Wednesday, February 11, 2026

(विशेष बातचीत ) इशारों की भाषा है ग़ज़ल : पद्मश्री मदन चौहान /आलेख -स्वराज्य करुण


छह  दिन पुरानी तस्वीर के साथ  छह साल पुरानी बातचीत, जो आज भी प्रासंगिक है -

                             (स्वराज्य करुण )

छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय गायक, संगीतकार, हारमोनियम और तबला वादक श्री मदन चौहान  से इस बार 5 फरवरी 2026 की शाम उनके घर हुई मुलाक़ात में छह साल पहले उनसे लिया गया मेरा वह इंटरव्यू भी याद आ गया, जो उन्हें पद्मश्री सम्मान दिए जाने की घोषणा के बाद उनके इसी मकान में इसी जगह पर मैंने उनसे लिया था.इस विशेष बातचीत पर आधारित मेरा आलेख सांध्य दैनिक 'चैनल इंडिया' के 'साहित्य विशेष' में 10 फरवरी 2020 को प्रकाशित हुआ था -

 *ग़ज़ल इशारों की भाषा है। सूफ़ी नज़्मों और ग़ज़लों में भी इशारों -इशारों में रूहानी प्रेम के जरिए ईश्वर तक पहुँचने की बात होती है।  सूफ़ी एक स्वभाव का नाम  है । सूफ़ी रचनाओं का सार भी यही है कि ईश्वरीय प्रेम के लिए धरती पर इंसान और इंसान के बीच परस्पर प्रेम का रिश्ता हो । संगीत भी  मानव जीवन के लिए प्यार और शांति की भाषा है।  --यह कहना है छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध संगीत शिल्पी मदन सिंह चौहान का ,जिन्हें भारत सरकार ने इस वर्ष  2020 में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर  पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित करने की घोषणा की है। मार्च  के आख़िरी या अप्रैल के पहले हफ़्ते में नई दिल्ली में होने वाले जलसे में राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद 141 हस्तियों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित करेंगे । इनमें से 7 लोगों को पद्मविभूषण ,16 लोगों को पद्मभूषण और  श्री चौहान सहित   118 शख़्सियतों को  पद्मश्री अलंकरण से  नवाज़ने का ऐलान किया गया है।  उधर गणतंत्र दिवस के एक दिन पहले 25 जनवरी की शाम नई दिल्ली में यह ऐलान हुआ और इधर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के राजा तालाब मोहल्ले में श्री चौहान के घर पर उन्हें मुबारकबाद देने  उनके चाहने वालों का सैलाब उमड़ पड़ा।उन्हें बधाई देने कुछ दिनों बाद मैं भी  अपने कवि मित्र और श्रृंखला साहित्य मंच पिथौरा के अध्यक्ष प्रवीण प्रवाह के साथ  उनके घर पहुँचा। उन्होंने बड़ी आत्मीयता से हमारा स्वागत किया । मैंने उन्हें अपने काव्य संग्रह 'मेरे दिल की बात' की एक सौजन्य प्रति  भेंटकर उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट किया । अंतरंग बातचीत में श्री चौहान ने अपनी सुदीर्घ कला यात्रा के कई अनुभवों और स्मृतियों को हमारे साथ साझा किया ।

                                            


                                              पद्मश्री मदन चौहान से मेरी मुलाकात 5 फरवरी 2026 

    श्री मदन चौहान छत्तीसगढ़ के उन प्रतिभावान सितारों में से हैं ,जो अपने हुनर की रौशनी से देश और प्रदेश के  सांस्कृतिक आकाश को लगातार आलोकित कर रहे हैं । सहज ,सरल और सौम्य स्वभाव के श्री  चौहान  हिन्दी और  उर्दू  में गीत ,ग़ज़लों और भजनों के सुमधुर गायक के रूप में प्रसिद्ध हैं और सूफ़ी गायन में भी पूरे देश में उनकी ख्याति है। लेकिन 73 वर्षीय श्री चौहान ने  50 वर्षों से जारी अपनी संगीत साधना की शुरुआत छत्तीसगढ़ी लोक संगीत से की । उस दौर के मशहूर लोक गायक शेख हुसैन के साथ उन्होंने वर्षो तक  तबले पर संगत की। शेख हुसैन अक्सर अपने साथी सन्त मसीह दास के  लिखे गाने गाते थे। ये गाने छत्तीसगढ़ी लोक गीतों की एक लोकप्रिय विधा 'ददरिया ' के रूप में होते थे। वह रेडियो का ज़माना था और रायपुर में आकाशवाणी केन्द्र खुले दस साल से कुछ ज्यादा वक्त हो चुका था।  इस केन्द्र से छत्तीसगढ़ी लोक गीतों के फरमाइशी कार्यक्रमों में शेख हुसैन की मधुर आवाज़ में और मदन चौहान के तबला वादन के साथ प्रसारित संत मसीहदास के लोकगीतों ने पूरे छत्तीसगढ़ में तहलका  मचा दिया । इन गीतों की अपार लोकप्रियता की सबसे बड़ी वज़ह थी इनकी कर्णप्रियता और अपनी माटी  की सोंधी महक से भरपूर अपनी भाषा में लोक -जीवन की रंग -बिरंगी  अभिव्यक्ति । इनमें से 'चना के दार राजा ' 'गुल -गुल भजिया खा ले ' और 'मन के मनमोहनी " जैसे कई सदाबहार गीत सुनकर लोग आज भी झूम उठते हैं। उन दिनों लोक गीतों के कार्यक्रमों के प्रसारण के समय लोग अपने -अपने रेडियो सेट के सामने बड़ी तल्लीनता से  बैठे रहते थे। चाय और पान की दुकानों में ग्राहकों के साथ संगीत प्रेमी श्रोताओं की भीड़ लग जाती थी ।


आकाशवाणी रायपुर के अलावा  - विविध भारती से भी इन गीतों का प्रसारण यदाकदा  होता रहता है ।   इन लोक गीतों की असली मिठास को  तो हम इन्हें सुनकर ही महसूस कर सकते हैं ,फिर भी छत्तीसगढ़ी  लोक संगीत के रसिक जन  आज भी अक्सर इन्हें  गुनगुना उठते हैं ।जैसे यह लोकप्रिय ददरिया गीत -


"बटकी म बासी अऊ चुटकी म नून 

मंय गावत हौं ददरिया ,तयं कान देके सुन ...

ओ चना के दार ।

टुरा पर बुधिया ,होटल म भजिया झडक़त हे ओ ....!" 

आत्मीय बातचीत में मदन चौहान ने एक दिलचस्प संस्मरण भी  सुनाया । उन्होंने बताया- उन दिनों शेख हुसैन साहब की आवाज़ में एक और छत्तीसगढ़ी गीत काफी हिट  हुआ था ,जिसकी पंक्तियाँ थीं --

"एक पइसा के भाजी ल दू पइसा म बेचे गोई -बइठे .... बज़ार म " सब्जी विक्रेताओं के बीच यह गाना बहुत पसंद किया गया ।  इससे प्रभावित होकर  छुईखदान (जिला-राजनांदगांव ) के सब्जी विक्रेताओं ने शेख साहब को अपनी टीम के साथ कार्यक्रम पेश करने वहाँ आमंत्रित किया था। वहाँ सादगीपूर्ण ढंग से आयोजित कार्यक्रम में हम लोगों को दर्शकों और श्रोताओं का भरपूर  स्नेह मिला । वह हमारे लिए एक यादगार आयोजन था।

शेख हुसैन और संत मसीह दास अब इस दुनिया में नहीं हैं ,लेकिन अपने इन दोनों पुराने साथियों को याद करते हुए मदन चौहान बहुत भावुक हो जाते हैं।  यह पूछे जाने पर कि तबला वादन की ओर झुकाव कैसे हुआ ,चौहान जी अपनी यादों को खंगालते हुए बताते हैं कि बचपन में वनस्पति घी के खाली कनस्तरों को तबले की तरह बजाना उन्हें अच्छा लगता था। बाद में यही शौक उनको तबला वादन की ओर ले आया। कुछ स्थानीय आर्केस्ट्रा पार्टियों के साथ भी वह जुड़े रहे ।श्री  चौहान कहते हैं -  तबला  सीखने और तबला वादक के रूप में कामयाब होने में तीस साल लग गए। तबला वादन किसी भी गायन और संगीत का ज़रूरी हिस्सा होता है। 

 श्री चौहान आकाशवाणी रायपुर के मशहूर तबला वादक कन्हैयालाल भट्ट को अपना पहला  गुरु मानते हैं ,जिनसे उन्होंने इसका अनौपचारिक शास्त्रीय ज्ञान  हासिल किया । जयपुर के उस्ताद काले खां साहब उन दिनों कार्यक्रमों के सिलसिले में यहां आकाशवाणी आते -जाते थे।  तबला वादन की कई बारीकियां उनसे भी सीखी । भिलाई नगर के रतनचंद वर्मा से गायन कला का अनौपचारिक प्रशिक्षण लिया। श्री चौहान आकाशवाणी रायपुर के उस दौर के एक वरिष्ठ तबला वादक आशिक अली खां को भी याद करते हैं । वह कहते हैं -मैंने उनसे भी बहुत कुछ सीखा ।

