Thursday 24 March 2011

बैंक खातों पर भी लगाओ ' सूचना का अधिकार ' क़ानून !

                                                                                            स्वराज्य करुण

              नयी  दिल्ली में कॉमन-वेल्थ खेल घोटाला और टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला , मुम्बई में आदर्श सोसायटी घोटाला,पुणे के एक तथा कथित कबाड़ी और  घोड़ा व्यापारी हसन अली पर पचास हज़ार करोड रूपयों की टैक्स चोरी का इलज़ाम और  स्विस बैंक में अरबों रुपयों का काला-धन छुपा कर रखने की खबर , उड़ीसा में एक सरकारी कंपनी के सबसे बड़े अफसर के घर से करोड़ों रुपयों के सोने के बिस्कुट बरामद होने का मामला- यह सूची और भी लंबी हो सकती है .  पिछले   एक साल से भी कम समय में देश में आर्थिक-अपराधों के कितने  ही सनसनीखेज मामले सामने आए और कुछ दिनों तक मीडिया में सुर्खियाँ बन कर छाए रहने के बाद या तो ओझल हो गए ,या फिर जन-मानस में  धीरे-धीरे उनकी चर्चा फीकी होने लगी.
        वैसे भी जनता की सामूहिक याददाश्त यानी  पब्लिक-मेमोरी ज्यादा लंबे समय तक कायम नहीं रह पाती .शायद यही कारण है कि ऐसे जन-विरोधी अपराधों के खिलाफ कोई सामूहिक प्रतिरोध हो नहीं पाता और अगर कहीं होता भी है तो उसका असर दूध में आए उबाल से ज्यादा टिकाऊ नहीं होता.  आए दिनों विकास खंड , तहसील और जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर के भी कई अधिकारियों के घरों में आयकर और आर्थिक अपराध जांच ब्यूरो के छापों की ख़बरें मीडिया में आती रहती हैं . कई बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों, फ़िल्मी पुरुषों और   फ़िल्मी महिलाओं  के घरों और प्रतिष्ठानों पर  भी ऐसे छापे पड़ते रहते हैं .कहीं बेशुमार और बेहिसाब नकद राशि बरामद होने की चर्चा होती है ,तो कहीं भारी -भरकम चल-अचल संपत्ति का खुलासा होने का दावा किया जाता है.  पटवारियों,  फॉरेस्ट गार्डों, आर. टी. ओ. सिपाहियों और दूसरे कई विभागों के सामान्य कर्मचारियों तक की जीवन शैली उनके मासिक वेतन से कई गुना ज्यादा रौनकदार होती है.  इनकम-टैक्स, सेल्स टैक्स और खाद्य अफसरों की तनख्वाह  से ज्यादा चमकदार जीवन शैली का तो कहना ही क्या ? मेहनत और ईमानदारी की कमाई से केवल रोटी ,कपड़ा और एक सामान्य मकान की ज़रूरत पूरी हो सकती है और एक औसत जीवन जिया जा सकता है ,लेकिन ऐश-ओ-आराम के साथ गुलछर्रे नहीं उड़ाए जा सकते . मंहगाई ने औसत जीवन जीने वालों का जीना दूभर कर दिया है. कहीं न कहीं महंगाई का एक बड़ा कारण काला धन भी है.
