Sunday, December 2, 2012
कितनी होनी चाहिए भौतिक विकास की गति ?
संस्कार , संस्कृति और सभ्यता चाहे नष्ट हो जाएँ, नैतिकता तबाह हो जाए , गाँव और किसान गायब हो जाएँ , लेकिन भौतिकता की चकाचौंध चाहने वालों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला ! उन्हें राष्ट्रों को विकास के नाम पर आर्थिक गुलामी में जकड़ने को आतुर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफ.डी.आई. का राग ज्यादा लुभावना लगता है .
नदी
Thursday, October 11, 2012
शानदार व्यवसाय !
लोकतंत्र में राजनीति अब शानदार व्यवसाय !
कोई छुप कर खाय यहाँ तो कोई खुल कर खाय !!
कोई कहता खुद को इसका पहला , दूजा पाया !
तीजे और चौथे पायों के दिल को भी यह भाया !!
तीजे और चौथे पायों के दिल को भी यह भाया !!
माल मुफ्त का बेरहमी से सबने खूब कमाया !
नेताओं ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी आसान यहाँ जमाया !!
नेताओं ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी आसान यहाँ जमाया !!
सरकारी बंगले में जिसने अपना बोर्ड लगाया !
उसे वहाँ से कोई माई का लाल हटा न पाया !!
उसे वहाँ से कोई माई का लाल हटा न पाया !!
कह करुण कविराय यह तो लक्ष्मी जी की माया !
नेता बनते ही मिल जाए धन- दौलत की छाया !!
नेता बनते ही मिल जाए धन- दौलत की छाया !!
दूर गरीबी को करने की क्यों हो इतनी चिन्ता !
हर गरीब जब नेता बनकर पाए अमीर सी काया !!
-स्वराज्य करुण
हर गरीब जब नेता बनकर पाए अमीर सी काया !!
-स्वराज्य करुण
Sunday, September 30, 2012
रूपये तो पेड़ों पर ही लगते हैं सरदार जी !
चिल्हर संकट के कारण पैसा तो बाज़ार से कब का गायब हो चुका है . अब तो रूपए का जमाना है .इसलिए सरदार जी को कहना ही था तो कहते कि रूपए पेड़ पर नहीं लगते ,लेकिन वो ठहरे बेचारे भोले- भंडारी! पुरानी कहावत कह गए -पैसे पेड़ पर नहीं लगते !दरअसल वह बोलना चाह रहे थे कि रूपए पेड़ पर नहीं लगते .लेकिन मै तो कहूँगा -रूपए पेड़ पर ही उगते (लगते) है .अगर मुझ पर भरोसा न हो तो जंगल महकमे के अफसरों से पूछ लीजिए . गड्ढे खोदने का रूपया .फिर उनमें पेड़ लगाने का रूपया ,फिर पेड़ काटने और कटवाने का रूपया! यानी जंगल में लगे हर पेड़ पर फूलता और फलता है रूपया !जिस पेड़ की डालियों में जितने पत्ते होंगे ,उस पर उतने ही रूपए उगेंगे !.पत्तों के आकार के हिसाब से आप रूपए का मोल भी निकाल सकते हैं .जैसे सागौन और साल वृक्ष के चौड़े पत्तों के हिसाब से आप उन्हें एक-एक हजार का नोट मान सकते हैं .रूपये तो पेड़ों पर ही उगते (लगते ) हैं .तभी तो छोटा हो या बड़ा , देश के जंगल महकमे का लगभग हर मुलाजिम मालदार होता है .रूपयों के पेड़ देखना चाहते हैं तो जंगल नहीं ,जंगल महकमे को देखिये !कितनी तेजी से रूपयों की फसल कट रही है वहाँ ! यह तत्परता ज़रूरी भी है उनके लिए . कारण यह कि उनकी मेहरबानी से रूपयों के सारे पेड़ जितनी जल्दी-जल्दी कटते जा रहे हैं , उतनी जल्दी लग नहीं रहे हैं .एक दिन ऐसा आएगा ,जब पेड़ों के सारे पत्ते झर जाएंगे , रूपयों की लालच में लोग पेड़ों को भी उखाड कर ले जाएंगे और यह जंगल ही खत्म हो जाएगा .जब जंगल ही नहीं रहेगा ,तो जंगल महकमे की भी ज़रूरत नहीं रह जाएगी . यही वजह है कि वो जंगल के पेड़ों पर उगते रूपयों की फसल तेजी से नोच -खसोट कर अपना बैंक बैलेंस बढ़ाते जा रहे हैं .आखिर भविष्य के लिए कुछ तो बचाना होगा . वैसे अकेले जंगल महकमें में ही क्यों ? रूपयों के पेड़ तो आज देश के हर महकमे में लगे हुए हैं . कोई उन्हें हिलाकर रूपये बटोर रहा है .तो कोई उनकी हर डाली को नोच-खसोट कर ! बाकी तो सब राजी-खुशी हैं जी ! -स्वराज्य करुण
Saturday, September 29, 2012
( कविता ) आठ हजार की थाली !