मदन सिंह चौहान का जन्म  रायपुर के  राजा तालाब मोहल्ले में  15 अक्टूबर 1947 को  हुआ था । उनके पिता भिलाई इस्पात संयंत्र के कर्मचारी थे । रिटायर होने के बाद रायपुर में बस गए । मदन चौहान की पांचवीं तक की पढ़ाई  इसी राजा तालाब  मोहल्ले की प्राथमिक पाठशाला में हुई।  रायपुर के ही प्रतिष्ठित राष्ट्रीय विद्यालय में उन्होंने मिडिल और मेट्रिक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने मित्र शेख हुसैन के साथ उन्होंने कुछ दिनों तक ऑटो पार्ट्स की एक दुकान में नौकरी की । फिर कुछ समय स्थानीय श्यामनगर गुरुद्वारे में  120 रुपए मासिक मानदेय पर तबला वादक के रूप में गुरुवाणी के कार्यक्रमों में संगत करने लगे। शबद -कीर्तन  की रचनाओं का उन पर गहरा असर हुआ।यहीं से उनका झुकाव आध्यात्मिक संगीत की ओर हुआ। इस बीच स्थानीय नगर निगम द्वारा  संचालित निवेदिता कन्या हायर सेकेंडरी स्कूल में उन्हें वर्ष 1977 में तबला संगतकार के रूप में सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिल गयी ,जहाँ 32 वर्षो की लम्बी नौकरी के  बाद वर्ष 2009 में वह सेवानिवृत्त हो गए। 

    उन्होंने पुरानी यादों के झरोखे से  झाँकते हुए यह भी बताया कि   छत्तीसगढ़ी गीतों की लोकप्रिय गायिका श्रीमती निर्मला इंगले की प्रेरणा से   वह तबला वादन के साथ -साथ गायन में भी रुचि लेने लगे। आज  सुगम संगीत के मंजे हुए गायक कलाकारों में उनकी गिनती होती है। मदन चौहान की खनकदार मख़मली आवाज़ में  हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भजनों के अनेक एलबम जारी हो चुके हैं  । इनमें माँ दुर्गा की आराधना पर आधारित 'दयामयी दया करो ' शिरडी वाले साईं बाबा को समर्पित 'दो अक्षर का नाम साईं' और 'बच्चों पे रहम ' और गणेश वंदना 'गजानंद स्वामी ' शीर्षक से जारी म्यूज़िक एलबम भी शामिल हैं। उनकी आवाज़ में शिरडी के साईं बाबा पर केन्द्रित म्यूज़िक एलबम  'रहम नज़र करो अब मोर साईं ' भी काफी पसंद किया जा रहा है। भजन एलबमों में कई रचनाएँ चौहान जी द्वारा स्वयं लिखी गयी हैं। उर्दू में भक्ति गीतों का उनका एक म्यूज़िक एलबम  'आओ आओ नबी ' शीर्षक से आया है,जिसके गीतकार इसरार इलाहाबादी हैं। श्री चौहान के  भजनों के  कई एलबम छत्तीसगढ़ी में भी हैं।  छत्तीसगढ़ में  18 वीं सदी में हुए  महान समाज सुधारक बाबा गुरु घासीदास को समर्पित,  दिलीप पटेल का  लिखा पंथी गीत  'जगमग लागे अंजोर '  भी मदन चौहान की आवाज़ में काफी लोकप्रिय हो रहा  है। सूफ़ियाना रंगत की उनकी प्रस्तुतियां श्रोताओं का मन मोह लेती हैं । 

श्री चौहान  के अनेक  म्यूजिक एलबम, विभिन्न कार्यक्रमों में दी गयी प्रस्तुतियां और समय -समय पर  टेलीविजन चैनलों में दिए गए  इंटरव्यू आदि की रिकार्डिंग  यूट्यूब पर भी उपलब्ध है। उनकी आवाज़ में एक 'जस गीत' छत्तीसगढ़ी फीचर फ़िल्म ' तहुँ कंवारा - महुँ कुंवारी ' में भी शामिल किया गया है। श्री चौहान ने संत कबीर सहित अनेक प्राचीन कवियों की पारम्परिक  रचनाओं के अलावा नये दौर के कवियों और शायरों की रचनाओं को भी अपना स्वर और संगीत दिया है। उनकी धीर -गंभीर ,लेकिन मीठी आवाज़ में  उत्तरप्रदेश के वरिष्ठ कवि उदयभानु 'हंस'  की यह ग़ज़ल  किसी भी महफ़िल की रौनक और रंगत को और भी गाढ़ा कर देती  है ,जिसकी  कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं --


" कब तक यूं बहारों में पतझर का चलन होगा ,

कलियों की चिता होगी ,फूलों का हवन होगा ।

हर धर्म की रामायण कहती है ये युग -युग से ,

सोने का हिरन लोगे ,सीता का हरण होगा ।"

इस रचना के बारे में चौहान जी अपनी यादों को शेयर करते हुए एक दिलचस्प प्रसंग भी सुनाते हैं - -  वर्षों पहले पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर एक बार ओड़िशा जाते हुए कुछ समय रायपुर में रुके थे। उन दिनों वह प्रधानमंत्री के पद से त्यागपत्र दे चुके थे ।स्थानीय लोगों ने उनके सम्मान में एक आयोजन किया था  ,जहां उनके आग्रह पर मेरे द्वारा  उदयभानु ' हंस'  की यह रचना  अपनी आवाज़ में पेश की गयी । चंद्रशेखर जी इस रचना से इतने प्रभावित हुए कि वापसी में उन्होंने अपने एक सुरक्षा अधिकारी को मेरे पास भेजकर इसकी रिकार्डिंग मंगवाई । यह निश्चित रूप से  रचनाकार  और गायक के लिए सम्मान की बात थी। मजे की बात यह कि उदयभानु 'हंस' से श्री चौहान की कोई मुलाकात अब तक नहीं हुई है ,लेकिन उनकी इस ग़ज़ल ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वो इसे सुरों में सजाकर सांगीतिक आयोजनों में प्रस्तुत करने लगे ।पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्वर्गीय अरुण जेटली  भी रायपुर में एक बार  मदन चौहान  का कार्यक्रम देखकर उनसे काफी  प्रभावित हुए थे। 

 चौहान जी ने  रायपुर के स्थानीय शायर  अता रायपुरी की कई ग़ज़लों और नज़्मों को भी स्वर दिया है। जैसे अता की एक ग़ज़ल की इन पंक्तियों को देखिए -

"तमाशा मैं बन जाऊं  ये डर नहीं है ,

मेरा पाँव चादर से बाहर नहीं है ।

बहुत ऊँचे लोगों की बस्ती है लेकिन 

कोई मेरे कद के बराबर नहीं है।

अता को भी खुरच कर देखा है हमने 

कोई चेहरा चेहरे के ऊपर नहीं है ।

हमारी मोहब्बत बड़ी सीधी -सादी ,इ

इशारों -विशारों का चक्कर नहीं है।"

श्री चौहान ने  पिथौरा (जिला-महासमुन्द )के कवि   प्रवीण 'प्रवाह' की कई रचनाओं को भी अपनी आवाज़ दी है। राजधानी रायपुर के अनेक सरकारी और गैर सरकारी सामाजिक -सांस्कृतिक-धार्मिक  आयोजनों  में गीत -संगीत के प्रस्तुतिकरण के लिए मदन चौहान को सम्मानपूर्वक आमंत्रित किया जाता है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की जयंती और पुण्यतिथि पर होने वाली प्रार्थना सभाओं में भी वह सर्वधर्म समभाव पर आधारित भजन और गीत प्रस्तुत करते हैं।सूफ़ी गायन में बाबा बुल्ले शाह , बाबा फ़रीद ,अमीर ख़ुसरो  और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया और ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती  उनके मनपसंद शायर हैं।  छत्तीसगढ़ सरकार ने कला के क्षेत्र में  असाधारण योगदान के लिए मदन चौहान को वर्ष 2017 में राजा चक्रधर सिंह राज्य अलंकरण से सम्मानित किया था।  राजधानी रायपुर में आयोजित राज्य स्थापना दिवस समारोह 'राज्योत्सव' में मुख्य अतिथि की आसंदी से राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने उन्हें इस अलंकरण से नवाज़ा था ।  

सुगम संगीत के क्षेत्र में आज के अनेक नामचीन कलाकार श्री  मदन चौहान के शिष्य रह चुके हैं। इनमें  गायिका गरिमा दिवाकर और अभ्रदिता मोइत्रा जैसे कई मशहूर नाम शामिल हैं। अभ्रदिता पहले रायपुर में रहती थीं । वह अब  त्रिवेंद्रम(केरल )  में रहकर हिंदुस्तानी संगीत पर काम कर रही हैं । मध्यप्रदेश सरकार ने कुछ साल पहले अभ्रदिता को  'लता मंगेशकर पुरस्कार' से सम्मानित किया था। 

श्री चौहान कहते हैं - संगीत हर इंसान को  कुदरत की एक अनमोल देन है। गाना -गुनगुनाना  हर इंसान के स्वभाव में होता है। रियाज़ अथवा  अभ्यास से उसे निखारा जा सकता है। भारत में संगीत की वर्तमान स्थिति पर उनका विचार है कि इस कम्प्यूटर युग में नये कलाकारों के लिए पहले की तुलना में आज कहीं ज़्यादा व्यापक संभावनाएं हैं । हमारे समय में इस फील्ड में काफी चुनौतियाँ थीं ।  यह सुगम संगीत का दौर है ,लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शास्त्रीय संगीत ही इसकी बुनियाद है।  सुगम संगीत में आगे बढ़ने के लिए  शास्त्रीय संगीत की बारीकियों को  समझना  ज़रूरी है।   नये लोग जो इस क्षेत्र में आना चाहते हैं ,वे अगर संगीत को  पूजा अथवा इबादत के रूप में लें और मेहनत करें  तो उन्हें क़ामयाबी जरूर मिलेगी।

