Wednesday, December 21, 2022

(आलेख) आग उगलते खेतों में धरती माता का जलता हुआ आँचल


(आलेख : स्वराज करुण )

फसल उगाने वाले खेत आग उगलने लगें तो इससे दुःखद, दर्दनाक और दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और क्या होगी? हालांकि ऐसा सभी जगह नहीं हो रहा है ,लेकिन जहाँ कहीं भी हो रहा है ,वह कृषि उत्पादन और पर्यावरण के भविष्य के लिए बहुत ख़तरनाक़ है। देश के कुछ राज्यों के कुछ इलाकों में इन दिनों  खरीफ़ फसल (धान) की कटाई के बाद 

खेतों में जलाई जा रही  पराली यानी फसल-अवशेषों  की आग से धरती माता का आँचल जलने लगा  है , यानी खेती की ज़मीन झुलसती जा रही है और उसकी उपजाऊ शक्ति नष्ट हो रही है। विडम्बना यह कि धरती माता के आँचल को उसके ही  मेहनतकश बेटे यानी हमारे  कर्मठ किसान आग के हवाले कर रहे हैं। सरकारों की ओर से की जा रही अपीलों और तमाम अच्छी योजनाओं के बावज़ूद कुछ इलाकों में पराली जलाने की प्रवृत्ति कम होने का नाम नहीं ले रही है। इस आग से,  मिट्टी में रहने वाले राइजोबियम बैक्टीरिया  ख़त्म हो रहे हैं ,जो नाइट्रोजन को मिट्टी में पहुँचा कर उसकी उर्वरता को बढ़ाते थे। पराली की आग से केंचुए भी मरते जा रहे हैं ,जो खेतों की ज़मीन को भुरभुरी बनाकर फसलों की वृद्धि में सहायक हो सकते थे। यह दृश्य कल दोपहर छत्तीसगढ़ में पिथौरा तहसील के अंतर्गत ग्राम  लहरौद से नयापारा  (खुर्द) जाने वाले रास्ते के किनारे के खेतों का है। पराली जलाकर किसान शायद भोजन के लिए घर चले गए थे ,क्योंकि  आसपास कोई नज़र नहीं आ रहा था और खेतों में आग धधक रही थी।


                                                           


                               पराली जलाए बिना खेती पहले भी होती थी : अब क्या हो गया ?

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       खेती हजारों वर्षों से हो रही है ,लेकिन हमारे देश में पराली जलाने की यह कुप्रथा विगत छह-सात साल से देखी जा रही है। किसान जब पराली नहीं जलाते थे , उनकी खेती  तब भी होती थी और बहुत अच्छे से होती थी। अब क्या हो गया? पराली जलाने की बीमारी  पंजाब और हरियाणा से निकलकर  उनके पड़ोसी दिल्ली और उत्तरप्रदेश  सहित देश के कई राज्यों में फैल गयी है ।कुछ वर्ष पहले आकाशवाणी से प्रसारित अपने मासिक कार्यक्रम  'मन की बात' में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी किसानों से खेतों में पराली नहीं जलाने की अपील की थी और कहा था कि पराली जलाने से धरती माता की त्वचा झुलस जाती है। मैंने दो सप्ताह पहले सम्बलपुर(ओड़िशा) प्रवास के दौरान हीराकुद बाँध की एक नहर के किनारे के कुछ खेतों में भी  पराली जलने के निशान देखे ।छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों में भी यह समस्या है। प्रभावित राज्य सरकारें किसानों से अपील कर रही हैं कि वे पराली न जलाएँ ,उन्हें पराली के वैकल्पिक उपयोग के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है ,लेकिन कई  किसान इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं।  छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल किसानों को पराली नहीं जलाने और सरकारी गौठानों के लिए पैरा दान करने की समझाइश दे रहे हैं ,आम सभाओं में भी  अपील  कर रहे हैं,जिसका  सकारात्मक असर  कई गाँवों में देखा गया है ,फिर भी कुछ गाँवों में किसान पराली जला रहे हैं। इसके फलस्वरूप खेतों से उड़कर पराली का धुआँ दूर -दूर तक फैल रहा है ,जिससे गाँवों की स्वच्छ हवा प्रदूषित हो रही है। मेरे विचार से सरकारों के अलावा यह स्थानीय ग्राम पंचायतों के पंच-सरपंचों और संबंधित इलाके के  कृषि अधिकारियों की भी ज़िम्मेदारी है कि वे किसानों को पराली नहीं जलाने के लिए  समझाएँ  और उन्हें पराली के वैकल्पिक उपयोगों के लिए प्रोत्साहित करें। इस विषय में किसानों में जागरूकता  लाने के लिए समाचार पत्रों के साथ -साथ रेडियो स्टेशनों और टीव्ही चैनलों का भी सहयोग लिया जाए।  

                                   पराली के धुएँ के बीच सुबह की सैर 

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     आजकल गाँवों के लोग भी सुबह की सैर के लिए निकलते हैं ,तब उन्हें पराली के धुएँ से प्रदूषित हवा में साँस लेते हुए निकलना पड़ता है।पहली नज़र में दूर से तो ऐसा लगता है कि कोहरा है ,लेकिन नज़दीक जाने पर पता चलता है कि यह पराली का धुआँ है ,जो दोपहर और शाम तक भी बना रहता है। आम तौर पर गाँवों की हवा स्वच्छ होती है ,लेकिन उसके साफ सुथरे अमृत तुल्य प्राकृतिक ऑक्सीजन में  पराली के धुएँ से कार्बन डाइऑक्साइड का ज़हर घुल जाता है ,जो निश्चित रूप से ग्रामीणों की सेहत के लिए भी हानिकारक है। खुद पराली जलाने वाले किसानों के स्वास्थ्य के लिए भी यह नुकसानदायक है।  

                                    आख़िर क्या है किसानों की मजबूरी ?

        यह भी विचारणीय है कि किसान आख़िर अपने खेतों में पराली क्यों जलाते हैं ? क्या इसके पीछे उनकी कोई मज़बूरी है ?  इसे भी समझना होगा। कुछ दिनों पहले एक किसान ने मुझसे कहा कि खेती के बढ़ते मशीनीकरण के फलस्वरूप गाँवों में पशुधन की संख्या कम होती जा रही है । अब खेतों की जुताई ट्रैक्टरों से और फसलों की कटाई हार्वेस्टरों से होने लगी है। इससे  पशुओं की उपयोगिता और उनकी संख्या भी कम हो गयी है । पहले पराली (पैरा , पुआल ) का उपयोग पशु चारे के रूप में होता था। पशुओं की संख्या घटने के कारण अब  इसका इस्तेमाल बहुत सीमित मात्रा में होता है। इसके अलावा उन्नत कृषि तकनीक और रासायनिक खादों की वजह से फसलों का उत्पादन भी काफी बढ़ गया है। तो कटाई के बाद फसल अवशेषों का क्या किया जाए ? उन्हें खेतों से उठाने में  खर्चा बहुत लगता है। किसान का कहना बहुत हद तक ठीक लगा लेकिन मेरे विचार से देश में  दूध के उत्पादन को अधिक से अधिक  बढ़ावा मिले तो गोवंश की आबादी बढ़ सकती है। इससे पशु चारे के रूप में पैरा की खपत बढ़ेगी। दूध उत्पादक सहकारी समितियों के माध्यम से राज्य सरकारें इस दिशा में प्रयास कर रही हैं। डेयरी फार्मिंग में भी किसानों की मदद के लिए अनेक सरकारी योजनाएँ हैं। 

                       पराली के अनेकानेक वैकल्पिक उपयोग : बन सकती है जैविक खाद

   इंटरनेट को खंगाला जाए तो पराली के वैकल्पिक उपयोगों के बारे में एक से बढ़कर एक बेहतरीन जानकारी मिलेगी ,जिन्हें आजमाया जाए तो समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। पराली को जलाने के बजाय  खेतों में ही सड़ाकर जैविक खाद बनाई जा सकती है।इसके लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने 'पूसा डिकम्पोजर' नामक दवा विकसित की है ,जो तरल रूप में और पावडर तथा कैप्सूल के रूप में है। फसल कटाई के बाद इसे खेतों में डालकर पराली को जैविक खाद में परिवर्तित किया जा सकता है। इससे पर्यावरण भी स्वच्छ और स्वस्थ रहेगा। न्यूज ऑन एयर (News On Air)नामक वेबसाइट ने 5 नवम्बर 2022 को इस संबंध में एक विस्तृत ख़बर दी है।इसमें बताया गया है कि 'पूसा डिकम्पोजर' के उपयोग के बारे में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने  दिल्ली में एक दिवसीय कार्यशाला का भी आयोजन किया था।

                                   मशरूम उत्पादन में पैरा का इस्तेमाल

   मशरूम की खेती में भी पैरा का उपयोग होता है। हमारे इधर तो 'पैरा फुटू' के नाम से यह ख़ूब लोकप्रिय है। पैरा आधारित मशरूम की खेती करके भी किसान अच्छी कमाई कर सकते हैं। कई किसान कर भी रहे हैं। अगर इस पद्धति से मशरूम उत्पादन को और भी अधिक बढ़ावा  मिले तो पराली जलाने की समस्या कम हो सकती है ।

                                    पराली से बन सकते हैं कप-प्लेट : 

                         आईआईटी दिल्ली के छात्रों का सराहनीय प्रयोग 

    एक अन्य वेबसाइट' इंडिया साइंस वायर' (India Science Wire) में 16 अक्टूबर 2018 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई .आई. टी .)दिल्ली के इन्क्यूबेशन सेंटर से जुड़े तीन छात्रो  के  स्टार्टअप ने पराली जैसे फसल अवशेषों से कप -प्लेट (दोना पत्तल)बनाने की तकनीक विकसित की है।इस पहल की शुरुआत आईआईटी-दिल्ली के छात्र अंकुर कुमार, कनिका प्रजापत और प्रचीर दत्ता ने मई 2014 में ग्रीष्मकालीन परियोजना के रूप में शुरू की थी, जब वे बीटेक कर रहे थे। रिपोर्ट के अनुसार -  "उनका विचार था कि फसल अपशिष्टों से जैविक रूप से अपघटित होने योग्य बर्तन बनाने की तकनीक विकसित हो जाए तो प्लास्टिक से बने प्लेट तथा कपों का इस्तेमाल कम किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने एक प्रक्रिया और उससे संबंधित मशीन विकसित की और पेटेंट के लिए आवेदन कर दिया। अंकुर कुमार ने बताया कि "जल्दी ही हमें यह एहसास हो गया कि मुख्य समस्या कृषि कचरे से लुगदी बनाने की है, न कि लुगदी को टेबलवेयर में परिवर्तित करना।"लगभग उसी समय, दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की समस्या उभरी और पराली जलाने से इसका संबंध एक बड़ा मुद्दा बन गया। उसी दौरान हमने इस नयी परियोजना पर काम करना शुरू किया था। हमारी कोशिश कृषि अपशिष्टों से लुगदी बनाना और उससे लिग्निन-सिलिका के रूप में सह-उत्पाद को अलग करने की थी। 

