Wednesday, October 18, 2023

(आलेख) इतने भजन ,इतने पूजन ,इतनी प्रार्थनाएँ , सब व्यर्थ

इतने भजन ,इतने पूजन ,इतनी प्रार्थनाएँ, इंसानी बर्बरता के आगे कोई काम न आए। क्या वे लाखों लोग अपने बचाव के लिए अपने -अपने अज्ञात ,अदृश्य ईश्वर से प्रार्थना नहीं कर रहे होंगे , जो हमास और इजरायल के बीच 12 दिनों से जारी विनाशकारी युद्ध में फँसे हुए हैं ? सब व्यर्थ गया। गजा के एक अस्पताल पर बमबारी जहाँ लज्जाजनक है ,वहीं इसके फलस्वरूप अस्पताल में 500 मौतों की ख़बर बेहद पीड़ादायक । ऐसा भी कहा जा रहा है कि इस घिनौने हमले में मरने वालों और घायलों की संख्या और भी बढ़ सकती है।
मनुष्य बीमार पड़ने पर अपने स्वास्थ्य के लिए ,अपनी प्राण रक्षा के लिए अस्पतालों की शरण लेता है, लेकिन अगर किसी अस्पताल पर ही बमबारी हो तो इंसान आख़िर जाए तो जाए कहाँ ? क्या इस क्रूरतम हमले में डॉक्टर्स ,नर्स और अस्पताल के अन्य कर्मचारी भी मरे या घायल नहीं हुए होंगे ,जो वहाँ मरीजों की सेवा के लिए तैनात थे? यह बमबारी चाहे जिसने भी की हो , वह इंसान तो हो ही नहीं सकता। उसकी हैवानियत की सबको एक स्वर से निन्दा करनी चाहिए ।हमास और इजरायल दोनों एक -दूसरे पर इस शर्मनाक करतूत का आरोप लगा रहे हैं । कौन सही है और कौन गलत , यह तय कर पाना वहाँ चल रही भयानक हिंसा और प्रतिहिंसा के माहौल में बहुत कठिन हो गया है। यह ख़ूनी लड़ाई हर हालत में रुकनी चाहिए। अस्पताल में हुई सैकड़ों मौतों के लिए दोनों पक्षों को सार्वजनिक रूप से पश्चाताप करना चाहिए ,क्योंकि अगर वे युद्ध नहीं करते तो ऐसा क्यों होता ? -स्वराज्य करुण

Wednesday, October 11, 2023

(आलेख) बंद क्यों नहीं होती ऐसी ख़ूनी लड़ाइयाँ ? लेखक -स्वराज्य करुण

आख़िर संयुक्त राष्ट्रसंघ की क्या ड्यूटी है? (आलेख -स्वराज्य करुण) यूक्रेन पर लगभग डेढ़ साल पहले शुरू हुए रूसी आक्रमण की आग अभी बुझी भी नहीं है और उधर इज़राइल और फिलिस्तीन के बीच युद्ध शुरू हो गया है। युद्ध चाहे यूक्रेन और रूस का हो या इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच , इन्हें तत्काल रोका जाना चाहिए। बेरहमी और पागलपन से भरी इन लड़ाइयों में अब तक इन देशों के सैकड़ों निरीह नागरिकों की मौत हो चुकी है , हजारों लोग घायल हुए हैं। युद्ध के बदहवास माहौल में मृतकों और घायलों के सही-सही आंकड़े तत्काल नहीं मिल पाते है। शायद ये आंकड़े अब तक मिली संख्याओं से अधिक होंगे।संयुक्त राष्ट्र संघ को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। आख़िर संयुक्त राष्ट्र संघ की क्या ड्यूटी है? उसके बड़े-बड़े दिग्गज पदाधिकारियों को आख़िर लाखों डॉलर की तनख्वाहें और सुख-सुविधाएँ आख़िर किस काम के लिए मिलती हैं ? दुनिया के तमाम देशों ने मिलकर यह संगठन बनाया किसलिए है?
किन्हीं दो देशों की खूनी लड़ाई का खामियाज़ा उन देशों के उन हजारों-लाखों लोगों को भुगतना पड़ता है ,जिनकी कोई गलती नहीं होती ,जिनका उन लड़ाइयों से कोई लेना -देना नहीं रहता। वो अपनी और अपने परिवारों की ज़िन्दगी की गाड़ी खींचने के लिए रोजी-रोटी की ज़द्दोज़हद में लगे रहते हैं। लेकिन युद्ध की आग उनकी घर-गृहस्थी को उजाड़कर रख देती है , उन्हें और उनके मासूम बच्चों , माताओं ,बहनों और बुजुर्गों सहित घर के दूसरे सदस्यों को भी जलाकर राख कर देती है।लेकिन उन राष्ट्रों के प्रमुख शासक अपने-अपने सिंहासनों की सुरक्षा के लिए , अपने -अपने अहंकार की तुष्टि के लिए अपने -अपने नागरिकों में युद्धोन्माद की लहर पैदा करके, उन्हें मानवता का दुश्मन बना देते हैं और खुद अपने-अपने महलों में हमेशा महफूज़ बने रहते हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वर्ष 1945 में दो जापानी शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिकी परमाणु बमों के हमलों में लाखों नागरिक मारे गए।उसकी एक अलग दर्दनाक कहानी है। यह कड़वी सच्चाई है कि दुनिया का इतिहास राष्ट्रों के बीच हुई और हो रही लड़ाइयों से बहते बेगुनाहों के ख़ून से भी लिखा गया है और लिखा जा रहा है। अगर दुनिया पढ़े-लिखे ,सुशिक्षित लोगों की है , अगर दुनिया में शिक्षा और साक्षरता बढ़ चुकी है , तो ऐसी लड़ाइयाँ बंद होनी चाहिए। वैसे ये बात तो है कि अनपढ़ लोग इस प्रकार के पागलपन से अक्सर दूर रहते हैं ,लेकिन पागल किस्म के लोग उन्हें भी पागलपन का शिकार बनाकर युद्ध की आग में झोंक देते हैं। युद्ध से और किसी को कोई फायदा हो या न हो ,लेकिन अस्त्र-शस्त्रों के निर्माता और व्यापारी हमेशा फ़ायदे में रहते हैं। ये लड़ाइयाँ हथियारों के सौदागरों को लाखों ,करोड़ो और अरबो रुपयों के मुनाफ़े का बाज़ार मुहैय्या करवाती हैं। दुनिया भर के हथियार-उद्योग इन्हीं निर्मम लड़ाइयों के दम पर फलते-फूलते रहते हैं। विगत तीन दशकों में हमारी दुनिया में कई युद्ध हुए हैं। वर्ष 1990 में खाड़ी युद्ध , वर्ष 2001 में अफ़ग़ानिस्तान पर , फिर 2003 में इराक पर अमेरिकी हमलों का खौफ़नाक मंज़र दुनिया देख चुकी है। सीरिया से भी युद्ध की ख़बरें गाहेबगाहे आती रहती हैं। कुछ साल पहले अज़रबैजान-आर्मेनिया की खूनी ज़ंग में भी मानव जीवन की भारी तबाही हो चुकी है । दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से युद्ध के विनाशकारी पागलपन की ख़बरें मिलती ही रहती हैं। ऐसी लड़ाइयाँ बंद होनी चाहिए। दुनिया के तमाम देशों को अपनी जनता के लिए बेहतर शिक्षा के साथ बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं पर , आवागमन के बेहतर संसाधनों के विकास पर ध्यान देना चाहिए। अपनी ऊर्जा साहित्य ,कला और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन पर लगानी चाहिए। अगर ये दुनिया सचमुच पढ़े-लिखों की है तो उसे सभी देशों के बीच परस्पर शांति और मैत्री के लिए काम करना चाहिए। संयुक्त राष्ट्रसंघ का गठन भी इसी उद्देश्य से किया गया था। लेकिन लगता है कि वह इस बात को भूल चुका है। उसे याद दिलाना ज़रूरी है। आलेख -स्वराज्य करुण फोटो -इंटरनेट से साभार