(यह बातचीत फरवरी 2020 में हुई थी )

-स्वराज्य करुण 

Thursday, January 29, 2026

(आयोजन ) साहित्य, कला और संस्कृति का अनोखा संगम /आलेख -स्वराज्य करुण

वाकई यह एक शानदार और यादगार आयोजन था. साहित्य, कला और संस्कृति के तीन दिवसीय आयोजन  *रायपुर साहित्य उत्सव 2026* के प्रथम दिवस पर मुझे भी अपनी कविता पढ़ने का अवसर मिला. नवा रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में आयोजित  साहित्य उत्सव में छत्तीसगढ़ के दिवंगत वरिष्ठ साहित्यकारों की स्मृति में अलग -अलग मंडप बनाए गए थे. इनमें से सुरजीत नवदीप स्मृति मंडप में पहले दिन 23 जनवरी की शाम महासमुन्द जिले के कवियों को काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था. महासमुन्द के अशोक शर्मा, बन्धु राजेश्वर खरे, प्रलय थिटे,श्रीमती साधना कसार और श्रीमती एस. चन्द्रसेन, बागबाहरा के हबीब समर, पिथौरा के प्रवीण प्रवाह, एफ. ए. नंद और मैंने काव्य पाठ किया. 

                                                  

                                                    






रायपुर साहित्य उत्सव 2026 वास्तव में साहित्य, कला और संस्कृति का एक अनोखा  सुन्दर, यादगार और शानदार संगम था,जहाँ छत्तीसगढ़ सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए साहित्यकारों और कलाकारों के बीच आत्मीय दुआ -सलाम और मेल -मिलाप के साथ परस्पर विचारों का आदान प्रदान भी हुआ.साहित्यकारों को अपनी वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए खुला मंच मिला. पुरखौती मुक्तांगन में तीन दिनों तक लेखकों, कवियों कलाकारों और साहित्यिक -सांस्कृतिक अभिरुचि वाले नागरिकों की भारी चहल -पहल रही. इससे पुरखौती मुक्तांगन की रौनक और भी ज़्यादा बढ़ गई.


                                     

                                            

छत्तीसगढ़ के साहित्यिक इतिहास में राज्य सरकार के जनसम्पर्क विभाग और छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी का यह तीन दिवसीय कार्यक्रम रायपुर साहित्य उत्सव 2026 एक यादगार आयोजन के रूप में दर्ज हो गया.विभाग ने सभी विधाओं के वरिष्ठ और कनिष्ठ, हर तरह के रचनाकारों को मंच प्रदान करने का सराहनीय प्रयास किया. पुस्तक मेले के रूप में कई प्रकाशकों के स्टाल भी लगाए गए थे, जिनमें प्रदेश के नये -पुराने साहित्यकारों की किताबें भी प्रदर्शित की गई थीं. कुछ पुस्तकों का विमोचन भी हुआ.

                                      यह भव्य और ऐतिहासिक आयोजन तीन दिनों की अपनी मधुर स्मृतियाँ देकर 25जनवरी को चला गया. साहित्य उत्सव के शानदार और सफल आयोजन के लिए  आयोजक संस्थाओं और उनकी पूरी टीम लिए तारीफ़ और बधाई ज़रूर बनती है, जिन्होंने साहित्यकारों और कलाकारों को अभिव्यक्ति का खुला आकाश दिया.मुझे छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय संत कवि स्वर्गीय पवन दीवान की एक बात अक्सर याद आती है. उन्होंने  एक बार मुझसे कहा था -"लेखकों और कवियों को साहित्यिक आयोजनों में यथासंभव ज़रूर जाना चाहिए, क्योंकि वहाँ जाने पर ही पता चलता है कि हमारी साहित्यिक बिरादरी कितनी विशाल है."  रायपुर साहित्य उत्सव 2026 में भी साहित्यिक बिरादरी के विराट स्वरूप की एक सुन्दर झलक देखने को मिली.

(यात्रा संस्मरण) डेढ़ हजार साल से भी ज़्यादा पुरानी हैं पाण्डव गुफाएँ / लेखक -स्वराज्य करुण

(आलेख -  स्वराज्य करुण ) 

मध्यप्रदेश में पहाड़ों की रानी के नाम से प्रसिद्ध पचमढ़ी का संबंध महाभारत काल और गुप्त काल से भी है. ऐसा बताया जाता है कि पचमढ़ी का नामकरण यहाँ सतपुड़ा पर्वत के एक हिस्से की पहाड़ी में निर्मित पाँच गुफाओं के आधार पर हुआ है, जो पाण्डव गुफा के नाम से प्रसिद्ध हैं.    लोगों की ऐसी धारणा है कि वनवास का कुछ समय पाण्डवों ने इन गुफाओं में गुज़ारा था.वहीं इन्हें गुप्त काल में यानी चौथी, पांचवी शताब्दी ईस्वी में निर्मित भी माना जाता है.  इस आधार पर कहा जा सकता है कि ये गुफाएँ डेढ़ हजार साल से भी अधिक पुरानी हैं

                                      

 

                                                पाण्डव गुफाओं की ओर जाते हुए पर्यटक 


मुझे जनवरी 2025 के आख़िरी दिनों में से एक दिन वहाँ जाने का अवसर मिला, लेकिन गुफाओं तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों की सुविधा होने के बावजूद थकावट की वजह से मैं  उन गुफाओं को देखने नहीं जा पाया और नीचे बने मनोरम उद्यान को और परिसर में लगे सूचना बोर्ड्स को देखकर ही अपनी जिज्ञासाओं को शांत करता रहा.गाइड ने बताया कि  उद्यान विभाग द्वारा एक पथरीली बंजर जमीन को बड़ी मेहनत से सींचकर इसे एक सुन्दर बगीचे के रूप में विकसित किया गया है. इसे 'पाण्डव उद्यान'नाम दिया गया है. वर्ष 1989 में स्थापित इस उद्यान में तरह -तरह के रंग बिरंगे फूलों के पौधे सबका मन मोह लेते हैं. 

   गुफाओं के नीचे परिसर में हिन्दी और अंग्रेजी में  सूचना फलक भी लगे हुए हैं.हिन्दी में अंकित विवरण में बताया गया है - 

   "यह इस क्षेत्र की प्रसिद्ध पाँच गुफाएं हैं, जिनके आधार पर ही पचमढ़ी नाम हुआ है. ऐसी धारणा है कि पाण्डवों ने अपने वनवास के दौरान यहाँ कुछ समय व्यतीत किया था. यह गुफाएं सामान्य विन्यास की हैं तथा कुछ में स्तंभ युक्त वरामदा निर्मित है. गुफा क्रमांक दो के सामने वाले भाग में साधारण चैत्य गवाक्ष आलेख देखा जा सकता है. गुफा क्रमांक तीन के कोष्ठ का प्रवेश द्वार शाखाओं से अलंकृत है. जिनके निचले भाग में लघु देव आकृतियाँ बनी हुई हैं. गुफा क्रमांक तीन में एक उत्कीर्ण अभिलेख है, जिस पर लिखा है कि उत्कीर्ण भगावकेण, अर्थात यह गुफा भगवक नामक व्यक्ति द्वारा बनाई गई थी, जो संभवतः एक भिक्षु था. इसके आधार पर इसका निर्माण गुप्त काल (चौथी या पांचवी शताब्दी ई. )में हुआ होगा. इसी आधार पर ये गुफाएं बौद्ध धर्म से संबंधित हो सकती हैं. इस पहाड़ी के ऊपरी भाग में पक्की ईटों द्वारा निर्मित पुरावशेष हैं. यह संभवतया किसी स्तूप से संबंधित रहे होंगे."

                                                     


                                                  पाण्डव गुफाओं के बारे में प्रदर्शित सूचना फलक 

    इन गुफाओं को भारत सरकार ने प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्विक स्थल  अवशेष अधिनियम 1958 के तहत राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक घोषित किया है. इस आशय का सूचना फलक भी वहाँ प्रदर्शित है, जिसमें यह चेतावनी भी लिखी हुई है कि यदि कोई भी इस स्मारक को क्षति पहुंचता, नष्ट करता, विलग अथवा परिवर्तित करता, कुरूप करता, खतरे में डालता या दुरूपयोग करते हुए पाया जाता है तो उसे इस अपकृत्य के लिए 3 महीने तक का कारावास या 5000 (पाँच हजार रूपये )तक जुर्माना अथवा दोनों से दण्डित किया जा सकता है.इनका संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण जबलपुर मंडल द्वारा किया जा रहा है.वहीं एक अन्य सूचना बोर्ड में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मंडल ने पर्यटकों से निवेदन किया है कि स्मारक के उन हिस्सों के ऊपर न चढ़ें, जो चढ़ने के लिए नहीं हैं. स्मारक परिसर में कचरा नियत स्थान पर ही फेंकें. वहीं इस बोर्ड में अधीक्षण, पुरातत्वविद भोपाल ने पर्यटकों से सुझाव एवं सम्मतियाँ भी आमंत्रित की  हैं.

