सौ से ज़्यादा कवियों का यादगार संग्रह ; 'राजनांदगांव 77'
(लेखक -स्वराज्य करुण )
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आज से कुछ दशक पहले कवियों में साझा कविता -संग्रह छपवाने का उत्साह हुआ करता था, अभिव्यक्ति की चाहत लिए रचनाकार परस्पर सहयोग से संयुक्त काव्य -संग्रह छपवा लिया करते थे. उनकी स्थानीय साहित्यिक संस्थाओं की भी इसमें सक्रिय भूमिका रहती थी. प्रकाशन के लिए स्थानीय नागरिकों और छोटे -बड़े दुकानदारों से आग्रह करने पर कुछ आर्थिक सहयोग भी मिल जाता था,लेकिन लगता है कि वह बात अब नहीं रह गई है. संयुक्त काव्य संग्रह छपवाने में कवियों की दिलचस्पी कम होती जा रही है. इस घटती दिलचस्पी के कई कारण हो सकते हैं. उन कारणों पर जाए बिना आज मैं छत्तीसगढ़ की साहित्यिक संस्कारधानी राजनांदगांव से लगभग 49 साल पहले प्रकाशित एक साझा कविता -संग्रह की चर्चा करना चाहूंगा, जो 'राजनांदगांव 77' के नाम से वर्ष 1977 -78 में प्रकाशित हुआ था.इसके प्रकाशक के रूप में किसी साहित्यिक संस्था का नाम नहीं है, बल्कि 'सम्पादक मंडल ' लिखा हुआ है. छत्तीसगढ़ में उन दिनों कम्प्यूटर आधारित छपाई मशीनों का चलन व्यापक रूप से नहीं हुआ था. इसी वजह से सहयोगी कविता -संग्रह 'राजनांदगांव 77 ' की छपाई हैण्ड कम्पोजिंग से ट्रेडल मशीन पर वहाँ के ब्राम्हण पारा स्थित चेतना प्रिंटर्स द्वारा की गई थी.
इसमें तत्कालीन राजनांदगांव जिले के लगभग 130 कवियों की रचनाएँ शामिल हैं.यह जिला वर्ष 2022 में तीन जिलों में बँट गया है - (1) राजनांदगांव (2) मोहला -मानपुर -अम्बागढ़ चौकी और (3) खैरागढ़-छुईखदान -गंडई.हिन्दी साहित्य की दुनिया में सभी जानते हैं कि राजनांदगांव जिला देश के तीन दिग्गज साहित्यकारों -पदुम लाल पुन्नालाल बख्शी, डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र और गजानन माधव मुक्तिबोध की कर्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध है. बख्शी जी और मिश्रजी का जन्म इसी जिले में हुआ था. मुक्तिबोध जी कुछ वर्षों तक राजनांदगांव के कॉलेज में प्राध्यापक रहे.साझा काव्य संग्रह 'राजनांदगांव 77' के सम्पादक थे सर्वश्री सरोज द्विवेदी, रमेश वर्मा 'सरस' और संजय यादव. सम्पादक मंडल में शामिल थे -सर्वश्री राजेश तिवारी, जीवन यदु 'राही ', गणेश शरण सोनी 'प्रतीक ', सुरेश अतीत, हरजीत एस. राजा, गनपत दुबे, रमाकांत शर्मा, मोहन अग्रहरि और कृष्ण कुमार नायक.
इसमें इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के तत्कालीन उप कुलपति श्री अरुण कुमार सेन ने संकलन के सम्पादक मंडल के सदस्य श्री सरोज द्विवेदी को सम्बोधित शुभकामना संदेश में लिखा है -"आपका 25 -10 -77 का पत्र प्राप्त हुआ.यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि राजनांदगांव जिले के समस्त कवियों की कविताओं का एक संकलन प्रकाशित करने की योजना आप लोगों ने तैयार की है".डॉ. सेन के अलावा इसमें राजनांदगांव के तत्कालीन सांसद मदन तिवारी, मध्यप्रदेश की तत्कालीन जनता पार्टी सरकार के मंत्रियों पवन दीवान और दरबार सिंह, तत्कालीन राजनांदगांव कलेक्टर एम. के. सक्सेना, छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार, धमतरी निवासी नारायण लाल परमार, राजनांदगांव के तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी जी. एल . जोशी और वाराणसी के मुकुन्दी लाल श्रीवास्तव के शुभकामना संदेश भी इसमें प्रकाशित हैं.