Wednesday, October 4, 2023

(आलेख) मेरी समझ से ये हैं घुटनों में दर्द के कुछ असली कारण

(आलेख -स्वराज करुण ) दोस्तों , मैं कोई डॉक्टर या फिजियोथेरेपी का विशेषज्ञ तो नहीं,लेकिन इस युग में घुटनो के दर्द की आम हो चली समस्या को देखकर और सुनकर कह रहा हूँ । मैं स्वयं इस दर्द से गुज़र रहा हूँ। आप कहेंगे कि पर उपदेश ,कुशल बहुतेरे ,लेकिन जैसा कि मैंने महसूस किया है और शायद आप लोग भी मुझसे सहमत होंगे । घुटनों के दर्द की बढ़ती समस्या के कई कारण हो सकते हैं। मेरी समझ से इसके कुछ असली कारण ये हो सकते हैं । ज़्यादातर शहरी लोगों में ज़मीन पर पालथी मोड़कर बैठने और पीढ़े में भोजन करने की आदत छूट गयी है। पहले महिलाएँ रसोई घरों में ज़मीन पर बने मिट्टी के गोबर लिपे चूल्हे में लकड़ी से खाना बनाती थीं ,या कोयले की सिगड़ी में । लेकिन अब मिट्टी के चूल्हे लगभग विलुप्त हो चुके हैं तो उनमें उपयोग के लिए लकड़ियों का तो सवाल ही नहीं उठता। पहले हर मोहल्ले में लकड़ी टाल होते थे ,लेकिन वे भी अब कहाँ दिखाई देते हैं? अब तो लगभग हर किचन में गैस चूल्हा और प्लेटफार्म होता है । महिलाएँ खड़े होकर खाना बनाती हैं। डाइनिंग टेबल सस्ता हो या महँगा ,कई घरों में खाना डाइनिंग टेबल पर ही परोसा जाता है। बच्चे ,बड़े सभी उम्र के लोग उसमें डाइनिंग कुर्सियों पर बैठकर भोजन करते हैं। पालथी मोड़ने की आदत कहाँ रहेगी ? शादी -ब्याह के आयोजनों में पहले मेहमानों को पंगत में बैठाकर बड़े मान-मनुहार के साथ ,प्राकृतिक दोना पत्तलों में बड़े प्रेम से भोजन परोसा जाता था, मेहमान भी पालथी मोड़कर आराम से खाना खाते थे।लेकिन अब तो हर तरफ़ बफे सिस्टम का प्रचलन है । लोग खड़े-खड़े भोजन करते हैं। पालथी मोड़कर बैठने की आदत भी उनमें नहीं रह गयी है। छोटे-छोटे कामों के लिए पैदल चलने की आदत भी छूटती जा रही है। आजकल कहीं आना -जाना हो तो आजकल बच्चे और बड़े सभी लोग बाइक चलाकर आते - जाते हैं। साइकिल चलाने से पैरों की कसरत हो जाती थी ,लेकिन साइकिल की आदत छूट रही है। आपके शरीर को लाने ले जाने काम तो मशीन कर रही है। पैरों की कसरत भला कैसे हो पाएगी ? यह ज़रूर है कि कहीं बहुत दूर जाना हो तो भले ही बाइक का इस्तेमाल करें ,लेकिन आसपास बाज़ार-दुकान जाना हो,बच्चों को दो चार किलोमीटर की दूरी पर स्कूल भेजना हो तो साइकिल बेहतर है। हम लोग अपने बचपन के दिनों में पहली से पाँचवी तक फर्श पर टाट पट्टियों में बैठ कर पढ़ाई करते थे ,बेंच और डेस्क पर बैठने का सिलसिला छठवीं से शुरू होता था और कई जगहों पर तो उन कक्षाओं में भी टाट पट्टियों में बैठकर ही बच्चे बड़े आराम से पढ़ाई कर लेते थे। पालथी मोड़कर बैठने की आदत बन जाती थी । लेकिन अब तो ज़्यादातर स्कूलों में डेस्क और बेंच पर बैठकर ही पढ़ाई होती है। घुटनों का मूवमेंट नहीं होता। लेकिन एक बात ज़रूर अच्छी हुई है कि कई राज्यों में सरकारी योजनाओं के तहत हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी कक्षाओं की बालिकाओं को निःशुल्क साइकल दी जा रही है ,जिनका उपयोग भी उनके द्वारा किया जा रहा है ,जो उनकी सेहत के लिए भी अच्छा है।लेकिन कई शहरी घरों में अभिभावक अपने बेटे-बेटियों की जिद के आगे झुककर उनके हाथों में एक्टिवा या स्कूटी जैसे बाइक थमा देते हैं, जिनमें ये बच्चे फर्राटे से आते जाते हैं और कई बार दुर्घटनाग्रस्त भी हो जाते हैं। साइकिल से दुर्घटनाओं की आशंका काफी कम होती है।यह पैरों के व्यायाम का भी एक अच्छा साधन है। - स्वराज करुण