      इन छात्रों का कहना था --"हमने सोचा कि अगर किसानों को उनके फसल अवशेषों का मूल्य मिल जाए तो वे पराली जलाना बंद कर सकते हैं। इस प्रकार सितंबर 2017 में प्रोजेक्ट स्थापित किया गया। अभी स्थापित की गई यूनिट में प्रतिदिन 10 से 15 किलोग्राम कृषि अपशिष्टों का प्रसंस्करण किया जा सकता है।इस प्रोजेक्ट के  संस्थापकों का कहना है कि अब वे इससे जुड़ा पायलट प्लांट स्थापित करने के लिए तैयार हैं, जिसकी मदद से प्रतिदिन तीन टन फसल अवशेषों का प्रसंस्करण करके दो टन लुगदी बनायी जा सकेगी। इस तरह के प्लांट उन सभी क्षेत्रों में लगाए जा सकते हैं, जहां फसल अवशेष उपलब्ध हैं।अंकुर के अनुसार, "अगर रणनीतिक पार्टनर और निवेश मिलता है तो बाजार की मांग के अनुसार हम उत्पादन इकाइयों में परिवर्तन करके उसे फाइबर और बायो-एथेनॉल जैसे उत्पाद बनाने के लिए भी अनुकूलित कर सकते हैं।" चूंकि' इंडिया साइंस वायर ' की  यह रिपोर्ट लगभग चार साल पुरानी है ,इसलिए बाद में  क्या हुआ ,इसकी जानकारी फिलहाल मुझे नहीं है। लेकिन इतना तो तय है कि पराली से कप प्लेट भी बन सकते हैं। 

                              सड़क निर्माण में भी काम आएगी पराली 

               इस बीच इंटरनेट पर उपलब्ध 9 नवम्बर 2022 की एक ख़बर के अनुसार केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि पराली से बायो बिटुमिन बनाकर सड़क निर्माण में उसका इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने मध्यप्रदेश में कुछ सड़क परियोजनाओं का शिलान्यास करते हुए कहा कि यह तकनीक अगले दो -तीन महीने में आ जाएगी।

                                ताप बिजली घरों में भी हो सकता है पराली का इस्तेमाल

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 इसके अलावा पराली के इस्तेमाल से ताप बिजली घरों में कोयले की खपत भी कम हो सकती है। इससे पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी।वेबसाइट 'डाउन टू अर्थ' की 14 मई 2020 की एक रिपोर्ट में बायोमास के रूप में पराली का इस्तेमाल कोयला आधारित ताप बिजली संयंत्रों में किए जाने की संभावनाओं पर प्रकाश डाला गया है। इसमें बताया गया है कि वर्ष 2017 में केन्द्र सरकार ने सभी राज्यों को निर्देश दिए थे कि वे अपने ताप बिजली घरों में कोयले के साथ 5 से 10 प्रतिशत बायोमास पैलेट्स(छर्रे या गोली)का इस्तेमाल करें। केन्द्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रम राष्ट्रीय ताप बिजली निगम (एनटीपीसी)ने दादरी स्थित अपने संयंत्र में कोयले के साथ 10 प्रतिशत बायोमास का उपयोग किया था । एनटीपीसी ने देश भर के अपने 21 ताप बिजली घरों में इसका प्रयोग शुरू किया था । आगे क्या हुआ ,इसके बारे में  एनटीपीसी वाले ही बेहतर बता पाएंगे ,लेकिन यह तो तय है कि ताप बिजली घरों में कोयले के साथ कुछ मात्रा में पराली का इस्तेमाल किया जा सकता है।

              दोस्तों , मेरी कोशिश होगी कि पराली के विभिन्न लाभप्रद उपयोगों के बारे में समय -समय पर आपको जानकारी देता रहूँ। आप चाहें तो खुद भी इंटरनेट पर सर्च करके इस संबंध में काफी उपयोगी सूचनाएँ प्राप्त कर सकते हैं।  (स्वराज करुण )

Saturday, December 17, 2022

(स्मृति-शेष ) तपस्वी साहित्यकार लाला जगदलपुरी ; 102 वीं जयंती


 (आलेख : स्वराज्य करुण )

आधुनिक इतिहास के एक ऐसे दौर में ,जब देश के अधिकांश वनांचलों में मुद्रण और प्रकाशन सुविधाओं का नितांत अभाव था , छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल बस्तर अंचल में एक साहित्यकार इन सुविधाओं की फिक्र छोड़कर बड़ी तल्लीनता से साहित्य साधना में लगे हुए थे।  मैं याद कर रहा हूँ साहित्य महर्षि लाला जगदलपुरी को , जिन्होंने  93 साल की अपनी  जीवन यात्रा के दस ,बीस या तीस नहीं ,बल्कि पूरे 77 साल एक तपस्वी के रूप में साहित्य की देवी माँ सरस्वती की साधना में लगा दिए। सचमुच वह एक तपस्वी साहित्यकार थे ,जिन्होंने   देश और दुनिया के साहित्य भण्डार को अपनी रचनाओं के अनमोल रत्नों से समृद्ध बनाया। 

लाला जी हिन्दी  और छत्तीसगढ़ी भाषाओं के साथ -साथ बस्तर अंचल में प्रचलित हल्बी और भतरी भाषाओं के भी साहित्यकार थे।  आज अगर वे हमारे बीच होते तो अपनी ज़िन्दगी के सफ़र के 102 साल पूरे करके 103 वें वर्ष में प्रवेश कर चुके होते।  लेकिन  उनकी तकरीबन पौन सदी से भी अधिक लम्बी  साहित्य साधना विगत 14 अगस्त 2013 को अचानक हमेशा के लिए थम गयी ,जब अपने गृहनगर जगदलपुर में उनका देहावसान हो गया। तत्कालीन बस्तर रियासत की राजधानी रहे इसी जगदलपुर में उनका जन्म 17 दिसम्बर 1920 को हुआ था। उनका साहित्य सृजन 16 वर्ष की उम्र में किशोरावस्था से ही प्रारंभ हो चुका था। हिन्दी  और हल्बी पत्रकारिता में भी उनका सक्रिय योगदान रहा। उन्होंने वर्ष 1948 से 1950 तक दुर्ग के साप्ताहिक 'ज़िन्दगी' और वर्ष 1950 में रायपुर के ठाकुर प्यारेलाल सिंह के अर्ध साप्ताहिक 'राष्ट्रबन्धु' सहित देश के अनेक दैनिक समाचार पत्रों को बस्तर -संवाददाता के रूप में अपनी सेवाएँ दी। लालाजी तुषारकान्ति बोस द्वारा प्रकाशित बस्तर के प्रथम हल्बी साप्ताहिक 'बस्तरिया' के  भी सम्पादक रहे। इसका प्रकाशन वर्ष 1984 में प्रारंभ हुआ था।

                                


लाला जगदलपुरी की  प्रमुख हिन्दी  पुस्तकों में वर्ष 1983 में प्रकाशित  ग़ज़ल संग्रह 'मिमियाती ज़िन्दगी दहाड़ते परिवेश ',   वर्ष 1992 में प्रकाशित काव्य संग्रह 'पड़ाव ',वर्ष 2005 में प्रकाशित आंचलिक कविताएं और वर्ष 2011 में प्रकाशित 'ज़िन्दगी के लिए जूझती गज़लें ' तथा 'गीत धन्वा 'शामिल हैं। उनके द्वारा सम्पादित चार कवियों  के सहयोगी काव्य संग्रह 'हमसफ़र ' का प्रकाशन वर्ष 1986 में हुआ। इसमें बहादुर लाल तिवारी , लक्ष्मीनारायण पयोधि , गनी आमीपुरी और स्वराज्य करुण की हिन्दी कविताएं शामिल हैं। मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी भोपाल  द्वारा वर्ष 1994 में प्रकाशित लाला जगदलपुरी की पुस्तक 'बस्तर : इतिहास एवं संस्कृति ' ने छत्तीसगढ़ के इस आदिवासी अंचल पर केन्द्रित एक प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ के रूप में काफी प्रशंसा अर्जित की। वर्ष 2007 में इस ग्रंथ का तीसरा संस्करण प्रकाशित किया गया। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर हरिहर वैष्णव द्वारा सम्पादित एक महत्वपूर्ण पुस्तक " लाला जगदलपुरी समग्र ' का भी प्रकाशन हो चुका है। छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी रायपुर द्वारा लाला जी की  पुस्तक 'बस्तर की लोकोक्तियाँ ' वर्ष 2008 में प्रकाशित की गयी। उनकी हल्बी लोक कथाओं का संकलन लोक चेतना प्रकाशन जबलपुर द्वारा वर्ष 1972 में प्रकाशित किया गया। लाला जी ने प्रेमचंद की प्रमुख कहानियों का  भी हल्बी में अनुवाद किया था । यह अनुवाद संकलन 'प्रेमचंद चो बारा कहनी ' शीर्षक से वर्ष 1984 में वन्या प्रकाशन भोपाल ने प्रकाशित किया था।  ।  लालाजी की अधिकांश हिन्दी कविताओं में इस युग की निर्मम सामाजिक -आर्थिक विसंगतियों को लेकर गहरी वेदना की झलक मिलती है।  इस दौर की यह क्रूरतम विडम्बना है कि आज सज्जन कहलाने वाले लोग दुर्जनों की पीठ ठोंकते नज़र आते हैं। यह इस दौर की बेरहम त्रासदी है ,जिसकी मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति वर्ष 1984 में प्रकाशित लालाजी के ग़ज़ल संग्रह 'मिमियाती ज़िन्दगी -दहाड़ते परिवेश' में शामिल इस रचना में मिलती है --


दुर्जनता की पीठ ठोंकता 

सज्जन कितना बदल गया है !

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दहकन का अहसास कराता,चंदन कितना बदल गया है , 

मेरा चेहरा मुझे डराता, दरपन कितना बदल गया है !

आँखों ही आँखों में  सूख गई हरियाली अंतर्मन की ,

कौन करे विश्वास कि मेरा सावन कितना बदल गया है !

पाँवों के नीचे से खिसक-खिसक जाता सा बात-बात में ,

मेरे तुलसी के बिरवे का आँगन कितना बदल गया है ! 

भाग रहे हैं लोग मृत्यु के पीछे-पीछे बिना बुलाए

जिजीविषा से अलग-थलग यह जीवन कितना बदल गया है

प्रोत्साहन की नई दिशा में देख रहा हूँ, सोच रहा हूँ ,

दुर्जनता की पीठ ठोंकता सज्जन कितना बदल गया है !

लाला जी ने  बहुत सादगीपूर्ण  जीवन जिया । उनके सौवें जन्म वर्ष के उपलक्ष्य में वर्ष 2020 में  बस्तर जिला प्रशासन द्वारा जगदलपुर स्थित शासकीय जिला ग्रंथालय का नामकरण उनके नाम पर किया गया। यह निश्चित रूप से स्वागत योग्य निर्णय है।  यह  ग्रंथालय जगदलपुर के शासकीय बहुउद्देश्यीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय परिसर में स्थित है। इस ग्रंथालय के एक हिस्से में लाला जी की रचनाओं ,उनकी पुस्तकों और उनसे यशस्वी जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण वस्तुओं का संकलन भी प्रदर्शित किया गया है। लाला जी को छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर रायपुर में आयोजित राज्योत्सव 2004 में प्रदेश सरकार की ओर से पंडित सुन्दरलाल शर्मा साहित्य सम्मान से नवाजा गया था । तपस्वी साहित्यकार लाला जगदलपुरी के सम्मान में छत्तीसगढ़ सरकार ने वर्ष 2022 से राज्य सम्मान  की भी शुरुआत की है। पहला 'लाला जगदलपुरी सम्मान ' छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर एक नवम्बर 2022 को  छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कवि ,खैरागढ़ निवासी जीवन यदु 'राही' को दिया गया । साहित्य महर्षि लाला जगदलपुरी को आज उनकी 102 वीं जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि। (आलेख -स्वराज्य करुण )

(साक्षात्कार ) परिवेश हमारी ज़िन्दगी के ख़िलाफ़ है :लाला जगदलपुरी

 

