम्य में रामायण के महानायक  प्रभु श्रीराम की माता कौशल्या की जीवन -गाथा पर आधारित उनका उपन्यास 'कोशल-नंदिनी 'भी हाल ही में प्रकाशित हुआ है , जो हमारे प्राचीन इतिहास में 'कोसल ' और ' दक्षिण कोसल' के नाम से प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि पर आधारित है। यह अंचल दंडकारण्य के नाम से भी प्रसिद्ध रहा है। कई विद्वानों ने इस अंचल को माता कौशल्या का मायका और भगवान श्रीराम का ननिहाल माना है। इस नाते छत्तीसगढ़ की जनता से प्रभु श्रीराम का 'मामा -भांचा ' का रिश्ता बनता है और यही कारण है कि यहाँ भानजे के चरणस्पर्श की परम्परा है। माता कौशल्या दक्षिण कोसल के महाराजा भानुवंत और महारानी सुबाला की पुत्री थीं। महानदी के किनारे श्रीपुर (वर्तमान सिरपुर ) को महाराज भानुवंत की राजधानी माना जाता है।
               
              उपन्यास की पृष्ठभूमि छत्तीसगढ़
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   शिवशंकर पटनायक रचित  'कोशल नंदिनी ' माता कौशल्या के जीवन पर आत्मकथा के रूप में हिन्दी में पहला उपन्यास है ,जिसकी पृष्ठभूमि तत्कालीन कोसल या दक्षिण कोसल है और छत्तीसगढ़ जिसका अभिन्न अंग रहा है। अपने उपन्यासों में पात्रों को फ्लैशबैक में ले जाकर उनके ही माध्यम से घटनाओं का वर्णन करना शिव शंकर पटनायक की लेखकीय विशेषता है। वह कहानीकार भी हैं और यही खूबी उनकी कहानियों में भी होती है।
उपन्यास' कोशल नंदिनी' की शुरुआत होती है रावण वध के बाद अवधपुरी (अयोध्या)में बने उत्साह और उत्सव के वातावरण से और समापन होता है श्रीराम के वनगमन के करुणामय प्रसंग के साथ। हालांकि दोनों घटनाओं में वनगमन पहले होना था ,लेकिन उपन्यास ने अपनी चिर-परिचित फ्लैशबैक शैली में शुरुआत की है ,जिसमें माता कौशल्या अवधपुर के राजप्रासाद में मनाए जा रहे उत्सव का वर्णन करती हैं और श्रीराम के वनगमन को वह माता कैकेयी की आत्माहुति कहकर अपनी 'आत्म-कथा ' को विराम देती हैं। 
        
      शिवाहा पर्वत और चित्रोत्पला महानदी 
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     उपन्यास के सभी प्रसंग पाठकों में कौतुहल जाग्रत करते हैं । लेखक ने दक्षिण कोसल के प्राचीन स्थलों को भी रेखांकित किया है, जो पाठकों के ज्ञानवर्धन की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है। जैसे -- वर्तमान सिहावा पर्वत उन दिनों 'शिवाहा 'कहलाता था ,जो चित्रोत्पला महानदी का उदगम भी है। भगवान श्रीराम की बहन का नाम शांता था। वह विकलांग थीं ,लेकिन अपने गहन अध्ययन और कठोर परिश्रम से उन्होंने विकलांगता को पराजित कर दिया था।
       
       कौशल्या जन्म की कहानी और 
       राजीव लोचन मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा
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 माता कौशल्या का एक नाम ' अपराजिता' भी है। वह अपनी माता सुबाला से अपने जन्म की कहानी जानना चाहती हैं। सुबाला उन्हें बताती हैं कि संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने और महाराज भानुवंत ने भगवान शिव की आराधना की । वह प्रकट हुए । उन्होंने उनसे भगवान विष्णु की पूजा करने और चित्रोत्पला के संगम पर उनका मंदिर स्थापित करने की सलाह दी और कहा कि मुझमें और भगवान श्रीकांत (विष्णु)में कोई अंतर नहीं है। उन्होंने भानुवंत और सुबाला को इस मंदिर की स्थापना के साथ ही ऋषि लोमश के साथ संतान कामेष्टि यज्ञ करवाने के लिए भी कहा। महारानी सुबाला अपराजिता यानी कौशल्या को बताती हैं -"-मंदिर निर्माण में सभी ने अभूतपूर्व सहयोग दिया। चित्रोत्पला महानदी के संगम पर  जहाँ दो अन्य सहायक नदियाँ आकर मिलती हैं ,स्थापत्य कला से पूर्ण भगवान राजीव लोचन का मंदिर निर्मित हो गया। ऋषि लोमश का सम्पूर्ण समय निरीक्षण ,अवलोकन  तथा पर्यवेक्षण में व्यतीत हुआ। स्वामी जब कभी आकस्मिक रूप से वहाँ पहुँचते ,ऋषि लोमश से अवश्य मिलते।भगवान राजीव लोचन के मंदिर के भव्य शिलान्यास के साथ निर्माण कार्य प्रारंभ हो गया तथाअप्रत्याशित समयावधि में पूर्ण हो गया।आर्यावर्त के लगभग मध्य में स्वर्ण रेखा नर्मदाजी से चित्रोत्पला महानदी के उदगम स्थल शिवाहा पर्वत से आगे तक विस्तृत कोसल राज्य के प्रायःसभी ऋषि यथा --कश्यप , अत्रि ,लोमश , श्रृंगी , मुचकुंद ,अंगिरा ,सरभंग के अतिरिक्त वशिष्ठ ,विश्वामित्र ,गौतम ,अगस्त्य तथा महेन्द्र गिरि से  परशुराम ऋषि भी भगवान राजीवलोचन की प्राण -प्रतिष्ठा के समय उपस्थित हो गए थे। ऋषियों ने महाराज को आशीष तथा शुभकामनाएं देकर विदा ली। इसके पांचवें दिन ऋषि लोमश ने राजीव लोचन मंदिर प्रांगण में ही संतान कामेष्टि यज्ञ प्रारंभ कर दिया। 
     
 कोसल की पावन धरा पर जन्म मेरा सौभाग्य
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    उपरोक्त वर्णन से  स्पष्ट होता है कि चित्रोत्पला महानदी और दो अन्य नदियों (पैरी और सोंढूर )का यह संगम स्थल छत्तीसगढ़ का वर्तमान तीर्थ  राजिम है ,जहाँ दक्षिण कोसल के महाराजा भानुवंत ने लोमश ऋषि की देखरेख में विष्णु मंदिर के रूप में राजीव लोचन मंदिर का निर्माण करवाया था। उपन्यास में माता सुबाला अपनी पुत्री अपराजिता (कौशल्या)को बताती हैं कि यज्ञ के फलस्वरूप भगवान लक्ष्मीनारायण ने स्वप्न में महाराज भानुवंत को संतान प्राप्ति का वरदान दिया और आगे चलकर पुत्री अपराजिता का जन्म हुआ। अपने जन्म की कथा सुनकर वह कहती है --"वास्तव में यह मेरा सौभाग्य था कि कोसल की पावन धरा पर मैंने जन्म लिया।"
          
