Wednesday 9 February 2011

एक खुशनुमा मौसम की हत्या !

                                                                                                                  स्वराज्य करुण

वसंत के खुशनुमा मौसम   की खुले-आम हत्या हो रही है और सब कुछ देख कर भी  समाज खामोश है. यह खामोशी हमारे घर-परिवार, देश और दुनिया के भविष्य के लिए बहुत खतरनाक हो सकती है.  पढ़े-लिखे लोग ही अगर पर्यावरण के महत्व को ताक पर रखकर विकास के नाम पर हरे-भरे बेजुबान पेड़ों को बेरहमी से काटने और कटवाने लगें, या फिर इस अपराध को देख  कर भी चुप रहें,  तो उनकी शिक्षा और साक्षरता पर और  विश्व-विद्यालयों से मिली उनकी लंबी -चौड़ी डिग्रियों के असली होने पर संदेह होने लगता है. एक तरफ तो  कुछ लोग  हर बरसात के मौसम में ग्लोबल-वार्मिंग और पर्यावरण -संकट की दुहाई देकर वन-महोत्सव के नाम पर  बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हज़ारों लोगों को इकट्ठा कर पौधे लगाने का आडम्बर  करते हैं, वहीं दूसरी तरफ वसंत-पंचमी के दिन खुले  आम , बीस-बीस, पच्चीस-पच्चीस साल पुराने पेड़ों की  पूरी बेदर्दी से हत्या  कर  देने  या फिर हत्या होते देखने में  भी उन्हें कोई शर्म नहीं आती.  उन्हें पेड़ों के फूलों में , पत्तियों में , बाग-बगीचों में वसंत की खुशनुमा बहारों   के खत्म हो जाने की कोई फ़िक्र नहीं होती.  वे पेड़ों की डालियों को कुछ इस तरह  बेरहमी से  काटते और कटवाते  हैं,  जैसे कोई हत्यारा किसी बेगुनाह इंसान के हाथ-पैर .किसी पौधे के अंकुरण से ले कर बढ़ते-बढ़ते वृक्ष बनने में वर्षों लग जाते हैं. कोई पेड़ बीस-पच्चीस साल में छायादार बनता है,लेकिन हत्यारे आधुनिक मशीनों से उसे मिनटों में कत्ल कर देते हैं. यह देश के किसी भी शहर या किसी भी इलाके का दर्दनाक और शर्मनाक नज़ारा हो सकता है .

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                                                हत्यारों ने काट दिए बेगुनाहों के हाथ-पैर

  सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जिन लोगों पर किसी शहर या जिले की हरियाली को बचाने की जिम्मेदारी है, आज वही लोग पेड़ों को मार कर कच्चा पचा जा रहे हैं. कुछ शहरों में तो सड़क -चौड़ीकरण के नाम पर ,वैध-अवैध कॉलोनियां बनाने के नाम पर  पेड़ों की ह्त्या की जा रही है ,तो दूर-दराज़ के ग्रामीण इलाकों में जंगलों और पहाड़ों  में भी हरियाली के दुश्मन  खुले-आम छाए हुए हैं.कल तक जो पहाड़ एकदम हरे-भरे थे, आज उन्हें वीरान होते  देख दिल कांपने लगता है. पेड़-पौधे कुछ बोल नहीं सकते . इसलिए स्वार्थी इंसान उन पर ज़ुल्म ढाता रहता है. जबकि इंसान तो इंसान, दूसरे  जीव-जंतुओं के ज़िंदा रहने के  लिए भी ये पेड़ -पौधे मूल्यवान प्राण-वायु ऑक्सीजन  निशुल्क देते हैं. स्वादिष्ट और पौष्टिक फलों के रूप में   भी मानव-जीवन को उनका वरदान  हमेशा मिलता रहता है. गर्मियों की तेज धूप में किसी पेड़ की घनी छाया में खड़े रहकर या बैठ कर क्या किसी ने कभी उसकी ठंडक को महसूस किया है ?

