Tuesday, September 22, 2026

(पुस्तक -चर्चा ) महान संत गुरुनानक देव जी छत्तीसगढ़ यात्रा पर एक महत्वपूर्ण किताब /आलेख -स्वराज्य करुण

 महान संत गुरुनानक देव की छत्तीसगढ़ यात्रा पर एक महत्वपूर्ण किताब 

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         (आलेख  -स्वराज्य करुण )

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महान संत और सिक्ख धर्म के संस्थापक गुरुनानक देव जी आज से लगभग 520  साल पहले छत्तीसगढ़ भी आए थे. वे भारत भ्रमण पर निकले थे और वर्ष 1506 ईस्वी में अमरकंटक से शिवरीनारायण होकर जगन्नाथपुरी जाते हुए छत्तीसगढ़ के ग्राम गढ़फुलझर भी आए थे. इस गाँव से लगे हुए तत्कालीन रानीसागर नामक गाँव में उनका दो दिवसीय पड़ाव था.  गुरुनानक जी के आगमन की याद में रानी सागर का नामकरण 'नानक सागर'  किया गया. गढ़फुलझर और उससे लगा हुआ नानक सागर वर्तमान महासमुंद जिले के अंतर्गत बसना तहसील में हैं . यहाँ पर नानक सागर साहिब गुरुद्वारा भी है.दोनों ओड़िशा के सीमावर्ती गाँव हैं . गढ़फुलझर और नानक सागर आज पूरे देश के सिक्ख समाज की आस्था का प्रमुख केन्द्र बन गए हैं.गुरुनानक जी जगन्नाथ पुरी की यात्रा से वापसी में भी गढ़फुलझर आए थे. उन दिनों छत्तीसगढ़ को दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था. उन दिनों कहीं आने -जाने के लिए आज जैसे साधन नहीं थे. जरा सोचिए, उस दौर में गुरुनानक जी जैसी महान विभूतियाँ अपने प्रेरक विचारों को जन -जन तक पहुँचाने के लिए सैकड़ों, हज़ारों मील की यात्रा कैसे करती रही होंगी! गुरुनानक देव जी भी अपने अनुयायियों के साथ पंजाब से जगन्नाथ पुरी शायद पैदल जा रहे थे. 

                                                        


                                      दिव्य धाम नानक सागर 

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           पूरी दुनिया को सत्य, अहिंसा, दया, करुणा और परोपकार जैसे सर्वश्रेष्ठ मानव मूल्यों का संदेश देने वाले गुरुनानक देव जी के छत्तीसगढ़ प्रवास से जुड़े कई ऐतिहासिक तथ्य हाल के कुछ वर्षों में सामने आए हैं. उनकी छत्तीसगढ़ यात्रा से जुड़े इस प्रकार के विभिन्न ज्ञानवर्धक प्रसंगों पर छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार, पिथौरा (जिला -महासमुंद )निवासी श्री शिवशंकर पटनायक ने 'दिव्य धाम नानक सागर ' शीर्षक से एक महत्वपूर्ण किताब लिखी है.  श्री पटनायक से मिलने मैं उस दिन शाम को उनके घर गया था, जहाँ उनके हाथों मुझे उनकी इस मूल्यवान पुस्तक की सौजन्य प्रति प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त हुआ. उन्होंने प्रबुद्धजनों के विचारों को और उनके द्वारा रखे गए तथ्यों को संकलित और सम्पादित करते हुए  अपने भी विचार इसमें शामिल किए हैं. 

         अब तक 38 किताबें प्रकाशित ; 39 वीं जल्द आएगी 

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पौराणिक और सामाजिक विषयों पर श्री पटनायक की 37 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. यह उनकी 38वीं किताब है, जबकि भगवान श्री रामचंद्र जी के अनुज भरत पर भी उनकी एक पुस्तक जल्द आने वाली है. श्री पटनायक के पौराणिक उपन्यासों में माता कौशल्या पर 'कोशल नंदिनी' रावण की आत्मग्लानि पर 'अग्नि स्नान ', छत्तीसगढ़ के लोक देवता पर 'देवी करिया धुर्वा' , महाभारत के कर्ण पर 'कालजयी कर्ण ' और प्रश्नों की शर शैय्या पर भीष्म ' कहानी संग्रह 'पराजित पुरुष ', 'मंदिर सलामत है' आदि शामिल हैं. 

                उनके साहित्य पर अब तक चार पीएच-डी.

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श्री पटनायक के साहित्य पर शोधर्थियों द्वारा अब तक चार पीएच -डी. भी की जा चुकी है. ताजा शोध प्रबंध वर्ष 2026 में श्री बेनु प्रसाद सिदार ने लिखा है, जिसका विषय है 'शिवशंकर पटनायक के पौराणिक उपन्यासों के नारी -पात्रों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण. यह शोध कार्य पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर के अंतर्गत किया गया है. 