   और भी कई अपेक्षाएं पर्यटकों से की गयी हैं.लेकिन गुफाओं को देखकर नीचे आने पर मेरे परिजनों ने मुझे बताया  कि कुछ पर्यटकों द्वारा सूचना फलकों पर अंकित चेतावनी और अपील की अनदेखी करते हुए ऊपर की गुफाओं में से एक गुफा में काफी गंदगी फैलाई गई है.शायद वह नकुल की गुफा है.

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Saturday, January 17, 2026

(आलेख ) अपने गाँव में अपनों के बीच अपनी किताब का विमोचन

 अपने गाँव में अपनों के बीच अपनों के  अपनी किताब विमोचन

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 मेरा वह गाँव अब एक छोटा शहर बन गया है, लेकिन है आज भी है वह गाँव जैसा ही,  जहाँ अधिकांश लोग एक -दूसरे को जानते, पहचानते हैं, जहाँ ग्रामीण परिवेश की हवाओं में आत्मीयता के सुरभित फूल खिलते और तैरते हैं, जिस गाँव में  मेरा बचपन बीता, जहाँ की गलियों की धूल -मिट्टी में मैं पला -बढ़ा, खेला -कूदा,जहाँ के खपैरेलों वाले स्कूल में मुझे अक्षर और शब्द ज्ञान मिला और जहाँ के अन्न जल से मेरा पालन -पोषण हुआ, वहाँ की पावन धरती पर पहली बार मेरी कविताओं की किताब का विमोचन अपनों के बीच, आत्मीय जनों की उपस्थिति में आत्मीय लोगों के हाथों हुआ, यह मेरे लिए एक सुखद और नया अनुभव रहा.  मेरी इच्छा थी कि विमोचन मेरे ही गाँव में हो. श्रृंखला साहित्य मंच के स्थापना के दिनों से ही यानी लगभग 37 वर्षों से मैं इस संस्था का सदस्य हूँ.मंच के साथियों  का भी यह स्नेहिल आग्रह था कि विमोचन पिथौरा में हो.उनके सहयोग से  6 जनवरी 2026 को मेरी 83 कविताओं के संग्रह 'दिलवालों का देश कहाँ ' का विमोचन समारोह सम्पन्न हुआ. यह पुस्तक तो लगभग पाँच महीने पहले अगस्त 2025 में भाई सुधीर शर्मा के सर्वप्रिय प्रकाशन (दिल्ली -रायपुर )में छपकर तैयार थी, लेकिन विमोचन का सुखद संयोग अब जाकर बना. 

                                                          


      

छत्तीसगढ़ के तहसील मुख्यालय पिथौरा (जिला -महासमुन्द )के अग्रसेन भवन में आयोजित इस सादगीपूर्ण समारोह में  वरिष्ठ साहित्यकार,भाषा -विज्ञानी और छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा वर्ष 2025 में पंडित सुन्दरलाल शर्मा राज्य अलंकरण से सम्मानित डॉ. चित्तरंजन कर ने मुख्य अतिथि की आसंदी से मेरी इस पुस्तक का विमोचन किया. स्थानीय अग्रसेन भवन में  आयोजित विमोचन समारोह की अध्यक्षता छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार और उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान से साहित्य भूषण सम्मान प्राप्त कवि, पत्रकार और लेखक गिरीश पंकज ने की. विशेष अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार और छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जन -जाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष जी. आर. राना और पिथौरा निवासी सुप्रसिद्ध कहानीकार तथा उपन्यासकार शिवशंकर पटनायक उपस्थित थे. यह इन साहित्यिक दिग्गजों का बड़प्पन था कि उन्होंने मुझ जैसे एक साधारण कवि के इस संग्रह की तारीफ़ की. उनका उदबोधन मेरे लिए आशीर्वाद स्वरूप रहा. मैं इन सभी दिग्गज साहित्यिक हस्तियों का और साहित्य मंच के अपने सभी सदस्य मित्रों का आभारी हूँ. उन सब स्नेही जनों, साहित्यिक मित्रों का भी आभार मानता हूँ, जो मेरे गाँव सहित अंचल के विभिन्न स्थानों से आकर समारोह में उपस्थित हुए और जिन्होंने मेरा उत्साह बढ़ाया. उन सभी की उपस्थिति से वह दिन यादगार बन गया.

                                        



                   किसी भी देश की असली छवि वहाँ के साहित्य में देखिए     -डॉ. चित्तरंजन कर 

          समारोह में मुख्य अतिथि डॉ. चित्तरंजन कर ने कहा  कि किसी भी देश की असली छवि अगर देखनी हो, तो वहाँ के साहित्य में देखिए. उन्होंने कहा कि साहित्य रचना कोई शौक नहीं, कोई मौज नहीं, कोई चाय की चुस्की नहीं, बल्कि एक चेतना है, वेदना है, संवेदना है, जो रचनाकार को लिखने के लिए प्रेरित करती है. साहित्यकार समाज रुपी शरीर का मुख है. वह समाज के दर्द को महसूस करके उसे अपने शब्दों से अभिव्यक्ति देता है.उन्होंने कहा कि समय के साथ  देश,  दुनिया में और समाज में परिवर्तन तो ठीक है, लेकिन मानवीय मूल्यों का जो विघटन हो रहा है, वह चिन्ताजनक है. उन्होंने कहा कि करुणा ही कविता रचती है.स्वराज्य करुण के कविता -संग्रह 'दिलवालों का देश कहाँ ' में संकलित उनकी कविताओं में इसे महसूस किया जा सकता है.इन कविताओं की हर पंक्ति सारगर्भित है.संग्रह की हर कविता में देशज भावनाएँ हैं और मानवीय संवेदनाएँ हैं.इनमें वैचारिक रूप से उदात्त भावनाएँ हैं.            

                                               


                                             समारोह को सम्बोधित करते हुए डॉ. चित्तरंजन कर 


कविताओं में संवेदनाओं के साथ 

                                               सामाजिक सरोकार भी ज़रूरी -गिरीश पंकज 

                   अध्यक्षीय आसंदी से राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार गिरीश पंकज ने कहा कि  कविताओं में मानवीय संवेदनाओं के साथ सामाजिक सरोकार का होना भी बहुत ज़रूरी है . ये दोनों विशेषताएँ स्वराज्य करुण की कविताओं में देखने  को मिलती हैं .स्वराज्य करुण के रचना -कर्म से मैं किसी न किसी रूप में विगत लगभग चालीस वर्षों से परिचित हूँ वे लोक मंगल, सामाजिक -सरोकार और लोक जागरण के कवि हैं.उनकी कविताओं में समाज का दर्द दिखाई देता है. उनके कविता -संग्रह 'दिलवालों का देश कहाँ ' का उल्लेख करते हुए गिरीश पंकज ने कहा -कवि चिंतित है कि धीरे -धीरे यह देश धन वालों का देश बनता जा रहा है. इसलिए दिलवालों का देश हाशिए पर चला गया है. कवि उस देश को हाशिए से राष्ट्र के केन्द्र में लाना चाहता है .इस संग्रह की कविताओं में रोमांस नहीं बल्कि समाज की पीड़ा की अभिव्यक्ति है. समाज में जो कुछ भी पीड़ादायक घटित हो रहा है, उसे यह कवि बेबाक तरीके से कहता है. कहीं कोई लुका छिपी नहीं. इसीलिए मुझे स्वराज्य करुण की काव्य -यात्रा शुरु से पसंद है.गिरीश पंकज ने कहा कि उनके इस संग्रह की कविताएँ हमें सोचने के लिए विवश करती हैं. इनमें गीत भी हैं और ग़ज़लें भी. सबसे अच्छी बात ये है कि ये सभी छंदबद्ध रचनाएँ हैं.

                                      

                                                समारोह को सम्बोधित करते हुए गिरीश पंकज 

गिरीश पंकज ने पिथौरा के एक अच्छे और सकारात्मक साहित्यिक वातावरण का उल्लेख करते हुए इसके लिए श्रृंखला साहित्य मंच की तारीफ़ की. उन्होंने कहा कि यहाँ के कवियों में और साहित्य प्रेमियों में कोई बनावटीपन नहीं, बल्कि  सहजता, सरलता और आत्मीयता है.इसलिए पिथौरा आना मुझे अच्छा लगता है.

                    

            खोए हुए गाँव की तरह खोए हुए 

             देश को भी खोजें-जी. आर. राना 

         विशेष अतिथि जी. आर. राना ने आज के समय में गाँवों की जीवन शैली में आ रहे निराशाजनक बदलाव पर चिन्ता प्रकट की. उन्होंने कहा कि बचपन में हम जिस बरगद की शाखाओं में खेलते और झूलते थे,, जो हमें शीतल छाया देती थीं, वे शाखाएँ 'बॉब कट ' की तरह कटती जा रही हैं अब ना तो कहीं दाऊ का बाड़ा है और न ही बरगद और पीपल छाँव. इसी संदर्भ में उन्होंने अपनी एक लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी कविता की भी पंक्तियाँ पढ़कर सुनाई -मोर गाँव गंवागे संगी, मय कहाँ रिपोर्ट लिखाँव?

जी. आर. राना ने कहा कि स्वराज्य करुण के कविता -संग्रह के शीर्षक 'दिलवालों का देश कहाँ ' में हमारे खोए हुए गाँव की तरह खोए हुए देश के लिए चिन्ता झलकती है. आइए, हम सब मिलकर उस देश को खोजें.

