Sunday, September 6, 2026

(लघुकथा ) स्वतंत्र देश का 'स्वतंत्र ' गुण्डा / लेखक -स्वराज्य करुण

 लघुकथा 

स्वतंत्र देश का  'स्वतंत्र ' गुण्डा ! 

   (लेखक - स्वराज्य करुण )

    उस दिन  सुबह -सवेरे चार सीधे -सादे , कुछ पढ़े -लिखे मज़दूर आदमी काम पर जाने से पहले  अपने मोहल्ले की एक गुमटी में चाय पी रहे थे और दीन -दुनिया की चर्चा भी कर रहे थे.उनमें से एक ने बाकी तीनों से पूछा - 

"अच्छा, आप लोग जरा ये बताइए, ऐसी स्वतंत्रता और कहाँ मिलेगी, जहाँ दुनिया के किसी स्वतंत्र देश में 'स्वतंत्र' नामक गुण्डा टीव्ही पर खुले आम इंटरव्यू दे और पूरी दमदारी से कहे कि हाँ उसने एक ग़रीब आदमी का सिर फोड़ा, इसके बाद भी कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया?" 
  दूसरा आदमी बोला -"हाँ,उसका यह भी कहना था कि उस स्वतंत्र देश के बड़े -बड़े ताकतवर लोग उसके बड़े भाई हैं और उनका आशीर्वाद हमेशा उसके साथ रहता है और अपराध करने के बाद भी इन ताकतवर लोगों के आशीर्वाद से ही आज वह आज़ाद घूम रहा था."
 तीसरे ने कहा -" लेकिन धन्य है उस स्वतंत्र देश का वह प्राइवेट चैनल, जिसने पॉडकास्ट के रूप में उस अपराधी का इंटरव्यू भी प्रसारित किया.  कल शाम फिर उस देश के एक चैनल में  उसके  एक बयान की यह पट्टी भी दिखाई गई, कि कोई उसका बाल बाँका भी नहीं कर सकता, चाहे ट्रम्प आए या नेतन्याहू ! "
यह सुनकर पहला आदमी बोला -" हालांकि फिर  ये भी ख़बर आई कि उस  'स्वतंत्र  गुण्डे'  को पकड़ लिया गया है.लेकिन पकड़ लिए जाने से पहले वह पूरी अकड़ के साथ गुंडागर्दी के अपने अपराध को गर्व के साथ और  बेशर्मी से टीव्ही पर स्वीकार भी करता रहा  ?सोचने वाली बात ये है कि पकड़ में वह आख़िर कब तक रहेगा? उस देश में तो राम और रहीम के नाम को बदनाम करने वाला एक शातिर अपराधी सीखचों के पीछे आराम फरमाता है और अपनी मर्जी से, जब चाहे, तब थोड़े -थोड़े दिनों के बाद दुनिया की सैर करने  बाहर आता -जाता  है. बताओ भला,उस देश का समाज कहाँ जा रहा है?" 
      चौथे आदमी ने कहा -"समाज कहीं जाए, हमको तो अपने काम पर जाना है, नहीं तो आज की मज़दूरी कैसे मिलेगी? स्वतंत्र नामक वह गुण्डा तो एक न एक दिन अपनी इसी गुंडई ताकत के दम पर उस स्वतंत्र देश को अपना गुलाम बना ही लेगा और वहाँ का नेता भी बन जाएगा,लेकिन फिलहाल तो हमें आज की अपनी मज़दूरी की चिन्ता है." यह कहते हुए वे सब लोग अपने -अपने काम पर निकल पड़े!

     - स्वराज्य करुण 

 

Thursday, July 30, 2026

(पुस्तक -चर्चा )सबकी ख़ुशहाली के लिए 'मेरे दिल की बात ' (आलेख - डॉ. परदेशी राम वर्मा )

 मेरे काव्य -संग्रह पर छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय डॉ. परदेशी राम वर्मा जी के मूल्यवान विचार, उनके समीक्षात्मक आलेख में, जो उन्हें धन्यवाद सहित यहाँ प्रस्तुत हैं -

सबकी ख़ुशहाली के लिए 'मेरे दिल की बात '

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 'मेरे दिल की बात' छत्तीसगढ़ के सुपरिचित कवि स्वराज्य करुण का नया काव्य -संग्रह है. इस संग्रह में उन्होंने अपनी 62 कविताओं को संकलित किया है. भिन्न -भिन्न रंग की रचनाओं के माध्यम से अपने दिल की बात कहने का उन्होंने सुन्दर प्रयत्न किया है. स्वराज्य करुण यूँ तो गद्य लेखक के रूप में भी विशेष पहचान रखते हैं, किन्तु मूलतः वे कवि हैं. विगत चालीस वर्षो से वे कविताएँ लिख रहे हैं. उन्होंने बच्चों के लिए भी ख़ूब लिखा है. गीत विधा और ग़ज़ल पर भी उनका भरपूर अधिकार है. वे सरलता के आग्रही हैं. गीतों, ग़ज़लों में भी उनका यह आग्रह देखते ही बनता है -

     "ये अपनी धरती 

     धान का सागर है,

     दूर -दूर तक फैले 

      प्रेम के आखर हैं."

