Tuesday, March 10, 2026

(कविता ) बोलो, तानाशाह ! तुम कब मरोगे (कवि -स्वराज्य करुण )

 बोलो तानाशाह ! तुम कब मरोगे ?

 (कविता : स्वराज्य करुण )

        *****

जब मरोगे तब 

कितनी ज़मीन, कितने जंगल 

कितनी नदियाँ, कितने पहाड़ 

कितनी खदानें और कितने 

देश अपने साथ लेकर 

दुनिया से जाओगे?

बोलो,  तानाशाह!

क्या  तुम्हें शर्म नहीं आती ,

जो निरीह ,निःशस्त्र मनुष्यों की हत्या 

करवाके भी बड़ी बेशर्मी से  

अपनी पथराई आँखों और 

ख़ून के प्यासे होठों  से

मुस्कुराते रहते हो ? 

तुम्हारी सेनाएं छोटे -छोटे देशों के 

शहरों ,कस्बों और गाँवों पर बमों की 

बरसात करके मासूम बच्चों को

अनाथ कर जाती हैं ।

हवाई हमलों के जरिए 

चहल -पहल से भरी मानव बस्तियों 

को बदल देती हैं श्मशानों में!

तुम्हारे सैनिक आकाश मार्ग से

जमीन पर उतरकर तुम्हारे आदेश पर 

महिलाओं ,बच्चों ,जवानों और 

बुजुर्गों को बेरहमी से मार डालते हैं! 

वो जब मनुष्यों पर इतना ज़ुल्म ढाते हैं 

तो फिर वहाँ उनके जुल्मों के 

आगे  मूक ,निरीह जानवरों ,

चहकते पंछियों और 

हरे भरे वृक्षों , जल से भरी नदियों , 

का क्रंदन कौन सुनेगा ?

तुम्हारे हमलावर फौजियों के 

खूनी पंजों में छटपटाती 

प्रकृति का रुदन कौन सुनेगा ?

तानाशाह फिर भी अपने 

वातानुकूलित 'वार रूम ' में 

बैठ कर तबाही के खूनी नज़ारों को , 

कत्ल होती इंसानियत को 

ठंडी हवाओं के बीच

शराब की चुस्कियों के साथ 

रुपहले स्क्रीन पर देखते हुए 

मुस्कुराते रहते हो,

नाचते, गाते, मस्ती करते रहते हो !

बमों के धमाकों और बारूद से 

भरे आसमान को देखकर भी 

नहीं दहलता तुम्हारा दिल !

रोते बिलखते बच्चों और

बदहवास माताओं को स्क्रीन पर 

देखकर भी नहीं पसीजता तुम्हारा दिल !

बोलो तानाशाह !

क्या तानाशाहों को 

कभी रोना नहीं आता ? 

क्या तानाशाहों के माँ -बाप,

बीवी -बच्चे,भाई -बहन और 

घर -परिवार नहीं होते?

दुनिया से इंसानी ज़िन्दगी को  

मिटाने पर आमादा तानाशाह ! 

क्या तुम्हें आत्मग्लानि नहीं होती ?

तुम्हें तो शर्म से और पीड़ितों की 

आहों से मर जाना चाहिए !

बोलो ,तानाशाह!तुम कब मरोगे ?

जल्दी मरो...!

हम तुम्हारी मौत की कामना करते हैं।

-- स्वराज्य करुण

Sunday, March 8, 2026

(आलेख )भूले -बिसरे कवि वेणु जी से जुड़ी कुछ यादें /लेखक -स्वराज्य करुण

 'तुम वीणा मैं बांसुरी' और 'श्रुति कीर्ति' 