  साहित्य महर्षि लाला जगदलपुरी से मेरे  38 साल

 पुराने साक्षात्कार का पुनः स्मरण :  स्वराज्य  करुण 

*********************************************************************************************सही मसाहित्य महर्षि  लाला जगदलपुरी  अब इस भौतिक संसार में नहीं हैं। आज अगर वे हमारे बीच होते तो 102 साल के हो चुके होते।   लालाजी का जन्म 17 दिसम्बर 1920 को छत्तीसगढ़ की तत्कालीन बस्तर रियासत की राजधानी जगदलपुर में हुआ था।  गृहनगर जगदलपुर में ही 93 साल की आयु में 14 अगस्त 2013 को उनका निधन हो गया । उनकी साहित्य साधना  लगभग 77 वर्षो तक निरन्तर चलती रही ।  वह बस्तर की आदिवासी संस्कृति और वहाँ के लोक साहित्य के गंभीर अध्येता और विशेषज्ञ थे । मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी भोपाल द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक 'बस्तर :इतिहास एवं संस्कृति '  छत्तीसगढ़ के इस आदिवासी अंचल के सामाजिक -सांस्कृतिक और ऐतिहासिक तथ्यों का एक प्रामाणिक सन्दर्भ ग्रन्थ है।    उन पर केन्द्रित हरिहर वैष्णव की  पुस्तक 'लाला जगदलपुरी समग्र ' भी हाल के  वर्षो में प्रकाशित हुई है । लाला जगदलपुरी  से मेरा यह साक्षात्कार रायपुर की साहित्यिक लघु पत्रिका 'पहचान ' के जून -अगस्त 1984 के अंक में प्रकाशित हुआ था ।  आज 17 दिसम्बर 2022  को उनके जन्म दिवस के मौके पर   लगभग 38 साल के लम्बे अंतराल के बाद इसे पुनः प्रस्तुत करते हुए उनसे  जुड़ी  अनेकानेक स्मृतियाँ आंखों में तैरने लगी हैं ।**************************************************************************************************

यदि आपमें साहित्यिक अभिरुचि है और आप कभी जगदलपुर (बस्तर )जाएं और वहाँ लाला जगदलपुरी से भेंट न करें , ऐसा आपके लिए हर्गिज़ संभव नहीं। पिछले दिनों एक सरकारी काम से जगदलपुर गया तो वहाँ मुझे लालाजी से मुलाकात का भी सौभाग्य मिला ।बस्तर की पहली यात्रा और पहली बार एक समर्पित साहित्य साधक से मिलने और बातचीत करने का यह पहला मौका मेरे जीवन की सर्वाधिक मधुर स्मृतियों में शामिल हो गया है।

   शाम को गरज -चमक के साथ पड़ी तेज़ बौछारों से  नवतपे की गर्मी शांत हो गयी थी । हवा में ठंडक आ गयी थी और आसमान रह -रह कर टपक रहा था ।मैं लोगों से लालाजी के निवास का पता पूछते हुए निकल रहा था ।धोती -कुर्ता पहने एक दुबले -पतले सज्जन छाता लगाए नज़दीक से गुजरे । मैंने देखा -अरे ! वही तो हैं ।पत्र -पत्रिकाओं में छपी उनकी तस्वीरें मेरे स्मृति -पटल पर उभर आयीं । मैंने कुछ झिझकते हुए उन्हें रोककर पूछा -क्या आप ही लाला जगदलपुरी हैं ?स्नेह भरी आवाज़ में उन्होंने कहा - हाँ -हाँ ! कहिए आप ....?


                                                  


                                                             साहित्य महर्षि लाला जगदलपुरी

   मैंने अपना परिचय दिया ।बड़ी आत्मीयता और प्रसन्नता के साथ वे मुझे एक चाय की दुकान पर ले गए ।बाहर बूंदाबांदी ने फिर बारिश का रूप ले लिया था ।चाय के साथ हमारी बातचीत भी चलने लगी ।लालाजी जितने विशाल हॄदय वाले हैं ,उतने ही स्पष्टवादी भी । साहित्यिक क्षेत्र में फैली उठा -पटक की राजनीति से वे काफी क्षुब्ध हैं ।उन्होंने कहा --" साहित्य की दुनिया में फैली खेमेबाजी ने आज बहुत -सी प्रतिभाओं को उपेक्षा के अँधेरे में ला पटका है।" काफी देर तक बातें होती रही। 

      बारिश थमने पर वे मुझे  अपने घर ले गए ।हाल ही में 'आंदोलन प्रकाशन'  जगदलपुर द्वारा प्रकाशित अपने ग़ज़ल संग्रह  ' मिमियाती ज़िन्दगी दहाड़ते  परिवेश ' की एक प्रति उन्होंने मुझे भेंट की ।उनकी 51 ग़ज़लों का यह संकलन इन दिनों काफी चर्चा और प्रशंसा का विषय बना हुआ है।जिज्ञासा हुई कि उन्होंने संग्रह का शीर्षक 'मिमियाती ज़िन्दगी दहाड़ते परिवेश ' ही क्यों रखा ?क्या ज़िन्दगी और परिवेश एक सिक्के के दो पहलू नहीं हैं ?क्या वे नहीं मानते कि ज़िन्दगी से ही परिवेश बनता है ?

   उन्होंने कहा -" मैं परिवेश और ज़िन्दगी को एक नहीं मानता ।दोनों एक सिक्के के दो पहलू नहीं हैं ।परिवेश एक परिधि है ,जिसके केन्द्र में हमारी ज़िन्दगी है ।परिवेश एक स्थानवाची शब्द है ।यद्यपि ज़िन्दगी ही परिवेश बनाती है  लेकिन दोनों का अस्तित्व पृथक --पृथक होता है ।चोरों ,उठाईगीरों ,शोषकों का झुंड ही आज परिवेश बन गया है ।सामर्थ्यवान लोग दहाड़ रहे हैं और कमज़ोर मिमिया रहे हैं ।परिवेश हमारी ज़िन्दगी के  ख़िलाफ़ हो गया है ।" लालाजी ने आगे कहा -" परिवेश एक व्यवस्था है ,जिसके सामने आज ज़िन्दगी मिमिया रही है । मेरे ग़ज़ल संग्रह का शीर्षक यही संकेत देता है ।"

  लालाजी के इस संकलन की अधिकांश ग़ज़लें हमारे समय और समाज की विसंगतियों को रेखांकित करती हैं ।लालाजी आदिवासी अंचल में रचे -बसे रचनाकार हैं।अतः उनकी कुछ ग़ज़लों में बस्तर की आदिम धरती का भी सजीव  चित्रण हुआ है ।संग्रह में जहाँ जीवन का जंगली संग्राम है ,वहीं तूम्बा के साथ सरगी के वृक्षों की शीतल छाया भी । बानगी देखिए --

     इस धरती के राम जंगली इसके नमन -प्रणाम जंगली 

    कुड़ई , कुंद, झुई सम्मोहक वनफूलों के नाम जंगली ।

         अथवा 

    लम्बी राह ,हमसफ़र तूम्बा ग्रीष्म की दाह ,हमसफ़र तूम्बा ।

   सिरचढ़ी धूप ,गाँव का राही   पेड़ की छाँह ,हमसफ़र तूम्बा ।

          या 

    प्रकृति का सहज प्यार  सरगी की छाया 

   शीतल -शीतल उदार,   सरगी की छाया ।

  जीवन पर विसंगतियां तो हावी हैं ही , पर मानवीय संवेदना और सौन्दर्य का महत्व भी कम नहीं हुआ है।  व्यवस्था के शिंकजे में मिमियाती ज़िन्दगी को देख कर लाला जी व्यथित हैं । समय के विरोधाभास का एक चित्र उनके संग्रह की पहली ही ग़ज़ल में देखिए --

दहकन का अहसास कराता  चंदन कितना बदल गया है  

मेरा चेहरा मुझे डराता , दरपन कितना बदल गया है ।

लालाजी पिछले क़रीब पाँच दशकों से  लगातार लिख रहे हैं ।वे राष्ट्रभाषा हिन्दी के अलावा लोक भाषाओं ;छत्तीसगढ़ी , हल्बी और भतरी में भी निरन्तर सृजनरत हैं ।'हल्बी पंचतंत्र ' , हल्बी लोककथाएँ'और 'रामकथा ' उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं ।बस्तर की आदिवासी संस्कृति पर उन्होंने अनेक शोध -निबंध लिखे हैं ,जो विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुए हैं। लालाजी निरन्तर लिखें और राष्ट्रभाषा और लोकभाषाओं के भण्डार को समृद्ध करते रहें ,यही शुभकामना है । प्रस्तुत है ,लाला जगदलपुरी के हाल ही में छपे ग़ज़ल -संग्रह 'मिमियाती ज़िन्दगी दहाड़ते परिवेश 'से एक ग़ज़ल 

           आसमान लौटा दे सूरज 

                    ***

       छद्म चेतना जिसको मारे  उसकी टूटन कौन निवारे ।

       होंगे कितने विवश आदमी  जो अंदर ही अंदर हारे ।

       चीख़ -पुकारों की सांसत में कौन पुकारे , किसे पुकारे ?

      बड़ा ज़ुर्म है यहाँ न कोई  निरीहता पर आँसू ढारे।

      जिसको देखो वही देवता किस -किस की आरती उतारें ?

     उनकी सारी सुख -सुविधाएँ ,जो अनीति के राजदुलारे ।

      आसमान लौटा दे सूरज,   रख ले सारे चाँद -सितारे ।

Saturday, December 10, 2022

(आलेख) अभिनंदन का हक़दार है बिलासपुर शहर

          ( आलेख : स्वराज्य करुण )

अपने पूर्वज साहित्यकारों को याद रखने वाला शहर   निश्चित रूप से सराहना और अभिनंदन का हक़दार होता है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में एक मुख्य सड़क का नामकरण छत्तीसगढ़ी और हिंदी के वरिष्ठ कवि  स्वर्गीय पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी के नाम पर किया जाना स्थानीय जनता के साथ -साथ प्रदेश की साहित्यिक बिरादरी के लिए भी गर्व की बात है। बिलासपुर में आधुनिक हिंदी कविता के सुपरिचित हस्ताक्षर श्रीकांत वर्मा के नाम पर भी एक सड़क है और अज्ञेय जी के नाम पर अज्ञेय नगर भी। वहाँ छत्तीसगढ़ी के वरिष्ठ कवि पंडित द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्र' के नाम पर विप्र महाविद्यालय भी संचालित हो रहा है।

                            


                                                             (फोटो : स्वराज्य करुण )

उस दिन संक्षिप्त प्रवास के दौरान बिलासपुर में  यह देखकर मुझे आत्मिक खुशी हुई कि वहाँ का स्मार्ट रोड अब 'पद्मश्री पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी स्मार्ट रोड'के नाम से पहचाना जा रहा है। पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी को भारत सरकार ने 2 अप्रैल 2018 को पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया था। तत्कालीन राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने उन्हें इस अलंकरण से नवाज़ा था। पंडित चतुर्वेदी का जन्म 2 फरवरी 1926 को ग्राम कोटमी (तत्कालीन जिला-बिलासपुर)में और निधन 7 दिसम्बर 2018 को अपने गृहनगर बिलासपुर में हुआ था। उन्होंने लगभग 93 वर्ष की अपनी जीवन यात्रा के 77 साल साहित्य को और 70 साल पत्रकारिता को समर्पित कर दिए। वह वर्ष 2008 से 2013 तक छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के प्रथम अध्यक्ष भी रहे। उनकी प्रमुख पुस्तकों में छत्तीसगढ़ी कविता-संग्रह 'पर्रा भर लाई' और कहानी संग्रह 'भोलवा भोलाराम बनिस' उल्लेखनीय है। 