यह बहुत प्रभावी प्रयोग है. छत्तीसगढ़ धान का कटोरा है -इस मुहावरे पर मुग्ध माटी -पुत्र स्वराज्य  करुण ने कितना विराट आकार देने का यत्न किया है!कटोरे को उन्होंने 'धान का सागर ' कहा और धान के भरे -भरे खेतों को 'प्रेम का आखर 'कहा. छत्तीसगढ़ प्रेम, समता, अहिंसा और मेल -मिलाप की धरती है.यह धान उपजाने वाला 'धान का सागर 'है.धान के खेत इसीलिए 'प्रेम के आखर' के रूप में कविता में आए हैं.  स्वराज्य करुण का जन्म गरियाबंद में हुआ. छत्तीसगढ़ का यह हरा -भरा क्षेत्र बेहद सुन्दर है. इस क्षेत्र की सुन्दरता का असर कवि पर होना स्वाभाविक है. उन्होंने अपने जन्म स्थल के सौंदर्य को सदैव रेखांकित किया है -

       "नीला पर्वत, निर्मल नदियाँ और यह तालाब,

       लगता जैसे दिन में भी कोई सुन्दर ख़्वाब. 

       सौ -सौ जनम इस धरती पर रहे सदा आबाद,

      एक अनोखा सुख देती है हमको इसकी याद."


                          




                                                          डॉ. परदेशी राम वर्मा 

इस संकलन में अधिकांश कविताएँ प्रकृति की सुन्दरता पर हैं. लेकिन हमारे दौर की विसंगतियों पर भी संग्रह में प्रभावी रचनाएँ हैं. एक तरफ प्रकृति की सुन्दरता पर कवि मुग्ध होकर बार -बार इसी छत्तीसगढ़ में जन्म लेने की कामना करता है तो दूसरी ओर विरूपित हो रही दुनिया के संताप को महसूस कर व्यथित भी होता है-

     "बेच रहे देश को आसान किश्तों में,

     ग्राहकों की कमी नहीं इस कारोबार में.

     बिक जाएगा वतन देखते ही देखते,

     ध्यान अगर गया नहीं वतन की पुकार में."

विसंगतियों पर प्रहार करने का करुण जी का यह अंदाज ध्यान आकृष्ट करता है -

      "कैसे -कैसे मंज़र आए गाँधी जी के देश में,  

      फूल नहीं अब खंजर आए गाँधी जी के देश में "

इस संग्रह में गीत, ग़ज़ल और नई कविताएँ एक साथ हैं. दिल की बात है,  जिस ढंग से भी अभिव्यंजित हो. स्वराज्य करुण हिन्दी, छत्तीसगढ़ी और ओड़िया, तीन भाषाओं के जानकार हैं. उन्होंने वर्ष 1985 में नृसिंहनाथ मंदिर पर केंद्रित निराकार महालिक की ओड़िया भाषा में लिखित पुस्तक का हिन्दी अनुवाद किया था. वर्ष 2002 में उनका बालगीत संग्रह प्रकाशित और चर्चित हो चुका है.'   'हिलमिल सब करते हैं झिलमिल' संग्रह में उनकी चर्चित बाल कविताएँ हैं. 

    विद्यार्थी जीवन से ही लगातार लिखते रहने वाले स्वराज्य करुण जब विभिन्न दायित्वों से जुड़कर वैचारिक लेखन करते हैं, तब भी पठनीयता की शर्तों का ध्यान रखते हैं. प्रस्तुत संग्रह 'मेरे दिल की बात 'की कविताओं में उन्हें मुक्त उड़ान भरने का अवसर लगा है, जिसका उन्होंने ख़ूब लाभ भी लिया है. व्यवस्था से जन्मी विसंगतियों पर प्रतीकों में मर्यादित प्रहार करने का अवसर उन्होंने नहीं खोया है. तमाम निराशा और हताशा से भरे दौर में भी वे आशान्वित हैं. वे बहुत बड़ी आशा भी नहीं करते. वे आम आदमी के कवि हैं. इसलिए केवल यही कामना करते हैं -

   "न तरसे कोई दो वक़्त की थाली के लिए,

   दुआ करें सबकी ख़ुशहाली के लिए."

        

         आलेख  -डॉ. परदेशी राम वर्मा 

           एल. आई. जी. 18,

          आमदी नगर, भिलाई 490009 

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कृति : मेरे दिल की बात 

कवि : स्वराज्य करुण 

प्रकाशक : जी. नाइन पब्लिकेशन, 

रायपुर

प्रकाशन वर्ष 2011

मूल्य ; 50 रूपए 

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Thursday, July 2, 2026

(ग़ज़ल ) घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा? - स्वराज्य करुण

 घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा ?

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उजड़ते हैं कई घर, उजड़ती हैं बस्तियाँ 

फिर भी कम होती नहीं उनकी मस्तियाँ.

उनको चाहिए जगह ख़ूब लम्बी चौड़ी 

सियासत में मगन हैं जो बेखौफ़ हस्तियाँ .

उनके लिए तो खेल है ये रोज का यहाँ 

हाथों में जिनके है सिंहासन की रस्सियाँ.

आएगा तूफ़ाँ क्या उनको नहीं पता,

भंवर में छोड़ जाएगा जो उनकी कश्तियाँ.