 जैसी कई कृतियों के रचनाकार थे वेणु जी 

       आलेख  - स्वराज्य करुण 

क्या आप रूपनारायण वर्मा 'वेणु 'को जानते हैं? छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बिरादरी में नई पीढ़ी के अधिकांश कवियों और साहित्यिक अभिरुचि के लोगों ने उनका नाम भी शायद नहीं सुना होगा । वे बहुत सहज -सरल और सौम्य स्वभाव के कवि थे । रायपुर में आज से 105 साल पहले,वर्ष 1921में जन्मे थे । यहीं उनकी साहित्य -साधना 1935 में शुरु हुई थी । आजीवन रायपुर में रहकर ही उन्होंने काव्य सृजन किया। उनकी कई कृतियाँ प्रकाशित हुईं. शहर के साहित्यिक आयोजनों में भी वे शामिल होते थे। उन दिनों शहर इतना अधिक फैला हुआ नहीं था । सड़कों पर आज की तरह लोगों की और तरह -तरह की तेज रफ्तार मोटर गाड़ियों की भयंकर भीड़ नहीं होती थी। 

सड़कें चौड़ी भले ही कम थी, लेकिन खुली -खुली -सी लगती थीं।लोग एक मोहल्ले से दूसरे या तीसरे मोहल्ले तक बड़े आराम से साइकिलों पर या पैदल ही आया -जाया करते थे।मुझे कुछ -कुछ याद है,नाटे कद के वेणु जी गांधी टोपी और खादी का धोती -कुर्ता पहनकर पैदल ही  शहर का भ्रमण करते हुए अपने मित्रों और परिचितों से बड़ी आत्मीयता से मिलते थे।वे पैदल ही स्थानीय दैनिक अख़बारों के दफ्तरों में जाकर सम्पादकों को अपनी कविताएँ दे आते थे। स्थानीय वरिष्ठ जनों में भी उनका बड़ा सम्मान था, लेकिन समय की तेज रफ़्तार ने उन्हें भुला दिया ।


                                             


ऐसे समर्पित साहित्य साधक,  भूले -बिसरे कवि रूपनारायण वर्मा 'वेणु ' के 52 छोटे -बड़े गीतों का संकलन 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' का प्रकाशन 41साल पहले विजयादशमी के दिन 23अक्टूबर 1985 को हुआ था। उन्होंने  6 सितम्बर 1986 के दिन मुझे यह किताब और  अपने खण्ड काव्य 'श्रुतिकीर्ति 'की एक सौजन्य प्रति भी सस्नेह अपने हस्ताक्षर के साथ भेंट की थी । इस खण्ड काव्य के अंतिम आवरण पृष्ठ पर वेणु जी के फोटो के साथ उनका साहित्यिक परिचय भी प्रकाशित हुआ है ।सूक्तियों और लघु कथाओं का उनका संकलन 'ज्योति निर्झर'  वर्ष 1971 में प्रकाशित हुआ. यह उनकी पहली प्रकाशित कृति थी, जिसे नागपुर के धनवटे चेम्बर्स, सीतावर्डी स्थित विश्व भारती प्रकाशन ने प्रकाशित किया था।

उनकी दूसरी कृति ' सहस्त्र सुमन ' वर्ष 1981 में छपी , जिसके प्रकाशक वे स्वयं थे ।

वेणु जी की तीसरी पुस्तक खण्ड काव्य 'श्रुति कीर्ति 'का प्रकाशन वर्ष 1982 में हुआ, जिसके प्रकाशक गणेशराम नगर, रायपुर के डॉ.लक्ष्मण बजाज थे।कवि ने इसे भाव प्रधान काव्य के रूप में लिखा है। उनके परिचय में इसे  खण्ड -काव्य भी बताया गया है, जो भगवान श्रीराम के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न की धर्मपत्नी श्रुतिकीर्ति पर केंद्रित है और मुक्त छन्द में है. उस पर फिर कभी  अलग से लिखूँगा ।अभी तो वेणु जी के गीत -संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' की चर्चा करना चाहता हूँ ।

