Wednesday, November 2, 2022

(आलेख) छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य : कितना पुराना है इतिहास ? - स्वराज्य करुण

      तथ्यों और तर्कों के आईने में तीन महत्वपूर्ण पुस्तकें 

                 (आलेख - स्वराज्य करुण)

भारत के प्रत्येक राज्य और वहाँ के प्रत्येक अंचल की अपनी भाषाएँ ,अपनी बोलियाँ ,अपना साहित्य ,अपना संगीत और अपनी संस्कृति होती है । ये रंग -बिरंगी विविधताएँ ही भारत की राष्ट्रीय पहचान है ,जो इस देश को एकता के मज़बूत बंधनों में बांध कर रखती है। छत्तीसगढ़ भी एक ऐसा भारतीय राज्य है , जो अपनी भाषा ,अपने साहित्य और अपनी विविधतापूर्ण लोक संस्कृति से सुसज्जित और समृद्ध है। भाषाओं और बोलियों का भी अपना एक प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष साहित्यिक और  सांस्कृतिक इतिहास होता है।  छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य का भी अपना एक समृद्ध इतिहास है ,लेकिन यह इतिहास कितना पुराना है, इसे जानने और समझने के लिए मेरे विचार से प्रदेश के तीन विद्वान लेखकों की महत्वपूर्ण पुस्तकों  का अध्ययन बहुत ज़रूरी हो जाता है  ।

 पहली पुस्तक  'छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास' हिंदी भाषा में डॉ. नरेंद्र देव वर्मा की अनेक महत्वपूर्ण  कृतियों में शामिल  एक मूल्यवान धरोहर है। हिंदी में दूसरी पुस्तक है श्री नंदकिशोर तिवारी द्वारा लिखी गयी 'छत्तीसगढ़ी साहित्य ,दशा और दिशा तथा तीसरी किताब है डॉ. विनय कुमार पाठक  की छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार' जो शीर्षक से ही स्पष्ट है कि  सरल छत्तीसगढ़ी में लिखी गयी है। तीनों  लेखकों ने अपनी इन  पुस्तकों में छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य  के क्रमिक विकास पर गहन अध्ययन प्रस्तुत किया है। उन्होंने  विषय प्रवर्तन , विश्लेषण और प्रस्तुतिकरण बहुत परिश्रम के साथ अपने -अपने तरीके से किया है।  तीनों के अपने -अपने तर्क हैं और संकलित तथ्यों को देखने का अपना -अपना नज़रिया है।  लेकिन यह तय है कि तीनों किताबों में प्रस्तुत  तथ्यों और तर्को के आईने में  छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के इतिहास को  उसकी  प्राचीनता के अलग -अलग रंगों के साथ  बड़ी खूबसूरती से उभारा गया है। किसी भी राज्य ,देश और वहाँ के साहित्यिक -सांस्कृतिक इतिहास को लेकर विद्वानों में अलग -अलग अभिमतों का होना कोई नयी बात नहीं है। ऐसा होना बहुत स्वाभाविक है। ये मत -विभिन्नताएँ इन पुस्तकों में भी झलकती हैं।


                                                


श्री तिवारी और डॉ. पाठक ने अपनी पुस्तकों में उल्लेखित कुछ तथ्यों में डॉ. नरेंद्र देव वर्मा का भी संदर्भ दिया है। लेकिन दोनों ही डॉ. वर्मा के कुछ तथ्यों से सहमत नज़र नहीं आते।  डॉ. वर्मा और डॉ. पाठक अपनी पुस्तकों में छत्तीसगढ़ी भाषा और  साहित्य के इतिहास को एक हज़ार साल से ज्यादा पुराना मानते हैं । उनकी यह मान्यता छत्तीसगढ़ी के मौखिक और लिखित साहित्य को लेकर है। डॉ. वर्मा और डॉ. पाठक  के दृष्टिकोण से कबीरपंथ के संत धरम दास  छत्तीसगढ़ी भाषा के लिखित साहित्य के  प्रथम  कवि थे जबकि श्री नंदकिशोर तिवारी ऐसा नहीं मानते। उनका कहना है कि सन 1472 में बांधो गढ़ (विंध्यप्रदेश) में जन्मे  संत धरमदास  छत्तीसगढ़ के कवर्धा आकर कबीरपीठ की स्थापना की थी ,लेकिन उनके पदों में बघेली और अवधी का प्रभाव है ,छत्तीसगढ़ी का नहीं।

                                        छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास

        डॉ.  नरेंद्र देव वर्मा हिंदी साहित्य और भाषा विज्ञान में एम.ए. होने  के साथ इन  विषयों में पी-एच.डी. भी थे। उनकी  पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास'  एक शोध -प्रबंध है। उन्होंने 1973  में पण्डित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर में पी-एच.डी. की उपाधि के लिए   भाषा वैज्ञानिक अध्ययन  के आधार पर इसे लिखा था।  पुस्तक के रूप में इसे छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा वर्ष 2009 में प्रकाशित किया गया। यह पुस्तक लगभग 380 पृष्ठों की है।अपने इस शोध-प्रबंध में डॉ. वर्मा ने अनेक प्रसिद्ध भाषाविज्ञानियों को संदर्भित करते हुए पूर्वी हिंदी समूह के अंतर्गत जहाँ अवधी और बघेली के साथ छत्तीसगढ़ी की तुलना की है ,वहीं छत्तीसगढ़ी भाषा का वर्गीकरण करते हुए उन्होनें  यहाँ प्रचलित आंचलिक बोलियों का भी  व्याकरणिक अध्ययन प्रस्तुत किया है।

                             पूर्वी हिंदी क्षेत्र की प्रमुख भाषा है छत्तीसगढ़ी

      डॉ. वर्मा छत्तीसगढ़ी ,अवधी और बघेली के तुलनात्मक अध्ययन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि छत्तीसगढ़ी पूर्वी हिंदी क्षेत्र की एक प्रमुख भाषा है । उन्होंने यह शोध -प्रबंध 32 अध्यायों में लिखा  है। इनमें   छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि  छत्तीसगढ़ी का विकास ,छत्तीसगढ़ की बोलियाँ, छत्तीसगढ़ी का शब्द -समूह ,छत्तीसगढ़ी विषयक साहित्य , छत्तीसगढ़ी के स्वर , स्वर-परिवर्तन, छत्तीसगढ़ी स्वरों की उतपत्ति ,व्यंजन -परिवर्तन, छत्तीसगढ़ी व्यंजनों की उतपत्ति ,संज्ञा की रचना ,समास ,कारक-रचना जैसे अध्याय  शामिल हैं ,जो छत्तीसगढ़ी भाषा , व्याकरण और साहित्य से जुड़े तथ्यों पर क्रमबद्ध रौशनी डालते हैं। डॉ. वर्मा लिखते कि छत्तीसगढ़ी से उनका तात्पर्य रायपुर ,बिलासपुर और दुर्ग में बोली जाने वाली छत्तीसगढ़ी से है ।रायपुर और बिलासपुर की छत्तीसगढ़ी में उच्चारण एवं कतिपय शब्द-प्रयोगों का ही भेद है। उन्होंने छत्तीसगढ़ी के अलावा प्रदेश में प्रचलित खल्ताही,सरगुजिहा, लरिया,सदरी कोरवा ,बैगानी, बिंझवारी ,कलंगा ,भूलिया, बस्तरी(हल्बी) बोलियों की भी व्याकरणिक विवेचना की है।

                नवीं-दसवीं शताब्दी में हुआ था 

              छत्तीसगढ़ी और अवधी का जन्म 

        अध्याय -5 में डॉ. नरेंद्र देव वर्मा  लिखते हैं -  छत्तीसगढ़ी और अवधी ,दोनों का जन्म अर्ध -मागधी के गर्भ से आज से लगभग 1156 वर्ष पूर्व नवीं- दसवीं शताब्दी में हुआ था।इस एक सहस्त्र वर्ष के सुदीर्घ अंतराल में छत्तीसगढ़ी और अवधी पर अन्य भाषाओं के प्रभाव भी पड़े तथा इनका स्वरूप पर्याप्त परिवर्तित हो गया। डॉ. वर्मा ने छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास को तीन चरणों में विभाजित किया है -(1) गाथा युग : 1000 से 1500 ईस्वी (2)भक्ति युग : 1500 से 1900 ईस्वी और आधुनिक युग :1900 ईस्वी से आज तक। उन्होंने भक्ति युग के प्रमुख कवियों में संत धरम दास और सतनाम पंथ के प्रवर्तक संत गुरु घासीदास जी की कुछ रचनाओं का भी उल्लेख किया है। इसी अध्याय में डॉ. वर्मा ने  आधुनिक युग के अंतर्गत छत्तीसगढ़ी कविता और गद्य साहित्य  के विकास की भी चर्चा की है। छत्तीसगढ़ी कविता के विकास को उन्होंने क्रमशः प्रथम ,द्वितीय और तृतीय उन्मेष में वर्गीकृत किया है ।

              हीरालाल काव्योपाध्याय थे छत्तीसगढ़ी के प्रथम कथा -लेखक

   पुस्तक के 5वें अध्याय में गद्य-खण्ड के अंतर्गत डॉ. नरेंद्र देव वर्मा ने अनेक प्रमुख  साहित्यकारों की छत्तीसगढ़ी कहानियों ,उपन्यासों और नाटकों का भी उल्लेख किया है। डॉ. वर्मा लिखते हैं -" छत्तीसगढ़ी गद्य का सक्रिय इतिहास हीरालाल काव्योपाध्याय द्वारा लिखित छत्तीसगढ़ी व्याकरण से प्रारंभ होता है,जिसे सन 1890 में जार्ज ए. ग्रियर्सन ने सम्पादित और अनूदित कर कलकत्ता के बैप्टिस्ट मिशन प्रेस से छपवाया। "डॉ. वर्मा के अनुसार -- "छत्तीसगढ़ी में हीरालाल काव्योपाध्याय ने ही सर्वप्रथम कथा -लेखन का श्रीगणेश किया था।उनके व्याकरण -ग्रंथ में 'श्रीराम की कथा ',ढोला की कहानी' और 'चंदैनी की कहानी 'निबद्ध है । काव्योपाध्याय के इस ग्रंथ ने छत्तीसगढ़ी गद्य के इतिहास का ही सूत्रपात नहीं किया, प्रत्युत छत्तीसगढ़ी कथा का भी पौरोहित्य किया ,तथा छत्तीसगढ़ी नाटक के आरंभ के सूत्र भी उक्त पुस्तक के संवादों में छिपे हुए हैं।"