 श्री शिवशंकर पटनायक द्वारा रचित पुस्तक 'दिव्य धाम नानक सागर 'के प्रकाशक पिथौरा निवासी वरिष्ठ पत्रकार श्री रजिन्दर सिंह खनूजा हैं. गुरुनानक देव जी की गढ़फुलझर यात्रा के विभिन्न ऐतिहासिक तथ्यों के खोजकर्ता टाटीबंध, रायपुर के श्री अमृत पाल सिंह (रिंकू ) ओबेरॉय हैं, जो नानक सागर रिसर्च टीम के प्रमुख भी हैं.उल्लेखनीय है .महासमुंद जिले का बसना -सरायपाली क्षेत्र राजवंशों के समय फुलझर राज के  नाम से जाना जाता था. यह एक रियासत थी.लेखक श्री पटनायक ने इस पुस्तक की रचना करने से पहले पत्रकार श्री खनूजा के साथ स्वयं गढ़फुलझर और नानक सागर का अध्ययन दौरा किया था और स्थानीय लोगों से बातचीत करके कई तथ्य भी संकलित किए थे.

         भैना राजवंश के शासन काल में छत्तीसगढ़ आए थे गुरुनानक जी 

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    वर्ष 2023 में प्रकाशित लगभग 150 पन्नों की सुन्दर छपाई और रंगीन चित्रों से सुसज्जित इस पुस्तक के लिए सहयोग राशि 151 रूपए रखी गई है. पुस्तक में गढ़फुलझर के भैना राजवंश की भी जानकारी मिलती है. भैना राजाओं के वंशज श्री राजा राम राजभानू (डिप्टी रजिस्ट्रार -फर्म्स एवं सोसायटीज )ने पुस्तक में 'प्रफ्फुलित मन ' शीर्षक अपने संदेश में लिखा है कि भैना राजा जगत साय ठाकुर के वंशज एवं फुलझर राज्य के संस्थापक राजा फूलसाय  भैना ठाकुर ने गढ़ फुलझर राज की स्थापना की थी. उनकी 18पीढ़ियों ने यहाँ राज किया था.इनमें सभी धर्मानुरागी थे. श्री राजा राम राजभानू के अनुसार जब गढ़फुलझर के राजपाट की ज़िम्मेदारी मानस राज सागरचंद भैना को सौंपी गई, जो अत्यंत कुशल प्रशासक और धर्मशील थे, उनके ही राज काल में गुरुनानक देव जी का गढ़फुलझर आगमन हुआ, जहाँ रानी सागर (अब नानक सागर ) में दो दिन के पड़ाव में उन्होंने लोगों को अपना उपदेश दिया था. गढ़फुलझर के राजा मानस राज सागर चंद भैना ने गुरुनानक जी के नाम पर 5एकड़ ज़मीन भी दी थी.

                       छत्तीसगढ़ और पंजाब के बीच बना ऐतिहासिक रिश्ता 

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मेरे विचार से इसे हम तत्कालीन छत्तीसगढ़ और पंजाब राज्य के बीच बना ऐतिहासिक आत्मीय रिश्ता भी कह सकते हैं. पुस्तक में 'गढ़फुलझर' शीर्षक एक अध्याय में श्री मनमोहन दास वैष्णव को संदर्भित करते हुए भैना राज्य के पूर्व शासक भानुमान का वैवाहिक संबंध चण्डीगढ़ राज्य  उनका  राजकुमारी चंदन कुमारी के साथ होने और इसके फलस्वरूप दोनों राज्यों में प्रगाढ़ मैत्री संबंध स्थापित होने की भी जानकारी दीं गई है. यह भी बताया गया है कि दोनों राज्यों के बीच बहुत दूरी होने के बावजूद प्रजा एक -दूसरे के राज्य में आना -जाना करती थी गुरुनानक जी के अनुयायियों और भक्तों का आगमन भी भैना काल में (गढ़फुलझर क्षेत्र में ) लगातार होता रहा, जिसका प्रभाव यहाँ भी पड़ा.श्रीमनमोहन वैष्णव के अनुसार  समय अबाध गति से बढ़ रहा था, उसी क्रम में पंजाब और गढ़फुलझर के नागरिकों के मध्य संबंध भी बढ़ रहे थे. पंजाब से आए सिखों का मन भी यहाँ रमने लगा था. उन्होंने गढ़फुलझर राज्य में बस जाने का मन बना लिया और स्थायी रूप से रहने लगे. इतने लम्बे संबंधों के कारण स्थानीय रीति -रिवाज, बोली -भाषा, रहन -सहन और संस्कारों को उन्होंने कब स्वीकार कर लिया, यह उन्हें ज्ञात नहीं. इस प्रकार भक्तिकाल में गुरुनानक देव जी के भव्य व्यक्तित्व, वाणी, कीर्तन और उपदेशों का प्रचार -प्रसार भैना राज्य में व्यापक रूप से होने लगा पुस्तक में दिए गए तथ्यों के अनुसार गुरुनानक जी के आगमन पर स्थानीय ग्रामीणों ने उनका शानदार आत्मीय स्वागत किया था.  इस जगह को स्थानीय लोग बावा डेरा भी कहते हैं.