     वेणु जी ने अपना यह गीत -संग्रह  गुरुदेव  रवीन्द्र नाथ ठाकुर की पावन स्मृति को समर्पित किया है।   इस गीत -संकलन के प्रकाशक, प्रचारक और वितरक 'वेणु' जी के मित्र गणेशराम नगर, रायपुर के डॉ. लक्ष्मण बजाज थे । यह पुस्तक 60 पेज की है । उन दिनों इसकी कीमत केवल छह रूपए थी । 

    

  *वेणुजी रस सिद्ध कवि थे* 

                     ******

     उनके इस गीत -संकलन  में 'पुरोवाच ' लिखा है पीएच -डी. और डी. लिट. की उपाधि प्राप्त डॉ. विष्णुप्रसाद पाण्डेय ने,  जो  उन दिनों शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, दुर्ग में हिन्दी के प्राध्यापक हुआ करते थे। उन्होंने  लिखा है -"वेणु जी ने छायावादी रोमांटिक कविता के माध्यम से साहित्य -संसार में प्रवेश किया और प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, रहस्यवाद तथा मांसलवाद की धाराओं में अपनी कविता का ताना -बाना बुनते आ रहे हैं ।.... वेणु जी में जनजीवन की ज्योति का चितेरापन है। उनके अन्तः करण में भावमयी सरिता की स्नातकता है ।.... वेणु जी रस सिद्ध कवि हैं।वेणु जी की इन कविताओं में जान है और वे उदात्त संरचनाओं की परम्परा की रक्षा करती हैं । 

        *मैं अपना परिचय क्या दूँ?*

         गीत -संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' में अपने परिचय के अंतर्गत वेणु जी लिखते हैं -

    "मैं अपना परिचय क्या दूँ ? मैं उस वीणा वादिनी की वीणा का तार हूँ, जिसमें जीवन के स्वर निकलते हैं।तुम उस युग की वंशी हो, जिसमें कई छिद्र हैं। उस जगत जननी भगवती माँ भारती की सेवा का ही प्रत्यक्ष फल है, जो मैं आप लोगों के बीच रहकर प्रति वर्ष उस कल्याणी माँ को एक पुष्प चढ़ाता हूँ, जिसके रजकण के प्रताप से मेरे  निरगंध फूल सुरभित हो उठते हैं ।....कवि  लिखते हैं -मेरे जीवन की अंतिम इच्छा यह है कि मेरे जीते जी मेरी सभी कृतियाँ प्रकाश में आ जाएँ।भारतीय परम्परा के अनुसार जीवित व्यक्ति का मूल्यांकन बहुत कम होता है, लोग मृत्यु होने की बाट देखते रहते हैं ।मेरी कृतियाँ मेरी हृदयतंत्री की आवाज़ है, जिसमें जीवन के सूक्ष्म तत्वों के दर्शन होंगे । वीणा बजाने वाला कुशल होना चाहिए । हे जगत नियन्ता! तुम वीणा हो और मैं श्याम सुन्दर की हूँ वेणु, जिसमें गोपियाँ तथा गोप भी हृदय तंत्री निहित हैं ।' तुम वीणा मैं बांसुरी' मानव जीवन को विकसित करने में समर्थ होगी, ऐसा पूर्ण विश्वास है ।   

-विनयावत -रूपनारायण वर्मा वेणु "

 वहीं ' उन्होंने स्वयं को 'माँ भारती के कंठहार का पुष्प' बताते हुए 'आत्म निवेदन ' शीर्षक एक अन्य वक्तव्य में लिखा है -"उस वीणा वादिनी के श्रीचरणों से सुवासित 'तुम वीणा मैं बांसुरी '(भाव प्रधान गीत संकलन )रख रहा हूँ, जिसमें जीवन के तथ्य एवं सूक्ष्म तत्वों पर विचार किया गया है ।  मेरी इस भाव प्रधान कृति में जीवन दर्शन और प्रकृति सौन्दर्य के सूक्ष्म तत्व विद्यमान हैं । उन्होंने इस पुस्तक में भूमिका लेखन के लिए डॉ. विष्णु प्रसाद पाण्डेय, परिचय लेखन के लिए प्रतिभा गुप्ता, सम्मति लेखन के लिए प्रतिभा तिवारी, आवरण और चित्र सज्जा के लिए अपने मित्र दीनदयाल सोनी सहित सभी सहयोगियों और मार्ग प्रदर्शक साहित्यकारों के प्रति आभार व्यक्त किया है ।