     सब देख रहे हैं कि   समाज-सेवा के नाम पर सामाजिक और राजनीतिक संस्थाओं से ताल्लुक रखने वालों की जीवन -शैली कैसे  रातोंरात एकदम से बदल जाती है. ऐसी जादुई समृद्धि आखिर आती कहाँ से है ,जिसे देख कर जनता भौचक रह जाती है ?     कई सरकारी अफसरों और कर्मचारियों के तो कई शहरों में कई-कई आलीशान मकान होने की चर्चा स्थानीय समाज में होती रहती है . रिश्वत एक गंभीर राष्ट्रीय और सामाजिक अपराध है, लेकिन इसे  'ऊपर की कमाई '  का  नाम देकर इस अपराध में नफरत नहीं ,बल्कि अपराधियों के लिए प्रलोभन और आकर्षण पैदा कर दिया गया है.  इनकम टैक्स के छापों में भी ,जिसके यहाँ छापा पड़ता है , वह अगर अनुपात से ज्यादा राशि 'सरेंडर ' कर दे , तो मामला आगे नहीं बढ़ता . उसकी इस अनुपातहीन अधिक राशि के स्रोत का कोई खुलासा नहीं होता.देश भर में  बड़े शहरों के आस-पास सैकड़ों की संख्या में बन रही बड़ी-बड़ी रिहायशी कॉलोनियों ,  बड़े-बड़े शॉपिंग-मॉलों और महंगी-गाड़ियों के शो-रूमों  की चका-चौंध देख कर काले धन के चमकीले , भड़कीले और भयानक जादू  का असर साफ़ देखा जा सकता है. पूरे देश में भू-माफिया अब प्रापर्टी-डीलर के नाम  से  पहचाने जाते हैं .
       एक प्रमुख  साप्ताहिक 'इंडिया टुडे ' के 2 फरवरी 2011  के अंक में छपी आवरण-कथा में बताया गया है कि आज़ादी के बाद से अब तक ,  करीब 64   वर्षों में भारत से कोई पांच सौ अरब डॉलर यानी लगभग साढ़े बाईस लाख करोड रूपए अवैध रूप से ले जाकर विदेशी बैंकों में जमा किए गए हैं . इस खबर में यह भी कहा गया है कि भारत की भूमिगत अर्थ-व्यवस्था छह सौ चालीस अरब डॉलर होने का अनुमान है. देश की जनता का खजाना लूट कर विदेशों में छुपाने वाले देश-द्रोहियों के नामों का खुलासा करने में भी देश के ठेकेदारों को संकोच हो रहा है क्योंकि चोर की दाढी में तिनके वाली कहावत सच साबित हो सकती है , तो कम से कम देश के भीतर भूमिगत अर्थ-व्यवस्था के सूत्रधारों के बारे में तो बता दीजिए !  इनसे वह भी नहीं हो सकता .शायद इसलिए कि चोरी और लूट-खसोट की इस बेशुमार दौलत के डाकुओं में  उनका भी तो नाम शुमार है. भला कोई  बीच चौराहे पर  सरे-आम अपने ही कपड़े कैसे उतार दे ? लोकतंत्र के हमारे पहरेदार  तो  देश की सबसे बड़ी पंचायत  में कालेधन और विकीलिक्स के खुलासे पर गंभीर चर्चा के बजाय शेर-ओ-शायरी भरी कव्वाली का मंचन करते नज़र आते हैं .भ्रष्टाचार और कालेधन के काले कारोबार में कुछ लोग तो मालामाल हो रहे हैं ,लेकिन  दुनिया का सबसे महान लोकतंत्र कहलाने वाला यह  देश भीतर से खोखला होता जा रहा है . अगर जल्द ही इस गंभीर बीमारी का कोई इलाज नहीं खोजा गया तो भारत का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा . इसलिए राष्ट्र -हित में इस पर चिंतन बहुत ज़रूरी है.
                             जनता के वर्षों से बढ़ते दबाव की वज़ह से देश में सरकारी काम-काज और हिसाब-किताब में पारदर्शिता के लिए सूचना का अधिकार क़ानून लागू  हो चुका है और इसके ज़रिये भी कई देशभक्त नागरिकों ने आर्थिक अपराधों के अनेक गंभीर मामलों को उजागर भी किया है . इसके बावजूद मुझे लगता है कि इस क़ानून का दायरा अभी और बढ़ाने की ज़रूरत है .कई सफेदपोश डाकू बैंकों में बेनामी खाते खुलवाकर भी अपना काला धन जमा करते हैं.    