                        उपन्यासकार और कवि भी थे डॉ. नरेंद्र देव वर्मा

   छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. नरेंद्र देव वर्मा का  जन्म महाराष्ट्र के वर्धा में 4 नवम्बर 1939 को और निधन 8 सितम्बर 1979 को गृहनगर रायपुर (छत्तीसगढ़) में हुआ।  छत्तीसगढ़ के ग्रामीण परिवेश पर केन्द्रित उनका उपन्यास 'सुबह की तलाश ' 1970 के दशक में राष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चित रहा। उनकी लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी रचना 'अरपा पैरी के धार ..महानदी हे  अपार' को छत्तीसगढ़ सरकार ने 'राज्य गीत' का दर्जा देकर सम्मानित किया है । डॉ. वर्मा  छत्तीसगढ़ के    साहित्यिक भण्डार को अपनी रचनाओं की अनमोल धरोहर से समृद्ध करते हुए  मात्र 40 वर्ष की अल्पायु में ही इस भौतिक संसार से चले गए। छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास को हिंदी में समझने के लिए डॉ. वर्मा द्वारा लिखित  'छत्तीसगढ़ी साहित्य का उद्विकास ' एक ज्ञानवर्धक पुस्तक है।

                      छत्तीसगढ़ी साहित्य : दशा और दिशा      

       छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के उत्थान के लिए समर्पित बिलासपुर निवासी श्री नंदकिशोर तिवारी ने भी अपनी पुस्तक में छत्तीसगढ़ी काव्य -साहित्य की विकास यात्रा को प्रथम ,द्वितीय और तृतीय उन्मेष में वर्गीकृत करते हुए अपना सारगर्भित विश्लेषण प्रस्तुत किया है। लेकिन वह डॉ. नरेंद्र देव वर्मा द्वारा छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास के काल निर्धारण से सहमत नहीं लगते। श्री तिवारी ने 215 पृष्ठों की अपनी इस पुस्तक की शुरुआत 'छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य :प्रथम उन्मेष ' शीर्षक से की है।  हम इसे पुस्तक का पहला अध्याय कह सकते हैं। उन्होंने इसमें लिखा है कि छत्तीसगढ़ में देर से आयी  मातृभाषा प्रेम के नवजागरण की चेतना ने कई भूलें की। उनके अनुसार पहली भूल थी - डॉ. नरेंद्र देव वर्मा ने छत्तीसगढ़ी साहित्य का हिंदी की तर्ज पर गाथा युग -विक्रम संवत 1000 से 1500,भक्ति युग विक्रम संवत 1500 से 1900 और आधुनिक युग 1900 से आज तक में विभाजित किया है।इस विभाजन काल की रचनाओं में छत्तीसगढ़ी लोक - गाथाओं को शामिल किया गया । संवत 1100 से 1500 तक छत्तीसगढ़ी में अनेक गाथाओं की रचना हुई ,जिनमें प्रेम तथा वीरता का अपूर्व विन्यास हुआ है।यद्यपि इन गाथाओं की लिपिबद्ध परम्परा नहीं रही है तथा ये पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से अभिरक्षित होती आयी हैं। 

    श्री तिवारी लिखते हैं --तर्क किया जा सकता है कि हिंदी साहित्य के इतिहास में भी लोक -गाथाओं को शामिल किया गया है । इस तरह तर्क करने वालों को समझना चाहिए कि हिंदी 'रासो' काव्य की अपनी परम्परा थी। 'रासो' राज दरबारों से जन -दरबार में आए।इस परम्परा की सभी रचनाओं के साथ लेखक का नाम जुड़ा है। वे लोक-कंठ से निः सृत न होकर कवियों की लेखनी से निःसृत हुईं और लोक -कंठ में समा गयीं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि वाचिक परम्परा में निःसृत लोक -गाथाओं को लिखित शिष्ट साहित्य की परम्परा में कैसे परिगणित किया जा सकता है? और कंठ-दर-कंठ गूँजतेव,गायक की मानसिकता ,स्थान आदि के प्रभाव से नित -नित परिवर्तित होते किस रूप को हम साहित्य में मान्यता देंगे?हमें शिष्ट-साहित्य और लोक-  साहित्य में उनकी मर्यादा और परम्परा को समझना होगा। 

                 संत धरम दास नहीं थे छत्तीसगढ़ी के प्रथम कवि  ?

        श्री तिवारी के अनुसार दूसरी भूल यह थी कि छत्तीसगढ़ी साहित्य की प्राचीनता को प्रमाणित करने की अतिशय आकांक्षा ने संत धरम दास को छत्तीसगढ़ी का पहला कवि घोषित कर दिया।संत धरम दास का जन्म 1472 में बांधोगढ़(विंध्य प्रदेश) में हुआ था। वे कबीर के शिष्य थे। उन्होंने कवर्धा में कबीरपीठ की स्थापना की थी। उनके गाए भजनों को छत्तीसगढ़ी में लिखा भजन मान लिया गया। श्री तिवारी डॉ. नरेंद्र देव वर्मा के इस कथन से भी सहमत नहीं हैं कि संत धरम दास ने लोक -गीतों की सहज ,सरल शैली में निगूढ़तम दार्शनिक भावनाओं की अभिव्यक्ति की और छत्तीसगढ़ी भाषा की शक्तियों को आत्मसात करते हुए उसे उच्चतर भावनाओं के संवहन योग्य बनाया। 

     श्री तिवारी के अनुसार - "संत धरम दास के एक भी पद छत्तीसगढ़ी लोक-गीतों की शैली में नहीं हैं और न ही छत्तीसगढ़ी भाषा की शक्ति का परिचय कराते हैं। भाषा वैज्ञानिक मानते हैं कि अवधी और बघेली की सहोदरा छत्तीसगढ़ी है। तीनों भाषाएँ एक -दूसरे के बहुत नज़दीक हैं। यही कारण है कि संत धरम दास को छत्तीसगढ़ी का प्रथम कवि करार दिया गया और छत्तीसगढ़ी साहित्य को पन्द्रहवीं सदी तक खींच ले जाया गया । उन्होंने संत धरम दास की छह पंक्तियों के एक पद का उल्लेख किया है और लिखा है कि इस पद में प्रयुक्त मोहे,भै, परगै, धूर, पाछै, नैहर,पाही और बिनवै जैसे शब्दों के लिए छत्तीसगढ़ी में क्रमशः मोला/मोका, भइस, परगे, धुर्रा(कुधरा), पाछू ,आगू , मइके, ससुरार ,विनती का उपयोग होता है।ऐसे में इसे छत्तीसगढ़ी कविता कैसे माना जा सकता है? वस्तुतः यह देर से छत्तीसगढ़ में आए नवजागरण की चेतना का प्रतिफलन है।श्री तिवारी कहते हैं कि बाबू प्यारेलालजी गुप्त छत्तीसगढ़ी काव्य का प्रारंभिक उत्थान  रेवाराम बाबू के भजनों को मानते हैं ,लेकिन उल्लेखनीय है कि रेवाराम बाबू का 'गुटका' हिंदी के अनेक संत कवियों के पदों का संग्रह है। श्री तिवारी के अनुसार छत्तीसगढ़ी काव्य के प्रारंभिक उन्मेष काल की रचनाओं में निरंतरता का अभाव था ।

    श्री नंदकिशोर तिवारी का जन्म 19 जून 1941 को बिलासपुर में हुआ था। हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त श्री तिवारी सम्प्रति अपने गृहनगर बिलासपुर में विगत कई वर्षों से 'छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर'नामक त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ी साहित्य और साहित्यकारों पर उनकी कई पुस्तकें छप चुकी हैं । इनमें 'छत्तीसगढ़ी साहित्य का ऐतिहासिक अध्ययन' भी  शामिल है।उन्होंने पण्डित मुकुटधर पाण्डेय और हरि ठाकुर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर पुस्तकें लिखी हैं ,वहीं  डॉ. नरेंद्र देव वर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित एक पुस्तक का सम्पादन भी किया है।  उनके सम्पादन में पण्डित लोचन प्रसाद पाण्डेय के पुरातात्विक लेखों का एक प्रामाणिक संग्रह 'कौशल -कौमुदी ' शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है। श्री तिवारी की पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी साहित्य :दशा और दिशा' वैभव प्रकाशन रायपुर द्वारा वर्ष 2006 में प्रकाशित की गयी थी।

                      छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार

   डॉ. विनय कुमार पाठक की   पुस्तक  'छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार' लगभग 106 पृष्ठों की 17 सेंटीमीटर लम्बी और 11 सेंटीमीटर चौड़ी यह पुस्तक आकार में छोटी जरूर है ,लेकिन प्रकार में यह  हमें आचार्य रामचंद्र शुक्ल की याद दिलाती है ,जिन्हें  हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन के लिए भी याद किया जाता है। उनकी एक पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार' का पहला संस्करण वर्ष 1971 में प्रकाशित हुआ था। प्रयास प्रकाशन बिलासपुर द्वारा प्रकाशित  यह पुस्तक छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के क्रमिक विकास का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है । छपते ही उन दिनों आंचलिक साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों के बीच इसकी मांग  इतनी बढ़ी कि दूसरा और तीसरा संस्करण भी छपवाना पड़ा। 

दूसरा संस्करण 1975 में और तीसरा वर्ष 1977 में प्रकाशित हुआ था।  पुस्तक का तीसरा संस्करण उन्होंने मुझे 18 अगस्त 1977 को भेंट किया था ,जब वह आरंग के शासकीय महाविद्यालय में प्राध्यापक थे।वहाँ रहते हुए उन्होंने स्थानीय कवियों की रचनाओं का एक छोटा संकलन 'आरंग के कवि ' शीर्षक से सम्पादित और प्रकाशित किया था।  

    बिलासपुर में 11 जून 1946 को जन्मे  डॉ. पाठक छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष  रह चुके हैं। वह  हिन्दी और भाषा-विज्ञान में पी-एच . डी. तथा ङी. लिट् की उपाधियाँ प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार हैं। इन दिनों वह अपने जन्म स्थान और गृहनगर बिलासपुर में साहित्य साधना और समाज-सेवा में लगे हुए हैं। उनके शोध -ग्रंथों में 'छत्तीसगढ़ी साहित्य का सांस्कृतिक अनुशीलन ' और छत्तीसगढ़ी में प्रयुक्त परिनिष्ठित हिंदी और इतर भाषाओं के शब्दों में अर्थ -परिवर्तन' भी उल्लेखनीय हैं।

