Friday, August 16, 2019

(स्मृति आलेख ) क्या -क्या नहीं थे हरि ठाकुर ?

                                     - स्वराज करुण 
व्यक्तित्व एक ,लेकिन कृतित्व अनेक ।  स्वर्गीय हरि ठाकुर के संदर्भ में यह बात बिल्कुल सटीक  बैठती है । सोच रहा हूँ -आज उनकी जयंती पर हम उन्हें किस रूप में याद करें ? क्या -क्या नहीं थे वह ?
      हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं के  एक ऐसे कवि थे  ,जिनकी कविताओं में और जिनके गीतों में  अन्याय और शोषण की जंजीरों से माटी -महतारी  की मुक्ति की बेचैन अभिव्यक्ति मिलती है । वह एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी , इतिहासकार , पत्रकार , लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के अग्रणी नेता भी थे । छत्तीसगढ़ के इतिहास और यहाँ की कला -संस्कृति , बोली और भाषा का उन्होंने गहन अध्ययन करते हुए कई गंभीर आलेख भी लिखे ।  छत्तीसगढ़ में  वर्ष 1857 के  अमर शहीद वीर नारायण सिंह सहित यहाँ की अनेक  महान विभूतियों की प्रेरणादायी जीवन गाथा उनकी लेखनी से जनता के सामने आयी ।
     उनका जन्म 16 अगस्त 1927 को रायपुर में हुआ था । उनके पिता स्वर्गीय प्यारेलाल सिंह ठाकुर   एक महान श्रमिक नेता ,आज़ादी के आंदोलन के महान योद्धा , सहकारिता आंदोलन के कर्मठ नेता , पत्रकार , विधायक और रायपुर नगरपालिका के तीन बार निर्वाचित अध्यक्ष रह चुके थे ।  स्वर्गीय हरि नारायण सिंह ठाकुर (हरि ठाकुर ) को देश और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा अपने क्रांतिकारी पिता जी से विरासत में मिली थी।  हरि ठाकुर का निधन तीन दिसम्बर 2001 को हुआ ।  ।   
अपने इस आलेख के साथ मैं स्वर्गीय डॉ. राजेन्द्र सोनी द्वारा सम्पादित साहित्यिक पत्रिका 'पहचान -यात्रा ' के   जून 2002 के 'हरि ठाकुर विशेषांक ' का मुखपृष्ठ भी प्रस्तुत कर रहा हूँ ,जिसमें उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर साहित्यकारों और पत्रकारों के आलेख शामिल हैं ।  इसी विशेषांक में छत्तीसगढ़ी भाषा मे  हरि ठाकुर द्वारा रचित दो नाटक भी प्रकाशित किए गए हैं ।इनमें से एक नाटक का  शीर्षक है ' पर बुधिया ' ।दूसरा नाटक स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में छत्तीसगढ़ में हुए  'तमोरा सत्याग्रह'  पर आधारित है ।
     उनके देहावसान  के अगले  दिन राजधानी रायपुर के मारवाड़ी श्मशान घाट में सैकड़ों लोगों ने अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें अंतिम बिदाई दी । उसी दिन छत्तीसगढ़ विधान सभा की बैठक  में उन्हें विशेष रूप से श्रद्धाजंलि दी गयी ।  तबके अध्यक्ष स्वर्गीय श्री राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल ने निधन उल्लेख करते हुए सदन में उनका जीवन परिचय प्रस्तुत किया । तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अजीत जोगी और तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष श्री नन्द कुमार साय समेत अनेक सदस्यों ने स्वर्गीय श्री हरि ठाकुर की  संघर्षपूर्ण और गौरवपूर्ण जीवन यात्रा पर प्रकाश डाला । उन सभी के वक्तव्य भी इस विशेषांक में संकलित हैं। श्री अजीत जोगी ने सदन में शोक उदगार कुछ इन शब्दों में व्यक्त किए थे -

 "माननीय अध्यक्ष महोदय , आज प्रातः 10 बजे जब कंचन की काया को चंदन की चिता पर लिटाकर अग्नि दी गयी ,तो उस चिता के सामने खड़ा मैं स्वर्गीय हरि ठाकुर को प्रणाम करते हुए यह याद कर रहा था  कि उनके रूप में मानो एक युग का अंत हो गया  , पटाक्षेप हो गया ।एक ऐसे छत्तीसगढ़ के सपूत को हमने खोया ,जो एक साथ न जाने क्या -क्या था ? कवि था ,साहित्यकार था ,इतिहासकार था और छत्तीसगढ़ के संदर्भ में ,छत्तीसगढ़ के  इतिहास के संदर्भ में ,छत्तीसगढ़ के गौरवशाली रत्नों के संदर्भ में एक चलते फिरते ग्रन्थ थे । लिविंग इनसाइक्लोपीडिया थे ,यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी ।...श्री हरि ठाकुर ने छत्तीसगढ़ की अस्मिता से हम  छत्तीसगढ़ियों को अवगत कराया । मेरा अनेक संदर्भो में उनके साथ सम्पर्क रहा ,सानिध्य रहा ।  मुझे याद आ रहा है एक दिन मैंने दुःखी होकर उनसे पूछा था -" छत्तीसगढ़ के इतने आंदोलन चलते हैं ।आप सबमें शामिल हो जाते हैं । आप वास्तव में हैं किसके साथ ? उन्होंने जवाब दिया - " मैं तो छत्तीसगढ़ राज्य बनाने वाले के साथ हूँ। कोई भी आंदोलन चलाएगा ...हरि ठाकुर उसके साथ रहेगा,तब तक साथ रहेगा ,जब तक छत्तीसगढ़ राज्य नहीं बन जाता ।"