Tuesday, October 3, 2023

(आलेख) डीजे की आफ़त से कब मिलेगी राहत ?

(आलेख -स्वराज्य करुण) पुरानी कहावत है कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं । यह कहावत आज के समय में डीजे यानी डिस्क-जॉकी नामक साउंड बॉक्स पर भी लागू हो रही है। वह आपसे या हमसे कहीं दूर बज रहा हो तो काफी राहत महसूस होती है ,लेकिन भयानक दैत्य गर्जना वाले ये बड़े- बड़े गहरे काले रंग के डिब्बे जिस रास्ते से या जिस मोहल्ले से गुजरते हैं , जिन घरों के नज़दीक से गुजरते हैं , वहाँ के सीधे-सादे शांतिप्रिय नागरिक और उनके परिवार त्राहिमाम -त्राहिमाम करते हुए अपने कान बन्द करने को मज़बूर हो जाते हैं । उनके घरों के बर्तन तक झनझनाने लगते हैं,खिड़कियाँ काँपने लगती हैं। ऐसा लगता है ,मानो कोई भूचाल आ गया है! हालांकि सड़कों पर जुलूसों में यह धमाल कुछ देर तक ही मचता है , लेकिन अगर कोई जुलूस कई किलोमीटर लम्बा हो और किसी के घर के आसपास यह धमाल घंटों तक जोर -जोर से होता रहे तो? ऐसे में उन सड़कों के दोनों किनारों के दुकानदार और घरों में रहने वाले लोग सोचते हैं कि शोरगुल की यह आफ़त कब टले तो राहत मिले और हम चैन से बैठ सकें , अपने अपने काम कर सकें या आराम से सो सकें। लेकिन कई बार किसी आयोजन में देर रात तक डीजे बजता रहता है। उसके इर्दगिर्द के घरों के लोग उस व्यक्ति को कोसने लगते हैं ,जिसने उनका का सुख-चैन खत्म करने के लिए इस आफ़त का आविष्कार किया!
पारम्परिक लाउडस्पीकरों से बजने वाले गीत -संगीत कर्णभेदी नहीं ,बल्कि कर्णप्रिय हुआ करते थे , उन सामान्य लाउडस्पीकरों से (माइक पर ) वक़्ता कई सार्वजनिक सभाओं को भी आराम से संबोधित कर लेते थे। हालांकि इन लाउडस्पीकरों से प्रसारित ध्वनियों से भी शोर मचता था ,लेकिन इस वह डीजे की तरह उतना भयंकर नहीं होता था।लेकिन अब तो ऐसा लगता है कि लाउडस्पीकरों को धता बताते हुए उनकी दुकानों पर डीजे नामक दानवी शोर मचाने वाले इन बक्सों ने कब्जा जमा लिया है। डीजे बक्सों से होने वाला यह कर्णभेदी ध्वनि प्रदूषण शहरों से दौड़ते हुए अब कस्बों और गाँवों तक भी पहुँच गया है। बारातों सहित तरह-तरह के सामाजिक -सांस्कृतिक-धार्मिक जलसों और जुलूसों में इनका धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। लोग वाहनों में एक साथ कई -कई डीजे बॉक्स लगवाकर इतना शोर मचवाते हैं कि कान के पर्दे फट सकते हैं और हॄदय रोगियों तथा नन्हें बच्चों के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुँच सकता है। गाहेबगाहे ऐसी ख़बरें आती भी रहती हैं । यह भी सुनने में आता है कि ऐसे प्राणघातक साउंड बॉक्स में गगनभेदी और दिल दहला देने वाले संगीत की धुनों पर आड़े-टेढ़े नाचने वाले कुछ लोग नशे की हालत में धमाल मचाते रहते हैं । उनके आस-पास से गुजरने वाले राहगीर और कामकाजी लोग परेशान होते रहते हैं। ऐसा भी सुनने को मिलता है कि इन डीजे वालों के रास्ते में संयोगवश आने -जाने वाले सामान्य नागरिक अपनी गाड़ियों के लिए कुछ साइड मांगने पर उनसे बदसलूकी भी की जाती है। डीजे के साउंड बक्सों का कुछ घंटों का किराया ही कई -कई हजार रुपयों का होता है और कहीं-कहीं आयोजक-प्रायोजक लोग लाखों रुपए भी खर्च कर देते हैं। सिर्फ़ कुछ देर के आनंद के लिए यह एक तरह की निर्मम फ़िज़ूलखर्ची नहीं तो और क्या है?। देश में पहले स्कूल -कॉलेजों की परीक्षाओं के मौसम में कोलाहल नियंत्रण अधिनियम के तहत ध्वनिविस्तारक यंत्रों पर प्रतिबंध लगा दिया जाता था ,ताकि विद्यार्थी शांतिपूर्ण माहौल में पढ़ाई करते हुए परीक्षा की तैयारी कर सकें । इस अधिनियम को सिर्फ़ परीक्षाओं के दिनों में ही नहीं ,बल्कि हमेशा लागू रहना चाहिए। मेरी अल्प जानकारी के अनुसार ध्वनि मापन का पैमाना डेसिबल है। शायद नियम ,अधिनियम भी बने हुए हैं कि एक निश्चित डेसिबल से ज़्यादा ध्वनि नहीं की जानी चाहिए ,लेकिन ....? विभिन्न प्रकार के जुलूसों की गाड़ियों में एक साथ बहुत सारे डीजे बॉक्स क्यों लगना चाहिए ?क्या एक या दो डीजे बॉक्स लगाने से काम नहीं चल सकता ? इससे ध्वनि प्रदूषण रुकेगा तो नहीं लेकिन शायद काफी हद तक कम हो जाएगा। इस बारे में सोचा जाना चाहिए। आलेख -स्वराज करुण (फोटो - इंटरनेट से साभार) <