   बहरहाल, अब हम वेणुजी के इस गीत -संकलन में प्रकाशित  रचनाओं को देखें । इनमें कवि ने अपने मनोभावों के जरिए आशा -निराशा और हर्ष -विषाद सहित मानव जीवन के अनेक रंगों का समावेश किया है ।उनका पहला गीत 'वीणा वादिनी 'शीर्षक से देवी सरस्वती को समर्पित है । 

पृष्ठ 2पर प्रकाशित उनके दूसरे गीत में छायावादी स्वर की अनुगूंज है -

*मैं तुम्हारा दीप बनकर जल रहा हूँ । 

  निशा जाती मुझको लेकर,

  मैं तड़फता तुमको देखकर,

  तुम चले हो अस्ताचल को,

  मैं भी बुझता जा रहा हूँ । *


आगे की रचनाओं में से एक आज के समाज में व्याप्त नारी -उत्पीड़न और भूख से तड़फते इंसानों को लेकर है. इन गंभीर समस्याओं से आहत वेणु जी का कवि -हृदय अपने  संकलन के पृष्ठ 3पर कहता है -

     *मानव मिला न अब तक कोई 

       जो मानव कहलाए । 

       एक नारी की लाज लुट रही,

       एक खड़ी मुस्काये । 

       हँस -हँस फूल लुटाये साजन,

       एक पड़ा कुम्हलाये । 

       एक दारुण दुःख से तड़फे,

       एक खड़ा मुस्काये । 

        एक तरसता दाने -दाने,

       एक अन्न को ठुकराये । 

        जो जग की आँखों का काँटा था,

        वह फूल बन मुस्काये । 


संकलन के पृष्ठ 16 में एक छोटा -सा गीत हमें जीवन के संघर्षो को, दुःख -दर्दो को हँसते हुए झेल जाने की सीख देता है -

    *मैंने तो हँसना सीखा है । 

     दुःख -दर्दों को झेल -झेल कर 

      आगे बढ़ना सीखा है । 

      आई आँधी मुझे गिराने 

     आया शीत मुझे कँपाने,

     गिर -गिर उठना सीखा है ।* 

  

वेणु जी का कवि इस संसार को छल से भरा मानता है । पृष्ठ 19 में प्रकाशित गीत में यह भावना प्रकट होती है -

*छल भरा संसार तेरा,

 रूप में छल, मृत्यु में छल,

 जीवन हो गया मेरा गरल,

  दुःख भरा संसार तेरा । 

 मैं तुम्हारे रूप में मिल रहा हूँ,

 मैं तुम्हारी याद में घुल रहा हूँ,

  छल भरा अभिसार तेरा । 


गीत संग्रह के पृष्ठ 17 में छपी अपनी रचना में कवि की भावनाओं को महसूस कीजिए -

   * तुम मुझे पाषण रहने दो । 

    मुझे जीवन न दो,

     मुझे सूरत न दो,

    मेरा अभिमान रहने दो । 

    मेरा संसार है मंगल,

    मेरा व्यवहार है उज्ज्वल,

    मेरी वाणी है निश्छल,

   उसे तुम रस में भरने दो । 

    तुम्हारे प्यार में छल है,

    तुम्हारा जीवन छलमय है,

    मुझे तुम दूर रहने दो । 

     मुझे वरदान नहीं होना,

     मुझे श्रृंगार नहीं होना,

     मैं उस रूप का अनुगामी,

    मुझे तुम उसमें मिलने दो । *


संकलन के पृष्ठ 28 में 'गोस्वामी तुलसीदास जी के प्रति' और पृष्ठ 30 में  महाकवि 'निराला 'जी के प्रति ' शीर्षक गीत में दोनों महाकवियों के सम्मान में वेणु जी ने अपनी भावनाएँ व्यक्त की हैं । पृष्ठ 33 में  'बसंत के प्रति 'शीर्षक से प्रकाशित गीत में विरह वेदना से पीड़ित नायिका बसंत के वातावरण में अपनी सखी से बातचीत करते हुए अपनी मनोव्यथा प्रकट करती है  । इस गीत का प्रारंभिक अंश -

