Monday, October 12, 2026

(आलेख )भाषाओं के त्रिवेणी संगम में उर्दू मिश्रित हिन्दी की मिठास घोलती मज़ीद राही की शायरी/ लेखक -स्वराज्य करुण

 अब तक लगभग गुमनाम रहे शायर मज़ीद राही को जनता के सामने लाने का एक विनम्र प्रयास

भाषाओं के त्रिवेणी संगम में  उर्दू मिश्रित हिन्दी की मिठास घोलती  मज़ीद राही की  शायरी  

                             आलेख -स्वराज्य करुण 

 कविता या शायरी चाहे किसी भी भाषा की हो, वह आम जनता को भावनात्मक रूप से जोड़कर रखती है । यह ख़ासियत  मज़ीद राही की शायरी में भी मिलती है। हालांकि शायर के रूप में उनकी जान - पहचान का दायरा बहुत सीमित है, लेकिन उनकी नज़्मों और ग़ज़लों का कैनवास बहुत बड़ा है  । वे ओड़िशा राज्य के खरियार रोड शहर में एक सँकरी -सी गली के बहुत साधारण मकान में रहते हैं । यह शहर ओड़िशा  की पश्चिमी सीमा पर नुआपाड़ा जिले में छत्तीसगढ़ की सरहद से लगा हुआ है। यहाँ के जन -जीवन पर ओड़िया, छत्तीसगढ़ी और हिन्दी भाषाओं का  मिलाजुला गहरा सांस्कृतिक असर देखा जा सकता है ।  खरियार रोड की आम ज़िन्दगी  भी तीन भाषाओं (ओड़िया, छत्तीसगढ़ी और हिन्दी)  के त्रिवेणी संगम जैसी लगती है , जिसमें मज़ीद भाई की शायरी उर्दू मिश्रित हिन्दी की  मिठास घोल रही है  । यह इलाका ब्रिटिश हुकूमत के दौरान पहले छत्तीसगढ़ के तत्कालीन रायपुर जिले में, महासमुंद तहसील का हिस्सा था । उस दौरान जब अंग्रेजों की सरकार ने वर्ष 1936 में भाषावार प्रांतों का गठन किया, तब उसने खरियार रोड को ओड़िशा में शामिल कर लिया। यही कारण है कि आज के दौर में भौगोलिक और प्रशासनिक दृष्टि से अलग -अलग राज्य होते हुए भी यहाँ की आम ज़िन्दगी में दोनों राज्यों की साझा संस्कृति की खूबसूरत तस्वीर नज़र आती है  जोंक नदी यहाँ दोनों राज्यों की सीमा - रेखा बनकर बहती है। इस नदी पर बने पुल को दोनों तरफ से पार करके दोनों राज्यों के कामकाजी  लोग एक दूसरे के राज्य में रोज आते -जाते हैं।  खरियार रोड इस रास्ते पर  पश्चिम ओड़िशा का अंतिम शहर है । यहाँ के निवासी मज़ीद राही  की उर्दू और हिन्दी  शायरी जोंक नदी के  उस पुल की तरह आम जनता के दिलों को जोड़ने का काम करती है,  जो दोनों राज्यों के बीच नियमित आवागमन के साथ -साथ सामाजिक -सांस्कृतिक और व्यावसायिक सम्पर्को का  महत्वपूर्ण सेतु बनकर शान से खड़ा है । देश को मज़ीद भाई की नज़्मों और ग़ज़लों की तरह आज ऐसे ही भावनात्मक पुलों की ज़रूरत है , जो अपनी रचनाओं से  भारतवासियों को जोड़कर रखें । वे सचमुच कौमी एकता के शायर हैं ।  उनका  पूरा नाम अब्दुल मज़ीद खाँ अशरफी है, लेकिन शायरी वे मज़ीद राही के नाम से ही करते हैं ।उनकी  नज़्में और ग़ज़लें भले ही उर्दू ज़ुबान में हों, लेकिन वे उन्हें देवनागरी (हिन्दी )लिपि में लिखते हैं। वैसे भी आम बोलचाल की उर्दू और हिन्दी के बीच फ़र्क कर पाना बहुत मुश्किल है । दोनों ही भाषाओं में अरबी और फ़ारसी  सहित कुछ अन्य भाषाओं के शब्द भी दूध में शक्कर की तरह घुलमिल गए हैं, जिसकी मिठास मज़ीद राही जैसे शायरों की नज़्मों और ग़ज़लों में भी महसूस की जा सकती है ।



मज़ीद राही की कविताएँ  सामान्य उर्दू और सामान्य हिन्दी में होती हैं।हालांकि उन्होंने अपनी कुछ रचनाएँ उर्दू लिपि में भी लिखी हैं, लेकिन अपनी शायरी देवनागरी लिपि में लिखना उन्हें ज़्यादा अच्छा लगता है ।  खरियार रोड  के पास छत्तीसगढ़ के ग्राम नर्रा (वर्तमान जिला -महासमुंद )में 6नवम्बर 1956 को उनका जन्म हुआ था। यह गाँव जोंक नदी के पुल के उस पार है।मज़ीद भाई नर्रा में ही आठवीं तक पढ़ाई करने के बाद आगे चलकर जीवन-यापन के लिए  दर्जी बन गए। वे बताते हैं कि  उन्होंने बचपन में रायपुर के एक मदरसे में उर्दू की भी पढ़ाई की थी ।कुछ साल उन्होंने महासमुन्द जिले के पिथौरा कस्बे में रहकर टेलरिंग का काम किया, फिर वहाँ से लगभग 57 किलोमीटर दूर खरियार रोड आ गए और परिवार सहित यहीं के होकर रह गए। वे स्थानीय मस्जिद के मौलवी भी हैं ।  घर -गृहस्थी संभालते हुए  बड़ी खामोशी से काव्य -सृजन में  लगे हुए हैं। पिथौरा में कुछ साल रहने की वज़ह से वहाँ के लोगों  से उनका आत्मीय रिश्ता जुड़ गया है।इसीलिए जब हम लोगों ने सुना  कि मज़ीद भाई बहुत बीमार हैं,  शायद उन्हें लकवा हो गया है और वे बिस्तर से उठ नहीं पा रहे हैं, तो मुझे और मेरे कवि मित्र प्रवीण प्रवाह को भी बड़ी चिन्ता हुई ।