जनता के पैसों से खाते आठ हजार की थाली !
अखबारों में पढकर यह सब जनता देती गाली !!
बेशरम हँसते हैं लेकिन जाम से जाम टकराकर !
जनता के हर आंसू पर वो खूब बजाएं ताली !!
राजनीति व्यापार है उनका भरते रोज तिजोरी !
अखबारों में पढकर यह सब जनता देती गाली !!
बेशरम हँसते हैं लेकिन जाम से जाम टकराकर !
जनता के हर आंसू पर वो खूब बजाएं ताली !!
राजनीति व्यापार है उनका भरते रोज तिजोरी !
कुर्सी उनके लिए सुरक्षित ,साला हो या साली !!
आज़ादी और लोकतंत्र भी उनके चरण पखारें !
जिनके आगे माथ नवाए क़ानून वृक्ष की डाली !!
पढ़ लिख कर बेकार घूमती बेकारों की पलटन !
फिर भी कहते नहीं रहेगा कोई हाथ अब खाली !!
सदा-सदा के लिए सलामत उनके छत्र-सिंहासन !
भले चमन को खा जाए उसका ही कोई माली !!
प्लेटफार्म से सड़कों तक दूध को तरसे बचपन !
लेकिन उनके गालों में हर दिन खिलती लाली !!
राज इसका रह जाएगा राज बन कर हरदम !
राजनीति में आते ही कैसे दूर हुई कंगाली !!
हर चुनाव में साड़ी- कम्बल -दारू का बोलबाला !
असल नोट नेता की जेब में ,जनता को दे जाली !!
हुक्कामों के जश्न से जगमग पांच सितारा होटल !
ड्रिंक-डिनर -डिप्लोमेसी छलकाएं खूब प्याली !!
-स्वराज्य करुण
Wednesday, September 19, 2012
प्रभु ! कैसे करें आपका स्वागत ?
विद्या
और बुद्धि के देवता हे गणेश जी महाराज ! आपका आगमन ऐसे नाजुक समय में हो रहा है जब यह देश मानव शरीरधारी अपने भाग्य विधाताओं की बेजा हरकतों से मुसीबतों के चक्रव्यूह में घिर गया है ! कृपया उन्हें थोड़ी सदबुद्धि तो
दीजिए ,जो डीजल के दाम बढ़ाकर और रसोई गैस सिलेंडरों की कटौती करके आम जनता
को परेशान कर रहे हैं , देशी बाज़ारों को जो विदेशी व्यापारियों के हाथों
गिरवी रखने जा रहे है !
हे विघ्न विनाशक ! हम तो आज धर्म संकट में पड़ गए हैं .इस घोर संकट से हमें जल्द उबारिये प्रभु ! आप ही बताइये ! हम कैसे करें आपका स्वागत ,जब कदम -कदम पर एक से बढ़कर एक विघ्न हमारे सामने पहाड़ की तरह खड़े हो रहे हैं ,
देश में हर तरफ महंगाई का सैलाब नज़र आ रहा है और दाल-आटे का भाव आसमान छूने लगा
है . दूध और फलों के दाम सातवें आसमान पर हैं ! होटलों में नकली दूध और
नकली खोवे की मिठाईयाँ खुले आम बिक रही हैं . हम जानते है - आपको मोदक प्रिय
हैं ,लेकिन हम आपको नकली मोदकों का भोग लगाने का दुस्साहस भला कैसे कर
पाएंगे ? जहां तक फलों की बात करें ,वह भी तो कार्बाइड जैसे घातक रसायनों
में पका कर और नुकसानदायक रंगों में रंग कर बेचे जा रहे है . मिलावटखोरों का धंधा तेजी से चल रहा है और वह जनता की जिंदगी से खुल कर खिलवाड़ कर रहे है .कोई देखने ,रोकने और टोकने वाला नहीं है . डाक्टर आज भी अपने मरीजों
को दूध पीने और फल खाने की सलाह देते हैं ,लेकिन इतनी महंगाई और मिलावट के
इस दौर में यह कैसे संभव है ?