   डॉ. पाठक ने अपनी  पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार' में  छत्तीसगढ़ी साहित्य के क्रमबद्ध विकास को अलग -अलग कालखण्डों में रेखांकित किया है।  आत्माभिव्यक्ति के तहत डॉ. पाठक ने लिखा है कि इस कृति में स्पष्ट रूप से दो खण्ड हैं, जिसमें पहला खण्ड साहित्य का है और दूसरा साहित्यकारों का।  वह लिखते हैं --"कई झन बिदवान मन छत्तीसगढ़ी साहित्य ल आज ले दू-तीन सौ बरिस तक मान के ओखर कीमत आंकथे। मय उन बिदवान सो पूछना चाहूं के अतेक पोठ अउ जुन्ना भाषा के साहित्य का अतेक नवा होही ? ए बात आने आए के हम ला छपे या लिखे हुए साहित्य नइ मिलै,तभो एखर लोक साहित्य ल देख के अनताज (अंदाज ) तो लगाए जा सकत हे के वो कोन जुग के लेखनी आय ! छत्तीसगढ़ी के कतकोन कवि मरगें ,मेटागें ,फेर अपन फक्कड़ अउ सिधवा सुभाव के कारन ,छपास ले दूरिया रहे के कारन रचना संग अपन नांव नइ गोबिन। उनकर कविता ,उनकर गीत आज मनखे -मनखे के मुंहूं ले सुने जा सकत हे। उनकर कविता म कतका जोम हे ,एला जनैयेच मन जानहीं।"

               शब्द सांख्यिकी नियम से हुआ  काल निर्धारण

      डॉ. पाठक ने लिखा है कि शब्द सांख्यिकी का नियम लगाकर ,युग के प्रभाव और उसकी प्रवृत्ति को देखकर कविता लेखन के समय का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। 'डॉ. नरेंद्र  देव वर्मा' ने शब्द सांख्यिकी नियम लगा कर बताया है कि पूर्वी हिन्दी (अवधी)से छत्तीसगढ़ी 1080 साल पहले नवमी -दसवीं शताब्दी में अलग हो चुकी थी । पुस्तक में डॉ. वर्मा को संदर्भित करते हुए  छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास का काल निर्धारण भी किया है,जो इस प्रकार है -- मौखिक परम्परा (प्राचीन साहित्य )--आदिकाल (1000 से 1500वि) -- चारण काल (1000 से 1200 वि)-- वीरगाथा काल (1200 से 1500 तक ),फिर मध्यकाल(1500 से 1900 वि),फिर लिखित परम्परा यानी आधुनिक साहित्य (1900 से आज तक )फिर आधुनिक काल में भी प्रथम उन्मेष (1900 से 1955 तक )और द्वितीय उन्मेष (1955 से आज तक )।

    आदिकाल के संदर्भ में डॉ. विनय पाठक लिखते हैं --इतिहास के पन्ना ल उल्टाये ले गम मिलथे के 10 वीं शताब्दी ले 12वीं शताब्दी तक हैहयवंशी राजा मन के कोनो किसिम के लड़ाई अउ बैर भाव नइ रिहिस।उनकर आपुस म मया भाव अउ सुमता दिखथे। ए बीच  बीरगाथा के रचना होना ठीक नई जान परै।ओ  बखत के राजा मन के राज म रहत कवि मन के जउन राजा के बीरता ,गुनानवाद मिलथे (भले राजा के नांव नइ मिलै)।ओ अधार ले एला चारण काल कहि सकत हन । बारहवीं  शताब्दी के छेवर-छेवर मा इन मन ल कतको जुद्ध करना परिस ।ये तरह 12 वीं शताब्दी के छेवर -छेवर ले 1500 तक बीर गाथा काल मान सकत हन।ये ही बीच बीरता ,लड़ाई ,जुद्ध के बरनन होइस हे, एमा दू मत नइये।

  डॉ. पाठक वर्ष 1000 से 1500 तक को आदिकाल या वीरगाथा काल के रूप में स्थापित किए जाने के डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के विचार  को आधा ठीक और आधा गलत मानते हैं। उन्होंने आगे  लिखा है --"गाथा बिसेस के प्रवृति होय के कारण ये जुग ल गाथा युग घलो कहे जा  सकत हे।एमा मिलत प्रेमोख्यान गाथा म अहिमन रानी ,केवला रानी असन अबड़ कन गाथा अउ धार्मिक गाथा म पंडवानी, फूलबासन ,असन कई एक ठो गाथा ल ए जुग के रचना कहे अउ माने जा सकत हे। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ह 1000 ले 1500 तक के जुग ल आदिकाल या बीरगाथा काल कहे हे ,जउन ह आधा ठीक अउ आधा गलत साबित होथे। "

                   छत्तीसगढ़ी के प्रथम कवि धरम दास !

  आगे डॉ. पाठक ने छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास क्रम में  मध्यकाल और आधुनिक साहित्य से जुड़े तथ्यों की चर्चा की है। उन्होंने मध्यकालीन साहित्य में  भक्ति धारा के प्रवाहित होने के  प्रसंग में लिखा है कि  संत कबीरदास के शिष्य धरम दास को छत्तीसगढ़ी का पहला कवि माना जा सकता है। डॉ. पाठक लिखते हैं -- "राजनीति के हेरफेर अउ  चढ़ाव -उतार के कारन समाज म रूढ़ि ,अंधविश्वास के नार बगरे के कारन ,मध्यकाल म लोगन के हिरदे ले भक्ति के धारा तरल रउहन बोहाये लागिस।वइसे तो इहां कतको भक्त अउ संत कवि होगे हें ,फेर उंकर परमान नइ मिल सके के कारन उनकर चरचा करना ठीक नोहय।कबीरदास के पंथ ल मनैया कवि मन के अतका परचार-परसार होय के कारन इहां कबीरपंथ के रचना अबड़ मिलथे। एही पंथ के रद्दा म रेंगइया कबीरदास के पट्ट चेला धरम दास ल छत्तीसगढ़ी के पहिली कवि माने जा सकत हे।घासीदास के पंथ के परचार के संग संग कतको रचना मिलथे ,जउन हर ये जुग के साहित्य के मण्डल ल भरथे। "

 छत्तीसगढ़ी में कहानी ,उपन्यास ,नाटक और एकांकी ,निबंध और समीक्षात्मक लेख भी खूब लिखे गए हैं। अनुवाद कार्य भी खूब हुआ है। पुस्तक की शुरुआत डॉ. पाठक ने 'छत्तीसगढ़ी साहित्य' के अंतर्गत गद्य साहित्य से करते हुए  यहाँ के गद्य साहित्य की इन सभी  विधाओं के प्रमुख  लेखकों और उनकी कृतियों का उल्लेख किया है। डॉ. पाठक के अनुसार   कुछ विद्वान  छत्तीसगढ़ी गद्य का सबसे पहला नमूना  दंतेवाड़ा के शिलालेख को बताते हैं ,जबकि यह मैथिली के रंग में रंगा हुआ है। 

                 आरंग का शिलालेख छत्तीसगढ़ी गद्य का पहला नमूना 

     अपनी इस पुस्तक में डॉ. पाठक ने लिखा है कि  आरंग में मिले सन 1724 के शिलालेख को छत्तीसगढ़ी गद्य लेखन का पहला नमूना माना जा सकता है।इसका ठोस कारण ये है कि यह (आरंग)निमगा (शुद्ध )छत्तीसगढ़ी की जगह है और यह कलचुरि राजा अमर सिंह का शिलालेख है। सन 1890 में हीरालाल काव्योपाध्याय का 'छत्तीसगढ़ी व्याकरण ' छपकर आया ,जिसमें ढोला की कहानी और रामायण की कथा भी छपी है ,जिनकी भाषा मुहावरेदार और काव्यात्मक है।अनुवादों के प्रसंग में डॉ. पाठक ने एक दिलचस्प जानकारी दी है कि सन 1918 में पंडित शुकलाल प्रसाद पाण्डेय ने शेक्सपियर के लिखे 'कॉमेडी ऑफ एरर्स ' का अनुवाद 'पुरू झुरु' शीर्षक से किया था । पंडित मुकुटधर पाण्डेय ने कालिदास के 'मेघदूत' का छत्तीसगढ़ी अनुवाद करके एक बड़ा काम किया है।डॉ. पाठक की पुस्तक में 'छत्तीसगढ़ी साहित्य म नवा बिहान 'शीर्षक ' के अंतर्गत प्रमुख कवियों की कविताओं का भी जिक्र किया गया है।

                              लिखित परम्परा की शुरुआत 

       छत्तीसगढ़ी साहित्य में आधुनिक काल की चर्चा प्रारंभ करते हुए अपनी इस पुस्तक में डॉ. पाठक कहते  हैं-"कोनो बोली ह तब तक भाषा के रूप नइ ले लेवै ,जब तक ओखर लिखित परम्परा नइ होवै।" इसी कड़ी में उन्होंने आधुनिक काल के अंतर्गत छत्तीसगढ़ी के लिखित साहित्य के प्रथम और द्वितीय उन्मेष पर प्रकाश डाला है। प्रथम उन्मेष में उन्होंने सन 1916 के आस -पास राजिम के पंडित सुन्दरलाल शर्मा रचित 'छत्तीसगढ़ी दानलीला 'सहित आगे के वर्षों में प्रकाशित कई साहित्यकारों की कृतियों की जानकारी दी है।

                            सुराज मिले के पाछू नवा-नवा प्रयोग 

    डॉ. पाठक ने पुस्तक में द्वितीय उन्मेष के अंतर्गत लिखा है  -  --"सुराज मिले के पाछू  हिन्दी के जमों उप -भाषा अउ बोली डहर लोगन के धियान गिस।ओमा रचना लिखे के ,ओमा सोध करेके ,ओमा समाचार पत्र अउ पत्रिका निकारे के काम धड़ाधड़ सुरू होगे। छत्तीसगढ़ी म ए बीच जतका प्रकाशन होइस ,साहित्य म जतका नवा -नवा प्रयोग होइस ,ओखर ले छत्तीसगढ़ी के रूप बने लागिस,संवरे लागिस।अउ आज छत्तीसगढ़ी ह आने रूप म हमार आघू हावै। छत्तीसगढ़ी डहर लोगन के जउन रद्दी रूख रहिस ,टरकाऊ बानी रहिस ,अब सिराय लागिस। छत्तीसगढ़ी साहित्य ह अब मेला -ठेला ले उतरके लाइब्रेरी ,पुस्तक दुकान अउ ए .एच. व्हीलर इहां आगे। लाउडस्पीकर म रेंक के बेंचई ले उठके रेडियो, सिनेमा अउ कवि सम्मेलन तक हबरगे।गंवैहा मन के चरचा ले असकिटिया के 'काफी हाउस' अउ 'साहित्यिक गोष्ठी ' के रूप म ठउर जमा लिस। लोगन के सुवाद बदलगे, छत्तीसगढ़ के भाग पलटगे। " 