तिनकों को जोड़ जिसने बनाया था अपना घर 

लुटेरों ने लूट लिया कल उसका आशियाँ.

घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा 

वीरान रसोई में कैसे बनेंगी रोटियाँ .

तबाही का तमाशा हुआ बच्चों के सामने 

क्या सोचेंगी कहो कल नई -नई पीढ़ियाँ.

  -स्वराज्य करुण 


Wednesday, July 1, 2026

(कविता ) हर लफ्ज़ बेअसर हो गया है..! कवि - स्वराज्य करुण

 हर लफ्ज़ बेअसर हो गया है..!

     (कवि -स्वराज्य करुण )

चेहरा उसका ख़ूनी खंजर हो गया है, 

दिल भी बेरहम बुलडोजर हो गया है.

दर्द किसी का क्या जाने वो कुर्सीवाला , 

जिसके हाथों गाँवों का मर्डर हो गया है.

जज्बातों के फूलों को कुचला है जिसने,

 इरादा उसका निर्मम पत्थर हो गया है.

खामोशी से देख रहा सब जुल्म यहाँ,

आदमी जो मंदिर का ईश्वर हो गया है.

कोई रोये या चीखे अब सामने उसके,

प्रार्थना का हर लफ्ज़ बेअसर हो गया है.

सीधे सादे इंसानों  का घर - आंगन,  

पल भर में ही कितना जर्जर हो गया है.

उनके सपनों का बगीचा जा कर देखो, 

आज वहाँ ये कैसा मंजर हो गया है.

फूलों जैसे नाजुक -नाजुक बच्चों में भी,

जाने कौन इतनी दहशत बो गया है.

राजमहल तुम अपने लिए वहाँ बनाओगे,

जहाँ पे उसका खेत बंजर हो गया है.

मज़दूर ने  अपनी मेहनत से जो घर बनाया, 

तुम्हारे हाथों आज वो खंडहर हो गया है.

जिसके ख़्वाबों को  तुमने दफ़न कर दिया,

वह इंसान बागी अब उठकर हो  गया है.

पी रहे हो  तुम जिसे समझकर अमृत,

लिये तुम्हारे पछतावे का जहर हो गया है.

बर्बाद किया है तुमने जिस गाँव को सुनो, 

ग़रीबों के अभिशाप का वो शहर हो गया है.

उनकी आहें तूफानों में इक दिन बदलेंगी

देखोगे तब झोंका हवा का बवंडर  हो गया है.

-स्वराज्य करुण 

 



Monday, June 29, 2026

(कविता ) कहाँ जाएँ सब बेघर पंछी? -स्वराज्य करुण

कहाँ जाएँ कहो बेघर पंछी?

      (स्वराज्य करुण )

कहाँ जाएँ कहो बेघर पंछी  धूप और बरसात में 

उजड़ गए  घरौंदे जिनके, सुबह, दोपहर, रात में.

अब न होगी भिनसारे उनकी प्यार भरी चहक यहाँ 

नहीं मिलेगी आंगन में अब मोंगरे की महक यहाँ.

बच्चों की आँखों के आगे उजड़े जिनके गाँव 

उन मेहनतकश परिवारों को कहाँ मिलेगी छाँव.

करते थे जो बहा पसीना, कुछ सपनों की खेती,.

पूछ रही माटी -महतारी कहाँ अपनों की खेती.

अंधियारे में तुलसी चौरा, रोये घर की महतारी 

जाने किसकी नज़र लगी है शोक में डूबे नर -नारी. 

राजाओं के महल बनेंगे खेतों और खलिहानों में,

मजूर किसान की गिनती भी कब होती है इंसानों में.

नहीं छोड़ेंगे गाँव तो उनकी बस्ती में आग लगाएंगे

फिर उनकी खाली जमीन पर वे अपने बाग लगाएंगे.

उनको अपना नौकर समझे, दुत्कारे हर बात में, 

आ गया है छल -कपट से पावर जिनके हाथ में.

शहरों से जो सज -धज कर आए अपनी मोटर कार में,

उनका दिल क्यों डूबेगा बोलो यहाँ के हाहाकार में.

-स्वराज्य करुण 

29 जून 2026 












Friday, June 5, 2026

(आलेख ) पर्यावरण संकट को लेकर हमारी चुप्पी शर्मनाक भी और खतरनाक भी !

 आज 5जून ; विश्व पर्यावरण दिवस 

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(आलेख - स्वराज्य करुण )

  हम आख़िर कैसी दुनिया चाहते हैं?क्या हमें हरे -भरे वनों, पर्वतीय झरनों   और नदियों की अमृत धाराओं से परहेज है? अगर नहीं तो क्यों हम ख़ामोश रहकर इनकी बर्बादी देखते रहते हैं? यह ज़रूर है कि हममें से कुछ लोग इनकी रक्षा के लिए संघर्ष करते रहते हैं । उनके जज्बे को प्रणाम और सलाम, लेकिन  पर्यावरण बचाने की लड़ाई में उनका साथ देने वाले हममें से आख़िर हैं कितने लोग? जंगल तबाह हो रहे हैं,पहाड़ उजड़ते जा रहे हैं, नदियाँ सूखती जा रही हैं । विश्व पर्यावरण दिवस आज हमें चीख़- चीख़ कर कह रहा है कि  तेजी से तबाह हो रहे अपने प्राकृतिक पर्यावरण को बचा लो, लेकिन इन चीखों के जवाब में उन्हें मिलती है हमारी कायरतापूर्ण चुप्पी! यह चुप्पी बेहद शर्मनाक है,  चिन्ताजनक है और बेहद खतरनाक भी । 