         साहित्यिक पत्रिका 'पहचान यात्रा ' के इस विशेषांक में  छत्तीसगढ़ी भाषा के क्रमिक विकाश पर भी स्वर्गीय श्री  हरि ठाकुर का एक आलेख शामिल है ,जिसका शीर्षक है  'छत्तीसगढ़ी का प्राचीन नाम कोसली या महाकोसली ?' उनके निधन के बाद रायपुर में गठित हरि ठाकुर स्मारक संस्थान ने   छत्तीसगढ़ के इतिहास और राज्य की संस्कृति तथा महान विभूतियों से जुड़े उनके विभिन्न आलेखों का एक वृहद संकलन 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' शीर्षक से प्रकाशित किया । यह विशाल ग्रन्थ उनके जन्म दिन 16 अगस्त 2003 को प्रकाशित हुआ । ग्रन्थ का सम्पादन डॉ. विष्णुसिंह ठाकुर, डॉ. देवीप्रसाद वर्मा 'बच्चू जाजगीरी ' और आशीष सिंह ने किया है ।
     हरि ठाकुर सन १९४२ में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गांधीजी के आव्हान पर असहयोग आन्दोलन में भी शामिल हुए . देश की आज़ादी के बाद वर्ष १९५५ में उन्होंने गोवा मुक्ति आन्दोलन में हिस्सा लिया .इसके पहले वह  विनोबाजी के सर्वोदय और भूदान आन्दोलन से जुड़े और १९५४ में  उन्होंने नागपुर से  प्रकाशित भूदान आन्दोलन की पत्रिका '  साम्य  योग ' का सम्पादन किया .उन्होंने वर्ष १९६५ में छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की .
       रायपुर में उन्होंने वर्ष १९६७ में अपने  पिताजी के साप्ताहिक समाचार पत्र 'राष्ट्रबन्धु' के प्रकाशन और सम्पादन का दायित्व संभाला .नब्बे के दशक में वह  छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आन्दोलन के लिए सर्वदलीय मंच के  संयोजक रहे . एक नवम्बर २००० को छत्तीसगढ़ राज्य बना ,लेकिन अफ़सोस कि वह अपने सपनों के छत्तीसगढ़ को एक राज्य के रूप में विकसित होते ज्यादा समय तक नहीं देख पाए और राज्य बनने के सिर्फ लगभग तेरह  महीने  में ३ दिसम्बर  २००१ को उनका देहावसान हो गया . अगले दिन चार दिसम्बर को  छत्तीसगढ़ विधान सभा के  शीत कालीन सत्र पक्ष-विपक्ष के सभी सदस्यों ने  शोक-प्रकट करते हुए उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि दी .
        स्वर्गीय हरि ठाकुर  छत्तीसगढ़ की पुरानी और नयी ,दोनों ही पीढ़ियों के बीच सामान रूप से लोकप्रिय साहित्यकार थे वर्ष १९९५ में उनकी प्रेरणा से रायपुर में नये-पुराने लेखकों और कवियों ने मिलकर साहित्यिक संस्था 'सृजन सम्मान ' का गठन किया . उन्हें इस संस्था का अध्यक्ष बनाया गया था  . छत्तीसगढ़ के इतिहास , साहित्य और यहाँ  की कला -संस्कृति का उन्होंने गहरा अध्ययन किया था  । वर्ष १९७० -७२ में बनी दूसरी छत्तीसगढ़ी फिल्म 'घर-द्वार ' में लिखे उनके  के गीतों को  अपार लोकप्रियता मिली .इनमें से  मोहम्मद रफ़ी की दिलकश आवाज़ में  एक गीत ' गोंदा फुलगे मोरे राजा ' तो आज भी कई लोगों की जुबान पर है.
  हरि ठाकुर के  हिन्दी  कविता संग्रहों में 'लोहे का नगर ' और  नये विश्वास के बादल ' छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रहों में 'सुरता के चन्दन '   हिन्दी शोध-ग्रन्थों  में 'छत्तीसगढ़  राज्य का प्रारंभिक  इतिहास' ,  'उत्तर कोसल बनाम दक्षिण कोसल' विशेष रूप  से उल्लेखनीय हैं .उन्होंने   अपनी  कविताओं  में हमेशा आम जनता के दुःख-दर्द  को अभिव्यक्ति दी । उन्होंने गीत विधा के साथ -साथ अतुकांत कविताएँ भी लिखीं । अपनी कविताओं के माध्यम से उन्होंने  देश की  सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों पर तीखे प्रहार  किए . बानगी  देखिये -

