Sunday, February 13, 2011

(गीत) यादों के अवशेष रह गए !

                                                    - स्वराज्य करुण
     
             सतरंगे सपनों का मेला  वीरान हुआ संग्राम में ,
                  दिल की धरती पर केवल,यादों के अवशेष रह गए !
                               
    नज़रबंद हो गयी रात भी ,
 कैद सुबह की हुई रोशनी
   भरी दोपहरी बागों में अब  
   नहीं प्यार की छाँव घनी !

        लौट गयी सारी उम्मीदें ,खामोश घर  के आँगन से ,
             मुसाफिरों के स्वागत में, न जाने  कितने  देश रह गए !

  पूछ रहा मैं चौराहों से
       मंजिल है किस राह पर ,
       उत्तर बन कर हर सवाल 
            आ ठहरा  मेरी निगाह  पर !

अंधियारे के ज़हरीले तीरों से मर गया है सूरज ,
            किसी बावरी विधवा के ज्यों, बिखरे-बिखरे  केश रह गए !

       कोई लहरों से जूझता
        झीलों में नहाता कोई ,
              घायल व्याकुल नदियों सा
             नयनों से नीर बहता कोई !

             नाविक खड़ा रहा किनारे ,  नांव खींच ले गयी सुनामी ,
            उसके जीवन में कितने ही प्यार भरे सन्देश रह गए  !
                                                                                                                   - स्वराज्य करुण 

8 comments:

  1. @अंधियारे के ज़हरीले तीरों से मर गया है सूरज ,
    किसी बावरी विधवा के ज्यों,बिखरे-बिखरे केश रह गए!

    आज तो घायल इतने हुए,
    टिप्पणी करना ही भूल गए।

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  2. नज़रबंद हो गयी रात भी
    कैद सुबह की हुई रोशनी
    भरी दोपहरी बागों में अब
    नहीं प्यार की छाँव घनी !

    मन की कोमल अनंभूतियों को सहेजता सुंदर गीत।
    बधाई, करुण जी।

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  3. सुन्दर रचना !

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  4. बहुत सुंदर रचना, धन्यवाद

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  5. बहुत सुन्दर गीत है .
    आपके लेखन में सोंच और सादगी विशेष तौर पर प्रशंसा के लायक मुझे लगती है .बधाई .

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  6. यादों का समंदर, यादों के अवशेष.

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  7. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (14-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  8. नज़रबंद हो गयी रात भी ,
    कैद सुबह की हुई रोशनी
    भरी दोपहरी बागों में अब
    नहीं प्यार की छाँव घनी !

    बहुत भावपूर्ण सुन्दर अभिव्यक्ति..

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