           प्रजा हितैषी राजा -महाराजा
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  उपन्यास के महत्वपूर्ण घटनाचक्र में एक ज्ञानवर्धक प्रसंग रामायण काल के राजाओं के प्रजा हितैषी स्वभाव को भी प्रकट करता है ,जो देश की चार प्रमुख नदियों के अवतरण का भी प्रसंग है। माता कौशल्या ने यह कथा ऋषि कश्यप से सुनी थी। उपन्यास में कौशल्या के।माध्यम से लेखक ने इसका वर्णन किया है। 
    यह महाराज चित्रवंत की कथा है ,जिन्होंने कोसल राज्य की प्रजा के आग्रह पर राज्य में गंगा की तरह एक जीवनदायिनी नदी की आवश्यकता को देखते हुए वन में रहकर अनेक वर्षों तक मातागंगा की कठोर तपस्या की। माता गंगा प्रकट होती हैं और उनसे वरदान मांगने के लिए कहती हैं। इस पर महाराज चित्रवंत उनसे प्रजा हित में कोसल राज्य में आने का आग्रह करते हैं।लेकिन वह अपनी विवशता बताकर कहती हैं -- "मैं तुम्हारी भावनाओं की सराहना करती हूँ,किन्तु विवश हूँ।भगवान विष्णु के चरणों से निकलकर त्रिलोचन भगवान आशुतोष महादेव की जटा पर बंधी हूँ। सर्व कल्याण ही तुम्हारा लक्ष्य है।अतः ,पुत्र , तुम हताश न होकर सदाशिव महादेव को संतुष्ट करो।"
        
        देश की चार प्रमुख नदियों का अवतरण 
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   महाराज चित्रवंत तनिक भी निराश हुए बिना भगवान शिव की तपस्या में लीन हो गए। महादेव प्रकट हुए और उन्होंने चित्रवंत से वरदान मांगने कहा। उनके यह कहने पर कि आप तो अंतर्यामी हैं ,आप मेरे हॄदय की पीड़ा को जानते हैं , भगवान महादेव मुस्कान सहित कहते हैं -- "भगीरथ ने अपने पूर्वजों अर्थात महाराज सागर के 60 हजार पुत्रों के मोक्ष के लिए धरती पर गंगा का अवतरण कराया था ,किन्तु तुम तो अपनी प्रजा तथा दक्षिणवासी वनवासियों के जीवन ,जल तथा मोक्ष के लिए देवी गंगा का प्राकट्य चाह रहे हो।यह काम -विकार रहित लोक -कल्याण के लिए कामना है।इस पर्वत अंचल तथा दक्षिण  के  वनवासी ,सभी मेरे अनन्य भक्त हैं अतः पुत्र चित्रवंत ! यह पर्वत मेरे नाम के अनुरूप शिवाहा के नाम से विख्यात होगा । इसके कुण्ड से देवी गंगा पूर्व दिशा की ओर चित्रोत्पला के नाम से , तथा कोसल राजधानी की उत्तरी सीमा में स्थित विन्ध्य से स्वर्ण -रेखा नर्मदा जी के रूप में पश्चिम दिशा में प्रवाहित होंगी। " महाराज चित्रवंत ने उनसे दक्षिण के वनवासियों के बारे में भी विचार करने का आग्रह किया। इस पर भगवान शिव बोले --मैं तुम्हारी व्यापक तथा सार्थक भावना को जनता हूँ पुत्र ! निश्चिंत रहो ।देवी गंगा दक्षिण में मातृत्व की प्रतिमूर्ति की तरह गोदावरी के नाम से प्रवाहित होंगी। पुत्र ! उत्तर में गंगा , दक्षिण में गोदावरी , पूर्व में चित्रोत्पला और पश्चिम में स्वर्ण -रेखा नर्मदा , आर्यावर्त में चारों दिशाओं में गंगा प्रवाहित होंगी ।"
          कोसल राज्य की सीमाएं 
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     लेखक ने उपन्यास में तत्कालीन कोसल राज्य की भौगोलिक सीमाओं का भी उल्लेख किया है । अयोध्या से माता कौशल्या अपने पुत्र( बालक)  राम को लेकर मायके यानी कोसल प्रदेश जा रही हैं ,जिसकी सीमा विन्ध्य पर्वत के तट से , स्वर्ण -रेखा नर्मदा जी से चित्रोत्पला महानदी के तट पर स्थित श्रीपुर तक कोसल प्रजा ने जिस प्रकार राम का स्वागत किया ,वह वर्णनातीत था ।
        कथाओं और उप -कथाओं का ताना -बाना
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   माता कौशल्या की आत्मकथा के रूप में  उपन्यास का ताना -बाना कई प्राचीन कथाओं और उप -कथाओं के अटूट धागों से बुना गया है। इसके लगभग सभी प्रमुख पात्रों को लोकहितैषी चिन्तन करते हुए भी दिखाया गया है। एक स्थान पर कौशल्या अपनी माता से कहती हैं -- सर्व कल्याण के लिए निजत्व का मूल्य ही कहाँ होता है माता ?  
         प्रजा वत्सल महाराज 
        चित्रवंत का कठोर संकल्प 
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    कोसल की प्रजा जब तत्कालीन महाराज चित्रवंत से जीवन यापन तथा धार्मिक अनुष्ठान के साथ मोक्ष के लिए कोसल को भी गंगा की तरह एक जीवन दायिनी नदी की आवश्यकता बताती है ,तब वह प्रजा की कामना का आदर करते हुए कहते हैं --"  उस राजा का जीवन ही धिक्कार युक्त है ,जो अपनी प्रजा की इच्छा की पूर्ति न कर सके। जल ही तो जीवन है। इस दृष्टि से प्रजा ने जीवन की मांग की है। राजत्व का सिद्धांत है , राजा का प्रथम दायित्व है कि वह प्रजा के जीवन की रक्षा करे।" यह कहकर चित्रवंत ऋषियों की उपस्थिति में  संकल्प लेते हैं -- मैं चित्रवंत पिता स्वर्णवंत, प्रपिता हरिवंत आप समस्त महान ऋषियों की शपथ लेता हूँ कि यदि मेरी अगाध आस्था महाकाल महा मृत्युंजय महादेव पर समग्र रूप से हो तथा तनिक भी त्रुटि ना हो ,तो मैं माँ गंगा को कोसल में ही नहीं , अपितु दक्षिण आर्यावर्त में भी आने को विनम्रता तथा भक्ति से  बाध्य कर दूंगा और यदि ऐसा न कर सका,तब जीवन लेकर कोसल (श्रीपुर) नहीं लौटूंगा।" महाराज चित्रवंत अपने अल्पायु पुत्र कृपावंत  को राज गद्दी सौंपकर सघन वन की ओर तापस वेश धारण कर प्रस्थान कर जाते हैं। यह प्रसंग इस बात का प्रमाण है कि  तत्कालीन समय के अनेक   राजा और महाराजा अपनी प्रजा के प्रति अपने  सामाजिक उत्तरदायित्व कितनी गंभीरता  से महसूस करते थे। 
        