(पुस्तक-चर्चा) मोर सुरता के गाँव ; माटी -महतारी की मर्मस्पर्शी छुअन (आलेख -स्वराज्य करुण)

मधु धांधी की छत्तीसगढ़ी कविताओं के संकलन 'मोर सुरता के गाँव' की रचनाओं में ग्राम्य जीवन का सामाजिक ,आर्थिक और प्राकृतिक परिवेश भी साकार हो उठा है। इन रचनाओं में छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति की सोंधी महक भी है और कई रचनाओं में किसानों और मज़दूरों के कठिन जीवन संघर्षों का हृदयस्पर्शी चित्रण भी हुआ है। मोर सुरता के गाँव - यानी मेरी यादों का गाँव। इस कविता संग्रह की सभी रचनाओं में माटी -महतारी की मर्मस्पर्शी छुअन है। उनकी रचनाएँ हमें अपनी जड़ों से जोड़ती हैं।
मधुर स्वभाव और मीठे स्वरों के कवि मधु धांधी का जन्म छत्तीसगढ़ के तत्कालीन अविभाजित रायपुर जिले में स्थित ग्राम पिसीद विकासखंड -कसडोल में 21 जून 1951 को हुआ था। यह गाँव और विकासखंड अब राज्य के बलौदाबाजार-कसडोल जिले में है। कवि मधु धांधी का निधन तीन अप्रैल 1977 को वर्तमान महासमुंद जिले में विकासखंड मुख्यालय पिथौरा से लगे हुए अपने गृहग्राम -खुटेरी में हुआ । उन दिनों यह गाँव और विकासखंड रायपुर जिले में शामिल था। मधु धांधी छत्तीसगढ़ में आंचलिक कवि सम्मेलनों के उभरते कवि थे। उनकी कुछ कविताएँ आंचलिक और राष्ट्रीय पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं , उन दिनों आकाशवाणी के रायपुर केन्द्र से उनके काव्य पाठ का प्रसारण भी हुआ। लेकिन उस दौर में संसाधनों की कमी के चलते उनकी अधिकांश रचनाओं का व्यापक रूप से प्रकाशन और प्रसारण नहीं हो पाया। हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं के मधुर गीतकार मधु धांधी के निधन के बाद उनके शोकसंतप्त मित्रों और शुभचिंतकों ने उनकी स्मृति में पिथौरा में साहित्य एवं सांस्कृतिक समिति का गठन किया ,जिसके तत्वावधान में उनका पहला कविता संग्रह 'हॄदय का पंछी ' अक्टूबर 1977 में प्रकाशित किया। यह उनकी 13 हिन्दी और 12 छत्तीसगढ़ी कविताओं का मिला -जुला संकलन था। लगभग पैंतालिस साल बाद वर्ष 2022 में उनकी 74 हिन्दी कविताओं का संग्रह 'मेरा सागर ;तुम्हारी कश्ती' और छत्तीसगढ़ी कविताओं का संग्रह 'मोर सुरता के गाँव' का प्रकाशन हुआ । इनमें से हिन्दी कविता -संग्रह वैभव प्रकाशन रायपुर द्वारा और छत्तीसगढ़ी कविता -संग्रह श्रृंखला साहित्य मंच ,पिथौरा द्वारा प्रकाशित किया गया। यह एक विडम्बना है कि उनके तीनों कविता -संग्रह उनके मरणोपरांत ही प्रकाशित हो पाए। मधु धांधी की 46 वीं पुण्यतिथि( तीन अप्रैल 2023 ) के मौके पर उन्हें याद करते हुए आज हम 'साहित्य -विशेष ' में विनम्र श्रद्धांजलि सहित उनकी 19 छत्तीसगढ़ी कविताओं के संकलन ' मोर सुरता के गाँव' की चर्चा कर रहे हैं। दिवंगत कवि के प्रथम संग्रह 'हॄदय का पंछी ' की छत्तीसगढ़ी कविताओं को भी इस संग्रह में सहेजा गया है। चूंकि 'हृदय का पंछी' का प्रकाशन 45 साल पहले (1977 में )हुआ था , इसलिए इन छत्तीसगढ़ी रचनाओं को संरक्षित करने की दृष्टि से इन्हें नये संग्रह में शामिल किया गया है। इन गीतों की तरह बाकी सात कविताओं में भी लोकजीवन की भावुक अभिव्यक्ति को भी हम महसूस कर सकते हैं।। आधुनिकता के इस दौर में , हम अपनी जीवनशैली में चाहे कितने ही शहरी क्यों न हो जाएँ, लेकिन हम में से अधिकांश अपने भीतर कहीं न कहीं स्वयं को अपने गाँवों में ही पाते हैं। नौकरी और रोजगार के लिए गाँव छोड़कर शहरों में जा बसे लोगों की जड़ें अपने गाँवों से अलग नहीं हो पाती। ऐसे में मधु धांधी के इस कविता संग्रह का शीर्षक गीत -'मोर सुरता के गाँव' पाठकों को उस गाँव की याद दिलाता है ,जहाँ आमा के मउरने लगे हैं। यानी आम के वृक्षों में मौर आने लगे हैं ।