*नभ में लाली क्यों दौड़ रही,

बताओ सखी मुझको आकर,

मैं दिन -रात सुखूं हे आली,

वे आये न अपने निज गृह पर । 

सखी बोली -सुन हे तू प्यारी,

है जंगल में ऋतु बसंत,

चंदा जो हँसता आज यहाँ,

वह भी भूला है राग -रंग  । *


वेणु जी पृष्ठ 35 पर प्रकाशित  अपने 40 वें गीत में हताश -निराश मनुष्य का मनोबल बढ़ाते हुए कहते हैं -

  *अमृत पुत्र होकर भी तुम 

     क्यों अंगारों से डरते हो । 

     कितने युद्ध तुम देख चुके,

     कितने देखोगे जीवन में  । 

     कितने कंटक पथ पार किये,

     कितनी विपदा आई मग में  । 

     मैं उसी भस्म का बना हुआ,

     जिसको शिव रोज चढ़ाते हैं  । 

     मरघट में खुशी मनाते हैं,

    तुम उसी शिवा के अग्नि नेत्र,

    फिर क्यों उनसे डरते हो  । *


कवि रूपनारायण वर्मा 'वेणु ' के गीत आकाशवाणी रायपुर से भी प्रसारित हुए थे।समय -समय पर अनेक पत्र -पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें दैनिक नवभारत, नईदुनिया,देशबन्धु, युगधर्म, महाकोशल, अक्षत, मध्यप्रदेश संदेश, आयुर्वेद -विकास, धन्वंतरि, सुधा निधि, आयुर्वेद महासम्मेलन पत्रिका आदि शामिल हैं, जिनमें उनके गीतों, लघु कथाओं और लेखों का प्रकाशन हुआ।आयुर्वेद से संबंधित पत्रिकाओं में उनकी रचनाओं के प्रकाशन से ऐसा लगता है कि देश की इस अत्यंत प्राचीन चिकित्सा पद्धति में भी उनकी गहरी दिलचस्पी रही होगी, हालांकि इस बारे में उनसे पूछने का मौका मुझे नहीं मिला।

   छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बिरादरी  उम्मीद की जानी चाहिए कि वह अपने भूले -बिसरे कवि वेणु जी को याद रखने के लिए उनकी अप्रकाशित रचनाओं की खोज -ख़बर लेकर उन्हें प्रकाशित करने का प्रयास करेगी।जो समाज अपने साहित्यकारों को और उनके साहित्य को याद रखता है, उस समाज की मानवीय संवेदनाएँ भी बनी रहती हैं और सामाजिक समरसता के साथ उसकी संस्कृति भी सुरक्षित रहती है।

-स्वराज्य करुण 

Saturday, March 7, 2026

(आलेख ) श्री राम चरित मानस के 'अरण्य काण्ड ' और 'सुन्दर काण्ड 'का हुआ उड़िया अनुवाद /लेखक -स्वराज्य करुण )

 

छत्तीसगढ़ के बाबा विष्णु शरण 65 साल पहले 

कर चुके थे  उड़िया भाषा में सम्पूर्ण 'मानस 'का अनुवाद 

           (आलेख  -स्वराज्य करुण )

