Friday, November 24, 2023

(आलेख) हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती ! लेखक -स्वराज्य करुण

(आलेख - स्वराज्य करुण ) यह पुरानी कहावत भी है और आज के दौर में हमें यह मानकर भी चलना चाहिए कि जिस तरह हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती ,ठीक उसी तरह ज़रूरी नहीं कि इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया और मीडिया के विभिन्न मंचों पर आ रही हर बात खरे सोने की तरह सच हो , जब तक कि उसमें कोई ठोस प्रमाण या ठोस तथ्य न हो। हर नई तकनीक के अच्छे-बुरे दोनों पहलू होते हैं । उसका उपयोग भी हो सकता है और दुरुपयोग भी। लेकिन जैसा कि समाचारों में देखा , सुना और पढ़ा जा रहा है ,इंटरनेट आधारित ए .आई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या कृत्रिम बौद्धिकता) , चैट जीपीटी और अब डीप फेक नामक नई तकनीक ने दुनिया के करोड़ों सोशल मीडिया यूजर्स के सामने एक नया संकट खड़ा कर दिया है। सदुपयोग के बजाय इन नये संचार उपकरणों के दुरुपयोग की चर्चा अधिक हो रही है। कहा जा रहा है कि ये नवीन तकनीकी उपकरण सोशल मीडिया और परम्परागत मीडिया के साथ -साथ मानव समाज में भी विश्वसनीयता का संकट पैदा कर सकते हैं। ताज़ातरीन चर्चा डीप फेक की है। इन नई तकनीकों में प्रशिक्षित कोई भी इंसान इनके जरिए समाज को भ्रमित कर सकता है। इन नवीन तकनीकों के क्या -क्या फायदे हो सकते हैं , यह स्पष्ट नहीं है ,हो सकता है कि कुछ फायदे भी हों , लेकिन इनसे हो रहे या होने वाले नुकसान की काफी चर्चा मीडिया में हो रही है। सोशल मीडिया के कुछ प्लेटफॉर्म्स में वायरल होने वाले फर्जी वीडियो की जाँच के लिए फैक्ट फाइंडिंग तकनीक भी उपलब्ध है ,लेकिन जब तक उस फर्जी वीडियो की वास्तविकता का पता लगता है ,तब तक काफी देर हो चुकी होती है और फर्जी बातें दूर तक पहुँच कर साधारण मनुष्यों को गुमराह कर सकती हैं। मैंने देखा तो नहीं है ,लेकिन सुना है कि ए. आई. तकनीक के द्वारा आपके मुखारविन्द से वह सब कुछ कहलवाया जा सकता है ,जो आपने कभी कहा ही नहीं था। यानी इसके जरिए अफवाहें भी फैलाई जा सकती हैं। इसी तरह आप लेखक या कवि हों या न हों , लेकिन चैट जीपीटी के जरिए आप किसी भी विषय पर स्वयं के नाम से लेख या कहानी लिखवा सकते हैं ,पत्रकार हों या न हों , अपने लिए अपने नाम से समाचार लिखवा सकते हैं कविताओं का सृजन कर सकते हैं । यानी फर्जी लेखक,पत्रकार और फर्जी कवि बन कर प्रसिद्ध हो सकते हैं। यह देश और दुनिया में साहित्य और पत्रकारिता के लिए भी एक बड़ा संकट बन सकता है। ए. आई .तकनीक से कुछ टीव्ही चैनलों में न्यूज रीडिंग भी की गयी है। हालांकि उसमें कुछ गलत नहीं था । अब तक तो कम्प्यूटर पर फोटोशॉप साफ्टवेयर के जरिए किसी का सिर किसी के धड़ से जोड़ा जा सकता था ,लोग फोटो शॉप के जरिए कई तरह के फर्जी फोटो भी तैयार कर लेते थे और शायद करते भी हैं , फर्जी वीडियो भी वायरल होते रहते हैं , लेकिन अब डीप फेक में तो कोई भी किसी के भी वीडियो का गलत इस्तेमाल कर सकता है। या फर्जी वीडियो बना सकता है।हाल ही में एक फर्जी वीडियो वायरल हुआ ,जिसमें माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को गरबा नृत्य करते हुए दिखाया गया।स्वयं प्रधानमंत्री ने इसका जिक्र करते हुए एक बैठक में लोगों को डीप फेक तकनीक से सावधान किया। यह अच्छी बात है कि भारत सरकार ने डीप फेक के खतरों को गंभीरता से संज्ञान में लिया है। नई दिल्ली में कल केन्द्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव की अध्यक्षता में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में डीप फेक वीडियो अपलोड करने वालों और इसके प्लेटफॉर्म बनाने वालों पर जुर्माना लगाने का निर्णय लिया गया। मंत्री जी ने डीप फेक को लोकतंत्र के लिए भी एक बड़ा ख़तरा बताया । इस बैठक में सभी प्रमुख इंटरनेट मीडिया संस्थानों के प्रमुख प्रतिनिधियों सहित कई तकनीकी विशेषज्ञ और शिक्षाविद भी शामिल हुए। बैठक में डीप फेक के खतरों से निपटने के लिए दस दिनों के भीतर एक स्पष्ट कार्ययोजना बनाने का भी निर्णय लिया गया।-स्वराज्य करुण

Tuesday, November 7, 2023

(गीत) मेहनत की मुस्कान -स्वराज्य करुण

मेहनत की मुस्कान b> सांध्य दैनिक 'छत्तीसगढ़' की साप्ताहिक पत्रिका ' इतवारी अख़बार' में 20 नवम्बर 2011 को प्रकाशित।

Sunday, November 5, 2023

(आलेख) यह देखकर हम जैसे मामूली लोग हैरान हैं !

यह देखकर दुनिया के हम जैसे मामूली लोग हैरान हैं कि हमास और इजरायल के बीच यह निर्मम लड़ाई आख़िर हो क्यों रही है ?इक्कीसवीं सदी में आकर उच्च शिक्षा ग्रहण करने वालों के दिमागों पर इस तरह के पागलपन का ग्रहण क्यों लग गया है? उनकी शिक्षा -दीक्षा पर संदेह होने लगता है। क्या उन्होंने मानवता को बर्बाद करने की शिक्षा हासिल की है ?
टीव्ही चैनलों में आ रहे भयावह दृश्य हर इंसान को विचलित कर रहे हैं। कहीं अस्पतालों पर बम बरसाए जा रहे हैं तो कहीं स्कूलों और शरणार्थी शिविरों पर हमले हो रहे हैं। क्यों इतनी मारकाट मची हुई है ? दोनों पक्षों की बमबारी में हजारों मासूम बच्चे और निरीह नागरिक मारे जा रहे हैं। बस्तियाँ तबाह हो रही हैं। जिन लोगों ने लाखों रूपये खर्च कर कई मंज़िल ऊँची इमारतों में अपने सपनों का आशियाना ख़रीदा था , वे इमारतें भी ज़मींदोज़ हो रही हैं। लोगों के सपनों का आशियाना उजड़ रहा है। बमों के बारूदी धुएँ से दुनिया का वायुमंडल भी प्रदूषित हो रहा है। मानवता कराह रही है। इस निर्मम युद्ध की ख़बरों ने रूस-यूक्रेन युद्ध के समाचारों को भी पीछे ढकेल दिया है।युद्ध चाहे कहीं भी हो रहा हो , उसमें जीत किसी की नहीं होती , हजारों लाखों लोगों की लाशों पर सिर्फ़ मानवता की हार होती है। इसलिए चाहे हमास-इजरायल की लड़ाई हो ,या रूस-यूक्रेन युद्ध , ये हिंसक संघर्ष तत्काल बंद होने चाहिए। इन युद्धों को रोकने में संयुक्त राष्ट्रसंघ की ढुलमुल नीति पूरी दुनिया को निराश कर रही है! - स्वराज करुण

Wednesday, October 18, 2023

(आलेख) इतने भजन ,इतने पूजन ,इतनी प्रार्थनाएँ , सब व्यर्थ

इतने भजन ,इतने पूजन ,इतनी प्रार्थनाएँ, इंसानी बर्बरता के आगे कोई काम न आए। क्या वे लाखों लोग अपने बचाव के लिए अपने -अपने अज्ञात ,अदृश्य ईश्वर से प्रार्थना नहीं कर रहे होंगे , जो हमास और इजरायल के बीच 12 दिनों से जारी विनाशकारी युद्ध में फँसे हुए हैं ? सब व्यर्थ गया। गजा के एक अस्पताल पर बमबारी जहाँ लज्जाजनक है ,वहीं इसके फलस्वरूप अस्पताल में 500 मौतों की ख़बर बेहद पीड़ादायक । ऐसा भी कहा जा रहा है कि इस घिनौने हमले में मरने वालों और घायलों की संख्या और भी बढ़ सकती है।
मनुष्य बीमार पड़ने पर अपने स्वास्थ्य के लिए ,अपनी प्राण रक्षा के लिए अस्पतालों की शरण लेता है, लेकिन अगर किसी अस्पताल पर ही बमबारी हो तो इंसान आख़िर जाए तो जाए कहाँ ? क्या इस क्रूरतम हमले में डॉक्टर्स ,नर्स और अस्पताल के अन्य कर्मचारी भी मरे या घायल नहीं हुए होंगे ,जो वहाँ मरीजों की सेवा के लिए तैनात थे? यह बमबारी चाहे जिसने भी की हो , वह इंसान तो हो ही नहीं सकता। उसकी हैवानियत की सबको एक स्वर से निन्दा करनी चाहिए ।हमास और इजरायल दोनों एक -दूसरे पर इस शर्मनाक करतूत का आरोप लगा रहे हैं । कौन सही है और कौन गलत , यह तय कर पाना वहाँ चल रही भयानक हिंसा और प्रतिहिंसा के माहौल में बहुत कठिन हो गया है। यह ख़ूनी लड़ाई हर हालत में रुकनी चाहिए। अस्पताल में हुई सैकड़ों मौतों के लिए दोनों पक्षों को सार्वजनिक रूप से पश्चाताप करना चाहिए ,क्योंकि अगर वे युद्ध नहीं करते तो ऐसा क्यों होता ? -स्वराज्य करुण

Wednesday, October 11, 2023

(आलेख) बंद क्यों नहीं होती ऐसी ख़ूनी लड़ाइयाँ ? लेखक -स्वराज्य करुण

आख़िर संयुक्त राष्ट्रसंघ की क्या ड्यूटी है? (आलेख -स्वराज्य करुण) यूक्रेन पर लगभग डेढ़ साल पहले शुरू हुए रूसी आक्रमण की आग अभी बुझी भी नहीं है और उधर इज़राइल और फिलिस्तीन के बीच युद्ध शुरू हो गया है। युद्ध चाहे यूक्रेन और रूस का हो या इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच , इन्हें तत्काल रोका जाना चाहिए। बेरहमी और पागलपन से भरी इन लड़ाइयों में अब तक इन देशों के सैकड़ों निरीह नागरिकों की मौत हो चुकी है , हजारों लोग घायल हुए हैं। युद्ध के बदहवास माहौल में मृतकों और घायलों के सही-सही आंकड़े तत्काल नहीं मिल पाते है। शायद ये आंकड़े अब तक मिली संख्याओं से अधिक होंगे।संयुक्त राष्ट्र संघ को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। आख़िर संयुक्त राष्ट्र संघ की क्या ड्यूटी है? उसके बड़े-बड़े दिग्गज पदाधिकारियों को आख़िर लाखों डॉलर की तनख्वाहें और सुख-सुविधाएँ आख़िर किस काम के लिए मिलती हैं ? दुनिया के तमाम देशों ने मिलकर यह संगठन बनाया किसलिए है?
किन्हीं दो देशों की खूनी लड़ाई का खामियाज़ा उन देशों के उन हजारों-लाखों लोगों को भुगतना पड़ता है ,जिनकी कोई गलती नहीं होती ,जिनका उन लड़ाइयों से कोई लेना -देना नहीं रहता। वो अपनी और अपने परिवारों की ज़िन्दगी की गाड़ी खींचने के लिए रोजी-रोटी की ज़द्दोज़हद में लगे रहते हैं। लेकिन युद्ध की आग उनकी घर-गृहस्थी को उजाड़कर रख देती है , उन्हें और उनके मासूम बच्चों , माताओं ,बहनों और बुजुर्गों सहित घर के दूसरे सदस्यों को भी जलाकर राख कर देती है।लेकिन उन राष्ट्रों के प्रमुख शासक अपने-अपने सिंहासनों की सुरक्षा के लिए , अपने -अपने अहंकार की तुष्टि के लिए अपने -अपने नागरिकों में युद्धोन्माद की लहर पैदा करके, उन्हें मानवता का दुश्मन बना देते हैं और खुद अपने-अपने महलों में हमेशा महफूज़ बने रहते हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वर्ष 1945 में दो जापानी शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिकी परमाणु बमों के हमलों में लाखों नागरिक मारे गए।उसकी एक अलग दर्दनाक कहानी है। यह कड़वी सच्चाई है कि दुनिया का इतिहास राष्ट्रों के बीच हुई और हो रही लड़ाइयों से बहते बेगुनाहों के ख़ून से भी लिखा गया है और लिखा जा रहा है। अगर दुनिया पढ़े-लिखे ,सुशिक्षित लोगों की है , अगर दुनिया में शिक्षा और साक्षरता बढ़ चुकी है , तो ऐसी लड़ाइयाँ बंद होनी चाहिए। वैसे ये बात तो है कि अनपढ़ लोग इस प्रकार के पागलपन से अक्सर दूर रहते हैं ,लेकिन पागल किस्म के लोग उन्हें भी पागलपन का शिकार बनाकर युद्ध की आग में झोंक देते हैं। युद्ध से और किसी को कोई फायदा हो या न हो ,लेकिन अस्त्र-शस्त्रों के निर्माता और व्यापारी हमेशा फ़ायदे में रहते हैं। ये लड़ाइयाँ हथियारों के सौदागरों को लाखों ,करोड़ो और अरबो रुपयों के मुनाफ़े का बाज़ार मुहैय्या करवाती हैं। दुनिया भर के हथियार-उद्योग इन्हीं निर्मम लड़ाइयों के दम पर फलते-फूलते रहते हैं। विगत तीन दशकों में हमारी दुनिया में कई युद्ध हुए हैं। वर्ष 1990 में खाड़ी युद्ध , वर्ष 2001 में अफ़ग़ानिस्तान पर , फिर 2003 में इराक पर अमेरिकी हमलों का खौफ़नाक मंज़र दुनिया देख चुकी है। सीरिया से भी युद्ध की ख़बरें गाहेबगाहे आती रहती हैं। कुछ साल पहले अज़रबैजान-आर्मेनिया की खूनी ज़ंग में भी मानव जीवन की भारी तबाही हो चुकी है । दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से युद्ध के विनाशकारी पागलपन की ख़बरें मिलती ही रहती हैं। ऐसी लड़ाइयाँ बंद होनी चाहिए। दुनिया के तमाम देशों को अपनी जनता के लिए बेहतर शिक्षा के साथ बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं पर , आवागमन के बेहतर संसाधनों के विकास पर ध्यान देना चाहिए। अपनी ऊर्जा साहित्य ,कला और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन पर लगानी चाहिए। अगर ये दुनिया सचमुच पढ़े-लिखों की है तो उसे सभी देशों के बीच परस्पर शांति और मैत्री के लिए काम करना चाहिए। संयुक्त राष्ट्रसंघ का गठन भी इसी उद्देश्य से किया गया था। लेकिन लगता है कि वह इस बात को भूल चुका है। उसे याद दिलाना ज़रूरी है। आलेख -स्वराज्य करुण फोटो -इंटरनेट से साभार