छत्तीसगढ़  में अपने साहित्यकारों से जुड़ी स्मृतियों को सहेज कर रखने की एक अच्छी परम्परा है।   जिला मुख्यालय रायगढ़ में सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित लोचनप्रसाद पांडेय और पद्मश्री मुकुटधर पांडेय के नाम पर गृह निर्माण मंडल की दो कॉलोनियों का नामकरण मध्यप्रदेश के ज़माने में हो चुका था। रायगढ़ दोनों पांडेय बंधुओं का कर्मक्षेत्र और गृहनगर रहा है।  वहाँ  संस्कृत ,ओड़िया और हिंदी के विद्वान कवि पंडित चिरंजीव दास के नाम पर भी एक सड़क का नामकरण लगभग दो-ढाई दशक पहले हो चुका है ,जो रायगढ़ के ही रहने वाले थे। इसी तरह लगभग दो वर्ष पहले जगदलपुर के शासकीय जिला ग्रंथालय का नामकरण साहित्य मनीषी लाला जगदलपुरी के नाम पर  किया जा चुका है। 

    राजनांदगांव में हिंदी के तीन ख्यातनाम साहित्यकारों - डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी ,गजानन माधव मुक्तिबोध और डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र के नाम पर त्रिवेणी संग्रहालय परिसर बनाया गया है। राजनांदगांव इन तीनों साहित्यिक दिग्गजों  का कर्मक्षेत्र रहा है। बख़्शीजी के नाम पर भिलाई नगर में बख़्शी सृजन पीठ का संचालन किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा  प्रदेश के प्रसिद्ध साहित्यकार पण्डित सुन्दरलाल शर्मा , माधवराव सप्रे , डॉ. खूबचन्द बघेल , लाला जगदलपुरी और लक्ष्मण मस्तुरिया के नाम पर राज्य सम्मानों की भी स्थापना की गयी है। कई शिक्षण संस्थान भी प्रदेश के अनेक दिवंगत साहित्यकारों के नाम पर कई वर्षों से संचालित हो रहे हैं। फोटो एवं आलेख : स्वराज्य करुण 



Friday, December 9, 2022

(आलेख) छठवीं-सातवीं सदी का भीम -कीचक मन्दिर :प्राचीन भारतीय वास्तु -शिल्प का अनुपम उदाहरण

                (आलेख -स्वराज्य करुण)

छत्तीसगढ़ के कस्बेनुमा ऐतिहासिक नगर मल्हार का 'भीम -कीचक ' मन्दिर  प्राचीन भारत के वास्तु शिल्प का एक अनुपम उदाहरण है। यह दरअसल एक शिव मंदिर है , हालांकि उसकी जलहरि में शिवलिंग नहीं है। लेकिन मन्दिर की भव्यता बताती है कि कभी यह दक्षिण कोसल के नाम से प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख आस्था केन्द्र रहा होगा।  पुरातत्वविदों ने अनुमान के आधार पर इसे छठवीं -सातवीं सदी का मन्दिर बताया है। अगर उनका अनुमान सटीक हो  तो इसे तेरह सौ से चौदह साल साल पुराना कहा जा सकता है।भारत सरकार द्वारा'प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल व अवशेष अधिनियम 1958 (यथा संशोधित)के अंतर्गत इसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया है। 

मल्हार के  'भीम कीचक' मन्दिर की अब तक शायद उतनी चर्चा नहीं हो पायी है ,जितनी वहाँ के डिडनेश्वरी मन्दिर की होती रही है।मुझे उस दिन 'भीम कीचक'मन्दिर और उसके परिसर के अवलोकन का अवसर मिला। उसकी दीवारों पर कुछ एक पत्थरों को हाथ से नाप कर भी देखा। प्रत्येक पत्थर की चौड़ाई दो हाथ और लम्बाई ढाई हाथ की है।यानी कम से कम दो फुट चौड़ी और दाई फुट लम्बी पत्थर की ईंटें !  यह कल्पना करके आश्चर्य होता है कि जिस युग में बड़े बड़े  पत्थरों को दूर दराज से उठाकर लाने के लिए आज की तरह भारी वाहन नहीं थे , भारी मशीनें नहीं थीं , पत्थरों को तराशने के लिए आधुनिक औजार नहीं थे , उस दौर में इस ऊँचे और विशाल मन्दिर का निर्माण आख़िर कैसे किया गया होगा? जिस प्रकार मिस्र के हजारों साल पुराने  विशाल पिरामिड हमें आश्चर्यचकित करते हैं ,ठीक उसी तरह भारत और दुनिया के अलग -अलग देशों के सैकड़ों-हजारों साल पुराने विशाल भवनों की निर्माण -कला और उनके निर्माण-काल के बारे में सोचकर हैरत होती है। 


                                                


भीम कीचक मन्दिर एवं परिसर,मल्हार (छत्तीसगढ़)
फोटो : स्वराज्य करुण 

भीम-कीचक मन्दिर  छत्तीसगढ़ के मल्हार  नगरपंचायत क्षेत्र के पातालेश्वर महादेव वार्ड में,  (बिलासपुर मार्ग पर)  स्थित है। मन्दिर परिसर लगभग पौने दो एकड़ में विस्तारित है।। इस मंदिर के साथ यहाँ प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों  का रख -रखाव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के रायपुर मंडल द्वारा किया जाता है। परिसर में पुरातात्विक महत्व की कई खण्डित अवशेष भी हैं ,जिन्हें सुव्यस्थित रूप से रखा। गया है। परिसर को एक सुन्दर उद्यान के रूप में विकसित किया गया है। सम्पूर्ण परिसर को लोहे का  जालीदार घेरा लगाकर सुरक्षित किया गया है। परिसर की देखभाल के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से एक पूर्णकालिक कर्मचारी तैनात है,जबकि तीन मज़दूर ठेके पर रखे गए हैं।

        परिसर के भीतर (प्रवेश द्वार के पास)   उनके सूचना फलक पर  'भीम -कीचक 'मन्दिर के बारे में दी गयी जानकारी के अनुसार - "यह भव्य मन्दिर अवशेष स्थानीय तौर पर देऊर के नाम से प्रचलित है। मन्दिर की भित्ति के ऊपर का भाग खण्डित है।पश्चिमाभिमुखी इस मन्दिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग प्रमाणित करता है कि मन्दिर भगवान शिव को समर्पित था मन्दिर की द्वार -शाखा पर गंगा और यमुना का सुन्दर अंकन है।द्वार -शाखा पर ही अन्दर की ओर शिव और उनके गणों को विभिन्न भाव-भंगिमाओं में दर्शाया गया है।मूर्ति शिल्प के आधार पर यह मन्दिर छठवीं -सातवीं शताब्दी का प्रतीत होता है ।"  यानी पुरातत्वविद भी इसका निर्माण काल पक्के तौर पर बताने की स्थिति में नहीं हैं ,यही कारण है कि उन्होंने 'प्रतीत होता है ' लिखा है। सूचना फलक में इसे शिव मंदिर तो बताया गया है ,लेकिन इसका नामकरण 'भीम -कीचक' के नाम पर क्यों हुआ , इस संबंध में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सूचना फलक में कोई जानकारी नहीं दी गयी है। क्या इस नामकरण का  महाभारत की कथा में भीम द्वारा  कीचक वध के प्रसंग से भी कोई संबंध जुड़ता है ?  इतिहासकार और पुरातत्वविद इस बारे में बेहतर बता पाएंगे।- स्वराज्य करुण 

Wednesday, November 2, 2022

(आलेख) छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य : कितना पुराना है इतिहास ? - स्वराज्य करुण

      तथ्यों और तर्कों के आईने में तीन महत्वपूर्ण पुस्तकें 

                 (आलेख - स्वराज्य करुण)

भारत के प्रत्येक राज्य और वहाँ के प्रत्येक अंचल की अपनी भाषाएँ ,अपनी बोलियाँ ,अपना साहित्य ,अपना संगीत और अपनी संस्कृति होती है । ये रंग -बिरंगी विविधताएँ ही भारत की राष्ट्रीय पहचान है ,जो इस देश को एकता के मज़बूत बंधनों में बांध कर रखती है। छत्तीसगढ़ भी एक ऐसा भारतीय राज्य है , जो अपनी भाषा ,अपने साहित्य और अपनी विविधतापूर्ण लोक संस्कृति से सुसज्जित और समृद्ध है। भाषाओं और बोलियों का भी अपना एक प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष साहित्यिक और  सांस्कृतिक इतिहास होता है।  छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य का भी अपना एक समृद्ध इतिहास है ,लेकिन यह इतिहास कितना पुराना है, इसे जानने और समझने के लिए मेरे विचार से प्रदेश के तीन विद्वान लेखकों की महत्वपूर्ण पुस्तकों  का अध्ययन बहुत ज़रूरी हो जाता है  ।

 पहली पुस्तक  'छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास' हिंदी भाषा में डॉ. नरेंद्र देव वर्मा की अनेक महत्वपूर्ण  कृतियों में शामिल  एक मूल्यवान धरोहर है। हिंदी में दूसरी पुस्तक है श्री नंदकिशोर तिवारी द्वारा लिखी गयी 'छत्तीसगढ़ी साहित्य ,दशा और दिशा तथा तीसरी किताब है डॉ. विनय कुमार पाठक  की छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार' जो शीर्षक से ही स्पष्ट है कि  सरल छत्तीसगढ़ी में लिखी गयी है। तीनों  लेखकों ने अपनी इन  पुस्तकों में छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य  के क्रमिक विकास पर गहन अध्ययन प्रस्तुत किया है। उन्होंने  विषय प्रवर्तन , विश्लेषण और प्रस्तुतिकरण बहुत परिश्रम के साथ अपने -अपने तरीके से किया है।  तीनों के अपने -अपने तर्क हैं और संकलित तथ्यों को देखने का अपना -अपना नज़रिया है।  लेकिन यह तय है कि तीनों किताबों में प्रस्तुत  तथ्यों और तर्को के आईने में  छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के इतिहास को  उसकी  प्राचीनता के अलग -अलग रंगों के साथ  बड़ी खूबसूरती से उभारा गया है। किसी भी राज्य ,देश और वहाँ के साहित्यिक -सांस्कृतिक इतिहास को लेकर विद्वानों में अलग -अलग अभिमतों का होना कोई नयी बात नहीं है। ऐसा होना बहुत स्वाभाविक है। ये मत -विभिन्नताएँ इन पुस्तकों में भी झलकती हैं।


                                                


श्री तिवारी और डॉ. पाठक ने अपनी पुस्तकों में उल्लेखित कुछ तथ्यों में डॉ. नरेंद्र देव वर्मा का भी संदर्भ दिया है। लेकिन दोनों ही डॉ. वर्मा के कुछ तथ्यों से सहमत नज़र नहीं आते।  डॉ. वर्मा और डॉ. पाठक अपनी पुस्तकों में छत्तीसगढ़ी भाषा और  साहित्य के इतिहास को एक हज़ार साल से ज्यादा पुराना मानते हैं । उनकी यह मान्यता छत्तीसगढ़ी के मौखिक और लिखित साहित्य को लेकर है। डॉ. वर्मा और डॉ. पाठक  के दृष्टिकोण से कबीरपंथ के संत धरम दास  छत्तीसगढ़ी भाषा के लिखित साहित्य के  प्रथम  कवि थे जबकि श्री नंदकिशोर तिवारी ऐसा नहीं मानते। उनका कहना है कि सन 1472 में बांधो गढ़ (विंध्यप्रदेश) में जन्मे  संत धरमदास  छत्तीसगढ़ के कवर्धा आकर कबीरपीठ की स्थापना की थी ,लेकिन उनके पदों में बघेली और अवधी का प्रभाव है ,छत्तीसगढ़ी का नहीं।

