Wednesday, February 18, 2026

(आलेख ) महाकवि कालिदास के 'मेघदूत' से छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी का रिश्ता /लेखक -स्वराज्य करुण

 महाकवि कालिदास के 'मेघदूत' से 

  छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी का रिश्ता 

      (लेखक -स्वराज्य करुण )

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महाकवि कालिदास की कालजयी कृति 'मेघदूतम ' का उल्लेख किए बिना प्राचीन भारतीय साहित्य अपूर्ण ही माना जाएगा. कई विद्वान छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में उदयपुर के पास खड़े रामगढ़ (रामगिरि) पर्वत को 'मेघदूत ' की रचना -स्थली मानते हैं.इसे लेकर विद्वानों में मत -भिन्नता है, लेकिन अगर कुछ विद्वान इस रामगिरि को ही 'मेघदूत ' की रचना स्थली मानते हैं तो इससे पता चलता है कि महाकवि कालिदास और उनकी इस लोकप्रिय कृति से छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक और भावनात्मक सम्बन्ध प्रारम्भ से ही जुड़ा हुआ है. आधुनिक युग  में प्रदेश के तपस्वी साहित्यकार पद्मश्री पंडित मुकुटधर पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ी भाषा से भी इसका रिश्ता जोड़ दिया .  उन्होंने  'मेघदूत 'का पहला छत्तीसगढ़ी अनुवाद किया था. लेकिन प्रकाशित अनुवाद के प्राक्कथन में पाण्डेय जी ने विनम्रता पूर्वक लिखा है -

"आंचलिक बोलियों में कदाचित छत्तीसगढ़ी में यह सर्वप्रथम अनुवाद है. यह न तो अविकल अनुवाद है और न भावानुवाद, दोनों के मध्य की वस्तु है. कहीं कुछ शब्द या वाक्यांश छूट गये हैं तो कहीं नये जुड़ गये हैं. छूटे हुए अंश कुछ ऐसे नहीं कि उनके बिना मूल भाव में कुछ अधिक अंतर पड़ता हो.प्रस्तुत अनुवाद में मूल का शतांश आनन्द भी पाठकों को प्राप्त हो जाए तो मैं अपना परिश्रम सफल समझूंगा."

             



छत्तीसगढ़ लेखक संघ रायगढ़ ने 'मेघदूत'का छत्तीसगढ़ी अनुवाद वर्ष 1984 में प्रकाशित किया था. यह अनुवाद पाण्डेय जी के प्राक्कथन सहित 55 पृष्ठों में है. कथानक के प्रथम खण्ड में 63 छन्द और द्वितीय खण्ड उत्तर मेघ में 52 छन्द हैं. 

          

        छोटा -सा गीति -काव्य है 'मेघदूत'

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   अनुवादक स्वर्गीय पंडित मुकुटधर पाण्डेय अपने प्राक्कथन में काव्य -कला की दृष्टि से 'मेघदूत ' को कालिदास की एक अनूठी कृति और  एक छोटा -सा गीति -काव्य मानते हैं. उनकी कलम से इसका यह छत्तीसगढ़ी अनुवाद  अत्यंत सम्मोहक बनपड़ा हैं. प्रथम खण्ड (पूर्व मेघ ) के इन अंशों को देखिए -

                     (1)

    यक्ष एक हर अपन काम म गलती कछु कर डारिस 

     तब कुबेर हर शाप छोड़ (अलका ले ओला निकारिस) 

    "बच्छर दिन नारी ले ओला विलग रहे बर परही

     (मोर नगर ला छोड़ कहूँ दुरिहा म बासा करही)

      बूडिस महिमा, यक्ष रामगिरि म जा छाइस छानी,

     जिहाँ जानकी के असनाँधे भरे कुण्ड म पानी.

                       (2)

    ओ पहाड़ म कै महिना कटगे बिछोह दुःख भारी 

    सोनहा चूरा तरी खसकगे, बिसरे कभू न नारी.

   परथम दिन असाढ़ के देखिस (बड़ीहन)बादर छाए,

    परबत छत ला खीसा मारत हाँथी कस बौराए.


                   (3) 

जे बादर ला देख काम -कौतुक हर मन  में जागे 

ओकर आगू केसनो करके ठाढ़े रस म पागे.

बहुत बेर ले सोंचत रहिगे (मगन भाव म होके ),

यक्ष राज के अनुचर हर आँखी म आँसू रोके.

मेघ देख के सुखिया के मन घलो बदल जब जाथे, 

 विरही मन के का कहना, दुरिहा म जी अकुलाथे.

          (4)

सावन लकठाइस, बिरहिन हर जेमाँ प्रान बचाए 

बादर हाथ संदेसा भेजे के विचार ठहराए.

फूल कोरिया अंजुरा म लेके अरघ बनाए,

कुशल -क्षेम पूछ के यक्ष हर स्वागत ओकर गाए.

         (5)

बादर बन थे धूँका, धूआँ, मिल के आगी -पानी 

कहाँ संदेसा ले जा सकथे जीयत-जागत प्रानी.

व्याकुल जी म यक्ष नि बूझिस, बादर दूत बनाइस,

कामी हर जड़ -चेतन मा भेद कहाँ कर पाइस?

             (6) 

जग -जाहिर पुष्कर आवर्तक, कुल म तैं जनमे, 

इन्दर राजा के मंत्री अस, (दया बहुत तोर मन में ).

अइसे जान गोहारौँ तोला, बिपद परे है भारी,

दूर देश म परे आज हौँ, छोड़ पियारी नारी.

जो माँगै तो गुनवन्ता ला माँगै, भले नि पावै,

फेर अधम ला कभू न, पूरन माँग भले हो जावै.

         (7)

मैं बिरहा के सरन लगे है हिरदे म मोर आगी,

धनपति के रिस कारन बिछुरे हौँ, मैं बड़े अभागी.

पहुँचा दे सन्देस पियारी ला अलका म जाके,

(जेहर राजधानी कुबेर के ) नगर यक्ष राजा के.

पुर बाहिर है बाग -बगइचा, लगे बहुत फुलवारी,

चन्द्रचूड़ के चन्द्र किरन म धोए महल -अटारी.


अनुवाद के प्राक्कथन में पंडित मुकुटधर पाण्डेय लिखते हैं -

*संसार की अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है. हिन्दी में तो इसके कई अनुवाद हुए हैं. ब्रज भाषा में राजा लक्ष्मण सिंह और राय देवी प्रसाद 'पूर्ण 'के अनुवाद प्रसिद्ध हैं.

   *मैंने अनुवाद में मल्लीनाथ की टीका से सहायता ली है. पाठ भी उन्हीं का रखा है सिर्फ़ एक जगह 'क्षण मुख पट ' का अर्थ मल्लीनाथ से भिन्न मिलेगा.

* अनुवाद की भाषा छत्तीसगढ़ी का वह रूप है, जो रायगढ़, सारंगढ़ और चन्द्रपुर अंचल में प्रयुक्त होता है. कहीं कारक प्रत्ययों के रूप में आधुनिकीकरण भी दृष्टिगत होगा.उदाहरण के लिए तृतीय करण कारक के चिन्ह 'से' को ले लीजिए. छत्तीसगढ़ी में 'से' की जगह कहीं 'में ', कहीं 'मँ' या 'माँ' तो कहीं 'ले' का प्रयोग होता है. इसमें एकाध जगह 'से' भी मिलेगा, जैसा कि आजकल पढ़े -लिखे लोग बोलते हैं. 

 *रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग की छत्तीसगढ़ी से इसमें अन्तर स्वाभाविक है, क्योंकि कहा जाता है कि चार -चार कोस के अन्तर में बोली में कुछ न कुछ फ़र्क आ जाता है.

* अनुवाद की भाषा क्रिया -पदों को छोड़कर कहीं -कहीं संस्कृत -शब्द -बहुल हो गई है. बिना संस्कृत शब्दों की सहायता लिए जब हिन्दी में ही अनुवाद नहीं हो सकता तब छत्तीसगढ़ी में होना तो और भी कठिन है. दूसरी बात गद्यनुवाद की अपेक्षा पद्यानुवाद में एक और कठिनाई छन्द और तुकों की सामने आती है. 

 पाण्डेय जी कहते हैं -"अनुवाद की भाषा क्रिया -पदों को छोड़कर कहीं -कहीं संस्कृत -शब्द -बहुल हो गई है. बिना संस्कृत शब्दों की सहायता लिए जब हिन्दी में ही अनुवाद नहीं हो सकता तब छत्तीसगढ़ी में होना तो और भी कठिन है. दूसरी बात गद्यनुवाद की अपेक्षा पद्यानुवाद में एक और कठिनाई छन्द और तुकों की सामने आती है." 

   उल्लेखनीय है कि साहित्य ऋषि पंडित मुकुटधर पाण्डेय हिन्दी कविता में छायावादी भावधारा के प्रवर्तक माने जाते हैं. वर्ष 1920 में जबलपुर की पत्रिका 'श्रीशारदा'  में छायावाद पर उनके 4निबंध धारावाहिक प्रकाशित हुए थे.हिन्दी साहित्य के इतिहास में उन्हें द्विवेदी युग का महत्वपूर्ण कवि माना जाता है.

 भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1976 में पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया था.पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर से उन्हें डी. लिट. की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया था.

उनकी पहली कविता 14साल की उम्र में आगरा की पत्रिका स्वदेश बांधव में छपी, पहला कविता -संग्रह 'पूजा के फूल ' वर्ष 1919 में, एक निबंध संग्रह 'छायावाद और अन्य निबंध 1983 में और मेघदूत का छत्तीसगढ़ी अनुवाद 1984 में प्रकाशित हुआ.

पंडित मुकुटधर पाण्डेय का जन्म 30 सितम्बर 1895 को महानदी के किनारे ग्राम -बालपुर (तत्कालीन जिला बिलासपुर, वर्तमान जिला जांजगीर चाम्पा)में हुआ था.  उनका निधन अपने गृह नगर रायगढ़ में 6 नवम्बर 1989 को हुआ. वे वर्ष 1919 से 1929 तक अध्यापक रहे. वर्ष 1931 से 1937 तक उन्होंने नटवर हाई स्कूल रायगढ़ में अध्यापन किया.वर्ष 1937 से 1940 रायगढ़ रियासत के मजिस्ट्रेट, द्वितीय श्रेणी दंडाधिकारी रहे. 

                

मेघदूत के छत्तीसगढ़ी अनुवाद पर

 पंडित मुकुटधर पाण्डेय के विचार -

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उन्होंने प्राक्कथन में जो लिखा, उनमें से कुछ बिंदुवार इस प्रकार है -

*मेघदूत के कवि कालिदास का परिचय देना सूर्य को दीपक दिखाना है. कालिदास 473 ईस्वी के पहले हुए हैं.(मंदसौर में प्राप्त वत्सभट्टी लिखित एक शिलालेख )

* कालिदास के लिखे निम्न लिखित ग्रंथ कहे जाते हैं -

(1)ऋतु संहार (2) विक्रमोंर्वशीयम (3) मालविका अग्नि मित्रम 

(4) अभिज्ञान शाकुंतलम (5) कुमार संभव (6)रघुवंशम (7) मेघदूतम (8)श्रृंगारतिलकम (9)श्रुतबोध (10)नलोदय (11) राक्षस काव्यम.इनमें से प्रथम सात सुप्रसिद्ध हैं.'ऋतु संहार ' उनकी प्रारम्भिक रचना कही जाती है. शेष ग्रंथों के कालिदास -रचित होने में विद्वानों को संदेह है.