छत्तीसगढ़ के संत कवि पवन दीवान उन दिनों राजिम से विधायक निर्वाचित होकर मध्यप्रदेश सरकार के जेल मंत्री थे. उन्होंने शुभकामना संदेश में लिखा था -" राजनांदगांव 77का प्रकाशन एक सुखद कदम है. इस नगर को मैं साहित्य का एक इतिहास और इतिहास का साहित्य मानता हूँ.सर्वश्री बख्शी जी, मिश्रजी एवं मुक्तिबोध जी के त्रिकाल जयी संघर्ष को आप अपने संकलन में सार्थकता देंगे, यह निश्चित है . "
नारायण लाल परमार ने अपने संदेश में लिखा -"राजनांदगांव 77 की योजना कुछ इस तरह भा गई है कि मैं चाहता हूँ कि सम्पूर्ण प्रदेश में ऐसे आत्म विश्वासी कदम उठें. राजनांदगांव तो छत्तीसगढ़ अंचल की संस्कारधानी है. राजनांदगांव 77के माध्यम से जन सामान्य को साहित्य में तब से अब तक की सम्पूर्ण यात्रा का आस्वाद मिले, ऐसी कामना है."
इस काव्य -संग्रह की भूमिका लिखी थी वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार शरद कोठारी ने, जो राजनांदगांव के साप्ताहिक और आगे चलकर दैनिक हुए 'सवेरा संकेत' के सम्पादक रह चुके थे . उन्होंने लिखा -"अक्सर मित्रों के प्रति अति प्रेम या उपेक्षित साहित्यकारों द्वारा संयुक्त रूप से आत्म ज्ञापन की भावना से काव्य -संग्रह प्रकाशित होते हैं, जिसमें रचना का स्तर सबसे पहला शिकार होता है. आलोच्य काव्य संग्रह में जिन तरुण कवियों को संकलित किया गया है, वे नई कविता की सृजनात्मक प्रतिभा सिद्ध होंगी, इसमें संदेह नहीं. " अपनी भूमिका में कोठारी जी ने आगे लिखा है -प्रस्तुत काव्य संग्रह के कतिपय कवियों को व्यक्तिगत रूप से जानने -पहिचानने का संयोग मुझे प्राप्त हुआ है. इनकी सृजनmशीलता से भी परिचित हूँ, तथा उनकी रचनाओं को यदकदा छापने का अवसर भी मिला है. इस संकलन में वे ज़रा भिन्न रूप में सामने आ रहे हैं. साहित्य जगत का एक कार्यकर्ता होने के नाते मैं उनका अभिनंदन करता हूँ. मैं इस समय संकलित रचनाओं के बारे में कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हूँ. एतदर्थ, यह संकलन एक ऐसी साहित्य -यात्रा के प्रथम सोपान के रूप में समझा जाए, जिस मार्ग पर छत्तीसगढ़ का साहित्यकार नये -नये प्रयोग कर रहा है. रचनाओं में अनगढ़पन अथवा अभिव्यक्ति की अपरिपक्वता भले ही हो, किन्तु भावी संभावनाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता. "
सम्पादक मंडल की ओर से सम्पादकीय वक्तव्य में लिखने वाले का नाम तो स्पष्ट नहीं छपा है, लेकिन हस्ताक्षर सरोज द्विवेदी का प्रतीत होता है. उन्होंने लिखा था - राजनांदगांव का कलात्मक इतिहास बहुत गौरवशाली है. जिले में विभिन्न प्रकार की बहुत -सी प्रतिभाएँ अभी भी लुकी -छिपी हैं या उन्हें अवसर नहीं मिल पाया है.उभरने का अवसर मिलते ही वे यहाँ की गौरव गाथा में चार चाँद लगा देंगी.