               

             *गुरुनानक जी से प्रभावित हुआ छत्तीसगढ़ का बंजारा समाज *

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 छत्तीसगढ़ का बंजारा समाज भी गुरुनानक जी के उपदेशों को मानने वाला समाज है. पुस्तक से यह भी जानकारी मिलती है कि  लगभग एक हजार बंजारा परिवार इस क्षेत्र के 40 गाँवों में रहते हैं.पुस्तक में नानक सागर रिसर्च टीम के प्रमुख अमृत पाल सिंह (रिंकू )ने  बंजारा समाज के प्रतिनिधियों से हुई चर्चा का भी उल्लेख किया है. उनके हवाले से उन्होंने लिखा है कि बंजारा समाज के पूर्वजों द्वारा गुरुनानक देव जी के नाम से शिवरीनारायण में करीब 5जगहों पर 9 एकड़ जमीन दी गई थी, जो आज भी मौज़ूद है. शिवरीनारायण में और गढ़फुलझर के पास ग्राम लिलेश्वर और जेवरा में गुरुनानक जी का मंदिर है जहाँ मूर्ति भी विराजमान है, जिनकी पूजा वहाँ के स्थानीय बंजारों द्वारा की जाती है. जेवरा में भी गुरुनानक देव जी के नाम 12एकड़ ज़मीन मौज़ूद है. बंजारा समाज के लोगों ने अमृतपाल सिंह को बताया कि वहाँ पर भी समाज ने एक छोटा गुरुद्वारा साहिब का निर्माण किया है.पुस्तक 'दिव्य धाम नानक सागर ' में अन्य विशिष्टजनों के साथ बंजारा समाज महासभा छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष श्री गुहाराम बंजारा का भी शुभकामना संदेश प्रकाशित किया गया है.उनके अलावा छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल, बसना के विधायक श्री सम्पत अग्रवाल, दिल्ली के गुरु सेवक सरदार देवेंदर सिंह,गुरुद्वारा धन धन बाबा बुड्ढा साहिब, तेलीबाँधा रायपुर के प्रधान सरदार हरकिशन सिंह राजपूत, साप्ताहिक 'छत्तीसगढ़ जनादेश ' महासमुंद के प्रधान सम्पादक श्री के. पी. साहू, और हम चाकर गोविन्द के, गतका अखाड़ा कमेटी दुर्ग के अध्यक्ष सरदार हरविंदर सिंह के भी शुभेच्छा संदेश इसमें प्रकाशित किए गए हैं. खोजकर्ता के रूप में अमृतपाल सिंह (रिंकू )ने भी  अपनी बात रखी है.

                     

           कई ऐतिहासिक चित्र भी हैं किताब में 

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पुस्तक में गुरुनानक जी के छत्तीसगढ़ प्रवास से जुड़े कई यादगार चित्र भी दिए गए हैं. इनमें गढ़ फुलझर के प्राचीन किले,गुरुद्वारा नानक सागर साहिब, गढ़फुलझर, मानसरोवर तालाब, भैना राजा के किले और मंदिर, रानी के किले, रानी तालाब,ग्राम नानक सागर में स्थित नानक चबूतरा,बंजारा समाज द्वारा पिथौरा से 31किलोमीटर दूर ग्राम लिलेसर में और ग्राम दाबपाली (बागबाहरा) में निर्मित गुरुनानक जी के मंदिर के फोटोग्राफ़्स भी शामिल हैं. इनके अलावा पिथौरा से लगभग 77किलोमीटर की दूरी पर शिवरी नारायण में भी बंजारा समाज ने  गुरुनानक जी का मंदिर बनवाया था. उसका फोटो भी पुस्तक में दिया गया है. नानक सागर में सिक्ख समाज ने एक भव्य गुरूद्वारे का निर्माण भी 15 मार्च 2026 से शुरू किया गया है.पुस्तक में गुरुनानक जी से जुड़ी 10 प्रेरक घटनाओं की भी जानकारी दी गई है.

                    प्रेरणा का प्रकाश पुंज है 'दिव्य धाम नानक सागर '

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    आज जबकि पूरी दुनिया में जगह -जगह युद्ध, हिंसा और प्रतिहिंसा का भयावह वातावरण है, अराजक तत्वों द्वारा मानव समाज को नफ़रत की आग में झुलसाया जा रहा है, तब  विश्व -शांति, मैत्री और सामाजिक सदभावना के लिए गुरुनानक देव जैसे पवित्र संत -महात्माओं के विचारों से ही मनुष्य को शांतिपूर्ण जीवन जीने का रास्ता मिल सकता है.  इस दृष्टि से देखें तो 'दिव्य धाम नानक सागर ' जैसी पुस्तक  निराशा के अंधकार में भटकते मनुष्यों को सच्चाई और अच्छाई की राह दिखाने वाले प्रेरणा के प्रकाश पुंज की तरह बहुत उपयोगी साबित हो सकती है.