हे गणपति
बप्पा ! आज़ादी के बाद हमारे भारत में लाखों स्कूल और हजारों कॉलेज खुल गए ,लेकिन उनमे
पढ़-लिख कर निकलते युवा हमेशा की तरह बेरोजगारों की अनंत कतार में खड़े रहने को मजबूर हैं .
भ्रष्टाचार की काली कमाई से कुछ लोगों के साधारण मकान अब महल सरीखे सीना
तान कर खड़े नज़र आ रहे हैं . कल तक पुरानी सायकल पर घूमने वाले कुछ लोग
रातों-रात महंगी गाड़ियों के मालिक बन गए हैं. क्या यह सब उन्हें ईमानदारी
की कमाई से प्राप्त हुआ है ? हे गणपति बप्पा ! देश की इस दुर्दशा के लिए
ज़िम्मेदार लोगों को सदबुद्धि के साथ चेतावनी भी दीजिए ! फिर भी अगर वह नहीं
मानते तो क्या आप अपनी अदालत में मुकदमा चलाकर उन्हें दण्डित करेंगे ? तभी
तो हम आपका स्वागत कर पाएंगे ! -- स्वराज्य करुण
Monday, August 6, 2012
मानवता का दुश्मन परमाणु बम !
हिरोशिमा -नागासाकी में विनाशकारी परमाणु बादल
(६ अगस्त और ९ अगस्त १९४५ )
दोस्तों ! माचिस से चूल्हा जलाकर पेट की आग बुझाई जा सकती है और किसी के घर में आग भी लगाई जा सकती है. सुई से कपड़े सिले जा सकते हैं और किसी की आँखें भी फोड़ी जा सकती हैं . चीजों का इस्तेमाल व्यक्ति की मानसिकता पर निर्भर करता है . अराजक. विध्वंसक और हिंसक मानसिकता का व्यक्ति हर उस वस्तु का दुरूपयोग कर सकता हैं,जिसका निर्माण समाज की सुख-शान्ति के लिए और इंसान की कठिन जिंदगी को आसान बनाने के लिए हुआ है .विज्ञान के कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण आविष्कारों के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा है. परमाणु विज्ञान इसका एक बड़ा उदाहरण है . इसका उपयोग बिजली बनाने से लेकर चिकित्सा विज्ञान में भी हो रहा है और विनाशकारी हथियार के रूप में एटम बम बनाने के लिए भी . एटमी हथियारों बेरहम और बेशरम प्रतिस्पर्धा हमारी इस खूबसूरत दुनिया का क्या हाल बना देगी ,इसे अगर समझना हो तो
आज छह अगस्त को कुछ पल के लिए जापान के हिरोशिमा शहर में सिर्फ ६७ साल पहले हुई तबाही को याद करें .आज का दिन विश्व-शान्ति के लिए पूरी दुनिया में हिरोशिमा दिवस के रूप में मनाया जाता है .