                                        छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास

        डॉ.  नरेंद्र देव वर्मा हिंदी साहित्य और भाषा विज्ञान में एम.ए. होने  के साथ इन  विषयों में पी-एच.डी. भी थे। उनकी  पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास'  एक शोध -प्रबंध है। उन्होंने 1973  में पण्डित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर में पी-एच.डी. की उपाधि के लिए   भाषा वैज्ञानिक अध्ययन  के आधार पर इसे लिखा था।  पुस्तक के रूप में इसे छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा वर्ष 2009 में प्रकाशित किया गया। यह पुस्तक लगभग 380 पृष्ठों की है।अपने इस शोध-प्रबंध में डॉ. वर्मा ने अनेक प्रसिद्ध भाषाविज्ञानियों को संदर्भित करते हुए पूर्वी हिंदी समूह के अंतर्गत जहाँ अवधी और बघेली के साथ छत्तीसगढ़ी की तुलना की है ,वहीं छत्तीसगढ़ी भाषा का वर्गीकरण करते हुए उन्होनें  यहाँ प्रचलित आंचलिक बोलियों का भी  व्याकरणिक अध्ययन प्रस्तुत किया है।

                             पूर्वी हिंदी क्षेत्र की प्रमुख भाषा है छत्तीसगढ़ी

      डॉ. वर्मा छत्तीसगढ़ी ,अवधी और बघेली के तुलनात्मक अध्ययन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि छत्तीसगढ़ी पूर्वी हिंदी क्षेत्र की एक प्रमुख भाषा है । उन्होंने यह शोध -प्रबंध 32 अध्यायों में लिखा  है। इनमें   छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि  छत्तीसगढ़ी का विकास ,छत्तीसगढ़ की बोलियाँ, छत्तीसगढ़ी का शब्द -समूह ,छत्तीसगढ़ी विषयक साहित्य , छत्तीसगढ़ी के स्वर , स्वर-परिवर्तन, छत्तीसगढ़ी स्वरों की उतपत्ति ,व्यंजन -परिवर्तन, छत्तीसगढ़ी व्यंजनों की उतपत्ति ,संज्ञा की रचना ,समास ,कारक-रचना जैसे अध्याय  शामिल हैं ,जो छत्तीसगढ़ी भाषा , व्याकरण और साहित्य से जुड़े तथ्यों पर क्रमबद्ध रौशनी डालते हैं। डॉ. वर्मा लिखते कि छत्तीसगढ़ी से उनका तात्पर्य रायपुर ,बिलासपुर और दुर्ग में बोली जाने वाली छत्तीसगढ़ी से है ।रायपुर और बिलासपुर की छत्तीसगढ़ी में उच्चारण एवं कतिपय शब्द-प्रयोगों का ही भेद है। उन्होंने छत्तीसगढ़ी के अलावा प्रदेश में प्रचलित खल्ताही,सरगुजिहा, लरिया,सदरी कोरवा ,बैगानी, बिंझवारी ,कलंगा ,भूलिया, बस्तरी(हल्बी) बोलियों की भी व्याकरणिक विवेचना की है।

                नवीं-दसवीं शताब्दी में हुआ था 

              छत्तीसगढ़ी और अवधी का जन्म 

        अध्याय -5 में डॉ. नरेंद्र देव वर्मा  लिखते हैं -  छत्तीसगढ़ी और अवधी ,दोनों का जन्म अर्ध -मागधी के गर्भ से आज से लगभग 1156 वर्ष पूर्व नवीं- दसवीं शताब्दी में हुआ था।इस एक सहस्त्र वर्ष के सुदीर्घ अंतराल में छत्तीसगढ़ी और अवधी पर अन्य भाषाओं के प्रभाव भी पड़े तथा इनका स्वरूप पर्याप्त परिवर्तित हो गया। डॉ. वर्मा ने छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास को तीन चरणों में विभाजित किया है -(1) गाथा युग : 1000 से 1500 ईस्वी (2)भक्ति युग : 1500 से 1900 ईस्वी और आधुनिक युग :1900 ईस्वी से आज तक। उन्होंने भक्ति युग के प्रमुख कवियों में संत धरम दास और सतनाम पंथ के प्रवर्तक संत गुरु घासीदास जी की कुछ रचनाओं का भी उल्लेख किया है। इसी अध्याय में डॉ. वर्मा ने  आधुनिक युग के अंतर्गत छत्तीसगढ़ी कविता और गद्य साहित्य  के विकास की भी चर्चा की है। छत्तीसगढ़ी कविता के विकास को उन्होंने क्रमशः प्रथम ,द्वितीय और तृतीय उन्मेष में वर्गीकृत किया है ।

              हीरालाल काव्योपाध्याय थे छत्तीसगढ़ी के प्रथम कथा -लेखक

   पुस्तक के 5वें अध्याय में गद्य-खण्ड के अंतर्गत डॉ. नरेंद्र देव वर्मा ने अनेक प्रमुख  साहित्यकारों की छत्तीसगढ़ी कहानियों ,उपन्यासों और नाटकों का भी उल्लेख किया है। डॉ. वर्मा लिखते हैं -" छत्तीसगढ़ी गद्य का सक्रिय इतिहास हीरालाल काव्योपाध्याय द्वारा लिखित छत्तीसगढ़ी व्याकरण से प्रारंभ होता है,जिसे सन 1890 में जार्ज ए. ग्रियर्सन ने सम्पादित और अनूदित कर कलकत्ता के बैप्टिस्ट मिशन प्रेस से छपवाया। "डॉ. वर्मा के अनुसार -- "छत्तीसगढ़ी में हीरालाल काव्योपाध्याय ने ही सर्वप्रथम कथा -लेखन का श्रीगणेश किया था।उनके व्याकरण -ग्रंथ में 'श्रीराम की कथा ',ढोला की कहानी' और 'चंदैनी की कहानी 'निबद्ध है । काव्योपाध्याय के इस ग्रंथ ने छत्तीसगढ़ी गद्य के इतिहास का ही सूत्रपात नहीं किया, प्रत्युत छत्तीसगढ़ी कथा का भी पौरोहित्य किया ,तथा छत्तीसगढ़ी नाटक के आरंभ के सूत्र भी उक्त पुस्तक के संवादों में छिपे हुए हैं।"

                        उपन्यासकार और कवि भी थे डॉ. नरेंद्र देव वर्मा

   छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. नरेंद्र देव वर्मा का  जन्म महाराष्ट्र के वर्धा में 4 नवम्बर 1939 को और निधन 8 सितम्बर 1979 को गृहनगर रायपुर (छत्तीसगढ़) में हुआ।  छत्तीसगढ़ के ग्रामीण परिवेश पर केन्द्रित उनका उपन्यास 'सुबह की तलाश ' 1970 के दशक में राष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चित रहा। उनकी लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी रचना 'अरपा पैरी के धार ..महानदी हे  अपार' को छत्तीसगढ़ सरकार ने 'राज्य गीत' का दर्जा देकर सम्मानित किया है । डॉ. वर्मा  छत्तीसगढ़ के    साहित्यिक भण्डार को अपनी रचनाओं की अनमोल धरोहर से समृद्ध करते हुए  मात्र 40 वर्ष की अल्पायु में ही इस भौतिक संसार से चले गए। छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास को हिंदी में समझने के लिए डॉ. वर्मा द्वारा लिखित  'छत्तीसगढ़ी साहित्य का उद्विकास ' एक ज्ञानवर्धक पुस्तक है।

                      छत्तीसगढ़ी साहित्य : दशा और दिशा      

       छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के उत्थान के लिए समर्पित बिलासपुर निवासी श्री नंदकिशोर तिवारी ने भी अपनी पुस्तक में छत्तीसगढ़ी काव्य -साहित्य की विकास यात्रा को प्रथम ,द्वितीय और तृतीय उन्मेष में वर्गीकृत करते हुए अपना सारगर्भित विश्लेषण प्रस्तुत किया है। लेकिन वह डॉ. नरेंद्र देव वर्मा द्वारा छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास के काल निर्धारण से सहमत नहीं लगते। श्री तिवारी ने 215 पृष्ठों की अपनी इस पुस्तक की शुरुआत 'छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य :प्रथम उन्मेष ' शीर्षक से की है।  हम इसे पुस्तक का पहला अध्याय कह सकते हैं। उन्होंने इसमें लिखा है कि छत्तीसगढ़ में देर से आयी  मातृभाषा प्रेम के नवजागरण की चेतना ने कई भूलें की। उनके अनुसार पहली भूल थी - डॉ. नरेंद्र देव वर्मा ने छत्तीसगढ़ी साहित्य का हिंदी की तर्ज पर गाथा युग -विक्रम संवत 1000 से 1500,भक्ति युग विक्रम संवत 1500 से 1900 और आधुनिक युग 1900 से आज तक में विभाजित किया है।इस विभाजन काल की रचनाओं में छत्तीसगढ़ी लोक - गाथाओं को शामिल किया गया । संवत 1100 से 1500 तक छत्तीसगढ़ी में अनेक गाथाओं की रचना हुई ,जिनमें प्रेम तथा वीरता का अपूर्व विन्यास हुआ है।यद्यपि इन गाथाओं की लिपिबद्ध परम्परा नहीं रही है तथा ये पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से अभिरक्षित होती आयी हैं। 

    श्री तिवारी लिखते हैं --तर्क किया जा सकता है कि हिंदी साहित्य के इतिहास में भी लोक -गाथाओं को शामिल किया गया है । इस तरह तर्क करने वालों को समझना चाहिए कि हिंदी 'रासो' काव्य की अपनी परम्परा थी। 'रासो' राज दरबारों से जन -दरबार में आए।इस परम्परा की सभी रचनाओं के साथ लेखक का नाम जुड़ा है। वे लोक-कंठ से निः सृत न होकर कवियों की लेखनी से निःसृत हुईं और लोक -कंठ में समा गयीं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि वाचिक परम्परा में निःसृत लोक -गाथाओं को लिखित शिष्ट साहित्य की परम्परा में कैसे परिगणित किया जा सकता है? और कंठ-दर-कंठ गूँजतेव,गायक की मानसिकता ,स्थान आदि के प्रभाव से नित -नित परिवर्तित होते किस रूप को हम साहित्य में मान्यता देंगे?हमें शिष्ट-साहित्य और लोक-  साहित्य में उनकी मर्यादा और परम्परा को समझना होगा। 

                 संत धरम दास नहीं थे छत्तीसगढ़ी के प्रथम कवि  ?