      डॉ. पाठक ने छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार' में 'द्वितीय उन्मेष' के तहत वर्ष 1950 से 1970 के दशक में प्रकाशित छत्तीसगढ़ी के अनेक कवियों के कविता -संग्रहों का उल्लेख करते हुए यह भी लिखा है कि वर्ष 1955 से एक वर्ष तक छपी और मुक्तिदूत द्वारा सम्पादित 'छत्तीसगढ़ी' मासिक पत्रिका ने एक अंक छत्तीसगढ़ी कविताओं का भी प्रकाशित किया था ,जिसमें 21 कवियों की रचनाएँ शामिल थीं।  'द्वितीय उन्मेष ' डॉ. पाठक ने अनेक कवियों   की चर्चा की है। साथ ही उन्होंने इनमें से 25 प्रमुख कवियों के काव्य गुणों का उल्लेख करते हुए उनकी एक -एक रचनाएँ भी प्रस्तुत की हैं। 

         इसमें दो राय नहीं कि   छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की विकास यात्रा ने इतिहास के दुर्गम पथ पर चलते हुए  अपने हर पड़ाव पर छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाया है। इसका श्रेय  उन सभी ज्ञात ,अल्प ज्ञात और अज्ञात कवियों और लेखकों को दिया जाना चाहिए ,जिनकी  रचनाओं ने देश के साहित्यिक मानचित्र पर  इस प्रदेश का नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित किया है।

    आलेख  -- स्वराज्य करुण 

      

Wednesday, October 5, 2022

(पुस्तक -चर्चा ) अग्नि -स्नान : आत्मग्लानि से पीड़ित रावण की आत्मकथा

                                            (आलेख : स्वराज्य करुण )

भारत में और विशेष रूप से उत्तर भारत में विजयादशमी का  दिन रावण पर श्रीराम के विजय पर्व के रूप में मनाया जाता है। लंकापति रावण भले ही प्रकाण्ड विद्वान रहा हो ,लेकिन अपनी अहंकारी मनोवृत्ति  और  सीताजी के अपहरण के जघन्य अपराध की वजह से उसका और उसके वैभवशाली साम्राज्य का पतन हो गया।  विजयादशमी का एक महान संदेश यह भी है कि व्यक्ति को अहंकार से दूर रहना चाहिए। बहरहाल , सभी मित्रों को विजयादशमी की हार्दिक शुभेच्छाओं सहित  आज मैं यहाँ रावण की ज़िन्दगी पर केन्द्रित उपन्यास 'अग्निस्नान' की चर्चा कर रहा हूँ। मेरे विचार से यह उपन्यास  रावण के अपराधबोध के साथ -साथ उसकी आत्मग्लानि की आत्मकथा भी है। 

   कालजयी महाकाव्य 'रामायण ' के श्रीराम भारतीय समाज और संस्कृति के रोम -रोम  में रमे हुए हैं। लोक आस्था और विश्वास के प्रतीक के रूप में भारत की धरती के कण -कण में उनकी महिमा व्याप्त है। वह भारतीय संस्कृति के लोक नायक हैं। आशा और विश्वास के आलोक पुंज हैं।  लेकिन जिस प्रकार दिन और रात हमारी पृथ्वी और प्रकृति के दो अनिवार्य पहलू हैं ,उसी तरह किसी भी ऐतिहासिक और पौराणिक घटना पर आधारित कथाओं और महाकाव्यों में नायकों  और खलनायकों  का होना भी अनिवार्य है। नायक अच्छाई का और खलनायक बुराई का प्रतीक होते हैं और दोनों के बीच संघर्ष में नायक विजयी होता है।  खलनायक की पराजय मनुष्य को हमेशा सदमार्ग पर चलने का संदेश दे जाती है।महर्षि वाल्मीकि रचित संस्कृत महाकाव्य 'रामायण' और उस पर आधारित महाकवि तुलसीदास के अवधी महाकाव्य 'रामचरितमानस'  का भी यही संदेश है। इन महाकाव्यों के पौराणिक प्रसंगों पर इस आधुनिक युग मे  कई नाटक भी  लिखे गए हैं । रामलीलाओं का नाट्य  मंचन तो पता नहीं ,कब से होता चला आ रहा है !  फिल्में भी बनी हैं , टेलीविजन सीरियल भी आए हैं और उपन्यास भी लिखे गए हैं। 

                                                       


लेकिन हिन्दी में 'रामायण' के  खलनायक 'रावण ' पर केंद्रित उपन्यासों में  सिर्फ आचार्य चतुरसेन के "वयं रक्षामः' की याद आती है। निश्चित रूप से वह उनका  एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कालजयी उपन्यास है।   इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार शिवशंकर पटनायक का  उपन्यास 'अग्नि स्नान'  भी है , जो  'वयम रक्षामः 'की तुलना में अब तक कम प्रचारित है। लेकिन प्रवाहपूर्ण भाषा में पौराणिक घटनाओं का रोचक और रोमांचक वर्णन अग्नि -स्नान ' के पाठकों को भी अंत तक अपने मोहपाश में बांधकर रखता है।  उपन्यास का मूल संदेश यही है कि व्यक्ति कितना ही विद्वान क्यों न हो ,शारीरिक ,सामाजिक ,आर्थिक,राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से कितना ही  बलशाली क्यों न हो , सिर्फ़ एक चारित्रिक दुर्बलता उसे पतन के गर्त में ढकेल देती है । 

         रावण  निश्चित रूप से महाप्रतापी था।  वेदों और पुराणों का महापंडित और भाष्यकार था । रक्ष -संस्कृति का प्रवर्तक था । उसने स्वयं वेदों की अनेक ऋचाओं के साथ  महातांडव मंत्र की भी रचना की थी। वह परम शिवभक्त था। उसकी कठिन तपस्या से प्रभावित होकर भगवान शिव ने उसे नाभिकुण्ड में अमृत होने का वरदान दिया था ।  उसने अपने  तत्कालीन समाज में अनार्यो को एकता के सूत्र में बांधने के लिए  रक्ष -संस्कृति की स्थापना की थी ।लेकिन काम -वासना के उसके चारित्रिक दुर्गुण ने , सत्ता के अहंकार ने , मायावती , वेदवती , रंभा और सीता जैसी नारियों के अपमान ने उसे युद्ध के मैदान में राम के अग्नि बाणों से शर्मनाक पराजय के साथ अग्नि -स्नान के लिए बाध्य कर दिया।

       आत्मग्लानि की आत्मकथा 

रावण की हार तो हुई ,लेकिन पत्नी मंदोदरी और भ्राता विभीषण को छोड़कर उसके समूचे वंश का नाश हो गया।  उपन्यास 'अग्नि -स्नान ' रावण के अपराध बोध और पश्चाताप की महागाथा है। उसकी आत्मग्लानि की आत्मकथा है। हालांकि इसमें उसके व्यक्तित्व की विशेषताओं को भी  उभारा गया है। 


                                                               


                                                   उपन्यासकार शिवशंकर पटनायक 

श्रीराम के हॄदय की विशालता 

   वहीं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के हॄदय की विशालता को भी प्रेरणास्पद ढंग से उपन्यास में  रेखांकित किया गया है। रणभूमि में रावण अग्नि बाणों से आहत होकर मृत्यु शैया पर है। राम अपने भ्राता लक्ष्मण को उससे राजनीति की शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजते हैं। वह कहते हैं -"महाप्रतापी ,महापंडित व महान शिव भक्त लंकेश को मैंने  पुनः प्राण तथा चेतना इसलिए प्रदान की है,ताकि अनुज लक्ष्मण लंकाधिपति से सम्यक ज्ञान ,विशेषकर राजनीति से संबंधित शिक्षा प्राप्त कर सके। " 

 श्रीराम के व्यक्तित्व से प्रभावित रावण     

   राम के व्यक्तित्व से रावण भी प्रभावित हो गया था। लक्ष्मण को शिक्षा प्रदान करने से पहले रावण उनसे कहता है -- "अल्पायु में ही राघवेंद्र श्री राम ने साधन -विहीन होकर भी जिस कला ,चातुर्य तथा व्यवहार बल से अबोध ,अज्ञानी वानर ,भालुओं को संगठित कर अपराजेय माने जाने वाले लंकाधिपति तथा समस्त समय -वीर राक्षसों को पराजित कर दिया ,उनका व्यक्तित्व ही राजनीति का सार है। भला फिर किसी राजनैतिक ज्ञान की महत्ता कहाँ रह जाती है ?" 

लक्ष्मण को रावण की शिक्षा आज भी प्रेरणादायक

इसके बावजूद  रावण जिस तरह लक्ष्मण को अपने आध्यात्मिक ज्ञान के साथ राजनीति की शिक्षा देते हैं ,वह आज के समय में भी प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक राजनीतिज्ञ के लिए जानने ,समझने और प्रेरणा ग्रहण करने लायक है। वह कहता है --"राजा को अनासक्त भाव से मनोविकारों यथा -काम ,क्रोध ,लोभ ,मोह ,मद तथा मत्सर पर विजय प्राप्त करनी चाहिए ,क्योंकि ये राजा को सार्थक उत्थान से रोकते हैं।राजा को द्यूत ,मदिरा और स्त्री-प्रसंग से भी अनिवार्य रूप से बचना चाहिए ,क्योंकि ये विवेक को नष्ट करते हैं। अविवेकी राजा में उत्तम निर्णय लेने का गुण नहीं होता ,तथा वह आगत परिणामों को भी नज़र -अंदाज़ कर जाता है,जिससे वह नष्ट तो होता ही है ,उसके कारण राज्य की प्रजा का जीवन भी नारकीय हो जाता है।" मृत्यु शैया पर पड़े रावण की आँखों में उसके वैभवशाली और शक्तिशाली राजकीय जीवन की प्रत्येक घटना किसी चलचित्र की तरह तैर रही है। वह स्वयं इनका वर्णन कर रहा है। इसमें  इस महाप्रतापी के  पश्चाताप की और आत्मग्लानि की  अनुगूंज भी है। उसे अपने जीवन की प्रत्येक घटना फ्लैशबैक में याद आ रही है। अपने पितामह ऋषि पुलस्त्य पत्नी मंदोदरी और भाई विभीषण  की नसीहतें भी उसे पतन के मार्ग पर चलने से रोक नहीं पायी।