देश के सभी बैंकों के जमा खातों और लॉकरों पर भी इसे लागू कर दिया जाना चाहिए. ऐसा प्रावधान होना चाहिए कि कोई भी नागरिक किसी भी सरकारी या प्रायवेट बैंक में सूचना के अधिकार के तहत आवेदन दे कर किसी भी खातेधारक के प्रचलित खाते की  और किसी के भी लॉकर की  जानकारी हासिल कर सके .इसके लिए बैंकों को अपने खातेधारकों की सूची उनके एकाउंट नम्बरों के साथ सूचना पटल पर प्रदर्शित करना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए . आज-कल सूचना प्रौद्योगिकी का  ज़माना है . अधिकाँश बैंकों में ई-बैंकिंग प्रणाली शुरू हो गयी है,पर इसमें केवल खातेधारक इंटरनेट के ज़रिये अपना व्यक्तिगत  लेन-देन कर सकते हैं और स्वयं के खाते का हिसाब देख सकते हैं . मेरा सुझाव है कि इस तकनीकी सुविधा का दायरा बढ़ा कर बैंक-प्रबंधन द्वारा अपने सभी खातेदारों के एकाउंट नंबरों के साथ उनके खातों का दिन-प्रतिदिन का हिसाब वेब-साईट पर भी प्रदर्शित किया जाना चाहिए .  उसमें ऐसी सुविधा दी जा सकती है कि कोई भी नागरिक किसी के भी एकाउंट की ताज़ा जानकारी स्वयं डाउन -लोड कर सके . इसमें जो मेहनतकश ईमानदार खातेधारक होंगे , उन्हें कोई संकोच नहीं होगा ,जबकि भ्रष्टाचार और बेईमानी से धन अर्जित करने वालों को निश्चित रूप से मानसिक कष्ट होगा .,लेकिन देश के लिए और देशवासियों के लिए यह फायदे की बात होगी ,क्योंकि इतनी व्यापक पारदर्शिता होने पर बेनामी धन बैंकों में जमा नहीं हो पाएगा . सफेदपोश टैक्स  चोर और डाकू अपनी काली कमाई बैंकों में फर्जी नामों से नहीं रख पाएंगे .
      काले धन को उजागर करने का एक सरल उपाय बाब रामदेव ने भी बताया है कि हज़ार -पांच सौ के बड़े नोटों का प्रचलन बंद कर दिया जाए ,ताकि  ऐसे चोर और लुटेरे  अपने काले धन को बिस्तर के नीचे , तकिये और दीवान के भीतर , बाथरूम आदि में छुपाकर न रख सकें. जब बड़े नोटों का चलन बंद हो जाएगा और  हज़ार-पांच सौ के नोटों की कोई उपयोगिता नहीं रह जाएगी   तो ये नोट मजबूरन बाहर निकालने पड़ेंगे .अभी तो कोई भी व्यक्ति हज़ार-हज़ार के दस नोट  अपनी जेब में रख कर दस हज़ार रूपए आसानी से कहीं भी ले जा सकता है ,लेकिन जब एक रूपए और दो रूपए के नोटों में दस हज़ार रूपए लेकर आना-जाना हो, तब   काफी मुश्किल आएगी और अगर वह  काले धन का हिस्सा हो ,तो अपने आप उजागर हो जाएगा . लेकिन सच तो यह है कि जिन लोगों को ये उपाय लागू करने हैं , वे भला ऐसा क्यों करेंगे ? उनका भीतरी चेहरा तो कालिख से रंगा हुआ है.                                                                                     -  स्वराज्य करुण


2 comments:

  1. बहुत सही बात.काले धन पर अंकुश लगना ही चाहिए.

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  2. आपका कहना सही है भैया,
    पर चोर-डकैतों की भी पौ बारह हो जाएगी :)

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