        श्री तिवारी के अनुसार दूसरी भूल यह थी कि छत्तीसगढ़ी साहित्य की प्राचीनता को प्रमाणित करने की अतिशय आकांक्षा ने संत धरम दास को छत्तीसगढ़ी का पहला कवि घोषित कर दिया।संत धरम दास का जन्म 1472 में बांधोगढ़(विंध्य प्रदेश) में हुआ था। वे कबीर के शिष्य थे। उन्होंने कवर्धा में कबीरपीठ की स्थापना की थी। उनके गाए भजनों को छत्तीसगढ़ी में लिखा भजन मान लिया गया। श्री तिवारी डॉ. नरेंद्र देव वर्मा के इस कथन से भी सहमत नहीं हैं कि संत धरम दास ने लोक -गीतों की सहज ,सरल शैली में निगूढ़तम दार्शनिक भावनाओं की अभिव्यक्ति की और छत्तीसगढ़ी भाषा की शक्तियों को आत्मसात करते हुए उसे उच्चतर भावनाओं के संवहन योग्य बनाया। 

     श्री तिवारी के अनुसार - "संत धरम दास के एक भी पद छत्तीसगढ़ी लोक-गीतों की शैली में नहीं हैं और न ही छत्तीसगढ़ी भाषा की शक्ति का परिचय कराते हैं। भाषा वैज्ञानिक मानते हैं कि अवधी और बघेली की सहोदरा छत्तीसगढ़ी है। तीनों भाषाएँ एक -दूसरे के बहुत नज़दीक हैं। यही कारण है कि संत धरम दास को छत्तीसगढ़ी का प्रथम कवि करार दिया गया और छत्तीसगढ़ी साहित्य को पन्द्रहवीं सदी तक खींच ले जाया गया । उन्होंने संत धरम दास की छह पंक्तियों के एक पद का उल्लेख किया है और लिखा है कि इस पद में प्रयुक्त मोहे,भै, परगै, धूर, पाछै, नैहर,पाही और बिनवै जैसे शब्दों के लिए छत्तीसगढ़ी में क्रमशः मोला/मोका, भइस, परगे, धुर्रा(कुधरा), पाछू ,आगू , मइके, ससुरार ,विनती का उपयोग होता है।ऐसे में इसे छत्तीसगढ़ी कविता कैसे माना जा सकता है? वस्तुतः यह देर से छत्तीसगढ़ में आए नवजागरण की चेतना का प्रतिफलन है।श्री तिवारी कहते हैं कि बाबू प्यारेलालजी गुप्त छत्तीसगढ़ी काव्य का प्रारंभिक उत्थान  रेवाराम बाबू के भजनों को मानते हैं ,लेकिन उल्लेखनीय है कि रेवाराम बाबू का 'गुटका' हिंदी के अनेक संत कवियों के पदों का संग्रह है। श्री तिवारी के अनुसार छत्तीसगढ़ी काव्य के प्रारंभिक उन्मेष काल की रचनाओं में निरंतरता का अभाव था ।

    श्री नंदकिशोर तिवारी का जन्म 19 जून 1941 को बिलासपुर में हुआ था। हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त श्री तिवारी सम्प्रति अपने गृहनगर बिलासपुर में विगत कई वर्षों से 'छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर'नामक त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ी साहित्य और साहित्यकारों पर उनकी कई पुस्तकें छप चुकी हैं । इनमें 'छत्तीसगढ़ी साहित्य का ऐतिहासिक अध्ययन' भी  शामिल है।उन्होंने पण्डित मुकुटधर पाण्डेय और हरि ठाकुर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर पुस्तकें लिखी हैं ,वहीं  डॉ. नरेंद्र देव वर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित एक पुस्तक का सम्पादन भी किया है।  उनके सम्पादन में पण्डित लोचन प्रसाद पाण्डेय के पुरातात्विक लेखों का एक प्रामाणिक संग्रह 'कौशल -कौमुदी ' शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है। श्री तिवारी की पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी साहित्य :दशा और दिशा' वैभव प्रकाशन रायपुर द्वारा वर्ष 2006 में प्रकाशित की गयी थी।

                      छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार

   डॉ. विनय कुमार पाठक की   पुस्तक  'छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार' लगभग 106 पृष्ठों की 17 सेंटीमीटर लम्बी और 11 सेंटीमीटर चौड़ी यह पुस्तक आकार में छोटी जरूर है ,लेकिन प्रकार में यह  हमें आचार्य रामचंद्र शुक्ल की याद दिलाती है ,जिन्हें  हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन के लिए भी याद किया जाता है। उनकी एक पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार' का पहला संस्करण वर्ष 1971 में प्रकाशित हुआ था। प्रयास प्रकाशन बिलासपुर द्वारा प्रकाशित  यह पुस्तक छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के क्रमिक विकास का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है । छपते ही उन दिनों आंचलिक साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों के बीच इसकी मांग  इतनी बढ़ी कि दूसरा और तीसरा संस्करण भी छपवाना पड़ा। 

दूसरा संस्करण 1975 में और तीसरा वर्ष 1977 में प्रकाशित हुआ था।  पुस्तक का तीसरा संस्करण उन्होंने मुझे 18 अगस्त 1977 को भेंट किया था ,जब वह आरंग के शासकीय महाविद्यालय में प्राध्यापक थे।वहाँ रहते हुए उन्होंने स्थानीय कवियों की रचनाओं का एक छोटा संकलन 'आरंग के कवि ' शीर्षक से सम्पादित और प्रकाशित किया था।  

    बिलासपुर में 11 जून 1946 को जन्मे  डॉ. पाठक छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष  रह चुके हैं। वह  हिन्दी और भाषा-विज्ञान में पी-एच . डी. तथा ङी. लिट् की उपाधियाँ प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार हैं। इन दिनों वह अपने जन्म स्थान और गृहनगर बिलासपुर में साहित्य साधना और समाज-सेवा में लगे हुए हैं। उनके शोध -ग्रंथों में 'छत्तीसगढ़ी साहित्य का सांस्कृतिक अनुशीलन ' और छत्तीसगढ़ी में प्रयुक्त परिनिष्ठित हिंदी और इतर भाषाओं के शब्दों में अर्थ -परिवर्तन' भी उल्लेखनीय हैं।

   डॉ. पाठक ने अपनी  पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार' में  छत्तीसगढ़ी साहित्य के क्रमबद्ध विकास को अलग -अलग कालखण्डों में रेखांकित किया है।  आत्माभिव्यक्ति के तहत डॉ. पाठक ने लिखा है कि इस कृति में स्पष्ट रूप से दो खण्ड हैं, जिसमें पहला खण्ड साहित्य का है और दूसरा साहित्यकारों का।  वह लिखते हैं --"कई झन बिदवान मन छत्तीसगढ़ी साहित्य ल आज ले दू-तीन सौ बरिस तक मान के ओखर कीमत आंकथे। मय उन बिदवान सो पूछना चाहूं के अतेक पोठ अउ जुन्ना भाषा के साहित्य का अतेक नवा होही ? ए बात आने आए के हम ला छपे या लिखे हुए साहित्य नइ मिलै,तभो एखर लोक साहित्य ल देख के अनताज (अंदाज ) तो लगाए जा सकत हे के वो कोन जुग के लेखनी आय ! छत्तीसगढ़ी के कतकोन कवि मरगें ,मेटागें ,फेर अपन फक्कड़ अउ सिधवा सुभाव के कारन ,छपास ले दूरिया रहे के कारन रचना संग अपन नांव नइ गोबिन। उनकर कविता ,उनकर गीत आज मनखे -मनखे के मुंहूं ले सुने जा सकत हे। उनकर कविता म कतका जोम हे ,एला जनैयेच मन जानहीं।"

               शब्द सांख्यिकी नियम से हुआ  काल निर्धारण

      डॉ. पाठक ने लिखा है कि शब्द सांख्यिकी का नियम लगाकर ,युग के प्रभाव और उसकी प्रवृत्ति को देखकर कविता लेखन के समय का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। 'डॉ. नरेंद्र  देव वर्मा' ने शब्द सांख्यिकी नियम लगा कर बताया है कि पूर्वी हिन्दी (अवधी)से छत्तीसगढ़ी 1080 साल पहले नवमी -दसवीं शताब्दी में अलग हो चुकी थी । पुस्तक में डॉ. वर्मा को संदर्भित करते हुए  छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास का काल निर्धारण भी किया है,जो इस प्रकार है -- मौखिक परम्परा (प्राचीन साहित्य )--आदिकाल (1000 से 1500वि) -- चारण काल (1000 से 1200 वि)-- वीरगाथा काल (1200 से 1500 तक ),फिर मध्यकाल(1500 से 1900 वि),फिर लिखित परम्परा यानी आधुनिक साहित्य (1900 से आज तक )फिर आधुनिक काल में भी प्रथम उन्मेष (1900 से 1955 तक )और द्वितीय उन्मेष (1955 से आज तक )।

    आदिकाल के संदर्भ में डॉ. विनय पाठक लिखते हैं --इतिहास के पन्ना ल उल्टाये ले गम मिलथे के 10 वीं शताब्दी ले 12वीं शताब्दी तक हैहयवंशी राजा मन के कोनो किसिम के लड़ाई अउ बैर भाव नइ रिहिस।उनकर आपुस म मया भाव अउ सुमता दिखथे। ए बीच  बीरगाथा के रचना होना ठीक नई जान परै।ओ  बखत के राजा मन के राज म रहत कवि मन के जउन राजा के बीरता ,गुनानवाद मिलथे (भले राजा के नांव नइ मिलै)।ओ अधार ले एला चारण काल कहि सकत हन । बारहवीं  शताब्दी के छेवर-छेवर मा इन मन ल कतको जुद्ध करना परिस ।ये तरह 12 वीं शताब्दी के छेवर -छेवर ले 1500 तक बीर गाथा काल मान सकत हन।ये ही बीच बीरता ,लड़ाई ,जुद्ध के बरनन होइस हे, एमा दू मत नइये।

  डॉ. पाठक वर्ष 1000 से 1500 तक को आदिकाल या वीरगाथा काल के रूप में स्थापित किए जाने के डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के विचार  को आधा ठीक और आधा गलत मानते हैं। उन्होंने आगे  लिखा है --"गाथा बिसेस के प्रवृति होय के कारण ये जुग ल गाथा युग घलो कहे जा  सकत हे।एमा मिलत प्रेमोख्यान गाथा म अहिमन रानी ,केवला रानी असन अबड़ कन गाथा अउ धार्मिक गाथा म पंडवानी, फूलबासन ,असन कई एक ठो गाथा ल ए जुग के रचना कहे अउ माने जा सकत हे। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ह 1000 ले 1500 तक के जुग ल आदिकाल या बीरगाथा काल कहे हे ,जउन ह आधा ठीक अउ आधा गलत साबित होथे। "

                   छत्तीसगढ़ी के प्रथम कवि धरम दास !

  आगे डॉ. पाठक ने छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास क्रम में  मध्यकाल और आधुनिक साहित्य से जुड़े तथ्यों की चर्चा की है। उन्होंने मध्यकालीन साहित्य में  भक्ति धारा के प्रवाहित होने के  प्रसंग में लिखा है कि  संत कबीरदास के शिष्य धरम दास को छत्तीसगढ़ी का पहला कवि माना जा सकता है। डॉ. पाठक लिखते हैं -- "राजनीति के हेरफेर अउ  चढ़ाव -उतार के कारन समाज म रूढ़ि ,अंधविश्वास के नार बगरे के कारन ,मध्यकाल म लोगन के हिरदे ले भक्ति के धारा तरल रउहन बोहाये लागिस।वइसे तो इहां कतको भक्त अउ संत कवि होगे हें ,फेर उंकर परमान नइ मिल सके के कारन उनकर चरचा करना ठीक नोहय।कबीरदास के पंथ ल मनैया कवि मन के अतका परचार-परसार होय के कारन इहां कबीरपंथ के रचना अबड़ मिलथे। एही पंथ के रद्दा म रेंगइया कबीरदास के पट्ट चेला धरम दास ल छत्तीसगढ़ी के पहिली कवि माने जा सकत हे।घासीदास के पंथ के परचार के संग संग कतको रचना मिलथे ,जउन हर ये जुग के साहित्य के मण्डल ल भरथे। "

 छत्तीसगढ़ी में कहानी ,उपन्यास ,नाटक और एकांकी ,निबंध और समीक्षात्मक लेख भी खूब लिखे गए हैं। अनुवाद कार्य भी खूब हुआ है। पुस्तक की शुरुआत डॉ. पाठक ने 'छत्तीसगढ़ी साहित्य' के अंतर्गत गद्य साहित्य से करते हुए  यहाँ के गद्य साहित्य की इन सभी  विधाओं के प्रमुख  लेखकों और उनकी कृतियों का उल्लेख किया है। डॉ. पाठक के अनुसार   कुछ विद्वान  छत्तीसगढ़ी गद्य का सबसे पहला नमूना  दंतेवाड़ा के शिलालेख को बताते हैं ,जबकि यह मैथिली के रंग में रंगा हुआ है। 