Wednesday, October 4, 2023

(आलेख) मेरी समझ से ये हैं घुटनों में दर्द के कुछ असली कारण

(आलेख -स्वराज करुण ) दोस्तों , मैं कोई डॉक्टर या फिजियोथेरेपी का विशेषज्ञ तो नहीं,लेकिन इस युग में घुटनो के दर्द की आम हो चली समस्या को देखकर और सुनकर कह रहा हूँ । मैं स्वयं इस दर्द से गुज़र रहा हूँ। आप कहेंगे कि पर उपदेश ,कुशल बहुतेरे ,लेकिन जैसा कि मैंने महसूस किया है और शायद आप लोग भी मुझसे सहमत होंगे । घुटनों के दर्द की बढ़ती समस्या के कई कारण हो सकते हैं। मेरी समझ से इसके कुछ असली कारण ये हो सकते हैं । ज़्यादातर शहरी लोगों में ज़मीन पर पालथी मोड़कर बैठने और पीढ़े में भोजन करने की आदत छूट गयी है। पहले महिलाएँ रसोई घरों में ज़मीन पर बने मिट्टी के गोबर लिपे चूल्हे में लकड़ी से खाना बनाती थीं ,या कोयले की सिगड़ी में । लेकिन अब मिट्टी के चूल्हे लगभग विलुप्त हो चुके हैं तो उनमें उपयोग के लिए लकड़ियों का तो सवाल ही नहीं उठता। पहले हर मोहल्ले में लकड़ी टाल होते थे ,लेकिन वे भी अब कहाँ दिखाई देते हैं? अब तो लगभग हर किचन में गैस चूल्हा और प्लेटफार्म होता है । महिलाएँ खड़े होकर खाना बनाती हैं। डाइनिंग टेबल सस्ता हो या महँगा ,कई घरों में खाना डाइनिंग टेबल पर ही परोसा जाता है। बच्चे ,बड़े सभी उम्र के लोग उसमें डाइनिंग कुर्सियों पर बैठकर भोजन करते हैं। पालथी मोड़ने की आदत कहाँ रहेगी ? शादी -ब्याह के आयोजनों में पहले मेहमानों को पंगत में बैठाकर बड़े मान-मनुहार के साथ ,प्राकृतिक दोना पत्तलों में बड़े प्रेम से भोजन परोसा जाता था, मेहमान भी पालथी मोड़कर आराम से खाना खाते थे।लेकिन अब तो हर तरफ़ बफे सिस्टम का प्रचलन है । लोग खड़े-खड़े भोजन करते हैं। पालथी मोड़कर बैठने की आदत भी उनमें नहीं रह गयी है। छोटे-छोटे कामों के लिए पैदल चलने की आदत भी छूटती जा रही है। आजकल कहीं आना -जाना हो तो आजकल बच्चे और बड़े सभी लोग बाइक चलाकर आते - जाते हैं। साइकिल चलाने से पैरों की कसरत हो जाती थी ,लेकिन साइकिल की आदत छूट रही है। आपके शरीर को लाने ले जाने काम तो मशीन कर रही है। पैरों की कसरत भला कैसे हो पाएगी ? यह ज़रूर है कि कहीं बहुत दूर जाना हो तो भले ही बाइक का इस्तेमाल करें ,लेकिन आसपास बाज़ार-दुकान जाना हो,बच्चों को दो चार किलोमीटर की दूरी पर स्कूल भेजना हो तो साइकिल बेहतर है। हम लोग अपने बचपन के दिनों में पहली से पाँचवी तक फर्श पर टाट पट्टियों में बैठ कर पढ़ाई करते थे ,बेंच और डेस्क पर बैठने का सिलसिला छठवीं से शुरू होता था और कई जगहों पर तो उन कक्षाओं में भी टाट पट्टियों में बैठकर ही बच्चे बड़े आराम से पढ़ाई कर लेते थे। पालथी मोड़कर बैठने की आदत बन जाती थी । लेकिन अब तो ज़्यादातर स्कूलों में डेस्क और बेंच पर बैठकर ही पढ़ाई होती है। घुटनों का मूवमेंट नहीं होता। लेकिन एक बात ज़रूर अच्छी हुई है कि कई राज्यों में सरकारी योजनाओं के तहत हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी कक्षाओं की बालिकाओं को निःशुल्क साइकल दी जा रही है ,जिनका उपयोग भी उनके द्वारा किया जा रहा है ,जो उनकी सेहत के लिए भी अच्छा है।लेकिन कई शहरी घरों में अभिभावक अपने बेटे-बेटियों की जिद के आगे झुककर उनके हाथों में एक्टिवा या स्कूटी जैसे बाइक थमा देते हैं, जिनमें ये बच्चे फर्राटे से आते जाते हैं और कई बार दुर्घटनाग्रस्त भी हो जाते हैं। साइकिल से दुर्घटनाओं की आशंका काफी कम होती है।यह पैरों के व्यायाम का भी एक अच्छा साधन है। - स्वराज करुण

Tuesday, October 3, 2023

(आलेख) डीजे की आफ़त से कब मिलेगी राहत ?

(आलेख -स्वराज्य करुण) पुरानी कहावत है कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं । यह कहावत आज के समय में डीजे यानी डिस्क-जॉकी नामक साउंड बॉक्स पर भी लागू हो रही है। वह आपसे या हमसे कहीं दूर बज रहा हो तो काफी राहत महसूस होती है ,लेकिन भयानक दैत्य गर्जना वाले ये बड़े- बड़े गहरे काले रंग के डिब्बे जिस रास्ते से या जिस मोहल्ले से गुजरते हैं , जिन घरों के नज़दीक से गुजरते हैं , वहाँ के सीधे-सादे शांतिप्रिय नागरिक और उनके परिवार त्राहिमाम -त्राहिमाम करते हुए अपने कान बन्द करने को मज़बूर हो जाते हैं । उनके घरों के बर्तन तक झनझनाने लगते हैं,खिड़कियाँ काँपने लगती हैं। ऐसा लगता है ,मानो कोई भूचाल आ गया है! हालांकि सड़कों पर जुलूसों में यह धमाल कुछ देर तक ही मचता है , लेकिन अगर कोई जुलूस कई किलोमीटर लम्बा हो और किसी के घर के आसपास यह धमाल घंटों तक जोर -जोर से होता रहे तो? ऐसे में उन सड़कों के दोनों किनारों के दुकानदार और घरों में रहने वाले लोग सोचते हैं कि शोरगुल की यह आफ़त कब टले तो राहत मिले और हम चैन से बैठ सकें , अपने अपने काम कर सकें या आराम से सो सकें। लेकिन कई बार किसी आयोजन में देर रात तक डीजे बजता रहता है। उसके इर्दगिर्द के घरों के लोग उस व्यक्ति को कोसने लगते हैं ,जिसने उनका का सुख-चैन खत्म करने के लिए इस आफ़त का आविष्कार किया!
पारम्परिक लाउडस्पीकरों से बजने वाले गीत -संगीत कर्णभेदी नहीं ,बल्कि कर्णप्रिय हुआ करते थे , उन सामान्य लाउडस्पीकरों से (माइक पर ) वक़्ता कई सार्वजनिक सभाओं को भी आराम से संबोधित कर लेते थे। हालांकि इन लाउडस्पीकरों से प्रसारित ध्वनियों से भी शोर मचता था ,लेकिन इस वह डीजे की तरह उतना भयंकर नहीं होता था।लेकिन अब तो ऐसा लगता है कि लाउडस्पीकरों को धता बताते हुए उनकी दुकानों पर डीजे नामक दानवी शोर मचाने वाले इन बक्सों ने कब्जा जमा लिया है। डीजे बक्सों से होने वाला यह कर्णभेदी ध्वनि प्रदूषण शहरों से दौड़ते हुए अब कस्बों और गाँवों तक भी पहुँच गया है। बारातों सहित तरह-तरह के सामाजिक -सांस्कृतिक-धार्मिक जलसों और जुलूसों में इनका धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। लोग वाहनों में एक साथ कई -कई डीजे बॉक्स लगवाकर इतना शोर मचवाते हैं कि कान के पर्दे फट सकते हैं और हॄदय रोगियों तथा नन्हें बच्चों के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुँच सकता है। गाहेबगाहे ऐसी ख़बरें आती भी रहती हैं । यह भी सुनने में आता है कि ऐसे प्राणघातक साउंड बॉक्स में गगनभेदी और दिल दहला देने वाले संगीत की धुनों पर आड़े-टेढ़े नाचने वाले कुछ लोग नशे की हालत में धमाल मचाते रहते हैं । उनके आस-पास से गुजरने वाले राहगीर और कामकाजी लोग परेशान होते रहते हैं। ऐसा भी सुनने को मिलता है कि इन डीजे वालों के रास्ते में संयोगवश आने -जाने वाले सामान्य नागरिक अपनी गाड़ियों के लिए कुछ साइड मांगने पर उनसे बदसलूकी भी की जाती है। डीजे के साउंड बक्सों का कुछ घंटों का किराया ही कई -कई हजार रुपयों का होता है और कहीं-कहीं आयोजक-प्रायोजक लोग लाखों रुपए भी खर्च कर देते हैं। सिर्फ़ कुछ देर के आनंद के लिए यह एक तरह की निर्मम फ़िज़ूलखर्ची नहीं तो और क्या है?। देश में पहले स्कूल -कॉलेजों की परीक्षाओं के मौसम में कोलाहल नियंत्रण अधिनियम के तहत ध्वनिविस्तारक यंत्रों पर प्रतिबंध लगा दिया जाता था ,ताकि विद्यार्थी शांतिपूर्ण माहौल में पढ़ाई करते हुए परीक्षा की तैयारी कर सकें । इस अधिनियम को सिर्फ़ परीक्षाओं के दिनों में ही नहीं ,बल्कि हमेशा लागू रहना चाहिए। मेरी अल्प जानकारी के अनुसार ध्वनि मापन का पैमाना डेसिबल है। शायद नियम ,अधिनियम भी बने हुए हैं कि एक निश्चित डेसिबल से ज़्यादा ध्वनि नहीं की जानी चाहिए ,लेकिन ....? विभिन्न प्रकार के जुलूसों की गाड़ियों में एक साथ बहुत सारे डीजे बॉक्स क्यों लगना चाहिए ?क्या एक या दो डीजे बॉक्स लगाने से काम नहीं चल सकता ? इससे ध्वनि प्रदूषण रुकेगा तो नहीं लेकिन शायद काफी हद तक कम हो जाएगा। इस बारे में सोचा जाना चाहिए। आलेख -स्वराज करुण (फोटो - इंटरनेट से साभार) <

(पुस्तक-चर्चा) मोर सुरता के गाँव ; माटी -महतारी की मर्मस्पर्शी छुअन (आलेख -स्वराज्य करुण)

मधु धांधी की छत्तीसगढ़ी कविताओं के संकलन 'मोर सुरता के गाँव' की रचनाओं में ग्राम्य जीवन का सामाजिक ,आर्थिक और प्राकृतिक परिवेश भी साकार हो उठा है। इन रचनाओं में छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति की सोंधी महक भी है और कई रचनाओं में किसानों और मज़दूरों के कठिन जीवन संघर्षों का हृदयस्पर्शी चित्रण भी हुआ है। मोर सुरता के गाँव - यानी मेरी यादों का गाँव। इस कविता संग्रह की सभी रचनाओं में माटी -महतारी की मर्मस्पर्शी छुअन है। उनकी रचनाएँ हमें अपनी जड़ों से जोड़ती हैं।
मधुर स्वभाव और मीठे स्वरों के कवि मधु धांधी का जन्म छत्तीसगढ़ के तत्कालीन अविभाजित रायपुर जिले में स्थित ग्राम पिसीद विकासखंड -कसडोल में 21 जून 1951 को हुआ था। यह गाँव और विकासखंड अब राज्य के बलौदाबाजार-कसडोल जिले में है। कवि मधु धांधी का निधन तीन अप्रैल 1977 को वर्तमान महासमुंद जिले में विकासखंड मुख्यालय पिथौरा से लगे हुए अपने गृहग्राम -खुटेरी में हुआ । उन दिनों यह गाँव और विकासखंड रायपुर जिले में शामिल था। मधु धांधी छत्तीसगढ़ में आंचलिक कवि सम्मेलनों के उभरते कवि थे। उनकी कुछ कविताएँ आंचलिक और राष्ट्रीय पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं , उन दिनों आकाशवाणी के रायपुर केन्द्र से उनके काव्य पाठ का प्रसारण भी हुआ। लेकिन उस दौर में संसाधनों की कमी के चलते उनकी अधिकांश रचनाओं का व्यापक रूप से प्रकाशन और प्रसारण नहीं हो पाया। हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं के मधुर गीतकार मधु धांधी के निधन के बाद उनके शोकसंतप्त मित्रों और शुभचिंतकों ने उनकी स्मृति में पिथौरा में साहित्य एवं सांस्कृतिक समिति का गठन किया ,जिसके तत्वावधान में उनका पहला कविता संग्रह 'हॄदय का पंछी ' अक्टूबर 1977 में प्रकाशित किया। यह उनकी 13 हिन्दी और 12 छत्तीसगढ़ी कविताओं का मिला -जुला संकलन था। लगभग पैंतालिस साल बाद वर्ष 2022 में उनकी 74 हिन्दी कविताओं का संग्रह 'मेरा सागर ;तुम्हारी कश्ती' और छत्तीसगढ़ी कविताओं का संग्रह 'मोर सुरता के गाँव' का प्रकाशन हुआ । इनमें से हिन्दी कविता -संग्रह वैभव प्रकाशन रायपुर द्वारा और छत्तीसगढ़ी कविता -संग्रह श्रृंखला साहित्य मंच ,पिथौरा द्वारा प्रकाशित किया गया। यह एक विडम्बना है कि उनके तीनों कविता -संग्रह उनके मरणोपरांत ही प्रकाशित हो पाए। मधु धांधी की 46 वीं पुण्यतिथि( तीन अप्रैल 2023 ) के मौके पर उन्हें याद करते हुए आज हम 'साहित्य -विशेष ' में विनम्र श्रद्धांजलि सहित उनकी 19 छत्तीसगढ़ी कविताओं के संकलन ' मोर सुरता के गाँव' की चर्चा कर रहे हैं। दिवंगत कवि के प्रथम संग्रह 'हॄदय का पंछी ' की छत्तीसगढ़ी कविताओं को भी इस संग्रह में सहेजा गया है। चूंकि 'हृदय का पंछी' का प्रकाशन 45 साल पहले (1977 में )हुआ था , इसलिए इन छत्तीसगढ़ी रचनाओं को संरक्षित करने की दृष्टि से इन्हें नये संग्रह में शामिल किया गया है। इन गीतों की तरह बाकी सात कविताओं में भी लोकजीवन की भावुक अभिव्यक्ति को भी हम महसूस कर सकते हैं।। आधुनिकता के इस दौर में , हम अपनी जीवनशैली में चाहे कितने ही शहरी क्यों न हो जाएँ, लेकिन हम में से अधिकांश अपने भीतर कहीं न कहीं स्वयं को अपने गाँवों में ही पाते हैं। नौकरी और रोजगार के लिए गाँव छोड़कर शहरों में जा बसे लोगों की जड़ें अपने गाँवों से अलग नहीं हो पाती। ऐसे में मधु धांधी के इस कविता संग्रह का शीर्षक गीत -'मोर सुरता के गाँव' पाठकों को उस गाँव की याद दिलाता है ,जहाँ आमा के मउरने लगे हैं। यानी आम के वृक्षों में मौर आने लगे हैं ।यानी यह वसंत का मौसम है - *तोर मया के मउरिस हे आमा रे राम , मोर सुरता गाँव आमा मउरे। मन के अजोध्या म सीता अउ राम , जिहाँ मया के राधा ,उहैं हावै श्याम।* अर्थात तेरी मया (प्रीत) के आम मउरने लगे हैं।मेरी यादों के गाँव में आम मउरने लगा है। सीता और राम मेरे मन के अयोध्या में हैं। जहाँ प्रेम की राधा होती है ,श्याम भी वहीं होता है। कवि ने 'मोर गाँव के दू चरवाहा 'शीर्षक अपने गीत में गाँव के मेहनतकश चरवाहों की कठिन दिनचर्या का वर्णन किया है , वहीं 'फेर पर गे संगी अकाल ' शीर्षक से ही स्पष्ट है कि यह रचना अकाल पीड़ित जनता की मनोदशा को प्रकट करती है । वर्ष 1972 के अपने एक गीत ' खेत -खेत ला पानी ' में कवि आव्हान करते हैं- *खेत -खेत ला पानी ,सब ला काम दव, जाए बर हे दूरिहा ,झन आराम लव। संगी -संगवारी हे भखरा ,हीरा ह , अबड़ पिराथे गा आँखी के पीरा ह। झन गोठियावव जात-पाँत के बात ला आँसू पोछव ,सुख -दुःख मा तो साथ दव।* यानी हर खेत को पानी और सबको रोजगार दो। बहुत दूर जाना है। आराम मत करो। जात-पाँत की बात मत करो ,जो आँखों को पीड़ा देती है। इसलिए पीड़ितों के आँसू पोछो और सुख -दुःख में उनका साथ दो। कवि देश की प्रगति की ओर भी लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं। उन्होंने इस गीत में आज़ादी के बाद देश में बने भाखड़ा नंगल और हीराकुद जैसे विशाल जलाशयों का उल्लेख किसानों के संगी -संगवारी के रूप में 'भखरा' और' हीरा' के नाम से किया है। लेकिन वह जनता को झूठे आश्वासन देने वालों से भी सावधान करते हैं और कहते हैं कि ऐसे लबरा (झूठे)लोगों के भाषणों से तुमने क्या पाया - *झन पतियाहू तुमन त असवासन ला , का पाए हव सुन -सुन लबरा भासन ला।* देश और प्रदेश की विषम परिस्थितियों ने कवि को व्यथित किया है। उनकी यह व्यथा इस गीत की आगे की पंक्तियों में छलक उठती है -- *गांधीजी के सपना ,सपना रहिगे , नेहरू जी के प्रिय गुलाब कछु कहिगे। छत्तीसगढ़ के बेटा मन सब सहिगे, बादर बिन बरसे के बरसे रहिगे।* संग्रह में - आँखी होगे बदरा,रोवत हे अंगना के दीयना ,आँखी बैरी ,सुरता के फाँस , और मोर टूट के घरौंदा माटी के जैसे प्रेम और विरह के गीत भी हैं ,जिनमें वियोग श्रृंगार की प्रधानता है , तो 'बाँचे हे चार दिन गवनवा हो ही 'जैसे गीत में जिस बेटी का गौना होने वाला है ,उसके साथ उसकी माँ का मर्मस्पर्शी संवाद भी । इसी तरह 'तोर सुरता के जंगल मा संगी' शीर्षक गीत में कवि ने नायक -नायिका के बीच सहज ,सरल श्रृंगार भावों से परिपूर्ण बातचीत को अपनी कल्पनाओं के कैनवास पर भावनाओं के रंगों से सजाया है। वहीं 'सीता हरण'शीर्षक लम्बी रचना में कवि ने माता सीता के अपहरण की घटना का मार्मिक चित्रण किया है। मधु धांधी की हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कविताओं की दुनिया हमारे और आपके परिवेश में ही रची -बसी हैं। उनके दोनों नये कविता संग्रहों की रचनाओं में माटी- महतारी की मर्मस्पर्शी छुअन के साथ दिलों को छू लेने वाली मानवीय संवेदनाओं की मोहक अभिव्यक्ति भी है। कवि तो भावुक होता ही है,लेकिन मुझे लगता है कि इन रचनाओं को पढ़कर पाठक भी स्वयं को भावुक होने से नहीं रोक पाएंगे! आलेख -- स्वराज्य करुण