 -स्वराज्य करुण 

Sunday, September 6, 2026

(लघुकथा ) स्वतंत्र देश का 'स्वतंत्र ' गुण्डा / लेखक -स्वराज्य करुण

 लघुकथा 

स्वतंत्र देश का  'स्वतंत्र ' गुण्डा ! 

   (लेखक - स्वराज्य करुण )

    उस दिन  सुबह -सवेरे चार सीधे -सादे , कुछ पढ़े -लिखे मज़दूर आदमी काम पर जाने से पहले  अपने मोहल्ले की एक गुमटी में चाय पी रहे थे और दीन -दुनिया की चर्चा भी कर रहे थे.उनमें से एक ने बाकी तीनों से पूछा - 

"अच्छा, आप लोग जरा ये बताइए, ऐसी स्वतंत्रता और कहाँ मिलेगी, जहाँ दुनिया के किसी स्वतंत्र देश में 'स्वतंत्र' नामक गुण्डा टीव्ही पर खुले आम इंटरव्यू दे और पूरी दमदारी से कहे कि हाँ उसने एक ग़रीब आदमी का सिर फोड़ा, इसके बाद भी कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया?" 
  दूसरा आदमी बोला -"हाँ,उसका यह भी कहना था कि उस स्वतंत्र देश के बड़े -बड़े ताकतवर लोग उसके बड़े भाई हैं और उनका आशीर्वाद हमेशा उसके साथ रहता है और अपराध करने के बाद भी इन ताकतवर लोगों के आशीर्वाद से ही आज वह आज़ाद घूम रहा था."
 तीसरे ने कहा -" लेकिन धन्य है उस स्वतंत्र देश का वह प्राइवेट चैनल, जिसने पॉडकास्ट के रूप में उस अपराधी का इंटरव्यू भी प्रसारित किया.  कल शाम फिर उस देश के एक चैनल में  उसके  एक बयान की यह पट्टी भी दिखाई गई, कि कोई उसका बाल बाँका भी नहीं कर सकता, चाहे ट्रम्प आए या नेतन्याहू ! "
यह सुनकर पहला आदमी बोला -" हालांकि फिर  ये भी ख़बर आई कि उस  'स्वतंत्र  गुण्डे'  को पकड़ लिया गया है.लेकिन पकड़ लिए जाने से पहले वह पूरी अकड़ के साथ गुंडागर्दी के अपने अपराध को गर्व के साथ और  बेशर्मी से टीव्ही पर स्वीकार भी करता रहा  ?सोचने वाली बात ये है कि पकड़ में वह आख़िर कब तक रहेगा? उस देश में तो राम और रहीम के नाम को बदनाम करने वाला एक शातिर अपराधी सीखचों के पीछे आराम फरमाता है और अपनी मर्जी से, जब चाहे, तब थोड़े -थोड़े दिनों के बाद दुनिया की सैर करने  बाहर आता -जाता  है. बताओ भला,उस देश का समाज कहाँ जा रहा है?" 
      चौथे आदमी ने कहा -"समाज कहीं जाए, हमको तो अपने काम पर जाना है, नहीं तो आज की मज़दूरी कैसे मिलेगी? स्वतंत्र नामक वह गुण्डा तो एक न एक दिन अपनी इसी गुंडई ताकत के दम पर उस स्वतंत्र देश को अपना गुलाम बना ही लेगा और वहाँ का नेता भी बन जाएगा,लेकिन फिलहाल तो हमें आज की अपनी मज़दूरी की चिन्ता है." यह कहते हुए वे सब लोग अपने -अपने काम पर निकल पड़े!

     - स्वराज्य करुण 

 

Thursday, July 30, 2026

(पुस्तक -चर्चा )सबकी ख़ुशहाली के लिए 'मेरे दिल की बात ' (आलेख - डॉ. परदेशी राम वर्मा )

 मेरे काव्य -संग्रह पर छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय डॉ. परदेशी राम वर्मा जी के मूल्यवान विचार, उनके समीक्षात्मक आलेख में, जो उन्हें धन्यवाद सहित यहाँ प्रस्तुत हैं -

सबकी ख़ुशहाली के लिए 'मेरे दिल की बात '