                 आरंग का शिलालेख छत्तीसगढ़ी गद्य का पहला नमूना 

     अपनी इस पुस्तक में डॉ. पाठक ने लिखा है कि  आरंग में मिले सन 1724 के शिलालेख को छत्तीसगढ़ी गद्य लेखन का पहला नमूना माना जा सकता है।इसका ठोस कारण ये है कि यह (आरंग)निमगा (शुद्ध )छत्तीसगढ़ी की जगह है और यह कलचुरि राजा अमर सिंह का शिलालेख है। सन 1890 में हीरालाल काव्योपाध्याय का 'छत्तीसगढ़ी व्याकरण ' छपकर आया ,जिसमें ढोला की कहानी और रामायण की कथा भी छपी है ,जिनकी भाषा मुहावरेदार और काव्यात्मक है।अनुवादों के प्रसंग में डॉ. पाठक ने एक दिलचस्प जानकारी दी है कि सन 1918 में पंडित शुकलाल प्रसाद पाण्डेय ने शेक्सपियर के लिखे 'कॉमेडी ऑफ एरर्स ' का अनुवाद 'पुरू झुरु' शीर्षक से किया था । पंडित मुकुटधर पाण्डेय ने कालिदास के 'मेघदूत' का छत्तीसगढ़ी अनुवाद करके एक बड़ा काम किया है।डॉ. पाठक की पुस्तक में 'छत्तीसगढ़ी साहित्य म नवा बिहान 'शीर्षक ' के अंतर्गत प्रमुख कवियों की कविताओं का भी जिक्र किया गया है।

                              लिखित परम्परा की शुरुआत 

       छत्तीसगढ़ी साहित्य में आधुनिक काल की चर्चा प्रारंभ करते हुए अपनी इस पुस्तक में डॉ. पाठक कहते  हैं-"कोनो बोली ह तब तक भाषा के रूप नइ ले लेवै ,जब तक ओखर लिखित परम्परा नइ होवै।" इसी कड़ी में उन्होंने आधुनिक काल के अंतर्गत छत्तीसगढ़ी के लिखित साहित्य के प्रथम और द्वितीय उन्मेष पर प्रकाश डाला है। प्रथम उन्मेष में उन्होंने सन 1916 के आस -पास राजिम के पंडित सुन्दरलाल शर्मा रचित 'छत्तीसगढ़ी दानलीला 'सहित आगे के वर्षों में प्रकाशित कई साहित्यकारों की कृतियों की जानकारी दी है।

                            सुराज मिले के पाछू नवा-नवा प्रयोग 

    डॉ. पाठक ने पुस्तक में द्वितीय उन्मेष के अंतर्गत लिखा है  -  --"सुराज मिले के पाछू  हिन्दी के जमों उप -भाषा अउ बोली डहर लोगन के धियान गिस।ओमा रचना लिखे के ,ओमा सोध करेके ,ओमा समाचार पत्र अउ पत्रिका निकारे के काम धड़ाधड़ सुरू होगे। छत्तीसगढ़ी म ए बीच जतका प्रकाशन होइस ,साहित्य म जतका नवा -नवा प्रयोग होइस ,ओखर ले छत्तीसगढ़ी के रूप बने लागिस,संवरे लागिस।अउ आज छत्तीसगढ़ी ह आने रूप म हमार आघू हावै। छत्तीसगढ़ी डहर लोगन के जउन रद्दी रूख रहिस ,टरकाऊ बानी रहिस ,अब सिराय लागिस। छत्तीसगढ़ी साहित्य ह अब मेला -ठेला ले उतरके लाइब्रेरी ,पुस्तक दुकान अउ ए .एच. व्हीलर इहां आगे। लाउडस्पीकर म रेंक के बेंचई ले उठके रेडियो, सिनेमा अउ कवि सम्मेलन तक हबरगे।गंवैहा मन के चरचा ले असकिटिया के 'काफी हाउस' अउ 'साहित्यिक गोष्ठी ' के रूप म ठउर जमा लिस। लोगन के सुवाद बदलगे, छत्तीसगढ़ के भाग पलटगे। " 

      डॉ. पाठक ने छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार' में 'द्वितीय उन्मेष' के तहत वर्ष 1950 से 1970 के दशक में प्रकाशित छत्तीसगढ़ी के अनेक कवियों के कविता -संग्रहों का उल्लेख करते हुए यह भी लिखा है कि वर्ष 1955 से एक वर्ष तक छपी और मुक्तिदूत द्वारा सम्पादित 'छत्तीसगढ़ी' मासिक पत्रिका ने एक अंक छत्तीसगढ़ी कविताओं का भी प्रकाशित किया था ,जिसमें 21 कवियों की रचनाएँ शामिल थीं।  'द्वितीय उन्मेष ' डॉ. पाठक ने अनेक कवियों   की चर्चा की है। साथ ही उन्होंने इनमें से 25 प्रमुख कवियों के काव्य गुणों का उल्लेख करते हुए उनकी एक -एक रचनाएँ भी प्रस्तुत की हैं। 

         इसमें दो राय नहीं कि   छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की विकास यात्रा ने इतिहास के दुर्गम पथ पर चलते हुए  अपने हर पड़ाव पर छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाया है। इसका श्रेय  उन सभी ज्ञात ,अल्प ज्ञात और अज्ञात कवियों और लेखकों को दिया जाना चाहिए ,जिनकी  रचनाओं ने देश के साहित्यिक मानचित्र पर  इस प्रदेश का नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित किया है।

    आलेख  -- स्वराज्य करुण 

      

Wednesday, October 5, 2022

(पुस्तक -चर्चा ) अग्नि -स्नान : आत्मग्लानि से पीड़ित रावण की आत्मकथा

                                            (आलेख : स्वराज्य करुण )

भारत में और विशेष रूप से उत्तर भारत में विजयादशमी का  दिन रावण पर श्रीराम के विजय पर्व के रूप में मनाया जाता है। लंकापति रावण भले ही प्रकाण्ड विद्वान रहा हो ,लेकिन अपनी अहंकारी मनोवृत्ति  और  सीताजी के अपहरण के जघन्य अपराध की वजह से उसका और उसके वैभवशाली साम्राज्य का पतन हो गया।  विजयादशमी का एक महान संदेश यह भी है कि व्यक्ति को अहंकार से दूर रहना चाहिए। बहरहाल , सभी मित्रों को विजयादशमी की हार्दिक शुभेच्छाओं सहित  आज मैं यहाँ रावण की ज़िन्दगी पर केन्द्रित उपन्यास 'अग्निस्नान' की चर्चा कर रहा हूँ। मेरे विचार से यह उपन्यास  रावण के अपराधबोध के साथ -साथ उसकी आत्मग्लानि की आत्मकथा भी है। 

   कालजयी महाकाव्य 'रामायण ' के श्रीराम भारतीय समाज और संस्कृति के रोम -रोम  में रमे हुए हैं। लोक आस्था और विश्वास के प्रतीक के रूप में भारत की धरती के कण -कण में उनकी महिमा व्याप्त है। वह भारतीय संस्कृति के लोक नायक हैं। आशा और विश्वास के आलोक पुंज हैं।  लेकिन जिस प्रकार दिन और रात हमारी पृथ्वी और प्रकृति के दो अनिवार्य पहलू हैं ,उसी तरह किसी भी ऐतिहासिक और पौराणिक घटना पर आधारित कथाओं और महाकाव्यों में नायकों  और खलनायकों  का होना भी अनिवार्य है। नायक अच्छाई का और खलनायक बुराई का प्रतीक होते हैं और दोनों के बीच संघर्ष में नायक विजयी होता है।  खलनायक की पराजय मनुष्य को हमेशा सदमार्ग पर चलने का संदेश दे जाती है।महर्षि वाल्मीकि रचित संस्कृत महाकाव्य 'रामायण' और उस पर आधारित महाकवि तुलसीदास के अवधी महाकाव्य 'रामचरितमानस'  का भी यही संदेश है। इन महाकाव्यों के पौराणिक प्रसंगों पर इस आधुनिक युग मे  कई नाटक भी  लिखे गए हैं । रामलीलाओं का नाट्य  मंचन तो पता नहीं ,कब से होता चला आ रहा है !  फिल्में भी बनी हैं , टेलीविजन सीरियल भी आए हैं और उपन्यास भी लिखे गए हैं। 

                                                       


लेकिन हिन्दी में 'रामायण' के  खलनायक 'रावण ' पर केंद्रित उपन्यासों में  सिर्फ आचार्य चतुरसेन के "वयं रक्षामः' की याद आती है। निश्चित रूप से वह उनका  एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कालजयी उपन्यास है।   इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार शिवशंकर पटनायक का  उपन्यास 'अग्नि स्नान'  भी है , जो  'वयम रक्षामः 'की तुलना में अब तक कम प्रचारित है। लेकिन प्रवाहपूर्ण भाषा में पौराणिक घटनाओं का रोचक और रोमांचक वर्णन अग्नि -स्नान ' के पाठकों को भी अंत तक अपने मोहपाश में बांधकर रखता है।  उपन्यास का मूल संदेश यही है कि व्यक्ति कितना ही विद्वान क्यों न हो ,शारीरिक ,सामाजिक ,आर्थिक,राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से कितना ही  बलशाली क्यों न हो , सिर्फ़ एक चारित्रिक दुर्बलता उसे पतन के गर्त में ढकेल देती है । 

         रावण  निश्चित रूप से महाप्रतापी था।  वेदों और पुराणों का महापंडित और भाष्यकार था । रक्ष -संस्कृति का प्रवर्तक था । उसने स्वयं वेदों की अनेक ऋचाओं के साथ  महातांडव मंत्र की भी रचना की थी। वह परम शिवभक्त था। उसकी कठिन तपस्या से प्रभावित होकर भगवान शिव ने उसे नाभिकुण्ड में अमृत होने का वरदान दिया था ।  उसने अपने  तत्कालीन समाज में अनार्यो को एकता के सूत्र में बांधने के लिए  रक्ष -संस्कृति की स्थापना की थी ।लेकिन काम -वासना के उसके चारित्रिक दुर्गुण ने , सत्ता के अहंकार ने , मायावती , वेदवती , रंभा और सीता जैसी नारियों के अपमान ने उसे युद्ध के मैदान में राम के अग्नि बाणों से शर्मनाक पराजय के साथ अग्नि -स्नान के लिए बाध्य कर दिया।

       आत्मग्लानि की आत्मकथा 

रावण की हार तो हुई ,लेकिन पत्नी मंदोदरी और भ्राता विभीषण को छोड़कर उसके समूचे वंश का नाश हो गया।  उपन्यास 'अग्नि -स्नान ' रावण के अपराध बोध और पश्चाताप की महागाथा है। उसकी आत्मग्लानि की आत्मकथा है। हालांकि इसमें उसके व्यक्तित्व की विशेषताओं को भी  उभारा गया है। 


                                                               


                                                   उपन्यासकार शिवशंकर पटनायक 

श्रीराम के हॄदय की विशालता 

   वहीं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के हॄदय की विशालता को भी प्रेरणास्पद ढंग से उपन्यास में  रेखांकित किया गया है। रणभूमि में रावण अग्नि बाणों से आहत होकर मृत्यु शैया पर है। राम अपने भ्राता लक्ष्मण को उससे राजनीति की शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजते हैं। वह कहते हैं -"महाप्रतापी ,महापंडित व महान शिव भक्त लंकेश को मैंने  पुनः प्राण तथा चेतना इसलिए प्रदान की है,ताकि अनुज लक्ष्मण लंकाधिपति से सम्यक ज्ञान ,विशेषकर राजनीति से संबंधित शिक्षा प्राप्त कर सके। " 

 श्रीराम के व्यक्तित्व से प्रभावित रावण     

   राम के व्यक्तित्व से रावण भी प्रभावित हो गया था। लक्ष्मण को शिक्षा प्रदान करने से पहले रावण उनसे कहता है -- "अल्पायु में ही राघवेंद्र श्री राम ने साधन -विहीन होकर भी जिस कला ,चातुर्य तथा व्यवहार बल से अबोध ,अज्ञानी वानर ,भालुओं को संगठित कर अपराजेय माने जाने वाले लंकाधिपति तथा समस्त समय -वीर राक्षसों को पराजित कर दिया ,उनका व्यक्तित्व ही राजनीति का सार है। भला फिर किसी राजनैतिक ज्ञान की महत्ता कहाँ रह जाती है ?" 