   हमने सोचा कि खरियार रोड जाकर उन्हें देख आएँ। रास्ते में प्रवीण ने मोबाइल से उन्हें कॉल किया।मज़ीद भाई ने ही कॉल रिसीव किया।उन्हें पता लगा कि हम उनसे मिलने खरियार रोड आ रहे हैं, तो वे बहुत ख़ुश हुए।फोन पर संक्षिप्त बातचीत से हमें कुछ तसल्ली हुई कि मज़ीद भाई स्वस्थ हैं ।खरियार रोड पहुँचकर हमने उन्हें साइकिल चलाते देखा और भला चंगा पाया तो और भी अच्छा लगा।  घर के पास गली के सामने रुककर उन्होंने हमारा स्वागत किया। फिर  घर ले गए।चाय -नाश्ता करवाया। बातचीत में उन्होंने बताया कि वाकई वे बहुत बीमार हो गए थे,लेकिन  ओड़िशा के  बरगढ़ जिले में गोड़भग्गा नामक गाँव के एक वैद्य से इलाज करवाया और ठीक हो गए  ।  

     मुस्कुराहट मज़ीद भाई के व्यक्तित्व की विशेषता है, लेकिन उस मुस्कान के पीछे देश और दुनिया के आम इंसानों का दर्द भी छिपा हुआ है, जिसे वे अपनी कविताओं में आवाज़ देते हैं । उन्होंने शायरी करना  वर्ष 1995 से शुरू किया था ।विगत तीन दशकों से  वे उर्दू और हिन्दी साहित्य की सेवा कर रहे हैं।अपनी कविताओं की डायरी और कापियों को वे अपने पलंग के नीचे  टीन की पुराने किस्म की पेटी में सुरक्षित रखते हैं, जिसे उन्होंने  खोला और अपनी हस्तलिखित रचनाओं की बेशकीमती धरोहर हमारे सामने रख दी  ।वे अपनी अधिकांश रचनाओं में लेखन तिथि और समय भी  ज़रूर अंकित करते हैं । उनकी रचनाओं में  जहाँ आज के मनुष्य का दुःख -दर्द  छलकता नज़र आता है, वहीं  उनमें देशभक्ति की भावनाएँ भी  महसूस की जा सकती हैं । उनकी कई रचनाएँ निराशा के स्याह अंधेरे में भटकते इंसानों को राह दिखाने वाली रौशनी की तरह लगती हैं ।आज से 25 साल पहले, वर्तमान युग की कड़वी सच्चाई बयान करती एक अक्टूबर 2001 को दिन के दो बजे लिखी 'हक़ीक़त' शीर्षक रचना में उनकी इन पंक्तियों को देखिए -


*मैं ये नहीं कहता हूँ कि ईमान नहीं है,

 लेकिन यहाँ सच बोलना आसान नहीं है ।

 हर एक आदमी से ये सवाल करूंगा,

 वो कौन है यहाँ जो परेशान नहीं है  ।

पश्चिमी हवा ने हमें कुछ ऐसा बिगाड़ा,

लगता है  मेरा देश हिन्दुस्तान नहीं है ।

कुछ हद से गुजरे जा रही है बेहयाइयाँ,

शर्म -ओ -हया किसी के दरम्यान नहीं है ।

मतलब परस्त लोगों से है दफ़न कायदा,

रिश्ते हैं, मगर रिश्तों में पहचान नहीं है । *


लेकिन जहाँ वे देश के वर्तमान माहौल से व्यथित हैं, वहीं अपने वतन का गुणगान करना भी नहीं भूलते । वे कहते हैं -


*ये ऊँचों में ऊँचा है आसमान की तरह,

  कोई नहीं है मेरे हिन्दुस्तान की तरह ।

  कुन्दन की मानिन्द मेरे देश के ज़र्रे ,

  हर किरण फूटती है  परवान की तरह ।

 चमचमाती जगमगाती गंगा की लहरें,

 शान पे हिमालय है सुल्तान की तरह ।

 इस मुल्क पे टिकी हैं सारे मुल्क की नज़रें,

 सारे ग़रीबों में जैसे धनवान की तरह ।

 'राही' की औकात से बाहर की बात है,

 तारीफ़ क्या करेगा, है नादान की तरह।* 


आत्मीय मुलाकात में उन्होंने बहुत भावुक होकर हमें अपनी इस ग़ज़ल की पहली दो पंक्तियाँ गाकर भी सुनाई । श्रृंखला साहित्य मंच ने एक बार उन्हें  पिथौरा में हुए अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में  आमंत्रित किया था, जहाँ  'शाने हिन्द ' शीर्षक उनकी  इस देशभक्तिपूर्ण  रचना को उनसे तरन्नुम में सुनकर कविगण और श्रोता दोनों झूम उठे  ।अपनी इस ग़ज़ल से मज़ीद भाई कवि सम्मेलन में छा गए थे ।उन्होंने अपनी यह ग़ज़ल 15 दिसम्बर 2001 को सुबह 7बजे लिखी थी ।मज़ीद भाई ओड़िशा के अपने शहर खरियार रोड की गंगा -जमुनी संस्कृति से भी बहुत प्रभावित हैं । यहाँ सभी समुदायों के लोग मिलजुल कर रहते हैं ।  यहाँ की मिट्टी की इस प्यार भरी तासीर को महसूस करते हुए मज़ीद राही ने 27 फरवरी 2001 को रात 2 बजे लिखा -