        प्रणम्य हैं कोसल के वनवासी 
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     कोसल राज्य की नैसर्गिक ,सामाजिक ,सांस्कृतिक विशेषताओं और विशेष रूप से यहाँ की जनजातीय संस्कृति का भी लेखक ने वर्णन किया है। माता सुबाला अपने पति भानुवंत से कहती हैं --"स्वामी ! ये वनवासी ही तो वास्तव में प्रणम्य हैं। निष्काम तथा निष्पाप जीवन जीने की कला में अप्रतिम तथा मृत्युभय की छाया से दूर ,जीवंतता के लिए अनुकरणीय तथा प्रशंसनीय। " 
इसके बाद वह पुत्री अपराजिता (कौशल्या) को सम्बोधित करते हुए वनवासियों की प्रशंसा में कहती हैं -- "पुत्री अपराजिता! इनके कारण ही कोसल अद्वितीय है। वन ,खनिज , बहुमूल्य धातु तथा अन्य राजकीय सम्पदा के अघोषित राज रक्षक हैं ,जिनमें राज मुद्रा या अन्य अनुग्रह प्राप्त करने की तनिक भी लालसा नहीं है।"
महाराज भानुवंत भी सहमति व्यक्त करते हुए कहते हैं --"ये मात्र राज रक्षक नहीं , अपितु राज -सैनिक भी हैं ,जिन्होंने कोसल को दिया ही है, निरंतर देते भी हैं ,किन्तु कुछ प्राप्त करने की तनिक भी कामना नहीं करते ।"
                 उपन्यासकार का कथन 
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     उपन्यास के प्रारंभ में लेखक ने 'अनौपचारिक दो शब्द ' शीर्षक से अपनी भूमिका में लिखा है --" वास्तव में यह मेरे लिए एक चुनौती की तरह था।  समस्त रामायणों में श्रीराम कथा को ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। माता कौशल्या अत्यन्त ही महत्वपूर्ण पात्र हैं ,किन्तु उनसे सम्बंधित सभी घटनाएं और चरित्र चित्रण श्रीराम के ही चतुर्दिक घूमते हैं। उनका पृथक अस्तित्व है ही नहीं। साहित्य में कौशल्या के संबंध में अध्ययन सामग्री का नितांत अभाव है।साहित्यकार किसी राज्य विशेष का ही नहीं ,अपितु लोक हित में यथार्थ का प्रतिनिधित्व करता है। अतः उपन्यास में वर्णित तथ्य लगभग प्रामाणिक हैं।हाँ , कथानक के विस्तार के लिए मर्यादित कल्पना का प्रयोग तो किया गया है ,किन्तु कथा की मौलिकता को तनिक भी प्रभावित करने का प्रयास नहीं किया गया है।"उपन्यासकार का यह भी विचार है कि आध्यात्मिक या पौराणिक पात्रों को लेकर उपन्यास लिखना दुष्कर कार्य है ,क्योंकि जन -आस्था के प्रति सचेत रहना अति आवश्यक होता है। ।
            पाठकीय अभिमत 
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     एक पाठक की हैसियत से मेरा यह मानना है कि अगर प्रूफ की गलतियों को सुधार कर पढ़ा जाए तो  'कोशल नंदिनी' माता कौशल्या की धारा प्रवाह आत्म -कथा के रूप में  सचमुच एक अदभुत उपन्यास है।  उपन्यासकार का परिश्रम सराहनीय है।
 उन्होंने भावनाओं के आवेग में बहते हुए , किसी उफनती नदी के प्रवाह जैसी भाषा में इसकी रचना की है ,लेकिन मात्र डेढ़ सौ पृष्ठों के इस उपन्यास में  लगभग  हर पन्ने पर प्रूफ की गलतियां नदी के इस प्रवाह को बाधित करती प्रतीत होती हैं।  आशा है कि अगले संस्करण में इन त्रुटियों को सुधार लिया जाएगा। बहरहाल , माता कौशल्या की इस  आत्म कथा में पौराणिक कहानियों और लघुकथाओं की एक ऐसी नेटवर्किंग है ,जिसका  सम्मोहन  पाठकों में कथानक के अंत तक उत्सुकता बनाए  रखता है। 
   आलेख  -- स्वराज करुण

Tuesday, September 14, 2021

राजभाषा के 72 साल :आज भी वही सवाल ?

राजभाषा के 72 साल :आज भी वही सवाल ?

        (लेखक : स्वराज करुण)

  हमारे  अनेक विद्वान साहित्यकारों और महान  नेताओं ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में महिमामण्डित किया है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय एकता की भाषा भी कहा है ।   उनके विचारों से हम  सहमत भी हैं । हमने  15 अगस्त  2021 को अपनी आजादी के 74 साल पूरे कर लिए और  हिन्दी को राजभाषा का संवैधानिक दर्जा मिलने के 72 साल भी आज 14 सितम्बर 2021 को पूरे हो गए। लेकिन राष्ट्रभाषा और राजभाषा को लेकर आज भी कई सवाल जस के तस बने हुए हैं। उनके जवाबों का हम सबको   इंतज़ार है।
   
 सहज -सरल सम्पर्क भाषा की जरूरत 
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  किसी भी राष्ट्र को अपने  नागरिकों के लिए एक ऐसी सहज -सरल सम्पर्क  भाषा की ज़रूरत होती है जिसके माध्यम से लोग दिन - प्रतिदिन एक - दूसरे से  बात -व्यवहार कर सकें । निश्चित रूप से 'हिन्दी' में यह गुण  स्वाभाविक रूप से है और यही उसकी ताकत भी है ,जो देश को एकता के सूत्र में  बाँधकर रखती है । आज़ादी के आंदोलन में और उसके बाद भी हमने हिन्दी की इस ताकत को महसूस किया है ।हिन्दी के प्रचलन को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय एकता को सशक्त बनाने में रेडियो ,टीव्ही और पत्र -पत्रिकाओं सहित इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया की भी उल्लेखनीय भूमिका है। लेकिन  लगता है कि जाने -अनजाने हिन्दी की यह ताकत कमज़ोर हो रही है । यह चिन्ता और चिन्तन का विषय है ।
आज़ादी के लगभग दो साल बाद  हमारी संविधान सभा ने 14 सितम्बर 1949 को उसे भारत की 'राजभाषा' यानी सरकारी काम -काज की भाषा का दर्जा दिया था। इस ऐतिहासिक दिन को यादगार बनाए रखने के लिए देश में हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है ।
लेकिन अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव और  समय - समय पर दक्षिण के राज्यों में   हिन्दी विरोध को देखकर चिन्ता होती है ।  त्रिभाषी फार्मूले को भी दक्षिण के लोग  नहीं मानते । इस पर उनके साथ सार्थक संवाद की ज़रूरत है ।
  
  सीखें ज़्यादा से ज़्यादा भाषाएं
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  वास्तव में किसी भी देश अथवा किसी भी राज्य की भाषा सीखने में कोई बुराई नहीं है । लोग अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार दुनिया की अधिक से अधिक भाषाओं को पढ़ें  और सीखें  तो इससे अच्छी बात भला और क्या हो सकती है ?सुदूर बंगाल के एक गाँव में 12 अगस्त 1877 को जन्मे और परिवार के साथ  रायपुर (छत्तीसगढ़)आकर पले-बढ़े हरिनाथ डे आगे चलकर सिर्फ़ 34 साल की आयु में पहुँचते तक  हिन्दी ,बांग्ला सहित देश -विदेश की 36 भाषाओं के आधिकारिक विद्वान बन गए। दुर्भाग्य से 30 अगस्त 1911 को  उनका निधन हो गया। रायपुर के बूढ़ापारा स्थित डे भवन में  उनके नाम पर लगे  संगमरमर के शिलालेख में उन सभी 36 भाषाओं की सूची अंकित है , जिनका ज्ञान हरिनाथ ने अर्जित किया था। उनकी प्राथमिक और मिडिल स्कूल की पढ़ाई रायपुर में हुई थी।  भारत के तमाम प्रान्तों के लोग और विशेष रूप से स्कूल -कॉलेजों के विद्यार्थी एक -दूसरे के राज्यों में प्रचलित भाषाओं को सीखें तो इससे हमारी राष्ट्रीय एकता और भी मजबूत होगी । हमारे देश की कई  महान विभूतियों के बारे में कहा भी जाता है कि वे अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे । लेकिन अपने देश के लोगों से वो अपने ही देश की भाषा में संवाद करते थे । 
    