                                        


विश्व पर्यावरण दिवस सिर्फ़ पौधे लगाने की औपचारिकता तक सीमित नहीं रहना चाहिए । लगाए गए पौधों की देख -भाल भी हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए । देखा जाए तो पर्यावरण के भी कई प्रकार होते हैं । मेरे ख़्याल से इनमें पहला है प्राकृतिक पर्यावरण, जिसमें नदी, पहाड़,तालाब, जंगल और झरनों के साथ -साथ समुद्र और और वायुमंडल भी शामिल है। इसी कड़ी में सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और औद्योगिक पर्यावरण  सहित मनुष्य का स्वयं का मानसिक और पारिवारिक पर्यावरण भी है । हमें इन सभी प्रकार के पर्यावरणों की रक्षा करनी होगी, लेकिन इसके लिए सबसे पहले प्राकृतिक पर्यावरण को बचाना होगा । हमारा प्राकृतिक परिवेश अगर स्वच्छ रहेगा तो बाकी सभी पर्यावरणीय संकट अपने -आप समाप्त होते जाएंगे । अगर हम समाज में सुख ,शांति और समृद्धि चाहते हैं तो सबसे पहले अपने प्राकृतिक पर्यावरण को बचाना होगा ।  स्वच्छ पर्यावरण हमारे शारीरिक पर्यावरण को भी स्वस्थ बनाएगा । 

तरह -तरह की बीमारियों का असली कारण हमारा प्रदूषित पर्यावरण ही तो है! भारत के संदर्भ में मुझे प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वर्ष 2014 में देश में शुरु किए गए स्वच्छ भारत अभियान की याद आ रही है । देश के लाखों गाँवों और हजारों शहरों में इस अभियान के लिए जन भागीदारी के साथ, जैसा उत्साहजनक वातावरण बना था, लगता है कि उसकी आँच अब धीमी पड़ गई है । पर्यावरण की स्वच्छता के लिए जिस अच्छे उद्देश्य से और जिस जोशीले अंदाज में यह अभियान चलाया गया था, क्या  उसी जोश -ओ -खरोश से उसे दोबारा शुरु नहीं किया जा सकता?

      लेकिन दिक्कत यह है कि  हम सब नागरिक अपने पर्यावरण पर गहराते संकट को लेकर बहुत लापरवाह हैं । सब कुछ जानते ,समझते हुए भी इंसान अपने पर्यावरण को दूषित कर रहा है और अपने साथ -साथ अपनी दुनिया को भी तबाही के रास्ते पर ले जा रहा है। पहाड़ों की हरियाली को नोच खसोट कर उनके नैसर्गिक सौंदर्य को नष्ट करने में अब शायद किसी को कष्ट नहीं होता। बढ़ती जनसंख्या ,बढ़ते शहरीकरण और तीव्र गति से फलते -फूलते  औद्योगिक विकास की वजह से जल ,जंगल ,पहाड़ और ज़मीन  आज गंभीर संकट में हैं। अत्यधिक शहरीकरण और सीमेंट कांक्रीट की लगातार पसरती बस्तियों में (अब तो गाँवों में भी )पक्के मकानों का निर्माण हो रहा है। सीमेंट कांक्रीट की सड़कें बन रही हैं। इन सबमें प्राकृतिक पत्थरों के उपयोग के लिए मनुष्य और मशीनों के हाथों पहाड़ उजड़ते जा रहे हैं। 

    हर कोई आज पक्के घरों में रहना चाहता है। इसमें मनुष्य की कई तरह की मज़बूरियाँ भी हैं ।चारे पानी की तलाश में गाँवों में आने जाने वाले बन्दर ग्रामीणों के  खपरैल वाली छतों को उजाड़ देते हैं। जंगल कट रहे हैं ,तो वहाँ रहने वाले पशु -पक्षियों का जीवन भी खतरे में पड़ गया है। हमें इन सबका विकल्प भी सोचना होगा। नये जंगल लगाने होंगे। उजड़ते पहाड़ों में सघन वृक्षारोपण करना होगा।आधुनिक ड्रोन टेक्नोलॉजी के जरिए उनमें बरसात के दिनों में फलदार ,छायादार वृक्षों के बीजों का छिड़काव हो सकता है।  शायद उनमें पीपल जैसे वृक्षों के बीजों का छिड़काव भी हो  तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं ,क्योंकि पीपल की जड़ें कठोर धरती और पत्थरों की दरारों के बीच भी उगने के लिए जगह बना लेती हैं। लोग कहते हैं कि यह चौबीसों घंटे ऑक्सीजन देने वाला वृक्ष है।