 विशेष अतिथि वरिष्ठ कहानीकार और उपन्यासकार शिवशंकर पटनायक ने भी कविता संग्रह की प्रशंसा की. महासमुन्द के कवि अशोक शर्मा ने संग्रह का उल्लेख करते हुए इस अवसर पर कहा कि साहित्यिक रचनाओं के शब्दों से समाज को ऊर्जा मिलती है. उन्होंने कहा कि साहित्य सदैव शाश्वत होता है.

                         कहाँ मिलेगा दिलवालों का देश?

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  मैंने अपने कविता -संग्रह की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला और कहा कि साहित्यिक रचनाएँ मानव हृदय की भावनाओं का प्रतिबिम्ब होती हैं.अपने कविता -संग्रह के शीर्षक *दिलवालों का देश कहाँ * का उल्लेख करते हुए  कहा - यह सवाल अक्सर मेरे मन -मस्तिष्क को विचलित करता रहता है कि आधुनिकता की तेज आँधी में दिनों -दिन बेदिल और बेरहम होते जा रहे इस संसार में,  स्नेह, ममता, दया और करुणा से भरे दिलवाले संवेदनशील इंसान कहाँ  मिलेंगे?यह प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है कि  दुनिया के नक्शे में  ऐसे दिलवाले इंसानों का देश कहाँ है, ऐसा कोई देश अगर कहीं है भी तो वह कहाँ मिलेगा ? अगर नहीं है तो क्या हमें अपने ही देश को दिलवालों का देश बनाने का प्रयास नहीं करना चाहिए? 

  विशेष अतिथि की आसंदी से शिवशंकर पटनायक  ने भी कविता संग्रह की प्रशंसा की. महासमुन्द के वरिष्ठ कवि अशोक शर्मा ने संग्रह का उल्लेख करते हुए इस अवसर पर कहा कि साहित्यिक रचनाओं के शब्दों से समाज को ऊर्जा मिलती है. उन्होंने कहा कि साहित्य सदैव शाश्वत होता है.प्रारंभ में स्वराज्य करुण ने अपने कविता -संग्रह की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला. 

                               


  स्वागत भाषण श्रृंखला साहित्य मंच के अध्यक्ष प्रवीण प्रवाह ने दिया.समारोह का संचालन साहित्य मंच के पूर्व अध्यक्ष उमेश दीक्षित ने किया.इस अवसर पर श्रृंखला साहित्य मंच के सचिव संतोष गुप्ता, पूर्व अध्यक्ष अनूप दीक्षित,वरिष्ठ सदस्य शशि कुमार डड़सेना,एफ. ए. नंद, माधव तिवारी, डॉ. जीतेश्वरी साहू, गुरप्रीत कौर सहित स्थानीय पत्रकार सर्व श्री मनोहर साहू, रजिन्दर खनूजा, जाकिर कुरैशी, नंदकिशोर अग्रवाल, राजेन्द्र सिन्हा और मनमीत छाबड़ा तथा पार्षद मन्नू ठाकुर भी उपस्थित थे. महासमुन्द के बन्धु राजेश्वर खरे, बागबाहरा के रुपेश तिवारी, धनराज साहू और हबीब समर, कोमाखान के डॉ.विजय शर्मा और किसान दीवान बसना के बद्री प्रसाद पुरोहित, अभनपुर के ब्लॉगर ललित शर्मा, सांकरा (जोंक )के जवाहर लाल नायक, रायपुर की श्रीमती माधुरी कर, पिथौरा के सर्वश्री मधुसूदन महान्ति, रितेश महान्ति, आकाश महान्ति, विवेक दीक्षित,गुरुचरण सिंह सलूजा,अनंत सिंह वर्मा,रमेश भोई, रमाशंकर पाण्डेय, श्रीमती सविता डे, श्रीमती सुप्रिया दास, नरेन्द्र जोशी,ग्राम खुटेरी के पूर्व सरपंच घनश्याम धांधी, सरायपाली के डॉ. पीतांबर साहू तथा बड़ी संख्या में आंचलिक साहित्यकारों और साहित्य प्रेमी नागरिकों की भी उत्साह जनक उपस्थिति रही. 

       समारोह के अंत में डॉ. चित्तरंजन कर ने इस कविता संग्रह के कुछ गीतों के साथ प्रवीण प्रवाह की एक ग़ज़ल को भी अपनी मधुर आवाज़ में संगीत के साथ प्रस्तुत किया .उनके साथ तबले पर सरायपाली के डॉ. प्रदीप साहू ने संगत की. आभार प्रदर्शन श्रृंखला साहित्य मंच के पूर्व अध्यक्ष अनूप दीक्षित ने किया.

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Monday, December 22, 2025

(समाचार ) एक साथ मनाई गई छत्तीसगढ़ की तीन महान विभूतियों की जयंती

 एक साथ मनाई गई छत्तीसगढ़ की तीन महान विभूतियों की जयंती 

            विचार-गोष्ठी का भी हुआ आयोजन

 छत्तीसगढ़ प्रदेश की तीन महान विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर राजधानी रायपुर के हाँडीपारा स्थित छत्तीसगढ़ी भवन में कल 21 दिसम्बर को स्थानीय प्रबुद्धजनों की विचार -गोष्ठी आयोजित की गई.इसमें वक्ताओं ने स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक जागरण के  कार्यों में  तीनों विभूतियों की ऐतिहासिक भूमिका को याद किया. इन विभूतियों में से छत्तीसगढ़ के गांधी के नाम से लोकप्रिय  पंडित सुन्दरलाल शर्मा का जन्म 21दिसम्बर 1881 को राजिम में और त्यागमूर्ति के नाम से प्रसिद्ध ठाकुर प्यारेलाल सिंह का जन्म 21दिसम्बर 1891 को ग्राम -दैहान (जिला -राजनांदगांव ) में हुआ था, जबकि संविधान सभा के सदस्य रहे,संविधान पुरुष के नाम से प्रसिद्ध घनश्याम सिंह गुप्त का जन्म 22दिसम्बर 1885 को दुर्ग में हुआ था. स्वतंत्रता संग्राम में भी तीनों विभूतियों की सक्रिय भूमिका थी.विचार -गोष्ठी में तीनों की जयंती  एक साथ मनाई गई.

     तीनों विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर इतिहासकार डॉ. के. के. अग्रवाल, वरिष्ठ रंगकर्मी और लेखक अरविन्द मिश्रा,  संस्कृति कर्मी अशोक तिवारी, साहित्यकार और पत्रकार स्वराज्य करुण और छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण सेनानी, किसान नेता और साप्ताहिक 'किसान वीर 'के सम्पादक  गोवर्धन प्रसाद चंद्राकर ने प्रकाश डाला.सर्वप्रथम तीनों विभूतियों के चित्र पर माल्यार्पण किया गया. लोकतंत्र सेनानी और राज्य निर्माण सेनानी जागेश्वर प्रसाद ने स्वागत भाषण देने के बाद कार्यक्रम का संचालन भी किया.उन्होंने ही आभार प्रदर्शन भी किया. राज्य निर्माण आंदोलनकारी संस्था छसपा द्वारा आयोजित इस विचार -गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए इतिहासकार डॉ. के. के. अग्रवाल ने  स्वतंत्रता संग्राम और अछूतोद्धार के लिए छत्तीसगढ़ में पंडित सुन्दरलाल शर्मा की ऐतिहासिक भूमिका का उल्लेख किया. डॉ. अग्रवाल ने कहा कि उस दौर में पंडित सुन्दरलाल शर्मा ने एक साथ तीन बड़े कार्य किए. उन्होंने समाज में जन -जागरण के लिए खण्ड -काव्य 'दानलीला ' सहित 18 ग्रंथों की रचना की.राष्ट्रीय विद्यालय का संचालन किया. स्वदेशी आंदोलन, किसान आंदोलन, जंगल सत्याग्रह और नहर सत्याग्रह में भी पंडित सुन्दरलाल शर्मा की महत्वपूर्ण भूमिका थी. वे छत्तीसगढ़ में   अछूतोद्धार आंदोलन के प्रणेता थे. स्वतंत्रता आंदोलन में  गिरफ्तार होकर उन्हें जेल में भी रहना पड़ा.                     

                                                              

                                        



त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह को याद करते हुए इतिहासकार डॉ. के. के. अग्रवाल ने कहा कि ठाकुर साहब ने वर्ष 1919 में राजनांदगाँव में  लगभग 36 दिनों तक चले छत्तीसगढ़ के प्रथम मज़दूर आंदोलन का नेतृत्व किया. यह आंदोलन उनकी अगुवाई में सूती कपड़ा मिल के मज़दूरों ने किया था.डॉ. अग्रवाल ने कहा कि त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह छत्तीसगढ़ के इस प्रथम मज़दूर आंदोलन के अग्रदूत और सहकारिता आंदोलन के भी पुरोधा थे.  छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा के लिए रायपुर में पहला कॉलेज उन्हीं के प्रयासों से छत्तीसगढ़ कॉलेज के नाम से शुरु हुआ. इसके लिए ठाकुर साहब की अध्यक्षता में 1937 में छत्तीसगढ़ एजुकेशन सोसायटी का गठन किया गया था.