   रक्ष -संस्कृति का नष्ट होना 

  उसने जिस अच्छे  उद्देश्य से  रक्ष -संस्कृति की स्थापना की थी ,वह उसके ही अविवेकपूर्ण  कार्यो की वजह से नष्ट  होती चली गयी। उसने ताड़का को नैमिषारण्य और वज्रमणि (सूर्पनखा)को दंडकारण्य का प्रभार सौंपा था। ताड़का और वज्र मणि के सैनिक रक्ष संस्कृति के विपरीत आचरण करते हैं। एक स्थान पर रावण कहता है --"ताड़का ,सुबाहु, मारीच तथा राक्षस -सेना ने मेरे द्वारा स्थापित संस्कृति के विरुद्ध आचरण किया था ,जबकि यज्ञ में विघ्न उपस्थित करना ,ऋषियों को अपमानित करना ,उनके आश्रमों को क्षति पहुँचाना तथा निरंकुश व मर्यादा विहीन आचरण करना वर्जित था। रावण आगे कहता है -- वास्तव में नियंत्रण के अभाव में राक्षसों की संख्या में तो कल्पनातीत वृद्धि हुई थी ,किंतु संस्कृति का भाव उनमें लेशमात्र भी नहीं था।मुझे यह स्वीकारने में संकोच नहीं है कि उनका आचरण मात्र धर्म -विपरीत ही नहीं ,अत्यंत निम्न कोटि का था।वे दुर्दांत पशु की तरह आचरण कर रहे थे।सभी आत्म केन्द्रित व पर-पीड़क हो गए थे। उनमें लंकाधिपति रावण के प्रति गर्व तो था ,किन्तु भय नहीं था। मुझे निश्चय ही अपनी संस्कृति से अनुराग था। मैंने संस्कृति के उन्नयन के लिए जिस साधना ,त्याग व युद्धबल का प्रयोग किया था ,वे सभी मुझे निरर्थक प्रतीत होने लगे थे। किसी भी संस्कृति में दया ,क्षमा ,त्याग ,संवेदनशीलता,जीवन -मूल्यों के प्रति आस्था ,धर्म ,चिंतन-दर्शन आदि तो आवश्यक हैं,साथ ही संस्कृति को अहिंसक भाव से भी युक्त होना चाहिए।किन्तु मैं जो अब राक्षसों के कृत्यों को देख रहा था ,उनकी संस्कृति में तो केवल बर्बरता,पर -पीड़ा ,हिंसा तथा अधार्मिकता की ही प्रबलता थी। मैंने शोषण ,अत्याचार तथा उत्पीड़न के विरुद्ध इस संस्कृति की कामना की थी ,किन्तु देवों अथवा आर्यों से कहीं अधिक तो राक्षस ही शोषण ,उत्पीड़न तथा अत्याचार को बढ़ावा दे ही नहीं रहे थे ,अपितु मूर्तरूप में उसे क्रियान्वित भी कर रहे थे।स्थिति तो यह थी कि जितना सत्ता -मद मुझे नहीं था ,उससे कहीं अधिक उनमें व्याप्त हो गया था । स्पष्ट प्रतीत होने लगा था कि राक्षस का अर्थ ही आतंक ,अत्याचार और बलात्कार था।" 

अविवेकपूर्ण आचरण से पतन की ओर 

रावण के इस कथन से  हालांकि यह प्रकट होता है कि रक्ष -संस्कृति को लेकर उसका  चिंतन  मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था , लेकिन वह स्वयं अविवेकपूर्ण आचरण की वजह से पतन की ओर अग्रसर हो रहा था।  उसके विद्वतापूर्ण व्यक्तित्व का एक आदर्श पहलू यह भी था कि लंका विजय के लिए प्रस्थान के पहले जब  श्रीराम समुद्र के किनारे भगवान शिव की प्राण प्रतिष्ठा करना चाह रहे थे और उन्हें इस कार्य के लिए ब्राम्हण पुरोहित नहीं मिल रहा था ,तब इस बारे में  सुनकर रावण ने स्वप्रेरणा से यह कार्य करने निर्णय लिया और एक पुरोहित का रूप धारण कर , राम की सेना के बीच आया और उनके हाथों यज्ञ सम्पन्न करवाकर शिव लिंग की स्थापना की। यह स्थान रामेश्वरम के नाम से प्रसिद्ध है।

 सदगुणों  के बावज़ूद विरोधाभासी चरित्र 

 इस प्रकार के अनेक सद्गुणों  के बावज़ूद रावण के चरित्र में भयानक  विरोधाभास था। उसने असुराधिपति तिमिधवज की पत्नी मायावती से छलपूर्वक बलात्कार किया । जो उसकी (रावण की )पत्नी मंदोदरी की बड़ी बहन थी।  बलात्कार के मानसिक आघात से पीड़ित तो थी ही ,उसका पति तिमिधवज आर्यों और देवों की सेना से हुए  एक युद्ध में मारा भी गया था। इस  दोहरी मानसिक पीड़ा ने मायावती को सती के रूप में अग्नि-स्नान के लिए बाध्य कर दिया था। उसने अपने भाई कुबेर के पुत्र जल कुबेर की प्रेयसी रंभा से बलात्कार किया। ब्रम्हर्षि कुशध्वज की पुत्री वेद कन्या वेदवती से उसकी तपस्या के दौरान  बलात्कार का प्रयास किया ,जिसने अग्नि प्रज्ज्वलित कर अपनी रक्षा की और  धरती में समा गई। लेकिन उसने रावण को श्राप दिया कि वह अगले जन्म में विदेह जनक सूता के रूप में,अयोनिजा जानकी के रूप में जानी जाएगी और उसकी मृत्यु का कारण बनेगी। वही वेदवती राजा जनक की पुत्री सीता के रूप में स्वयंवर में भगवान श्रीराम को वरण करती है, जिसका अपहरण  रावण द्वारा छलपूर्वक किया जाता है और जिसकी खोज में राम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ वानरों की सेना लेकर लंका की ओर प्रस्थान करते हैं। उपन्यास में भगवान श्रीराम द्वारा किष्किंधा नरेश वानर राज बाली की छलपूर्वक वध किये जाने की घटना का भी उल्लेख है।

    श्रीराम के समक्ष पश्चाताप

  इन समस्त घटनाओं का वर्णन मरणासन्न अवस्था मे रावण करता है।अंत मे वह युद्ध भूमि में ही भगवान श्रीराम के समक्ष पश्चाताप करते हुए अपने तमाम अपराधों को स्वीकारता है। वह कहता है -"तुमने अग्नि -बाण चलाकर मेरा सर्वस्व जला दिया।श्रीराम तुमने उचित किया।दसकंधर रावण की नियति यही है कि वह अग्नि -दग्ध होता रहे।आगत में जो नारी -अस्मिता को खंडित करने का प्रयास करेगा अथवा सामाजिक मूल्यों एवं मानवीय संवेदनाओं का हनन करने का घिनौना कृत्य करेगा,वह रावण की नियति को प्राप्त कर अग्नि -स्नान को बाध्य होगा।रावण ने भले ही गो -लोक प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त कर लिया है ,पर उसके कृत्य रावण को जीवित रखेंगे और समय स्वयमेव श्रीराम का रूप लेकर उसे अग्नि -स्नान कराता रहेगा। आगत के लिए यही सत्य , शाश्वत रूप में स्वीकार्य होगा ,क्योंकि रावण की नियति ही है अग्नि -स्नान ।"  रावण के प्रायश्चित से भरे इन वाक्यों के साथ ही 256 पृष्ठों के इस उपन्यास का समापन होता है।

शिवशंकर पटनायक : पौराणिक उपन्यासों के लेखक 

उपन्यासकार शिवशंकर पटनायक छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार हैं। वह महासमुन्द जिले के तहसील मुख्यालय पिथौरा के रहने वाले हैं। विगत कुछ वर्षों में उनके अनेक कहानी संग्रह ,निबंध संग्रह और उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। इनमें  रामायण और महाभारत के पात्रों पर केन्द्रित उपन्यास विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।  माता कौशल्या की आत्मकथा को उन्होंने 'कोशल नंदिनी ' के रूप में उपन्यास के सांचे में ढाला है तो 'आत्माहुति' केकैयी के जीवन पर आधारित है। वहीं ' भीष्म प्रश्नों की शरशैय्या पर' , 'कालजयी कर्ण'  और 'एकलव्य' महाभारत के इन चर्चित चरित्रों पर केन्द्रित हैं।  इन कृतियों ने यह साबित कर दिया है कि शिवशंकर पटनायक  पौराणिक उपन्यासों के भी  सिद्धहस्त लेखक हैं।   प्राचीन महाकाव्यों के पौराणिक चरित्रों पर अलग -अलग उपन्यास लिखना कोई मामूली  बात नहीं है। इसके लिए उनकी भावनाओं को ,उनकी संवेदनाओं को ,उनके भीतर की मानसिक उथल -पुथल को हृदय की गहराइयों से महसूस करने वाला लेखक ही इस  कठिन चुनौती को स्वीकार कर सकता है । पौराणिक घटनाओं के  तथ्यपूर्ण  वर्णन के लिए प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करना पड़ता है ,जिन्हें कथोपकथन में और पात्रों के संवादों में अपनी कल्पनाशीलता के साथ सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने पर ही एक बेहतरीन उपन्यास की रचना होती है। इस नज़रिए से देखें तो अपने अनेक पौराणिक उपन्यासों की श्रृंखला में 'अग्नि -स्नान' शिवशंकर पटनायक का एक सफल और कालजयी उपन्यास है ।-- स्वराज्य करुण 

Sunday, October 2, 2022

(आलेख) महात्मा गांधी की पहली छत्तीसगढ़ यात्रा : कुछ यादगार प्रसंगों के साथ दावे और प्रतिदावे

          (आलेख -स्वराज्य करुण   )

 राष्ट्रपिता महात्मा गांधी  वास्तव में कितनी बार छत्तीसगढ़ आए थे? एक बार या दो बार? यह सवाल इसलिए कि उनकी पहली छत्तीसगढ़ यात्रा  को लेकर विद्वानों के बीच कई दावे और प्रतिदावे हैं। कुछ विद्वानों की मानें तो गांधीजी   दो दिन के दौरे पर 20 दिसम्बर 1920 को पहली बार यहाँ आए थे ।  अगर यह  दावा प्रामाणिक है तो उनके दो दिवसीय  छत्तीसगढ़ प्रवास के प्रसंग को आज  102 साल   पूरे हो गए हैं और वह 13 वर्षों के अंतराल में ,दो बार छत्तीसगढ़ आए थे। आइए , आज गांधी जी की  153 वीं जयंती के मौके पर उन्हें नमन करते हुए  इतिहास के पन्ने पलटकर उनकी इन यात्राओं के कुछ प्रमुख प्रसंगों को याद करें । स्वर्गीय हरि ठाकुर ने अपने महाग्रंथ 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' (प्रकाशन वर्ष 2003) में 'कण्डेल नहर सत्याग्रह के सूत्रधार :बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव' शीर्षक अपने आलेख मे लिखा है कि   20 दिसम्बर 1920 को पंडित सुन्दर लाल शर्मा गांधीजी को लेकर रायपुर पहुँचे। 


                                                   




  पहली यात्रा के दावे पर प्रश्न चिन्ह क्यों ?