    देश में आज प्लास्टिक और पॉलीथिन का कचरा हमारे पर्यावरण के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। शहरों के साथ साथ हमारे गाँव और कस्बे भी प्लास्टिक प्रदूषण के शिंकजे में है। अधिकांश लोग जानते हैं कि  प्लास्टिक कचरे की रिसाइक्लिंग करके उसे दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है ,सड़क निर्माण में प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल हो सकता है , लेकिन इंसान हर तरफ प्लास्टिक के डिब्बों बोतलों और पॉलीथिन की थैलियों का उपयोग करने के बाद उन्हें लापरवाही से इधर उधर फेंककर प्रदूषण फैलाने का अपराध कर रहा है । यहाँ तक कि अब तो हमारे महासागर भी इस प्रदूषण की चपेट में आ गए हैं। यह एक अच्छी पहल है कि भारत सरकार द्वारा देश के कई शहरों में प्लास्टिक इंजीनियरिंग संस्थान संचालित किए जा रहे हैं ,जहाँ युवाओं को इस विषय में प्रशिक्षण के साथ डिग्री /प्रमाणपत्र भी दिये जाते हैं। प्लास्टिक रिसाइकिलिंग में इन युवाओं की प्रतिभा का उपयोग करते हुए उन्हें रोजगार के अवसर दिए जा सकते हैं। 

      अगर देश में कृषि उपजों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की तरह प्लास्टिक कचरे की सरकारी खरीदी के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित हो और जगह जगह खरीदी केंद्र बना दिए जाएं तो जहाँ बड़ी संख्या में गरीबों को कुछ अतिरिक्त आमदनी हो सकती है ,वहीं हमारे चारों ओर प्लास्टिक और पॉलीथिन के बेतरतीब  फैलते लाखों  टुकड़े काफी हद तक साफ़ हो जाएंगे।

   दुनिया भर में कई देशों द्वारा समुद्र और ज़मीन के भीतर और हवा में किया जाने वाला परमाणु हथियारों का परीक्षण भी बढ़ते प्रदूषण का एक ख़तरनाक कारण बन गया है। पूरी दुनिया में परमाणु परीक्षणों और परमाणु हथियारों पर कड़ा  प्रतिबंध लगा देना  चाहिए।  लगभग दो दशक पहले हुए अमेरिका -इराक युद्ध, वर्ष 2021 से चल रहे रूस -यूक्रेन युद्ध और इस वर्ष 2026 में अमेरिका -इजराइल और ईरान के बीच हो रही लड़ाई में 

जिस बड़े पैमाने पर बमबारी हुई और हो भी रही है, क्या उससे जन -धन की हानि के साथ -साथ पर्यावरण का भी विनाश नहीं हुआ होगा? लेबनान पर इजराइली हमलों में भी जन -धन और पर्यावरण का भारी विनाश हुआ ही होगा । आज ज़रूरत इस बात की है कि पर्यावरण और मानवता की रक्षा के लिए ऐसे युद्ध  तत्काल रोके जाएँ और पूरी दुनिया में धरती के मरणासन्न हरित आवरण को नया जीवन दिया जाए ।

      आलेख   -स्वराज्य करुण

      चित्र  -आचार्य ललित मुनि 

Wednesday, March 18, 2026

(पुस्तक -चर्चा ) एक साझा कविता -संग्रह की अगले साल होगी स्वर्ण जयंती /लेखक -स्वराज्य करुण

 एक साझा कविता -संग्रह की अगले साल होगी स्वर्ण जयंती 

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लगभग 49 साल पहले के आरंग की हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कविताएँ 

             

 (आलेख -स्वराज्य करुण )

   छत्तीसगढ़ में साझा कविता संग्रहों के प्रकाशन की उत्साहजनक परम्परा आज भले ही कमज़ोर पड़ गई हो, लेकिन उस दौर में शहरों और कस्बाई गाँवों से प्रकाशित हुए कई संकलन आज भी उस परम्परा की याद दिलाते हैं ।  महानदी के समीपवर्ती  शहर आरंग के 22 कवियों के साझा संग्रह 'आरंग के कवि ' का प्रकाशन  लगभग 49 साल पहले जून 1977 में हुआ था   ।  आगामी जून 2027 में इसके  50 साल पूरे हो जाएंगे, जो हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कवियों के इस मिले -जुले  कविता संग्रह की स्वर्ण जयंती होगी  । अभिव्यक्ति की चाहत हर व्यक्ति में होती है । हर किसी के मन में अपने आस -पास हो रही अच्छी -बुरी घटनाओं के बारे में तरह -तरह के विचार उठते रहते हैं , जिन्हें वह बातचीत में किसी न किसी से साझा करता ही है ।  अगर व्यक्ति कवि या लेखक हुआ तो वह अपने विचारों को या अपनी भावनाओं को लिखकर प्रकट करता है । उसकी अभिव्यक्ति कविता, कहानी, निबंध आदि साहित्यिक विधाओं में समाज के सामने आती है ।  आरंग के कवियों का यह साझा -संग्रह भी मनुष्य की वैचारिक अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण दस्तावेज है । छत्तीसगढ़ की साहित्यिक विरासत को और भी ज़्यादा धनवान बनाने में स्थानीय स्तर के ऐसे प्रकाशनों का भी सराहनीय योगदान रहा है  । ऐसे प्रकाशन जिस गाँव, कस्बे या शहर में होते हैं, उसे भी दूर -दूर तक  साहित्यिक पहचान मिलती है ।