   *लाखों में एक शहर -ए -हिन्दुस्तान है,

     खरियार रोड नाम है, अम्नो आमान है ।

     अजीब असर है यहाँ की आबो मिट्टी में,

      सब एक रहते हैं जैसे ज़िस्मो जान हैं ।*


  मज़ीद भाई के शहर की तरह  साझा संस्कृति और सदभावना के कुछ शहर और कुछ गाँव अपवाद स्वरूप ज़रूर हो सकते हैं,लेकिन अफ़सोस की बात हैं कि आज  समय ऐसा आ गया है जब देश और दुनिया के अधिकांश के इंसानों में एक -दूसरे के प्रति प्रेम की भावना कम होती रही है और नफ़रत का माहौल बढ़ता जा रहा है, तब ऐसे नाजुक़ वक़्त में शायर मज़ीद राही लोगों को अपनी इन पंक्तियों में  मोहब्बत का पैगाम देते हैं -

*नफरत निकालिये, सभी नफरत निकालिये,

  मिलकर रहें ऐसी कोई सूरत निकालिये.

  आदमी ही आदमी के काम आता है,

   रहने दें आदमी को,दिल से मत निकालिये.

   फिज़ूल ख़र्च से बचें, कुछ फ़ायदा नहीं,

   हर नेक काम के लिये दौलत निकालिये.*


मज़ीद भाई के दिल की ये भावनाएँ उनकी कलम से 21 मार्च 2001 को दिन के दो बजे  निकली थीं, जो आज भी प्रासंगिक हैं। हर सच्चे कवि को जीवन के संघर्षों में घिरे इंसानों का दुःख -दर्द व्यथित और विचलित करता रहता है।मज़ीद राही  भी उन कवियों में से एक हैं ।उन्होंने अपने लेखन के शुरुआती दिनों में,तीन जुलाई 1995 को शाम 7बजे अपनी कविताओं की डायरी में लिखा -

*सागर का छलकना देखकर 

  ये दिल का छलकना हो न सका,

 लोगों से भरी इस दुनिया में

 कोई भी अपना हो न सका ।*


मज़ीद राही की शायरी में व्यंग्य भी है । वे आज के दौर के नेताओं पर तंज कसते हुए लिखते हैं -

     *मज़ाक समझ लिया है देश का नेता बनना,

     पहले आदमी तो बन, फिर देवता बनना ।

     कुछ बनना है तो माँ -बाप का सपूत बन,

    तब कहीं जाके भारत माता का बेटा बनना ।

     जरा बता दो हवस के पुजारियों को यहाँ 

     इतना आसाँ नहीं, शहीदों का सपना बनना ।*

    

 दुनिया में ऐसा कौन शायर होगा , जिसे ग़रीबों की पीड़ा महसूस नहीं होती ? मेहनतकश  ग़रीबों की दयनीय हालत देखकर मज़ीद राही के भीतर का शायर भी कराह उठता है और 'ग़रीबी ' शीर्षक रचना में 25 फरवरी 2001 को शाम छह बजे उनके दिल से निकलती हैं ये पंक्तियाँ -

   *दुनिया में ग़रीबों को आराम नहीं मिलता,

   रोते हैं तो  रोने का अंजाम नहीं मिलता ।

   सच्ची लगन से मेहनत करें, फिर भी ग़म ही ग़म है,

   कभी मेरी वफ़ाओं का इनआम नहीं मिलता ।

   बूँदों की तरह आना, धरती में समा जाना,

   तवारीख़ में कभी हमारा कहीं नाम नहीं मिलता।*

ग़रीब इंसान  अपने ग़मों से  भी हिम्मत नहीं हारता  ।  वह दुःखों के अंधेरे में भी तारों की मानिन्द चमकता रहता है  । कुछ इसी तरह के जज़्बात मज़ीद भाई के इस मुक्तक में भी उतर आए हैं -

   * तूफ़ाने ग़म में ग़रीबों का ठहरना देखो, 

      काँटों के बीच फूलों का महकना देखो।

      चाँदनी चाँद से होती है ये माना मैंने,

      अंधेरी रात में तारों का चमकना देखो ।*


ग़रीबों के दर्द को अपने दिल की गहराइयों से महसूस करते हुए शायर मज़ीद राही ने 27 मई 2002 को दिन के दस बजे 'गुरबत ' शीर्षक रचना में लिखा था - 

   *ज़मीं झाँकती है, गगन झाँकता है,

    वो देखो, किसी का बदन झाँकता है ।

    ग़रीबों से गुरबत का यूँ देखा रिश्ता,

    मैय्यत को जैसे कफ़न झाँकता है ।

    हिकारत से देखो न राही किसी को, 

    तुम्हें जब ग़रीबों का मन झाँकता है ।*

रोजी -रोटी के चक्कर में उलझा हर इंसान अपने आस -पास के माहौल को देखकर कुछ न कुछ सोचता ज़रूर है ।  कुछ न कुछ भावनाएँ उसके दिल में भी उमड़ती -घुमड़ती रहती हैं ।  यह अलग बात है कि ज़िन्दगी की भागदौड़ में व्यस्त रहने की वज़ह से वह उन भावनाओं को शब्द नहीं दे पाता और उसके जज़्बात दिल में ही रह जाते हैं, लेकिन एक शायर या कवि आम इंसान की उन भावनाओं को अपने दिल की गहराइयों से महसूस करता है और अपने चिंतन और लेखन से उन्हें शब्दों के साँचे में ढालकर  दुनिया के सामने रख देता है । मज़ीद राही की रचनाओं को भी हमें उसी नज़रिए से देखना चाहिए ।

आलेख -स्वराज्य करुण,

Tuesday, September 22, 2026

(पुस्तक -चर्चा ) महान संत गुरुनानक देव जी छत्तीसगढ़ यात्रा पर एक महत्वपूर्ण किताब /आलेख -स्वराज्य करुण