 *कालिदास के काव्यों की काव्य -मर्मग्यों ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की है.भारतीय ही नहीं, विदेशी विद्वान भी उनके काव्य के सौन्दर्य पर मुग्ध हैं. वास्तव में जर्मन कवि गेटे के कथनानुसार यदि कोई स्वर्ग लोक और मर्त्य लोक के एश्वर्य को एकत्र देखना चाहता हो तो उसे कालिदास का 'अभिज्ञान शाकुंतलम 'देखना चाहिए.

* कालिदास ने अपने काव्य में बाह्य प्रकृति और अंतः प्रकृति, दोनों का चित्रण किया है. उनके काव्य में जड़ प्रकृति चेतन का सा व्यवहार करती है वह मनुष्य के प्रत्येक सुःख -दुःख में भाग लेती है. निर्वासिता सीता का रुदन सुनकर मयूर नृत्य करना छोड़ देते हैं. वृक्ष फूलों का परित्याग कर देते हैं  और हरिण अपने मुख में लिए तृण कंवल को गिरा देते हैं.रामगिरि केवल प्रस्तर-खण्डों का ढेर नहीं है, वह एक मित्र का ह्रदय रखता है. एक वर्ष की दीर्घ अवधि के बाद मेघ से मिलने पर उसके नेत्र उश्न वाष्प से सजल हो उठते हैं..

 *कालिदास के काव्य में देशकाल का कोई व्यवधान नहीं है. दो हजार वर्ष बीत जाने पर भी उनकी कविता पुरानी नहीं हुई है. उसमें वैसी ही ताजगी है. कालिदास सार्वकालिक एवं सार्वभौम कवि हैं.

  *मेघदूत काव्य कला की दृष्टि से कालिदास की एक अनूठी कृति है. यह एक छोटा -सा गीति -काव्य है, पर इसके संबंध में पंडितों में यह उक्ति प्रसिद्ध है -"मेघे माघे गतं वयः " कहा जाता है कि संसार की किसी भी भाषा के साहित्य में इसके समान सुन्दर काव्य नहीं है. जैसा कि पहिले ही कहा जा चुका है, देशी -विदेशी सभी विद्वान इसके सौन्दर्य पर मुग्ध हैं 

*मेघदूत के पहिले वाल्मीकि रामायण को छोड़कर कदाचित कहीं दूत प्रेषण की परम्परा नहीं पाई जाती.रामायण में भगवान राम का सन्देश लेकर हनुमान सीता जी के पास लंका गए थे. कालिदास के ध्यान में यह बात अवश्य रही होगी. उत्तरमेघ में उन्होंने इसका उल्लेख भी किया है.

 *मेघदूत के बाद फिर हंसदूत, पवनदूत आदि कई काव्यों की रचना हुई.भारत में ही नहीं, विदेश में भी उसके अनुकरण में काव्य -रचना की गई. शीलर (Schillar)ने 'Maria Stuart' लिखा, जिसमें स्काट लैंड की बंदिनी रानी मेघोँ को देखकर उनसे अपने देश होकर जाने के लिए निवेदन करती हैं.

   * यक्ष ने मेघ के द्वारा जो सन्देश भेजा, वह शाश्वत सन्देश है. आज भी आषाढ़ के आरम्भ में नवीन मेघोँ को आकाश में मंडराते देखकर विरहिणी स्त्रियाँ अपने प्रियतमों से मिलने को आतुर हो उठती हैं. मेघ अपनी मधुर मन्द्रध्वनि से उन्हें ढाढ़स बँधाता और उनके प्रियतमों के शीघ्र प्रत्यागमन की सूचना देता है.

   *जहाँ तक कथानक का सम्बन्ध है, कालिदास की अन्यान्य कृतियों में पौराणिक या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पाई जाती है, पर 'मेघदूत 'का ऐसा कोई आधार नहीं पाया जाता. यह एकमात्र उनकी कल्पना की उपज है. यक्ष ने अपने काम में गलती की तो यक्षराज कुबेर ने उसे शाप दिया कि वह एक वर्ष तक अपनी पत्नी से अलग रहे. कहा जाता है कि कर्तव्य में प्रमाद का कारण उसका पत्नी -प्रेम था. इसलिए उसे वर्ष भर पत्नी -वियोग सहने का दण्ड दिया गया था.

*अलका (अलकापुरी ) छोड़ उसने रामगिरि में आश्रय लिया. वहाँ आठ माह किसी प्रकार काटने के बाद एक दिन आषाढ़ के आरम्भ में उसने पर्वत -शिखर पर बादलों को छाए हुए देखा. उसे अपनी पत्नी की याद आ गई. उसे विश्वास था कि मेरे विरह में मेरी पत्नी की भी यही दशा होगी. उसने सोचा, आषाढ़ के बाद श्रावण का महीना लग जाएगा, वर्षा -ऋतु में वियोग -व्यथा बढ़ जाती है, कहीं ऐसा न हो कि मेरे वियोग में मेरी पत्नी प्राण ही त्याग दे. इस आशंका से उसने मेघ को दूत वरण कर पत्नी को सन्देश भेजा कि मैं जीवित हूँ, तुम धैर्य धारण कर चार महीना किसी प्रकार और काटो, देवोत्थान के बाद फिर हम दोनों का मधुर मिलन होगा. 

    *यक्ष की प्रेमिका उसकी विवाहिता धर्म -पत्नी है, परकीया स्त्री नहीं. वह पतिव्रता है, विरह -काल में एक वेणी, मलिन -वसना और भूमि -शयना होकर काल -यापन करती है. उसी प्रकार यक्ष भी एक पत्नी व्रती था.

* मेघदूत यद्यपि एक प्रेम -काव्य है, तथापि उसमें कवि की धर्म -परायणता पद -पद पर परिलक्षित होती है.

*मेघदूत में कालिदास का प्रकृति -चित्रण दर्शनीय है. पूर्व मेघ को तो आप विन्ध्य से लेकर हिमालय तक सारे उत्तर भारत की प्राकृतिक -सुषमा का दर्पण ही समझिये. पर्वत -शिखर का आलिंगन करने वाले मेघ से लेकर गाँव के पेड़ पर नीड़ निर्माण करने वाले कौआ तक उनके प्रकृति -वर्णन के दायरे में आते हैं 

     कहाँ था कालिदास के मेघदूत का रामगिरि  पर्वत?

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पंडित मुकुटधर पाण्डेय ने प्राक्कथन में रामगिरि की अवस्थिति को लेकर भी अपने अभिमत दिए हैं.  उनके अभिमत बिंदुवार कुछ इस प्रकार हैं -

 *रामगिरि की अवस्थिति के सम्बन्ध में मतभेद पाया जाता है. कोई चित्रकूट तो कोई रामटेक (नागपुर ) तो कोई रामगिरि (सरगुजा )को 'मेघदूत' का रामगिरि मानता है. हाल ही में जिला बस्तर से लगे हुए कोरापुट जिले में भी एक रामगिरि होने की बातसुनी गई है .

*सभी तर्क -वितर्क द्वारा अपने -अपने पक्ष का समर्थन करते हैं. मैं इस सम्बन्ध में स्वयं कुछ न कहकर 'मेघदूत 'में कथित रामगिरि की स्थिति तथा मेघ के मार्ग से पाठकों को परिचित करा दे रहा हूँ, ताकि वे स्वयं इस पर विचार कर सकें.

* 'मेघदूत' में रामगिरि की पहचान के सम्बन्ध में मुख्य तीन बातें पाई जाती हैं -(पाण्डेय जी ने संस्कृत श्लोक भी दिए हैं )

(1) वहाँ जल -कुण्ड या जलाशय या जल स्रोत होना चाहिए, जहाँ जानकी ने स्नान किया था.

(2)वहाँ किसी शिला या चट्टान पर राम के चरण -चिन्ह अंकित होने चाहिए.

(3) वहाँ बेत -वृक्षों की झाड़ी होनी चाहिए 

   *रामगिरि के उत्तराभिमुख से यात्रा आरम्भ होती है.

सर्वप्रथम 'मालक्षेत्र 'पड़ता है.'मालक्षेत्र ' को कृषि -प्रधान होना चाहिए. 'मालक्षेत्र' से फिर उत्तराभिमुख प्रस्थान करने पर पहिले आम्रकूट आता है. आम्रकूट के उपान्त भाग में जंगली आम के पेड़ों की बहुलता थी.

* मतभेद रामगिरि, मालक्षेत्र और आम्रकूट, इन तीनों स्थानों को लेकर ही है.

*आम्रकूट से आगे बढ़ने पर विन्ध्य के पाद -देश में बहती हुई रेवा (नर्मदा ) के दर्शन होते हैं 

*विंध्याचल में जंगली हाथियों और जामुन के वृक्षों की विपुलता रही होगी.

*उसके बाद दशार्ण देश आता है, जिसकी राजधानी 'विदिशा ' है. निकट ही वेत्रवती (बेतवा ) नदी बहती है.विदिशा से उत्तराभिमुख जाते हुए उज्जयिनी (उज्जैन ) जाने को मार्ग का कुछ घुमाव पड़ता है. मार्ग में निविंध्या नदी पड़ती है तब

अवंति देश आता है, जिसकी राजधानी उज्जयिनी है.

*उज्जयिनी में महाकाल के दर्शन होते हैं. 

* इसके बाद गंभीरा नदी मिलती है. फिर देवगिरि (देवगढ़ )आता है, जहाँ स्कंद का निवास है. फिर चर्मणवती (चम्बल ) नदी मिलती है. दशपुर आता है.

*ब्रम्हावर्त जनपद, फिर कुरुक्षेत्र आता है. सरस्वती नदी मिलती है.कनखल आता है, जहाँ गंगाजी हिमालय से नीचे उतरती हैं. इसके बाद हिमालय, फिर कैलाश के दर्शन होते हैं. कैलाश में ही अलकापुरी की अवस्थिति बतलाई गई है 

*ऐसा जान पड़ता है कि कालिदास ने जिन -जिन स्थानों का वर्णन किया है, वहाँ वे अवश्य गए रहे होंगे. जिस बारीकी से और जिस ख़ूबी के साथ उन्होंने उन स्थानों का वर्णन किया है, वह प्रत्यक्ष देखे बिना संभव नहीं था.

  छत्तीसगढ़ लेखक संघ, रायगढ़ ने पंडित मुकुटधर पाण्डेय की इस कृति को प्रकाशित करके सराहनीय कार्य किया था.वर्ष 1984 में इलाहबाद के एक प्रिंटिंग प्रेस से मुद्रित इस पुस्तक की सामान्य कीमत 10 रूपए और सजिल्द कीमत 15 रूपए थी.उन दिनों छत्तीसगढ़ लेखक संघ रायगढ़ के संरक्षक ठाकुर जीवन सिंह और प्रो. दिनेश पाण्डेय, अध्यक्ष डॉ. बिहारी लाल साहू, उपाध्यक्ष प्रो. मेदिनी नायक, सचिव डॉ. बलदेव, सह -सचिव शिखा नन्दे, कोषाध्यक्ष प्रो. धनीराम पटेल, सम्पर्क सचिव रामलाल निषाद और प्रबंध सचिव मीनकेतन प्रेमिल हुआ करते थे.  प्रकाशक के रूप में उन्होंने "आपकी वस्तु आपको ही समर्पित सादर "लिखकर पाण्डेय जी की यह कृति उन्हें ही समर्पित की है.