                                         


आरंग छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक शहर है जो प्रदेश की राजधानी रायपुर से लगभग 35 किलोमीटर पर राष्ट्रीय राजमार्ग 53के किनारे बसा हुआ है  । स्थानीय साहित्यकारों और साहित्यिक अभिरुचि के नागरिकों ने मिलकर यहाँ हिंदी साहित्य परिषद का गठन किया था, जिसके संयोजक थे सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. विनय कुमार पाठक, जो उन दिनों आरंग महाविद्यालय में हिन्दी के सहायक प्राध्यापक हुआ करते थे और छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के तीसरे अध्यक्ष भी रहे  । अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल 2016 से 2018 तक रहा. डॉ. पाठक इन दिनों अपने गृहनगर बिलासपुर में साहित्य सृजन के साथ -साथ वहाँ के साहित्यिक आयोजनों में  काफी व्यस्त रहते हैं।वे  थावे विद्यापीठ (बिहार) के कुलपति भी हैं  ।   आरंग में सहायक प्राध्यापक के रूप में अपने कार्यकाल में उन्होंने बेहतरीन साहित्यिक वातावरण बनाने का सराहनीय प्रयास किया था, जिसके फलस्वरूप 'आरंग के कवि 'का प्रकाशन  संभव हो पाया । इसका सम्पादन भी उन्होंने किया था।

 इस संकलन में हिंदी के 13 और छत्तीसगढ़ी के 9 कवि शामिल हैं। यह साझा कविता संग्रह कवर पेज सहित 32पेज का है, उन दिनों इसकी कीमत सिर्फ़ एक रूपए रखी गई थी ।  हैण्ड कम्पोजिंग से इसकी छपाई  नंदिनी मार्ग, भिलाई नगर स्थित श्री छत्तीसगढ़ प्रेस में हुई थी । बाइंडिंग स्टेपलर से की गई थी  । कविता -संग्रह 'आरंग के कवि 'का प्रकाशन पचरी घाट, जूना, बिलासपुर स्थित प्रयास प्रकाशन द्वारा किया गया था. यह प्रयास प्रकाशन की तैंतीसवीं भेंट थी  । 

    संग्रह के प्रारंभ में 'आरंग और आरंग के कवि 'शीर्षक अपनी चार पेज की भूमिका में प्रयास प्रकाशन के संचालक डॉ.विनय कुमार पाठक ने इस कस्बे की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठ भूमि पर प्रकाश डाला है । इसके साथ ही उन्होंने यहाँ के यादगार साहित्यिक आयोजनों की भी चर्चा की है । उन्होंने यह भूमिका उन्होंने 11जून 1977 को छत्तीसगढ़ी समारोह दिवस के अवसर पर लिखी थी । डॉ. पाठक भूमिका की शुरुआत करते हुए लिखते हैं -

  "मोरध्वज की दानशीलता के लिए विश्व विख्यात, जैनियों के श्रद्धा का केन्द्र स्थल, कलचुरि युग के सांस्कृतिक -कलात्मक विकास का प्रतीक आरंग  युग के विविध आरोह -अवरोह को अभिव्यक्त करता है, जहाँ शैव, वैष्णव, जैन, बौद्ध और आंचलिक देवी -देवताओं के सामान्य और विशिष्ट रूप अवस्थित हैं । कहीं सत्यनाम की गूंज है तो कहीं कबीर पंथ के चौका का स्वर  । स्वधर्मों में संलग्न यहाँ के वासी और इतर धर्मावलम्बी धर्म -निरपेक्षता और सह -अस्तित्व का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं ।  आरंग छत्तीसगढ़ का संक्षिप्त संस्करण कहा जा सकता है. छत्तीसगढ़ का सही स्वरूप आरंग में केंद्रीभूत है  । " 

डॉ. पाठक आगे लिखते हैं -"खंडहर अतीत की उज्ज्वल गाथा को उदाभाषित करता है.ऐतिहासिक -सांस्कृतिक दृष्टि से आरंग की समृद्धि अभिलेखों और उपलब्ध पुरातत्व सामग्रियों में संरक्षित है । जिस नगरी की सांस्कृतिक -ऐतिहासिक समृद्धि विश्रुत -विख्यात हो, वहाँ की साहित्यिक -थाती निःसंदेह सामर्थ्यवान होगी  । ऐसा आभास होता है कि यहाँ की साहित्यिक -साधना स्वान्तः सुखाय में संलग्न रही ।  उचित पर्यावरण के अभाव में यहाँ की प्रतिभाएँ काल -कवलित हो गईं । नौकरी पेशे से आयातित साहित्यिकों ने यहाँ के साहित्यिकों के साथ संशलिष्ट -समन्वित होकर हिंदी साहित्य समिति की स्थापना की, जिसमें सर्वश्री बाबूलाल चौबे, नत्थूलाल दुबे, चिन्ता प्रसाद द्विवेदी, रामनारायण शुक्ला, रामानुज दास वैष्णव, लखन लाल गुप्ता (वस्त्र विक्रेता )आदि का योगदान उल्लेखनीय रहा  । 