बहुत दिनों से इस बात की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी कि यहाँ की साहित्यिक प्रतिभाओं को कभी एक साथ किसी मंच पर लाया जाए. हम कह तो नहीं सकते कि इस पुस्तक ने इस आवश्यकता की पूर्ति की है, किन्तु इतना ज़रूर कह सकते हैं कि इस दिशा में यह एक ठोस प्रयास सिद्ध होगा. सम्पादकीय में राजनांदगांव 77के प्रकाशन में काफी विलम्ब होने के कारणों का उल्लेख करते हुए कहा गया है -"साहित्यिक प्रयासों में अर्थाभाव होता है. साथ ही रचनाकारों का स्वभाव (फक्कड़पन) इसे और जटिल बना देता है. इस पुस्तक के साथ भी यही समस्या अंत तक बनी रही और यही कारण है कि इसे नियत समय से काफी विलम्ब हो गया. तथापि बड़ों के आशीर्वाद और मित्रों के सतत सहयोग के साथ ही इस जिले की प्रबुद्ध जनता का भरपूर स्नेह मिला. हम सबके प्रति कृतज्ञ हैं. प्रयास की सफलता और असफलता का निर्णय तो पाठक गण ही करेंगे, किन्तु जिले की काव्यात्मक -प्रतिभाओं को एक साथ प्रस्तुत करने में हमें बहुत गर्व हुआ है. "
संग्रह की प्रस्तावना राजनांदगांव के वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक 'छत्तीसगढ़ झलक ' के प्रधान सम्पादक चन्द्रकांत ठाकुर ने लिखी थी.यह पुस्तक छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कवि डॉ. नंदू लाल चोटिया जी को समर्पित की गई है, जो राजनांदगांव के निवासी थे और कवि सम्मेलनों के कुशल मंच संचालक के रूप में भी उनकी बड़ी ख्याति थी.
संकलन में जिन कवियों की रचनाएँ प्रकाशित हैं उनमें डॉ. गणेश खरे, सरोज द्विवेदी, चन्द्रकांत ठाकुर,डॉ. मलय, राजेश तिवारी, गिरीश बख्शी, नारायण दास चोटिया, रमेश वर्मा 'सरस ', संजय यादव, जीवन यदु 'राही ', रमाकांत श्रीवास्तव, बालकृष्ण गुप्ता, ला. रा. तम्बोली, एस. डी. डडसेना, रसिक ठक्कर, राम कुमार वेणु, गणेश सोनी 'प्रतीक ', सुरेश अतीत, करीम बख्श गाजी, गोपाल देव, मोहन अग्रहरि, सेवाराम दुबे, महेन्द्र कुमार ठाकुर, प्रभा सरस, गनपत दुबे, जी. एल. जोशी, श्रीमती उषा जोशी, कृष्ण कुमार नायक, ए. सत्तार सरोज, शेखर, हेमंत कुमार वर्मा, चन्द्रभूषण झा, ए. एल यदु, शत्रुघन सिंह राजपूत, अशोक कुमार अग्रवाल, दादूलाल जोशी,श्रीमती शकुंतला 'प्रतीक ', सुन्दर शर्मा, चन्द्र कुमार 'चन्द्र', कैलाश सोनी, कन्हैया लाल देवांगन, हफ़ीज खान,प्रभात बख्शी, अनिल पाली,गंगाधर चौधरी, ज्ञानेंद्र तिवारी, नलिन श्रीवास्तव, दिनेश 'बदनसीब', हीरालाल अग्रवाल, लोक बाबू,डोरेलाल श्रीवास्तव,शरण ठाकुर, गुण रमन शर्मा, रवि शुक्ल, बृजमोहन शाह, एच. बी.बागड़े, चंद्रशेखर सोनी, श्रीनिवास अग्रवाल, डी. पी. नागवंशी, हरेंद्र जोगेवार, पृथ्वीपाल सिंह भाटिया, मेवराम साहू,कमल नारायण साहू, ज्ञानचंद जैन, रामनारायण श्रीवास्तव, कामता प्रसाद त्रिपाठी 'पीयूष ', सुभाष वैष्णव, पाठक परदेशी, नरेश कुमार मेश्राम, विजय वादिया, गजाधर प्रसाद साहू, करुणा कल्पना, समयलाल तम्बोली,प्रभात कुमार तिवारी, रमाकांत शर्मा, डॉ. रतन जैन, अजय कुमार ठाकुर, तेज करण जैन, के. एन. महाजन, नीतेश कुमार, आसिफ कुरैशी, नारायण