-स्वराज्य करुण 

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Friday, February 13, 2026

(आलेख ) सौ से ज़्यादा कवियों का यादगार संग्रह ; राजनांदगांव 77 / लेखक -स्वराज्य करुण

 सौ से ज़्यादा कवियों का यादगार संग्रह ; 'राजनांदगांव 77'

    (लेखक -स्वराज्य करुण )

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आज से कुछ दशक पहले कवियों में साझा कविता -संग्रह छपवाने का उत्साह हुआ करता था, अभिव्यक्ति की चाहत लिए रचनाकार परस्पर सहयोग से संयुक्त काव्य -संग्रह छपवा लिया करते थे. उनकी स्थानीय साहित्यिक संस्थाओं की भी इसमें सक्रिय भूमिका रहती थी. प्रकाशन के लिए स्थानीय नागरिकों और छोटे -बड़े दुकानदारों से आग्रह करने पर कुछ आर्थिक सहयोग भी मिल जाता था,लेकिन लगता है कि वह बात अब नहीं रह गई है. संयुक्त काव्य संग्रह छपवाने में कवियों की दिलचस्पी कम होती जा रही है.  इस घटती दिलचस्पी के  कई कारण हो सकते हैं. उन कारणों पर जाए बिना आज मैं छत्तीसगढ़ की साहित्यिक संस्कारधानी राजनांदगांव से लगभग 49 साल पहले प्रकाशित एक साझा कविता -संग्रह की चर्चा करना चाहूंगा, जो 'राजनांदगांव 77' के नाम से वर्ष 1977 -78 में प्रकाशित हुआ था.इसके प्रकाशक के रूप में किसी साहित्यिक संस्था का नाम नहीं है, बल्कि  'सम्पादक मंडल ' लिखा हुआ है.  छत्तीसगढ़ में उन दिनों कम्प्यूटर आधारित छपाई मशीनों का चलन व्यापक रूप से नहीं हुआ था. इसी वजह से सहयोगी कविता -संग्रह 'राजनांदगांव 77 ' की छपाई हैण्ड कम्पोजिंग से ट्रेडल मशीन पर वहाँ के ब्राम्हण पारा स्थित चेतना प्रिंटर्स द्वारा की गई थी.

इसमें तत्कालीन राजनांदगांव जिले के लगभग 130 कवियों की रचनाएँ शामिल हैं.यह जिला वर्ष 2022 में तीन जिलों में बँट गया है - (1) राजनांदगांव (2) मोहला -मानपुर -अम्बागढ़ चौकी और (3) खैरागढ़-छुईखदान -गंडई.हिन्दी साहित्य की दुनिया में सभी जानते हैं कि राजनांदगांव जिला देश के तीन दिग्गज साहित्यकारों -पदुम लाल पुन्नालाल बख्शी, डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र  और गजानन माधव मुक्तिबोध की कर्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध है. बख्शी जी और मिश्रजी का जन्म इसी जिले में हुआ था. मुक्तिबोध जी कुछ वर्षों तक राजनांदगांव के कॉलेज में प्राध्यापक रहे.साझा काव्य संग्रह 'राजनांदगांव 77' के सम्पादक थे सर्वश्री सरोज द्विवेदी, रमेश वर्मा 'सरस' और संजय यादव. सम्पादक मंडल में शामिल थे -सर्वश्री राजेश तिवारी, जीवन यदु 'राही ', गणेश शरण सोनी 'प्रतीक ', सुरेश अतीत, हरजीत एस. राजा, गनपत दुबे, रमाकांत शर्मा, मोहन अग्रहरि और कृष्ण कुमार नायक. 

                                                          


इसमें  इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के तत्कालीन उप कुलपति श्री अरुण कुमार सेन ने संकलन के सम्पादक मंडल के सदस्य श्री सरोज द्विवेदी को सम्बोधित शुभकामना संदेश में लिखा है -"आपका 25 -10 -77 का पत्र प्राप्त हुआ.यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि राजनांदगांव जिले के समस्त कवियों की कविताओं का एक संकलन प्रकाशित करने की योजना आप लोगों ने तैयार की है".डॉ. सेन के अलावा इसमें राजनांदगांव के तत्कालीन सांसद मदन तिवारी, मध्यप्रदेश की तत्कालीन जनता पार्टी सरकार के मंत्रियों पवन दीवान और दरबार सिंह, तत्कालीन राजनांदगांव कलेक्टर एम. के. सक्सेना, छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार, धमतरी निवासी नारायण लाल परमार,  राजनांदगांव के तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी जी. एल . जोशी और वाराणसी के मुकुन्दी लाल श्रीवास्तव के शुभकामना संदेश भी इसमें प्रकाशित हैं. 

   छत्तीसगढ़ के संत कवि पवन दीवान उन दिनों राजिम से विधायक निर्वाचित होकर मध्यप्रदेश सरकार के जेल मंत्री थे. उन्होंने शुभकामना संदेश में लिखा था -" राजनांदगांव 77का प्रकाशन एक सुखद कदम है. इस नगर को मैं साहित्य का एक इतिहास और इतिहास का साहित्य मानता हूँ.सर्वश्री बख्शी जी, मिश्रजी एवं मुक्तिबोध जी के त्रिकाल जयी संघर्ष को आप अपने संकलन में सार्थकता देंगे, यह निश्चित है . "

     नारायण लाल परमार ने अपने संदेश में लिखा -"राजनांदगांव 77 की योजना कुछ इस तरह भा गई है कि मैं चाहता हूँ कि सम्पूर्ण प्रदेश में ऐसे आत्म विश्वासी कदम उठें. राजनांदगांव तो छत्तीसगढ़ अंचल  की संस्कारधानी है. राजनांदगांव 77के माध्यम से जन सामान्य को साहित्य में तब से अब तक की सम्पूर्ण यात्रा का आस्वाद मिले, ऐसी कामना है."

   इस काव्य -संग्रह की भूमिका लिखी थी वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार शरद कोठारी ने, जो राजनांदगांव के साप्ताहिक और आगे चलकर दैनिक हुए 'सवेरा संकेत' के सम्पादक रह चुके थे . उन्होंने लिखा -"अक्सर मित्रों के प्रति अति प्रेम या उपेक्षित साहित्यकारों द्वारा संयुक्त रूप से आत्म ज्ञापन की भावना से काव्य -संग्रह प्रकाशित होते हैं, जिसमें रचना का स्तर सबसे पहला शिकार होता है. आलोच्य काव्य संग्रह में जिन तरुण कवियों को संकलित किया गया है, वे नई कविता की सृजनात्मक प्रतिभा सिद्ध होंगी, इसमें संदेह नहीं. " अपनी भूमिका में कोठारी जी ने आगे लिखा है -प्रस्तुत काव्य संग्रह के कतिपय कवियों को व्यक्तिगत रूप से जानने -पहिचानने का संयोग मुझे प्राप्त हुआ है. इनकी सृजनmशीलता से भी परिचित हूँ, तथा उनकी रचनाओं को यदकदा छापने का अवसर भी मिला है. इस संकलन में वे ज़रा भिन्न रूप में सामने आ रहे हैं. साहित्य जगत का एक कार्यकर्ता होने के नाते मैं उनका अभिनंदन करता हूँ. मैं इस समय संकलित रचनाओं के बारे में कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हूँ. एतदर्थ, यह संकलन एक ऐसी साहित्य -यात्रा के प्रथम सोपान के रूप में समझा जाए, जिस मार्ग पर छत्तीसगढ़ का साहित्यकार नये -नये प्रयोग कर रहा है. रचनाओं में अनगढ़पन   अथवा अभिव्यक्ति की  अपरिपक्वता भले ही हो, किन्तु भावी संभावनाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता. "

      सम्पादक मंडल की ओर से सम्पादकीय वक्तव्य में लिखने वाले का नाम तो स्पष्ट नहीं छपा है, लेकिन हस्ताक्षर सरोज द्विवेदी का प्रतीत होता है. उन्होंने लिखा था - राजनांदगांव का कलात्मक इतिहास बहुत गौरवशाली है. जिले में विभिन्न प्रकार की बहुत -सी प्रतिभाएँ अभी भी लुकी -छिपी हैं या उन्हें अवसर नहीं मिल पाया है.उभरने का अवसर मिलते ही वे यहाँ की गौरव गाथा में चार चाँद लगा देंगी.बहुत दिनों से इस बात की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी कि यहाँ की साहित्यिक प्रतिभाओं को कभी एक साथ किसी मंच पर लाया जाए. हम कह तो नहीं सकते कि इस पुस्तक ने इस आवश्यकता की पूर्ति की है, किन्तु इतना ज़रूर कह सकते हैं कि इस दिशा में यह एक ठोस प्रयास सिद्ध होगा. सम्पादकीय में राजनांदगांव 77के प्रकाशन में काफी विलम्ब होने के कारणों का उल्लेख करते हुए कहा गया है -"साहित्यिक प्रयासों में अर्थाभाव होता है. साथ ही रचनाकारों का स्वभाव (फक्कड़पन) इसे और जटिल बना देता है. इस पुस्तक के साथ भी यही समस्या अंत तक बनी रही और यही कारण है कि इसे नियत समय से काफी विलम्ब हो गया. तथापि बड़ों के आशीर्वाद और मित्रों के सतत सहयोग के साथ ही इस जिले की प्रबुद्ध जनता का भरपूर स्नेह मिला. हम सबके प्रति कृतज्ञ हैं. प्रयास की सफलता और असफलता का निर्णय तो पाठक गण ही करेंगे, किन्तु जिले की काव्यात्मक -प्रतिभाओं को एक साथ प्रस्तुत करने में हमें बहुत गर्व हुआ है. "

     संग्रह की प्रस्तावना राजनांदगांव के वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक 'छत्तीसगढ़ झलक ' के प्रधान सम्पादक चन्द्रकांत ठाकुर ने लिखी थी.यह पुस्तक छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कवि डॉ. नंदू लाल चोटिया जी को समर्पित की गई है, जो राजनांदगांव के निवासी थे और कवि सम्मेलनों के कुशल मंच संचालक के रूप में भी उनकी बड़ी ख्याति थी.