 महान संत गुरुनानक देव की छत्तीसगढ़ यात्रा पर एक महत्वपूर्ण किताब 

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         (आलेख  -स्वराज्य करुण )

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महान संत और सिक्ख धर्म के संस्थापक गुरुनानक देव जी आज से लगभग 520  साल पहले छत्तीसगढ़ भी आए थे. वे भारत भ्रमण पर निकले थे और वर्ष 1506 ईस्वी में अमरकंटक से शिवरीनारायण होकर जगन्नाथपुरी जाते हुए छत्तीसगढ़ के ग्राम गढ़फुलझर भी आए थे. इस गाँव से लगे हुए तत्कालीन रानीसागर नामक गाँव में उनका दो दिवसीय पड़ाव था.  गुरुनानक जी के आगमन की याद में रानी सागर का नामकरण 'नानक सागर'  किया गया. गढ़फुलझर और उससे लगा हुआ नानक सागर वर्तमान महासमुंद जिले के अंतर्गत बसना तहसील में हैं . यहाँ पर नानक सागर साहिब गुरुद्वारा भी है.दोनों ओड़िशा के सीमावर्ती गाँव हैं . गढ़फुलझर और नानक सागर आज पूरे देश के सिक्ख समाज की आस्था का प्रमुख केन्द्र बन गए हैं.गुरुनानक जी जगन्नाथ पुरी की यात्रा से वापसी में भी गढ़फुलझर आए थे. उन दिनों छत्तीसगढ़ को दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था. उन दिनों कहीं आने -जाने के लिए आज जैसे साधन नहीं थे. जरा सोचिए, उस दौर में गुरुनानक जी जैसी महान विभूतियाँ अपने प्रेरक विचारों को जन -जन तक पहुँचाने के लिए सैकड़ों, हज़ारों मील की यात्रा कैसे करती रही होंगी! गुरुनानक देव जी भी अपने अनुयायियों के साथ पंजाब से जगन्नाथ पुरी शायद पैदल जा रहे थे. 

                                                        


                                      दिव्य धाम नानक सागर 

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           पूरी दुनिया को सत्य, अहिंसा, दया, करुणा और परोपकार जैसे सर्वश्रेष्ठ मानव मूल्यों का संदेश देने वाले गुरुनानक देव जी के छत्तीसगढ़ प्रवास से जुड़े कई ऐतिहासिक तथ्य हाल के कुछ वर्षों में सामने आए हैं. उनकी छत्तीसगढ़ यात्रा से जुड़े इस प्रकार के विभिन्न ज्ञानवर्धक प्रसंगों पर छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार, पिथौरा (जिला -महासमुंद )निवासी श्री शिवशंकर पटनायक ने 'दिव्य धाम नानक सागर ' शीर्षक से एक महत्वपूर्ण किताब लिखी है.  श्री पटनायक से मिलने मैं उस दिन शाम को उनके घर गया था, जहाँ उनके हाथों मुझे उनकी इस मूल्यवान पुस्तक की सौजन्य प्रति प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त हुआ. उन्होंने प्रबुद्धजनों के विचारों को और उनके द्वारा रखे गए तथ्यों को संकलित और सम्पादित करते हुए  अपने भी विचार इसमें शामिल किए हैं. 

         अब तक 38 किताबें प्रकाशित ; 39 वीं जल्द आएगी 

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पौराणिक और सामाजिक विषयों पर श्री पटनायक की 37 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. यह उनकी 38वीं किताब है, जबकि भगवान श्री रामचंद्र जी के अनुज भरत पर भी उनकी एक पुस्तक जल्द आने वाली है. श्री पटनायक के पौराणिक उपन्यासों में माता कौशल्या पर 'कोशल नंदिनी' रावण की आत्मग्लानि पर 'अग्नि स्नान ', छत्तीसगढ़ के लोक देवता पर 'देवी करिया धुर्वा' , महाभारत के कर्ण पर 'कालजयी कर्ण ' और प्रश्नों की शर शैय्या पर भीष्म ' कहानी संग्रह 'पराजित पुरुष ', 'मंदिर सलामत है' आदि शामिल हैं. 

                उनके साहित्य पर अब तक चार पीएच-डी.

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श्री पटनायक के साहित्य पर शोधर्थियों द्वारा अब तक चार पीएच -डी. भी की जा चुकी है. ताजा शोध प्रबंध वर्ष 2026 में श्री बेनु प्रसाद सिदार ने लिखा है, जिसका विषय है 'शिवशंकर पटनायक के पौराणिक उपन्यासों के नारी -पात्रों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण. यह शोध कार्य पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर के अंतर्गत किया गया है. 

 श्री शिवशंकर पटनायक द्वारा रचित पुस्तक 'दिव्य धाम नानक सागर 'के प्रकाशक पिथौरा निवासी वरिष्ठ पत्रकार श्री रजिन्दर सिंह खनूजा हैं. गुरुनानक देव जी की गढ़फुलझर यात्रा के विभिन्न ऐतिहासिक तथ्यों के खोजकर्ता टाटीबंध, रायपुर के श्री अमृत पाल सिंह (रिंकू ) ओबेरॉय हैं, जो नानक सागर रिसर्च टीम के प्रमुख भी हैं.उल्लेखनीय है .महासमुंद जिले का बसना -सरायपाली क्षेत्र राजवंशों के समय फुलझर राज के  नाम से जाना जाता था. यह एक रियासत थी.लेखक श्री पटनायक ने इस पुस्तक की रचना करने से पहले पत्रकार श्री खनूजा के साथ स्वयं गढ़फुलझर और नानक सागर का अध्ययन दौरा किया था और स्थानीय लोगों से बातचीत करके कई तथ्य भी संकलित किए थे.