                                                       खत्म हो रही पहाड़ों की हरियाली

 क्या पेड़-पौधों पर यह ज़ुल्म इसलिए हो रहा है कि वे किसी को अपना दर्द नहीं बता सकते ? जब कभी मेरे कानों में किसी पेड़ पर कुल्हाड़ी चलने की आवाज़ आती है, तो मन विचलित हो जाता है. उस बेजुबान को नहीं बचा पाने की पीड़ा मन ही  मन  कचोटती रहती है,लेकिन केवल मन मसोस कर रह जाने से क्या होता है ?  शहर हो या गाँव , क्या कोई बता सकता है कि रास्ते में किसी को पेड़ काटते  देख  हममें से कितने लोग कुछ देर के लिए रुक कर टोका-टाकी करते हैं ? हर कोई यह सोच कर आगे बढ़ लेता है कि मुझे क्या लेना-देना ? कितना खौफनाक समय है !सुशिक्षित नागरिक होने का भ्रम पाले हम लोगों में से कोई भी  हरियाली के हत्यारों से लड़ने-झगड़ने का जोखिम नहीं उठाना चाहता !अजीब माहौल है.  कहीं कोई देखने वाला नहीं, कहीं कोई बोलने वाला नहीं. सरकारों ने जिन्हें  जनता के टैक्स के पैसों से  भारी-भरकम तनख्वाहों में  पेड़-पौधों की रक्षा के लिए लगा रखा है, उन्हें भी इस बात से कोई मतलब नहीं . समाज-सेवी संस्था चलाने वालों को अनुदान बटोरने और डकारने से फुर्सत नहीं .समाज सेवक होने का दावा और दिखावा करने वालों को सड़कों पर राहगीरों के लिए छायादार पेड़ों की ज़रूरत  नहीं,क्योंकि उनके घरों में एयर-कंडीशनरों का  मुकम्मल इंतजाम है. ऐसा लगता है कि  हमारी सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदना अब खत्म हो गयी है. क्योंकि हरियाली के हत्यारे हमारे आस-पास घूम रहे हैं और हम  वसंत ऋतु के आगमन पर मौसम के  स्वागत का गीत गा रहे हैं ! वसंत तो वास्तव में पेड़ों के खिलने और फूलने-फलने से ही आता है. तो क्या पेड़ों के कटने पर वसंत के खुशनुमा मौसम  की  भी हत्या नहीं हो रही   ?  क्या खामोश रह कर इस अपराध में हम लोग भी भागीदार नहीं हैं  ?                                                                         
                                                                                                                 --  स्वराज्य करुण


7 comments:

  1. @समाज-सेवी संस्था चलाने वालों को अनुदान बटोरने और डकारने से फुर्सत नहीं।

    काश! यही बात अनुदान देने वाले भी समझ पाते,कौन सुपात्र है और कौन कुपात्र। लेकिन वहाँ भी...........। जय राम जी की।

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  2. कितना कीमती हो सकता है विकास, हमारी प्रगति.

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  3. अत्यंत चिंतनपरक / सारगर्भित प्रस्तुति ! आपका आभार !

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  4. ललित जी ने सही कहा। सार्थक आलेख। धन्यवाद।

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  5. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (10/2/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  6. बिल्कुल सही कह रहें हैं आप मैं आपकी बात से सहमत हूँ पर जिस गति से दुनियां आगे बढ रही और जिस कदर इन्सान की जरूरतों मै इज़ाफा हो रहा है तो इससे तो लगता है इसपर अंकुश लगाना थोडा मुश्किल ही काम है , पर हाँ अगर मिलकर प्रयास किया जाये तो कुछ हद तक इसे सफल बनाया जा सकता है !
    विचारणीय प्रस्तुति !

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  7. उनके घरों में एयर-कंडीशनरों का मुकम्मल इंतजाम है मगर वे नहीं जानते कि पेड़ पौधों की हवा का कोई मुकाबला ही नहीं है| वे कंक्रीट का जंगल बना रहे हैं और प्लास्टिक के फूलों पर इतरा रहे हैं पर नकली नकली होता है असली असली होता है| पेड़ों की ह्त्या के लिए कड़ी सजा के प्रावधान होने चाहिएं मौजूदा कानून कारगर नहीं हैं| सबसे बड़ी चीज बागवानी या प्रकृति प्रेम के प्रति नजरिया भी आमतौर पर लापरवाह और उदासीन है जो और भी खतरनाक है| किसी से कहिए पेड़ को पानी दे तो कह सकता है कि हमें तो पीने को भी नसीब नहीं होता... अब कौन समझाए कि हालात यही रहे तो बाबू एक दिन हवा भी नसीब नहीं होगी|

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