    संकलन में जिन कवियों की रचनाएँ प्रकाशित हैं उनमें डॉ. गणेश खरे, सरोज द्विवेदी, चन्द्रकांत ठाकुर,डॉ. मलय, राजेश तिवारी, गिरीश बख्शी, नारायण दास चोटिया, रमेश वर्मा 'सरस ', संजय यादव, जीवन यदु 'राही ', रमाकांत श्रीवास्तव, बालकृष्ण गुप्ता, ला. रा. तम्बोली, एस. डी. डडसेना, रसिक ठक्कर, राम कुमार वेणु, गणेश सोनी 'प्रतीक ', सुरेश अतीत, करीम बख्श गाजी, गोपाल देव, मोहन अग्रहरि, सेवाराम दुबे, महेन्द्र कुमार ठाकुर, प्रभा सरस, गनपत दुबे, जी. एल. जोशी, श्रीमती उषा जोशी, कृष्ण कुमार नायक, ए. सत्तार सरोज, शेखर, हेमंत कुमार वर्मा, चन्द्रभूषण झा, ए. एल  यदु, शत्रुघन सिंह राजपूत, अशोक कुमार अग्रवाल, दादूलाल जोशी,श्रीमती शकुंतला 'प्रतीक ', सुन्दर शर्मा, चन्द्र कुमार 'चन्द्र', कैलाश सोनी, कन्हैया लाल देवांगन, हफ़ीज खान,प्रभात बख्शी, अनिल पाली,गंगाधर चौधरी, ज्ञानेंद्र तिवारी, नलिन श्रीवास्तव, दिनेश 'बदनसीब', हीरालाल अग्रवाल, लोक बाबू,डोरेलाल श्रीवास्तव,शरण ठाकुर, गुण रमन शर्मा, रवि शुक्ल, बृजमोहन शाह, एच. बी.बागड़े, चंद्रशेखर सोनी, श्रीनिवास अग्रवाल, डी. पी. नागवंशी, हरेंद्र जोगेवार, पृथ्वीपाल सिंह भाटिया, मेवराम साहू,कमल नारायण साहू, ज्ञानचंद जैन, रामनारायण श्रीवास्तव, कामता प्रसाद त्रिपाठी 'पीयूष ', सुभाष वैष्णव, पाठक परदेशी, नरेश कुमार मेश्राम, विजय वादिया, गजाधर प्रसाद साहू, करुणा कल्पना, समयलाल तम्बोली,प्रभात कुमार तिवारी, रमाकांत शर्मा, डॉ. रतन जैन, अजय कुमार ठाकुर, तेज करण जैन, के. एन. महाजन, नीतेश कुमार, आसिफ कुरैशी, नारायण सिंह ठाकुर, प्रभुदास काचलवार,रूपेंद्र कुमार सिंह, तुलसीराम जायसवाल, मनहरण दुबे, सत्येन्द्र गुप्ता, दर्शन राय, एम. इलियास साजन, मन्नूलाल प्यासा,वि. ना. मजूमदार, बोधन सिंह चंदेल, नंदन नादान, माणिक लाल गोसाई, प्रमोद कुमार श्रीवास्तव, देवेंद्र आहूजा 'आँसू', के. गुलाब झाबक, सरोज भटनागर, जगदीश तिवारी, राजमोहन चौहान, अब्दुल सलाम कौसर, करुणा प्रसाद पाण्डेय, महेश मंजू जोशी, वीरेन्द्र कुमार शुक्ला, रामनरेश त्रिपाठी, हरजीत एस. राजा, 'जैड' अब्दुल, केवल सिंह, लक्ष्मण नन्दगईहां, कृष्णा यादव, चन्द्रकिशोर दास वैष्णव,गौतम कोठारी, गणेश प्रसाद गुप्ता, विजय कुमार नामदेव, गुलाब सिंह ठाकुर, रामनारायण नैय्यर, पलटनराम कोसरिया, पीसीलाल यादव,अरविन्द रायचा,  छन्नूलाल वर्मा, आर. एम. दुबे, शिव कुमार द्विवेदी और नीति भूषण भट्ट शामिल हैं.

छत्तीसगढ़ में सहयोगी कविता संग्रहों के प्रकाशन की परम्परा इस युग में  1950 के दशक में शुरु हुई थी, जब हरि ठाकुर और उनके साथी कवियों द्वारा  'नये स्वर' शीर्षक से सहयोगी संकलनों के प्रकाशन का सिलसिला प्रारंभ किया था.नये स्वर के तीन सहयोगी संकलन प्रकाशित हुए थे, जिनमें हरि ठाकुर, नारायण लाल परमार, गुरुदेव कश्यप, कुंज बिहारी चौबे आदि शामिल थे.वर्ष 1977 के आस - पास डॉ. विनय कुमार पाठक के सम्पादन में 'आरंग के कवि ' शीर्षक से एक संग्रह प्रकाशित हुआ था. इसमें आरंग कस्बे के कुछ कवियों की रचनाएँ छपी थीं.

   साझा कविता -संग्रहों के प्रकाशन का एक और अच्छा उदाहरण महासमुन्द जिले के पिथौरा में भी देखा जा सकता है,जहाँ श्रृंखला साहित्य मंच द्वारा वर्ष 1989 से 2018 के बीच आंचलिक कवियों के चार संकलन क्रमशः श्रृंखला -एक, श्रृंखला -2, श्रृंखला -3 और श्रृंखला -4 के नाम से प्रकाशित किए जा चुके हैं. मंच ने स्थानीय कवि शिवानंद महान्ति की क्षणिकाओं का संकलन 'संशय के बादल ' वर्ष 2028 में प्रकाशित किया था. वर्ष 2022 में सड़क हादसे में उनका निधन हो गया. मरणोपरांत उनकी क्षणिकाओं का एक संकलन वर्ष 2023में प्रकाशित हुआ. इसे भी श्रृंखला साहित्य मंच ने प्रकाशित किया था. इसी कड़ी में अंचल के ग्राम खुटेरी निवासी कवि स्वर्गीय मधु धांधी के छत्तीसगढ़ी गीतों का संकलन 'मोर सुरता के गाँव ' उनके निधन के लगभग 45वर्ष बाद वर्ष 2022 में प्रकाशित हुआ. इस संग्रह का प्रकाशन भी श्रृंखला साहित्य मंच द्वारा किया गया था.

   सहयोगी संकलन 'राजनांदगांव 77' की एक सौजन्य प्रति महासमुन्द जिले के पिथौरा निवासी कवि एस. डी. डडसेना (शशि डडसेना)को भेंट की गई थी, जो उन दिनों पंचायत निरीक्षक के पद पर राजनांदगांव जिले के अम्बागढ़ चौकी में पदस्थ थे. उनकी एक कविता भी इसमें शामिल है. उन्होंने यह संकलन पढ़ने के लिए मुझे दिया था. बहुत समय से सोच रहा था कि इस पर कुछ लिखा जाए. आज यह इच्छा पूरी हुई. 

-स्वराज्य करुण 

Wednesday, February 11, 2026

(विशेष बातचीत ) इशारों की भाषा है ग़ज़ल : पद्मश्री मदन चौहान /आलेख -स्वराज्य करुण


छह  दिन पुरानी तस्वीर के साथ  छह साल पुरानी बातचीत, जो आज भी प्रासंगिक है -

                             (स्वराज्य करुण )

छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय गायक, संगीतकार, हारमोनियम और तबला वादक श्री मदन चौहान  से इस बार 5 फरवरी 2026 की शाम उनके घर हुई मुलाक़ात में छह साल पहले उनसे लिया गया मेरा वह इंटरव्यू भी याद आ गया, जो उन्हें पद्मश्री सम्मान दिए जाने की घोषणा के बाद उनके इसी मकान में इसी जगह पर मैंने उनसे लिया था.इस विशेष बातचीत पर आधारित मेरा आलेख सांध्य दैनिक 'चैनल इंडिया' के 'साहित्य विशेष' में 10 फरवरी 2020 को प्रकाशित हुआ था -

 *ग़ज़ल इशारों की भाषा है। सूफ़ी नज़्मों और ग़ज़लों में भी इशारों -इशारों में रूहानी प्रेम के जरिए ईश्वर तक पहुँचने की बात होती है।  सूफ़ी एक स्वभाव का नाम  है । सूफ़ी रचनाओं का सार भी यही है कि ईश्वरीय प्रेम के लिए धरती पर इंसान और इंसान के बीच परस्पर प्रेम का रिश्ता हो । संगीत भी  मानव जीवन के लिए प्यार और शांति की भाषा है।  --यह कहना है छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध संगीत शिल्पी मदन सिंह चौहान का ,जिन्हें भारत सरकार ने इस वर्ष  2020 में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर  पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित करने की घोषणा की है। मार्च  के आख़िरी या अप्रैल के पहले हफ़्ते में नई दिल्ली में होने वाले जलसे में राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद 141 हस्तियों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित करेंगे । इनमें से 7 लोगों को पद्मविभूषण ,16 लोगों को पद्मभूषण और  श्री चौहान सहित   118 शख़्सियतों को  पद्मश्री अलंकरण से  नवाज़ने का ऐलान किया गया है।  उधर गणतंत्र दिवस के एक दिन पहले 25 जनवरी की शाम नई दिल्ली में यह ऐलान हुआ और इधर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के राजा तालाब मोहल्ले में श्री चौहान के घर पर उन्हें मुबारकबाद देने  उनके चाहने वालों का सैलाब उमड़ पड़ा।उन्हें बधाई देने कुछ दिनों बाद मैं भी  अपने कवि मित्र और श्रृंखला साहित्य मंच पिथौरा के अध्यक्ष प्रवीण प्रवाह के साथ  उनके घर पहुँचा। उन्होंने बड़ी आत्मीयता से हमारा स्वागत किया । मैंने उन्हें अपने काव्य संग्रह 'मेरे दिल की बात' की एक सौजन्य प्रति  भेंटकर उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट किया । अंतरंग बातचीत में श्री चौहान ने अपनी सुदीर्घ कला यात्रा के कई अनुभवों और स्मृतियों को हमारे साथ साझा किया ।

                                            


                                              पद्मश्री मदन चौहान से मेरी मुलाकात 5 फरवरी 2026 

    श्री मदन चौहान छत्तीसगढ़ के उन प्रतिभावान सितारों में से हैं ,जो अपने हुनर की रौशनी से देश और प्रदेश के  सांस्कृतिक आकाश को लगातार आलोकित कर रहे हैं । सहज ,सरल और सौम्य स्वभाव के श्री  चौहान  हिन्दी और  उर्दू  में गीत ,ग़ज़लों और भजनों के सुमधुर गायक के रूप में प्रसिद्ध हैं और सूफ़ी गायन में भी पूरे देश में उनकी ख्याति है। लेकिन 73 वर्षीय श्री चौहान ने  50 वर्षों से जारी अपनी संगीत साधना की शुरुआत छत्तीसगढ़ी लोक संगीत से की । उस दौर के मशहूर लोक गायक शेख हुसैन के साथ उन्होंने वर्षो तक  तबले पर संगत की। शेख हुसैन अक्सर अपने साथी सन्त मसीह दास के  लिखे गाने गाते थे। ये गाने छत्तीसगढ़ी लोक गीतों की एक लोकप्रिय विधा 'ददरिया ' के रूप में होते थे। वह रेडियो का ज़माना था और रायपुर में आकाशवाणी केन्द्र खुले दस साल से कुछ ज्यादा वक्त हो चुका था।  इस केन्द्र से छत्तीसगढ़ी लोक गीतों के फरमाइशी कार्यक्रमों में शेख हुसैन की मधुर आवाज़ में और मदन चौहान के तबला वादन के साथ प्रसारित संत मसीहदास के लोकगीतों ने पूरे छत्तीसगढ़ में तहलका  मचा दिया । इन गीतों की अपार लोकप्रियता की सबसे बड़ी वज़ह थी इनकी कर्णप्रियता और अपनी माटी  की सोंधी महक से भरपूर अपनी भाषा में लोक -जीवन की रंग -बिरंगी  अभिव्यक्ति । इनमें से 'चना के दार राजा ' 'गुल -गुल भजिया खा ले ' और 'मन के मनमोहनी " जैसे कई सदाबहार गीत सुनकर लोग आज भी झूम उठते हैं। उन दिनों लोक गीतों के कार्यक्रमों के प्रसारण के समय लोग अपने -अपने रेडियो सेट के सामने बड़ी तल्लीनता से  बैठे रहते थे। चाय और पान की दुकानों में ग्राहकों के साथ संगीत प्रेमी श्रोताओं की भीड़ लग जाती थी ।


आकाशवाणी रायपुर के अलावा  - विविध भारती से भी इन गीतों का प्रसारण यदाकदा  होता रहता है ।   इन लोक गीतों की असली मिठास को  तो हम इन्हें सुनकर ही महसूस कर सकते हैं ,फिर भी छत्तीसगढ़ी  लोक संगीत के रसिक जन  आज भी अक्सर इन्हें  गुनगुना उठते हैं ।जैसे यह लोकप्रिय ददरिया गीत -


"बटकी म बासी अऊ चुटकी म नून 

मंय गावत हौं ददरिया ,तयं कान देके सुन ...