नदी वही है ,नाव वही है
लेकिन वह मल्लाह नहीं है ।
धन बटोरने की चिन्ता में ,
जनहित की परवाह नहीं है ।।
       
  वस्तुतः स्वर्गीय हरि ठाकुर का सुदीर्घ साहित्यिक और सार्वजनिक जीवन उन हजारों , लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का प्रकाश पुंज है ,जो अपने देश और अपनी धरती के लिए कुछ करना चाहते हैं । वरना यह मनुष्य देह भी क्या है ,जो जन्म लेकर यूँ ही निरुद्देश्य मर -खप जाती है ,लेकिन जिन लोगों के जीवन का पथ उतार -चढ़ाव से  भरे दुर्गम पर्वतों से  होकर गुजरता है और जिनकी जीवन यात्रा उस पथरीले पथ पर मानवता के कल्याण का मकसद लेकर चलती है , वो  इतिहास बनाकर  लोगों के दिलों में हरि ठाकुर की तरह हमेशा के लिए यादगार बनकर रच -बस जाते हैं ।
  - स्वराज करुण

Thursday, August 15, 2019

(आलेख )प्राइवेट बनाम सरकारी : शिक्षा में किसका पलड़ा भारी ?

                                -- स्वराज करुण 
 अगर कोई पूछे कि सरकारी और प्राइवेट शिक्षा संस्थानों में पढ़ाई और रिजल्ट के मामले में  किसका पलड़ा भारी है तो मुझ जैसे अधिकतर लोग सरकारी संस्थाओं के पक्ष में होंगे । लेकिन आज की स्थिति में समाज का मानसिक झुकाव सिर्फ़ 'शो-बाजी'  के कारण प्राइवेट संस्थाओं की ओर बढ़ता जा रहा है ,जो हमारी नयी और भावी पीढ़ियों के लिए घातक हो सकता है ।
     गंभीरता से विचार करें और देखें तो मालूम होगा कि देश के उच्च और सर्वोच्च  पदों पर आसीन 99 प्रतिशत  वर्तमान और भूतपूर्व महानुभावों ने अपनी प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा सरकारी स्कूलों और सरकारी कॉलेजों में हासिल की है ,जिनमें राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों सहित बड़ी संख्या में केंद्रीय मंत्री , राज्यों के मुख्यमंत्री और मंत्रीगण ,सांसद और विधायकगण , कई प्रसिद्ध वैज्ञानिक ,शिक्षाविद , प्रसिद्ध डॉक्टर और इंजीनियर ,  साहित्यकार ,कलाकार आदि शामिल हैं । प्रशासनिक सेवाओं के उच्च पदस्थ अधिकारियों में से भी कम से कम 90 प्रतिशत अफसरों की प्रारंभिक शिक्षा सरकारी स्कूलों में हुई है ।
      वहीं दूसरी तरफ़ हम देखते हैं कि प्राइवेट शिक्षा संस्थानों ने देश को अब तक  कोई उल्लेखनीय प्रतिभाएं नहीं दी हैं । इसके बावज़ूद  हमारे यहाँ प्राइवेट स्कूल -कॉलेजों ,कोचिंग संस्थाओं और प्राइवेट विश्वविद्यालयों की मनमानी विज्ञापन बाजी से  समाज में उनका भ्रामक आकर्षण बढ़ता जा रहा है ,जो गहरी  चिन्ता और चिन्तन का विषय  बन गया है !  उनमें से अधिकांश तो कई बड़े -बड़े करोड़पति और अरबपति रसूखदारों के संस्थान होते हैं और कई तो ऐसी संस्थाएं खोलकर शिक्षा की दुकान चलाते हुए करोड़पति और अरबपति बन जाते हैं ।
    प्राइवेट स्कूल -कॉलेजों और निजी विश्वविद्यालयों के नाम भी या तो अंग्रेजीनुमा होते हैं या फिर उनका नामकरण ऐसा लगता है मानो उनके  मालिकों के नाम या  सरनेम पर हुआ है । इससे उन संस्थाओं के प्रति आम जनता और विद्यार्थियों में आत्मीयता की भावना नहीं होती , जबकि सरकारी शिक्षण संस्थाओं के नाम प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों , अमर शहीदों और  अन्य कई महान विभूतियों और दानदाताओं के नाम पर रखे जाते हैं , ताकि विद्यार्थी उनसे प्रेरणा ग्रहण कर सकें।
                अगर स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता पर विचार करें तो सरकारी स्कूलों में जितने प्रशिक्षित अध्यापक होते हैं ,उतने प्राइवेट में कहाँ होते हैं ?  कई राज्यों के सरकारी स्कूलों में बच्चों को  मध्यान्ह भोजन और  गणवेश के साथ -साथ पाठ्य पुस्तकें भी मुफ़्त मिलती हैं ,जबकि प्राइवेट स्कूलों में नहीं । बोर्ड परीक्षाओं की मेरिट सूची में  भी सरकारी स्कूलों के बच्चों का पलड़ा भारी रहता है ,जबकि प्राइवेट स्कूलों के इने गिने बच्चे ही मेरिट में आते हैं । यही स्थिति विश्वविद्यालयों की मेरिट सूचियों में भी देखी जा सकती है ।
   दरअसल प्राइवेट स्कूल -  कॉलेजों में  सितारा होटलनुमा भवनों और उसी तरह की  होटलनुमा सुविधाओं के अलावा कुछ  रहता भी नहीं । जैसे -एयरकंडीशनरों से सुसज्जित क्लास रूम , जलपानगृह और एसी वाले डायनिंग हॉल ,  स्कूल बसों की सुविधाएं आदि । फीस भी उनकी काफी तगड़ी होती है ।  इनके झूठे  ग्लैमर के मायाजाल में फँसकर  पैसे वाले अभिभावक  तो अपने बच्चों को वहाँ दाखिल करवा लेते हैं ,जबकि गरीब,मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय अभिभावकों और उनके बच्चों में हीन भावना पैदा होती  है  । 
     हमने सुना है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में ऐसी विसंगतियों को दूर करने का अच्छा प्रयास किया है । यह भी बताया जाता है कि दिल्ली सरकार ने शासकीय स्कूलों को निजी क्षेत्र के स्कूलों की तरह शानदार भवनों और शैक्षणिक उपकरणों की भी व्यवस्था की है ।
       सरकारी क्षेत्र में  जवाहर नवोदय विद्यालयों को ' रोल मॉडल'  के रूप लिया जा सकता है ,लेकिन ये मात्र अपवाद हैं । काश कि सभी सरकारी स्कूल सुविधाओं के मामले में निजी क्षेत्र के सितारा होटल जैसे स्कूलों की तरह न सही ,कम से कम  जवाहर नवोदय विद्यालयों जैसे तो  हो जाएं ।
       -- स्वराज करुण