   विचार -गोष्ठी में अरविन्द मिश्रा ने पंडित सुन्दर लाल शर्मा के सार्वजनिक जीवन के अनेक अनछुए प्रसंगों का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि पंडित सुन्दरलाल शर्मा ने अपने खण्ड -काव्य 'दानलीला 'में तत्कालीन समाज में व्याप्त शोषण के खिलाफ़ जन -जागरण का संदेश दिया था. दूध -दही और खेतों में पैदा होने वाली उपज का उपभोग अकेले कंस द्वारा किए जाने का प्रतीकात्मक  विरोध इस खण्ड काव्य में किया गया है,  तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत द्वारा भी भारत की जनता का तरह -तरह से शोषण किया जा रहा था, जिसका प्रतीकात्मक विरोध इस खण्ड काव्य में प्रकट होता है.

                                                       


   स्वराज्य करुण ने कहा कि तीनों विभूतियों  की जीवन यात्रा किसी महाकाव्य से कम नहीं है. ठाकुर साहब तत्कालीन मध्य प्रांत और बरार की विधानसभा सभा में वर्ष 1952 में रायपुर से विधायक निर्वाचित होकर पहुँचे थे और प्रतिपक्ष के नेता भी बनाए गए थे. त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह तीन बार क्रमशः वर्ष 1936,वर्ष 1940 और वर्ष 1944 में रायपुर नगरपालिका परिषद के निर्वाचित अध्यक्ष रहे और शहर के विकास के लिए अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ठाकुर साहब पत्रकार भी थे. उन्होंने  रायपुर में वर्ष 1950 से 1952 तक राष्ट्रबंधु 'नामक अर्ध -साप्ताहिक समाचार पत्र का सम्पादन और प्रकाशन किया, लेकिन विधायक बनने और नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के बाद अपनी व्यस्तता के कारण उन्हें इसका  प्रकाशन स्थगित करना पड़ा.सहकारिता आंदोलन में उनकी अग्रणी भूमिका को भी विचार -गोष्ठी में याद किया गया. 

घनश्याम सिंह गुप्त को याद करते हुए विचार -गोष्ठी में बताया गया कि गुप्त जी ने संविधान सभा के सदस्य के रूप में स्वतंत्र भारत के संविधान का हिन्दी अनुवाद तैयार करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था. वे भारतीय संविधान के हिन्दी रूपांतरण के लिए बनी समिति के अध्यक्ष भी थे.

अशोक तिवारी ने कहा कि ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने वर्ष 1950 के  दौर में आसाम प्रांत में पीढ़ियों से निवास कर रहे प्रवासी छत्तीसगढ़ियों को जमीन से बेदखल किए जाने की जानकारी मिलते ही तत्काल आसाम का दौरा किया और पचास दिनों तक वहाँ के गाँवों में घूम -घूम कर उनका दुःख -दर्द सुना और उनकी दिक्क़तों को दूर करने के लिए अपनी रिपोर्ट के साथ आसाम तथा तत्कालीन मध्य प्रांत और बरार की सरकारों के स्तर पर सक्रिय पहल की.

 राज्य निर्माण सेनानी गोवर्धन चंद्राकर ने कहा कि  आज़ादी के बाद देश में शिक्षा और संचार सुविधाओं का काफी विकास हुआ है लेकिन किसी न किसी रूप में सामाजिक -आर्थिक शोषण आज भी व्याप्त है. उच्च शिक्षा प्राप्त करके ऊँचे पदों पर पहुँचे अधिकांश लोग अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों से दूर हो गए हैं. गोवर्धन प्रसाद चंद्राकर ने कहा कि हमारी महान विभूतियों ने हमेशा अन्याय और शोषण के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करते हुए समाज को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया है. हमें उनके बताए रास्ते पर चलना होगा.विचार-गोष्ठी में उर्दू शायर सुखनवर हुसैन, छत्तीसगढ़ी गीतकार रामेश्वर शर्मा, रसिक बिहारी अवधिया सहित गोविन्द धनगर, संजीव साहू, डॉ. श्याम लाल साकार, परसराम तिवारी, प् शिवनारायण ताम्रकार,मिनेश चंद्राकर, रघुनंदन साहू, श्यामू राम सेन, गंगाराम साहू, आदर्श चंद्राकर, मुकेश टिकरिहा, हिमांशु चक्रवर्ती, आशाराम देवांगन, उमैर खान, डॉ. छगन लाल सोनवानी ऋतु महंत, रोहित चन्द्रवंशी और रामकुमार देवांगन  आदि उपस्थित थे.


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Sunday, December 21, 2025

( कीर्ति शेष ) अब कहाँ मिलते हैं ऐसे लोग ? /आलेख -स्वराज्य करुण

अब कहाँ मिलते हैं ऐसे लोग ?

ऐतिहासिक संयोग : आज दो महान विभूतियों की जयंती ; 

पंडित सुन्दर लाल शर्मा और त्याग मूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह को विनम्र नमन.

  (आलेख- स्वराज करुण )

भारत माता के पवित्र आँचल को  अनेक महान पुण्यात्माओं ने  अपने जन्म और कर्म से धन्य किया है। लेकिन अब कहाँ मिलते हैं ऐसे लोग ,जिन्होंने सादगीपूर्ण और महान उद्देश्यों से परिपूर्ण अपने सार्वजनिक जीवन से देश और दुनिया के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया है।  देश और समाज के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों की एक लम्बी सूची है।

  आज 21 दिसम्बर को भारत के छत्तीसगढ़ प्रदेश की ऐसी दो महान विभूतियों को याद करने का दिन है। यह एक ऐतिहासिक संयोग है कि दोनों का जन्म आज ही के दिन हुआ था। यहाँ के  सामाजिक ,सांस्कृतिक  साहित्यिक और राजनीतिक इतिहास में उनकी शानदार भूमिकाओं को भी आज याद करने का दिन है । यह एक यादगार  संयोग का दिन है .

पंडित सुन्दरलाल शर्मा और ठाकुर प्यारेलाल सिंह को उनकी जयंती पर विनम्र नमन करते हुए देश और समाज की बेहतरी के लिए उनके द्वारा किए गए कठिन संघर्षों को भी आज याद किया जाएगा।   स्वतंत्रता संग्राम , अछूतोद्धार , किसानों और मज़दूरों के कल्याण से सम्बंधित कार्यो में छत्तीसगढ़ के  दोनों महान सपूतों का  ऐतिहासिक योगदान अतुलनीय और अविस्मरणीय है।   दोनों की गरिमापूर्ण जीवन यात्रा में याद करने लायक अनेक महत्वपूर्ण प्रसंग हैं जिन्हें बहुत विस्तार से लिखा जा सकता है। इस आलेख में उनमें से कुछ  प्रसंगों का उल्लेख किया गया है।


                                                      


                                            पंडित सुन्दरलाल शर्मा -ठाकुर प्यारेलाल सिंह 


पंडित सुन्दरलाल शर्मा 

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  पंडित सुन्दरलाल शर्मा का जन्म तीर्थ नगरी राजिम में 21 दिसम्बर 1881 को हुआ था। उनका निधन 28 दिसम्बर 1940 को हुआ।  राजिम के पास चमसूर (चन्द्रसूर )उनका पैतृक गाँव है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा राजिम में हुई। घर पर ही उन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत ,बांग्ला ,ओड़िया , मराठी ,अंग्रेजी और उर्दू आदि भाषाओं का ज्ञान हासिल किया।। वह छत्तीसगढ़ी और हिन्दी के उच्च कोटि के साहित्यकार थे। किशोरावस्था से ही उनमें साहित्यिक रूझान विकसित होने लगा था। वर्ष 1898 में उनकी रचनाएं 'रसिक मित्र ' नामक पत्रिका में छपने लगी थी। उन्होंने पंडित विश्वनाथ दुबे के साथ मिलकर राजिम में 'कवि समाज ' के नाम से  साहित्यिक संस्था का भी गठन किया था।

  वर्ष 1906 में प्रकाशित शर्माजी की  कृति दानलीला ' को छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला प्रबंध -काव्य माना जाता है।  इसका दूसरा संस्करण वर्ष 1915 में प्रकाशित हुआ था। कवि होने के अलावा वह अच्छे लेखक भी थे। उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की थी।  वर्ष 1904 में उनका लिखा नाटक ' भक्त प्रह्लाद' भी काफी लोकप्रिय हुआ था। उन्होंने राजिम में वर्ष 1904 में सार्वजनिक वाचनालय की भी स्थापना की थी। राजिम से उन्होंने 'श्री राजीव प्रेम पीयूष ' नामक पत्रिका की भी शुरुआत की थी ,तब उनकी आयु मात्र 17 वर्ष थी। अपने निधन से कुछ पहले वर्ष 1940 में उन्होंने 'दुलरुआ ' नामक पत्रिका का प्रकाशन भी शुरू किया था।पंडित सुन्दरलाल शर्मा ने  तत्कालीन समाज में अछूत समझी जाने वाली जातियों के लोगों में स्वाभिमान जगाने के साथ -साथ राजिम में मंदिर प्रवेश का अधिकार दिलाया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक वर्ष की जेल हुई तो जेल से ही 'श्रीकृष्ण जन्म स्थान ' शीर्षक से हस्तलिखित पत्रिका निकालते रहे। वर्तमान धमतरी जिले के कण्डेल में वर्ष 1920 में बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव के नेतृत्व में किसानों का नहर सत्याग्रह हुआ।,जिसमें शामिल होने के लिए सत्याग्रहियों ने महात्मा गाँधी को आमंत्रित किया। 