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 'मेरे दिल की बात' छत्तीसगढ़ के सुपरिचित कवि स्वराज्य करुण का नया काव्य -संग्रह है. इस संग्रह में उन्होंने अपनी 62 कविताओं को संकलित किया है. भिन्न -भिन्न रंग की रचनाओं के माध्यम से अपने दिल की बात कहने का उन्होंने सुन्दर प्रयत्न किया है. स्वराज्य करुण यूँ तो गद्य लेखक के रूप में भी विशेष पहचान रखते हैं, किन्तु मूलतः वे कवि हैं. विगत चालीस वर्षो से वे कविताएँ लिख रहे हैं. उन्होंने बच्चों के लिए भी ख़ूब लिखा है. गीत विधा और ग़ज़ल पर भी उनका भरपूर अधिकार है. वे सरलता के आग्रही हैं. गीतों, ग़ज़लों में भी उनका यह आग्रह देखते ही बनता है -

     "ये अपनी धरती 

     धान का सागर है,

     दूर -दूर तक फैले 

      प्रेम के आखर हैं."

यह बहुत प्रभावी प्रयोग है. छत्तीसगढ़ धान का कटोरा है -इस मुहावरे पर मुग्ध माटी -पुत्र स्वराज्य  करुण ने कितना विराट आकार देने का यत्न किया है!कटोरे को उन्होंने 'धान का सागर ' कहा और धान के भरे -भरे खेतों को 'प्रेम का आखर 'कहा. छत्तीसगढ़ प्रेम, समता, अहिंसा और मेल -मिलाप की धरती है.यह धान उपजाने वाला 'धान का सागर 'है.धान के खेत इसीलिए 'प्रेम के आखर' के रूप में कविता में आए हैं.  स्वराज्य करुण का जन्म गरियाबंद में हुआ. छत्तीसगढ़ का यह हरा -भरा क्षेत्र बेहद सुन्दर है. इस क्षेत्र की सुन्दरता का असर कवि पर होना स्वाभाविक है. उन्होंने अपने जन्म स्थल के सौंदर्य को सदैव रेखांकित किया है -

       "नीला पर्वत, निर्मल नदियाँ और यह तालाब,

       लगता जैसे दिन में भी कोई सुन्दर ख़्वाब. 

       सौ -सौ जनम इस धरती पर रहे सदा आबाद,

      एक अनोखा सुख देती है हमको इसकी याद."


                          




                                                          डॉ. परदेशी राम वर्मा 

इस संकलन में अधिकांश कविताएँ प्रकृति की सुन्दरता पर हैं. लेकिन हमारे दौर की विसंगतियों पर भी संग्रह में प्रभावी रचनाएँ हैं. एक तरफ प्रकृति की सुन्दरता पर कवि मुग्ध होकर बार -बार इसी छत्तीसगढ़ में जन्म लेने की कामना करता है तो दूसरी ओर विरूपित हो रही दुनिया के संताप को महसूस कर व्यथित भी होता है-

     "बेच रहे देश को आसान किश्तों में,

     ग्राहकों की कमी नहीं इस कारोबार में.

     बिक जाएगा वतन देखते ही देखते,

     ध्यान अगर गया नहीं वतन की पुकार में."

विसंगतियों पर प्रहार करने का करुण जी का यह अंदाज ध्यान आकृष्ट करता है -

      "कैसे -कैसे मंज़र आए गाँधी जी के देश में,  

      फूल नहीं अब खंजर आए गाँधी जी के देश में "

इस संग्रह में गीत, ग़ज़ल और नई कविताएँ एक साथ हैं. दिल की बात है,  जिस ढंग से भी अभिव्यंजित हो. स्वराज्य करुण हिन्दी, छत्तीसगढ़ी और ओड़िया, तीन भाषाओं के जानकार हैं. उन्होंने वर्ष 1985 में नृसिंहनाथ मंदिर पर केंद्रित निराकार महालिक की ओड़िया भाषा में लिखित पुस्तक का हिन्दी अनुवाद किया था. वर्ष 2002 में उनका बालगीत संग्रह प्रकाशित और चर्चित हो चुका है.'   'हिलमिल सब करते हैं झिलमिल' संग्रह में उनकी चर्चित बाल कविताएँ हैं. 

    विद्यार्थी जीवन से ही लगातार लिखते रहने वाले स्वराज्य करुण जब विभिन्न दायित्वों से जुड़कर वैचारिक लेखन करते हैं, तब भी पठनीयता की शर्तों का ध्यान रखते हैं. प्रस्तुत संग्रह 'मेरे दिल की बात 'की कविताओं में उन्हें मुक्त उड़ान भरने का अवसर लगा है, जिसका उन्होंने ख़ूब लाभ भी लिया है. व्यवस्था से जन्मी विसंगतियों पर प्रतीकों में मर्यादित प्रहार करने का अवसर उन्होंने नहीं खोया है. तमाम निराशा और हताशा से भरे दौर में भी वे आशान्वित हैं. वे बहुत बड़ी आशा भी नहीं करते. वे आम आदमी के कवि हैं. इसलिए केवल यही कामना करते हैं -

   "न तरसे कोई दो वक़्त की थाली के लिए,

   दुआ करें सबकी ख़ुशहाली के लिए."