((ग़ज़ल ) आज़ादी ...?

सभी मित्रों को आज़ादी के महापर्व और रक्षाबन्धन  की हार्दिक शुभेच्छाएँ ।   स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर 36 साल पहले दैनिक ' देशबन्धु ' में प्रकाशित मेरी एक रचना । कृपया इसे देश की तत्कालीन सामाजिक -आर्थिक परिस्थितियों के  परिप्रेक्ष्य में देखें और पढ़ें । निश्चित रूप से इन 36 वर्षों में परिस्थितियाँ काफी कुछ बदली हैं और पहले की तुलना में लोगों के जीवन स्तर में भी सुधार आया है । इसके बावज़ूद  विकास की तीव्र गति वाली दौड़ में करोड़ों लोग पीछे रह गए हैं । देश के कई कोनों में  आर्थिक विषमताओं  का अँधेरा आज भी कायम है ।उन्हीं विषमताओं के अँधकार से घिरे लोगों के दर्द को अभिव्यक्त करने की कोशिश  है मेरी यह रचना ।

Tuesday, August 13, 2019

(आलेख) चाँदनी को है रौशनी का इंतज़ार !


                              - स्वराज करुण
  जिस चिकने -चौड़े  राष्ट्रीय राजमार्ग पर चमचमाती मोटर गाडियाँ तूफ़ानी रफ़्तार से दिन - रात  भागती -दौड़ती रहती हैं ,उसके ठीक  एक किनारे पर कभी -भी आ धमकने वाले हादसों से बेपरवाह  कुछ गरीब परिवार झोपड़ियाँ बनाकर मेहनत -मज़दूरी करते हुए  किसी तरह गुज़र - बसर कर रहे हैं ।  इन्हीं में से एक है चाँदनी का परिवार । वह छत्तीसगढ़ के  घुमन्तू देवार समुदाय की है ।
      नाम चाँदनी ,लेकिन घर में भी और जीवन में भी अँधेरा  ही अँधेरा । उसे इंतज़ार है -विकाश की उस रौशनी का ,जो  उसके परिवार को   छोटा ही सही   लेकिन एक पक्का मकान दिलवा दे ,जिसमें बिजली की भी  रौशनी हो ,पानी की उचित व्यवस्था हो । चाँदनी की तरह ज्योति भी अपने परिवार के लिए वर्षो से यह सपना देख रही है । यहाँ पर देवार समुदाय के अलावा  कुछ अन्य समुदायों के गरीब परिवार भी  झुग्गी बनाकर वर्षों से बसे हुए हैं । इन सबका सपना है कि उनका अपना एक मकान हो ।
       देवार परिवारों के पुरुष अपनी सायकलों के कैरियर के दोनों ओर प्लास्टिक की बड़ी - बड़ी थैलियाँ बाँधकर शहर में दिन भर टिन -टप्पर और दूसरी तरह के कबाड़ ,प्लास्टिक की पन्नी आदि बीनते हैं और कबाड़ियों के पास बेचकर कुछ कमाई कर लेते हैं । ऐसा करके ये लोग शहर की साफ़ -सफ़ाई में भी अप्रत्यक्ष रूप से ही सही ,मददगार तो साबित हो रहे हैं । कुछ पुरुष पेंटर और मोटर मिस्त्री भी हैं । इस झोपड़ -पट्टी में लगभग चालीस -पचास परिवारों का बसेरा है । कुछ के मकान कच्चे और कुछ  अधपके हैं । कुछ घरों में बिजली का कनेक्शन है तो कुछ में नहीं ।  निस्तारी सुविधा का कोई ठिकाना नहीं ।
     चाँदनी की  छोटी -सी झोपड़ी में बिजली कनेक्शन का तो सवाल ही नहीं उठता ।जहाँ पैर फैलाकर सोना या फिर कुछ आराम से बैठ पाना हमारे - आपके लिए मुमकिन नहीं ,उसी झोपड़ी में चाँदनी अपने पति बुधारू और बच्चों के साथ रहती है । अगर भारी बरसात हुई तो बहुत तकलीफ़ हो जाती है । झोपड़ी में पानी भर जाता है ।तब  ये लोग बाजू में नगर निगम के शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के बरामदे में शरण लेते हैं ।