         भैना राजवंश के शासन काल में छत्तीसगढ़ आए थे गुरुनानक जी 

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    वर्ष 2023 में प्रकाशित लगभग 150 पन्नों की सुन्दर छपाई और रंगीन चित्रों से सुसज्जित इस पुस्तक के लिए सहयोग राशि 151 रूपए रखी गई है. पुस्तक में गढ़फुलझर के भैना राजवंश की भी जानकारी मिलती है. भैना राजाओं के वंशज श्री राजा राम राजभानू (डिप्टी रजिस्ट्रार -फर्म्स एवं सोसायटीज )ने पुस्तक में 'प्रफ्फुलित मन ' शीर्षक अपने संदेश में लिखा है कि भैना राजा जगत साय ठाकुर के वंशज एवं फुलझर राज्य के संस्थापक राजा फूलसाय  भैना ठाकुर ने गढ़ फुलझर राज की स्थापना की थी. उनकी 18पीढ़ियों ने यहाँ राज किया था.इनमें सभी धर्मानुरागी थे. श्री राजा राम राजभानू के अनुसार जब गढ़फुलझर के राजपाट की ज़िम्मेदारी मानस राज सागरचंद भैना को सौंपी गई, जो अत्यंत कुशल प्रशासक और धर्मशील थे, उनके ही राज काल में गुरुनानक देव जी का गढ़फुलझर आगमन हुआ, जहाँ रानी सागर (अब नानक सागर ) में दो दिन के पड़ाव में उन्होंने लोगों को अपना उपदेश दिया था. गढ़फुलझर के राजा मानस राज सागर चंद भैना ने गुरुनानक जी के नाम पर 5एकड़ ज़मीन भी दी थी.

                       छत्तीसगढ़ और पंजाब के बीच बना ऐतिहासिक रिश्ता 

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मेरे विचार से इसे हम तत्कालीन छत्तीसगढ़ और पंजाब राज्य के बीच बना ऐतिहासिक आत्मीय रिश्ता भी कह सकते हैं. पुस्तक में 'गढ़फुलझर' शीर्षक एक अध्याय में श्री मनमोहन दास वैष्णव को संदर्भित करते हुए भैना राज्य के पूर्व शासक भानुमान का वैवाहिक संबंध चण्डीगढ़ राज्य  उनका  राजकुमारी चंदन कुमारी के साथ होने और इसके फलस्वरूप दोनों राज्यों में प्रगाढ़ मैत्री संबंध स्थापित होने की भी जानकारी दीं गई है. यह भी बताया गया है कि दोनों राज्यों के बीच बहुत दूरी होने के बावजूद प्रजा एक -दूसरे के राज्य में आना -जाना करती थी गुरुनानक जी के अनुयायियों और भक्तों का आगमन भी भैना काल में (गढ़फुलझर क्षेत्र में ) लगातार होता रहा, जिसका प्रभाव यहाँ भी पड़ा.श्रीमनमोहन वैष्णव के अनुसार  समय अबाध गति से बढ़ रहा था, उसी क्रम में पंजाब और गढ़फुलझर के नागरिकों के मध्य संबंध भी बढ़ रहे थे. पंजाब से आए सिखों का मन भी यहाँ रमने लगा था. उन्होंने गढ़फुलझर राज्य में बस जाने का मन बना लिया और स्थायी रूप से रहने लगे. इतने लम्बे संबंधों के कारण स्थानीय रीति -रिवाज, बोली -भाषा, रहन -सहन और संस्कारों को उन्होंने कब स्वीकार कर लिया, यह उन्हें ज्ञात नहीं. इस प्रकार भक्तिकाल में गुरुनानक देव जी के भव्य व्यक्तित्व, वाणी, कीर्तन और उपदेशों का प्रचार -प्रसार भैना राज्य में व्यापक रूप से होने लगा पुस्तक में दिए गए तथ्यों के अनुसार गुरुनानक जी के आगमन पर स्थानीय ग्रामीणों ने उनका शानदार आत्मीय स्वागत किया था.  इस जगह को स्थानीय लोग बावा डेरा भी कहते हैं.

               

             *गुरुनानक जी से प्रभावित हुआ छत्तीसगढ़ का बंजारा समाज *

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 छत्तीसगढ़ का बंजारा समाज भी गुरुनानक जी के उपदेशों को मानने वाला समाज है. पुस्तक से यह भी जानकारी मिलती है कि  लगभग एक हजार बंजारा परिवार इस क्षेत्र के 40 गाँवों में रहते हैं.पुस्तक में नानक सागर रिसर्च टीम के प्रमुख अमृत पाल सिंह (रिंकू )ने  बंजारा समाज के प्रतिनिधियों से हुई चर्चा का भी उल्लेख किया है. उनके हवाले से उन्होंने लिखा है कि बंजारा समाज के पूर्वजों द्वारा गुरुनानक देव जी के नाम से शिवरीनारायण में करीब 5जगहों पर 9 एकड़ जमीन दी गई थी, जो आज भी मौज़ूद है. शिवरीनारायण में और गढ़फुलझर के पास ग्राम लिलेश्वर और जेवरा में गुरुनानक जी का मंदिर है जहाँ मूर्ति भी विराजमान है, जिनकी पूजा वहाँ के स्थानीय बंजारों द्वारा की जाती है. जेवरा में भी गुरुनानक देव जी के नाम 12एकड़ ज़मीन मौज़ूद है. बंजारा समाज के लोगों ने अमृतपाल सिंह को बताया कि वहाँ पर भी समाज ने एक छोटा गुरुद्वारा साहिब का निर्माण किया है.पुस्तक 'दिव्य धाम नानक सागर ' में अन्य विशिष्टजनों के साथ बंजारा समाज महासभा छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष श्री गुहाराम बंजारा का भी शुभकामना संदेश प्रकाशित किया गया है.उनके अलावा छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल, बसना के विधायक श्री सम्पत अग्रवाल, दिल्ली के गुरु सेवक सरदार देवेंदर सिंह,गुरुद्वारा धन धन बाबा बुड्ढा साहिब, तेलीबाँधा रायपुर के प्रधान सरदार हरकिशन सिंह राजपूत, साप्ताहिक 'छत्तीसगढ़ जनादेश ' महासमुंद के प्रधान सम्पादक श्री के. पी. साहू, और हम चाकर गोविन्द के, गतका अखाड़ा कमेटी दुर्ग के अध्यक्ष सरदार हरविंदर सिंह के भी शुभेच्छा संदेश इसमें प्रकाशित किए गए हैं. खोजकर्ता के रूप में अमृतपाल सिंह (रिंकू )ने भी  अपनी बात रखी है.