लक्ष्मण को रावण की शिक्षा आज भी प्रेरणादायक

इसके बावजूद  रावण जिस तरह लक्ष्मण को अपने आध्यात्मिक ज्ञान के साथ राजनीति की शिक्षा देते हैं ,वह आज के समय में भी प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक राजनीतिज्ञ के लिए जानने ,समझने और प्रेरणा ग्रहण करने लायक है। वह कहता है --"राजा को अनासक्त भाव से मनोविकारों यथा -काम ,क्रोध ,लोभ ,मोह ,मद तथा मत्सर पर विजय प्राप्त करनी चाहिए ,क्योंकि ये राजा को सार्थक उत्थान से रोकते हैं।राजा को द्यूत ,मदिरा और स्त्री-प्रसंग से भी अनिवार्य रूप से बचना चाहिए ,क्योंकि ये विवेक को नष्ट करते हैं। अविवेकी राजा में उत्तम निर्णय लेने का गुण नहीं होता ,तथा वह आगत परिणामों को भी नज़र -अंदाज़ कर जाता है,जिससे वह नष्ट तो होता ही है ,उसके कारण राज्य की प्रजा का जीवन भी नारकीय हो जाता है।" मृत्यु शैया पर पड़े रावण की आँखों में उसके वैभवशाली और शक्तिशाली राजकीय जीवन की प्रत्येक घटना किसी चलचित्र की तरह तैर रही है। वह स्वयं इनका वर्णन कर रहा है। इसमें  इस महाप्रतापी के  पश्चाताप की और आत्मग्लानि की  अनुगूंज भी है। उसे अपने जीवन की प्रत्येक घटना फ्लैशबैक में याद आ रही है। अपने पितामह ऋषि पुलस्त्य पत्नी मंदोदरी और भाई विभीषण  की नसीहतें भी उसे पतन के मार्ग पर चलने से रोक नहीं पायी।

   रक्ष -संस्कृति का नष्ट होना 

  उसने जिस अच्छे  उद्देश्य से  रक्ष -संस्कृति की स्थापना की थी ,वह उसके ही अविवेकपूर्ण  कार्यो की वजह से नष्ट  होती चली गयी। उसने ताड़का को नैमिषारण्य और वज्रमणि (सूर्पनखा)को दंडकारण्य का प्रभार सौंपा था। ताड़का और वज्र मणि के सैनिक रक्ष संस्कृति के विपरीत आचरण करते हैं। एक स्थान पर रावण कहता है --"ताड़का ,सुबाहु, मारीच तथा राक्षस -सेना ने मेरे द्वारा स्थापित संस्कृति के विरुद्ध आचरण किया था ,जबकि यज्ञ में विघ्न उपस्थित करना ,ऋषियों को अपमानित करना ,उनके आश्रमों को क्षति पहुँचाना तथा निरंकुश व मर्यादा विहीन आचरण करना वर्जित था। रावण आगे कहता है -- वास्तव में नियंत्रण के अभाव में राक्षसों की संख्या में तो कल्पनातीत वृद्धि हुई थी ,किंतु संस्कृति का भाव उनमें लेशमात्र भी नहीं था।मुझे यह स्वीकारने में संकोच नहीं है कि उनका आचरण मात्र धर्म -विपरीत ही नहीं ,अत्यंत निम्न कोटि का था।वे दुर्दांत पशु की तरह आचरण कर रहे थे।सभी आत्म केन्द्रित व पर-पीड़क हो गए थे। उनमें लंकाधिपति रावण के प्रति गर्व तो था ,किन्तु भय नहीं था। मुझे निश्चय ही अपनी संस्कृति से अनुराग था। मैंने संस्कृति के उन्नयन के लिए जिस साधना ,त्याग व युद्धबल का प्रयोग किया था ,वे सभी मुझे निरर्थक प्रतीत होने लगे थे। किसी भी संस्कृति में दया ,क्षमा ,त्याग ,संवेदनशीलता,जीवन -मूल्यों के प्रति आस्था ,धर्म ,चिंतन-दर्शन आदि तो आवश्यक हैं,साथ ही संस्कृति को अहिंसक भाव से भी युक्त होना चाहिए।किन्तु मैं जो अब राक्षसों के कृत्यों को देख रहा था ,उनकी संस्कृति में तो केवल बर्बरता,पर -पीड़ा ,हिंसा तथा अधार्मिकता की ही प्रबलता थी। मैंने शोषण ,अत्याचार तथा उत्पीड़न के विरुद्ध इस संस्कृति की कामना की थी ,किन्तु देवों अथवा आर्यों से कहीं अधिक तो राक्षस ही शोषण ,उत्पीड़न तथा अत्याचार को बढ़ावा दे ही नहीं रहे थे ,अपितु मूर्तरूप में उसे क्रियान्वित भी कर रहे थे।स्थिति तो यह थी कि जितना सत्ता -मद मुझे नहीं था ,उससे कहीं अधिक उनमें व्याप्त हो गया था । स्पष्ट प्रतीत होने लगा था कि राक्षस का अर्थ ही आतंक ,अत्याचार और बलात्कार था।" 

अविवेकपूर्ण आचरण से पतन की ओर 

रावण के इस कथन से  हालांकि यह प्रकट होता है कि रक्ष -संस्कृति को लेकर उसका  चिंतन  मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था , लेकिन वह स्वयं अविवेकपूर्ण आचरण की वजह से पतन की ओर अग्रसर हो रहा था।  उसके विद्वतापूर्ण व्यक्तित्व का एक आदर्श पहलू यह भी था कि लंका विजय के लिए प्रस्थान के पहले जब  श्रीराम समुद्र के किनारे भगवान शिव की प्राण प्रतिष्ठा करना चाह रहे थे और उन्हें इस कार्य के लिए ब्राम्हण पुरोहित नहीं मिल रहा था ,तब इस बारे में  सुनकर रावण ने स्वप्रेरणा से यह कार्य करने निर्णय लिया और एक पुरोहित का रूप धारण कर , राम की सेना के बीच आया और उनके हाथों यज्ञ सम्पन्न करवाकर शिव लिंग की स्थापना की। यह स्थान रामेश्वरम के नाम से प्रसिद्ध है।

 सदगुणों  के बावज़ूद विरोधाभासी चरित्र 

 इस प्रकार के अनेक सद्गुणों  के बावज़ूद रावण के चरित्र में भयानक  विरोधाभास था। उसने असुराधिपति तिमिधवज की पत्नी मायावती से छलपूर्वक बलात्कार किया । जो उसकी (रावण की )पत्नी मंदोदरी की बड़ी बहन थी।  बलात्कार के मानसिक आघात से पीड़ित तो थी ही ,उसका पति तिमिधवज आर्यों और देवों की सेना से हुए  एक युद्ध में मारा भी गया था। इस  दोहरी मानसिक पीड़ा ने मायावती को सती के रूप में अग्नि-स्नान के लिए बाध्य कर दिया था। उसने अपने भाई कुबेर के पुत्र जल कुबेर की प्रेयसी रंभा से बलात्कार किया। ब्रम्हर्षि कुशध्वज की पुत्री वेद कन्या वेदवती से उसकी तपस्या के दौरान  बलात्कार का प्रयास किया ,जिसने अग्नि प्रज्ज्वलित कर अपनी रक्षा की और  धरती में समा गई। लेकिन उसने रावण को श्राप दिया कि वह अगले जन्म में विदेह जनक सूता के रूप में,अयोनिजा जानकी के रूप में जानी जाएगी और उसकी मृत्यु का कारण बनेगी। वही वेदवती राजा जनक की पुत्री सीता के रूप में स्वयंवर में भगवान श्रीराम को वरण करती है, जिसका अपहरण  रावण द्वारा छलपूर्वक किया जाता है और जिसकी खोज में राम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ वानरों की सेना लेकर लंका की ओर प्रस्थान करते हैं। उपन्यास में भगवान श्रीराम द्वारा किष्किंधा नरेश वानर राज बाली की छलपूर्वक वध किये जाने की घटना का भी उल्लेख है।

    श्रीराम के समक्ष पश्चाताप

  इन समस्त घटनाओं का वर्णन मरणासन्न अवस्था मे रावण करता है।अंत मे वह युद्ध भूमि में ही भगवान श्रीराम के समक्ष पश्चाताप करते हुए अपने तमाम अपराधों को स्वीकारता है। वह कहता है -"तुमने अग्नि -बाण चलाकर मेरा सर्वस्व जला दिया।श्रीराम तुमने उचित किया।दसकंधर रावण की नियति यही है कि वह अग्नि -दग्ध होता रहे।आगत में जो नारी -अस्मिता को खंडित करने का प्रयास करेगा अथवा सामाजिक मूल्यों एवं मानवीय संवेदनाओं का हनन करने का घिनौना कृत्य करेगा,वह रावण की नियति को प्राप्त कर अग्नि -स्नान को बाध्य होगा।रावण ने भले ही गो -लोक प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त कर लिया है ,पर उसके कृत्य रावण को जीवित रखेंगे और समय स्वयमेव श्रीराम का रूप लेकर उसे अग्नि -स्नान कराता रहेगा। आगत के लिए यही सत्य , शाश्वत रूप में स्वीकार्य होगा ,क्योंकि रावण की नियति ही है अग्नि -स्नान ।"  रावण के प्रायश्चित से भरे इन वाक्यों के साथ ही 256 पृष्ठों के इस उपन्यास का समापन होता है।

शिवशंकर पटनायक : पौराणिक उपन्यासों के लेखक 

उपन्यासकार शिवशंकर पटनायक छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार हैं। वह महासमुन्द जिले के तहसील मुख्यालय पिथौरा के रहने वाले हैं। विगत कुछ वर्षों में उनके अनेक कहानी संग्रह ,निबंध संग्रह और उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। इनमें  रामायण और महाभारत के पात्रों पर केन्द्रित उपन्यास विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।  माता कौशल्या की आत्मकथा को उन्होंने 'कोशल नंदिनी ' के रूप में उपन्यास के सांचे में ढाला है तो 'आत्माहुति' केकैयी के जीवन पर आधारित है। वहीं ' भीष्म प्रश्नों की शरशैय्या पर' , 'कालजयी कर्ण'  और 'एकलव्य' महाभारत के इन चर्चित चरित्रों पर केन्द्रित हैं।  इन कृतियों ने यह साबित कर दिया है कि शिवशंकर पटनायक  पौराणिक उपन्यासों के भी  सिद्धहस्त लेखक हैं।   प्राचीन महाकाव्यों के पौराणिक चरित्रों पर अलग -अलग उपन्यास लिखना कोई मामूली  बात नहीं है। इसके लिए उनकी भावनाओं को ,उनकी संवेदनाओं को ,उनके भीतर की मानसिक उथल -पुथल को हृदय की गहराइयों से महसूस करने वाला लेखक ही इस  कठिन चुनौती को स्वीकार कर सकता है । पौराणिक घटनाओं के  तथ्यपूर्ण  वर्णन के लिए प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करना पड़ता है ,जिन्हें कथोपकथन में और पात्रों के संवादों में अपनी कल्पनाशीलता के साथ सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने पर ही एक बेहतरीन उपन्यास की रचना होती है। इस नज़रिए से देखें तो अपने अनेक पौराणिक उपन्यासों की श्रृंखला में 'अग्नि -स्नान' शिवशंकर पटनायक का एक सफल और कालजयी उपन्यास है ।-- स्वराज्य करुण