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 वहीं दैनिक' हरिभूमि ' के 26 दिसम्बर 2020 के अंक में कनक तिवारी  ने अपने आलेख में गांधीजी की पहली छत्तीसगढ़ यात्रा पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाया है। उनके आलेख का शीर्षक है - 'गांधी 1920 में छत्तीसगढ़ आए थे ?' कनक तिवारी इसमें लिखते हैं -- "  कुछ अरसा पहले एक संस्कृति कर्मी बुद्धिजीवी ने  उजागर किया कि वर्ष 1920 में महात्मा गांधी के छत्तीसगढ़ के रायपुर तथा धमतरी के प्रचारित प्रथम प्रवास को लेकर भरोसेमंद सबूत नहीं मिल रहे हैं। बीसियों लेख , विवरण ,पुस्तकें , इंटरव्यू और छिटपुट प्रतिक्रियाएं लगातार बताती रही हैं कि गांधी आए थे। ज़्यादातर समर्थक आश्वस्त लेखकों का जन्म 1920 के बाद हुआ है।भारत श्रुतियों और स्मृतियों का देश है।सुना हुआ मिथक इतिहास बना दिया जाता है। इतिहास लेकिन  मौखिक और दस्तावेजी सबूत मांगता है। तिवारी जी आगे लिखते हैं---  " छत्तीसगढ़ की राजनीति के शलाका पुरुष रविशंकर शुक्ल 1920 में 43 वर्ष के रहे थे। 1956 में प्रकाशित 'शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ'के पृष्ठ 44 पर उनका वाक्य है --सन 1920 की कलकत्ता की विशेष  कांग्रेस से पूर्व महात्मा गांधी रायपुर आए थे । गांधी के दिन प्रतिदिन का ब्यौरा गांधी शांति प्रतिष्ठान और भारतीय विद्या भवन बम्बई ने 1971 में मिलकर प्रकाशित किया । उसके अनुसार गांधी कलकत्ता से 17 दिसम्बर 1920 को चलकर 18 दिसम्बर को नागपुर पहुँचे ।फिर नागपुर से  8 जनवरी को चले गए।इस दरमियान गांधी 3 जनवरी को सिवनी तथा 6 और 7 जनवरी को छिंदवाड़ा प्रवास पर रहे। इस तरह कलकत्ता कांग्रेस के पहले रायपुर आने का शुक्ल का कथन समय सिद्ध नहीं है। तिवारी जी ने आगे यह भी लिखा है कि गांधी शताब्दी वर्ष 1969 में मध्यप्रदेश सरकार की पुस्तक 'मध्यप्रदेश और गांधीजी 'में उनका रायपुर ,धमतरी और कुरूद आना विस्तार से लिखते  व्यक्तियों के नाम और घटनाएं भी दर्ज हैं। लेकिन उन घटनाओं और व्यक्तियों से संबंधित तस्वीरें और समाचार पत्र जन दृष्टि में देखे नहीं जा पाए हैं। शताब्दी वर्ष में ही रविशंकर विश्वविद्यालय की एक पुस्तिका 'छत्तीसगढ़ में गांधीजी' यह तय करती है कि गांधी आए थे। हरि ठाकुर ,केयूर भूषण ,डॉ. शोभाराम देवांगन आदि का ऐसा कहना है।शोभाराम देवांगन ने आँखों देखा बयान दर्ज किया है । लेकिन कोई प्रमाण नहीं दिया।" अपने आलेख में तिवारीजी ने कई और तथ्यों के साथ अपने तर्क दिए हैं । उनके तर्क और तथ्य विचारणीय हैं ,लेकिन उनसे भिन्न राय रखने वालों ने भी गांधीजी के प्रथम छत्तीसगढ़ प्रवास को लेकर अपने संकलित तथ्यों के साथ इस प्रसंग का उल्लेख किया है और दावा भी किया है कि 1920 में गांधी जी पहली बार छत्तीसगढ़ आए थे। इस सिलसिले में  वरिष्ठ  लेखक और ब्लॉगर राहुल कुमार सिंह (Rahul Kumar Singh ) ने भी गांधी की तलाश ' शीर्षक से एक लेख लिखा है ,जिसे उन्होंने 21 सितम्बर 2020 को अपने  ब्लॉग 'अकलतरा डॉट ब्लॉग स्पॉट डॉट कॉम '  में कुछ विचारणीय तथ्यों के साथ  प्रकाशित किया है। उन्होंने इस लेख में कुछ विद्वानों द्वारा गांधीजी के प्रथम छत्तीसगढ़ प्रवास की  दी गयी अलग -अलग तारीखों का भी जिक्र किया है । मेरे विचार से इन सभी दावों और प्रतिदावों के परीक्षण के लिए तत्कालीन ब्रिटिश  प्रशासन के स्थानीय कलेक्टोरेट के रिकार्ड भी देखे जाने चाहिए । 

     स्वर्गीय हरि ठाकुर का दावा 

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    बहरहाल ,  वर्ष 2020 छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कण्डेल नहर सत्याग्रह का भी शताब्दी वर्ष था। विद्वानों के अनुसार इस सत्याग्रह में किसानों को समर्थन देने और उनका हौसला बढ़ाने के लिए यहाँ आए थे। हरि ठाकुर ने अपने विशाल ग्रंथ  'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' में पंडित सुन्दरलाल शर्मा पर केन्द्रित अपने  आलेख में लिखा है -- " महात्मा गांधी को प्रथम बार छत्तीसगढ़ में लाने का श्रेय पं सुन्दरलाल शर्मा को ही है।धमतरी नगर में गांधी जी के आगमन से त्यौहार जैसा वातावरण बन गया था । मकईबंद तालाब से सभा स्थल तक डेढ़ मील के रास्ते के दोनों ओर स्त्री ,पुरुष और बच्चों की भीड़ उनके स्वागत में खड़ी थी।सभा मंच पर गांधीजी का पहुंचना दूभर हो गया था।गांधी जी के साथ शौकत अली तथा मोहम्मद अली भी थे। इसी सभा में गांधी जी ने कण्डेल नहर सत्याग्रह के संदर्भ में पंडित सुन्दरलाल शर्मा ,नारायण राव मेघावाले , नत्थूजी जगताप तथा छोटेलाल बाबू के प्रयासों की सराहना की।"

      तेरह साल में दो बार आए थे !

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 बहरहाल , यह तो मानी हुई बात है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम  इतिहास में गांधीजी से जुड़े कई प्रसंग अमिट अक्षरों में दर्ज हैं।  उनकी छत्तीसगढ़ यात्रा के प्रसंग भी इनमें शामिल हैं। अगर उनकी पहली छत्तीसगढ़ यात्रा की पुष्टि करने वाले कुछ विद्वानों की मानें तो गांधी जी ने  वर्ष 1920 से 1933 के बीच  लगभग तेरह वर्षो के अंतराल में दो बार छत्तीसगढ़ का दौरा किया था।वह कुल 9 दिनों तक यहाँ के अलग -अलग इलाकों में गए।  किसानों ,मज़दूरों और आम नागरिकों से मिले । गांधी जी  जी पहली बार वर्ष 1920 में यहाँ आए थे । वह 20 और 21 दिसम्बर तक यहाँ रहे। उनकी इस   पहली यात्रा  का  मुख्य उद्देश्य था -कण्डेल (धमतरी )  में हुए नहर सत्याग्रह में शामिल किसानों का हौसला बढाना और उनके अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करना । 

क्यों हुआ था कण्डेल नहर सत्याग्रह ?

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 स्वर्गीय हरि ठाकुर के लेख के अनुसार अगस्त  1920 में भरपूर वर्षा और खेतों में पर्याप्त पानी होने के बावज़ूद अंग्रेज सरकार ने कण्डेल  के किसानों पर पानी चोरी का झूठा इल्ज़ाम लगाकर  सिचाई  टैक्स की जबरन वसूली का भी आदेश जारी कर दिया था । प्रशासन ने किसानों पर 4050 रुपए का सामूहिक जुर्माना लगा दिया ।इसकी वसूली नहीं हुई तो किसानों को उनके पशुधन की कुर्की करने की नोटिस जारी कर दी गयी । किसानों के मवेशियों को ज़ब्त भी किया गया और साप्ताहिक हाट -बाजारों में उनकी नीलामी के भी प्रयास किए  गए  ,लेकिन ग्रामीणों की एकता के आगे प्रशासन की तमाम कोशिशें बेकार साबित हुईं।  सिंचाई टैक्स और जुर्माने के   आदेश के ख़िलाफ़ किसानों ने बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव के नेतृत्व में' नहर  सत्याग्रह " शुरू कर दिया । अंचल के नेताओं ने इस आंदोलन में जोश भरने के लिए  महात्मा गांधी  को बुलाने का निर्णय लिया । छोटेलाल जी के आग्रह पर उन्हें  20 दिसम्बर 1920 को पण्डित सुन्दरलाल शर्मा अपने साथ कोलकाता से  रायपुर लेकर आए ।

   गांधी जी के आगमन से पहले ही

   अंग्रेज प्रशासन बैकफुट पर 

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गांधी जी  रेलगाड़ी में यहाँ पहुँचे । यह महात्मा गांधी  के प्रभावी व्यक्तित्व का ही जादू था कि उनके  आगमन की ख़बर मिलते ही  अंग्रेज प्रशासन बैकफुट पर आ गया और उसे सिंचाई टैक्स की जबरिया  वसूली का हुक्म  वापस लेना पड़ा ।  

             रायपुर में विशाल आम सभा 

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गांधी जी  ने 20 दिसम्बर की शाम रायपुर में एक विशाल आम सभा को भी सम्बोधित किया । जहाँ पर उनकी  आम सभा हुई ,वह स्थान आज गांधी  मैदान के नाम से जाना जाता है। वह रायपुर से  21 दिसम्बर को रायपुर से मोटरगाड़ी में धमतरी गए थे ,जहाँ आम जनता और किसानों की ओर से पंडित  सुन्दरलाल शर्मा और छोटेलाल श्रीवास्तव सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने उनका स्वागत किया । गांधी जी  ने धमतरी में आम सभा को भी सम्बोधित किया और रायपुर आकर नागपुर के लिए रवाना हो गए ।