 महात्मा गांधी के विचार 
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक 'मेरे सपनों का भारत' में राष्ट्रभाषा के लिए कुछ  प्रमुख लक्षणों  का उल्लेख किया था । उनके अनुसार (1)वह भाषा सरकारी नौकरों के लिए आसान होनी चाहिए, (2) उस भाषा के द्वारा भारत का आपसी धार्मिक , आर्थिक और राजनीतिक काम-काज हो सकना चाहिए ,(3) उस भाषा को भारत के ज़्यादातर लोग बोलते हों ,(4)वह भाषा राष्ट्र के लिए आसान हो और (5) उस भाषा का विचार करते समय क्षणिक या कुछ समय तक रहने वाली स्थिति पर जोर न दिया जाय ।गांधीजी इन लक्षणों का जिक्र करते हुए लिखा था कि अंग्रेजी भाषा में इनमें से एक भी लक्षण है और ये पांच लक्षण रखने में हिन्दी से होड़ करने वाली  और कोई भाषा नहीं है । "
 
आज़ादी का अमृत महोत्सव और हमारी हिन्दी
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  हमारी आज़ादी के 75 वर्ष अगले साल यानी 15 अगस्त 2022 को पूर्ण हो जाएंगे और देश अपनी विकास यात्रा के 76 वें साल में प्रवेश करेगा। आज़ादी की 75वीं वर्षगाँठ को 'अमृत महोत्सव'  के रूप में मनाने का सिलसिला अभी से शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 12 मार्च 2021 को महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम से अमृत महोत्सव के आयोजनों का औपचारिक शुभारंभ किया। यह दिन स्वतंत्रता संग्राम के दौरान साबरमती आश्रम से गांधीजी के नेतृत्व में 12 मार्च 1930 को  शुरू हुए नमक सत्याग्रह और दांडी मार्च की याद दिलाने वाला एक ऐतिहासिक दिन है। इसी वजह से आज़ादी के अमृत महोत्सव के शुभारंभ के लिए इस दिन और स्थान का चयन किया गया।  अमृत महोत्सव वर्ष में राजभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी की दशा और दिशा पर और उसके क्रमिक ऐतिहासिक विकास पर चिन्तन -मनन और भी ज़्यादा जरूरी हो जाता है।

साहित्य और भाषाओं से जुड़े सवाल 
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किसी भी भाषा से जुड़े सवालों को आम तौर पर उसके साहित्य से जोड़ कर देखा जाता है। ऐसा इसलिए भी ,क्योंकि साहित्य ही भाषाओं को समृद्ध बनाता है और इसमें साहित्यकारों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत में प्रचलित हर भाषा के अनमोल ख़ज़ाने को  उसके साहित्यकारों ने अपनी कलम से समृद्ध किया है। 

हिन्दी का गौरवपूर्ण इतिहास
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हिन्दी भाषा के साहित्य का भी  अपना एक गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ,जिनका जन्म 9 सितम्बर 1850 को वाराणसी में और निधन6 जनवरी 1885 को वाराणसी ही हुआ था , वह  महज  34 वर्ष की अपनी जीवन यात्रा में  कविता ,नाटक ,उपन्यास और व्यंग्य लेखन के जरिए हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि का कीर्तिमान  बनाकर अपनी अमिट छाप छोड़ गए। उन्होंने भाषाओं  के महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा था कि स्वयं की भाषा ही सभी तरह उन्नतियों की जड़ स्वयं की भाषा की उन्नति में निहित है ,जिसके ज्ञान के बिना हॄदय की पीड़ा नहीं मिटती। वहीं अंग्रेजी पढ़ के हम सभी गुणों को हासिल कर भी लें ,पर अपनी भाषा का ज्ञान नहीं होने पर हम दीन यानी ग़रीब के ग़रीब ही रह जाएंगे । अपनी इन्हीं भावनाओं को व्यक्त करते हुए भारतेन्दु कहते हैं --

 "निज भाषा उन्नति अहै 
सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा ज्ञान बिन 
मिटत न हिय को शूल ।।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि 
सब गुन होत प्रवीन ।
पै निज भाषा ज्ञान बिन
रहत दीन के दीन ।।"

हमारे देश में  भारतेन्दु हरिश्चंद्र से लेकर वर्तमान में भी  हिन्दी साहित्य की यह  परम्परा निरंतर विकसित होती चली आयी है ,जो   छत्तीसगढ़ में भी  पुष्पित और पल्लवित हुई है। यहाँ के हिन्दी सेवी साहित्यकारों ने इस परम्परा को अपनी -अपनी शैली में खूब विकसित किया है।

छत्तीसगढ़ में जन्मी 
हिन्दी की पहली कहानी 
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विद्वानों के अनुसार सौ साल से भी कुछ अधिक पहले हिन्दी की पहली कहानी 'एक टोकरी भर मिट्टी ' छत्तीसगढ़ की धरती पर लिखी गयी थी ,जिसके लेखक थे पंडित माधवराव सप्रे । 
  
 हिन्दी पत्रकारिता की  बुनियाद
   छत्तीसगढ़ -मित्र के 121 साल
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सप्रे जी ने ही  आज से 121 साल पहले वर्ष 1900 में यहाँ के पेंड्रा जैसे बेहद पिछड़े वनवासी बहुल क्षेत्र से मासिक पत्रिका 'छत्तीसगढ़ मित्र ' का सम्पादन करते हुए यहाँ पत्रकारिता की बुनियाद रखी थी। उनके सहयोगी थे पंडित रामराव चिंचोलकर । इस पत्रिका के प्रोपराइटर थे प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वामन बलिराम लाखे। रायपुर के एक प्रिंटिंग प्रेस से इसकी छपाई होती थी। आर्थिक कठिनाइयों के कारण 'छत्तीसगढ़ मित्र' का प्रकाशन मात्र तीन वर्ष तक हो पाया। दिसम्बर 1902 में 36 वें अंक के बाद इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा।  सप्रे जी का जन्म 19 जून 1871 को वर्तमान मध्यप्रदेश के ग्राम पथरिया (जिला - दमोह) में हुआ था। उनका निधन 23 अप्रैल 1926 को रायपुर में हुआ। जीवन पर्यंत उनका कर्मक्षेत्र मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ ही रहा।
  