सिंह ठाकुर, प्रभुदास काचलवार,रूपेंद्र कुमार सिंह, तुलसीराम जायसवाल, मनहरण दुबे, सत्येन्द्र गुप्ता, दर्शन राय, एम. इलियास साजन, मन्नूलाल प्यासा,वि. ना. मजूमदार, बोधन सिंह चंदेल, नंदन नादान, माणिक लाल गोसाई, प्रमोद कुमार श्रीवास्तव, देवेंद्र आहूजा 'आँसू', के. गुलाब झाबक, सरोज भटनागर, जगदीश तिवारी, राजमोहन चौहान, अब्दुल सलाम कौसर, करुणा प्रसाद पाण्डेय, महेश मंजू जोशी, वीरेन्द्र कुमार शुक्ला, रामनरेश त्रिपाठी, हरजीत एस. राजा, 'जैड' अब्दुल, केवल सिंह, लक्ष्मण नन्दगईहां, कृष्णा यादव, चन्द्रकिशोर दास वैष्णव,गौतम कोठारी, गणेश प्रसाद गुप्ता, विजय कुमार नामदेव, गुलाब सिंह ठाकुर, रामनारायण नैय्यर, पलटनराम कोसरिया, पीसीलाल यादव,अरविन्द रायचा, छन्नूलाल वर्मा, आर. एम. दुबे, शिव कुमार द्विवेदी और नीति भूषण भट्ट शामिल हैं.
छत्तीसगढ़ में सहयोगी कविता संग्रहों के प्रकाशन की परम्परा इस युग में 1950 के दशक में शुरु हुई थी, जब हरि ठाकुर और उनके साथी कवियों द्वारा 'नये स्वर' शीर्षक से सहयोगी संकलनों के प्रकाशन का सिलसिला प्रारंभ किया था.नये स्वर के तीन सहयोगी संकलन प्रकाशित हुए थे, जिनमें हरि ठाकुर, नारायण लाल परमार, गुरुदेव कश्यप, कुंज बिहारी चौबे आदि शामिल थे.वर्ष 1977 के आस - पास डॉ. विनय कुमार पाठक के सम्पादन में 'आरंग के कवि ' शीर्षक से एक संग्रह प्रकाशित हुआ था. इसमें आरंग कस्बे के कुछ कवियों की रचनाएँ छपी थीं.
साझा कविता -संग्रहों के प्रकाशन का एक और अच्छा उदाहरण महासमुन्द जिले के पिथौरा में भी देखा जा सकता है,जहाँ श्रृंखला साहित्य मंच द्वारा वर्ष 1989 से 2018 के बीच आंचलिक कवियों के चार संकलन क्रमशः श्रृंखला -एक, श्रृंखला -2, श्रृंखला -3 और श्रृंखला -4 के नाम से प्रकाशित किए जा चुके हैं. मंच ने स्थानीय कवि शिवानंद महान्ति की क्षणिकाओं का संकलन 'संशय के बादल ' वर्ष 2028 में प्रकाशित किया था. वर्ष 2022 में सड़क हादसे में उनका निधन हो गया. मरणोपरांत उनकी क्षणिकाओं का एक संकलन वर्ष 2023में प्रकाशित हुआ. इसे भी श्रृंखला साहित्य मंच ने प्रकाशित किया था. इसी कड़ी में अंचल के ग्राम खुटेरी निवासी कवि स्वर्गीय मधु धांधी के छत्तीसगढ़ी गीतों का संकलन 'मोर सुरता के गाँव ' उनके निधन के लगभग 45वर्ष बाद वर्ष 2022 में प्रकाशित हुआ. इस संग्रह का प्रकाशन भी श्रृंखला साहित्य मंच द्वारा किया गया था.
सहयोगी संकलन 'राजनांदगांव 77' की एक सौजन्य प्रति महासमुन्द जिले के पिथौरा निवासी कवि एस. डी. डडसेना (शशि डडसेना)को भेंट की गई थी, जो उन दिनों पंचायत निरीक्षक के पद पर राजनांदगांव जिले के अम्बागढ़ चौकी में पदस्थ थे. उनकी एक कविता भी इसमें शामिल है. उन्होंने यह संकलन पढ़ने के लिए मुझे दिया था. बहुत समय से सोच रहा था कि इस पर कुछ लिखा जाए. आज यह इच्छा पूरी हुई.
-स्वराज्य करुण


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