Monday, September 4, 2023

(पुस्तक-चर्चा ) न्यूनतम शब्दों में अधिकतम कहने की हिम्मत रखती ये क्षणिकाएँ

(आलेख -स्वराज्य करुण) यह एक सच्चाई है कि दुनिया के प्रत्येक मनुष्य और यहाँ तक कि प्रत्येक जीव का जीवन क्षणभंगुर होता है। मेरी शुभकामना है कि सभी स्वस्थ रहें और दीर्घायु हों ,शतायु हों ,लेकिन इस हक़ीक़त से भला कौन इनकार कर सकता है कि अगले पल या अगले क्षण क्या होगा ,इसे कोई नहीं जानता । फिर भी एक बेहतर कल या सुखद भविष्य की आशाओं के साथ ,नई सुबह की उम्मीदों के साथ छोटे -छोटे और बड़े-बड़े सुखों और दुःखों की गठरी लेकर हम सब जिये चले जाते हैं। इस क्षणभंगुर जीवन की बड़ी -से बड़ी बातों को कुछ ही क्षणों में अपनी छोटी-छोटी क्षणिकाओं के माध्यम से बड़े सहज लेकिन प्रभावी ढंग से ,बड़ी ख़ूबसूरती से लिखना और कह देना शिवानंद महान्ती की एक बड़ी ख़ूबी थी। वे छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में स्थित पिथौरा कस्बे के निवासी थे।श्रृंखला साहित्य मंच ,पिथौरा की ओर से उनका पहला कविता -संग्रह 'संशय के बादल ' वर्ष 2018 में प्रकाशित हुआ था । उसमें भी उनकी अधिकांश रचनाएँ क्षणिकाओं के रूप में हैं । महासमुंद जिले में एक कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी उनकी पहचान और प्रतिष्ठा थी। हिन्दी कविता की क्षणिका-विधा के सिद्धहस्त और सशक्त हस्ताक्षर के रूप में छत्तीसगढ़ के साहित्यिक परिदृश्य में वह बड़ी तेजी से अपनी पहचान बना रहे थे। तभी दुर्भाग्यवश 11 अगस्त 2022 को रक्षाबंधन के पवित्र दिवस पर पिथौरा में सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल होने के बाद लगभग सौ किलोमीटर दूर राजधानी रायपुर के एक निजी अस्पताल में जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे। लेकिन तीसरे दिन यानी 14 अगस्त2022 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। ऐसा लगता है कि इस भयानक हादसे के साथ उनका हमसे सदैव के लिए बिछुड़ना भी कुछ ही क्षणों में हुआ। हम सब व्यथित हॄदय से कह सकते हैं कि देखते ही देखते यह सब 'कुछ ही क्षणों में ' घटित हो गया। इस हृदयविदारक हादसे में उनके निधन के लगभग एक वर्ष बाद उनकी क्षणिकाओं का यह संकलन 'कुछ ही क्षणों में' आपके सामने है। हालांकि उनके इस दूसरे संकलन में इस शीर्षक से उनकी कोई क्षणिका नहीं है । उनकी अब तक उपलब्ध कविताओं और क्षणिकाओं में भी इस शीर्षक से लिखी कोई रचना नहीं मिली है , लेकिन अपनी बातों को 'कुछ ही क्षणों में ' लिख देने और कह देने का उनका अभिव्यक्ति-कौशल संकलन की इन क्षणिकाओं में झलकता है, इसीलिए इस संग्रह का सम्पादन करते हुए मैंने इसका शीर्षक 'कुछ ही क्षणों में' दिया है । शिवानंद के साथ हुए जानलेवा सड़क हादसे ने मुझे भी बेहद विचलित और व्यथित करते हुए जीवन की क्षणभंगुरता का अहसास करवाया। मुझे लगा कि इंसान के साथ कुछ ही क्षणों में क्या से क्या हो जाता है !
शिवानंद की ये क्षणिकाएँ हमें उनसे जुड़ी अनेकानेक अमिट स्मृतियों से भी जोड़ती हैं। यह संग्रह उनकी प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर प्रकाशित हो रहा है। काश ! वे अपने जीवन-काल में स्वयं के इस दूसरे कविता -संग्रह (क्षणिका-संग्रह) को प्रकाशित होता हुआ देख पाते। लेकिन नियति ने उन्हें हमसे सदैव के लिए छीन लिया । मेरा मानना है कि साहित्य मनुष्य के मनोभावों की शाब्दिक अभिव्यक्ति है। कहानी ,उपन्यास ,निबंध और कविता भी साहित्य की अलग-अलग विधाएँ है। कविता हिन्दी साहित्य के क्रमिक विकास में गीत ,ग़ज़ल मुक्त छंद और अतुकांत कविता जैसे अलग -अलग रूपों में हमारे सामने आती रही है। पिछले कुछ दशकों में कविता का एक नया रूप 'क्षणिका'के रूप में प्रकट हुआ है। कोई भी सच्चा कवि स्वाभाविक रूप से भावुक होता है। वह अपने समय और समाज में घटित तरह -तरह की घटनाओं से भी प्रभावित होता है। अन्याय ,अत्याचार और सामाजिक विसंगतियों से आहत एक सच्चे कवि से कविता भावनाओं के आवेग में ही लिखी जाती है। मेरे विचार से किसी एक क्षण की भावुकता में रची गयी कोई छोटी कविता ही 'क्षणिका'होती है। अपने आस-पास के परिवेश से प्रभावित कवि में यह भावुकता क्षण भर में आती है ,तब अपनी भावुकता के इस क्षणिक उफान में कवि के शब्द 'क्षणिका' के रूप में अभिव्यक्त होते हैं ,जो पाठकों को विषय-वस्तु पर देर तक कुछ न कुछ सोचने के लिए मज़बूर कर देते हैं। शिवानंद महान्ती की इन क्षणिकाओं को भी हमें इसी नज़रिए से देखना और समझना चाहिए। इनमें व्यंग्य भी है और करुणा भी । समय और समाज की सच्चाइयों के बारे में न्यूनतम शब्दों में अधिकतम कह देने की हिम्मत शिवानंद की क्षणिकाओं में देखी जा सकती है। यह उनकी क्षणिकाओं की एक बड़ी ताकत भी है ,जिसे हम 'कुछ ही क्षणों में' शीर्षक से छपे इस संग्रह में महसूस कर सकते हैं। ।संग्रह में शामिल शिवानंद की क्षणिकाएँ हमें मानवीय संवेदनाओं से जोड़ती हैं। संग्रह में उनकी 40 क्षणिकाएँ शामिल हैं। उनकी अधिकांश क्षणिकाएँ हमारे समाज में हो रही व्यथित कर देने वाली विसंगतिपूर्ण हलचल की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करती हैं । ये क्षणिकाएँ कवि बिहारी की रचना "बिहारी सतसइ' के इस दोहे को चरितार्थ करती हैं ,जिसमें वे कहते हैं- सतसइया के दोहरे ,ज्यों नावक के तीर देखन में छोटे लगें ,घाव करें गंभीर । आजकल के छल-प्रपंच की सियासी तिजारत को देखकर शिवानंद महान्ती के भीतर का कवि आहत भी है और आक्रोशित भी । वह उस समाज की बात कहता है ,जिसका मन इन विसंगतियों को देखकर खौल रहा है और निराशा के अंधेरे में सुख की संभावनाओं को टटोल रहा है । इसकी बानगी 'निराशा के अंधेरे में शीर्षक उनकी इस क्षणिका में देखिए - कदम जो कभी टिकते नहीं थे , अब जम गए हैं अंगद के पैरों की तरह ! दिन जो गुज़र जाते थे देखते ही देखते , बमुश्किल गुज़र रहे है वक़्त को देखते -देखते! उम्मीद की किरणों का विशाल बरगद के पीछे लुकाछिपी का खेल चल रहा है! छल -प्रपंच की सियासी तिज़ारत को देखकर हम मन ही मन खौल रहे हैं , निराशा के अंधेरे में सुख की संभावनाओं को टटोल रहे हैं। महँगाई से परेशान जनता की ओर से अपनी एक बहुत छोटी क्षणिका में कवि की गुजारिश है कि बारिश तमाम मुसीबतों का साथ इस महँगाई को भी बहा कर ले जाए -- मुसीबतें सारे जहाँ की ले जाओ , ऐ बारिश ,महँगाई को बहा कर ले जाओ! कवि छत्तीसगढ़ शासन द्वारा महासमुंद जिला जेल के लिए मनोनीत अशासकीय संदर्शक भी रहे हैं।उस दौरान समय -समय पर जेल विजिट करते समय उन्होंने जेल के बाहर बाहर अपने बन्दी परिजनों से मिलने आए लोगों के चेहरों के भावों को ध्यान से पढ़ा और उनकी मनोदशा को दिल की गहराइयों से महसूस भी किया । यह सब 'जेल के बाहर' शीर्षक उनकी इस क्षणिका में प्रकट हुआ है - याचना ,उद्विग्नता, उत्सुकता, कुंठा , कुछ समय का ही है हालाँकि ठहराव, अलग -अलग चेहरों के अलग-अलग भाव ! संभावनाओं और आशंकाओं के वातायन में चकरघिन्नी-सा उलझा हुआ अशांत मन ! मैंने देखे जेल के बाहर प्रतीक्षा रत बंदियों के अनेक परिजन ! कवि आर्थिक विषमता के इस युग मे पैसों के अभाव में अस्पतालों में दम तोड़ते मरीजों और बारिश के अभाव में सूखती फसलों के बीच किसानों की वेदना से भी व्यथित है । उसकी यह पीड़ा इस क्षणिका में प्रकट होती है -- दवाइयों के अभाव में अस्पतालों में दम तोड़ते मरीजों के परिजनों की वेदना जैसी ही होती है बारिश के अभाव में सूखते खेतों में दम तोड़ती फसलों के साथ किसानों की वेदना ! वह कवि ही क्या ,जो आम जनता की तरह आज के निराशाजनक माहौल से व्यथित न हो ? शिवानंद की क्षणिकाओं में जनता की यह व्यथा उभर कर आती है। अपनी बहुत छोटी -सी इस क्षणिका में उन्होंने लिखा है -- इधर हमारी राष्ट्रभक्ति ख़तरे में पड़ जाती है, उधर पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ जाती हैं ! कवि शिवानंद आज की सियासत में बेशर्मी की हद तक व्याप्त फूहड़ता से भी बेहद विचलित है वह 'बेशर्म सियासत की नग्नता ' शीर्षक अपनी क्षणिका में कहते हैं - शर्मसार कर रही है बयानों की अशोभनीयता, सवालों के तिलस्म में उलझ गयी है सच्चाई की विश्वसनीयता ! पक्ष और विपक्ष के पुतलों में लग रही है रोज -रोज आग , दिखने लगी हम्माम के बाहर भी बेशर्म सियासत की नग्नता ! कवि शिवानंद ने स्वयं कोरोना की महामारी को झेला था। संग्रह में शामिल उनकी 40 क्षणिकाओं में से 13 क्षणिकाएँ वर्ष 2020-21 के कोरोना काल की त्रासदी से जूझती दुनिया पर केन्द्रित हैं ,जिनमें से कुछ में कवि का अपना दर्द भी छलक उठता है ,जबकि 10 क्षणिकाओं का संकलन उनके प्रथम कविता संग्रह'संशय के बादल' से भी किया गया है । शिवानंद महान्ती अब हमारे बीच नहीं हैं। उन्हें इस भौतिक संसार से गए एक साल देखते ही देखते 'कुछ ही क्षणों में' बीत गया । लेकिन हम जैसे उनके चाहने वालों को लगता ही नहीं कि वे अब दुनिया में नहीं हैं ।फिर भी हक़ीक़त तो हक़ीक़त है। उनका जाना कुछ ही क्षणों में हुआ जो सबको व्यथित कर गया। उनकी पहली पुण्यतिथि (14 अगस्त 2023 ) को ध्यान में रखकर श्रृंखला साहित्य मंच ने महान्ती परिवार के सहयोग से इस क्षणिका संग्रह का प्रकाशन किया था ,लेकिन कुछ धार्मिक मान्यताओं और रीति रिवाजों के अनुसार परिजनों ने उनकी पहली बरसी का कार्यक्रम उनके गृहनगर पिथौरा में 2 सितम्बर 2023 को रखा और इसी अवसर पर उनके क्षणिका -संग्रह का विमोचन भी हुआ। वरिष्ठ साहित्यकार जी. आर. राना विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। अध्यक्षता छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ भाषा विज्ञानी डॉ. चित्तरंजन कर ने की ।विशेष अतिथि के रूप में साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष ईश्वर सिंह दोस्त और रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार पूर्णचन्द्र रथ उपस्थित थे। विमोचन समारोह पिथौरा स्थित गुरु तेगबहादुर सभा-भवन में हुआ ,जहाँ पिथौरा क्षेत्र सहित सम्पूर्ण महासमुंद जिले के अनेक साहित्यकारो और साहित्य प्रेमी प्रबुद्धजन बड़ी संख्या में शामिल हुए। -स्वराज्य करुण सम्पादक -'कुछ ही क्षणों में' श्रृंखला साहित्य मंच ,पिथौरा ********

Monday, July 24, 2023

(आलेख)क्या नदियों को आपस में नहीं जोड़ा जा सकता ?