  किसानों की ओर से पंडित सुन्दरलाल शर्मा   कोलकाता से 20 दिसम्बर 1920 को महात्मा जी को रायपुर लेकर आए। यह महात्मा गाँधी की पहली छत्तीसगढ़ यात्रा थी।  नगरी -सिहावा में हुए आदिवासियों के जंगल सत्याग्रह में भी पंडित सुन्दरलाल शर्मा ने  सक्रिय सहयोग दिया। इस आंदोलन में वह गिरफ्तार भी हुए।  

भारत सरकार ने वर्ष 1990 में शर्माजी के सम्मान में विशेष आवरण और डाक टिकट भी जारी किया। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद उनके नाम पर बिलासपुर में ओपन यूनिवर्सिटी की स्थापना की गयी। उनके नाम पर साहित्य के क्षेत्र में राज्य अलंकरण भी घोषित किया गया ,जो हर साल एक चयनित साहित्यकार को राज्योत्सव के अवसर पर प्रदान किया जाता है।

             ठाकुर प्यारेलाल सिंह 

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         त्यागमूर्ति के नाम से लोकप्रिय समाजवादी चिन्तक और श्रमिक नेता ठाकुर प्यारेलाल सिंह तीन बार ,क्रमशः  वर्ष 1936 , 1940 और 1944 में रायपुर नगरपालिका परिषद के निर्वाचित अध्यक्ष रहे। । रायपुर से ही उन्होंने चार सितम्बर 1950 को अर्ध साप्ताहिक समाचार पत्र 'राष्ट्रबन्धु ' का सम्पादन और प्रकाशन शुरू किया था।  उनका जन्म 21 दिसम्बर 1891 को राजनांदगांव के पास ग्राम दैहान में हुआ था। विनोबा जी के सर्वोदय आंदोलन में भूदान यज्ञ की  पदयात्रा के दौरान ठाकुर साहब का निधन जबलपुर  में 20 अक्टूबर 1954 को हुआ। ठाकुर साहब की मिडिल स्कूल तक पढ़ाई राजनांदगांव में हुई। उन्होंने रायपुर के शासकीय हाई स्कूल (वर्तमान में जे.एन. पाण्डेय शासकीय बहुउद्देश्यीय उच्चतर माध्यमिक शाला ) से मेट्रिक उत्तीर्ण होने के बाद हिस्लाप कॉलेज नागपुर और जबलपुर से बी.ए. और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वकालत की शिक्षा प्राप्त की थी। 

 उनके निधन के लगभग 9 वर्ष बाद विनोबा जी ने रायपुर प्रवास के दौरान ठाकुर साहब की जयंती पर 21 दिसम्बर 1963 को छत्तीसगढ़ बुनकर सहकारी संघ के कार्यालय के सामने  उनकी प्रतिमा का अनावरण किया था।  यह प्रतिमा त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह स्मारक -समिति द्वारा स्थापित की गयी थी। उल्लेखनीय है कि ठाकुर प्यारेलाल सिंह छत्तीसगढ़ में सहकारिता आंदोलन के भी प्रमुख नेता थे । बुनकरों की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए बुनकर सहकारी संघ का गठन 5 जुलाई 1945 को  उनके द्वारा किया गया था। 

       ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने  छत्तीसगढ़ में सहकारिता आंदोलन के विस्तार के लिए और भी कई सहकारी समितियों का गठन किया । इनमें उपभोक्ता सहकारी संघ , मध्यप्रदेश पीतल धातु निर्माता सहकारी संघ ,स्वर्णकार सहकारी संघ ,विश्वकर्मा औद्योगिक सहकारी संघ आदि उल्लेखनीय हैं। श्रमिक नेता के रूप में उनकी ऐतिहासिक भूमिका को आज भी याद किया जाता है। 

   *छत्तीसगढ़ कॉलेज की स्थापना -ठाकुर प्यारेलाल सिंह की अध्यक्षता में वर्ष 1937 में छत्तीसगढ़ एजुकेशन सोसायटी का गठन हुआ। सोसायटी द्वारा उन्हीं दिनों रायपुर में छत्तीसगढ़ कॉलेज की स्थापना की गयी ,जो इस अंचल का पहला कॉलेज था। जे.योगनन्दम इस कॉलेज के प्रथम प्राचार्य थे। ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने वर्ष 1920 में राजनांदगांव में राष्ट्रीय विद्यालय की भी स्थापना की थी।

   उन्होंने वर्ष 1916 में राजनांदगांव स्थित बी.एन. सी.मिल (बंगाल -नागपुर कॉटन मिल ) में श्रमिकों की 37 दिनों की हड़ताल का नेतृत्व किया था। यह सबसे लम्बे समय तक चली भारत की पहली औद्योगिक हड़ताल थी । काम के घंटों में कमी और वेतन वृद्धि की मांग को लेकर यह आंदोलन हुआ था,जो काफी कामयाब रहा। व्ही. व्ही. गिरि जो आज़ादी के बाद भारत के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए, स्वयं इस आंदोलन में श्रमिकों का मनोबल बढ़ाने राजनांदगांव आए थे. बाद में ठाकुर साहब ने  वर्ष 1924 और 1936 में भी राजनांदगांव में श्रमिक आंदोलनों का नेतृत्व किया। वह वर्ष 1917 से 1936 तक ,19 वर्ष राजनांदगांव के मिल मजदूर संघ के सर्वमान्य अध्यक्ष रहे। वर्ष 1936 में ही वह मध्य प्रान्त और बरार (सी.पी.एंड बरार) की विधान सभा के लिए रायपुर से विधायक निर्वाचित हुए।उन दिनों मध्य प्रान्त की राजधानी नागपुर में हुआ करती थी। कुछ दिनों तक वह मध्य प्रांत की सरकार के शिक्षा मंत्री भी रहे।

  आसाम के चाय बागानों में कार्यरत छत्तीसगढ़ के प्रवासी श्रमिकों की समस्याओं के बारे में ख़बर मिलते ही उन्होंने वर्ष 1950 में वहाँ जाकर 50 दिनों तक गाँवों का सघन दौरा किया। कई गाँवों में पैदल घूमे। वहाँ से लौटकर तत्कालीन सी.पी.एंड बरार (सेंट्रल प्रॉविंस एंड बरार ) शासन को अपनी रिपोर्ट सौंपी और श्रमिकों को विस्थापित होने से बचाया।।

    स्वतंत्र भारत में लोकसभा और विधान सभाओं का  पहला आम चुनाव 1952 में हुआ। ठाकुर प्यारेलाल सिंह कृषक मजदूर प्रजा पार्टी के टिकट पर रायपुर से भारी बहुमत से विधान सभा के सदस्य चुने गए। उन्हें विधान सभा का नेता प्रतिपक्ष भी बनाया गया। स्वतंत्रता आंदोलन में  ठाकुर प्यारेलाल सिंह का ऐतिहासिक योगदान रहा। उन्होंने 26 जनवरी 1932 को रायपुर के गांधी चौक मैदान में पंडित रविशंकर शुक्ल की अध्यक्षता में आयोजित आयोजित आम सभा में ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ उत्तेजक भाषण दिया ।इस पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया ।उन्हें जुर्माने का साथ दो साल की सजा हुई। स्वाभिमानी ठाकुर साहब ने जुर्माना नहीं दिया । इस पर सरकार ने उनकी चल  सम्पत्ति कुर्क कर ली। उनकी वकालत का लाइसेंस भी जब्त कर लिया गया। इसे उन्होंने कभी वापस नहीं लिया। 

   वर्ष 1930 में भूमि बंदोबस्त को लेकर किसानों में अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ़ गुस्सा फूट पड़ा था। तब ठाकुर साहब  ने  गाँवों का दौरा किया और किसानों को एक जुट कर 'पट्टा मत लो -लगान मत दो ' आंदोलन चलाया।  उन्होंने वर्ष 1930 -31 में सिहावा के प्रसिद्ध जंगल सत्याग्रह में भी हिस्सा लिया।  गाँधीजी के आव्हान पर वर्ष 1942 में ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ देशव्यापी 'भारत छोड़ो आंदोलन ' में भी  छत्तीसगढ़ में ठाकुर साहब की सक्रिय भूमिका थी। इस आंदोलन में उनके दो बेटे ठाकुर रामकृष्ण सिंह और ठाकुर सच्चिदानंद सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार का लिया। ठाकुर प्यारेलाल सिंह भूमिगत रहकर आंदोलन का संचालन करते रहे। 

    ठाकुर साहब उन दिनों रायपुर के हांडी पारा स्थित राजनांदगांव बाड़ा में रहते थे। उनका मकान भूमिगत आंदोलनकारियों की राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र था। वहीं से आज़ादी के आंदोलन के प्रचार प्रसार के लिए ठाकुर साहब द्वारा हस्तलिखित सायक्लोस्टाइल्ड पर्चे निकाले जाते थे।उनके तीसरे पुत्र हरिनारायण सिंह ठाकुर (हरि ठाकुर )भी स्वतंत्रता के इस आंदोलन में सक्रिय थे  । उन्होंने भूमिगत रहकर आंदोलन को अपना भरपूर सहयोग दिया। 

  छत्तीसगढ़ सरकार ने ठाकुर प्यारेलाल सिंह के सम्मान में सहकारिता के क्षेत्र में राज्य अलंकरण की स्थापना की है ,जो हर साल राज्योत्सव के मौके पर चयनित व्यक्ति अथवा संस्था को प्रदान किया जाता है। राजधानी रायपुर के पास ग्राम निमोरा स्थित प्रदेश सरकार के पंचायत एवं ग्रामीण विकास संस्थान का नामकरण भी ठाकुर प्यारेलाल सिंह के नाम पर किया गया है।