                     

           कई ऐतिहासिक चित्र भी हैं किताब में 

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पुस्तक में गुरुनानक जी के छत्तीसगढ़ प्रवास से जुड़े कई यादगार चित्र भी दिए गए हैं. इनमें गढ़ फुलझर के प्राचीन किले,गुरुद्वारा नानक सागर साहिब, गढ़फुलझर, मानसरोवर तालाब, भैना राजा के किले और मंदिर, रानी के किले, रानी तालाब,ग्राम नानक सागर में स्थित नानक चबूतरा,बंजारा समाज द्वारा पिथौरा से 31किलोमीटर दूर ग्राम लिलेसर में और ग्राम दाबपाली (बागबाहरा) में निर्मित गुरुनानक जी के मंदिर के फोटोग्राफ़्स भी शामिल हैं. इनके अलावा पिथौरा से लगभग 77किलोमीटर की दूरी पर शिवरी नारायण में भी बंजारा समाज ने  गुरुनानक जी का मंदिर बनवाया था. उसका फोटो भी पुस्तक में दिया गया है. नानक सागर में सिक्ख समाज ने एक भव्य गुरूद्वारे का निर्माण भी 15 मार्च 2026 से शुरू किया गया है.पुस्तक में गुरुनानक जी से जुड़ी 10 प्रेरक घटनाओं की भी जानकारी दी गई है.

                    प्रेरणा का प्रकाश पुंज है 'दिव्य धाम नानक सागर '

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    आज जबकि पूरी दुनिया में जगह -जगह युद्ध, हिंसा और प्रतिहिंसा का भयावह वातावरण है, अराजक तत्वों द्वारा मानव समाज को नफ़रत की आग में झुलसाया जा रहा है, तब  विश्व -शांति, मैत्री और सामाजिक सदभावना के लिए गुरुनानक देव जैसे पवित्र संत -महात्माओं के विचारों से ही मनुष्य को शांतिपूर्ण जीवन जीने का रास्ता मिल सकता है.  इस दृष्टि से देखें तो 'दिव्य धाम नानक सागर ' जैसी पुस्तक  निराशा के अंधकार में भटकते मनुष्यों को सच्चाई और अच्छाई की राह दिखाने वाले प्रेरणा के प्रकाश पुंज की तरह बहुत उपयोगी साबित हो सकती है.

 -स्वराज्य करुण 

Sunday, September 6, 2026

(लघुकथा ) स्वतंत्र देश का 'स्वतंत्र ' गुण्डा / लेखक -स्वराज्य करुण

 लघुकथा 

स्वतंत्र देश का  'स्वतंत्र ' गुण्डा ! 

   (लेखक - स्वराज्य करुण )

    उस दिन  सुबह -सवेरे चार सीधे -सादे , कुछ पढ़े -लिखे मज़दूर आदमी काम पर जाने से पहले  अपने मोहल्ले की एक गुमटी में चाय पी रहे थे और दीन -दुनिया की चर्चा भी कर रहे थे.उनमें से एक ने बाकी तीनों से पूछा - 

"अच्छा, आप लोग जरा ये बताइए, ऐसी स्वतंत्रता और कहाँ मिलेगी, जहाँ दुनिया के किसी स्वतंत्र देश में 'स्वतंत्र' नामक गुण्डा टीव्ही पर खुले आम इंटरव्यू दे और पूरी दमदारी से कहे कि हाँ उसने एक ग़रीब आदमी का सिर फोड़ा, इसके बाद भी कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया?" 
  दूसरा आदमी बोला -"हाँ,उसका यह भी कहना था कि उस स्वतंत्र देश के बड़े -बड़े ताकतवर लोग उसके बड़े भाई हैं और उनका आशीर्वाद हमेशा उसके साथ रहता है और अपराध करने के बाद भी इन ताकतवर लोगों के आशीर्वाद से ही आज वह आज़ाद घूम रहा था."
 तीसरे ने कहा -" लेकिन धन्य है उस स्वतंत्र देश का वह प्राइवेट चैनल, जिसने पॉडकास्ट के रूप में उस अपराधी का इंटरव्यू भी प्रसारित किया.  कल शाम फिर उस देश के एक चैनल में  उसके  एक बयान की यह पट्टी भी दिखाई गई, कि कोई उसका बाल बाँका भी नहीं कर सकता, चाहे ट्रम्प आए या नेतन्याहू ! "
यह सुनकर पहला आदमी बोला -" हालांकि फिर  ये भी ख़बर आई कि उस  'स्वतंत्र  गुण्डे'  को पकड़ लिया गया है.लेकिन पकड़ लिए जाने से पहले वह पूरी अकड़ के साथ गुंडागर्दी के अपने अपराध को गर्व के साथ और  बेशर्मी से टीव्ही पर स्वीकार भी करता रहा  ?सोचने वाली बात ये है कि पकड़ में वह आख़िर कब तक रहेगा? उस देश में तो राम और रहीम के नाम को बदनाम करने वाला एक शातिर अपराधी सीखचों के पीछे आराम फरमाता है और अपनी मर्जी से, जब चाहे, तब थोड़े -थोड़े दिनों के बाद दुनिया की सैर करने  बाहर आता -जाता  है. बताओ भला,उस देश का समाज कहाँ जा रहा है?" 
      चौथे आदमी ने कहा -"समाज कहीं जाए, हमको तो अपने काम पर जाना है, नहीं तो आज की मज़दूरी कैसे मिलेगी? स्वतंत्र नामक वह गुण्डा तो एक न एक दिन अपनी इसी गुंडई ताकत के दम पर उस स्वतंत्र देश को अपना गुलाम बना ही लेगा और वहाँ का नेता भी बन जाएगा,लेकिन फिलहाल तो हमें आज की अपनी मज़दूरी की चिन्ता है." यह कहते हुए वे सब लोग अपने -अपने काम पर निकल पड़े!