(आलेख -स्वराज करुण) नदियाँ अगर धीरे बहें तो सुहावनी और उफनती हुई बहें तो डरावनी लगती हैं। लेकिन प्रकृति की व्यवस्था ही ऐसी है कि बारिश के मौसम में बादलों को बरसने से और नदियों को उफनने से नहीं रोका जा सकता। बरसात में जल से लबालब नदियाँ किसानों और उनके खेतों के लिए वरदान साबित होती हैं ,लेकिन अगर छलकते हुए वह सैलाब में तब्दील हो जाऍं तो ? इस वर्ष भी देश के कई राज्यों के कुछ इलाकों में इन दिनों भारी वर्षा से नदियों में आया सैलाब कहर बनकर जन जीवन को अस्त-व्यस्त कर रहा है।
अगर देश की नदियों को एक -दूसरे से जोड़ दिया जाए तो किसी नदी में बाढ़ की स्थिति बनने पर उसका अतिरिक्त पानी दूसरी नदी में भेजकर खतरे को कम किया जा सकता है। कुछ दशक पहले इसकी संभावनाओं पर विशेषज्ञों के बीच विचार -विमर्श भी हुआ करता था।नदी जोड़ो अभियान की भी चर्चा होती थी। लेकिन अब खामोशी है। क्या नहरों का जाल बिछाकर नदियों को आपस में नहीं जोड़ा जा सकता ? इसकी संभावनाओं पर सबको मिलकर विचार करना और रास्ता निकालना चाहिए। छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती ओंग सेतु पर मोबाइल कैमरे से मेरी आँखन देखी ये तीन तस्वीरें पिछले साल के आज ही के दिन की हैं । यह पश्चिम ओड़िशा में इठलाती,बलखाती ओंग नदी और उस पर बने पुल का नज़ारा है। ओंग सेतु छत्तीसगढ़ के तहसील मुख्यालय बसना से बलांगीर मार्ग पर लगभग 22 वें किलोमीटर पर है। ओंग नदी गर्मियों में एकदम सूख जाती है।यह छत्तीसगढ़ और ओड़िशा की जीवन -रेखा महानदी की सहायक है। - स्वराज करुण

Monday, July 3, 2023

(पुस्तक- चर्चा ) क्रांतिवीर नारायण सिंह की शहादत पर पहला उपन्यास ; 1857 सोनाखान

(आलेख ; स्वराज करुण ) स्वतंत्रता हर देश का मौलिक और मानवीय अधिकार है। विशेष रूप से विगत दो शताब्दियों में दुनिया के विभिन्न देशों में स्वतंत्रता के लिए जनता के अनेक संग्राम हुए हैं। भारत भी इन संग्रामों से अछूता नहीं रहा है। इनमें से कई संग्राम ज्ञात और कई अल्पज्ञात रहे और कुछ संघर्ष गुमनामी के अंधेरे में दबकर रह गए। इन संग्रामों में अनेक वीर योद्धाओं और क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। उनमें छत्तीसगढ़ की सोनाखान जमींदारी के वीर नारायण सिंह का नाम भी अमिट अक्षरों में दर्ज है ,जो वर्ष 1857 में अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कम्पनी की हुकूमत के ख़िलाफ़ सशस्त्र संघर्ष के नायक बनकर उभरे थे। ऐसे नायकों की गौरव गाथा पर आधारित उपन्यास लेखन साहित्यकारों के लिए वाकई बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। आज़ादी के आंदोलन में छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद क्रांतिवीर नारायण सिंह के संघर्षों पर आधारित '1857 ;सोनाखान' शीर्षक 144 पृष्ठों की यह पुस्तक उनके समय के छत्तीसगढ़ की सामाजिक -आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का भी सजीव वर्णन करती है। प्रजा हितैषी नारायण सिंह को अपनी अकाल पीड़ित जनता के लिए एक जमाखोर व्यापारी के गोदाम से अनाज निकलवाने और पीड़ितों में वितरित करने के आरोप में कम्पनी सरकार की ओर से राजद्रोह के मुकदमे का नाटक रचकर 10 दिसम्बर 1857 को रायपुर स्थित सैन्य छावनी में फाँसी पर लटका दिया गया था।
भीषण अकाल के दौर में उपजा विद्रोह ******* दरअसल अंग्रेजों के खिलाफ सोनाखान के नारायण सिंह का विद्रोह वर्ष 1856 में छत्तीसगढ़ में पड़े भीषण अकाल के दौर में उस वक्त हुआ ,जब प्रजा -वत्सल नारायण सिंह ने मदद के लिए रायपुर स्थित डिप्टी कमिश्नर इलियट को ख़बर भेजी ,लेकिन वहाँ से उन्हें कोई मदद नहीं मिली। तब नारायण सिंह ने खरौद के एक जमाखोर व्यापारी माखन को उसके गोदामों में भरे अनाज को सोनाखान जमींदारी की अकाल पीड़ित जनता के लिए बाँटने को कहा। नारायण सिंह यह अनाज मुफ़्त में नहीं बल्कि बाढ़ी में यानी मूल धन से डेढ़ गुना ज्यादा कीमत पर उधार में लेने को तैयार थे । वे चाहते थे कि नई फसल के आने पर सोनाखान जमींदारी की ओर से उन्हें उधार लिया गया अनाज बाढ़ी के रूप में लौटा दिया जाएगा।इसके लिए उन्होंने कुछ अन्य व्यापारियों को भी चिट्ठी भिजवाई थी।उनमें से कुछ ने उन्हें मदद का आश्वासन दिया लेकिन खरौद का जमाखोर व्यापारी माखन इनकार करता रहा। तब नारायण सिंह ने अपने सैनिकों के साथ उसके गोदामों से अनाज निकलवाकर भूख से बेहाल जनता में वितरित करवा दिया । उन्होंने उसे भरोसा भी दिया कि और बाकायदा इसकी लिखित सूचना सम्पूर्ण हिसाब के साथ रायपुर स्थित कम्पनी सरकार के डिप्टी कमिश्नर को भी भेजी। इस बीच माखन ने रोते -कलपते रायपुर पहुँचकर इलियट से नारायण सिंह की शिकायत कर दी। इलियट ने इसे डकैती मान लिया और नारायण सिंह के विरुद्ध कार्रवाई की योजना बनाने लगा। अतंतःएक सैन्य संघर्ष के बाद नारायण सिंह ने अंग्रेज अधिकारियों के सामने स्वयं को प्रस्तुत कर दिया था। इस पर तो फ़िल्म भी बन सकती है ************** पुस्तक की विषय -वस्तु ,पृष्ठभूमि , पात्रों के परस्पर संवाद और घटनाओं की वर्णन शैली को देखते हुए इसे उपन्यास कहना मेरे विचार से उचित होगा। इस पर तो हिन्दी और छत्तीसगढ़ी मिश्रित भाषा में एक अच्छी देशभक्तिपूर्ण फ़िल्म बन सकती है । इसका नाट्य रूपान्तर करके मंचन भी हो सकता है। इस पुस्तक के लेखक हैं राजधानी रायपुर निवासी वरिष्ठ पत्रकार आशीष सिंह। मेरी जानकारी के अनुसार पत्रकार होने के नाते आशीष के लेखन में घटनाओं का धाराप्रवाह वर्णन मिलता है। विश्लेषण और वर्णन की उनकी क्षमता गज़ब की होती है। उन्होंने अब तक न तो कहानियाँ लिखीं और न ही कविताएँ और उपन्यास तो कभी नहीं लिखा । इसके बावज़ूद उनके भीतर दबा -छिपा एक देशभक्त और भावुक उपन्यासकार इस कृति के माध्यम से हमारे सामने आया है। शहादत पर पहला उपन्यास ***** जहाँ तक मुझे जानकारी है ,वीर नारायण सिंह के संघर्ष और उनकी शहादत पर ऐसा कोई उपन्यास अब तक नहीं लिखा गया था। मेरा मानना है कि इस लिहाज से यह उनकी जीवन-गाथा पर आधारित पहला उपन्यास है। यह आशीष सिंह की एक बड़ी उपलब्धि है। आशीष को साहित्यिक प्रतिभा आशीष के रूप में विरासत में मिली है। उनके पिता हरि ठाकुर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी , गोवा मुक्ति आंदोलन के कर्मठ सिपाही , छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के लिए गठित सर्वदलीय मंच के संयोजक तथा हिन्दी और छत्तीसगढ़ी के सुप्रसिद्ध कवि थे। उन्होंने 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' शीर्षक से एक विशाल ग्रंथ भी लिखा , जिसमें छत्तीसगढ़ के इतिहास और यहाँ की महान विभूतियों के जीवन पर आधारित उनके कई आलेख शामिल हैं। हरि ठाकुर के पिता जी यानी आशीष सिंह के दादा जी ठाकुर प्यारेलाल सिंह अपने समय के एक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ,श्रमिक नेता और सहकारिता आंदोलन के प्रमुख स्तंभ थे। उन्होंने वर्ष 1950 के दशक में रायपुर से अर्ध साप्ताहिक 'राष्ट्र-बन्धु' का सम्पादन और प्रकाशन प्रारंभ किया था। ठाकुर प्यारेलाल सिंह 'त्यागमूर्ति' के नाम से भी लोकप्रिय हुए। वे तत्कालीन मध्यप्रान्त की नागपुर विधान सभा में विधायक और नेता प्रतिपक्ष भी रह चुके थे। उन्हें तीन बार रायपुर नगरपालिका अध्यक्ष भी निर्वाचित किया गया था। आशीष सिंह का लेखकीय परिचय ******* इस प्रकार आशीष सिंह विरासत में मिली लेखकीय परम्परा को अपनी सृजनात्मक प्रतिभा के जरिए लगातार आगे बढ़ा रहे हैं।उनकी अनेक पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। चौबीस जनवरी 1963 को जन्में आशीष सिंह लगभग तीन दशकों से राजधानी रायपुर में पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनका लेखन मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ की उन महान विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित रहा है ,जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपना भरपूर योगदान दिया था। आशीष ने उन पर आधारित कई बड़े-बड़े ग्रंथों का सम्पादन भी किया है ,जिनमें स्वर्गीय हरि ठाकुर के शोधपरक आलेखों और निबंधों का संकलन 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' और स्वर्गीय पण्डित रामदयाल तिवारी का विशाल ग्रंथ 'गांधी-मीमांसा' भी शामिल है। इसके अलावा तीन खंडों में प्रकाशित ठाकुर प्यारेलाल सिंह समग्र 'भी शामिल है। आशीष सिंह ने सम्पादन के अलावा कुछ पुस्तकें अलग से भी लिखी हैं । उनकी प्रकाशित पुस्तकों में महात्मा गांधी की छत्तीसगढ़ यात्रा पर आधारित ' बापू और छत्तीसगढ़' , वरिष्ठ पत्रकार सनत चतुर्वेदी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित 'अर्ध विराम ', छत्तीसगढ़ में वर्ष 1952 से 2014 तक हुए विधान सभा चुनावों का का लेखा-जोखा 'जनादेश' और छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानियों का हिन्दी, छत्तीसगढ़ी और अंग्रेजी में प्रकाशित जीवन-परिचय और उनका छत्तीसगढ़ी नाट्य रूपांतर 'हमर सुराजी ' आदि भी उल्लेखनीय है। हिन्दी -छत्तीसगढ़ी मिश्रित प्रवाह पूर्ण भाषा ****** अंग्रेजों के ख़िलाफ़ सोनाखान के अमर शहीद वीर नारायण सिंह के संघर्षों को ऐतिहासिक तथ्यों और तारीखों का साथ औपन्यासिक कथा वस्तु की शक्ल देकर आशीष सिंह ने सचमुच एक बड़ा महत्वपूर्ण कार्य किया है। इस पुस्तक में हिन्दी और छत्तीसगढ़ी मिश्रित उनकी भाषा -शैली वाकई बहुत प्रवाहपूर्ण है । भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम और आज़ादी के योद्धाओं के बलिदानों की कहानियों में जिन्हें सचमुच दिलचस्पी है ,ऐसे देशभक्त पाठकों को इस पुस्तक में वर्णित घटनाएँ अंत तक सम्मोहित करके रखती हैं। हर घटना उत्सुकता जगाती है कि आगे क्या हुआ होगा ? किसी भी ऐतिहासिक उपन्यास में घटनाएँ भले ही वास्तविक हों ,लेकिन उन्हें सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने के लिए काल्पनिकता का भी सहारा लेना पड़ता है। इसे देखते हुए कई प्रसंगों में आशीष सिंह ने कल्पनाओं के कैनवास पर शब्दों के रंगों से इस उपन्यास को सुसज्जित किया है। उन्होंने अपनी यह पुस्तक भारत की आज़ादी के अमृत महोत्सव को और अपने पिता स्वर्गीय हरि ठाकुर को समर्पित की है। यह पुस्तक हरि ठाकुर स्मारक संस्थान ,रायपुर द्वारा प्रकाशित की गयी है। लेखक ने अपनी इस औपन्यासिक पुस्तक में वीर नारायण सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व में व्याप्त मानवीय संवेदनशीलता को बख़ूबी उभारा है। वे न सिर्फ़ अपनी प्रजा के हर सुख -दुःख का ख़्याल रखते हैं ,बल्कि अपने पशुओं को भी भरपूर स्नेह देते हुए अपने कर्मचारियों के साथ स्वयं उनकी देखभाल भी करते हैं। अक्ति यानी अक्षय तृतीया के दिन किसानों के साथ खेतों में बीज बोने के अनुष्ठान में भी शामिल होते हैं। उस दिन वे ग्रामीण परिवारों में होने वाले वैवाहिक समारोहों में भी हिस्सा लेते हैं।वीर नारायण सिंह के परिवार के सोनाखान की जनता के साथ आत्मीय जुड़ाव को इस औपन्यासिक कृति में बड़ी रोचकता से उभारा गया है। लोक कल्याणकारी ज़मींदार का रहन -सहन आम किसानों जैसा है। उनकी मिट्टी की हवेली का वर्णन भी प्रभावित करता है। औपन्यासिक कृति में नाटक के तत्वों का प्रयोग ******** पुस्तक की भूमिका छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार और सेवानिवृत्त आई.ए. एस. अधिकारी डॉ. सुशील त्रिवेदी ने लिखी है। उनका कहना है -"आशीष सिंह ने अपनी इस औपन्यासिक कृति में नाटक के तत्वों का प्रयोग कर राष्ट्रीय चेतना को उत्प्रेरित किया है। उन्होंने अपनी कथा -वस्तु में 1856 और 1857 में सोनाखान और रायपुर से लेकर सम्बलपुर तक चल रही विद्रोह की घटनाओं को एक श्रृंखला में पिरोया है।अलग -अलग घटनाओं के बीच के सम्पर्क शून्य को उन्होंने अपनी साहित्यिक कल्पनाशीलता से भरा है।इस शून्य को भरते हुए आशीष सिंह छत्तीसगढ़ी जीवनशैली को पूरी यथार्थता में उभारते हैं।" पुस्तक में नवीन रचनाधर्मिता ******** वहीं पुस्तक के आमुख में राज्य के जाने-माने इतिहासकार और श्री शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी भिलाई के कुलपति प्रोफेसर लक्ष्मीशंकर निगम लिखते हैं --" आशीष की इस पुस्तक में एक नवीन रचनाधर्मिता देखने को मिलती है।यह रचना मूलतः नाटक शैली में , छत्तीसगढ़ी में है ,तथापि बीच -बीच में अन्य भाषा-भाषी पात्रों के उपस्थित होने पर हिन्दी का भी प्रयोग आवश्यकता अनुसार किया गया है।इस रचना के माध्यम से लेखक ने छत्तीसगढ़ के इतिहास ,संस्कृति और लोक व्यवहार का एक विहंगम दृश्य प्रस्तुत किया है और ऐसा करने के लिए ऐतिहासिक पात्रों का समावेश करने के साथ ही अन्य काल्पनिक पात्रों को भी गढ़ा है ,लेकिन ये काल्पनिक पात्र इतिहास से प्रतिद्वंद्विता नहीं करते , बल्कि उसके पूरक रूप में हैं।" पुस्तक में वीर नारायण सिंह की धर्मपत्नी ,उनके सुपुत्र गोविन्द सिंह और कई देशभक्त ग्रामीणों की बातचीत को भी बड़ी भावुकता से प्रस्तुत किया गया है। नारायण सिंह के आत्मीय सहयोगी के रूप में सम्बलपुर रियासत के वीर सुरेंद्र साय और उनके कुछ साथियों के कठिन संघर्षों का भी इसमें उल्लेख है। नारायण सिंह में देशभक्ति और मानवीय संवेदनशीलता ******* नारायण सिंह को रायपुर में डिप्टी कमिश्नर इलियट के सामने मुकदमे के लिए पेश करने पर उसके सवालों का जवाब देते हुए वे कहते हैं - मैंने आग्रहपूर्वक माखन से अनाज की मांग की थी।अन्य व्यापारियों ने तो मुझे यथा शक्ति मदद की ,मगर माखन ने अनाज न होने का बहाना बनाया।मैंने जाँच की तो ज्ञात हुआ कि उसके गोदामों में अनाज भरा है।अकाल की इस विपत्ति में वह जमाखोरी कर ऊँचे भाव में अनाज बेच रहा है।भूख से बिलबिला रहे लोगों के बर्तन ,आभूषण ,पशु और खेत गिरवी रख रहा है।क्या यह अन्याय नहीं है?क्या यह अपराध नहीं है ? मुकदमा तो उस पर चलना चाहिए।सारी स्थिति का ब्यौरा हमने तुम्हें भेजा था , पर तुमने अकाल की विभीषिका से जनता को बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया।यह तो कम्पनी का दायित्व था ।दोषी तो तुम भी हो।" नारायण सिंह इलियट के एक प्रश्न के उत्तर में माखन के गोदाम से अनाज लूटने के आरोप को ख़ारिज करते हुए कहते हैं -"माखन के गोदाम से ज़रूरत के मुताबिक ही अनाज लिया गया है।वह भी बाढ़ी में। मैंने उससे करारनामा में हस्ताक्षर करवाया है।कि अगली फसल आने के बाद लिए गए अनाज का डेढ़ गुना लौटा दिया जाएगा। करारनामा की नकल तुम्हें भी भेजी गई है।" इलियट पूछता है -क्या किसी की मर्जी के बिना ऐसा किया जा सकता है? इस पर नारायण सिंह कहते हैं -- जब हजारों जन भूख से तड़प रहे हों ,तो किसी जमाखोर व्यापारी की मर्जी का कोई मतलब नहीं । मैंने अपनी प्रजा की प्राण -रक्षा के लिए अनाज लिया है।न्याय तो तब होगा ,जब तुम माखन के गोदाम का सारा अनाज जब्त करो और भूखों मर रही जनता में बाँट दो। " लेकिन मुकदमे और न्याय का नाटक कर रहे कम्पनी सरकार के अंग्रेज अफ़सर पर वीर नारायण सिंह की इन दलीलों का कोई असर नहीं हुआ ।उन्हें जेल में बंद रखा गया । इसके बावजूद अपने देशभक्त जेल कर्मचारियों की मदद से नारायण सिंह 28 अगस्त 1857 को वार्ड की दीवार पर बनाए गए एक बड़े छेद से निकलकर सोनाखान पहुँच गए। लेकिन दो दिसम्बर 1857 को अंग्रेज कैप्टन स्मिथ और नेपियर की फौज के साथ हुए युद्ध में नारायण सिंह ने विवश होकर स्वयं को अंग्रेजों के सामने प्रस्तुत कर दिया। कैप्टन स्मिथ की फौज ने सोनाखान को राख में तब्दील कर दिया था *************** इस बीच एक दिसम्बर की रात कैप्टन स्मिथ ने अपनी फौज से सोनाखान की निर्जन बस्ती में आग लगवा दी और गाँव को राख में तब्दील कर दिया।उसने देवरी के जमींदार महाराज साय से कहा -लो ,महाराज साय अपना इनाम। ये रहा सोनाखान।अब तुम हो सोनाखान के जमींदार। " गिरफ़्तार हुए नारायण सिंह पर अंग्रेज हुकूमत की ओर से रायपुर में डिप्टी कमिश्नर इलियट की अदालत में फिर एक बार मुकदमे का नाटक हुआ।स्मिथ उनसे कहता है -" व्यापारी के गोदाम से अनाज लूटने के आरोप में तुम्हे गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया जा रहा था।ट्रायल के दौरान तुम जेल से फरार हो गए और 500 लोगों की सेना तैयार कर ली।जब तुम्हें गिरफ्तार करने पलटन पहुँची ,तो तुमने उस पर आक्रमण कर दिया।कम्पनी सरकार ने तुम्हारी इन हरकतों को राजद्रोह करार दिया है। "इलियट उनसे पूछता है -तुम्हें अपनी सफाई में कुछ कहना है? विदेशियों की इस अदालत को मैं मान्य नहीं करता ******* इस पर वीर नारायण सिंह का जवाब था - "पहली बात तो यह कि तुम विदेशियों की इस अदालत को मैं मान्य नहीं करता।"स्मिथ फिर बोला-यह कोर्ट की तौहीन है।तुम्हें अदालत का सम्मान करना होगा।" नारायण सिंह ने उसे जवाब दिया -"तुम फिरंगी हमारे देश में व्यापार करने आए थे न?लूट-खसोट और फूट डालकर राज्यों और जमींदारियों पर अवैध कब्जा जमा रहे हो ।तुम किस आधार पर मुझे देशद्रोही करार देते हो? क्या यह देश तुम्हारा है ? रहा सवाल सम्मान का ,तो वह हम तुम्हें अवश्य देते ,यदि तुम्हारा आचरण अतिथि जैसा होता। ये देश तुम्हारा नहीं ,हमारा है।हम तुम्हें राजा नहीं मानते तो राजद्रोह का प्रश्न ही उपस्थित नह होता।" अंततः उनकी देशभक्तिपूर्ण सभी दलीलों को अमान्य करते हुए इलियट की अदालत ने नारायण सिंह को फाँसी की सजा सुना दी। अंतिम इच्छा ;फिरंगी मेरा देश छोड़कर चले जाएँ ********* इलियट ने 10 दिसम्बर 1857 को सुबह फाँसी देने के पहले वीर नारायण सिंह से पूछा -माफी के अलावा तुम्हारी कोई इच्छा है,तो कह सकते हो।इस पर नारायण सिंह बोले -मेरे सिर पर पड़ा यह चोंगा उतार दिया जाए,ताकि मैं अपनी धरती और अपनी मातृभूमि के अंतिम दर्शन कर सकूं।इलियट ने फिर पूछा -और कोई इच्छा ? नारायण सिंह ने कहा -मेरी अंतिम इच्छा है कि फिरंगी मेरा देश छोड़कर चले जाएँ । आखिर अंग्रेजों ने नारायण सिंह को फाँसी पर लटका दिया।वीर नारायण सिंह अपनी प्रजा और अपने देश के लिए शहीद हो गए। छिपा हुआ साम्राज्यवादी एजेंडा लेकर आयी थी ईस्ट इंडिया कम्पनी ******** हमारे देश को गुलाम बनाना भले ही अंग्रेजों का दूरगामी और छिपा हुआ साम्राज्यवादी एजेंडा रहा होगा , लेकिन इसमें दो राय नहीं कि वे सबसे पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी बनाकर इस महादेश में व्यापार करने आए थे। उन्होंने अपनी कपट नीति और कूटनीति से भारत में कारोबार का ऐसा मायाजाल फैलाया कि उस ज़माने की छोटी -बड़ी अधिकांश रियासतों के राजे -महाराजे उसमें उलझ कर अंग्रेजों की इस 'कम्पनी सरकार' के सामने नतमस्तक होते चले गए। तत्कालीन युग का विशाल अखण्ड भारत अंग्रेजों का गुलाम बन गया। भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए देश के विभिन्न इलाकों में वर्षों तक रह-रहकर कई स्थानीय और व्यापक विद्रोह भी हुए ।झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के वर्ष 1857 की महान संघर्ष गाथा इतिहास में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के रूप में दर्ज है। इस विद्रोह के बाद इंग्लैंड की हुकूमत ने भारत का शासन और प्रशासन ईस्ट इंडिया कम्पनी से अपने हाथों में ले लिया। परलकोट के गैंद सिंह की शहादत ******* वैसे नारायण सिंह की शहादत के 32 साल पहले छत्तीसगढ़ अंचल में भी अंग्रेजों की 'कम्पनी सरकार 'के ख़िलाफ़ संघर्ष का वीरतापूर्ण इतिहास मिलता है ,जिसमें परलकोट यानी वर्तमान बस्तर राजस्व संभाग के कांकेर जिले में पखांजूर का इलाका भी इसका साक्षी रहा है ,जहाँ वर्ष 1825 में परलकोट के जमींदार गैंद सिंह को अंग्रेजों ने उनके महल के सामने 20 जनवरी को फाँसी पर लटका दिया था। सोनाखान के नारायण सिंह की शहादत 10 दिसम्बर 1857 को हुई। आज़ादी मिलने के दस साल बाद शहीद घोषित हुए वीर नारायण सिंह ************ असंख्य वीरों के महान संघर्षों से देश को 15 अगस्त 1947 को आज़ादी मिली और उसके लगभग 10 साल बाद 1957 में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शताब्दी वर्ष के दौरान तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने सोनाखान के नारायण सिंह को छत्तीसगढ़ का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और पहला शहीद घोषित किया । यानी पूरे सौ साल बाद उन्हें यह सम्मान मिला वरिष्ठ साहित्यकार और इतिहासकार हरि ठाकुर ने नारायण सिंह के बलिदान पर एक आलेख भी लिखा था ,जिसके छपने के बाद तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने इसका संज्ञान लिया और बलौदाबाजार के तत्कालीन तहसीलदार से जाँच प्रतिवेदन मंगवाया । नारायण सिंह को शहीद और स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा हरि ठाकुर के इसी आलेख के आधार पर दिया गया। हरि ठाकुर ने दिया 'वीर 'विशेषण ****** हरि ठाकुर के सुपुत्र और उपन्यास के लेखक आशीष सिंह ने पुस्तक की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए प्रारंभिक पन्नों में इस प्रसंग का उल्लेख किया है। उन्होंने यह भी लिखा है कि नारायण सिंह को 'वीर' विशेषण मेरे पिता (हरि ठाकुर) के द्वारा दिया गया था ,जो अब नारायण सिंह के साथ अटूट रूप से जुड़ गया है। रायपुर की सैन्य छावनी में हुए 17 शहीद *********** दिसम्बर 1857 में वीर नारायण सिंह की शहादत के बाद जनवरी 1858 में रायपुर की सैन्य छावनी में अंग्रेज अफसरों के ख़िलाफ़ मैग्जीन लश्कर हनुमान सिंह के नेतृत्व में एक सैन्य विद्रोह भड़क उठा था,जिसमें हनुमान सिंह ने तीसरे नियमित रेजिमेंट के सार्जेंट मेजर सिंडवेल की उसके बंगले में घुसकर तलवार से हत्या कर दी थी। हनुमान सिंह अंग्रेजो के शस्त्रागार को कब्जे में लेना चाहते थे ,लेकिन उनका और उनके साथियों का यह विद्रोह विफल हो गया। इस घटना के बाद हनुमान सिंह अज्ञातवास में चले गए और उनका कोई पता नहीं चला ।लेकिन उनके 17 साथियों को पकड़ लिया गया ,जिन्हें 22 जनवरी 1858 को फाँसी पर लटका दिया गया। यह उपन्यास वर्ष 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौर में छत्तीसगढ़ में घटित ऐसी कई भूली -बिसरी घटनाओं की याद दिलाता है । -स्वराज्य करुण