    चाँदनी बताती हैं -  बरसात की रातें  तो उस परछी में किसी तरह कट जाती हैं ,लेकिन सुबह होते ही जब  कॉम्प्लेक्स की दुकानों के शटर उठाए जाते हैं ,तब दुकानदार उन्हें डपट कर भगा देते हैं । इस कॉम्प्लेक्स में मोटर मैकेनिक और ऑटोपार्ट्स बेचने वालों की छोटी -छोटी दुकानें हैं ।  अपनी दुकान के चबूतरे या बरामदे में किसी परिवार को आश्रय देने पर कारोबार में रुकावट आती है ।इसलिए उन्हें  वहाँ से हटाना उनकी  मज़बूरी है।
 ।
    श्रमजीवी गरीबों की यह झुग्गी बस्ती रायपुर नगर निगम के मठपुरैना वार्ड में सरकारी स्कूलों के बगल में ही है ,लेकिन यहाँ के अधिकांश बच्चे स्कूल नहीं जाते ।  मेरी मुलाकात जिन दस -पन्द्रह बच्चों से हुई ,उनमें  दो भाई - बहन राहुल और सानिया नेताम भी थे ।  राहुल सातवीं और सानिया पाँचवी कक्षा में है । दोनों की तमन्ना इंजीनियर बनने की है। उनके पिता श्यामलाल नेताम किसी मोटर गैरेज में काम करते हैं । बातचीत में सानिया काफी होशियार लगी । उसने बताया कि चौथी कक्षा वह प्रथम श्रेणी याने कि  ए -ग्रेड में पास हुई है ।  स्कूल में दोपहर का भोजन मिलता है । एक पुस्तक स्कूल से मिली है बाकी किताबें हमने दुकान से खरीदी है ।
    यह पूछने पर कि उसके अगल-बगल की झुग्गियों में रहने वाले बहुत - से बच्चे स्कूल क्यों नहीं जाते ,सानिया कहती है -इन्हें कितना भी समझाओ ,पढ़ने में इनका मन लगता ही नहीं । दिन भर स्कूल के पास ही खेलते -टहलते रहते हैं ।  इनके माता -पिता भी ध्यान नहीं देते ।सानिया का एक कमरे का   घर हालांकि कुछ कच्चा है लेकिन दूसरों से कुछ ठीक है ,फिर भी उसके बताए अनुसार बरसात में छत टपकती है  और कमरे में पानी भर जाने पर रात भर जागना पड़ता है । सानिया यह भी बताती है कि इस बस्ती को ' डेरा पारा ' बोला जाता है । यह नाम 'देवार डेरा'   के कारण पड़ा है ।
  सानिया के पास खड़ी एक नन्हीं -सी बच्ची वर्षा पहली कक्षा में है ।  उसके सपनों के बारे में पूछने पर मुस्कुराते हुए बोली -बड़ी होकर मैं पुलिस बनूंगी। तीसरी कक्षा की रुखसाना भी पुलिस बनना चाहती है ।वर्षा के पिता समारू नेताम भी कचरा बीनने का काम करते हैं । गोली का ग्यारह साल का बेटा करण और दुकालू का दस साल का बेटा नियम स्कूल नहीं जाते । मेरे ख़्याल से अगर अध्यापक गण इस झुग्गी बस्ती में नियमित रूप से आकर बच्चों के अभिभावकों को समझाएं तो सभी बच्चे स्कूल जाने लगेंगे ।  शिक्षकों को उनसे सम्पर्क करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए ,क्योंकि गरीबों की यह बस्ती उनके स्कूल से बमुश्किल 50 कदम पर  है ।  बशर्ते अध्यापक इसे अपनी एक नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी मानकर ऐसा करें ।
     झोपड़ पट्टी की महिलाओं ने बताया कि  वहाँ निवास कर रहे  परिवारों में से कुछ के राशन कार्ड हैं ,वोटर कार्ड और  आधार कार्ड भी बन गए हैं। इन्हें सरकारी आवास योजना का लाभ मिल जाए तो ये इस बदतर स्थिति से उबर सकते हैं ।  कई महिलाओं ने बताया कि एक बार तहसील ऑफिस से कोई अधिकारी आए थे ।उन्होंने  पट्टे के लिए  फार्म भी भरवाया था ,लेकिन अब तक  कुछ नहीं हुआ ।
      -स्वराज करुण