 गीता -रहस्य का हिन्दी अनुवाद
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हरि ठाकुर ने अपनी पुस्तक 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' में लिखा है --"वर्ष 1915 में सप्रे जी ने  लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के महान और वृहद ग्रंथ  'गीता रहस्य ' का  हिन्दी में प्रामाणिक अनुवाद प्रस्तुत किया। उनके अनुवाद और भाषा की तिलक जी ने भूरि -भूरि प्रशंसा की थी।इस ग्रंथ के हिन्दी अनुवाद ने स्वाधीनता संग्राम के सत्याग्रहियों का वर्षों मार्ग दर्शन किया।"हरि ठाकुर आगे लिखते हैं -- सप्रेजी ने लगभग 16 ग्रंथ लिखे,जिनमें उनके मौलिक और अनुवादित ग्रंथों की संख्या भी शामिल है।उन्होंने सैकड़ों लेख लिखे ,जो तत्कालीन पत्र -पत्रिकाओं में छपते रहे।"
 अंग्रेजी हुकूमत के उस दौर में सप्रे जी ने 'छत्तीसगढ़ मित्र ' के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना के विकास और विस्तार में यथाशक्ति अपना भरपूर योगदान दिया।  कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जन संचार विश्वविद्यालय रायपुर ने  'छत्तीसगढ़ मित्र' के इन सभी 36 अंकों को फिर से छपवाकर संरक्षित किया है। विश्वविद्यालय ने इनका पुनर्मुद्रण वर्ष 2008 ,2009 और 2010 में करवाया है। राजधानी रायपुर में कई दशकों से संचालित सप्रे स्कूल पंडित माधवराव सप्रे के महान व्यक्तित्व और कृतित्व की याद दिलाता है। उनके नाम पर छत्तीसगढ़ सरकार ने पंडित माधव राव सप्रे राष्ट्रीय रचनात्मकता सम्मान की भी स्थापना की है। 
 हिन्दी भाषा और साहित्य को ज़्यादा से ज़्यादा अमीर  बनाने में अपनी रचनाओं के अनमोल रत्नों से छत्तीसगढ़ के जिन साहित्य मनीषियों ने अपना योगदान दिया ,उनमें डॉ.पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी , डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र ,गजानन माधव मुक्तिबोध , पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय ,मुकुटधर पाण्डेय , ठाकुर प्यारेलाल सिंह , डॉ. खूबचंद बघेल , हरि ठाकुर ,केयूर भूषण और  लाला जगदलपुरी,नारायणलाल परमार , त्रिभुवन  पाण्डेय और विश्वेन्द्र ठाकुर , जैसे अनेकानेक तपस्वी साहित्य साधकों की भूमिकाओं को कभी भुलाया नहीं जा सकता। 
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 बख्शी जी : सरस्वती के यशस्वी सम्पादक 
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वर्तमान राजनांदगांव जिले के    खैरागढ़ में 27 मई 1894 को जन्मे पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का निधन रायपुर में 28 दिसम्बर 1971 को हुआ। उन्हें वर्ष 1920 से 1956 तक यानी 36 वर्षों में चार अलग -अलग कालखण्डों में इलाहाबाद की प्रसिद्ध पत्रिका 'सरस्वती' के  सम्पादकीय दायित्व का गौरव मिला। वह हिन्दी जगत में सरस्वती के यशस्वी सम्पादक के रूप में प्रसिद्ध हुए।छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा उनके सम्मान में बख्शी सृजन पीठ की स्थापना की गयी है।

  छायावाद के प्रवर्तक मुकुटधर पाण्डेय 
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 रायगढ़ जिले के    पंडित मुकुटधर पाण्डेय को हिन्दी काव्य में छायावाद का प्रवर्तक माना जाता है। भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1976 में पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया था।  उनका जन्म 30 सितम्बर 1895 को रायगढ़ के पास तत्कालीन बिलासपुर जिले में महानदी के किनारे ग्राम बालपुर में और निधन 6 नवम्बर 1989 को रायगढ़ में हुआ। 
   
पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी
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बिलासपुर के स्वर्गीय पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी भी हिन्दी और छत्तीसगढ़ी दोनों ही भाषाओं के प्रतिष्ठित लेखक और कवि थे। पत्रकार के रूप में उन्होंने हिन्दी पत्र -पत्रिकाओं के माध्यम से कई दशकों तक समाज सेवा करते हुए अपनी लेखनी से राष्ट्रभाषा को भी समृद्ध बनाया। भारत सरकार ने वर्ष 2018 में उन्हें पद्मश्री अलंकरण से नवाजा। 
    छत्तीसगढ़ के अधिकांश साहित्य साधकों ने हिन्दी के साथ -साथ छत्तीसगढ़ी और अन्य आंचलिक लोक भाषाओं में भी साहित्य सृजन किया है। हिन्दी के विकास में उनका योगदान प्रणम्य है। 
 रचनाकारों की   लम्बी  फेहरिस्त
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हिन्दी साहित्य को अधिक से अधिक अमीर बनाने में छत्तीसगढ़  में सरस्वती के जिन उपासकों ने वर्षों तक कठिन लेखकीय साधना की है , उनके नामों और उनकी रचनाओं की एक लम्बी फेहरिस्त है ,जिनका सम्पूर्ण उल्लेख किसी एक आलेख में संभव नहीं है। फिर भी मेरी कोशिश है कि उनमें से कुछ रचनाकारों की चर्चा इसमें हो जाए। 
     पंडित सुन्दरलाल शर्मा 
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स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में यहाँ के कवियों और लेखकों ने भी अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना जगाने का सराहनीय कार्य किया।राजिम में 21 दिसम्बर 1881 को जन्मे पंडित सुन्दरलाल शर्मा आज़ादी के आंदोलन के कर्मठ सिपाही और नेतृत्वकर्ता होने के अलावा एक अच्छे कवि नाट्य लेखक और समाज सुधारक भी थे। उनका निधन 28 दिसम्बर 1940 को हुआ। उन्होंने चार नाटकों और दो उपन्यासों सहित लगभग बीस पुस्तकें लिखीं। उनके छत्तीसगढ़ी खण्ड काव्य 'दान लीला 'का प्रकाशन 10 मार्च 1906 को हुआ था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वर्ष 1922 में जब उन्हें एक वर्ष की सजा हुई ,तब उन्होंने केन्द्रीय जेल रायपुर में रहते हुए 'कृष्ण जन्म स्थान 'नामक हस्तलिखित पत्रिका का सम्पादन और प्रकाशन शुरू किया था ,जिसमें आज़ादी के आंदोलन के साथ हास्य -व्यंग्य और धार्मिक तथा राजनीतिक सामग्री भी  छपती थीं और  जेल की आंतरिक घटनाओं का भी 8उल्लेख होता था। उन्होंने राजिम से 'श्री राजिम प्रेम पीयूष' और 'दुलरुआ'  नामक पत्रिका भी निकाली। छत्तीसगढ़ सरकार ने बिलासपुर में उनके सम्मान में एक मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना की है ,जो विगत 15 वर्षों से सफलतापूर्वक संचालित हो रहा है । 
राजनांदगांव के कुंजबिहारी चौबे ने भी स्वतंत्रता संग्राम में अपनी कविताओं के साथ सक्रिय भागीदारी निभाई। रायपुर जिले के  डॉ.खूबचंद बघेल समाज सुधारक ,किसान नेता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के साथ -साथ प्रखर विचारक और हिन्दी तथा छत्तीसगढ़ी के अच्छे  साहित्यकार भी थे। 
राजनांदगांव के कुंजबिहारी चौबे ने अपने क्रांतिकारी तेवर की कविताओं से स्वतंत्रता आंदोलन की भावनाओं को स्वर दिया। उनकी चयनित रचनाओं का संकलन प्रभा-पुस्तक माला, इंडियन प्रेस जबलपुर द्वारा प्रकाशित किया गया था। 
 