यानी यह वसंत का मौसम है - *तोर मया के मउरिस हे आमा रे राम , मोर सुरता गाँव आमा मउरे। मन के अजोध्या म सीता अउ राम , जिहाँ मया के राधा ,उहैं हावै श्याम।* अर्थात तेरी मया (प्रीत) के आम मउरने लगे हैं।मेरी यादों के गाँव में आम मउरने लगा है। सीता और राम मेरे मन के अयोध्या में हैं। जहाँ प्रेम की राधा होती है ,श्याम भी वहीं होता है। कवि ने 'मोर गाँव के दू चरवाहा 'शीर्षक अपने गीत में गाँव के मेहनतकश चरवाहों की कठिन दिनचर्या का वर्णन किया है , वहीं 'फेर पर गे संगी अकाल ' शीर्षक से ही स्पष्ट है कि यह रचना अकाल पीड़ित जनता की मनोदशा को प्रकट करती है । वर्ष 1972 के अपने एक गीत ' खेत -खेत ला पानी ' में कवि आव्हान करते हैं- *खेत -खेत ला पानी ,सब ला काम दव, जाए बर हे दूरिहा ,झन आराम लव। संगी -संगवारी हे भखरा ,हीरा ह , अबड़ पिराथे गा आँखी के पीरा ह। झन गोठियावव जात-पाँत के बात ला आँसू पोछव ,सुख -दुःख मा तो साथ दव।* यानी हर खेत को पानी और सबको रोजगार दो। बहुत दूर जाना है। आराम मत करो। जात-पाँत की बात मत करो ,जो आँखों को पीड़ा देती है। इसलिए पीड़ितों के आँसू पोछो और सुख -दुःख में उनका साथ दो। कवि देश की प्रगति की ओर भी लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं। उन्होंने इस गीत में आज़ादी के बाद देश में बने भाखड़ा नंगल और हीराकुद जैसे विशाल जलाशयों का उल्लेख किसानों के संगी -संगवारी के रूप में 'भखरा' और' हीरा' के नाम से किया है। लेकिन वह जनता को झूठे आश्वासन देने वालों से भी सावधान करते हैं और कहते हैं कि ऐसे लबरा (झूठे)लोगों के भाषणों से तुमने क्या पाया - *झन पतियाहू तुमन त असवासन ला , का पाए हव सुन -सुन लबरा भासन ला।* देश और प्रदेश की विषम परिस्थितियों ने कवि को व्यथित किया है। उनकी यह व्यथा इस गीत की आगे की पंक्तियों में छलक उठती है -- *गांधीजी के सपना ,सपना रहिगे , नेहरू जी के प्रिय गुलाब कछु कहिगे। छत्तीसगढ़ के बेटा मन सब सहिगे, बादर बिन बरसे के बरसे रहिगे।* संग्रह में - आँखी होगे बदरा,रोवत हे अंगना के दीयना ,आँखी बैरी ,सुरता के फाँस , और मोर टूट के घरौंदा माटी के जैसे प्रेम और विरह के गीत भी हैं ,जिनमें वियोग श्रृंगार की प्रधानता है , तो 'बाँचे हे चार दिन गवनवा हो ही 'जैसे गीत में जिस बेटी का गौना होने वाला है ,उसके साथ उसकी माँ का मर्मस्पर्शी संवाद भी । इसी तरह 'तोर सुरता के जंगल मा संगी' शीर्षक गीत में कवि ने नायक -नायिका के बीच सहज ,सरल श्रृंगार भावों से परिपूर्ण बातचीत को अपनी कल्पनाओं के कैनवास पर भावनाओं के रंगों से सजाया है। वहीं 'सीता हरण'शीर्षक लम्बी रचना में कवि ने माता सीता के अपहरण की घटना का मार्मिक चित्रण किया है। मधु धांधी की हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कविताओं की दुनिया हमारे और आपके परिवेश में ही रची -बसी हैं। उनके दोनों नये कविता संग्रहों की रचनाओं में माटी- महतारी की मर्मस्पर्शी छुअन के साथ दिलों को छू लेने वाली मानवीय संवेदनाओं की मोहक अभिव्यक्ति भी है। कवि तो भावुक होता ही है,लेकिन मुझे लगता है कि इन रचनाओं को पढ़कर पाठक भी स्वयं को भावुक होने से नहीं रोक पाएंगे! आलेख -- स्वराज्य करुण