  आलेख  -स्वराज्य करुण 

Wednesday, December 17, 2025

लाला जगदलपुरी ; तिरानवे साल की ज़िन्दगी में 77 साल की सुदीर्घ साहित्य -साधना /आलेख -स्वराज्य करुण

 साहित्य महर्षि लाला जगदलपुरी की आज 17 दिसम्बर को 105वीं जयंती 

तिरानवे साल की ज़िन्दगी में 77साल की सुदीर्घ साहित्य -साधना

(आलेख -  स्वराज्य करुण )

 जिन्होंने 93 साल की अपनी जीवन -यात्रा के 77साल साहित्य -साधना में लगा दिए,ऐसे समर्पित साहित्य महर्षि लाला जगदलपुरी की आज 17 दिसम्बर 2025 को 105वीं जयंती है. उन्हें विनम्र नमन । हिन्दी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर तो वह थे ही, छत्तीसगढ़ और बस्तर के लोक साहित्य के  भी मर्मज्ञ थे। उन्होंने अपनी सुदीर्घ साहित्य साधना से छत्तीसगढ़ और बस्तर के वनांचल को देश और दुनिया में साहित्यिक और सांस्कृतिक पहचान दिलाने का श्रम-साध्य कार्य समर्पित भाव से किया।  उनके जगदलपुर शहर को देश और दुनिया में साहित्यिक पहचान भी उनके नाम  से मिली ।

 अफ़सोस कि उनकी तकरीबन पौन सदी से भी अधिक लम्बी  साहित्य- साधना विगत 14 अगस्त 2013 को अचानक हमेशा के लिए थम गयी ,जब अपने गृहनगर जगदलपुर में उनका देहावसान हो गया। इसी जगदलपुर में उनका जन्म 17 दिसम्बर 1920 को हुआ था।   उन्होंने ऋषि -तुल्य सादगीपूर्ण  जीवन जिया । धोती और कुर्ता उनका लिबास था । हर शाम वह अपने गृह नगर में पैदल घूमते और स्थानीय लोगों और साहित्यकारों से मिलते थे । उन दिनों उर्दू शायर ग़नी आमीपुरी भी जीवित थे, जिनकी ड्रायक्लिनिंग की छोटी -सी दुकान में वह अक्सर आते और बैठा करते थे। कुछ स्थानीय कवि भी लालाजी और ग़नी जी से मिलने वहाँ आ जाते थे ।

                                                              


लाला जगदलपुरी एक समर्पित साहित्य साधक थे। उन्हें तपस्वी साहित्य महर्षि भी कहा जा सकता है । वह पत्रकार भी थे। उन्होंने स्वर्गीय तुषार कांति बोस द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक 'बस्तरिया' का कई वर्षों तक सम्पादन किया, जो हल्बी लोकभाषा का पहला साप्ताहिक समाचार पत्र था ।वर्ष 2020 में उनके सौवें जन्म वर्ष के उपलक्ष्य में  जगदलपुर स्थित शासकीय जिला ग्रंथालय का नामकरण उनके नाम किया गया। उनके सम्मान में  यह निश्चित रूप से यह एक  स्वागत योग्य निर्णय था।   यह  ग्रंथालय जगदलपुर के शासकीय बहुउद्देश्यीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय परिसर में स्थित है।  लाला जी को छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर राजधानी रायपुर में आयोजित राज्योत्सव 2004 में प्रदेश सरकार की ओर से *पंडित सुन्दरलाल शर्मा साहित्य सम्मान*  से नवाजा गया था। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने उन्हें और बिलासपुर के वरिष्ठ साहित्यकार पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी को संयुक्त रूप से यह सम्मान प्रदान किया था।

   लाला जगदलपुरी ने हिन्दी और छत्तीसगढ़ी सहित बस्तर अंचल की हल्बी और भतरी लोकभाषाओं में भी साहित्य सृजन किया। उनकी प्रमुख हिन्दी पुस्तकों में वर्ष 1983 में प्रकाशित  ग़ज़ल संग्रह 'मिमियाती ज़िन्दगी दहाड़ते परिवेश '  वर्ष 1992 में प्रकाशित काव्य संग्रह 'पड़ाव ',वर्ष 2005 में प्रकाशित आंचलिक कविताएं और वर्ष 2011 में प्रकाशित ज़िन्दगी के लिए जूझती गज़लें तथा गीत धन्वा शामिल हैं। मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ कि मुझे भी उनका स्नेह और सानिध्य मिला था और उनके द्वारा सम्पादित तथा  वर्ष 1986 में प्रकाशित छत्तीसगढ़ के  चार कवियों  के सहयोगी काव्य संग्रह 'हमसफ़र 'में उन्होंने मेरी कविताओं को भी शामिल किया था । संकलन में  बहादुर लाल तिवारी , लक्ष्मीनारायण पयोधि और ग़नी आमीपुरी की भी  हिन्दी कविताएं शामिल हैं। 

   मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी भोपाल  द्वारा वर्ष 1994 में प्रकाशित लाला जगदलपुरी की पुस्तक 'बस्तर : इतिहास एवं संस्कृति ' ने छत्तीसगढ़ के इस आदिवासी अंचल पर केन्द्रित एक प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ के रूप में काफी प्रशंसा अर्जित की। वर्ष 2007 में इस ग्रंथ का तीसरा संस्करण प्रकाशित किया गया। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर हरिहर वैष्णव द्वारा सम्पादित एक महत्वपूर्ण पुस्तक " लाला जगदलपुरी समग्र ' का भी प्रकाशन हो चुका है। उनकी हिन्दी ग़ज़लों का संकलन 'मिमियाती ज़िंदगी दहाड़ते परिवेश ', शीर्षक से आंदोलन प्रकाशन जगदलपुर के भरत बेचैन द्वारा वर्ष 1983 में प्रकाशित किया गया था। इसमें शामिल उनकी एक ग़ज़ल इस प्रकार है -


*दुर्जनता की पीठ ठोंकता 

सज्जन कितना बदल गया है !

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दहकन का अहसास कराता,

चंदन कितना बदल गया है , 

मेरा चेहरा मुझे डराता, 

दरपन कितना बदल गया है !

आँखों ही आँखों में  सूख गई 

हरियाली अंतर्मन की ,

कौन करे विश्वास कि मेरा 

सावन कितना बदल गया है !

पाँवों के नीचे से खिसक-खिसक 

जाता सा बात-बात में ,

मेरे तुलसी के बिरवे का 

आँगन कितना बदल गया है ! 

भाग रहे हैं लोग मृत्यु के 

पीछे-पीछे बिना बुलाए,

जिजीविषा से अलग-थलग 

यह जीवन कितना बदल गया है !

प्रोत्साहन की नई दिशा में 

देख रहा हूँ, सोच रहा हूँ ,

दुर्जनता की पीठ ठोंकता

 सज्जन कितना बदल गया है !

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हमारी आज की दुनिया ,आज की समाज व्यवस्था और हमारे आस -पास के आज के वातावरण का वर्णन करती इस ग़ज़ल की हर पंक्ति अपने -आप में बहुत स्पष्ट है। यह ग़ज़ल सकेतों ही संकेतों में हमें बहुत कुछ कह रही है।  

छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी रायपुर द्वारा लाला जी की  पुस्तक 'बस्तर की लोकोक्तियाँ ' वर्ष 2008 में प्रकाशित की गयी। उनकी हल्बी लोक कथाओं का संकलन लोक चेतना प्रकाशन जबलपुर द्वारा वर्ष 1972 में प्रकाशित किया गया। लाला जी ने प्रेमचंद की प्रमुख कहानियों का  भी हल्बी में अनुवाद किया था । यह अनुवाद संकलन 'प्रेमचंद चो बारा कहनी ' शीर्षक से वर्ष 1984 में वन्या प्रकाशन भोपाल ने प्रकाशित किया था।   

                  मरणोपरांत छपी पाँच किताबें 

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 लालाजी के मरणोपरांत उनकी पाँच किताबों का प्रकाशन हुआ है । घर पर उनकी बिखरी पड़ी रचनाओं को सहेजने और सम्पादित कर पुस्तक रूप में प्रकाशित करवाने का सराहनीय कार्य उनके अनुज स्वर्गीय केशव लाल श्रीवास्तव के सुपुत्र विनय कुमार श्रीवास्तव ने किया है ।हाल के वर्षों में विनय जी के सम्पादन में   लाला जी की पाँच किताबें छप चुकी हैं। ये हैं (1) छोटी -छोटी कविताओं का संकलन बूँद -बूँद सागर  (2) बिखरे मोती ( 3)  आंचलिक कविताएँ :समग्र '  (4) बच्चों की कविताओं का संकलन 'बाबा की भेंट ' और (5) अप्रकाशित गद्यात्मक रचनाओं का संकलन 'बस्तर माटी की गूँज

।  इनमें से पाँचवे संकलन 'बस्तर माटी की गूँज' का सम्पादन विनय जी के साथ उनकी छोटी बहन  डॉ. आभा श्रीवास्तव ने भी किया है । साहित्य महर्षि लाला जगदलपुरी को विनम्र नमन ।

   आलेख -स्वराज्य करुण