Monday, June 19, 2023

(आलेख) साहित्य और पत्रकारिता के इतिहास पुरुष पण्डित माधवराव सप्रे ; लेखक स्वराज्य करुण

आज 19 जून को उनकी जयंती छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के युग प्रवर्तक साहित्यकार पण्डित माधवराव सप्रे को आज उनकी जयंती पर शत -शत नमन। उनका जन्म 19 जून 1871 -ग्राम पथरिया (जिला -दमोह)मध्यप्रदेश में और निधन23 अप्रैल 1926 को रायपुर (छत्तीसगढ़)में हुआ था। उन्होंने आज से 123 साल पहले 1900 में छत्तीसगढ़ के पेण्ड्रा (जिला -बिलासपुर) से अपने साथी रामराव चिंचोलकर के साथ मासिक पत्रिका 'छत्तीसगढ़ मित्र' का सम्पादन प्ररंभ करके , तत्कालीन समय के इस बेहद पिछड़े इलाके में पत्रकारिता की बुनियाद रखी। इस पत्रिका के प्रकाशक (प्रोपराइटर)थे छत्तीसगढ़ में सहकारिता आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रायपुर के वामन बलिराम लाखे । पत्रिका का मुद्रण रायपुर और नागपुर में हुआ।आर्थिक कठिनाइयों के कारण मात्र तीन साल में इसे बंद करना पड़ा । लेकिन यह पत्रिका छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की ऐतिहासिक बुनियाद बन गयी। सप्रेजी की ज़िंदगी का सफ़र महज़ 55 साल का रहा ,लेकिन अपनी कर्मठता और संघर्षशीलता के कारण इस अल्प अवधि में वह अपनी लेखनी से जनता के दिलों में छा गए। उनकी रचनाएँ हिन्दी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं।
साहित्य और पत्रकारिता के इतिहास पुरुष सप्रेजी की लिखी ,'एक टोकरी भर मिट्टी ' को हिन्दी की पहली कहानी होने का गौरव प्राप्त है। सप्रे जी ने महान स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य पण्डित बालगंगाधर तिलक के प्रखर विचारों को हिन्दी भाषी लोगों में प्रचारित करने के लिए वर्ष 1907 में नागपुर से 'हिन्दी केसरी ' साप्ताहिक का सम्पादन और प्रकाशन प्रारंभ किया था। तिलकजी मराठी में साप्ताहिक अख़बार 'केसरी' निकालते थे। सप्रेजी को वर्ष 1908 में 'हिन्दी केसरी' में अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ़ क्रांतिकारी लेखों के कारण राजद्रोह के आरोप में भारतीय दंड विधान की धारा 124(ए)तहत गिरफ़्तार किया गया था। उनके साथ 'देशसेवक' समाचार पत्र के सम्पादक कोल्हटकर जी भी गिरफ़्तार हुए थे। सप्रेजी ने कई मराठी ग्रंथों का हिन्दी अनुवाद भी किया। इनमें लोकमान्य बालगंगाधर तिलक द्वारा मंडल(म्यांमार)की जेल में कारावास के दौरान रचित900 पृष्ठों का 'श्रीमद्भगवद्गीता रहस्य' भी शामिल है ,जो 1915 में छपा था। सप्रे जी ने 'गीता रहस्य' के नाम से इसका हिन्दी में अनुवाद किया ,जो 1916 में प्रकाशित हुआ। उन्होंने चिंतामणि विनायक वैद्य के मराठी ग्रंथ महाभारत के उपसंहार' का भी हिन्दी अनुवाद किया,जो 'महाभारत मीमांसा' शीर्षक से 1920 में छपा। सप्रे जी द्वारा अनुवादित मराठी कृतियों में समर्थ श्री रामदास रचित 'दासबोध' भी उल्लेखनीय है।नागपुर में सप्रेजी ने हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाने के लिए 'हिन्दी ग्रंथमाला' का भी प्रकाशन प्रारंभ किया था।। सप्रेजी को पुनः विनम्र नमन।- स्वराज करुण

Tuesday, June 13, 2023

जानलेवा साबित हो रहे हैं रेलिंग विहीन रोड डिवाइडर

इसमें दो राय नहीं कि सड़कें बहुत अच्छी बन रही हैं ,लेकिन कई इलाकों में फोर लेन और सिक्स लेन सड़कों पर डिवाइडरों में रेलिंग नहीं होने के कारण हर पल दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है। दरअसल इन डिवाइडरों में हरियाली के लिए झाड़ीनुमा पौधे लगाए जाते हैं , जिन्हें खाने के लिए आस- पास के गाँवों के मवेशी वहाँ आते -जाते रहते हैं। ये रेलिंग विहीन रोड डिवाइडर प्राणघातक साबित हो रहे हैं। कई सड़कों पर ये डिवाइडर ज़रूरत से ज़्यादा चौड़े बनवाए गए हैं। कई बार ये मासूम मवेशी थकान मिटाने के लिए उन रेलिंग विहीन डिवाइडरों की झाड़ियों की छाँव में बैठ जाते हैं। चाहे जो भी कारण हो , कई बार ये बेचारे मासूम जानवर सड़क पार करने के चक्कर में वाहनों से टकराकर घायल हो जाते हैं और उनमें से कइयों की मौत भी हो जाती है। इन मवेशियों से टकराकर कई वाहन भी गंभीर रूप से दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं।फलस्वरूप उनके चालक और साथ बैठे यात्री भी गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। ऐसी दुर्घटनाएं विशेष रूप से रात के समय ज़्यादा होती हैं। कई बार कुछ लापरवाह किस्म के राहगीर भी शार्टकट के चक्कर में पैदल अथवा अपनी दोपहिया गाड़िया सहित इन डिवाइडरों को पार करते समय अचानक सामने आए वाहनों से टकरा कर घायल हो जाते हैं । इन हादसों से बचाव के लिए फोर लेन और सिक्स लेन की सड़कों के डिवाइडरों में दोनों तरफ रेलिंग लगवाने की ज़रूरत है। मेरा विनम्र निवेदन है कि मासूम पशुओं सहित आम जनता की जीवन रक्षा के लिए इस पर गंभीरता से विचार किया जाए और सड़क बनाने वालों को रेलिंग लगाने के सख़्त निर्देश दिए जाएँ। -स्वराज्य करुण