ओ चना के दार ।

टुरा पर बुधिया ,होटल म भजिया झडक़त हे ओ ....!" 

आत्मीय बातचीत में मदन चौहान ने एक दिलचस्प संस्मरण भी  सुनाया । उन्होंने बताया- उन दिनों शेख हुसैन साहब की आवाज़ में एक और छत्तीसगढ़ी गीत काफी हिट  हुआ था ,जिसकी पंक्तियाँ थीं --

"एक पइसा के भाजी ल दू पइसा म बेचे गोई -बइठे .... बज़ार म " सब्जी विक्रेताओं के बीच यह गाना बहुत पसंद किया गया ।  इससे प्रभावित होकर  छुईखदान (जिला-राजनांदगांव ) के सब्जी विक्रेताओं ने शेख साहब को अपनी टीम के साथ कार्यक्रम पेश करने वहाँ आमंत्रित किया था। वहाँ सादगीपूर्ण ढंग से आयोजित कार्यक्रम में हम लोगों को दर्शकों और श्रोताओं का भरपूर  स्नेह मिला । वह हमारे लिए एक यादगार आयोजन था।

शेख हुसैन और संत मसीह दास अब इस दुनिया में नहीं हैं ,लेकिन अपने इन दोनों पुराने साथियों को याद करते हुए मदन चौहान बहुत भावुक हो जाते हैं।  यह पूछे जाने पर कि तबला वादन की ओर झुकाव कैसे हुआ ,चौहान जी अपनी यादों को खंगालते हुए बताते हैं कि बचपन में वनस्पति घी के खाली कनस्तरों को तबले की तरह बजाना उन्हें अच्छा लगता था। बाद में यही शौक उनको तबला वादन की ओर ले आया। कुछ स्थानीय आर्केस्ट्रा पार्टियों के साथ भी वह जुड़े रहे ।श्री  चौहान कहते हैं -  तबला  सीखने और तबला वादक के रूप में कामयाब होने में तीस साल लग गए। तबला वादन किसी भी गायन और संगीत का ज़रूरी हिस्सा होता है। 

 श्री चौहान आकाशवाणी रायपुर के मशहूर तबला वादक कन्हैयालाल भट्ट को अपना पहला  गुरु मानते हैं ,जिनसे उन्होंने इसका अनौपचारिक शास्त्रीय ज्ञान  हासिल किया । जयपुर के उस्ताद काले खां साहब उन दिनों कार्यक्रमों के सिलसिले में यहां आकाशवाणी आते -जाते थे।  तबला वादन की कई बारीकियां उनसे भी सीखी । भिलाई नगर के रतनचंद वर्मा से गायन कला का अनौपचारिक प्रशिक्षण लिया। श्री चौहान आकाशवाणी रायपुर के उस दौर के एक वरिष्ठ तबला वादक आशिक अली खां को भी याद करते हैं । वह कहते हैं -मैंने उनसे भी बहुत कुछ सीखा ।

मदन सिंह चौहान का जन्म  रायपुर के  राजा तालाब मोहल्ले में  15 अक्टूबर 1947 को  हुआ था । उनके पिता भिलाई इस्पात संयंत्र के कर्मचारी थे । रिटायर होने के बाद रायपुर में बस गए । मदन चौहान की पांचवीं तक की पढ़ाई  इसी राजा तालाब  मोहल्ले की प्राथमिक पाठशाला में हुई।  रायपुर के ही प्रतिष्ठित राष्ट्रीय विद्यालय में उन्होंने मिडिल और मेट्रिक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने मित्र शेख हुसैन के साथ उन्होंने कुछ दिनों तक ऑटो पार्ट्स की एक दुकान में नौकरी की । फिर कुछ समय स्थानीय श्यामनगर गुरुद्वारे में  120 रुपए मासिक मानदेय पर तबला वादक के रूप में गुरुवाणी के कार्यक्रमों में संगत करने लगे। शबद -कीर्तन  की रचनाओं का उन पर गहरा असर हुआ।यहीं से उनका झुकाव आध्यात्मिक संगीत की ओर हुआ। इस बीच स्थानीय नगर निगम द्वारा  संचालित निवेदिता कन्या हायर सेकेंडरी स्कूल में उन्हें वर्ष 1977 में तबला संगतकार के रूप में सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिल गयी ,जहाँ 32 वर्षो की लम्बी नौकरी के  बाद वर्ष 2009 में वह सेवानिवृत्त हो गए। 

    उन्होंने पुरानी यादों के झरोखे से  झाँकते हुए यह भी बताया कि   छत्तीसगढ़ी गीतों की लोकप्रिय गायिका श्रीमती निर्मला इंगले की प्रेरणा से   वह तबला वादन के साथ -साथ गायन में भी रुचि लेने लगे। आज  सुगम संगीत के मंजे हुए गायक कलाकारों में उनकी गिनती होती है। मदन चौहान की खनकदार मख़मली आवाज़ में  हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भजनों के अनेक एलबम जारी हो चुके हैं  । इनमें माँ दुर्गा की आराधना पर आधारित 'दयामयी दया करो ' शिरडी वाले साईं बाबा को समर्पित 'दो अक्षर का नाम साईं' और 'बच्चों पे रहम ' और गणेश वंदना 'गजानंद स्वामी ' शीर्षक से जारी म्यूज़िक एलबम भी शामिल हैं। उनकी आवाज़ में शिरडी के साईं बाबा पर केन्द्रित म्यूज़िक एलबम  'रहम नज़र करो अब मोर साईं ' भी काफी पसंद किया जा रहा है। भजन एलबमों में कई रचनाएँ चौहान जी द्वारा स्वयं लिखी गयी हैं। उर्दू में भक्ति गीतों का उनका एक म्यूज़िक एलबम  'आओ आओ नबी ' शीर्षक से आया है,जिसके गीतकार इसरार इलाहाबादी हैं। श्री चौहान के  भजनों के  कई एलबम छत्तीसगढ़ी में भी हैं।  छत्तीसगढ़ में  18 वीं सदी में हुए  महान समाज सुधारक बाबा गुरु घासीदास को समर्पित,  दिलीप पटेल का  लिखा पंथी गीत  'जगमग लागे अंजोर '  भी मदन चौहान की आवाज़ में काफी लोकप्रिय हो रहा  है। सूफ़ियाना रंगत की उनकी प्रस्तुतियां श्रोताओं का मन मोह लेती हैं । 

श्री चौहान  के अनेक  म्यूजिक एलबम, विभिन्न कार्यक्रमों में दी गयी प्रस्तुतियां और समय -समय पर  टेलीविजन चैनलों में दिए गए  इंटरव्यू आदि की रिकार्डिंग  यूट्यूब पर भी उपलब्ध है। उनकी आवाज़ में एक 'जस गीत' छत्तीसगढ़ी फीचर फ़िल्म ' तहुँ कंवारा - महुँ कुंवारी ' में भी शामिल किया गया है। श्री चौहान ने संत कबीर सहित अनेक प्राचीन कवियों की पारम्परिक  रचनाओं के अलावा नये दौर के कवियों और शायरों की रचनाओं को भी अपना स्वर और संगीत दिया है। उनकी धीर -गंभीर ,लेकिन मीठी आवाज़ में  उत्तरप्रदेश के वरिष्ठ कवि उदयभानु 'हंस'  की यह ग़ज़ल  किसी भी महफ़िल की रौनक और रंगत को और भी गाढ़ा कर देती  है ,जिसकी  कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं --


" कब तक यूं बहारों में पतझर का चलन होगा ,

कलियों की चिता होगी ,फूलों का हवन होगा ।

हर धर्म की रामायण कहती है ये युग -युग से ,

सोने का हिरन लोगे ,सीता का हरण होगा ।"

इस रचना के बारे में चौहान जी अपनी यादों को शेयर करते हुए एक दिलचस्प प्रसंग भी सुनाते हैं - -  वर्षों पहले पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर एक बार ओड़िशा जाते हुए कुछ समय रायपुर में रुके थे। उन दिनों वह प्रधानमंत्री के पद से त्यागपत्र दे चुके थे ।स्थानीय लोगों ने उनके सम्मान में एक आयोजन किया था  ,जहां उनके आग्रह पर मेरे द्वारा  उदयभानु ' हंस'  की यह रचना  अपनी आवाज़ में पेश की गयी । चंद्रशेखर जी इस रचना से इतने प्रभावित हुए कि वापसी में उन्होंने अपने एक सुरक्षा अधिकारी को मेरे पास भेजकर इसकी रिकार्डिंग मंगवाई । यह निश्चित रूप से  रचनाकार  और गायक के लिए सम्मान की बात थी। मजे की बात यह कि उदयभानु 'हंस' से श्री चौहान की कोई मुलाकात अब तक नहीं हुई है ,लेकिन उनकी इस ग़ज़ल ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वो इसे सुरों में सजाकर सांगीतिक आयोजनों में प्रस्तुत करने लगे ।पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्वर्गीय अरुण जेटली  भी रायपुर में एक बार  मदन चौहान  का कार्यक्रम देखकर उनसे काफी  प्रभावित हुए थे। 

 चौहान जी ने  रायपुर के स्थानीय शायर  अता रायपुरी की कई ग़ज़लों और नज़्मों को भी स्वर दिया है। जैसे अता की एक ग़ज़ल की इन पंक्तियों को देखिए -

"तमाशा मैं बन जाऊं  ये डर नहीं है ,

मेरा पाँव चादर से बाहर नहीं है ।

बहुत ऊँचे लोगों की बस्ती है लेकिन 

कोई मेरे कद के बराबर नहीं है।

अता को भी खुरच कर देखा है हमने 

कोई चेहरा चेहरे के ऊपर नहीं है ।

हमारी मोहब्बत बड़ी सीधी -सादी ,इ

इशारों -विशारों का चक्कर नहीं है।"

श्री चौहान ने  पिथौरा (जिला-महासमुन्द )के कवि   प्रवीण 'प्रवाह' की कई रचनाओं को भी अपनी आवाज़ दी है। राजधानी रायपुर के अनेक सरकारी और गैर सरकारी सामाजिक -सांस्कृतिक-धार्मिक  आयोजनों  में गीत -संगीत के प्रस्तुतिकरण के लिए मदन चौहान को सम्मानपूर्वक आमंत्रित किया जाता है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की जयंती और पुण्यतिथि पर होने वाली प्रार्थना सभाओं में भी वह सर्वधर्म समभाव पर आधारित भजन और गीत प्रस्तुत करते हैं।सूफ़ी गायन में बाबा बुल्ले शाह , बाबा फ़रीद ,अमीर ख़ुसरो  और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया और ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती  उनके मनपसंद शायर हैं।  छत्तीसगढ़ सरकार ने कला के क्षेत्र में  असाधारण योगदान के लिए मदन चौहान को वर्ष 2017 में राजा चक्रधर सिंह राज्य अलंकरण से सम्मानित किया था।  राजधानी रायपुर में आयोजित राज्य स्थापना दिवस समारोह 'राज्योत्सव' में मुख्य अतिथि की आसंदी से राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने उन्हें इस अलंकरण से नवाज़ा था ।  