        

         आलेख  -डॉ. परदेशी राम वर्मा 

           एल. आई. जी. 18,

          आमदी नगर, भिलाई 490009 

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कृति : मेरे दिल की बात 

कवि : स्वराज्य करुण 

प्रकाशक : जी. नाइन पब्लिकेशन, 

रायपुर

प्रकाशन वर्ष 2011

मूल्य ; 50 रूपए 

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Thursday, July 2, 2026

(ग़ज़ल ) घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा? - स्वराज्य करुण

 घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा ?

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उजड़ते हैं कई घर, उजड़ती हैं बस्तियाँ 

फिर भी कम होती नहीं उनकी मस्तियाँ.

उनको चाहिए जगह ख़ूब लम्बी चौड़ी 

सियासत में मगन हैं जो बेखौफ़ हस्तियाँ .

उनके लिए तो खेल है ये रोज का यहाँ 

हाथों में जिनके है सिंहासन की रस्सियाँ.

आएगा तूफ़ाँ क्या उनको नहीं पता,

भंवर में छोड़ जाएगा जो उनकी कश्तियाँ.

तिनकों को जोड़ जिसने बनाया था अपना घर 

लुटेरों ने लूट लिया कल उसका आशियाँ.

घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा 

वीरान रसोई में कैसे बनेंगी रोटियाँ .

तबाही का तमाशा हुआ बच्चों के सामने 

क्या सोचेंगी कहो कल नई -नई पीढ़ियाँ.

  -स्वराज्य करुण 


Wednesday, July 1, 2026

(कविता ) हर लफ्ज़ बेअसर हो गया है..! कवि - स्वराज्य करुण

 हर लफ्ज़ बेअसर हो गया है..!

     (कवि -स्वराज्य करुण )

चेहरा उसका ख़ूनी खंजर हो गया है, 

दिल भी बेरहम बुलडोजर हो गया है.

दर्द किसी का क्या जाने वो कुर्सीवाला , 

जिसके हाथों गाँवों का मर्डर हो गया है.

जज्बातों के फूलों को कुचला है जिसने,

 इरादा उसका निर्मम पत्थर हो गया है.

खामोशी से देख रहा सब जुल्म यहाँ,

आदमी जो मंदिर का ईश्वर हो गया है.

कोई रोये या चीखे अब सामने उसके,

प्रार्थना का हर लफ्ज़ बेअसर हो गया है.

सीधे सादे इंसानों  का घर - आंगन,  

पल भर में ही कितना जर्जर हो गया है.

उनके सपनों का बगीचा जा कर देखो, 

आज वहाँ ये कैसा मंजर हो गया है.

फूलों जैसे नाजुक -नाजुक बच्चों में भी,

जाने कौन इतनी दहशत बो गया है.

राजमहल तुम अपने लिए वहाँ बनाओगे,

जहाँ पे उसका खेत बंजर हो गया है.

मज़दूर ने  अपनी मेहनत से जो घर बनाया, 

तुम्हारे हाथों आज वो खंडहर हो गया है.

जिसके ख़्वाबों को  तुमने दफ़न कर दिया,

वह इंसान बागी अब उठकर हो  गया है.

पी रहे हो  तुम जिसे समझकर अमृत,

लिये तुम्हारे पछतावे का जहर हो गया है.

बर्बाद किया है तुमने जिस गाँव को सुनो, 

ग़रीबों के अभिशाप का वो शहर हो गया है.

उनकी आहें तूफानों में इक दिन बदलेंगी

देखोगे तब झोंका हवा का बवंडर  हो गया है.

-स्वराज्य करुण 

 



Monday, June 29, 2026

(कविता ) कहाँ जाएँ सब बेघर पंछी? -स्वराज्य करुण

कहाँ जाएँ कहो बेघर पंछी?

      (स्वराज्य करुण )

कहाँ जाएँ कहो बेघर पंछी  धूप और बरसात में 

उजड़ गए  घरौंदे जिनके, सुबह, दोपहर, रात में.

अब न होगी भिनसारे उनकी प्यार भरी चहक यहाँ 

नहीं मिलेगी आंगन में अब मोंगरे की महक यहाँ.

बच्चों की आँखों के आगे उजड़े जिनके गाँव 

उन मेहनतकश परिवारों को कहाँ मिलेगी छाँव.

करते थे जो बहा पसीना, कुछ सपनों की खेती,.

पूछ रही माटी -महतारी कहाँ अपनों की खेती.

अंधियारे में तुलसी चौरा, रोये घर की महतारी 

जाने किसकी नज़र लगी है शोक में डूबे नर -नारी. 

राजाओं के महल बनेंगे खेतों और खलिहानों में,

मजूर किसान की गिनती भी कब होती है इंसानों में.