             गांधी जी की  दूसरी छत्तीसगढ़ यात्रा 

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        दूसरी बार वह वर्ष 1933 में छत्तीसगढ़ आए थे ।इस बार उंन्होने  22 नवम्बर से 28 नवम्बर तक याने कुल 7  दिनों तक इस अंचल का सघन दौरा किया ।  इस बीच वह दुर्ग ,रायपुर , धमतरी और बिलासपुर सहित मार्ग में कई गाँवों और शहरों के लोगों से मिलते रहे । उनकी यह  दूसरी छत्तीसगढ़ यात्रा इस मायने में भी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है कि इसी दरम्यान उंन्होने भारतीय समाज में व्याप्त ऊँच -नीच के भेदभाव के ख़िलाफ़ जन -जागरण के विशेष अभियान की शुरुआत भी यहाँ की धरती से की।  

      छत्तीसगढ़ के इतिहास में यह भी दर्ज है कि इस अंचल में अस्पृश्यता निवारण का कार्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी  पण्डित सुन्दरलाल शर्मा पहले ही शुरू कर चुके थे ।  उन्होंने वर्ष 1918 में दलितों को जनेऊ पहना कर सवर्णों की बराबरी में लाने का ऐतिहासिक कार्य करते हुए सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में सामाजिक जागरण का शंखनाद कर दिया था। वर्ष 1918 में ही उन्होंने राजिम स्थित भगवान राजीवलोचन के प्राचीन मन्दिर में अछूत समझे जाने वाले कहार (भोई )समुदाय को प्रवेश दिलाने का अभियान चलाया था। साहित्यकार स्वर्गीय हरि ठाकुर के  अनुसार  वर्ष 1924 में पण्डित सुन्दरलाल शर्मा ने  ठाकुर प्यारेलाल सिंह और घनश्याम सिंह गुप्त  के साथ रायपुर में 'सतनामी आश्रम' की स्थापना की थी। 

        पंडित सुन्दरलाल शर्मा की तारीफ़

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     नवम्बर 1933 में छत्तीसगढ़ के  दूसरे प्रवास में भी गांधी जी ने  रायपुर में  आम सभा को सम्बोधित किया ,जहाँ उंन्होने  छुआछूत मिटाने के लिए पण्डित सुन्दरलाल शर्मा द्वारा किए गए कार्यों की तारीफ़ करते हुए उन्हें अपना गुरु कहकर सम्मानित किया।  इस दौरान धमतरी की आम सभा में गाँधीजी ने कण्डेल के किसानों के नहर सत्याग्रह आंदोलन  को भी याद किया और कहा कि यह दूसरा 'बारादोली' है। उंन्होने इसके लिए बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव , पण्डित सुन्दरलाल शर्मा , नारायणराव मेघावाले और नत्थूजी जगताप जैसे किसान नेताओं की भी जमकर तारीफ़ की।  महात्मा गांधी  स्वतंत्रता संग्राम की सफलता के लिए देश में सामाजिक समरसता और समानता की भावना पर बहुत बल देते थे।     

   राजाओं के कॉलेज में राजकुमारों से 

   क्या कहा गांधी जी ने ?

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         उन्होंने दूसरी बार के अपने  छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान 24 नवम्बर 1933 को रायपुर स्थित राजाओं के कॉलेज याने राजकुमार कॉलेज में विद्यार्थियों को सम्बोधित किया । ये सभी विद्यार्थी छत्तीसगढ़ और देश की विभिन्न रियासतों के राजवंशों से ताल्लुक रखते थे। गांधीजी ने उनसे कहा था - "आप विश्वास कीजिए कि आप में और साधारण लोगों में कोई अंतर नहीं है। अंतर केवल इतना है कि आपको जो मौका मिला है,वह उन्हें नहीं दिया जाता।"  उंन्होने राजकुमारों से आगे कहा था --"अगर आप भारत के ग़रीबों की पीड़ा समझना नहीं सीखेंगे तो आपकी शिक्षा व्यर्थ है।  हिन्दू धर्म में जब प्राणी मात्र को एक मानने की शिक्षा दी गयी है ,तब मनुष्यों को जन्म से ऊँचा या नीचा मानना उसके अनुकूल हो ही नहीं सकता ।" 

         महात्मा गांधी का प्रेरणादायक प्रभाव 

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      छत्तीसगढ़ में   वर्ष 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में  सोनाखान के अमर शहीद वीर नारायण सिंह के सशस्त्र संघर्ष की अपनी गौरव गाथा है  ,वहीं बाद के वर्षों में महात्मा गांधी  के अहिंसक आंदोलनों के प्रेरणादायक प्रभाव से भी यह इलाका अछूता न रहा । जनवरी 1922 में आदिवासी बहुल सिहावा क्षेत्र में श्यामलाल सोम के नेतृत्व में हुआ 'जंगल सत्याग्रह' इसका एक बड़ा उदाहरण है ,जिसमें सोम सहित 33 लोग गिरफ़्तार हुए थे और जिन्हें तीन महीने से छह महीने तक की सजा हुई थी। वनों पर वनवासियों के परम्परागत अधिकार ख़त्म किए जाने और वनोपजों पर अंग्रेजी हुकूमत के एकाधिकार के ख़िलाफ़ यह सत्याग्रह हुआ था।  इस आंदोलन में भी पण्डित सुन्दरलाल शर्मा , नारायणराव मेघा वाले और बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव जैसे नेताओं ने भी सक्रिय भूमिका निभाई ।

    मई 1922 में सिहावा में सत्याग्रह का नेतृत्व करते हुए गिरफ़्तार होने पर  पण्डित शर्मा को एक वर्ष और मेघावाले को आठ महीने  का कारावास हुआ । वर्ष 1930 में गाँधीजी के आव्हान पर  स्वतंत्रता सेनानियों ने  धमतरी तहसील में जंगल सत्याग्रह फिर शुरू करने का निर्णय लिया  । इसके लिए धमतरी में नत्थूजी जगताप के बाड़े में सत्याग्रह आश्रम स्थापित किया गया। गिरफ्तारियां भी हुईं। रुद्री में हुए जंगल सत्याग्रह के दौरान पुलिस की गोली से एक सत्याग्रही मिंटू कुम्हार शहीद हो गए। 

    पण्डित रविशंकर शुक्ल ,पण्डित वामन बलिराम लाखे,पण्डित भगवती प्रसाद मिश्र ,बैरिस्टर छेदीलाल , अनन्त राम बर्छिहा , क्रान्तिकुमार भारतीय , यति यतन लाल ,डॉ.खूबचन्द बघेल , डॉ.ई.राघवेन्द्र राव ,मौलाना रऊफ़ खान ,महंत लक्ष्मीनारायण दास जैसे कई दिग्गज स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत से अंग्रेजी हुकूमत को समाप्त करने के लिए गांधी जी  के  बताए मार्ग पर चलकर इस अंचल में राष्ट्रीय चेतना की अलख जगायी।

       आलेख    -स्वराज्य करुण 


Saturday, October 1, 2022

(आलेख) देश -प्रदेश की सैर के लिए घुमक्कड़ जंक्शन में आइए

                                 (आलेख -- स्वराज्य करुण )

अगर आप अपने देश और प्रदेश के अल्पज्ञात और अज्ञात लेकिन दर्शनीय स्थलों की सैर करना चाहते हैं , लोक जीवन और लोक संस्कृति को नज़दीक से देखना ,समझना चाहते हैं , तो घुमक्कड़ जंक्शन में आइए ,जहाँ 2022 की  स्मारिका की ट्रेन आपको इस दिलचस्प यात्रा पर ले जाएगी। विश्व पर्यटन दिवस के मौके पर छत्तीसगढ़ के  वरिष्ठ ब्लॉगर एवं इंडोलॉजिस्ट ललित शर्मा (Kumar Lalit )द्वारा सम्पादित इस  वार्षिक स्मारिका में मेरा भी एक आलेख प्रकाशित हुआ है ,जो  छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में महानदी के तटवर्ती और ओड़िशा प्रांत के सीमावर्ती  पुसौर कस्बे की डेढ़ सौ साल पुरानी रामलीला के बारे में है। यह स्मारिका छत्तीसगढ़ सहित देश के कुछ अन्य पर्यटन स्थलों के बारे में विभिन्न क्षेत्रों के लेखकों के सुरुचिपूर्ण आलेखों से सुसज्जित है।  छत्तीसगढ़ के भाटापारा शहर से 15 किलोमीटर पर शिवनाथ नदी में स्थित मांडूक्य द्वीप के बारे में श्रीमती श्रुति प्रिया शर्मा ने अपने आलेख में महत्वपूर्ण और रोचक जानकारियाँ दी हैं। इस द्वीप को बोलचाल में मदकू द्वीप भी कहा जाता है।

                                              





                                                                           



क्या आपने सुना है कि देश में कहीं मानसून का भी मन्दिर है ? जी हाँ , भगवान जगन्नाथ जी का यह मंदिर उत्तरप्रदेश में कानपुर शहर से 35 किलोमीटर पर ग्राम बेहेटा बुजुर्ग में स्थित है। इस मंदिर का शिल्प जगन्नाथ जी के पारम्परिक मंदिरों से कुछ अलग है। दिल्ली के निरुपम शर्मा ने अपने आलेख में जानकारी दी है कि विश्व का यह इकलौता जगन्नाथ मंदिर है जो रथ के आकार का है और  यह पद्मकोश रूप में निर्मित है। इसके शिखर पर स्थापित शिला , वर्षा का पूर्वानुमान देती है। यहाँ तक कि बारिश कब होगी और संभावित बारिश की मात्रा की पूर्व सूचना भी इस शिला खण्ड से मिलती है।स्मारिका के सम्पादक ललित शर्मा  स्वयं एक घुमक्कड़ लेखक हैं और अपने  जिज्ञासु स्वभाव की वजह से देश का भ्रमण करते रहते हैं। उन्होंने स्मारिका में ' आओ लौट चलें गाँवों की ओर 'शीर्षक अपने आलेख में घुमक्कड़ी को जीवन की चलती -फिरती पाठशाला' के रूप में परिभाषित किया है। स्मारिका की कव्हर स्टोरी में उन्होंने छत्तीसगढ़ में पर्यटन के विविध आयामों पर प्रकाश डाला है।उनका एक अन्य  आलेख गरियाबंद जिले के फिंगेश्वर तहसील के एक ऐसे गाँव को लेकर है ,जिसे जनश्रुतियों के अनुसार देवताओं ने उजाड़ दिया था।  यह गाँव चंदली पहाड़ी पर बसा हुआ था । इसका नाम टेंवारी था , जो अब वीरान है ,लेकिन वहाँ पर एक शिव मंदिर है। 