Monday, September 4, 2023

(पुस्तक-चर्चा ) न्यूनतम शब्दों में अधिकतम कहने की हिम्मत रखती ये क्षणिकाएँ

(आलेख -स्वराज्य करुण) यह एक सच्चाई है कि दुनिया के प्रत्येक मनुष्य और यहाँ तक कि प्रत्येक जीव का जीवन क्षणभंगुर होता है। मेरी शुभकामना है कि सभी स्वस्थ रहें और दीर्घायु हों ,शतायु हों ,लेकिन इस हक़ीक़त से भला कौन इनकार कर सकता है कि अगले पल या अगले क्षण क्या होगा ,इसे कोई नहीं जानता । फिर भी एक बेहतर कल या सुखद भविष्य की आशाओं के साथ ,नई सुबह की उम्मीदों के साथ छोटे -छोटे और बड़े-बड़े सुखों और दुःखों की गठरी लेकर हम सब जिये चले जाते हैं। इस क्षणभंगुर जीवन की बड़ी -से बड़ी बातों को कुछ ही क्षणों में अपनी छोटी-छोटी क्षणिकाओं के माध्यम से बड़े सहज लेकिन प्रभावी ढंग से ,बड़ी ख़ूबसूरती से लिखना और कह देना शिवानंद महान्ती की एक बड़ी ख़ूबी थी। वे छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में स्थित पिथौरा कस्बे के निवासी थे।श्रृंखला साहित्य मंच ,पिथौरा की ओर से उनका पहला कविता -संग्रह 'संशय के बादल ' वर्ष 2018 में प्रकाशित हुआ था । उसमें भी उनकी अधिकांश रचनाएँ क्षणिकाओं के रूप में हैं । महासमुंद जिले में एक कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी उनकी पहचान और प्रतिष्ठा थी। हिन्दी कविता की क्षणिका-विधा के सिद्धहस्त और सशक्त हस्ताक्षर के रूप में छत्तीसगढ़ के साहित्यिक परिदृश्य में वह बड़ी तेजी से अपनी पहचान बना रहे थे। तभी दुर्भाग्यवश 11 अगस्त 2022 को रक्षाबंधन के पवित्र दिवस पर पिथौरा में सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल होने के बाद लगभग सौ किलोमीटर दूर राजधानी रायपुर के एक निजी अस्पताल में जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे। लेकिन तीसरे दिन यानी 14 अगस्त2022 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। ऐसा लगता है कि इस भयानक हादसे के साथ उनका हमसे सदैव के लिए बिछुड़ना भी कुछ ही क्षणों में हुआ। हम सब व्यथित हॄदय से कह सकते हैं कि देखते ही देखते यह सब 'कुछ ही क्षणों में ' घटित हो गया। इस हृदयविदारक हादसे में उनके निधन के लगभग एक वर्ष बाद उनकी क्षणिकाओं का यह संकलन 'कुछ ही क्षणों में' आपके सामने है। हालांकि उनके इस दूसरे संकलन में इस शीर्षक से उनकी कोई क्षणिका नहीं है । उनकी अब तक उपलब्ध कविताओं और क्षणिकाओं में भी इस शीर्षक से लिखी कोई रचना नहीं मिली है , लेकिन अपनी बातों को 'कुछ ही क्षणों में ' लिख देने और कह देने का उनका अभिव्यक्ति-कौशल संकलन की इन क्षणिकाओं में झलकता है, इसीलिए इस संग्रह का सम्पादन करते हुए मैंने इसका शीर्षक 'कुछ ही क्षणों में' दिया है । शिवानंद के साथ हुए जानलेवा सड़क हादसे ने मुझे भी बेहद विचलित और व्यथित करते हुए जीवन की क्षणभंगुरता का अहसास करवाया। मुझे लगा कि इंसान के साथ कुछ ही क्षणों में क्या से क्या हो जाता है !
शिवानंद की ये क्षणिकाएँ हमें उनसे जुड़ी अनेकानेक अमिट स्मृतियों से भी जोड़ती हैं। यह संग्रह उनकी प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर प्रकाशित हो रहा है। काश ! वे अपने जीवन-काल में स्वयं के इस दूसरे कविता -संग्रह (क्षणिका-संग्रह) को प्रकाशित होता हुआ देख पाते। लेकिन नियति ने उन्हें हमसे सदैव के लिए छीन लिया । मेरा मानना है कि साहित्य मनुष्य के मनोभावों की शाब्दिक अभिव्यक्ति है। कहानी ,उपन्यास ,निबंध और कविता भी साहित्य की अलग-अलग विधाएँ है। कविता हिन्दी साहित्य के क्रमिक विकास में गीत ,ग़ज़ल मुक्त छंद और अतुकांत कविता जैसे अलग -अलग रूपों में हमारे सामने आती रही है। पिछले कुछ दशकों में कविता का एक नया रूप 'क्षणिका'के रूप में प्रकट हुआ है। कोई भी सच्चा कवि स्वाभाविक रूप से भावुक होता है। वह अपने समय और समाज में घटित तरह -तरह की घटनाओं से भी प्रभावित होता है। अन्याय ,अत्याचार और सामाजिक विसंगतियों से आहत एक सच्चे कवि से कविता भावनाओं के आवेग में ही लिखी जाती है। मेरे विचार से किसी एक क्षण की भावुकता में रची गयी कोई छोटी कविता ही 'क्षणिका'होती है। अपने आस-पास के परिवेश से प्रभावित कवि में यह भावुकता क्षण भर में आती है ,तब अपनी भावुकता के इस क्षणिक उफान में कवि के शब्द 'क्षणिका' के रूप में अभिव्यक्त होते हैं ,जो पाठकों को विषय-वस्तु पर देर तक कुछ न कुछ सोचने के लिए मज़बूर कर देते हैं। शिवानंद महान्ती की इन क्षणिकाओं को भी हमें इसी नज़रिए से देखना और समझना चाहिए। इनमें व्यंग्य भी है और करुणा भी । समय और समाज की सच्चाइयों के बारे में न्यूनतम शब्दों में अधिकतम कह देने की हिम्मत शिवानंद की क्षणिकाओं में देखी जा सकती है। यह उनकी क्षणिकाओं की एक बड़ी ताकत भी है ,जिसे हम 'कुछ ही क्षणों में' शीर्षक से छपे इस संग्रह में महसूस कर सकते हैं। ।