Monday, August 12, 2019

(आलेख ) गौमाता को मिलना चाहिए ' राष्ट्रीय पशु ' का दर्जा

                           -स्वराज करुण 
            हमें अत्यंत शांत ,शालीन , सौम्य और अहिंसक 'गौमाता'को राष्ट्रीय पशु घोषित करना चाहिए । अभी तो हमारे यहाँ बेहद बेरहम और खूँखार जानवर बाघ को राष्ट्रीय पशु का दर्जा प्राप्त है ।  इस हिंसक जानवर को यह सम्मान वर्ष 1973 से मिला हुआ है । इसके पीछे बाघ को विलुप्तप्राय वन्य जीव मानकर उसके संरक्षण की दलील दी जाती है ।  जहाँ तक संरक्षण का सवाल है ,आप उसे जंगलों  में, अभयारण्यों में  संरक्षण देते रहिए ।
     
    लेकिन जो पशु हमें दूध ,घी ,दही ,मही जैसे पौष्टिक द्रव्यों से उत्तम स्वास्थ्य और ऊर्जा प्रदान करे , जिसकी सन्तान के रूप में बैल हमारी खेती के काम आते हों और इन सब कारणों  से हमारे देश में हजारों साल से गौमाता के रूप में जिसकी पूजा होती चली आ रही है  , आम जन मानस में जिसकी छवि एक माता के रूप में है , जिसके बारे में हमने अपने बचपन की स्कूली किताबों में पढ़ा है कि 'गाय  हमारी माता है ' क्या उस  गौ माता' को राष्ट्रीय पशु का दर्जा नहीं मिलना चाहिए ?  अगर नहीं तो क्यों ? कोई ठोस कारण तो बताए ?
        मेरे खयाल से गौमाता को राष्ट्रीय पशु घोषित कर हमें उसके संरक्षण के लिए हर संभव कदम उठाना चाहिए । अगर सरकारी तौर पर गौ माता को राष्ट्रीय पशु के रूप में मान्यता मिल जाए तो उसे  कचरे के ढेर पर प्लास्टिक ,पॉलीथिन और इस प्रकार के नुकसानदायक पदार्थों को खाने से बचाया जा सकेगा । उसके लिए चारे -पानी की उचित व्यवस्था हो सकेगी ।
     चूंकि तब वह राष्ट्रीय पशु होगी ,इसलिए  उसके संरक्षण के भी ठीक वैसे ही कठोर  कानूनी  प्रावधान  होंगे ,जैसे  वर्तमान में 'बाघ ' के लिए है । इससे गोवंश का भी समुचित संरक्षण और संवर्धन हो सकेगा । गोवंश के गोबर से जैविक खाद बनेगी ,जिससे खेतों की उर्वरकता बढ़ेगी और  शुद्ध अनाज पैदा होगा । रसोईघरों के लिए बायोगैस मिलेगी और  गोमूत्र से पर्याप्त मात्रा में स्वास्थ्यवर्धक औषधियाँ बनायी जा सकेंगी ।
          -स्वराज करुण
(फोटो : इंटरनेट से साभार )
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Wednesday, July 3, 2019

(आलेख ) गजराज आख़िर क्यों बन रहे यमराज ?

                                 - स्वराज करुण 

      हाथी जब किसी गाँव ,कस्बे या शहर  में अपने महावत के साथ घूमता है ,तो  लोगों के और विशेष रूप से बच्चों के आकर्षण का केन्द्र होता  है। ।
       उस समय लगता है इससे सीधा जानवर और कहीं नहीं मिलेगा , लेकिन बिना महावत का वही जंगली हाथी गाँवों में आतंक और उपद्रव का पर्याय बन जाता है ।   जैसा कि इन दिनों हमारे देश के कई राज्यों में देखा जा रहा है । जन -जागरण के तमाम अच्चेव प्रयासों के बावज़ूद जंगल घटते जा रहे हैं और वन्य प्राणियों के लिए चारे - पानी की समस्या बढ़ती जा रही है !
      ऐसे में   किसी जंगली हाथी को या उसके झुण्ड को जंगल में खाने को कुछ न मिले तो वह  गाँवों में आकर किसानों की खड़ी फ़सल को  चट कर जाते हैं और तोड़फोड़ में भी पीछे नहीं रहते । इतना ही नहीं ,बल्कि कई बार तो ये जंगली हाथी निरीह इंसानों को  बड़ी बेरहमी से कुचलकर मार डालते हैं ।  इंसानों को तब समझ में आता
 है कि गजराज आख़िर क्यों इस तरह  'यमराज '  बनते जा रहे हैं !
    बहरहाल , मुझे उस दिन  शहर के एक बाज़ार में महावत के साथ स्थानीय बच्चों को अपनी पीठ पर बैठकर  चहलकदमी करता एक हाथी मिल गया ,तो मेरे मोबाइल  ने उसे अपने कैमरे में कैद कर लिया । बाकी दो तस्वीरें  सर्च इंजन Google से साभार ।
        --स्वराज करुण