  गरियाबंद जिले के अमलीपदर गाँव की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में डॉ. संध्या शर्मा के आलेख में कई रोचक तथ्य आपको मिलेंगे। वहीं डॉ. पीसीलाल यादव के आलेख में  राजनांदगांव से 70 किलोमीटर पर स्थित उनके  गृह ग्राम (अब नगर पंचायत)गंडई के इतिहास की जानकारी मिलती है। डॉ. यादव के अनुसार अंग्रेजों के आने के पहले गंडई का प्राचीन नाम 'गंगई' था ,जो उनके उच्चारण दोष की वजह से गंडई हो गया।  स्मारिका में ललित भाई  अपने एक आलेख में हमें उत्तराखंड की एक पहाड़ी के शिखर पर स्थित ग्राम बासुरी की भी सैर कराते हैं। खरगोन (मध्यप्रदेश)के नवग्रह मंदिर के बारे में इंदौर की कविता शर्मा ,भटगांव(छत्तीसगढ़)की ग्राम देवी के बारे में ज्ञानेन्द्र पाण्डेय ,सरगुजा के वनवासियों की वर्तमान जीवन शैली के बारे में जयेश वर्मा ,राजनांदगांव जिले के ग्राम जामरी के ऐतिहासिक महत्व पर दीनदयाल साहू के आलेख भी पठनीय हैं। कवर्धा के घुमक्कड़ फोटोग्राफर और पत्रकार गोपी सोनी ने छत्तीसगढ़ के कवर्धा और मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिलों के सरहदी इलाकों में निवासरत बैगा जनजाति के युवाओं में प्रचलित गन्धर्व विवाह के बारे में लिखा है। उनके आलेख के अनुसार उस क्षेत्र के एक गाँव में मंडई के दौरान युवा पान खिलाकर एक दूसरे के जीवन साथी का चुनाव कर लेते हैं।रंग बिरंगे चित्रों के साथ आकर्षक कलेवर की इस  स्मारिका में ऐसे और भी कई दिलचस्प आलेख हैं।  - स्वराज्य करुण 

Friday, September 30, 2022

(आलेख) लगभग उतर चुका है दिमागी बुख़ार !

                                    (आलेख : स्वराज्य करुण   )

क्या कारण है कि जनता में  टेलीविजन चैनलों को देखने की पहले जैसी दिलचस्पी अब कहीं नज़र नहीं आती ? पहले तो  लोग  इस छोटे ,रुपहले पर्दे पर हिलती -डुलती ,बोलती तस्वीरों को टकटकी लगाकर बड़े आश्चर्य से  देखा करते थे अब ऐसे लोग विलुप्त प्रजाति में गिने जाते हैं  ।  ठीक भी है। छोटे परदे  पर बड़े -बड़ों की बड़बड़ाहट और  बड़ी -बड़ी बकवास सुनने,देखने  वाले ऐसे  ऐसे फुर्सत अली अब इक्के-दुक्के ही रह गए हैं ! लोग टी.व्ही. के पर्दे को नहीं ,बल्कि इन फुर्सत अलियों को अब आश्चर्य से देखा करते हैं ! लगता है कि  कुछ ही दशकों में लोगों के दिलों  से टीव्ही चैनलों का दिमागी बुख़ार ,देखते ही देखते , तेजी से उतरने लगा है। लगभग उतर ही चुका है। आप स्वयं अपने घरों में या पास -पड़ोस में इसे महसूस कर सकते हैं। यह एक शुभ संकेत है। पहले क्रिकेट की रनिंग कमेंट्री देखने के लिए छोटे पर्दे के सामने जिस तरह क्रिकेट प्रेमियों का जमावड़ा लगता था , वह भी अब नज़र नहीं आता। अब तो कब ,कहाँ कोई राष्ट्रीय ,अंतरराष्ट्रीय मैच हो रहा है , यह जानने की रुचि भी (जिनके घरों में टीव्ही है) उनमें   नहीं रह गयी है। 

     इसमें दो राय नहीं कि आज के युग में ,  एक स्वस्थ लोकतंत्र में  लोक -अभिव्यक्ति ,मनोरंजन और सूचनाओं तथा विचारों   के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में जनता को अख़बारों के साथ -साथ रेडियो और टीव्ही चैनलों की भी जरूरत होती है।अख़बार और रेडियो तो फिर भी काफी कुछ ठीक हैं ,लेकिन मेरा निजी आंकलन है कि  टेलीविजन चैनलों के प्रति जनता की दिलचस्पी लगातार घटती जा रही है। लोग टीव्ही देखना समय की बर्बादी मानने लगे हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं।मेरे ख़्याल से पहला कारण तो यह है कि पहले की तुलना में अब प्राइवेट चैनलों की भरमार हो गयी है। इक्का -दुक्का से बढ़कर उनकी संख्या सैकड़ों -हजारों में पहुँच गयी है। किसे देखें और किसे न देखें ?  दूसरा कारण है उनमें समाचारों और कार्यक्रमों के दौरान आने वाले अनगिनत अटपटे ,अतिशयोक्तिपूर्ण और अविश्वसनीय विज्ञापनों की भरमार ,जिनकी वजह से दर्शक ऊब जाते हैं और रिमोट बटनों से चैनल बदलने लगते हैं ,लेकिन ऐसे इश्तहारों से उन्हें तब भी राहत नहीं मिलती। सभी चैनलों में कार्यक्रमों के बीच ब्रेकिंग टाइम एक ही वक्त पर शुरू होता है और देर तक चलता है। 

    तीसरा कारण  लगभग सभी चैनलों की ,खास तौर पर न्यूज चैनलों की ,अपनी -अपनी वैचारिक राजनीतिक और व्यावसायिक   प्रतिबद्धता ,जो उनके डिबेट आदि के कार्यक्रमों में साफ़ झलकती है , जिनमें एंकरों की वाणी से ऐसा लगता है कि वे किसी खास रसूखदार व्यक्ति , दल अथवा संस्था के अघोषित प्रवक्ता के तौर पर या प्रचारक के रूप में बातें कह रहे हैं ,जबकि उनका काम मंच -संचालक के रूप में  सिर्फ़ इतना होना चाहिए कि वे उस कार्यक्रम में वक्ताओं अथवा प्रतिभागियों को बारी -बारी से बुलाएं और उन्हें बोलने का मौका दें । पर उनमें यह निष्पक्षता कहीं नज़र नहीं आती । चौथा कारण  मेरे ख़्याल से यह है कि जन सरोकारों से बहुत दूर अमीरों की ऐशोआराम को महिमामंडित करते बेहूदे धारावाहिकों और भोंडे कॉमेडी सीरियलों से जनता बोर हो चुकी है।  कला -संस्कृति के साथ -साथ किसानों ,मज़दूरों ,छात्र -छात्राओं और बेरोजगारों के हितों से जुड़े कार्यक्रम 99 प्रतिशत चैनलों में नज़र नहीं आते।  दूरदर्शन एक अपवाद हो सकता है।इसके अलावा पाँचवा कारण भी बहुत स्पष्ट है।  अब अधिकांश जनता समझने लगी है कि  ये प्राइवेट चैनल अरबों -- खरबों रुपयों की दौलत के मालिक  बड़े -बड़े सेठ -साहूकारों द्वारा खरीदे जा चुके हैं।  इनमें आने वाले कार्यक्रम भी उनके मालिकों की पसंद के होते हैं। एंकरों का रिमोट भी उन्हीं के हाथों में रहता है। स्वाभाविक है ,जो व्यक्ति  पूंजी लगाएगा ,वह अपने व्यावसायिक हितों का ध्यान तो रखेगा ही। 

 छठवां कारण इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया का बढ़ता  मायाजाल भी है। लोग अब टीव्ही के बजाय यूट्यूब चैनलों में दिलचस्पी लेने लगे हैं , हालांकि ख़बरों के मामले में  निष्पक्षता उनमें भी  नहीं है। फूहड़ कार्यक्रम उनमें भी ख़ूब आ रहे हैं। लेकिन  इस बुख़ार से भी  अगले कुछ दशकों में लोगों को मुक्ति मिल सकती है ,ऐसा मेरा मानना है। अगर आपको लगता है कि इन सबके अलावा और भी कई कारण  हैं तो कृपया साझा कीजिए।

-- स्वराज करुण।

Tuesday, September 27, 2022

(आलेख) दलबदलुओं को उनके निर्वाचित पदों से बर्ख़ास्त माना जाए : चुनाव खर्च की भी हो वसूली

(आलेख : स्वराज्य करुण )

दलबदल चाहे व्यक्तिगत हो या सामूहिक , दोनों ही स्थितियों में ,संसद और विधान सभाओं समेत अन्य सभी  निर्वाचित संस्थाओं से दलबदलुओं की सदस्यता स्वयमेव समाप्त हो जानी चाहिए। इसके लिए किसी कानूनी औपचारिक की जरूरत न हो। किसी ने दल बदला यानी उसे उसके निर्वाचित पद से ऑटोमेटिक बर्ख़ास्त माना जाए। जिस निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचित व्यक्ति ने दलबदल किया हो  उस निर्वाचनक्षेत्र में चुनाव करवाने में हुए सरकारी खर्च  की वसूली भी उसी व्यक्ति से  की जाए। ऐसे प्रावधान होने  चाहिए। कुछ लोगों ने लोकतंत्र का मज़ाक बना रखा है ! ऐसे प्रावधानों से उनको सबक मिलेगा।  

 कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि अगर दल बदल रहा है तो  इसका  मतलब  है कि वह व्यक्ति जनता को धोखा दे रहा है , क्योंकि वह किसी दल विशेष का प्रत्याशी बनकर उसके चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ता है ,उस दल और चुनाव चिन्ह के लिए व्होट मांगता है ,मतदाता भी उस पर भरोसा करके उस चिन्ह पर व्होट देकर उसे विजयी बनाते हैं। ऐसे में उस निर्वाचित व्यक्ति के द्वारा अचानक दल बदल करना एक प्रकार से मतदाताओं को धोखा देना नहीं तो और क्या है ?  अगर किसी को दलबदल करना ही है तो वह पहले अपने निर्वाचित पद से इस्तीफ़ा दे और जिस दल में जाना चाहता है ,उसका सदस्य बने , फिर चुनाव लड़कर और जीतकर दिखाए। आम जनता के भी यही विचार हैं।

                      

ललितडॉटकॉम: "मेरे दिल की बात" का विमोचन के बाद चले गुजरात की ओ...

 ललित भाई की यह पोस्ट लगभग ग्यारह साल पुरानी यादों को ताज़ा कर रही है। 

ललितडॉटकॉम: "मेरे दिल की बात" का विमोचन के बाद चले गुजरात की ओ...: छत्तीसगढ के यशस्वी ब्लॉगर साहित्यकार स्वराज्य करुण का नाम परिचय का मोहताज नहीं है,लगभग-35-40 वर्षों से उनकी सतत साहित्य साधना जारी है। एक द...