     - स्वराज्य करुण 

 

Thursday, July 30, 2026

(पुस्तक -चर्चा )सबकी ख़ुशहाली के लिए 'मेरे दिल की बात ' (आलेख - डॉ. परदेशी राम वर्मा )

 मेरे काव्य -संग्रह पर छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय डॉ. परदेशी राम वर्मा जी के मूल्यवान विचार, उनके समीक्षात्मक आलेख में, जो उन्हें धन्यवाद सहित यहाँ प्रस्तुत हैं -

सबकी ख़ुशहाली के लिए 'मेरे दिल की बात '

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 'मेरे दिल की बात' छत्तीसगढ़ के सुपरिचित कवि स्वराज्य करुण का नया काव्य -संग्रह है. इस संग्रह में उन्होंने अपनी 62 कविताओं को संकलित किया है. भिन्न -भिन्न रंग की रचनाओं के माध्यम से अपने दिल की बात कहने का उन्होंने सुन्दर प्रयत्न किया है. स्वराज्य करुण यूँ तो गद्य लेखक के रूप में भी विशेष पहचान रखते हैं, किन्तु मूलतः वे कवि हैं. विगत चालीस वर्षो से वे कविताएँ लिख रहे हैं. उन्होंने बच्चों के लिए भी ख़ूब लिखा है. गीत विधा और ग़ज़ल पर भी उनका भरपूर अधिकार है. वे सरलता के आग्रही हैं. गीतों, ग़ज़लों में भी उनका यह आग्रह देखते ही बनता है -

     "ये अपनी धरती 

     धान का सागर है,

     दूर -दूर तक फैले 

      प्रेम के आखर हैं."

यह बहुत प्रभावी प्रयोग है. छत्तीसगढ़ धान का कटोरा है -इस मुहावरे पर मुग्ध माटी -पुत्र स्वराज्य  करुण ने कितना विराट आकार देने का यत्न किया है!कटोरे को उन्होंने 'धान का सागर ' कहा और धान के भरे -भरे खेतों को 'प्रेम का आखर 'कहा. छत्तीसगढ़ प्रेम, समता, अहिंसा और मेल -मिलाप की धरती है.यह धान उपजाने वाला 'धान का सागर 'है.धान के खेत इसीलिए 'प्रेम के आखर' के रूप में कविता में आए हैं.  स्वराज्य करुण का जन्म गरियाबंद में हुआ. छत्तीसगढ़ का यह हरा -भरा क्षेत्र बेहद सुन्दर है. इस क्षेत्र की सुन्दरता का असर कवि पर होना स्वाभाविक है. उन्होंने अपने जन्म स्थल के सौंदर्य को सदैव रेखांकित किया है -

       "नीला पर्वत, निर्मल नदियाँ और यह तालाब,

       लगता जैसे दिन में भी कोई सुन्दर ख़्वाब. 

       सौ -सौ जनम इस धरती पर रहे सदा आबाद,

      एक अनोखा सुख देती है हमको इसकी याद."


                          




                                                          डॉ. परदेशी राम वर्मा 

इस संकलन में अधिकांश कविताएँ प्रकृति की सुन्दरता पर हैं. लेकिन हमारे दौर की विसंगतियों पर भी संग्रह में प्रभावी रचनाएँ हैं. एक तरफ प्रकृति की सुन्दरता पर कवि मुग्ध होकर बार -बार इसी छत्तीसगढ़ में जन्म लेने की कामना करता है तो दूसरी ओर विरूपित हो रही दुनिया के संताप को महसूस कर व्यथित भी होता है-

     "बेच रहे देश को आसान किश्तों में,

     ग्राहकों की कमी नहीं इस कारोबार में.

     बिक जाएगा वतन देखते ही देखते,

     ध्यान अगर गया नहीं वतन की पुकार में."

विसंगतियों पर प्रहार करने का करुण जी का यह अंदाज ध्यान आकृष्ट करता है -

      "कैसे -कैसे मंज़र आए गाँधी जी के देश में,  

      फूल नहीं अब खंजर आए गाँधी जी के देश में "

इस संग्रह में गीत, ग़ज़ल और नई कविताएँ एक साथ हैं. दिल की बात है,  जिस ढंग से भी अभिव्यंजित हो. स्वराज्य करुण हिन्दी, छत्तीसगढ़ी और ओड़िया, तीन भाषाओं के जानकार हैं. उन्होंने वर्ष 1985 में नृसिंहनाथ मंदिर पर केंद्रित निराकार महालिक की ओड़िया भाषा में लिखित पुस्तक का हिन्दी अनुवाद किया था. वर्ष 2002 में उनका बालगीत संग्रह प्रकाशित और चर्चित हो चुका है.'   'हिलमिल सब करते हैं झिलमिल' संग्रह में उनकी चर्चित बाल कविताएँ हैं. 