Tuesday, June 25, 2019

(आलेख) दुनिया को जल्द नज़र आएगा एक भूला -बिसरा जमींदोज़ शहर !

                          -स्वराज करुण 
      दुनिया को बहुत जल्द दो हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराने एक ऐसे भारतीय शहर का पता चल जाएगा ,जो अभी धरती माता के गर्भ से धीरे -धीरे बाहर आ रहा है ।  यह भूला -बिसरा शहर भारत के प्राचीन इतिहास में दक्षिण कोशल के नाम से प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ के ग्राम रींवा में ज़मीन के नीचे दबा हुआ था ,जो निकट भविष्य में हमें नज़र आएगा ।  राज्य सरकार ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से अनुमति लेकर यहाँ उत्खनन शुरू करवाया है ।   रायपुर जिले में आरंग तहसील के इस गाँव 40 ऐसे टीले हैं जो पुरातत्व की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं ।फिलहाल इनमें से दो टीलों में उत्खनन चल रहा है ,जो राज्य सरकार के पुरातत्व सलाहकार   डॉ .अरुण कुमार शर्मा के मार्गदर्शन में  करीब तीन हफ़्ते पहले शुरू हुआ है ।


     भारत सरकार द्वारा वर्ष 2017 में पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित 86 साल के  डॉ .शर्मा को छत्तीसगढ़ सहित देश के लगभग 20 राज्यों में पुरातात्विक उत्खनन का 45 वर्षों का लम्बा तजुर्बा है ।  वह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग में वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं । हाल के वर्षों में उन्होंने छत्तीसगढ़ के दो प्राचीन शहर सिरपुर और राजिम में भी उत्खनन कार्यो का नेतृत्व किया है ।
 भारतीय पुरातत्व पर अंग्रेजी में  उनकी 52 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । वयोवृद्ध डॉ  शर्मा इस उम्र में भी पूरे जोश और जज़्बे के साथ रींवा गाँव में दक्षिण कोशल के भूमिगत इतिहास को खोदने और खँगालने में लगे हुए हैं । वह छत्तीसगढ़ के ही धरतीपुत्र हैं ।शायद यह भी 86 साल की उम्र में उनके युवा जोश और जज़्बे का एक प्रमुख कारण है । वह रोज सुबह 8 बजे साइट पर पहुँच जाते हैं और अपने विभागीय सहयोगियों और स्थानीय मजदूरों के साथ शाम 5 बजे तक उत्खनन गतिविधियों में  लगे रहते हैं ।
              डॉ. शर्मा कहते हैं -रींवा गाँव में 40 ऐसे टीले हैं ,जिनमें भारत और दक्षिण कोशल के वैभवशाली इतिहास के अनेक मूल्यवान तथ्य दबे हुए हैं । इन सबके उत्खनन में कम से कम 5 साल का वक्त लग सकता है ।फिलहाल हम लोगों ने  20 टीलों के उत्खनन का लक्ष्य रखा है ।  पुरातात्विक उत्खनन बहुत सावधानी से और वैज्ञानिक पद्धति से  करना होता है ।   इन 20 टीलों में से वर्तमान में दो टीलों पर उत्खनन  चल रहा है ।इनमें से एक टीला मुम्बई -कोलकाता राष्ट्रीय राजमार्ग 53 के किनारे स्थित है । यह किसी बौद्ध स्तूप के आकार का है । इसकी 9 परतों में से 7 का उत्खनन हो चुका है । इसमें किसी महात्मा की अस्थियाँ हो सकती हैं । इसे मौर्यकालीन बौद्घ स्तूप माना जा रहा है ,जो मिट्टी का बना हुआ है । डॉ. अरुण कुमार शर्मा बताते हैं कि यह छत्तीसगढ़ में अब तक के उत्खनन में प्राप्त मिट्टी का पहला बौद्ध स्तूप है। इसके पहले सिरपुर में  पत्थरों से और भोंगपाल (बस्तर )में ईंटों से निर्मित स्तूप मिल चुके हैं  ।रींवा में दूसरा उत्खनन एक विशाल तालाब के पास हो रहा है ,जहाँ आसपास आम और पीपल आदि के कई बड़े -बड़े वृक्ष और बबूल की कँटीली झाड़ियाँ भी हैं । छिन्द के भी कुछ पेड़ वहाँ पर हैं ।