नहीं छोड़ेंगे गाँव तो उनकी बस्ती में आग लगाएंगे

फिर उनकी खाली जमीन पर वे अपने बाग लगाएंगे.

उनको अपना नौकर समझे, दुत्कारे हर बात में, 

आ गया है छल -कपट से पावर जिनके हाथ में.

शहरों से जो सज -धज कर आए अपनी मोटर कार में,

उनका दिल क्यों डूबेगा बोलो यहाँ के हाहाकार में.

-स्वराज्य करुण 

29 जून 2026 












Friday, June 5, 2026

(आलेख ) पर्यावरण संकट को लेकर हमारी चुप्पी शर्मनाक भी और खतरनाक भी !

 आज 5जून ; विश्व पर्यावरण दिवस 

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(आलेख - स्वराज्य करुण )

  हम आख़िर कैसी दुनिया चाहते हैं?क्या हमें हरे -भरे वनों, पर्वतीय झरनों   और नदियों की अमृत धाराओं से परहेज है? अगर नहीं तो क्यों हम ख़ामोश रहकर इनकी बर्बादी देखते रहते हैं? यह ज़रूर है कि हममें से कुछ लोग इनकी रक्षा के लिए संघर्ष करते रहते हैं । उनके जज्बे को प्रणाम और सलाम, लेकिन  पर्यावरण बचाने की लड़ाई में उनका साथ देने वाले हममें से आख़िर हैं कितने लोग? जंगल तबाह हो रहे हैं,पहाड़ उजड़ते जा रहे हैं, नदियाँ सूखती जा रही हैं । विश्व पर्यावरण दिवस आज हमें चीख़- चीख़ कर कह रहा है कि  तेजी से तबाह हो रहे अपने प्राकृतिक पर्यावरण को बचा लो, लेकिन इन चीखों के जवाब में उन्हें मिलती है हमारी कायरतापूर्ण चुप्पी! यह चुप्पी बेहद शर्मनाक है,  चिन्ताजनक है और बेहद खतरनाक भी । 


                                        


विश्व पर्यावरण दिवस सिर्फ़ पौधे लगाने की औपचारिकता तक सीमित नहीं रहना चाहिए । लगाए गए पौधों की देख -भाल भी हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए । देखा जाए तो पर्यावरण के भी कई प्रकार होते हैं । मेरे ख़्याल से इनमें पहला है प्राकृतिक पर्यावरण, जिसमें नदी, पहाड़,तालाब, जंगल और झरनों के साथ -साथ समुद्र और और वायुमंडल भी शामिल है। इसी कड़ी में सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और औद्योगिक पर्यावरण  सहित मनुष्य का स्वयं का मानसिक और पारिवारिक पर्यावरण भी है । हमें इन सभी प्रकार के पर्यावरणों की रक्षा करनी होगी, लेकिन इसके लिए सबसे पहले प्राकृतिक पर्यावरण को बचाना होगा । हमारा प्राकृतिक परिवेश अगर स्वच्छ रहेगा तो बाकी सभी पर्यावरणीय संकट अपने -आप समाप्त होते जाएंगे । अगर हम समाज में सुख ,शांति और समृद्धि चाहते हैं तो सबसे पहले अपने प्राकृतिक पर्यावरण को बचाना होगा ।  स्वच्छ पर्यावरण हमारे शारीरिक पर्यावरण को भी स्वस्थ बनाएगा । 

तरह -तरह की बीमारियों का असली कारण हमारा प्रदूषित पर्यावरण ही तो है! भारत के संदर्भ में मुझे प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वर्ष 2014 में देश में शुरु किए गए स्वच्छ भारत अभियान की याद आ रही है । देश के लाखों गाँवों और हजारों शहरों में इस अभियान के लिए जन भागीदारी के साथ, जैसा उत्साहजनक वातावरण बना था, लगता है कि उसकी आँच अब धीमी पड़ गई है । पर्यावरण की स्वच्छता के लिए जिस अच्छे उद्देश्य से और जिस जोशीले अंदाज में यह अभियान चलाया गया था, क्या  उसी जोश -ओ -खरोश से उसे दोबारा शुरु नहीं किया जा सकता?

      लेकिन दिक्कत यह है कि  हम सब नागरिक अपने पर्यावरण पर गहराते संकट को लेकर बहुत लापरवाह हैं । सब कुछ जानते ,समझते हुए भी इंसान अपने पर्यावरण को दूषित कर रहा है और अपने साथ -साथ अपनी दुनिया को भी तबाही के रास्ते पर ले जा रहा है। पहाड़ों की हरियाली को नोच खसोट कर उनके नैसर्गिक सौंदर्य को नष्ट करने में अब शायद किसी को कष्ट नहीं होता। बढ़ती जनसंख्या ,बढ़ते शहरीकरण और तीव्र गति से फलते -फूलते  औद्योगिक विकास की वजह से जल ,जंगल ,पहाड़ और ज़मीन  आज गंभीर संकट में हैं। अत्यधिक शहरीकरण और सीमेंट कांक्रीट की लगातार पसरती बस्तियों में (अब तो गाँवों में भी )पक्के मकानों का निर्माण हो रहा है। सीमेंट कांक्रीट की सड़कें बन रही हैं। इन सबमें प्राकृतिक पत्थरों के उपयोग के लिए मनुष्य और मशीनों के हाथों पहाड़ उजड़ते जा रहे हैं। 