सुगम संगीत के क्षेत्र में आज के अनेक नामचीन कलाकार श्री  मदन चौहान के शिष्य रह चुके हैं। इनमें  गायिका गरिमा दिवाकर और अभ्रदिता मोइत्रा जैसे कई मशहूर नाम शामिल हैं। अभ्रदिता पहले रायपुर में रहती थीं । वह अब  त्रिवेंद्रम(केरल )  में रहकर हिंदुस्तानी संगीत पर काम कर रही हैं । मध्यप्रदेश सरकार ने कुछ साल पहले अभ्रदिता को  'लता मंगेशकर पुरस्कार' से सम्मानित किया था। 

श्री चौहान कहते हैं - संगीत हर इंसान को  कुदरत की एक अनमोल देन है। गाना -गुनगुनाना  हर इंसान के स्वभाव में होता है। रियाज़ अथवा  अभ्यास से उसे निखारा जा सकता है। भारत में संगीत की वर्तमान स्थिति पर उनका विचार है कि इस कम्प्यूटर युग में नये कलाकारों के लिए पहले की तुलना में आज कहीं ज़्यादा व्यापक संभावनाएं हैं । हमारे समय में इस फील्ड में काफी चुनौतियाँ थीं ।  यह सुगम संगीत का दौर है ,लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शास्त्रीय संगीत ही इसकी बुनियाद है।  सुगम संगीत में आगे बढ़ने के लिए  शास्त्रीय संगीत की बारीकियों को  समझना  ज़रूरी है।   नये लोग जो इस क्षेत्र में आना चाहते हैं ,वे अगर संगीत को  पूजा अथवा इबादत के रूप में लें और मेहनत करें  तो उन्हें क़ामयाबी जरूर मिलेगी।

(यह बातचीत फरवरी 2020 में हुई थी )

-स्वराज्य करुण 

Thursday, January 29, 2026

(आयोजन ) साहित्य, कला और संस्कृति का अनोखा संगम /आलेख -स्वराज्य करुण

वाकई यह एक शानदार और यादगार आयोजन था. साहित्य, कला और संस्कृति के तीन दिवसीय आयोजन  *रायपुर साहित्य उत्सव 2026* के प्रथम दिवस पर मुझे भी अपनी कविता पढ़ने का अवसर मिला. नवा रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में आयोजित  साहित्य उत्सव में छत्तीसगढ़ के दिवंगत वरिष्ठ साहित्यकारों की स्मृति में अलग -अलग मंडप बनाए गए थे. इनमें से सुरजीत नवदीप स्मृति मंडप में पहले दिन 23 जनवरी की शाम महासमुन्द जिले के कवियों को काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था. महासमुन्द के अशोक शर्मा, बन्धु राजेश्वर खरे, प्रलय थिटे,श्रीमती साधना कसार और श्रीमती एस. चन्द्रसेन, बागबाहरा के हबीब समर, पिथौरा के प्रवीण प्रवाह, एफ. ए. नंद और मैंने काव्य पाठ किया. 

                                                  

                                                    






रायपुर साहित्य उत्सव 2026 वास्तव में साहित्य, कला और संस्कृति का एक अनोखा  सुन्दर, यादगार और शानदार संगम था,जहाँ छत्तीसगढ़ सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए साहित्यकारों और कलाकारों के बीच आत्मीय दुआ -सलाम और मेल -मिलाप के साथ परस्पर विचारों का आदान प्रदान भी हुआ.साहित्यकारों को अपनी वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए खुला मंच मिला. पुरखौती मुक्तांगन में तीन दिनों तक लेखकों, कवियों कलाकारों और साहित्यिक -सांस्कृतिक अभिरुचि वाले नागरिकों की भारी चहल -पहल रही. इससे पुरखौती मुक्तांगन की रौनक और भी ज़्यादा बढ़ गई.


                                     

                                            

छत्तीसगढ़ के साहित्यिक इतिहास में राज्य सरकार के जनसम्पर्क विभाग और छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी का यह तीन दिवसीय कार्यक्रम रायपुर साहित्य उत्सव 2026 एक यादगार आयोजन के रूप में दर्ज हो गया.विभाग ने सभी विधाओं के वरिष्ठ और कनिष्ठ, हर तरह के रचनाकारों को मंच प्रदान करने का सराहनीय प्रयास किया. पुस्तक मेले के रूप में कई प्रकाशकों के स्टाल भी लगाए गए थे, जिनमें प्रदेश के नये -पुराने साहित्यकारों की किताबें भी प्रदर्शित की गई थीं. कुछ पुस्तकों का विमोचन भी हुआ.

                                      यह भव्य और ऐतिहासिक आयोजन तीन दिनों की अपनी मधुर स्मृतियाँ देकर 25जनवरी को चला गया. साहित्य उत्सव के शानदार और सफल आयोजन के लिए  आयोजक संस्थाओं और उनकी पूरी टीम लिए तारीफ़ और बधाई ज़रूर बनती है, जिन्होंने साहित्यकारों और कलाकारों को अभिव्यक्ति का खुला आकाश दिया.मुझे छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय संत कवि स्वर्गीय पवन दीवान की एक बात अक्सर याद आती है. उन्होंने  एक बार मुझसे कहा था -"लेखकों और कवियों को साहित्यिक आयोजनों में यथासंभव ज़रूर जाना चाहिए, क्योंकि वहाँ जाने पर ही पता चलता है कि हमारी साहित्यिक बिरादरी कितनी विशाल है."  रायपुर साहित्य उत्सव 2026 में भी साहित्यिक बिरादरी के विराट स्वरूप की एक सुन्दर झलक देखने को मिली.

(यात्रा संस्मरण) डेढ़ हजार साल से भी ज़्यादा पुरानी हैं पाण्डव गुफाएँ / लेखक -स्वराज्य करुण

(आलेख -  स्वराज्य करुण ) 

मध्यप्रदेश में पहाड़ों की रानी के नाम से प्रसिद्ध पचमढ़ी का संबंध महाभारत काल और गुप्त काल से भी है. ऐसा बताया जाता है कि पचमढ़ी का नामकरण यहाँ सतपुड़ा पर्वत के एक हिस्से की पहाड़ी में निर्मित पाँच गुफाओं के आधार पर हुआ है, जो पाण्डव गुफा के नाम से प्रसिद्ध हैं.    लोगों की ऐसी धारणा है कि वनवास का कुछ समय पाण्डवों ने इन गुफाओं में गुज़ारा था.वहीं इन्हें गुप्त काल में यानी चौथी, पांचवी शताब्दी ईस्वी में निर्मित भी माना जाता है.  इस आधार पर कहा जा सकता है कि ये गुफाएँ डेढ़ हजार साल से भी अधिक पुरानी हैं

                                      

 

                                                पाण्डव गुफाओं की ओर जाते हुए पर्यटक 


मुझे जनवरी 2025 के आख़िरी दिनों में से एक दिन वहाँ जाने का अवसर मिला, लेकिन गुफाओं तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों की सुविधा होने के बावजूद थकावट की वजह से मैं  उन गुफाओं को देखने नहीं जा पाया और नीचे बने मनोरम उद्यान को और परिसर में लगे सूचना बोर्ड्स को देखकर ही अपनी जिज्ञासाओं को शांत करता रहा.गाइड ने बताया कि  उद्यान विभाग द्वारा एक पथरीली बंजर जमीन को बड़ी मेहनत से सींचकर इसे एक सुन्दर बगीचे के रूप में विकसित किया गया है. इसे 'पाण्डव उद्यान'नाम दिया गया है. वर्ष 1989 में स्थापित इस उद्यान में तरह -तरह के रंग बिरंगे फूलों के पौधे सबका मन मोह लेते हैं. 

   गुफाओं के नीचे परिसर में हिन्दी और अंग्रेजी में  सूचना फलक भी लगे हुए हैं.हिन्दी में अंकित विवरण में बताया गया है - 

   "यह इस क्षेत्र की प्रसिद्ध पाँच गुफाएं हैं, जिनके आधार पर ही पचमढ़ी नाम हुआ है. ऐसी धारणा है कि पाण्डवों ने अपने वनवास के दौरान यहाँ कुछ समय व्यतीत किया था. यह गुफाएं सामान्य विन्यास की हैं तथा कुछ में स्तंभ युक्त वरामदा निर्मित है. गुफा क्रमांक दो के सामने वाले भाग में साधारण चैत्य गवाक्ष आलेख देखा जा सकता है. गुफा क्रमांक तीन के कोष्ठ का प्रवेश द्वार शाखाओं से अलंकृत है. जिनके निचले भाग में लघु देव आकृतियाँ बनी हुई हैं. गुफा क्रमांक तीन में एक उत्कीर्ण अभिलेख है, जिस पर लिखा है कि उत्कीर्ण भगावकेण, अर्थात यह गुफा भगवक नामक व्यक्ति द्वारा बनाई गई थी, जो संभवतः एक भिक्षु था. इसके आधार पर इसका निर्माण गुप्त काल (चौथी या पांचवी शताब्दी ई. )में हुआ होगा. इसी आधार पर ये गुफाएं बौद्ध धर्म से संबंधित हो सकती हैं. इस पहाड़ी के ऊपरी भाग में पक्की ईटों द्वारा निर्मित पुरावशेष हैं. यह संभवतया किसी स्तूप से संबंधित रहे होंगे."

                                                     


                                                  पाण्डव गुफाओं के बारे में प्रदर्शित सूचना फलक 

    इन गुफाओं को भारत सरकार ने प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्विक स्थल  अवशेष अधिनियम 1958 के तहत राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक घोषित किया है. इस आशय का सूचना फलक भी वहाँ प्रदर्शित है, जिसमें यह चेतावनी भी लिखी हुई है कि यदि कोई भी इस स्मारक को क्षति पहुंचता, नष्ट करता, विलग अथवा परिवर्तित करता, कुरूप करता, खतरे में डालता या दुरूपयोग करते हुए पाया जाता है तो उसे इस अपकृत्य के लिए 3 महीने तक का कारावास या 5000 (पाँच हजार रूपये )तक जुर्माना अथवा दोनों से दण्डित किया जा सकता है.इनका संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण जबलपुर मंडल द्वारा किया जा रहा है.वहीं एक अन्य सूचना बोर्ड में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मंडल ने पर्यटकों से निवेदन किया है कि स्मारक के उन हिस्सों के ऊपर न चढ़ें, जो चढ़ने के लिए नहीं हैं. स्मारक परिसर में कचरा नियत स्थान पर ही फेंकें. वहीं इस बोर्ड में अधीक्षण, पुरातत्वविद भोपाल ने पर्यटकों से सुझाव एवं सम्मतियाँ भी आमंत्रित की  हैं.

   और भी कई अपेक्षाएं पर्यटकों से की गयी हैं.लेकिन गुफाओं को देखकर नीचे आने पर मेरे परिजनों ने मुझे बताया  कि कुछ पर्यटकों द्वारा सूचना फलकों पर अंकित चेतावनी और अपील की अनदेखी करते हुए ऊपर की गुफाओं में से एक गुफा में काफी गंदगी फैलाई गई है.शायद वह नकुल की गुफा है.