यह दिन हमे याद दिलाता है अमेरिका की उस काली करतूत की ,जिसने सम्पूर्ण मानवता को शर्मसार कर
दिया था . दुनिया के इतिहास में छह अगस्त १९४५ का दिन 'काला दिवस ' के रूप
में हमेशा के लिए दर्ज हो गया है . यही वह दिन है ,जब अमेरिका ने जापान के
खूबसूरत शहर हिरोशिमा पर दुनिया का पहला परमाणु बम गिरा कर कम से कम सत्तर
हजार बेगुनाह लोगों को तत्काल मौत के घाट उतार दिया था .और इस परमाणु हमले
के बाद के दुष्प्रभावों से कम से कम डेढ़ लाख लोग तरह-तरह की शारीरिक
तकलीफों के कारण तड़फ-तड़फ कर दम तोड़ गए . मासूम बच्चों -बूढों और युवा
इंसानों के अलावा लाखों निरीह जानवर भी बेमौत मारे गए . सम्पूर्ण हिरोशिमा
चलती-फिरती लाशों के शहर में तब्दील हो गया था . मकान ज़मींदोज़ हो गए थे
.शहर तबाह हो गया था . इस भयानक तबाही से भी जब खून के प्यासे दानव अमेरिका
का दिल नहीं भरा तो उसने ठीक तीसरे दिन नौ अगस्त को एक और जापानी शहर नागासाकी पर भी
परमाणु हमला करके ऐसा ही कहर ढाया . वह तो मेहनतकश जापानियों का ज़ज्बा था
,जिसने इन दोनों तबाह शहरों को कुछ ही
वर्षों में देखते ही देखते सपनों के नए शहर के रूप में नए सिरे से खड़ा कर दिया और इंसानी जिंदगी एक बार फिर अपनी
रफ्तार से चलने लगी लेकिन अपने लाखों नागरिकों की एक ही झटके में हुई मौत
का ज़ख्म ये दोनों शहर क्या कभी भूल पाएंगे? क्या हमारी दुनिया इसे भूल
पाएगी ? वह दूसरे विश्व युद्ध का दौर था . ईश्वर हमारी दुनिया को दोबारा तबाही का ऐसा मंजर न दिखाए . तीसरा विश्व-युद्ध कभी मत हो ,क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो महान वैज्ञानिक आइंस्टीन के शब्दों में -चौथा विश्व-युद्ध कभी नहीं होगा ,क्योंकि तब यह दुनिया रहेगी ही नहीं .
जापानियों का ज़ज्बा : फिर हुआ आबाद सपनों का शहर
हिरोशिमा में गिराए गए परमाणु बम की ताकत बीस हजार टन बतायी जाती
है .उसमे रेडियो-एक्टिव पदार्थ यूरेनियम-२३५ का इस्तेमाल हुआ था . इस बम के
गिरते ही वहाँ का तापमान दस मिलियन डिग्री तक पहुँच गया था सूरज की चमक से
भी हजार गुना तेज रौशनी ने शहर को जला डाला था .आज तो अमेरिका ही नही
,बल्कि दुनिया के बहुत से देश परमाणु बम बना रहे हैं ,जिनकी तबाही की ताकत
उससे भी हजारों गुना ज्यादा है . इसके बावजूद हमारी दुनिया विस्फोटकों के मुहाने
पर बैठ कर एकदम बेफिक्र है . वह मानवता के इस दुश्मन से दोस्ती गाँठ रही है . खतरे को समझ कर भी नासमझ बन रही है . आइये छह अगस्त को हिरोशिमा दिवस पर हम हिरोशीमा
और नागासाकी के लाखों शहीदों को याद करें और उनकी आत्मा की शांति के लिए
प्रार्थना करते हुए ईश्वर से यह भी गुजारिश करें कि वह परमाणु बम बनाने
वालों को सदबुद्धि दें और उनके दिलों में मानवता की भावना जगाए. परमाणु-
ताकत का शांतिपूर्ण उपयोग हो .वह विनाश का हथियार नहीं. विकास का औजार बने
. -स्वराज्य करुण
Tuesday, July 31, 2012
कालजयी कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द
आज महान साहित्यकार कथा-सम्राट और उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की जयंती है ,जिन्होंने हिन्दी में 'गोदान' जैसा कालजयी उपन्यास लिखकर भारतीय किसान के दुःख-दर्द को दुनिया के सामने रखा और समाज को चिंतन के लिए मजबूर कर दिया . उन्होंने हिन्दी और उर्दू साहित्य को करीब एक दर्जन उपन्यास और लगभग ढाई सौ कहानियां दी .मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण होने की वजह से उनकी प्रत्येक रचना अपने- आप में कालजयी कृति बनकर उनकी तरह अमर हो गयी है. हिन्दी में 'कर्मभूमि' जैसे उपन्यास के साथ-साथ 'कफ़न' तथा 'पूस की रात ' जैसी कहानियां भी उन्हें आम जनता के साहित्यकार के रूप में एक अलग पहचान दिलाती हैं .बनारस के पास ग्राम लमही में ३१ जुलाई १८८० को उनका जन्म हुआ था . उनकी जीवन-यात्रा ८ अक्टूबर १९३६ को अचानक हमेशा के लिए थम गयी . आज उनकी जयंती पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि. -- स्वराज्य करुण
Subscribe to:
Posts (Atom)