     भूमिका में डॉ. पाठक ने लिखा है कि तीन दिसम्बर 1973 को आरंग में हिन्दी साहित्य परिषद की स्थापना हुई, जिसका विधिवत उदघाटन डॉ. पालेश्वर शर्मा ने किया तथा अध्यक्षता ठाकुर हृदय सिंह चौहान ने की  ।  परिषद के तत्वाधान में 26जनवरी 1974 को कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ, जिसमें 'अकादसी 'का विमोचन भी हुआ.उन्होंने चर्चा के दौरान बताया कि 'अकादसी ' उनकी छत्तीसगढ़ी कविताओं का संग्रह था । डॉ. पाठक भूमिका में आगे लिखते हैं -कवि सम्मेलन में सर्वश्री रविशंकर शुक्ल, पन्नालाल सराठे 'रत्नेश ', रामेश्वर वैष्णव आदि कवियों के साथ स्थानीय प्रतिभाएँ भी मंचित हुईं । प्रथम अधिवेशन में सर्वश्री पवन दीवान, विमल पाठक, लक्ष्मण मस्तूरिया, विश्वनाथ योगी, डॉ. प्रेम त्रिपाठी, मनोहर शर्मा, ईश्वर शर्मा, माखन लाल तम्बोली आदि कवियों की उपस्थिति ने जन मानस पर प्रभाव डाला । द्वितीय अधिवेशन में नवरंग कला केन्द्र, भिलाई नगर के टेलीविजन और आकाशवाणी के ख्याति प्राप्त छत्तीसगढ़ी लोक -कलाकारों का सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ । इसी कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ी साहित्य के युग -प्रवर्तक पंडित द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्र 'का अभिनंदन किया गया । प्रथम और द्वितीय अधिवेशन के साथ छत्तीसगढ़ी समारोह दिवस का तृतीय -चतुर्थ आयोजन समन्वित था ।  तृतीय अधिवेशन में प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी नाटक 'माटी जागिस रे ' का मंचन स्थानीय फ्रेंड्स क्लब के साथ सहयोगार्थ हुआ ।  इस भव्य मंच पर श्री विमल कुमार पाठक का सम्मान परिषद की ओर से किया गया । इसके पूर्व डॉ. शत्रुघ्न पाण्डेय के मुख्य आतिथ्य में हिंदी दिवस मनाया गया  । डॉ. विनय कुमार पाठक ने भूमिका में 'आरंग के कवि ' को आरंग नगरी के प्रकाशित -अप्रकाशित, साधक -आराधक, परिष्कृत -अपरिष्कृत, प्राचीन -अर्वाचीन, समग्र कवियों का संचयन बताया है  । उन्होंने 'आरंग के कवि ' को एक ऐसा पुष्प -स्तवक भी बताया है, जिसमें उनके शब्दों में  "विविध रंगी पुष्प रुपी कवि गण समन्वित -संगुफित हैं और जो आरंग की वर्तमान साहित्यिक चेतना को मुखरित करने का विनम्र प्रयास कर रहा है ।  "

        उल्लेखनीय है कि 22 कविताओं के इस छोटे -से लेकिन महत्वपूर्ण साझा संकलन के हिन्दी कवियों में सर्वश्री चिन्ता प्रसाद द्विवेदी, बाबूलाल चौबे, रामानुज दास वैष्णव, भगत सिंह सोनी, निर्मल कुमार रिछारिया, रामदेव सिंह , अनूपनाथ योगी,गोवर्धन लाल अग्रवाल, राममोहन अग्रवाल,प्रहलाद कुमार मराठा, चुन्नीलाल चंद्रवंशी , रूद्रनाथ चंद्राकर और मनोहर लाल साहू की रचनाएँ शामिल हैं,  वहीं  डॉ. विनय कुमार पाठक, वीरेन्द्र कुमार नामदेव, कृष्णमोहन अग्रवाल, सत्येन्द्र कुमार यदु, अरुण कुमार दुबे, लखन लाल अग्रवाल, दीनदयाल साहू,लखन लाल गुप्ता और श्रीमती रजनी पाठक की छत्तीसगढ़ी कविताएँ भी प्रकाशित की गई हैं । दोनों ही भाषाओं की लगभग सभी कविताओं में  जन भावनाओं को अभिव्यक्ति देने का सार्थक प्रयास किया गया है, जिनमें सामाजिक विसंगतियों के साथ -साथ समाज का दुःख -दर्द भी प्रकट होता है  । 

   हिन्दी खण्ड में पहली कविता चिन्ता प्रसाद द्विवेदी की है, उनके गीत 'अधूरा जीवन 'के इस छंद को देखिए -

     *सुनाऊँ किसे आपबीती कि मैंने 

     युगों से यातनाएँ सही हैं,

     किसी की खुशी के लिए ही हमेशा,

     हमारी जवानी अधूरी रही है । * 

 आगामी कड़ियों में बाबूलाल चौबे ने 'दीप शिखा ', रामानुज दास वैष्णव ने  'विज्ञान का दानव ', भगत सिंह सोनी ने 'धनात्मक ज़िन्दगी ' शीर्षक  कविताओं में अपनी -अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी है.

भगत सिंह सोनी की कविता की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं -

  *सुना है कुछ लोग 

  धनात्मक ज़िन्दगी जीते हैं.