    विद्यार्थी जीवन से ही लगातार लिखते रहने वाले स्वराज्य करुण जब विभिन्न दायित्वों से जुड़कर वैचारिक लेखन करते हैं, तब भी पठनीयता की शर्तों का ध्यान रखते हैं. प्रस्तुत संग्रह 'मेरे दिल की बात 'की कविताओं में उन्हें मुक्त उड़ान भरने का अवसर लगा है, जिसका उन्होंने ख़ूब लाभ भी लिया है. व्यवस्था से जन्मी विसंगतियों पर प्रतीकों में मर्यादित प्रहार करने का अवसर उन्होंने नहीं खोया है. तमाम निराशा और हताशा से भरे दौर में भी वे आशान्वित हैं. वे बहुत बड़ी आशा भी नहीं करते. वे आम आदमी के कवि हैं. इसलिए केवल यही कामना करते हैं -

   "न तरसे कोई दो वक़्त की थाली के लिए,

   दुआ करें सबकी ख़ुशहाली के लिए."

        

         आलेख  -डॉ. परदेशी राम वर्मा 

           एल. आई. जी. 18,

          आमदी नगर, भिलाई 490009 

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कृति : मेरे दिल की बात 

कवि : स्वराज्य करुण 

प्रकाशक : जी. नाइन पब्लिकेशन, 

रायपुर

प्रकाशन वर्ष 2011

मूल्य ; 50 रूपए 

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Thursday, July 2, 2026

(ग़ज़ल ) घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा? - स्वराज्य करुण

 घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा ?

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उजड़ते हैं कई घर, उजड़ती हैं बस्तियाँ 

फिर भी कम होती नहीं उनकी मस्तियाँ.

उनको चाहिए जगह ख़ूब लम्बी चौड़ी 

सियासत में मगन हैं जो बेखौफ़ हस्तियाँ .

उनके लिए तो खेल है ये रोज का यहाँ 

हाथों में जिनके है सिंहासन की रस्सियाँ.

आएगा तूफ़ाँ क्या उनको नहीं पता,

भंवर में छोड़ जाएगा जो उनकी कश्तियाँ.

तिनकों को जोड़ जिसने बनाया था अपना घर 

लुटेरों ने लूट लिया कल उसका आशियाँ.

घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा 

वीरान रसोई में कैसे बनेंगी रोटियाँ .

तबाही का तमाशा हुआ बच्चों के सामने 

क्या सोचेंगी कहो कल नई -नई पीढ़ियाँ.

  -स्वराज्य करुण 


Wednesday, July 1, 2026

(कविता ) हर लफ्ज़ बेअसर हो गया है..! कवि - स्वराज्य करुण

 हर लफ्ज़ बेअसर हो गया है..!

     (कवि -स्वराज्य करुण )

चेहरा उसका ख़ूनी खंजर हो गया है, 

दिल भी बेरहम बुलडोजर हो गया है.

दर्द किसी का क्या जाने वो कुर्सीवाला , 

जिसके हाथों गाँवों का मर्डर हो गया है.

जज्बातों के फूलों को कुचला है जिसने,

 इरादा उसका निर्मम पत्थर हो गया है.

खामोशी से देख रहा सब जुल्म यहाँ,

आदमी जो मंदिर का ईश्वर हो गया है.

कोई रोये या चीखे अब सामने उसके,

प्रार्थना का हर लफ्ज़ बेअसर हो गया है.

सीधे सादे इंसानों  का घर - आंगन,  

पल भर में ही कितना जर्जर हो गया है.

उनके सपनों का बगीचा जा कर देखो, 

आज वहाँ ये कैसा मंजर हो गया है.

फूलों जैसे नाजुक -नाजुक बच्चों में भी,

जाने कौन इतनी दहशत बो गया है.

राजमहल तुम अपने लिए वहाँ बनाओगे,

जहाँ पे उसका खेत बंजर हो गया है.

मज़दूर ने  अपनी मेहनत से जो घर बनाया, 

तुम्हारे हाथों आज वो खंडहर हो गया है.

जिसके ख़्वाबों को  तुमने दफ़न कर दिया,

वह इंसान बागी अब उठकर हो  गया है.

पी रहे हो  तुम जिसे समझकर अमृत,

लिये तुम्हारे पछतावे का जहर हो गया है.

बर्बाद किया है तुमने जिस गाँव को सुनो, 

ग़रीबों के अभिशाप का वो शहर हो गया है.

उनकी आहें तूफानों में इक दिन बदलेंगी, 

देखोगे तब झोंका हवा का बवंडर  हो गया है.

-स्वराज्य करुण 

 



Monday, June 29, 2026

(कविता ) कहाँ जाएँ सब बेघर पंछी? -स्वराज्य करुण

कहाँ जाएँ कहो बेघर पंछी?

      (स्वराज्य करुण )

कहाँ जाएँ कहो बेघर पंछी  धूप और बरसात में 

उजड़ गए  घरौंदे जिनके, सुबह, दोपहर, रात में.

अब न होगी भिनसारे उनकी प्यार भरी चहक यहाँ 

नहीं मिलेगी आंगन में अब मोंगरे की महक यहाँ.

बच्चों की आँखों के आगे उजड़े जिनके गाँव 

उन मेहनतकश परिवारों को कहाँ मिलेगी छाँव.

करते थे जो बहा पसीना, कुछ सपनों की खेती,.

पूछ रही माटी -महतारी कहाँ अपनों की खेती.

अंधियारे में तुलसी चौरा, रोये घर की महतारी 

जाने किसकी नज़र लगी है शोक में डूबे नर -नारी. 

राजाओं के महल बनेंगे खेतों और खलिहानों में,

मजूर किसान की गिनती भी कब होती है इंसानों में.

नहीं छोड़ेंगे गाँव तो उनकी बस्ती में आग लगाएंगे

फिर उनकी खाली जमीन पर वे अपने बाग लगाएंगे.

उनको अपना नौकर समझे, दुत्कारे हर बात में, 

आ गया है छल -कपट से पावर जिनके हाथ में.

शहरों से जो सज -धज कर आए अपनी मोटर कार में,

उनका दिल क्यों डूबेगा बोलो यहाँ के हाहाकार में.

-स्वराज्य करुण 

29 जून 2026