गांधी मीमांसा के रचनाकार  
पंडित रामदयाल तिवारी 
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रायपुर के पंडित रामदयाल तिवारी को सिर्फ 50 वर्ष की आयु मिली ,लेकिन उन्होंने इस अल्प समय की अपनी जीवन यात्रा में राष्ट्र पिता महात्मा गांधी पर केन्द्रित लगभग 800-पृष्ठों का महाग्रंथ 'गांधी -मीमांसा ' लिखकर इतिहास रच दिया। यह महान कृति गांधीजी के जीवन दर्शन की रचनात्मक समालोचना  है। रामदयाल तिवारी का जन्म 23 अगस्त 1892 को रायपुर में हुआ था और वहीं 21 अगस्त 1942 को उनका निधन हो गया। उन्होंने लिखा था --" राष्ट्र अपना मुख साहित्य के दर्पण में देखता है।साहित्य राष्ट्र के दिल का खज़ाना है।" छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित आर  डी.तिवारी शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल पंडित रामदयाल तिवारी के नाम पर विगत कई दशकों से संचालित हो रहा  है।
    
 दंडकारण्य के साहित्य महर्षि 
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   अपनी रचनाओं के माध्यम से हिन्दी भाषा और साहित्य की सेवा करने वाले समर्पित साहित्यकारों में जगदलपुर (बस्तर )के लाला जगदलपुरी ने 93 साल की अपनी जीवन यात्रा के 77 साल साहित्य सृजन में लगा दिए। बस्तर को दंडकारण्य के नाम से भी जाना जाता है। लालाजी इस वनवासी अंचल के इतिहास ,  लोक साहित्य और लोक संस्कृति के भी अध्येता  थे। उन्हें दंडकारण्य का साहित्य महर्षि भी कहा जा सकता है।  मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी द्वारा प्रकाशित    उनकी पुस्तक 'बस्तर -इतिहास एवं संस्कृति'  अपने-आप में एक महत्वपूर्ण शोध -ग्रंथ है। उनका जन्म जगदलपुर में 17 दिसम्बर 1920 को हुआ था। जगदलपुर में ही 14 अगस्त 2014 को उनका निधन हो गया। उन्होंने हिन्दी के साथ -साथ छत्तीसगढ़ी और बस्तर की लोकभाषा हल्बी और भतरी में भी भरपूर लिखा। जगदलपुर के शासकीय जिला ग्रंथालय का नामकरण उनके जन्म दिन 17 दिसम्बर 2020 को समारोहपूर्वक उनके नाम पर किया गया ।
    
  यशस्वी कवि -लेखक हरि ठाकुर 
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छत्तीसगढ़ के हिन्दी साहित्यकारों में स्वर्गीय हरि ठाकुर का नाम भी प्रथम पंक्ति में लिया जाता है। उनका जन्म 16 अगस्त 1927 को रायपुर में हुआ और निधन नई दिल्ली के एक अस्पताल में   3 दिसम्बर 2001 को । यशस्वी कवि ,लेखक और पत्रकार स्वर्गीय हरि ठाकुर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और श्रमिक नेता ठाकुर प्यारेलाल सिंह के सुपुत्र थे।  हरि ठाकुर ने अपने सहयोगी कवियों के साथ मिलकर वर्ष 1956 में एक सहयोगी काव्य संग्रह -' नये स्वर ' का प्रकाशन किया। इसके अलावा बाद के वर्षों में हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में उनकी अनेक पुस्तकें छपीं ,जिनमें कविता संग्रह लोहे का नगर   (1967), छत्तीसगढ़ी गीत अउ कवित्व(1968) और गीतों के शिलालेख (1969), सुरता के चंदन (1979) और पौरुष :नये संदर्भ (1980)भी शामिल हैं।  उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुस्तक 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा 'उनके मरणोपरांत वर्ष 2003 में प्रकाशित हुआ। यह महाग्रंथ छत्तीसगढ़ पर केन्द्रित उनके शोध आलेखों का संकलन है । छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास सहित स्वतंत्रता संग्राम ,साहित्य और कला -संस्कृति से जुड़ी महान विभूतियों के जीवन परिचय को भी उन्होंने अपने इस विशाल ग्रंथ में शामिल किया है। इस पुस्तक का सम्पादन इतिहासकार डॉ. विष्णुसिंह ठाकुर और साहित्यकार देवीप्रसाद वर्मा(बच्चू जांजगीरी)ने किया है। स्वर्गीय हरि ठाकुर के जन्म दिन 16 अगस्त 2003 को इसका प्रकाशन हुआ।समाजवादी विचारधारा के  हरि ठाकुर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे और उन्होंने 1955 में गोवा मुक्ति आंदोलन में भी हिस्सा लिया था।उन्हें वर्ष 1992 में छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के लिए गठित सर्वदलीय मंच का संयोजक भी बनाया गया था। वह वर्ष 1970 के दशक में बनी दूसरी छत्तीसगढ़ी फ़िल्म 'घर -द्वार' के गीतकार भी थे। इस फ़िल्म में उनके लिखे सभी गीत काफी लोकप्रिय हुए।
साहित्य के माध्यम से हिन्दी भाषा और साहित्य के भंडार को भरपूर बनाने में अपना योगदान देने वाले रचनाकारों में रायगढ़ के जनकवि आनन्दी सहाय शुक्ल ,बंदे अली फातमी और मुस्तफा हुसैन मुश्फिक की लेखनी की अपनी रंगत थी।
   
पंडित चिरंजीव दास 
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 रायगढ़ के ही पंडित चिरंजीव दास ने महाकवि कालिदास के संस्कृत महाकाव्य 'मेघदूत' और 'रघुवंश 'सहित कई  अन्य प्राचीन संस्कृत कवियों की काव्य  पुस्तकों का हिन्दी मे पद्यानुवाद किया। वह ओड़िया ,छत्तीसगढ़ी ,अंग्रेजी और हिन्दी के प्रकाण्ड विद्वान थे।
    
कहानी ,उपन्यास और व्यंग्य 
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 कहानी ,उपन्यास और व्यंग्य भी हिन्दी गद्य लेखन की प्रमुख विधाएं हैं।  पंडित माधव राव सप्रे रचित हिन्दी की पहली कहानी 'एक टोकरी भर मिट्टी ' का जिक्र इस आलेख में पहले ही किया जा चुका है। प्रदेश के अन्य हिन्दी कहानीकारों में खैरागढ़ के स्वर्गीय  पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ,राजनांदगांव के  स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध , बिलासपुर के स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा , जगदलपुर के स्वर्गीय गुलशेर खां 'शानी 'सहित रायपुर के विनोद कुमार शुक्ल ,जगदलपुर की स्वर्गीय मेहरुन्निसा परवेज,भिलाई नगर के परदेशीराम वर्मा और विनोद मिश्र ,दुर्ग के स्वर्गीय  विश्वेश्वर ,खैरागढ़ के डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव ,राजिम के स्वर्गीय पुरुषोत्तम अनासक्त ,धमतरी के स्वर्गीय नारायण लाल परमार और स्वर्गीय त्रिभुवन पाण्डेय ,रायपुर के स्वर्गीय देवीप्रसाद वर्मा और स्वर्गीय विभु कुमार ,बिलासपुर की जया जादवानी ,वहीं के सतीश जायसवाल और पिथौरा (जिला -महासमुंद)के शिवशंकर पटनायक भी उल्लेखनीय हैं।इनमें से कई लेखक अच्छे उपन्यासकार भी हैं। उपन्यास ,यात्रा वृत्तांत और आत्मकथा लेखन में बिलासपुर के द्वारिका प्रसाद अग्रवाल का नाम भी पिछले कुछ वर्षों में तेजी से उभरा है। वहीं के डॉ.विनय कुमार पाठक पिछले करीब 50 वर्षों से छत्तीसगढ़ी के साथ -साथ हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाने में लगे हुए हैं।  रायपुर जिले के अभनपुर निवासी पर्यटन ब्लॉगर ललित शर्मा ने अपने  उपन्यास 'जनरल बोगी -ए ट्रेवलर्स लव स्टोरी ' के माध्मय से हिन्दी उपन्यासों की दुनिया में प्रवेश किया है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक स्थल सिरपुर (जिला -महासमुंद) और रामगढ़ (जिला -सरगुजा )पर दो पुस्तकें लिखी हैं ,जो क्रमशः 'सैलानी की नज़र में सिरपुर ' और 'सरगुजा का रामगढ़ " के नाम से काफी चर्चित हुई हैं।

