Sunday 6 February 2011

(गीत) हत्यारे घूम रहे झूम-झूम !

                                                             
                                                                 -  स्वराज्य करुण

 कातिलों के हाथों  कैदी बन गया पहाड़ ,
 हरेली  का  चीर-हरण कर रहा है कौन ?
           
     डरे हुए पंछियों का  
     उड़ना दुश्वार हुआ ,
         सपनों का घर उनका  
        आज  तार-तार हुआ !

पेड़ों के हत्यारे  घूम  रहे झूम-झूम  ,
गाँवों से शहरों तक हवाएं भी मौन !

   सूख गए जल-प्रपात  
नदियाँ वीरान हुईं 
       पनघट की वादियाँ भी  
  आज  सुनसान हुईं  !

  जान कर भी सब कुछ अनजान बन गए ,
ये दोहरा आचरण कर रहा है कौन ?

गाँव में अब कोई
तालाब नहीं है
     आँखों में  प्यार का 
सैलाब नहीं है !
              
जिंदगी की राह में  हमसफ़र हैं मुश्किलें,
मंजिलों का अपहरण कर रहा है कौन ?

खेतों में उग आए 
पत्थरों के जंगल
घरों के भीतर हैं 
बेघरों के जंगल !

धरती से अम्बर तक ज़हरीला मौसम,
दूषित यह वातावरण कर रहा है कौन ?

                                             स्वराज्य करुण

             
         

5 comments:

  1. अब सभी ब्लागों का लेखा जोखा BLOG WORLD.COM पर आरम्भ हो
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  2. पर्यावरणीय चिंता स्वाभाविक है !

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  3. जाने-अनजाने हम सभी इस सवाल के घेरे में हैं.

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  4. एक जागरूक नागरिक को अपने अन्दर झाँकने के लिए प्रेरित करती कविता लाजवाब है

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  5. झकझोरने वाली रचना सोचने को मजबूर करती है।
    बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

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