संग्रह में शामिल शिवानंद की क्षणिकाएँ हमें मानवीय संवेदनाओं से जोड़ती हैं। संग्रह में उनकी 40 क्षणिकाएँ शामिल हैं। उनकी अधिकांश क्षणिकाएँ हमारे समाज में हो रही व्यथित कर देने वाली विसंगतिपूर्ण हलचल की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करती हैं । ये क्षणिकाएँ कवि बिहारी की रचना "बिहारी सतसइ' के इस दोहे को चरितार्थ करती हैं ,जिसमें वे कहते हैं- सतसइया के दोहरे ,ज्यों नावक के तीर देखन में छोटे लगें ,घाव करें गंभीर । आजकल के छल-प्रपंच की सियासी तिजारत को देखकर शिवानंद महान्ती के भीतर का कवि आहत भी है और आक्रोशित भी । वह उस समाज की बात कहता है ,जिसका मन इन विसंगतियों को देखकर खौल रहा है और निराशा के अंधेरे में सुख की संभावनाओं को टटोल रहा है । इसकी बानगी 'निराशा के अंधेरे में शीर्षक उनकी इस क्षणिका में देखिए - कदम जो कभी टिकते नहीं थे , अब जम गए हैं अंगद के पैरों की तरह ! दिन जो गुज़र जाते थे देखते ही देखते , बमुश्किल गुज़र रहे है वक़्त को देखते -देखते! उम्मीद की किरणों का विशाल बरगद के पीछे लुकाछिपी का खेल चल रहा है! छल -प्रपंच की सियासी तिज़ारत को देखकर हम मन ही मन खौल रहे हैं , निराशा के अंधेरे में सुख की संभावनाओं को टटोल रहे हैं। महँगाई से परेशान जनता की ओर से अपनी एक बहुत छोटी क्षणिका में कवि की गुजारिश है कि बारिश तमाम मुसीबतों का साथ इस महँगाई को भी बहा कर ले जाए -- मुसीबतें सारे जहाँ की ले जाओ , ऐ बारिश ,महँगाई को बहा कर ले जाओ! कवि छत्तीसगढ़ शासन द्वारा महासमुंद जिला जेल के लिए मनोनीत अशासकीय संदर्शक भी रहे हैं।उस दौरान समय -समय पर जेल विजिट करते समय उन्होंने जेल के बाहर बाहर अपने बन्दी परिजनों से मिलने आए लोगों के चेहरों के भावों को ध्यान से पढ़ा और उनकी मनोदशा को दिल की गहराइयों से महसूस भी किया । यह सब 'जेल के बाहर' शीर्षक उनकी इस क्षणिका में प्रकट हुआ है - याचना ,उद्विग्नता, उत्सुकता, कुंठा , कुछ समय का ही है हालाँकि ठहराव, अलग -अलग चेहरों के अलग-अलग भाव ! संभावनाओं और आशंकाओं के वातायन में चकरघिन्नी-सा उलझा हुआ अशांत मन ! मैंने देखे जेल के बाहर प्रतीक्षा रत बंदियों के अनेक परिजन ! कवि आर्थिक विषमता के इस युग मे पैसों के अभाव में अस्पतालों में दम तोड़ते मरीजों और बारिश के अभाव में सूखती फसलों के बीच किसानों की वेदना से भी व्यथित है । उसकी यह पीड़ा इस क्षणिका में प्रकट होती है -- दवाइयों के अभाव में अस्पतालों में दम तोड़ते मरीजों के परिजनों की वेदना जैसी ही होती है बारिश के अभाव में सूखते खेतों में दम तोड़ती फसलों के साथ किसानों की वेदना ! वह कवि ही क्या ,जो आम जनता की तरह आज के निराशाजनक माहौल से व्यथित न हो ? शिवानंद की क्षणिकाओं में जनता की यह व्यथा उभर कर आती है। अपनी बहुत छोटी -सी इस क्षणिका में उन्होंने लिखा है -- इधर हमारी राष्ट्रभक्ति ख़तरे में पड़ जाती है, उधर पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ जाती हैं ! कवि शिवानंद आज की सियासत में बेशर्मी की हद तक व्याप्त फूहड़ता से भी बेहद विचलित है वह 'बेशर्म सियासत की नग्नता ' शीर्षक अपनी क्षणिका में कहते हैं - शर्मसार कर रही है बयानों की अशोभनीयता, सवालों के तिलस्म में उलझ गयी है सच्चाई की विश्वसनीयता ! पक्ष और विपक्ष के पुतलों में लग रही है रोज -रोज आग , दिखने लगी हम्माम के बाहर भी बेशर्म सियासत की नग्नता ! कवि शिवानंद ने स्वयं कोरोना की महामारी को झेला था। संग्रह में शामिल उनकी 40 क्षणिकाओं में से 13 क्षणिकाएँ वर्ष 2020-21 के कोरोना काल की त्रासदी से जूझती दुनिया पर केन्द्रित हैं ,जिनमें से कुछ में कवि का अपना दर्द भी छलक उठता है ,जबकि 10 क्षणिकाओं का संकलन उनके प्रथम कविता संग्रह'संशय के बादल' से भी किया गया है । शिवानंद महान्ती अब हमारे बीच नहीं हैं। उन्हें इस भौतिक संसार से गए एक साल देखते ही देखते 'कुछ ही क्षणों में' बीत गया । लेकिन हम जैसे उनके चाहने वालों को लगता ही नहीं कि वे अब दुनिया में नहीं हैं ।फिर भी हक़ीक़त तो हक़ीक़त है। उनका जाना कुछ ही क्षणों में हुआ जो सबको व्यथित कर गया। उनकी पहली पुण्यतिथि (14 अगस्त 2023 ) को ध्यान में रखकर श्रृंखला साहित्य मंच ने महान्ती परिवार के सहयोग से इस क्षणिका संग्रह का प्रकाशन किया था ,लेकिन कुछ धार्मिक मान्यताओं और रीति रिवाजों के अनुसार परिजनों ने उनकी पहली बरसी का कार्यक्रम उनके गृहनगर पिथौरा में 2 सितम्बर 2023 को रखा और इसी अवसर पर उनके क्षणिका -संग्रह का विमोचन भी हुआ। वरिष्ठ साहित्यकार जी. आर. राना विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। अध्यक्षता छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ भाषा विज्ञानी डॉ. चित्तरंजन कर ने की ।विशेष अतिथि के रूप में साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष ईश्वर सिंह दोस्त और रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार पूर्णचन्द्र रथ उपस्थित थे। विमोचन समारोह पिथौरा स्थित गुरु तेगबहादुर सभा-भवन में हुआ ,जहाँ पिथौरा क्षेत्र सहित सम्पूर्ण महासमुंद जिले के अनेक साहित्यकारो और साहित्य प्रेमी प्रबुद्धजन बड़ी संख्या में शामिल हुए। -स्वराज्य करुण सम्पादक -'कुछ ही क्षणों में' श्रृंखला साहित्य मंच ,पिथौरा ********