गोस्वामी तुलसीदास के अवधी में रचित महाकाव्य श्रीरामचरित मानस की लोकप्रियता बहुत दूर तक फैली हुई है. छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार स्वर्गीय बाबा विष्णु शरण ने इस महाकाव्य के तृतीय सोपान 'अरण्य काण्ड ' और पंचम सोपान 'सुन्दर काण्ड ' का ओड़िया भाषा में अनुवाद किया था, जो उनके निधन के लगभग 37 साल बाद वर्ष 2024 में प्रकाशित हुआ. दोनों अनुवाद देवनागरी लिपि में छपे हैं. वैसे तो बाबा विष्णु शरण ने आज से 65 साल पहले वर्ष 1961में श्री रामचरित मानस का उड़िया में शाब्दिक अनुवाद कर लिया था, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के कारण प्रकाशन संभव नहीं हो पा रहा था.

                              

               


इसमें से इन दो सोपानों को बसना (जिला -महासमुन्द )स्थित मानव मंगल संस्थान ने प्रकाशित किया है.बाबा के प्रमुख शिष्य और संस्थान के अध्यक्ष नारायण प्रसाद नैरोजी ने दोनों पुस्तकों में 'दो शब्द ' शीर्षक अपने वक्तव्य में लिखा है कि बसना क्षेत्र से बाबा (विष्णु शरण जी )का विशेष लगाव रहा, बाबा ने इस क्षेत्र की उड़िया भाषा भाषी जनता को श्रीमद गोस्वामी तुलसीदास विरचित रामचरित मानस के जीवन दर्शन, भक्ति और ज्ञान से लाभान्वित करने के लिए उड़िया भाषा में सन 1961में उसका शब्दशःछन्दबद्ध अनुवाद किया था, जिसे प्रकाशित कर आम जनता में वितरित करनाचाहते थे.परन्तु अर्थाभाव के कारण यह संभव नहीं हो सका. अब उनकी स्मृति में स्थापित मानव मंगल संस्थान, बसना द्वारा छत्तीसगढ़ सर्व उड़िया समाज के अध्यक्ष एवं रायपुर उत्तर के विधायक श्री पुरन्दर मिश्रा जी के सौजन्य से सिर्फ़ ' सुन्दर काण्ड ' का प्रकाशन किया जा रहा है. हमें विश्वास है कि उड़िया भाषा भाषी भक्तगण इसे गाकर, पाठ कर हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त कर सकेंगे. इसी कड़ी में 'अरण्य काण्ड' में ' दो शब्द 'शीर्षक अपने वक्तव्य में श्री नैरोजी ने लिखा है कि डॉ. संध्या राजेन्द्र राघवेन्द्र भोई, सरायपाली तथा नैरोजी परिवार, देवरी (पिलवापाली )एवं गणेशपुर के सौजन्य से सिर्फ़ 'अरण्य काण्ड ' का प्रकाशन किया जा रहा है. हमें विश्वास है कि उड़िया भाषा भाषी भक्तगण इसे गाकर, पाठकर भक्ति पथ पर अग्रसर होंगे.

         

                                                     