      अब तक के उत्खनन में इस टीले से कुछ स्वर्ण , कुछ रजत और कुछ ताम्र मुद्राएं भी मिली हैं । इनके अलावा मिट्टी के दीये और बर्तन तथा हाथी दांत से बनी सजावटी वस्तुओं के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं । स्वर्ण मुद्राओं में से एक पर ब्राम्ही लिपि में "कु' शब्द अंकित है । डॉ .शर्मा इसे कुमारगुप्त के समय का मानते हैं । सजावटी मालाओं में गूँथने के लिए उपयोग में लायी जाने वाली छोटी -छोटी मणि कर्णिकाओ का ज़खीरा भी मिला है । डॉ. शर्मा के अनुसार ये तमाम अवशेष ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के याने लगभग 2200 वर्ष पुराने हैं । वह कहते हैं -सुदूर अतीत में रींवा कोई गाँव नहीं ,बल्कि एक बड़ा शहर और प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था ।महानदी इसके नज़दीक से बहती थी । तत्कालीन समय में पेड़ों की अत्यधिक कटाई होने के कारण नदी के किनारों पर भी कटाव हुआ । इस वज़ह से महानदी यहाँ से 8 किलोमीटर दूर खिसक गयी ।  रींवा से 50 किलोमीटर पर छठवीं -आठवीं सदी में शैव ,वैष्णव और बौद्ध मतों के त्रिवेणी संगम के नाम से प्रसिद्ध सिरपुर भी महानदी के किनारे स्थित है । छत्तीसगढ़ के प्रयाग राज के नाम से मशहूर राजिम  महानदी ,पैरी और सोंढूर नदियों के संगम पर है। पुरातत्व वेत्ता डॉ .अरुण कुमार शर्मा बताते हैं कि प्राचीन काल में राजिम और सिरपुर से ओड़िशा के समुद्र तटवर्ती  शहर कटक  तक जल मार्ग से व्यापार होता था । इतना ही नहीं ,सिरपुर से सूरत (गुजरात) तक कारोबार स्थल -मार्ग से भी होता था । सिरपुर में हुए उत्खनन में दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार भी मिला है ,जहाँ दोमंजिला दुकानें हुआ करती थीं ।एक ऐसी मुहर (सील ) भी वहाँ मिली है ,जिस पर फ़ारसी लिपि में 'बन्दर-ए-मुबारक सूरत ' लिखा हुआ है । उल्लेखनीय है कि सूरत गुजरात का बंदरगाह शहर है ।
       बहरहाल हम एक बार फिर लौट आते हैं रींवा गाँव की ओर । डॉ .अरुण कुमार शर्मा  अपनी यादों में दर्ज इतिहास के पन्ने  पलटते हुए कहते हैं - रींवा गाँव दरअसल वीर भूमि है । इसे रींवा गढ़ के नाम से भी जाना जाता है । गढ़ याने किला । यहाँ पर भी  मिट्टी से  निर्मित एक बड़ा किला (मडफ़ोर्ट )था , जिसके सुरक्षा घेरे के रूप में मिट्टी की मज़बूत दीवारें थीं । आधुनिक ज्ञान -विज्ञान के इस दौर में दूर संवेदी भू -उपग्रह  के जरिए भी इसकी पुष्टि हो चुकी है । रींवा गढ़ का उल्लेख अंग्रेज अधिकारी लॉर्ड कनिंघम ने भी अपने अभिलेखों में किया है ।
      अगर यह इतना बड़ा शहर था तो जमींदोज क्यों हो गया ? इस सवाल पर डॉ .अरुण शर्मा कहते हैं - पुराने समय में भयानक  बाढ़ ,भूकम्प और महामारी जैसी आपदाओं के समय लोग अपने गाँव या शहर छोड़कर अन्यत्र पलायन कर जाते थे और बस्तियां वीरान हो जाती थीं ।यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा ।समय के प्रवाह में इस बस्ती के भवनों पर  सैकड़ों वर्षों तक धूल और मिट्टी की परतें चढ़ती गयीं और वो जमींदोज हो गयीं ।
            फ़िलहाल उत्खनन जारी है ।  भूमिगत इतिहास के पन्नों पर जमी सैकड़ों वर्षों की धूल  हटाई जा रही है । डॉ .अरुण कुमार शर्मा जैसे वरिष्ठतम पुरातत्ववेत्ता की पारखी आंखें अपनी गहन इतिहास दृष्टि से उन्हें पलटने और  पढ़ने में लगी हैं ।  उम्मीद की जानी चाहिए कि  उनके गहन अध्ययन ,उत्खनन और अनुसंधान से एक बहुत पुराना भूला -बिसरा शहर फिर हमारे सामने होगा । टाइम मशीन भले ही काल्पनिक हो, लेकिन प्रत्यक्ष में हो रहे इस कार्य  से शायद हम दो हज़ार साल से भी ज्यादा पुराने ज़माने को  और उस दौर की इंसानी ज़िन्दगी को महसूस तो कर सकेंगे ! वह एक रोमांचक एहसास होगा ।
         -स्वराज करुण