 छत्तीसगढ़ की हिन्दी कथा -यात्रा 
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वरिष्ठ लेखक और पत्रकार रमेश नैयर के सम्पादन में छत्तीसगढ़ के 17 हिन्दी कहानीकारों की कहानियों का संग्रह 'कथा यात्रा' शीर्षक से ग्रंथ अकादमी दिल्ली ने वर्ष 2003 में प्रकाशित किया। इसकी भूमिका में नैयर जी ने छत्तीसगढ़ की हिन्दी कहानी परम्परा का विस्तार से उल्लेख किया है।
महासमुंद के स्वर्गीय  लतीफ़ घोंघी ,वहीं के ईश्वर शर्मा ,बागबाहरा के स्वर्गीय गजेन्द्र तिवारी , रायगढ़ के कस्तूरी दिनेश दुर्ग के विनोद  साव और ऋषभ जैन और रायपुर के अख़्तर अली आदि व्यंग्य विधा के जाने -माने हस्ताक्षर हैं। लघु कथा लेखन में रायपुर के स्वर्गीय डॉ. राजेन्द्र सोनी और महासमुंद के महेश राजा सहित कई प्रतिष्ठित नाम शामिल हैं। 

काव्य गगन के कुछ और सितारे
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हिन्दी कविता के आकाश में छत्तीसगढ़ के  चमकदार सितारों में रायपुर के स्वर्गीय डॉ. नरेंद्र देव वर्मा ,स्वर्गीय ललित सुरजन और स्वर्गीय लक्ष्मण मस्तुरिया,  राजिम के स्वर्गीय पवन दीवान और स्वर्गीय कृष्णा रंजन , दुर्ग के स्वर्गीय कोदूराम दलित  रघुवीर अग्रवाल पथिक और  विमल कुमार पाठक , पिथौरा के स्वर्गीय मधु धान्धी और स्वर्गीय अनिरुद्ध भोई , बसना के स्वर्गीय विष्णु शरण ,धमतरी के स्वर्गीय मुकीम भारती को भी बहुत आदर और सम्मान के साथ याद किया जाता है।रायपुर के रामेश्वर वैष्णव और दुर्ग के पंडित दानेश्वर शर्मा हिन्दी और छत्तीसगढ़ी ,दोनों ही भाषाओं के जाने -माने  गीतकार हैं। अम्बिकापुर (सरगुजा )के शायर श्याम कश्यप 'बेचैन ' को गज़लों की दुनिया में बेहतरीन पहचान मिल रही है तो कोरबा के डॉ. माणिक विश्वकर्मा नवरंग  हिन्दी नवगीत लेखन में अग्रणी हैं। रायपुर के गिरीश पंकज कवि ,, कहानीकार ,व्यंग्यकार और उपन्यासकार के रूप में स्थापित हैं। जांजगीर के सतीश कुमार सिंह ,जगदलपुर के विजय सिंह , रामानुजगंज के पीयूष कुमार और बागबाहरा (जिला -महासमुंद)के रजत कृष्ण हिन्दी नयी कविता के  सक्रिय और सुपरिचित हस्ताक्षर हैं। 
         हिन्दी की वर्तमान स्थिति पर विचार करते समय हमें इस तथ्य को भी ध्यान में रखना चाहिए कि हमारे इन मनीषियों ने पूरे देश को एकता के सूत्र में बाँध कर रखने के लिए समय -समय पर हिन्दी के महत्व को खास तौर पर रेखांकित किया था । 
 
हिन्दी दिवस : यादगार दिन 
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 स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में हिन्दी ने ही पूरे देश को भावनात्मक रूप से संगठित किया । उस दौर में हिन्दी के  कवियों ,कहानीकारों, लेखकों और पत्रकारों ने अपनी लेखनी से देश की चारों दिशाओं में राष्ट्रीय चेतना का विस्तार किया । संभवतः यही कारण है कि आज़ादी के बाद देश के सभी राज्यों से आए हमारे महान नेताओं ने संविधान सभा में गहन विचार -मंथन के उपरांत हिन्दी  को भारत की राजभाषा बनाने का प्रस्ताव पारित किया । वह 14 सितम्बर 1949 का यादगार दिन था । इस ऐतिहासिक घटना की याद में देश के सभी केन्द्रीय कार्यालयों , सार्वजनिक ,उपक्रमों और राष्ट्रीयकृत बैंकों में  राजभाषा पखवाड़े के साथ  14 सितम्बर को हिन्दी दिवस अवसर पर  तमाम तरह के कार्यक्रम  होते हैं  । कई दफ़्तरों में यह पखवाड़ा एक सितम्बर से 14 सितम्बर तक मनाया जाता है । हिन्दी दिवस के दिन इसका समापन होता है ,वहीं कई कार्यालयों में हिन्दी दिवस यानी 14 सितम्बर से इसकी शुरुआत होती है । इस दौरान  प्रतियोगिताएं और विचार गोष्ठियां भी होती हैं । लेकिन हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी दिवस खत्म होते ही सब कुछ पुराने ढर्रे पर चलने लगता है  । 
       
      विचारणीय सवाल 
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      विचारणीय सवाल यह है कि हिन्दी को 72 साल पहले  राजभाषा का दर्जा तो मिल गया ,लेकिन वह  आखिर कब देश की सर्वोच्च अदालत सहित  राज्यों के  उच्च न्यायालयों और केन्द्रीय मंत्रालयों के सरकारी काम-काज की भाषा बनेगी ? स्वतंत्र भारत के इतिहास में 14 सितम्बर 1949  वह यादगार दिन है जब हमारी संविधान सभा ने हिन्दी को भारत की राजभाषा का दर्जा दिया था . इसके लिए  संविधान में धारा 343 से 351 तक राजभाषा के बारे में ज़रूरी प्रावधान किए  गए .
 