Monday, July 24, 2023

(आलेख)क्या नदियों को आपस में नहीं जोड़ा जा सकता ?

(आलेख -स्वराज करुण) नदियाँ अगर धीरे बहें तो सुहावनी और उफनती हुई बहें तो डरावनी लगती हैं। लेकिन प्रकृति की व्यवस्था ही ऐसी है कि बारिश के मौसम में बादलों को बरसने से और नदियों को उफनने से नहीं रोका जा सकता। बरसात में जल से लबालब नदियाँ किसानों और उनके खेतों के लिए वरदान साबित होती हैं ,लेकिन अगर छलकते हुए वह सैलाब में तब्दील हो जाऍं तो ? इस वर्ष भी देश के कई राज्यों के कुछ इलाकों में इन दिनों भारी वर्षा से नदियों में आया सैलाब कहर बनकर जन जीवन को अस्त-व्यस्त कर रहा है।
अगर देश की नदियों को एक -दूसरे से जोड़ दिया जाए तो किसी नदी में बाढ़ की स्थिति बनने पर उसका अतिरिक्त पानी दूसरी नदी में भेजकर खतरे को कम किया जा सकता है। कुछ दशक पहले इसकी संभावनाओं पर विशेषज्ञों के बीच विचार -विमर्श भी हुआ करता था।नदी जोड़ो अभियान की भी चर्चा होती थी। लेकिन अब खामोशी है। क्या नहरों का जाल बिछाकर नदियों को आपस में नहीं जोड़ा जा सकता ? इसकी संभावनाओं पर सबको मिलकर विचार करना और रास्ता निकालना चाहिए। छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती ओंग सेतु पर मोबाइल कैमरे से मेरी आँखन देखी ये तीन तस्वीरें पिछले साल के आज ही के दिन की हैं । यह पश्चिम ओड़िशा में इठलाती,बलखाती ओंग नदी और उस पर बने पुल का नज़ारा है। ओंग सेतु छत्तीसगढ़ के तहसील मुख्यालय बसना से बलांगीर मार्ग पर लगभग 22 वें किलोमीटर पर है। ओंग नदी गर्मियों में एकदम सूख जाती है।यह छत्तीसगढ़ और ओड़िशा की जीवन -रेखा महानदी की सहायक है। - स्वराज करुण