Friday, June 9, 2023

(पुस्तक -चर्चा )मंदिर सलामत है : हमारे सामाजिक परिवेश की कहानियाँ

शिवशंकर पटनायक की सैंतीसवीं किताब (आलेख : स्वराज करुण ) विभिन्न विधाओं की साहित्यिक रचनाओं की तरह कहानियाँ भी हमारे सामाजिक परिवेश में ही लिखी जाती हैं। उनका ताना -बाना हमारे समाज में होने वाली सुखद या दुःखद घटनाओं पर ही बुना जाता है। यह ताना -बाना कोई भी रचनाकार अपनी कल्पनाओं के धागों को यथार्थ के रंगों में रंगकर ही बुनता है। ऐसे अग्रणी रचनाकारों में छत्तीसगढ़ के शिवशंकर पटनायक भी शामिल हैं । वे इस प्रदेश के उन साहित्यकारों में से हैं , जो ग्रामीण परिवेश के निवासी हैं और महासमुंद जिले के पिथौरा जैसे छोटे -से गाँवनुमा कस्बे में रहकर समर्पित भाव से साहित्य की सेवा कर रहे हैं। उनकी साहित्य -साधना अर्ध -शताब्दी से भी अधिक समय से अनवरत जारी है। कहानियाँ ,निबंध और उपन्यास उनके लेखन की प्रमुख विधाएँ हैं। उनका नवीनतम कहानी संग्रह 'मंदिर सलामत है ' हाल ही में प्रकाशित हुआ है।यह उनकी सैंतीसवीं किताब है। अब तक 37 किताबों का लेखन और प्रकाशन साहित्य साधना के प्रति उनके समर्पण और उनकी असाधारण साहित्यिक प्रतिभा का सबसे बड़ा उदाहरण है। उनकी ताजातरीन किताब 'मंदिर सलामत है' कुल 10 कहानियों का संकलन है। संग्रह की पहली कहानी 'मंदिर सलामत है ' एक कस्बे मे हुए दो वैवाहिक आयोजनों पर लिखी गयी है। यहाँ मंदिर से लेखक का आशय घर-परिवार से है , जिसे सलामत रखना हम सबकी जिम्मेदारी है । रंग -भेद की सामाजिक बुराई को भी इसमें उकेरा गया है।
इन वैवाहिक आयोजनों में में से एक में नायिका सांवले रंग की होने के कारण समाज के कुछ लोग उसकी आलोचना करते हुए सगाई और विवाह को तोड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन सफल नहीं हो पाते और नेहा और प्रभाष का विवाह सम्पन्न हो जाता है । दूसरी घटना उस परिवार में घटती है ,जिसके मुखिया की पत्नी श्रीमती उर्मिला दास ने मिस्टर षड़ंगी की उच्च शिक्षित सहायक प्राध्यापिका बिटिया नेहा के काले रंग को लेकर सार्वजनिक रूप से प्रतिकूल टिप्पणी की थी। लेकिन वहीं जब उस परिवार की बेटी पूनम की शादी के दौरान कुछ लोग अफवाहों से प्रभावित होकर उस बेटी पर चरित्रहीनता का लांछन लगाते हैं और वैवाहिक अनुष्ठान में व्यवधान डालने का प्रयास करते हैं ,तब मिस्टर षड़ंगी की समझाइश पर ही पूनम का विवाह निर्विघ्न सम्पन्न हो जाता है। यहाँ लेखक ने इन दोनों घटनाओं का वर्णन आत्मकथ्य के रूप में किया है। लेखक को पूनम के पिता मिस्टर दास हाथ जोड़कर कहते हैं -- षड़ंगी साहब , आपने तो पूनम बिटिया का मंदिर बनाकर पुण्य अर्जित कर लिया, किंतु मैंने और मेरी पत्नी ने नेहा बिटिया का मंदिर ध्वंस कर जो पाप किया है , उसका प्रायश्चित हम किस प्रकार करेंगे? लेखक कहते हैं कि मैंने मिस्टर दास को आलिंगन में भरकर कहा -"आपको और आपकी धर्मपत्नी को नेहा को लेकर अपराध-बोध पालने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है ,क्योंकि महाकाल महादेव की अति कृपा से उसका मंदिर सलामत है।" संग्रह की अन्य कहानियों में (1) अधिकारी (2)जोजवा (3)मेहरबानी का कर्ज (4)कर्म -दंड (5) दाऊजी (6) तुमने सही कहा था (7)कर्त्तव्य -बोध (8) आक्रोश और (9) चैती शामिल हैं। ये कहानियाँ भी हमारे सामाजिक परिवेश के इर्दगिर्द होने वाली घटनाओं को रेखांकित करती हैं । संग्रह की प्रत्येक कहानी में कोई न कोई सार्थक सामाजिक संदेश ज़रूर गूंजता है। शिवशंकर पटनायक के प्रकाशित अन्य कहानी संग्रहों में (1)पराजित पुरुष (2) प्रारब्ध (3) पलायन और (4) डोकरी दाई भी काफी चर्चित और प्रशंसित हैं। उनके अधिकांश उपन्यास पौराणिक पात्रों और घटनाओं पर आधारित हैं।इनमें महाभारत की पृष्ठभूमि पर आधारित (भीष्म प्रश्नों की शर-शैय्या पर (2)कालजयी कर्ण और (3) एकलव्य भी उल्लेखनीय हैं । उन्होंने महाभारत की प्रमुख पात्रव कुन्ती और रामायण की मंदोदरी पर भी उपन्यासों की रचना की है। रामायण के पात्रों पर आधारित 'अग्नि स्नान' सहित 'कोशल नंदिनी ' जैसे उनके उपन्यास भी काफी प्रशंसित रहे हैं।उनका उपन्यास 'अग्नि स्नान ' रामायण के खलनायक 'रावण ' के आत्मकथ्य पर आधारित है।शिवशंकर पटनायक ने छत्तीसगढ़ के लोक देवता करिया धुर्वा पर भी एक उपन्यास लिखा है। उनके सहित निबंध संग्रहों में (1) आप मरना क्यों नहीं चाहते (2) भाव चिन्तन और (3)मानसिक दशा एवं दर्शन सम्मिलित हैं। आलेख - स्वराज करुण

Monday, June 5, 2023

(आज विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष) लगातार टूटते -झुकते पहाड़ !-लेखक : स्वराज्य करुण

हरे -भरे पहाड़ लगातार टूट रहे हैं। उनके झरनों पर और उनकी कन्दराओं में रहने वाले वन्य जीवों पर संकट गहराने लगा है। आज पर्यावरण दिवस पर हमें इन टूटते ,झुकते पहाड़ों की भी चिन्ता करनी ही चाहिए । लेकिन आधुनिकता की सुनामी में वो तो टूटेंगे ही ,क्योंकि सीमेन्ट -कांक्रीट का मकान बनवाना अब शायद लोगों की मज़बूरी हो गयी है ।
खपरैल वाली छतों से हर बरसात में पानी टपकने का डर बना रहता है । हर साल मानसून आने से पहले खपरा पलटवाने का झंझट ! हालांकि पहले भी लोग खपरैलों से ढँके मकानों में ही रहते थे। लेकिन आज के दौर में वनों के निरंतर कटते जाने से वन्य प्राणी भोजन -पानी की तलाश में मनुष्यों की बस्तियों में मंडराने लगे हैं।ग्रामीण इलाकों में खपरैल की छतों पर बन्दरों का उपद्रव बढ़ने लगा है।जो अपनी उछल-कूद से खपरैलों को तोड़ -फोड़ देते है ,फिर कच्ची ईंटों और मिट्टी के मकानों पर जंगली हाथी यदाकदा धावा बोल देते हैं । इसके अलावा साँप -बिच्छुओं और अन्य ज़हरीले कीड़े -मकोड़ों के डर तथा आधुनिक जीवन - शैली की चाहत की वज़ह से भी लोगों में मिट्टी की मोटी दीवारों वाले मकानों से अरुचि होने लगी है ,जबकि ऐसे मकान गर्मियों में सुकून भरी ठंडक और ठंड के मौसम में गुनगुनी गर्मी का एहसास देते हैं। कई कारणों से मिट्टी के मकानों के प्रति लोगों दिलचस्पी कम हो रही है । इसके साइड इफेक्ट भी साफ़ दिखने लगे हैं । गर्मियों में सीमेंट -कांक्रीट के मकान किसी तन्दूर की तरह भभकते हैं और अचानक बिजली चली जाने से पँखे ,कूलर और एसी बन्द हो जाने के बाद कुछ समय के लिए उमस भरी यातना झेलनी पड़ती है । कांक्रीट बनाने के लिए चलने वाले क्रशर यूनिटों के आस -पास स्वाभाविक रूप से वायु प्रदूषण होता ही है ,जिसका दुष्प्रभाव मानव और पशु - पक्षियों के स्वास्थ्य और पेड़ - पौधों पर भी पड़ना स्वाभाविक है फिर भी ऐसे मकानों के प्रति अमीर -गरीब , सबमें आकर्षण बढ़ रहा है ।शहरों में खपरैलों की बिक्री अब नज़र नहीं आती । फलस्वरूप कुम्हारों की आमदनी कम हो रही है ,हालांकि वो मिट्टी के घड़े और गमले आदि बनाकर और बेचकर अपना और अपने परिवार का किसी तरह गुजारा कर रहे हैं । लोग अब खपरैल वाली नहीं ,बल्कि सीमेंटेड यानी लेंटर्ड छतों के मकान चाहते हैं । बहुत मज़बूरी में ही कोई खपरैल का मकान बनवाता है ,या उसमें रहता है । सोचने के लिए मज़बूर करने वाला सवाल ये है कि हमारे पूर्वजों ने तो खपरैल और मिट्टी के बने मकानों में पीढ़ियाँ गुज़ार दी , फिर हम क्यों अपने लिए सीमेन्ट -कांक्रीट का जंगल खड़ा करना चाहते हैं ,जो पर्यावरण के लिए भी घातक साबित हो रहे हैं ? पहाड़ टूटेंगे तो हरियाली और बारिश भी कम होगी ही । हमें कोई न कोई नया विकल्प सोचना होगा । *********

(आलेख) सुख - शांति के लिए अपने प्राकृतिक पर्यावरण को बचाइए -- स्वराज्य करुण

लेखक - स्वराज्य करुण) ) विश्व पर्यावरण दिवस आज हमें चीख़- चीख़ कर कह रहा है कि तेजी से तबाह हो रहे अपने प्राकृतिक पर्यावरण को बचा लो , फिर चाहे सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक पर्यावरण हो ,चाहे आर्थिक और औद्योगिक पर्यावरण या आपके भीतर का मानसिक पर्यावरण , हर तरह का पर्यावरण स्वच्छ सुंदर और सुरक्षित रहेगा । सुख ,शांति और समृद्धि चाहते हो तो अपने प्राकृतिक पर्यावरण को बचा लो। लेकिन दिक्कत यह है कि सब कुछ जानते ,समझते हुए भी इंसान पर्यावरण को दूषित कर रहा है और अपने साथ -साथ अपनी दुनिया को भी तबाही के रास्ते पर ले जा रहा है। पहाड़ों की हरियाली को नोच खसोट कर उनके नैसर्गिक सौंदर्य को नष्ट करने में अब शायद किसी को कष्ट नहीं होता। बढ़ती जनसंख्या ,बढ़ते शहरीकरण और तीव्र गति से फलते -फूलते औद्योगिक विकास की वजह से जल ,जंगल और ज़मीन ,तीनों आज गंभीर संकट में हैं। जंगल कट रहे हैं ,तो वहाँ रहने वाले पशु -पक्षियों का जीवन भी खतरे में पड़ गया है। नये जंगल लगाने की जरूरत है। देश में आज प्लास्टिक और पॉलीथिन का कचरा हमारे पर्यावरण के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। शहरों के साथ साथ हमारे गाँव और कस्बे भी प्लास्टिक प्रदूषण के शिंकजे में है। अधिकांश लोग जानते हैं कि प्लास्टिक कचरे की रिसाइक्लिंग करके उसे दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है ,सड़क निर्माण में प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल हो सकता है , लेकिन इंसान हर तरफ प्लास्टिक के डिब्बों बोतलों और पॉलीथिन की थैलियों का उपयोग करने के बाद उन्हें लापरवाही से इधर उधर फेंककर प्रदूषण फैलाने का अपराध कर रहा है । यहाँ तक कि अब तो हमारे महासागर भी इस प्रदूषण की चपेट में आ गए हैं। यह एक अच्छी पहल है कि भारत सरकार द्वारा देश के कई शहरों में प्लास्टिक इंजीनियरिंग संस्थान संचालित किए जा रहे हैं ,जहाँ युवाओं को इस विषय में प्रशिक्षण के साथ डिग्री /प्रमाणपत्र भी दिये जाते हैं। प्लास्टिक रिसाइकिलिंग में इन युवाओं की प्रतिभा का उपयोग करते हुए उन्हें रोजगार के अवसर दिए जा सकते हैं। अगर देश में कृषि उपजों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की तरह प्लास्टिक कचरे की सरकारी खरीदी के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित हो और जगह जगह खरीदी केंद्र बना दिए जाएं तो जहाँ बड़ी संख्या में गरीबों को कुछ अतिरिक्त आमदनी हो सकती है ,वहीं हमारे चारों ओर प्लास्टिक और पॉलीथिन के बेतरतीब फैलते लाखों टुकड़े काफी हद तक साफ़ हो जाएंगे। दुनिया भर में कई देशों द्वारा समुद्र और ज़मीन के भीतर और हवा में किया जाने वाला परमाणु हथियारों का परीक्षण भी बढ़ते प्रदूषण का एक ख़तरनाक कारण बन गया है। पूरी दुनिया में परमाणु परीक्षणों और परमाणु हथियारों पर कड़ा प्रतिबंध लगा देना चाहिए। विगत एक साल से भी अधिक समय से जारी रूस -यूक्रेन युद्ध में चल रही भीषण बमबारी से जहाँ जन -धन की भारी तबाही हो रही है ,वहीं बमों और बारूदों से वहाँ हवा , पानी और ज़मीन भी प्रदूषित होती जा रही है। पर्यावरण और मानवता की रक्षा के लिए इस युद्ध को तत्काल रोका जाना चाहिए। ******************************

Friday, May 12, 2023

(आलेख)दुनिया की तमाम नर्सों की प्रेरणा स्रोत फ्लोरेंस नाइटिंगेल ; 203वीं जयंती ; विश्व नर्सिंग दिवस

आलेख :  स्वराज करुण 

     कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हमें अपना हर कार्य बहुत धैर्य से करना चाहिए। दुनिया भर के सभी अस्पतालों की नर्सों की कठिन ड्यूटी को देखकर हमें यही सीख मिलती है। अस्पतालों में डॉक्टरों की भूमिका तो अपनी जगह सबसे महत्वपूर्ण होती है ,लेकिन उनके साथ कदम से कदम मिलाकर ओपीडी और ऑपरेशन थियेटरों तक मरीजों की सेवा करने वाली नर्सों का योगदान भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष में अपने मस्तिष्क के एक जटिल ऑपरेशन के लगभग  एक सप्ताह बाद बाद कल शाम को ही घर लौटा हूँ। जब तक वहां भर्ती रहा , मेरे साथ -साथ अन्य गंभीर मरीजों की सेवा में तमन्यता से लगी नर्सो के धीरज को  देखकर मुझे फ्लोरेंस नाइटिंगेल की याद आती रही , जो दुनिया की तमाम नर्सों की प्रेरणास्रोत हैं ।संयोगवश आज 12 मई 2023 को उनकी 203 वीं जयंती है ,जो विश्व नर्सिंग दिवस के रूप में मनायी जा रही है। दर्द से कराहते मरीजों को दिलासा देना ,अचानक किसी मरीज की तबियत बहुत ख़राब हो जाए तो डॉक्टरों को सूचित करना , चाहे रात के दो बजे जाएं मरीजों  समय पर दवाइयाँ खिलाना , थर्मामीटर से उनके शरीर का तापमान लेना , मरीज को दी जा रही दवाइयों का और तापमान का हर घण्टे का रिकार्ड दर्ज करना , ये कोई साधारण काम नहीं हैं।मुझ जैसा साधारण व्यक्ति नर्सो की सेवा भावना और उनके सेवा कार्यो  का भला क्या प्रतिदान दे सकता है ? 

कोई कह सकता है कि उन्हें तो ड्यूटी के लिए तनख़्वाह मिलती है , लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि  पीड़ित मानवता की सेवा के किसी भी कार्य का मूल्यांकन रुपए -पैसों से नहीं किया जा सकता। आज विश्व नर्सिंग दिवस के के उपलक्ष्य में  फ्लोरेंस नाइटेंगल पर केन्द्रित मेरा यह आलेख दुनिया भर की तमाम नर्सो को समर्पित है ।

                            




           कोई भी धर्म मानवता से बड़ा नहीं 

अस्पताल एक ऐसी जगह है ,जहाँ इंसानों की जान बचाने के लिए न तो उनका धर्म देखा जाता है और न ही देखी जाती है उनकी जात ! अस्पतालों में मरीज मनुष्य के रूप में आते हैं ,हिन्दू मुसलमान ,सिक्ख या ईसाई के रूप में नहीं। मंदिर ,मस्ज़िद और मीनार के फ़िजूल धार्मिक विवादों में जनता को उलझाने वाले लोगों को देश और दुनिया भर के अस्पतालों से , ,वहाँ के डॉक्टरों और वहाँ की नर्सों से  सीखना चाहिए कि कोई भी धर्म मानवता से बड़ा नहीं होता। मानवता की सेवा के लिए  वहाँ की नर्सें भी  सदैव मुस्तैद रहती हैं।वे  अपनी सेवा भावना से सबको यह संदेश देती हैं कि  उनके लिए मानवता की सेवा ही सच्चा धर्म है।

   चाहे बाढ़ , तूफ़ान और  भूकम्प  जैसी प्राकृतिक आपदाएँ हों या युद्ध ,  महायुद्ध या महामारी  जैसे  मानवीय संकट , कहीं  अग्नि दुर्घटना हो गई हो ,या सड़क दुर्घटना  , वे हर हाल में इन हादसों से  पीड़ित इंसानों  की मदद के लिए ततपर रहती हैं। घायल और बीमार मरीजों की सेवा करती हैं। उन्हें अस्पतालों में रात दिन भाग दौड़ करते देखा जा सकता है।  डॉक्टरों के साथ मिलकर वो सामान्य दिनों में भी अस्पतालों में मरीजों के इलाज में मददगार की भूमिका में रहती हैं। 

    विगत दो वर्षों में कोरोना के दौरान भी उन्होंने अस्पतालों में मरीजों का जीवन बचाने के लिए पीपीई किट पहनकर , पसीने से लथपथ होकर भी चौबीसों घंटे ड्यूटी पर तैनात रहीं। आज 12 मई को उन्हीं सेवाभावी नर्सों की प्रेरणास्रोत फ्लोरेंसनाइटिंगेल की 202 वीं जयंती है। उन्हें विनम्र नमन।उनकी याद में आज पूरी दुनिया में नर्सिंग दिवस मनाया जाता है। उन्हें याद करते हुए  आज देश और दुनिया की करोड़ों नर्सों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है। 

     वैसे तो अस्पतालों में  मरीजों के इलाज़ में डॉक्टरों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है ,लेकिन  उनके  सहयोगी के रूप में नर्सों का भी बड़ा अहम रोल होता है ।  अगर डॉक्टर अपनी टीम का कप्तान होता है तो आज के युग में  नर्सें  उसकी टीम की सबसे  महत्वपूर्ण सदस्य होती हैं ,जल मरीजों की देखभाल सेवा भावना से और पूरी तन्मयता के साथ करती हैं ।  नर्सों के बिना किसी अस्पताल की कल्पना भी नहीं की जा सकती । 

     

         कौन थीं फ्लोरेंस नाइटिंगेल ?