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Saturday, January 17, 2026

(आलेख ) अपने गाँव में अपनों के बीच अपनी किताब का विमोचन

 अपने गाँव में अपनों के बीच अपनों के  अपनी किताब विमोचन

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 मेरा वह गाँव अब एक छोटा शहर बन गया है, लेकिन है आज भी है वह गाँव जैसा ही,  जहाँ अधिकांश लोग एक -दूसरे को जानते, पहचानते हैं, जहाँ ग्रामीण परिवेश की हवाओं में आत्मीयता के सुरभित फूल खिलते और तैरते हैं, जिस गाँव में  मेरा बचपन बीता, जहाँ की गलियों की धूल -मिट्टी में मैं पला -बढ़ा, खेला -कूदा,जहाँ के खपैरेलों वाले स्कूल में मुझे अक्षर और शब्द ज्ञान मिला और जहाँ के अन्न जल से मेरा पालन -पोषण हुआ, वहाँ की पावन धरती पर पहली बार मेरी कविताओं की किताब का विमोचन अपनों के बीच, आत्मीय जनों की उपस्थिति में आत्मीय लोगों के हाथों हुआ, यह मेरे लिए एक सुखद और नया अनुभव रहा.  मेरी इच्छा थी कि विमोचन मेरे ही गाँव में हो. श्रृंखला साहित्य मंच के स्थापना के दिनों से ही यानी लगभग 37 वर्षों से मैं इस संस्था का सदस्य हूँ.मंच के साथियों  का भी यह स्नेहिल आग्रह था कि विमोचन पिथौरा में हो.उनके सहयोग से  6 जनवरी 2026 को मेरी 83 कविताओं के संग्रह 'दिलवालों का देश कहाँ ' का विमोचन समारोह सम्पन्न हुआ. यह पुस्तक तो लगभग पाँच महीने पहले अगस्त 2025 में भाई सुधीर शर्मा के सर्वप्रिय प्रकाशन (दिल्ली -रायपुर )में छपकर तैयार थी, लेकिन विमोचन का सुखद संयोग अब जाकर बना. 

                                                          


      

छत्तीसगढ़ के तहसील मुख्यालय पिथौरा (जिला -महासमुन्द )के अग्रसेन भवन में आयोजित इस सादगीपूर्ण समारोह में  वरिष्ठ साहित्यकार,भाषा -विज्ञानी और छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा वर्ष 2025 में पंडित सुन्दरलाल शर्मा राज्य अलंकरण से सम्मानित डॉ. चित्तरंजन कर ने मुख्य अतिथि की आसंदी से मेरी इस पुस्तक का विमोचन किया. स्थानीय अग्रसेन भवन में  आयोजित विमोचन समारोह की अध्यक्षता छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार और उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान से साहित्य भूषण सम्मान प्राप्त कवि, पत्रकार और लेखक गिरीश पंकज ने की. विशेष अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार और छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जन -जाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष जी. आर. राना और पिथौरा निवासी सुप्रसिद्ध कहानीकार तथा उपन्यासकार शिवशंकर पटनायक उपस्थित थे. यह इन साहित्यिक दिग्गजों का बड़प्पन था कि उन्होंने मुझ जैसे एक साधारण कवि के इस संग्रह की तारीफ़ की. उनका उदबोधन मेरे लिए आशीर्वाद स्वरूप रहा. मैं इन सभी दिग्गज साहित्यिक हस्तियों का और साहित्य मंच के अपने सभी सदस्य मित्रों का आभारी हूँ. उन सब स्नेही जनों, साहित्यिक मित्रों का भी आभार मानता हूँ, जो मेरे गाँव सहित अंचल के विभिन्न स्थानों से आकर समारोह में उपस्थित हुए और जिन्होंने मेरा उत्साह बढ़ाया. उन सभी की उपस्थिति से वह दिन यादगार बन गया.

                                        



                   किसी भी देश की असली छवि वहाँ के साहित्य में देखिए     -डॉ. चित्तरंजन कर 

          समारोह में मुख्य अतिथि डॉ. चित्तरंजन कर ने कहा  कि किसी भी देश की असली छवि अगर देखनी हो, तो वहाँ के साहित्य में देखिए. उन्होंने कहा कि साहित्य रचना कोई शौक नहीं, कोई मौज नहीं, कोई चाय की चुस्की नहीं, बल्कि एक चेतना है, वेदना है, संवेदना है, जो रचनाकार को लिखने के लिए प्रेरित करती है. साहित्यकार समाज रुपी शरीर का मुख है. वह समाज के दर्द को महसूस करके उसे अपने शब्दों से अभिव्यक्ति देता है.उन्होंने कहा कि समय के साथ  देश,  दुनिया में और समाज में परिवर्तन तो ठीक है, लेकिन मानवीय मूल्यों का जो विघटन हो रहा है, वह चिन्ताजनक है. उन्होंने कहा कि करुणा ही कविता रचती है.स्वराज्य करुण के कविता -संग्रह 'दिलवालों का देश कहाँ ' में संकलित उनकी कविताओं में इसे महसूस किया जा सकता है.इन कविताओं की हर पंक्ति सारगर्भित है.संग्रह की हर कविता में देशज भावनाएँ हैं और मानवीय संवेदनाएँ हैं.इनमें वैचारिक रूप से उदात्त भावनाएँ हैं.            

                                               


                                             समारोह को सम्बोधित करते हुए डॉ. चित्तरंजन कर 


कविताओं में संवेदनाओं के साथ 

                                               सामाजिक सरोकार भी ज़रूरी -गिरीश पंकज 

                   अध्यक्षीय आसंदी से राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार गिरीश पंकज ने कहा कि  कविताओं में मानवीय संवेदनाओं के साथ सामाजिक सरोकार का होना भी बहुत ज़रूरी है . ये दोनों विशेषताएँ स्वराज्य करुण की कविताओं में देखने  को मिलती हैं .स्वराज्य करुण के रचना -कर्म से मैं किसी न किसी रूप में विगत लगभग चालीस वर्षों से परिचित हूँ वे लोक मंगल, सामाजिक -सरोकार और लोक जागरण के कवि हैं.उनकी कविताओं में समाज का दर्द दिखाई देता है. उनके कविता -संग्रह 'दिलवालों का देश कहाँ ' का उल्लेख करते हुए गिरीश पंकज ने कहा -कवि चिंतित है कि धीरे -धीरे यह देश धन वालों का देश बनता जा रहा है. इसलिए दिलवालों का देश हाशिए पर चला गया है. कवि उस देश को हाशिए से राष्ट्र के केन्द्र में लाना चाहता है .इस संग्रह की कविताओं में रोमांस नहीं बल्कि समाज की पीड़ा की अभिव्यक्ति है. समाज में जो कुछ भी पीड़ादायक घटित हो रहा है, उसे यह कवि बेबाक तरीके से कहता है. कहीं कोई लुका छिपी नहीं. इसीलिए मुझे स्वराज्य करुण की काव्य -यात्रा शुरु से पसंद है.गिरीश पंकज ने कहा कि उनके इस संग्रह की कविताएँ हमें सोचने के लिए विवश करती हैं. इनमें गीत भी हैं और ग़ज़लें भी. सबसे अच्छी बात ये है कि ये सभी छंदबद्ध रचनाएँ हैं.

                                      

                                                समारोह को सम्बोधित करते हुए गिरीश पंकज 

गिरीश पंकज ने पिथौरा के एक अच्छे और सकारात्मक साहित्यिक वातावरण का उल्लेख करते हुए इसके लिए श्रृंखला साहित्य मंच की तारीफ़ की. उन्होंने कहा कि यहाँ के कवियों में और साहित्य प्रेमियों में कोई बनावटीपन नहीं, बल्कि  सहजता, सरलता और आत्मीयता है.इसलिए पिथौरा आना मुझे अच्छा लगता है.

                    

            खोए हुए गाँव की तरह खोए हुए 

             देश को भी खोजें-जी. आर. राना 

         विशेष अतिथि जी. आर. राना ने आज के समय में गाँवों की जीवन शैली में आ रहे निराशाजनक बदलाव पर चिन्ता प्रकट की. उन्होंने कहा कि बचपन में हम जिस बरगद की शाखाओं में खेलते और झूलते थे,, जो हमें शीतल छाया देती थीं, वे शाखाएँ 'बॉब कट ' की तरह कटती जा रही हैं अब ना तो कहीं दाऊ का बाड़ा है और न ही बरगद और पीपल छाँव. इसी संदर्भ में उन्होंने अपनी एक लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी कविता की भी पंक्तियाँ पढ़कर सुनाई -मोर गाँव गंवागे संगी, मय कहाँ रिपोर्ट लिखाँव?

जी. आर. राना ने कहा कि स्वराज्य करुण के कविता -संग्रह के शीर्षक 'दिलवालों का देश कहाँ ' में हमारे खोए हुए गाँव की तरह खोए हुए देश के लिए चिन्ता झलकती है. आइए, हम सब मिलकर उस देश को खोजें.

 विशेष अतिथि वरिष्ठ कहानीकार और उपन्यासकार शिवशंकर पटनायक ने भी कविता संग्रह की प्रशंसा की. महासमुन्द के कवि अशोक शर्मा ने संग्रह का उल्लेख करते हुए इस अवसर पर कहा कि साहित्यिक रचनाओं के शब्दों से समाज को ऊर्जा मिलती है. उन्होंने कहा कि साहित्य सदैव शाश्वत होता है.

                         कहाँ मिलेगा दिलवालों का देश?

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  मैंने अपने कविता -संग्रह की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला और कहा कि साहित्यिक रचनाएँ मानव हृदय की भावनाओं का प्रतिबिम्ब होती हैं.अपने कविता -संग्रह के शीर्षक *दिलवालों का देश कहाँ * का उल्लेख करते हुए  कहा - यह सवाल अक्सर मेरे मन -मस्तिष्क को विचलित करता रहता है कि आधुनिकता की तेज आँधी में दिनों -दिन बेदिल और बेरहम होते जा रहे इस संसार में,  स्नेह, ममता, दया और करुणा से भरे दिलवाले संवेदनशील इंसान कहाँ  मिलेंगे?यह प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है कि  दुनिया के नक्शे में  ऐसे दिलवाले इंसानों का देश कहाँ है, ऐसा कोई देश अगर कहीं है भी तो वह कहाँ मिलेगा ? अगर नहीं है तो क्या हमें अपने ही देश को दिलवालों का देश बनाने का प्रयास नहीं करना चाहिए? 

  विशेष अतिथि की आसंदी से शिवशंकर पटनायक  ने भी कविता संग्रह की प्रशंसा की. महासमुन्द के वरिष्ठ कवि अशोक शर्मा ने संग्रह का उल्लेख करते हुए इस अवसर पर कहा कि साहित्यिक रचनाओं के शब्दों से समाज को ऊर्जा मिलती है. उन्होंने कहा कि साहित्य सदैव शाश्वत होता है.प्रारंभ में स्वराज्य करुण ने अपने कविता -संग्रह की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला. 