    हर कोई आज पक्के घरों में रहना चाहता है। इसमें मनुष्य की कई तरह की मज़बूरियाँ भी हैं ।चारे पानी की तलाश में गाँवों में आने जाने वाले बन्दर ग्रामीणों के  खपरैल वाली छतों को उजाड़ देते हैं। जंगल कट रहे हैं ,तो वहाँ रहने वाले पशु -पक्षियों का जीवन भी खतरे में पड़ गया है। हमें इन सबका विकल्प भी सोचना होगा। नये जंगल लगाने होंगे। उजड़ते पहाड़ों में सघन वृक्षारोपण करना होगा।आधुनिक ड्रोन टेक्नोलॉजी के जरिए उनमें बरसात के दिनों में फलदार ,छायादार वृक्षों के बीजों का छिड़काव हो सकता है।  शायद उनमें पीपल जैसे वृक्षों के बीजों का छिड़काव भी हो  तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं ,क्योंकि पीपल की जड़ें कठोर धरती और पत्थरों की दरारों के बीच भी उगने के लिए जगह बना लेती हैं। लोग कहते हैं कि यह चौबीसों घंटे ऑक्सीजन देने वाला वृक्ष है।

    देश में आज प्लास्टिक और पॉलीथिन का कचरा हमारे पर्यावरण के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। शहरों के साथ साथ हमारे गाँव और कस्बे भी प्लास्टिक प्रदूषण के शिंकजे में है। अधिकांश लोग जानते हैं कि  प्लास्टिक कचरे की रिसाइक्लिंग करके उसे दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है ,सड़क निर्माण में प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल हो सकता है , लेकिन इंसान हर तरफ प्लास्टिक के डिब्बों बोतलों और पॉलीथिन की थैलियों का उपयोग करने के बाद उन्हें लापरवाही से इधर उधर फेंककर प्रदूषण फैलाने का अपराध कर रहा है । यहाँ तक कि अब तो हमारे महासागर भी इस प्रदूषण की चपेट में आ गए हैं। यह एक अच्छी पहल है कि भारत सरकार द्वारा देश के कई शहरों में प्लास्टिक इंजीनियरिंग संस्थान संचालित किए जा रहे हैं ,जहाँ युवाओं को इस विषय में प्रशिक्षण के साथ डिग्री /प्रमाणपत्र भी दिये जाते हैं। प्लास्टिक रिसाइकिलिंग में इन युवाओं की प्रतिभा का उपयोग करते हुए उन्हें रोजगार के अवसर दिए जा सकते हैं। 

      अगर देश में कृषि उपजों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की तरह प्लास्टिक कचरे की सरकारी खरीदी के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित हो और जगह जगह खरीदी केंद्र बना दिए जाएं तो जहाँ बड़ी संख्या में गरीबों को कुछ अतिरिक्त आमदनी हो सकती है ,वहीं हमारे चारों ओर प्लास्टिक और पॉलीथिन के बेतरतीब  फैलते लाखों  टुकड़े काफी हद तक साफ़ हो जाएंगे।

   दुनिया भर में कई देशों द्वारा समुद्र और ज़मीन के भीतर और हवा में किया जाने वाला परमाणु हथियारों का परीक्षण भी बढ़ते प्रदूषण का एक ख़तरनाक कारण बन गया है। पूरी दुनिया में परमाणु परीक्षणों और परमाणु हथियारों पर कड़ा  प्रतिबंध लगा देना  चाहिए।  लगभग दो दशक पहले हुए अमेरिका -इराक युद्ध, वर्ष 2021 से चल रहे रूस -यूक्रेन युद्ध और इस वर्ष 2026 में अमेरिका -इजराइल और ईरान के बीच हो रही लड़ाई में 

जिस बड़े पैमाने पर बमबारी हुई और हो भी रही है, क्या उससे जन -धन की हानि के साथ -साथ पर्यावरण का भी विनाश नहीं हुआ होगा? लेबनान पर इजराइली हमलों में भी जन -धन और पर्यावरण का भारी विनाश हुआ ही होगा । आज ज़रूरत इस बात की है कि पर्यावरण और मानवता की रक्षा के लिए ऐसे युद्ध  तत्काल रोके जाएँ और पूरी दुनिया में धरती के मरणासन्न हरित आवरण को नया जीवन दिया जाए ।

      आलेख   -स्वराज्य करुण

      चित्र  -आचार्य ललित मुनि