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    पीड़ित मानवता की सेवा के लिए कर्म क्षेत्र में अपनी भावनाओं की ज्योति सदैव प्रज्ज्वलित रखने वाली महिला थीं फ्लोरेंस नाइटेंग । उनके  संघर्षपूर्ण और गरिमामय जीवन यात्रा के बारे में इंटरनेट पर  उपलब्ध अलग -अलग  जानकारियों के अनुसार वह एक  लेखिका भी थीं । उनकी पुस्तकों में 'लेटर्स फ्रॉम इजिप्ट ' 'नर्सिंग होम केयर ' 'नोट्स ऑफ़ नर्सिंग ' और 'नोट्स ऑन हॉस्पिटल्स '  उल्लेखनीय हैं  । उन्होंने वर्ष 1849 -1850 में अपने मित्रों के साथ इजिप्ट का दौरा किया था ।  इजिप्ट प्रवास पर आधारित उनकी यह किताब 1854 में छपी थी ।

      उनका जन्म- 12 मई, 1820 को फ्लोरेन्स (इटली ) में  एक सम्पन्न ब्रिटिश परिवार में हुआ था ।  निधन -13 अगस्त, 1910 को लन्दन में हुआ था  । वे  आधुनिक नर्सिग आन्दोलन की जननि ' मानी जाती हैं। आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि के बावज़ूद उन्होंने नर्स बनकर  मानवता के कल्याण का मार्ग चुना । यह वर्ष 1840  के उन दिनों की बात है ,जब इंग्लैंड में भयानक अकाल पड़ा था । फ्लोरेन्स नाइटेंगल ने इस कठिन समय में अकाल पीड़ित बीमारों की  मदद के लिए अपने एक  पारिवारिक डॉक्टर  के साथ नर्स बनने की इच्छा जताई ।हालांकि इसके लिए उन्हें पारिवारिक विरोध भी सहना पड़ा ,लेकिन उनके दृढ़ संकल्प की वज़ह से माता पिता ने उन्हें सहमति दे दी । क्रीमिया के युद्ध के दौरान वह  तुर्की में घायलों के उपचार के लिए 38 महिलाओं की टीम बनाकर युद्ध क्षेत्र में पहुँची । उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारावहाँ के सैन्य असपताल में भेजा गया था ।

      

     लेडी विथ द लैम्प की मिली उपाधि 

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       रात के समय जब डॉक्टर अपनी ड्यूटी के बाद चले जाते थे ,तब फ्लोरेन्स नाइटेंगल अँधेरे में मोमबत्तियां और लालटेन  जलाकर घायलों की देखभाल करती ।  इस पुण्य कार्य की वज़ह से उन्हें 'लेडी विथ द लैम्प ' की उपाधि से नवाज़ा गया था । वह सदैव सेवा की ज्योति जलाए रखने वाली एक ज्योतिर्मयी महिला थीं ।उन्होंने वर्ष 1859 के आसपास ' नोट्स ऑफ नर्सिंग ' नामक पुस्तक भी लिखी ।  उनकी प्रेरणा से ही महिलाएं नर्सिंग के क्षेत्र में आने लगीं । फ्लोरेन्स नाइटेंगल ने  अपने समय के शासकों को युद्ध ग्रस्त इलाकों में घायलों और बीमारों के इलाज की उचित व्यवस्था के लिए प्रेरित किया । पहले ऐसी कोई व्यवस्था नहीं होती थी । उन्होंने अपने अनुकरणीय सेवा कार्यों से अस्पतालों में नर्सिंग के प्रोफेशन को एक नयी पहचान दिलाई । लन्दन में उन्होंने वर्ष 1860 में सेंट थॉमस अस्पताल में  विश्व के प्रथम  नर्सिंग प्रशिक्षण स्कूल की स्थापना की ।

        -- स्वराज करुण 

(फोटो : इंटरनेट से साभार )

Wednesday, May 3, 2023

(आलेख) पारम्परिक और नागरिक पत्रकारिता पर कुछ विचार

 आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस ; चिन्तन -मनन का दिन 

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            (आलेख - स्वराज करुण )

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ष 1993 में की गयी घोषणा के अनुरूप सम्पूर्ण विश्व में हर साल तीन मई को मनाए जाने वाले विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस का यह 30 वां साल है। यूनेस्को ने इसे मनाने की सिफारिश की थी। आज इस  मौके पर पत्रकारिता की    सभी विधाओं में सक्रिय सभी लोगों को हार्दिक बधाई   और बहुत -बहुत शुभकामनाएँ । दुनिया के प्रत्येक लोकतंत्र में आधुनिक मीडिया के  सभी पहलुओं पर आज चिन्तन -मनन करने का दिन है। मेरे विचार से लोकतंत्र में प्रेस की आज़ादी और अभिव्यक्ति की आज़ादी , दोनों एक दूसरे के पूरक हैं  या एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उसी तरह एक आम नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कोई  फ़र्क नहीं है। है भी तो बहुत बारीक फ़र्क है ,क्योंकि प्रेस या मीडिया का संचालन भी नागरिक ही तो करते हैं। उनकी अभिव्यक्ति अगर बाधित होगी तो वे प्रेस या मीडिया का संचालन भला कैसे कर पाएंगे ? 

    आज की दुनिया में प्रेस का अर्थ बहुत व्यापक हो गया है। लोकतंत्र के इस नये युग में अब 'प्रेस' का मतलब सिर्फ़ छपा हुआ अख़बार नहीं है ,बल्कि उस तक समाचारों और विचारों की पूर्ति सतत बनाए रखने वाले रेडियो,टेलीविजन,  और इंटरनेट आधारित समाचार एजेंसियों सहित सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्म भी प्रेस के रूप में अपनी -अपनी भूमिका है ।लेकिन  पारम्परिक पत्रकारिता के रूप में प्रिंट मीडिया की भूमिका आज भी बहुत महत्वपूर्ण और ताकतवर बनी हुई है। छपे हुए शब्दों और विचारों का अपना महत्व होता है।

    इधर हो सकता है कि बहुत से लोग सोशल मीडिया को 'पत्रकारिता' मानने से  इंकार करें ,लेकिन यह पारम्परिक पत्रकारिता से हटकर 'सार्वजनिक पत्रकारिता'  अथवा 'नागरिक पत्रकारिता ' कहलाने की हक़दार तो बन ही चुकी है।भले ही इसके विभिन्न प्लेटफार्मों में मनुष्य को भ्रमित करने वाला शोरगुल बहुत है ,हर कोई इसमें अपनी बात कहने के लिए व्याकुल नज़र आता है ,लेकिन  यह सच्चाई है कि  आज  यह अभिव्यक्ति की आज़ादी का एक नया माध्यम है बन चुका है। सोशल मीडिया  अभिव्यक्ति की आज़ादी का एक नया माध्यम है। पारम्परिक पत्रकारिता में वैतनिक अथवा मानसेवी सम्पादक और वैतनिक , अवैतनिक संवाददाताओं का होना बहुत जरूरी है  । वो छपनीय जानकारी प्राप्त करने के लिए  किसी से भी कोई भी सवाल कर सकते हैं,  जबकि 'नागरिक पत्रकारिता 'में व्यक्ति को ऐसी आज़ादी नहीं है ,जबकि आज दुनिया का हर स्मार्ट फोन धारक व्यक्ति सूचनाओं ,समाचारों और विचारों का प्रेषक बनकर अप्रत्यक्ष रूप से ही क्यों न हो , एक 'नागरिक पत्रकार' (सिटीजन जनर्लिस्ट)  की भूमिका तो  निभा ही रहा है।वह अपने लिखे हुए का खुद सम्पादक ,मुद्रक और खुद प्रकाशक है। भले ही वह हमारी सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक  व्यवस्था के सूत्रधारों से आमने -सामने होकर कोई सवाल न  कर पाता हो ,लेकिन अपने इर्दगिर्द की घटनाओं और समस्याओं को सचित्र पोस्ट करके अप्रत्यक्ष रूप से सवाल तो उठा ही देता है और पारम्परिक प्रेस के लिए विषय अथवा मैटर का जुगाड़ भी कर देता है। वह भी एकदम निःशुल्क ,बल्कि खुद पैसे देकर ,यानी मोबाइल कम्पनियों  को  हर महीने सिम रिचार्ज के लिए अपनी जेब से सैकड़ों रुपए देकर वह 'नागरिक पत्रकारिता ' में अपना सहयोग दे रहा है। यह एक प्रकार की अनौपचारिक पत्रकारिता है। 

          दुनिया के बड़े - बड़े नेता, राष्ट्र  प्रमुख  और अफ़सर ,आजकल स्वयं न्यूज मेकर बन गए हैं जो  पारम्परिक प्रेस से साझा करने योग्य जानकारी सबसे पहले फेसबुक,  ट्विटर,ब्लॉग और वेबसाइट  पर फोटो और वीडियो सहित पोस्ट कर देते हैं ,जिन्हें अख़बार ,रेडियो और टीव्ही चैनल अपने लिए उठा लेते हैं। उन्हें पकी-पकाई सामग्री मिल जाती है।अब तो टीव्ही चैनलों की तरह यूट्यूब न्यूज चैनल भी ख़ूब चल रहे हैं।    

 सोशल मीडिया के ये सभी प्लेटफार्म निजी कम्पनियों द्वारा संधारित और संचालित हैं। वो जिस दिन चाहें ,इन्हें बंद भी कर सकती हैं।लेकिन विश्व के करोड़ो नागरिकों से  मिल रही तरह -तरह की सूचनाओं का विशाल बैंक उन्हें मुफ़्त में मिल रहा है और विज्ञापनों से भी  उनकी खरबों डॉलर की कमाई हो रही है।ऐसे में मुझे नहीं लगता कि वो  अपनी इन दुकानों को बंद करेंगीं। दुनिया भर में आज लगभग सभी सरकारी विभागों और  निजी कम्पनियों के अपने -अपने वेबसाइट हैं। लोकल से ग्लोबल तक हर तरह की जानकारी लोग इनमें अपने हिसाब से कहीं भी और कभी भी प्राप्त कर सकते हैं। प्रेस की स्वतंत्रता जनता की  अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़ी हुई है ,जो एकतरफा कतई नहीं हो सकती। इसके साथ हमारी सामाजिक ,राष्ट्रीय और वैश्विक ज़िम्मेदारियाँ भी हैं। सूचनाएँ गलत न हों ,समाचार प्रायोजित न हों और विचार विषैले न हों और जन हित से जुड़े हुए हों , प्रेस की आज़ादी में इन बातों का  ध्यान रखना भी  बहुत जरूरी है।  -- स्वराज करुण

Sunday, April 30, 2023

(आलेख) सरहदों के मिलन -बिंदु पर आकर

(आलेख :  स्वराज्य करुण  )

जहाँ कुछ ही कदमों के फासले पर बदल जाती हैं संस्कृतियाँ ,भाषाएँ  और बोलियाँ ,वहाँ  इस बदलाव को देखना और महसूस करना क्या आपको  रोमांचक नहीं  लगता ? मुझे तो लगता है। देश के भीतर ऐसे कई सीमावर्ती  मिलन -बिंदु हैं ,जहाँ आकर हम और आप स्वयं को रोमांचित महसूस कर सकते हैं ,जहाँ  हमें अपने भारत की सांस्कृतिक विविधता के भी  कई रंग देखने को मिलते हैं।  

    ऐसा ही रोमांच हमें  पड़ोसी देशों से लगी हमारी अंतर्राष्ट्रीय  सीमाओं पर भी होता है , लेकिन मैं जिनकी चर्चा कर रहा हूँ ,वो हमारी आंतरिक (घरेलू ) सरहदें हैं। हालांकि  अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं पर कई तरह की सख़्त बंदिशें भी होती हैं ,लेकिन देश के अंदर राज्यों के बीच  अंतर्राज्यीय सरहदों पर  सब कुछ सहज भाव से चलता  है ,क्योंकि इन सरहदों के इधर -उधर  रहने के बावज़ूद हम सब एक हैं, एक ही देश के निवासी हैं । पिछले साल इन्हीं गर्मियों में उधर से गुजरते हुए  अपने मोबाइल कैमरे से  मैंने ये दृश्य संकलित कर लिए।  इन तस्वीरों में  नज़र आ रहे दो सरकारी बोर्ड हमारे देश के दो प्रदेशों  की सरहदों के मिलन बिंदुओं  के सूचक हैं। नीले रंग का बोर्ड ओड़िशा के लोक निर्माण विभाग का है और पीले कलर का बोर्ड छत्तीसगढ़ सरकार के लोक निर्माण विभाग का । दोनों बोर्डों के बीच कुछ ही कदम पैदल  चलकर हम एक -दूसरे के राज्यों में आ -जा सकते हैं। इन चंद कदमों के फासले पर ही काफी कुछ बदल जाता है। बच्चों की स्कूली पढ़ाई की भाषा बदल जाती है , शासन -प्रशासन बदल जाता है। सामाजिक -सांस्कृतिक  राजनीतिक और प्रशासनिक  गतिविधियाँ बदल जाती हैं।


                                             



बोलचाल के लिए उधर  छत्तीसगढ़ मे छत्तीसगढ़ी और हिन्दी का चलन है  और इधर ओड़िशा के इलाके में ओड़िया भाषा और सम्बलपुरी बोली। हालांकि एक दूसरे के  इलाकों में स्थानीय लोग एक -दूसरे की भाषाओं और बोलियों के भी अभ्यस्त हैं। इन भाषाओं और बोलियों में एक -दूसरे के यहाँ लोक संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम भी समय -समय पर ख़ूब होते हैं। काम -काज के सिलसिले में एक -दूसरे के यहाँ आना -जाना भी हमेशा लगा ही रहता है। (स्वराज्य करुण ) यह स्थान छत्तीसगढ़ के तहसील मुख्यालय बसना (जिला -महासमुंद) से मात्र साढ़े तेरह किलोमीटर पर ओंग नदी के किनारे है। इधर से गुजरने वाली  सड़क बसना (छत्तीसगढ़ )से  ओड़िशा के सबडिविजनल मुख्यालय पद्मपुर की दिशा में जा रही है ,जो बसना से लगभग  40 किलोमीटर पर है। इस पुल से छत्तीसगढ़ के विकासखंड मुख्यालय बसना की दूरी मात्र साढ़े तेरह किलोमीटर है। कभी -कभी मुझे लगता है कि इस नदी का नाम 'ओम नदी'  या 'अंग नदी'  रहा होगा और शायद  समय के साथ आंचलिक उच्चारण के असर से जन -जीवन में इसका नाम 'ओंग' प्रचलित हो गया। पिछले साल जब मैं उस रास्ते से गुज़र रहा था ,तो वहाँ  छत्तीसगढ़ की तरफ की सड़क का उन्नयन और चौड़ीकरण किया जा रहा था। । उधर ओड़िशा की तरफ कुछ वर्ष पहले ओंग नदी पर एक बड़े पुल का निर्माण हो चुका है और आगे के  लगभग 26 किलोमीटर के रास्ते का चौड़ीकरण और डामरीकरण भी। इस रास्ते पर ओंग नदी का पुल पार करने के बाद आपको जगदलपुर भी मिलेगा , लेकिन वह  छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले का मुख्यालय जगदलपुर नहीं ,ओड़िशा का एक कस्बा है। इसके  आस - पास है  पहाड़ियों का  सुरम्य नैसर्गिक परिवेश । 

      दोनों सरहदों के मिलन -बिंदु के इर्द-गिर्द   कुछ पेड़ आम के भी हैं ,जो इन दिनों गर्मियों में फलों से लदे हुए नज़र आते है। फल अभी पके नहीं हैं। राहगीर कुछ फल चटनी और अचार बनाने के लिए तोड़ भी लें तो यहाँ कोई रोक -टोक नहीं है । यानी लगता है कि ये सार्वजनिक पेड़ हैं। अच्छा भी है। पहले ज़माने में राजा -महाराजा लोग जनता के लिए और कुछ करें या न करें ,लेकिन  सड़कों के किनारे फलदार पौधे जरूर लगवाते थे , जो बड़े होकर राहगीरों को छाया और स्वादिष्ट फल  मुफ़्त में दिया करते थे। ये पेड़ उनके लगवाए हुए हैं या  नहीं ,ये तो मुझे नहीं मालूम ,लेकिन जिन्होंने भी लगवाए होंगे , उनके इस परोपकार की प्रशंसा तो करनी ही चाहिए। उनसे प्रेरणा भी लेनी चाहिए।