                               


  स्वागत भाषण श्रृंखला साहित्य मंच के अध्यक्ष प्रवीण प्रवाह ने दिया.समारोह का संचालन साहित्य मंच के पूर्व अध्यक्ष उमेश दीक्षित ने किया.इस अवसर पर श्रृंखला साहित्य मंच के सचिव संतोष गुप्ता, पूर्व अध्यक्ष अनूप दीक्षित,वरिष्ठ सदस्य शशि कुमार डड़सेना,एफ. ए. नंद, माधव तिवारी, डॉ. जीतेश्वरी साहू, गुरप्रीत कौर सहित स्थानीय पत्रकार सर्व श्री मनोहर साहू, रजिन्दर खनूजा, जाकिर कुरैशी, नंदकिशोर अग्रवाल, राजेन्द्र सिन्हा और मनमीत छाबड़ा तथा पार्षद मन्नू ठाकुर भी उपस्थित थे. महासमुन्द के बन्धु राजेश्वर खरे, बागबाहरा के रुपेश तिवारी, धनराज साहू और हबीब समर, कोमाखान के डॉ.विजय शर्मा और किसान दीवान बसना के बद्री प्रसाद पुरोहित, अभनपुर के ब्लॉगर ललित शर्मा, सांकरा (जोंक )के जवाहर लाल नायक, रायपुर की श्रीमती माधुरी कर, पिथौरा के सर्वश्री मधुसूदन महान्ति, रितेश महान्ति, आकाश महान्ति, विवेक दीक्षित,गुरुचरण सिंह सलूजा,अनंत सिंह वर्मा,रमेश भोई, रमाशंकर पाण्डेय, श्रीमती सविता डे, श्रीमती सुप्रिया दास, नरेन्द्र जोशी,ग्राम खुटेरी के पूर्व सरपंच घनश्याम धांधी, सरायपाली के डॉ. पीतांबर साहू तथा बड़ी संख्या में आंचलिक साहित्यकारों और साहित्य प्रेमी नागरिकों की भी उत्साह जनक उपस्थिति रही. 

       समारोह के अंत में डॉ. चित्तरंजन कर ने इस कविता संग्रह के कुछ गीतों के साथ प्रवीण प्रवाह की एक ग़ज़ल को भी अपनी मधुर आवाज़ में संगीत के साथ प्रस्तुत किया .उनके साथ तबले पर सरायपाली के डॉ. प्रदीप साहू ने संगत की. आभार प्रदर्शन श्रृंखला साहित्य मंच के पूर्व अध्यक्ष अनूप दीक्षित ने किया.

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Monday, December 22, 2025

(समाचार ) एक साथ मनाई गई छत्तीसगढ़ की तीन महान विभूतियों की जयंती

 एक साथ मनाई गई छत्तीसगढ़ की तीन महान विभूतियों की जयंती 

            विचार-गोष्ठी का भी हुआ आयोजन

 छत्तीसगढ़ प्रदेश की तीन महान विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर राजधानी रायपुर के हाँडीपारा स्थित छत्तीसगढ़ी भवन में कल 21 दिसम्बर को स्थानीय प्रबुद्धजनों की विचार -गोष्ठी आयोजित की गई.इसमें वक्ताओं ने स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक जागरण के  कार्यों में  तीनों विभूतियों की ऐतिहासिक भूमिका को याद किया. इन विभूतियों में से छत्तीसगढ़ के गांधी के नाम से लोकप्रिय  पंडित सुन्दरलाल शर्मा का जन्म 21दिसम्बर 1881 को राजिम में और त्यागमूर्ति के नाम से प्रसिद्ध ठाकुर प्यारेलाल सिंह का जन्म 21दिसम्बर 1891 को ग्राम -दैहान (जिला -राजनांदगांव ) में हुआ था, जबकि संविधान सभा के सदस्य रहे,संविधान पुरुष के नाम से प्रसिद्ध घनश्याम सिंह गुप्त का जन्म 22दिसम्बर 1885 को दुर्ग में हुआ था. स्वतंत्रता संग्राम में भी तीनों विभूतियों की सक्रिय भूमिका थी.विचार -गोष्ठी में तीनों की जयंती  एक साथ मनाई गई.

     तीनों विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर इतिहासकार डॉ. के. के. अग्रवाल, वरिष्ठ रंगकर्मी और लेखक अरविन्द मिश्रा,  संस्कृति कर्मी अशोक तिवारी, साहित्यकार और पत्रकार स्वराज्य करुण और छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण सेनानी, किसान नेता और साप्ताहिक 'किसान वीर 'के सम्पादक  गोवर्धन प्रसाद चंद्राकर ने प्रकाश डाला.सर्वप्रथम तीनों विभूतियों के चित्र पर माल्यार्पण किया गया. लोकतंत्र सेनानी और राज्य निर्माण सेनानी जागेश्वर प्रसाद ने स्वागत भाषण देने के बाद कार्यक्रम का संचालन भी किया.उन्होंने ही आभार प्रदर्शन भी किया. राज्य निर्माण आंदोलनकारी संस्था छसपा द्वारा आयोजित इस विचार -गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए इतिहासकार डॉ. के. के. अग्रवाल ने  स्वतंत्रता संग्राम और अछूतोद्धार के लिए छत्तीसगढ़ में पंडित सुन्दरलाल शर्मा की ऐतिहासिक भूमिका का उल्लेख किया. डॉ. अग्रवाल ने कहा कि उस दौर में पंडित सुन्दरलाल शर्मा ने एक साथ तीन बड़े कार्य किए. उन्होंने समाज में जन -जागरण के लिए खण्ड -काव्य 'दानलीला ' सहित 18 ग्रंथों की रचना की.राष्ट्रीय विद्यालय का संचालन किया. स्वदेशी आंदोलन, किसान आंदोलन, जंगल सत्याग्रह और नहर सत्याग्रह में भी पंडित सुन्दरलाल शर्मा की महत्वपूर्ण भूमिका थी. वे छत्तीसगढ़ में   अछूतोद्धार आंदोलन के प्रणेता थे. स्वतंत्रता आंदोलन में  गिरफ्तार होकर उन्हें जेल में भी रहना पड़ा.                     

                                                              

                                        



त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह को याद करते हुए इतिहासकार डॉ. के. के. अग्रवाल ने कहा कि ठाकुर साहब ने वर्ष 1919 में राजनांदगाँव में  लगभग 36 दिनों तक चले छत्तीसगढ़ के प्रथम मज़दूर आंदोलन का नेतृत्व किया. यह आंदोलन उनकी अगुवाई में सूती कपड़ा मिल के मज़दूरों ने किया था.डॉ. अग्रवाल ने कहा कि त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह छत्तीसगढ़ के इस प्रथम मज़दूर आंदोलन के अग्रदूत और सहकारिता आंदोलन के भी पुरोधा थे.  छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा के लिए रायपुर में पहला कॉलेज उन्हीं के प्रयासों से छत्तीसगढ़ कॉलेज के नाम से शुरु हुआ. इसके लिए ठाकुर साहब की अध्यक्षता में 1937 में छत्तीसगढ़ एजुकेशन सोसायटी का गठन किया गया था.

   विचार -गोष्ठी में अरविन्द मिश्रा ने पंडित सुन्दर लाल शर्मा के सार्वजनिक जीवन के अनेक अनछुए प्रसंगों का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि पंडित सुन्दरलाल शर्मा ने अपने खण्ड -काव्य 'दानलीला 'में तत्कालीन समाज में व्याप्त शोषण के खिलाफ़ जन -जागरण का संदेश दिया था. दूध -दही और खेतों में पैदा होने वाली उपज का उपभोग अकेले कंस द्वारा किए जाने का प्रतीकात्मक  विरोध इस खण्ड काव्य में किया गया है,  तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत द्वारा भी भारत की जनता का तरह -तरह से शोषण किया जा रहा था, जिसका प्रतीकात्मक विरोध इस खण्ड काव्य में प्रकट होता है.

                                                       


   स्वराज्य करुण ने कहा कि तीनों विभूतियों  की जीवन यात्रा किसी महाकाव्य से कम नहीं है. ठाकुर साहब तत्कालीन मध्य प्रांत और बरार की विधानसभा सभा में वर्ष 1952 में रायपुर से विधायक निर्वाचित होकर पहुँचे थे और प्रतिपक्ष के नेता भी बनाए गए थे. त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह तीन बार क्रमशः वर्ष 1936,वर्ष 1940 और वर्ष 1944 में रायपुर नगरपालिका परिषद के निर्वाचित अध्यक्ष रहे और शहर के विकास के लिए अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ठाकुर साहब पत्रकार भी थे. उन्होंने  रायपुर में वर्ष 1950 से 1952 तक राष्ट्रबंधु 'नामक अर्ध -साप्ताहिक समाचार पत्र का सम्पादन और प्रकाशन किया, लेकिन विधायक बनने और नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के बाद अपनी व्यस्तता के कारण उन्हें इसका  प्रकाशन स्थगित करना पड़ा.सहकारिता आंदोलन में उनकी अग्रणी भूमिका को भी विचार -गोष्ठी में याद किया गया. 

घनश्याम सिंह गुप्त को याद करते हुए विचार -गोष्ठी में बताया गया कि गुप्त जी ने संविधान सभा के सदस्य के रूप में स्वतंत्र भारत के संविधान का हिन्दी अनुवाद तैयार करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था. वे भारतीय संविधान के हिन्दी रूपांतरण के लिए बनी समिति के अध्यक्ष भी थे.

अशोक तिवारी ने कहा कि ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने वर्ष 1950 के  दौर में आसाम प्रांत में पीढ़ियों से निवास कर रहे प्रवासी छत्तीसगढ़ियों को जमीन से बेदखल किए जाने की जानकारी मिलते ही तत्काल आसाम का दौरा किया और पचास दिनों तक वहाँ के गाँवों में घूम -घूम कर उनका दुःख -दर्द सुना और उनकी दिक्क़तों को दूर करने के लिए अपनी रिपोर्ट के साथ आसाम तथा तत्कालीन मध्य प्रांत और बरार की सरकारों के स्तर पर सक्रिय पहल की.

 राज्य निर्माण सेनानी गोवर्धन चंद्राकर ने कहा कि  आज़ादी के बाद देश में शिक्षा और संचार सुविधाओं का काफी विकास हुआ है लेकिन किसी न किसी रूप में सामाजिक -आर्थिक शोषण आज भी व्याप्त है. उच्च शिक्षा प्राप्त करके ऊँचे पदों पर पहुँचे अधिकांश लोग अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों से दूर हो गए हैं. गोवर्धन प्रसाद चंद्राकर ने कहा कि हमारी महान विभूतियों ने हमेशा अन्याय और शोषण के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करते हुए समाज को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया है. हमें उनके बताए रास्ते पर चलना होगा.विचार-गोष्ठी में उर्दू शायर सुखनवर हुसैन, छत्तीसगढ़ी गीतकार रामेश्वर शर्मा, रसिक बिहारी अवधिया सहित गोविन्द धनगर, संजीव साहू, डॉ. श्याम लाल साकार, परसराम तिवारी, प् शिवनारायण ताम्रकार,मिनेश चंद्राकर, रघुनंदन साहू, श्यामू राम सेन, गंगाराम साहू, आदर्श चंद्राकर, मुकेश टिकरिहा, हिमांशु चक्रवर्ती, आशाराम देवांगन, उमैर खान, डॉ. छगन लाल सोनवानी ऋतु महंत, रोहित चन्द्रवंशी और रामकुमार देवांगन  आदि उपस्थित थे.


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