                                     *कवि, लेखक और पत्रकार भी रहे विष्णु शरण*

                                                     *****

      उल्लेखनीय है कि बाबा विष्णु शरण छत्तीसगढ़ के धीर -गंभीर सर्वोदयी विचारक,अध्यापक, वरिष्ठ कवि,लेखक और पत्रकार थे. उनका जन्म बसना क्षेत्र के ग्राम पझरापाली में 19 सितम्बर 1919 को हुआ था. अपनी 69 वर्षीय जीवन यात्रा को अपने साधना कुटीर बसना में 7नवम्बर 1988 को पूर्ण विराम देकर वे ब्रम्हलीन हो गए .  उनके हिन्दी कविता संग्रहों में वर्ष 1986 में प्रकाशित 'पंचविंशिका', वर्ष 1988में प्रकाशित 'युगे -युगे ' और ' प्राणाधिके' शामिल है. इन तीनों संग्रहों के प्रकाशक श्री गोपेश्वर प्रसाद नैरोजी हैं.बाबा विष्णु शरण के देहावसान के कुछ महीनों बाद मई 1989 में 'यमुना तीरे 'का प्रकाशन हुआ, जबकि 35 साल बाद वर्ष 2023 में उनका एक और हिन्दी कविता -संग्रह 'धीर -समीरे ' वैभव प्रकाशन, रायपुर द्वारा प्रकाशित किया गया.बाबा जी के गहन दार्शनिक और आध्यात्मिक आलेखों के संकलन 'ज्ञान गंगा ' का प्रकाशन  उनके निधन के करीब 5साल बाद सितम्बर 1993 में मानव मंगल साधना संस्थान, बसना द्वारा किया गया. इसमें प्रकाशित जीवन परिचय में उनके शिष्य नारायण प्रसाद नैरोजी ने बताया  है कि बाबा विष्णु शरण वैष्णव वंशी थे. उनके पिता भरत दास उड़िया भाषा के कुशल कवि और हिन्दी साहित्य के विदग्ध मर्मज्ञ थे. अनुताप तरंग, गौर संकीर्तन, मंगलास्तव, संबलेश्वरी जणाण, कृष्ण -सुदामा पांडवंकर भातृ -प्रेम आदि उड़िया में इनकी जन -प्रिय पुस्तकें हैं. 

      हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से साहित्य रत्न की उपाधि प्राप्त बाबा विष्णु शरण रायपुर के शासकीय नार्मल स्कूल में अध्यापक भी रहे. उन्हें   महात्मा गांधी की बुनियादी शिक्षा योजना का रायपुर जिला संयोजक भी बनाया गया था. अध्यापन कार्य के प्रशिक्षण के लिए वे गांधीजी के सेवाग्राम वर्धा में भी रहे, जहाँ महात्मा गांधी के जीवन -दर्शन का उन पर गहरा असर हुआ. सेवाग्राम में उन्हें महात्मा गांधी सहित दादा कृपलानी, आर्य नायकम, कुमारप्पा आदि कई विद्वानों का भी सानिध्य मिला. 

         बाबा विष्णु शरण ने रायपुर में वर्ष 1950 में  ठाकुर प्यारेलाल सिंह  के अर्ध -साप्ताहिक 'राष्ट्रबन्धु' में सहयोगी सम्पादक के रूप में पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपनी अहम भूमिका निभाई. वर्ष 1959 -60 में बाबा विष्णु शरण को रायपुर जिला सर्वोदय मंडल का जिला संयोजक बनाया गया. इस महत्वपूर्ण दायित्व का भी उन्होंने बखूबी निर्वहन किया. उनकी लोकप्रियता सिर्फ़ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं थी, बल्कि मध्यप्रदेश के इंदौर, उज्जैन और सोनकच्छ तक उनकी प्रसिद्धि का विस्तार हुआ.उनके कविता -संग्रहों 'प्राणाधि के ' और 'युगे -युगे ' का लोकार्पण 21 मई 1988 को इंदौर में हुआ. लोकार्पण समारोह विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के हिन्दी विभाग और हिन्दी साहित्य समिति इंदौर द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था.बाबाजी अपने शिष्यों के आग्रह पर 29 नवम्बर 1986 से 16 जनवरी 1987 तक इंदौर प्रवास पर थे. इस दौरान उनके प्रथम कविता -संग्रह 'पंचविंशिका'का लोकार्पण हिन्दी विभाग,विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के सौजन्य से सम्पन्न हुआ.

   छत्तीसगढ़ का बसना उनका कार्यक्षेत्र रहा.  वे बसना के अपने 'साधना कुटीर ' में  आम जनता की समस्याओं को सुनकर उन्हें हल करने के लिए मार्ग दर्शन देते हुए मददगार की भूमिका में भी रहते थे. उनका साहित्य सृजन भी इसी 'साधना कुटीर ' में चलता रहता था, जो आज भी उनके चाहने वालों के लिए आस्था का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है.