    आलेख      -- स्वराज्य करुण 

  

(आलेख) जल -जीवन के साथ सूखने लगा जन -जीवन

(आलेख : स्वराज्य करुण  )

हमारी संस्कृति और हमारे जन -जीवन से जुड़ी नदियाँ पहले बारहमासी हुआ करती थीं ,अब उनमें से अधिकांश ' बरसाती नदियाँ ' कहलाने लगी हैं। ठीक भी है। बारहों महीने तो उनमें पानी नहीं रहता ।  आजकल उनके जल में जीवन की कुछ हलचल सिर्फ़ बरसात के दिनों में ही  नज़र आती है। पहले नदियों में नौकाओं के जरिए यातायात और माल परिवहन भी होता था । देश के भीतर  जल मार्ग से व्यापार व्यवसाय होने की जानकारी भी  इतिहास में मिलती है । कई नदियों के किनारे पुरातत्वविदों को उत्खनन में प्राचीन बंदरगाहों के अवशेष भी मिले हैं। 

    पहाड़ों की संतान हैं उनकी गोद से निकलने वाले नदी -नाले। लेकिन विगत सैकड़ों वर्षों से मानव के हाथों से हो रहे प्राकृतिक संसाधनों के असंतुलित और निर्मम दोहन की वजह से पहाड़ उजड़ने लगे और  नदियाँ भी सूखने लगीं ,पहाड़ों से निकलकर नदियों से मिलने वाले झरने भी सूखने लगे और जल मार्ग विलुप्त हो गए। यह सिलसिला आज भी जारी है। नदियों के साथ - साथ कई प्राकृतिक बरसाती नाले भी सूखकर बेजान होते जा रहे हैं। जब हमारी प्राकृतिक जल -धाराएँ सूखने लगीं तो धरती पर हमारा 'जन - जीवन 'भी इस समस्या से अछूता कैसे रह सकता है ?लिहाजा जल -जीवन के साथ जन -जीवन भी सूखने लगा । 


                                                    


                                   ( दृश्य  - पश्चिम ओड़िशा के ओंग नदी का , पिछले साल गर्मी के मौसम में ) 


     खेती के लिए पानी और सिंचाई भी जरूरी है। बिजली और  पेयजल के लिए भी पानी का बारहमासी स्रोत चाहिए। इसलिए नदियों पर छोटे-  बड़े बांधों के जरिए उनका पानी रोका जाने लगा तो उनकी  जल धाराएँ आगे नहीं बढ़ पायीं और आगे चलकर नदियाँ सूखने लगीं । बरसाती नाले भी।  मानव बसाहटों का कचरा नदी -नालों में डाला जाने लगा। ये प्राकृतिक जल स्रोत प्रदूषण का शिकार होने लगे।

     बड़े -बड़े उद्योगों को चलाने के लिए विशालकाय पाइप लाइनों के जरिए नदियों का  पानी सोखा जाने लगा। भू -जल का भी निर्मम शोषण होने लगा। हालांकि मानव जीवन के लिए तरह -तरह के उद्योग भी जरूरी हैं ,लेकिन उनमें पानी के  इस्तेमाल के लिए क्या कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो सकती ? वाटर रिचार्जिंग और रेन वाटर हार्वेस्टिंग की सहज -सरल तकनीक  शायद उनके लिए विकल्प बन सकती है। उनके लिए ही क्यों , आम जनता के लिए भी यह बहुत उपयोगी है। अब तो कई राज्यों में सरकारी और निजी भवन और  मकान बनाने के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग की तकनीक अनिवार्य कर दी गयी है।बरसात में छत पर जमा होने वाले पानी को पाइपों के माध्यम से ज़मीन के भीतर भेजकर इमारतों के आस -पास के गिरते हुए भू -जल स्तर को संभाला जा सकता है। बहुमूल्य  खनिज, वन और जल -सम्पदा के रूप में हम इंसान  प्रकृति से बहुत कुछ लेते हैं ,लेकिन जितना उससे लेते हैं ,उसके बदले हम उसे क्या और कितना देते हैं ? इस पर भी हमें विचार करना चाहिए ।

      भारत में नदियों को माता कहकर सम्बोधित किया जाता है ,क्योंकि वे अपने अमृत तुल्य पानी से मनुष्य का लालन -पालन करती हैं। लेकिन देश के कई शहरी इलाकों में नदियों के  इस  'अमृत जल ' को उनके बेटे -बेटियों  ने ही  विषैला बना दिया है। गंगा और यमुना के किनारे बसे कई शहरों से इस प्रकार के चिन्ताजनक सचित्र समाचार गाहेबगाहे आते रहते हैं। यह जरूर है कि नये दौर में वाटर ट्रीटमेंट तकनीक के जरिए हम नदियों के  प्रदूषित ,जहरीले पानी को भी साफ़ करके पीने योग्य बना रहे हैं। लेकिन यह तो कृत्रिम उपाय है। (स्वराज्य करुण) कृत्रिमता कभी  नैसर्गिकता का विकल्प नहीं बन सकती।  अगर जीवन को स्वस्थ रखना है तो नदी -नालों को भी स्वच्छ रखना होगा । उनकी गोद में कचरा डालना बंद करना होगा। उनके किनारों पर और उनके उदगम पहाड़ों पर  सघन वृक्षारोपण करना होगा। वर्तमान में प्राकृतिक वनों का असंतुलित दोहन भी नदी -नालों के सूखते जाने का एक बड़ा कारण है। नदी -नालों के किनारे बसे  कई गाँवों ,कस्बों और शहरों में ग्रीष्म ऋतु में पानी के लिए हाहाकार क्यों मचता है ,जबकि पानी का नैसर्गिक स्रोत तो उनके नज़दीक ही होता है ? इसके कई कारण हो सकते हैं।

   बाकी तो बड़े -बड़े विशेषज्ञ ही बताएंगे कि इस गंभीर समस्या के निराकरण के क्या -क्या उपाय हो सकते हैं ?   पिछले साल इन्हीं गर्मियों के दिनों में ओड़िशा में ओंग नदी के पुल से गुजरते हुए गर्मियों में सूखी इस  नदी की हालत को देखकर मन में ऐसे कई विचार आए  ,जिन्हें मैंने तस्वीरों सहित आप सबके चिन्तन-मनन के लिए  यहाँ प्रस्तुत  किया। 

आलेख : स्वराज्य  करुण

Friday, April 28, 2023

उत्कल गौरव मधुसूदन दास ; ओड़िशा राज्य के प्रथम स्वप्न दृष्टा

 

          (आलेख - स्वराज्य  करुण  )

  छत्तीसगढ़ , झारखण्ड और बंगाल के निकटतम पड़ोसी उत्कलवासी आज 28 अप्रैल को आधुनिक ओड़िशा राज्य के प्रथम स्वप्नदृष्टा  स्वर्गीय मधुसूदन दास को उनकी जयंती के दिन ज़रूर याद कर रहे होंगे । उन्होंने आज से लगभग 120 साल पहले अलग ओड़िशा राज्य का सपना देखा था और जनता को इसके लिए प्रेरित और संगठित किया था। 


                 


 ओड़िशा के समाचार पत्रों , ओड़िशा के टीव्ही चैनलों और सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों में भी आज लोग अलग -अलग तरीके से लोग उनके व्यक्ति और कृतित्व की चर्चा कर रहे होंगे। उत्कलवासियों ने उन्हें  'उत्कल गौरव 'का लोकप्रिय और आत्मीय सम्बोधन दिया । वह आज भी इसी सम्बोधन से याद किये जाते हैं । भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाकटिकट भी जारी किया था  ।वह बैरिस्टर (वकील ) होने के साथ -साथ विद्वान लेखक , चिन्तक और ओड़िया भाषा के लोकप्रिय साहित्यकार भी थे । उनका जन्मदिन ओड़िशा में 'वकील दिवस ' के रूप में भी मनाया जाता है ।

    स्वर्गीय मधुसूदन दास का जन्म 28 अप्रेल 1848 को तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासित बंगाल प्रेसीडेंसी के अंतर्गत उत्कल क्षेत्र के ग्राम सत्यभामापुर (जिला -कटक) में हुआ था । उनका  निधन 4 फरवरी 1934 को कटक में हुआ । उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से एम .ए .और वकालत की शिक्षा प्राप्त की थी । स्वतंत्रता आंदोलन में उन्होंने महत्वपूर्ण  योगदान दिया । वह पहले ऐसे प्रबुद्ध नागरिक थे ,जिन्होंने सबसे पहले एक अलग ओड़िशा राज्य की परिकल्पना की और इसके लिए लोगों को संगठित कर वर्ष 1903 में उत्कल सम्मिलनी की स्थापना की और इस  मंच के माध्यम से  लगातार जन जागरण का अभियान चलाया । सितम्बर 1897 में उन्होंने ब्रिटेन जाकर लंदन में   ब्रिटिश सरकार के सामने पृथक ओड़िशा राज्य की मांग रखी ।वह 1907 में एक बार फिर लंदन गए और ओड़िशा वासियों की समस्याओं और भावनाओं की ओर  ब्रिटिश सरकार का ध्यान आकर्षित किया । उत्कल सम्मिलनी के माध्यम से ओड़िशा राज्य निर्माण के लिए उनके नेतृत्व में जन जागरण के साथ -साथ जन आंदोलन भी चलता रहा ।

लेकिन  यह विडम्बना ही है कि ओड़िशा राज्य निर्माण का उनका सपना  उनके जीवनकाल में पूरा नहीं हो पाया । विधि का विधान देखिए कि ओड़िशा राज्य निर्माण के करीब 2 साल पहले ही 4 फरवरी 1934 को लगभग  86 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया  । ओड़िशा राज्य एक अप्रैल 1936 को अस्तित्व में आया ।  

       -स्वराज्य  करुण

आइए ,कुछ पल निकालकर करें वृक्ष-चिन्तन

 


(आलेख ; स्वराज्य करुण )

गर्मियों की तेज ,चिलचिलाती धूप में  राह चलते इंसान को कुछ पलों के सुकून के लिए शीतल छाँव की ज़रूरत होती है।  सड़कों के किनारे लगे नीम ,बरगद ,पीपल और कई अन्य छायादार पेड़ इंसान को निःशुल्क शीतलता प्रदान करते हैं। आम जैसे कई फलदार वृक्ष स्वादिष्ट फलों के साथ ठंडी छाँव भी देते हैं। पीपल का तो कहना ही क्या ?

   भारतीय संस्कृति का पूजनीय वृक्ष है पीपल । वैसे तो हमारी संस्कृति में बरगद ,आम ,आंवला  और बेल सहित  सभी वृक्ष पूजनीय हैं ,क्योंकि ये  हमारी  धरती पर  हर प्रकार से  प्राणी जगत की सेवा करते हैं ,हमें जीवित रहने के लिए बिना किसी भेदभाव के ,हर दिन भरपूर ऑक्सीजन देते हैं। अन्य प्रजातियों के वृक्षों की तरह यह भी पर्यावरण -हितैषी पेड़ है।    पीपल के बारे में कहा जाता है कि यह चौबीसों घंटे ऑक्सीजन देने वाला वृक्ष है। यह कहीं भी और कठोर भूमि पर भी उग सकता है। इसलिए आज के समय में उजड़ते पहाड़ों पर भी इसे उगाने की संभावनाओं पर हमें विचार करना चाहिए। परन्तु  अपने आस -पास देखें तो पता चलेगा कि यह तेजी से विलुप्त हो रहा है । पहले तो पीपल के पेड़ तालाबों के किनारे भी दिख जाते थे। नदी  -नालों के दोनों  किनारे भी तरह -तरह के सघन वृक्षों से सजे होते थे । लेकिन अब वो बात कहाँ ?  ऐसे में बचपन के दिनों में  अपनी स्कूली किताब 'बालभारती' में पढ़ी कविता की याद आती है --

यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे

मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे -धीरे। 

पीपल सहित सभी  प्रजातियों के पेड़ --पौधों को बचाना और उनकी संख्या बढ़ाना हमारी ज़िम्मेदारी है। लेकिन आज आधुनिकता की सुनामी में  तूफ़ानी रफ़्तार से हो रहे  शहरीकरण  की वजह से वृक्षों के अस्तित्व पर संकट के घने बादल मंडरा रहे हैं। मनुष्यों की आबादी बढ़ रही है और वृक्षों की घट रही है। फिर भी मनुष्य अगर चाहे तो अपने जीवन में पेड़ -पौधों के लिए भी पर्याप्त जगह छोड़  सकता है।  -- स्वराज्य  करुण

Wednesday, April 26, 2023

(आलेख) आजकल ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनतीं?

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को समर्पित एक फ़िल्म को याद करते हुए मन में उठा सवाल )

        (आलेख -स्वराज करुण)
अच्छा ,आप लोग जरा ये बताइए , आजकल  ऐसी फिल्में  क्यों नहीं बनतीं ,जो हमारे समाज की ज्वलंत समस्याओं को लेकर दर्शकों की चेतना को झकझोरती हों ,उन्हें सोचने के लिए मज़बूर करती हों? फिल्में मनोरंजन का माध्यम जरूर हैं लेकिन उनमें समाज के लिए कोई स्वस्थ और सार्थक संदेश भी तो होना चाहिए।
  क्या सचमुच हमारा समाज बदल गया है ?क्या ज़ुल्म और लूट का रिवाज़ बदल गया है ? अगर नहीं तो क्या फिर आजकल ऐसी फिल्मों और ऐसे गीतों की जरूरत नहीं है ,जिनमें तरह -तरह के ज़ुल्म-ओ-सितम से घिरे मनुष्य की मुक्ति और समाज में एक बेहतर बदलाव की चाहत हो ?
    अगर ऐसी फिल्में नहीं आ रही हैं तो उन  पुरानी फिल्मों के ऐसे गीत भी तो अब रेडियो और टीव्ही पर सुनने -देखने को नहीं मिल रहे हैं। शायद आज की समाज -व्यवस्था को ऐसे गीत बर्दाश्त नहीं होते। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। व्यवस्था की विसंगतियों पर प्रहार करने वाली फिल्में भी आती थीं और उनमें ऐसे गाने भी होते थे ,जो रेडियो पर भी फ़रमाइशी कार्यक्रमों में प्रसारित भी होते थे ।

                                               


        
    उदाहरण के लिए वर्ष 1970 में आई फ़िल्म 'समाज को बदल डालो' को याद कीजिए । इस फ़िल्म का  शीर्षक ही अपने -आप में एक बड़ा सन्देश लिए हुए है। लोकप्रिय शायर साहिर लुधियानवी के लिखे इस गीत को सुप्रसिद्ध संगीतकार रवि (रविशंकर शर्मा)के संगीत निर्देशन में लोकप्रिय मोहम्मद रफ़ी ने अपनी आवाज़ दी थी।
फ़िल्म में  अजय साहनी ,शारदा ,प्रेम चोपड़ा, प्राण ,  अरुणा ईरानी ,महमूद  और कन्हैयालाल सहित  सहित कई बड़े कलाकारों ने  बेहतरीन अभिनय किया था। जेमिनी पिक्चर्स द्वारा निर्मित यह फ़िल्म राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को समर्पित की गयी है । बहरहाल आप इस फ़िल्म के शीर्षक गीत को पढ़िए ,यूट्यूब के लिंक को क्लिक करके  सुनिए और मनन कीजिए कि आजकल ऐसे फ़िल्मी गाने समाज से गायब क्यों हैं ?-
https://www.facebook.com/Brij1206/videos/10203763381107017/

समाज को बदल डालो
समाज को बदल डालो
समाज को बदल डालो
जुल्म और लूट के रिवाज़  को बदल डालो
समाज को बदल डालो

कितने घर हैं जिनमे आज रौशनी नहीं
कितने घर हैं जिनमे आज रौशनी नहीं
कितने तन बदन हैं जिनमे ज़िन्दगी नहीं

मुल्क  और कौम के मिज़ाज़  को बदल डालो
मुल्क  और कौम के मिज़ाज़  को बदल डालो
समाज को बदल डालो
जुल्म और लूट के रिवाज़  को बदल डालो
समाज को बदल डालो

सैकड़ों  की मेहनतों पर एक क्यूँ पले
सैकड़ों  की मेहनतों  पर एक क्यूँ पले
ऊँच नीच से भरा निज़ाम  क्यूँ चले
आज है यही तो ऐसे आज को बदल डालो
आज है यही तो ऐसे आज को बदल डालो

समाज को बदल डालो
जुल्म और लूट के रिवाज़  को बदल डालो
समाज को बदल डालो.

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