  मुझे नहीं मालूम,

 सिर्फ़ जानता हूँ -

 कुरिया से कब्रिस्तान तक  की 

 ऋणात्मक ज़िन्दगी । *

      प्रहलाद कुमार मराठा की कविता 'नेता नहीं, काम चाहिए ' और चुन्नीलाल चंद्रवंशी की कविता 'चमचावाद 'में राजनीतिक परिस्थितियों पर व्यंग्य प्रहार है  । 


छत्तीसगढ़ी खण्ड में डॉ. विनय कुमार पाठक का गीत 'हमर मया के सुरूज मरगे '  की भावनाएँ बहुत मर्मस्पर्शी हैं -

   *हमर मया के सुरूज मरगे, एमा मोला नइये अचरज,

   अचरज हे तो एक गोठ म, आँसू के तप विरथा होगे  । 

   हमर मया बासी कस गुरतुर,दया -पेज म बूड़े रहै,

   अंगाकर रोटी कस मन तेमा, मिरचा अंतस म गुड़े रहै  । 

   भगवाने के कान फूटगे, एमा मोला नइये अचरज,

   अचरज हे तो एक गोठ म तुलसा के जप विरथा होगे । *

संकलन में वीरेन्द्र कुमार नामदेव ने अपने छत्तीसगढ़ी गीत  'लहू औटाके जिनगी जीथस ' में देश के किसानों को सम्बोधित करते हुए उनकी मेहनत को शब्दों के भावनात्मक साँचे में ढाला है ।  इन पंक्तियों में उनकी अभिव्यक्ति देखिए -

     *जाग जा नगरिहा, उठ जा रे किसान 

     सुरूज अपन अंगठी ले खरोचत हे कान.

     गियान के कुकरा बासत हे,सुन ले देके कान.

     बइला, नाँगर तोर संगवारी 

    वोकरे संग करथस तंय गोठ,

     लहू औटाके जिनगी जीथस,

     मन ल चिटको नइ करस मोठ  । 

     तोर किसानिन कस हरियर लुगरा 

     पहिरे मटमटावय धान । *

संग्रह  में कृष्ण मोहन अग्रवाल का गीत 'हिरदे के सोन चिरइया' और  सत्येन्द्र कुमार यदु का गीत 'हमर नानकुन सुघ्घर गाँव ' भी बहुत प्रभावशाली है,  वहीं ' घुना घुना कस देस 'शीर्षक अरुण कुमार दुबे के छत्तीसगढ़ी गीत में देश की हालत पर मार्मिक व्यंग्य है. लखन लाल अग्रवाल अपनी रचना 'ये धान के कटोरा मोर ' में छत्तीसगढ़ के गाँवों, किसानों और मज़दूरों की पीड़ा को वाणी देते हैं-

  *ये धान के कटोरा मोर, कइसे कंगला बनगे,

  जगह -जगह भिखमंगा बाढ़ीन,

  चरौटा भाजी तक नहीं बाचिस,

खाली होगे गाँव दिन -दिन, रोजी के तलाश में ।  *


हालांकि कवि इस गंभीर संकट से मुक्ति के लिए ग्रामीणों से कहते हैं -

  * तरिया बांध के, नरवा बांध के, सिंचाई ला बढ़ाऔ,

   कुआँ खोदावो, पम्प लगाओ, नहर बढ़ाय के साधन जुटाओ  । 

   अपन बस के जम्मो ताकत, तरक्की बर लगावो  । *

अगले क्रम में कवि लखनलाल गुप्ता छत्तीसगढ़ के लोगों का स्वाभिमान जगाने की कोशिश करते हैं. उनकी इस कविता का शीर्षक है - माथा के करम ला नहीं, हाथ के करम ला देख '. इस रचना की प्रारंभिक पंक्तियों में कवि की भावनाओं को महसूस कीजिए -

 *हमन आन छत्तीसगढ़िया औ रहेन 

 छत्तीसगढ़िया रे छत्तीसगढ़िया,

दुनिया ह जावथे चाँद के ऊपर,

फेर हमन रेहेन मुड़गड़िया रे मुड़गड़िया  । 

छत्तीसगढ़िया छत्तीसगढ़िया ला काटथे,

त दूसर मन काबर हमर दुःख ल हरही,

हमरे हमर ल नइ देखे सकन,

तौ दूसर मन काबर हमर परवाह करहीं । *


कुल मिलाकर  'आरंग के कवि ' हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कविताओं का एक छोटा लेकिन बहुत महत्वपूर्ण संकलन है. इसके प्रकाशन के पाँच दशक अगले साल जून 2027 में पूरे हो जाएंगे  । बहुत संभव है कि छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बिरादरी की  नई पीढ़ी को आज शायद याद भी नहीं होगा कि हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कवियों का ऐसा कोई संयुक्त संकलन 49 साल पहले प्रकाशित हुआ था । साझा कविता संग्रहों के प्रकाशन के इस प्रकार के रचनात्मक प्रयास पहले बहुत हुआ करते थे, एक परम्परा -सी चल पड़ी थी,क्या इसे आज भी रखने की ज़रूरत नहीं है?

 -स्वराज्य करुण