 राजभाषा अधिनियम
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अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी से हम पन्द्रह अगस्त 1947 को आज़ाद हुए और  26 जनवरी 1950 को देश में हमारा अपना संविधान लागू हुआ ,जिसमे भाषाई प्रावधानों के तहत अनुच्छेद 343 से 351तक  के प्रावधान भी लागू हो गए .इसके बावजूद केन्द्र सरकार के अधिकांश  मंत्रालयों से राज्यों को जारी होने वाले अधिकांश पत्र -परिपत्र प्रतिवेदन आज भी केवल अंग्रेजी में होते हैं ,जिसे समझना गैर-अंग्रेजी वालों के लिए काफी मुश्किल होता है ,जबकि राजभाषा अधिनियम 1963 के अनुसार केन्द्र सरकार के विभिन्न साधारण आदेशों , अधिसूचनाओं और सरकारी प्रतिवेदनों ,नियमों आदि में अंग्रेजी के साथ -साथ हिन्दी का भी प्रयोग अनिवार्य किया गया है.इसके बाद भी ऐसे सरकारी दस्तावेजों में हिन्दी का अता-पता नहीं रहता .केन्द्र  से  जिस राज्य को ऐसा कोई सरकारी पत्र या प्रतिवेदन भेजा जा रहा है , वह उस राज्य की स्थानीय भाषा में भी अनुवादित होकर जाना चाहिए । लेकिन होता ये है कि  नईदिल्ली से राज्यों को जो  पत्र -परिपत्र  अंग्रेजी में मिलते हैं ,उन्हें मंत्रालयों के  सम्बन्धित विभाग के अधिकारी सिर्फ़ एक अग्रेषण पत्र  लगाकर और उसमें  'आवश्यक कार्रवाई हेतु ' और  "कृत कार्रवाई से अवगत करावें ' लिखकर  निचले कार्यालयों को भेज देते हैं । 
    सरकारी पत्र व्यवहार में हिन्दी
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    दरअसल हिन्दी भाषी राज्यों के मंत्रालयों और सरकारी कार्यालयों में अंग्रेजी जानने -समझने वाले अफसरों और कर्मचारियों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है । इसलिए उन्हें उन पत्रों में प्राप्त दिशा -निर्देशों के अनुरूप आगे की कार्रवाई में कठिनाई होती है ।ऐसे में उनके निराकरण में स्वाभाविक रूप से विलम्ब होता ही है । केन्द्र की ओर से राज्यों के साथ सरकारी पत्र - व्यवहार अगर  राजभाषा हिन्दी और प्रादेशिक भाषाओं में हो तो यह समस्या काफी हद तक कम हो सकती है ।
 
हिन्दी कब बनेगी न्याय की भाषा ? 
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    सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के तमाम फैसले भी अंग्रेजी में लिखे जाते है ,जिन्हें अधिकाँश ऐसे आवेदक समझ ही नहीं पाते,जिनके बारे में फैसला होता है . ये अदालतें फैसला चाहे जो भी दें ,लेकिन राजभाषा हिन्दी में तो दें ,ताकि मुकदमे से जुड़े पक्षकार उसे आसानी से समझ सकें. अगर उन्हें अंग्रेजी में फैसला लिखना ज़रूरी लगता है तो उसके साथ उसका हिन्दी अनुवाद भी दें . गैर हिन्दी भाषी राज्यों में वहाँ की स्थानीय भाषा में फैसलों का अनुवाद उपलब्ध कराया जाना चाहिए .

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का सराहनीय निर्णय 
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इस मामले में अब तक की मेरी जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ,बिलासपुर ने अपनी वेबसाइट में अदालती सूचनाओं के साथ - साथ फैसलों का हिन्दी अनुवाद भी देना शुरू कर दिया है ,जो निश्चित रूप से सराहनीय और स्वागत योग्य है । 
       
 भारत सरकार का  राजभाषा विभाग 
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       यह अच्छी बात है कि भारत सरकार ने जून 1975  में राजभाषा से सम्बन्धित संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों पर अमल सुनिश्चित करने के लिए राजभाषा विभाग का गठन किया है ,जिसके माध्यम से हिन्दी को बढ़ावा देने के प्रयास भी किये जा रहे हैं । वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग भी कार्यरत है  लेकिन इस दिशा में और भी ज्यादा ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है । वैसे आधुनिक युग में कम्प्यूटर और इंटरनेट पर देवनागरी लिपि का प्रयोग भी हिन्दी को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने में काफी मददगार साबित हो रहा है । 
     कुछ निराशा भी होती है 
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   लेकिन यह देखकर निराशा होती है कि हिन्दी दिवस के बड़े -बड़े आयोजनों में हिन्दी की पैरवी करने वाले अधिकाँश ऐसे लोग होते हैं जो अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम के स्कूलों में पढाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं ।  दुकानों और बाजारों में लेन -देन के समय हिन्दी में बातचीत करने वाले कथित उच्च वर्गीय ग्राहकों को बड़े -बड़े होटलों में आयोजित सरकारी अथवा कार्पोरेटी बैठकों और सम्मेलनों में अंग्रेजी में बोलते -बतियाते देखा जा सकता है । 
  अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में 'हिन्दी दिवस ' मनाया नहीं जाता ,वहाँ 'हिन्दी -डे ' सेलिब्रेट ' किया जाता है । शहरों में  चारों तरफ़ नज़र दौड़ाने पर अधिकांश दुकानों ,होटलों  व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और निजी स्कूल -कॉलेजों के अंग्रेजी नाम वाले बोर्ड देखने को मिलते हैं । उन्हें देखने पर लगता है कि हमारी हिन्दी दम तोड़ रही है । हिन्दी माध्यम के स्कूलों में भी आगन्तुकों के स्वागत में बच्चे ' नमस्ते ' नहीं बोलकर 'गुड मॉर्निंग सर' अथवा ' गुड मॉर्निंग मैडम ' कहकर अभिवादन करते हैं । उन्हें ऐसा ही  सिखाया जा रहा है । कुछ एक अपवादों को छोड़कर देखें तो अधिकांश भारतीय परिवारों में  माता -पिता 'मम्मी -डैडी ' कहलाने लगे हैं ।चाचा -चाची और मामा -मामी जैसे आत्मीय सम्बोधन 'अंकल -आँटी ' में तब्दील हो गए हैं । पाठ्य पुस्तकों से देवनागरी के अंक गायब होते जा रहे हैं । उनमें पृष्ठ संख्या भी अंग्रेजी अंकों में छपी होती है । कई  स्कूली बच्चे भारतीय अथवा हिन्दी महीनों और सप्ताह के दिनों के नाम नहीं बोल पाते जबकि अंग्रेजी महीनों और दिनों के नाम धाराप्रवाह बोल देते हैं।   भारतीय बच्चे अगर फटाफट अंग्रेजी बोलें तो माता - पिता और अध्यापक गर्व से फूले नहीं समाते ! हिन्दी अच्छे से बोलना और लिखना श्रेष्ठि वर्ग में पिछड़ेपन की निशानी मानी जाती है ।  हिंदुस्तानी नागरिक अगर अंग्रेजी ठीक से न बोल पाए ,न लिख पाए तो हम हिंदुस्तानी लोग ही उसका मज़ाक उड़ाने लगते हैं ,जबकि कोई अंग्रेज अगर टूटी -फूटी हिन्दी बोले तो भी हम उसे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं । विरोध अंग्रेजी भाषा का नहीं ,बल्कि हम  भारतीयों को शिंकजे में ले चुकी अंग्रेजी मानसिकता का है । हमें अंग्रेजियत की इस मानसिकता से उबरना होगा ।
  लेकिन जब आम जनता से हिन्दी में बात करने वाले कई बड़े-बड़े नेताओं को संसद में अंग्रेजी में बोलते देखा और सुना जा सकता है तो निराशा होती गया । क्या कोई बता सकता है कि ऐसे भारतीयों  से भारत की राजभाषा के रूप में बेचारी हिन्दी आखिर उम्मीद करे भी तो क्या ?

      - स्वराज करुण

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और ब्लॉगर हैं )