      -स्वराज करुण


Thursday, March 5, 2026

(कविता ) यह कोई देशभक्ति नहीं / कवि -स्वराज्य करुण

 यह कोई देशभक्ति नहीं 

  ************

( स्वराज करुण )

हम और आप मनाते रहे 

रंगों का त्यौहार होली 

और उधर कोई ख़ून की होली 

खेल कर उजाड़ता रहा 

हम जैसे करोड़ों लोगों की 

रंग -बिरंगी ज़िन्दगी.

हमसे बहुत दूर उस देश की

धरती पर सिसकती रही मानवता 

बिलखती रही माताएँ,

बिलखती रही बहनें,

बिलखते रहे पिता.

जलते रहे मकान,

जलती रही बस्तियाँ. 

युद्ध ने उजाड़ा करोड़ों लोगों 

का जीवन. 

इसलिए तो कह रहा हूँ,

किसी दूसरे देश पर जबरन 

हमला कोई देशभक्ति नहीं है,

मानवता के खिलाफ़ अपराध है.

इसीलिए तो कह रहा हूँ...

हो सके तो 

इतना ज़रूर करना, 

उन परमाणु बमों को 

नष्ट कर देना, जिनसे 

हमारी इस हरी -भरी 

धरती और उस पर 

रंग -बिरंगे फूलों की तरह 

खिलते जन -जीवन के 

हमेशा के लिए नष्ट हो 

जाने का खतरा है, 

नष्ट हो भी रहा है.

हो सके तो रोक लेना 

उस  बेरहम युद्ध को, जो 

स्कूलों और अस्पतालों पर 

बम बरसा रहा है.

हो सके तो याद कर लेना 

ईरान की उन 165 नन्हीं बेटियों को 

जो गईं थीं स्कूल 

कुछ सीखने और अपनी 

ज़िन्दगी संवारने का 

सपना लिए, लेकिन

फिर कभी घर नहीं लौट पाईं 

अपने सपनों के साथ. 

उनके स्कूल पर हुआ हमला 

उनके मासूम सपनों पर आक्रमण था.

नष्ट कर देना इंसानियत के दुश्मन 

उन घातक बमों को,

जिनसे फिर न झुलसे कोई 

हिरोशिमा और कोई नागासाकी,

घायल न हों किसी बच्चे के,

किसी बेटी के फूलों जैसे कोमल सपने.

हो सके तो 

नष्ट कर देना उन वैक्यूम बमों को 

जिनसे भाप बनाकर

उड़ा दिए गए गज़ा पट्टी 

के हजारों इंसान.

नष्ट कर देना उन 

निर्मम हृदयों के पथरीले 

इरादों को, जिन्होंने 

इंसानियत के खिलाफ़ युद्ध में उजाड़ा 

इराक, अफगानिस्तान,

सीरिया और फिलिस्तीन सहित 

और भी कई देशों को, 

तबाह कर दी

वहाँ के लोगों की ज़िन्दगी.

हो सके तो नष्ट कर देना 

उन प्रयोग शालाओं को 

जहाँ बनते हैं मानवता को 

मटियामेट करने के इरादे से 

ऐसे घातक हथियार,

बनती हैं  दरिंदगी करने वाली 

मिसाइलें,

हो सके तो नष्ट 

कर देना  उन बेरहम दिमागों को,

जिनमें जन्म लेते हैं 

पृथ्वी को नष्ट करने के 

विनाशकारी इरादे, 

जिनमें पैदा होते हैं 

ऐसे घातक हथियार बनाने के विचार 

हो सके तो 

नष्ट कर देना उन हाथों को 

जो बनाते हैं मानवता के खिलाफ़ 

ऐसे हथियार.

इन सबके नष्ट होने पर ही 

बची रहेगी हमारी धरती,

बचे रहेंगे हम और तुम 

और हमारे जैसे 

करोड़ों -अरबों इंसान

एक खुशनुमा ज़िन्दगी के लिए.

     -स्वराज्य करुण