आज महान साहित्यकार कथा-सम्राट और उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की जयंती है ,जिन्होंने हिन्दी में 'गोदान' जैसा कालजयी उपन्यास लिखकर भारतीय किसान के दुःख-दर्द को दुनिया के सामने रखा और समाज को चिंतन के लिए मजबूर कर दिया . उन्होंने हिन्दी और उर्दू साहित्य को करीब एक दर्जन उपन्यास और लगभग ढाई सौ कहानियां दी .मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण होने की वजह से उनकी प्रत्येक रचना अपने- आप में कालजयी कृति बनकर उनकी तरह अमर हो गयी है. हिन्दी में 'कर्मभूमि' जैसे उपन्यास के साथ-साथ 'कफ़न' तथा 'पूस की रात ' जैसी कहानियां भी उन्हें आम जनता के साहित्यकार के रूप में एक अलग पहचान दिलाती हैं .बनारस के पास ग्राम लमही में ३१ जुलाई १८८० को उनका जन्म हुआ था . उनकी जीवन-यात्रा ८ अक्टूबर १९३६ को अचानक हमेशा के लिए थम गयी . आज उनकी जयंती पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि. -- स्वराज्य करुण
Tuesday, July 31, 2012
Friday, July 20, 2012
अभिनय और ऐय्याशी !
आप
सभी से पूछना चाहता हूँ- क्या अधिकाँश फ़िल्मी कलाकारों के लिए अभिनय और
ऐय्याशी एक ही सिक्के के दो पहलू नहीं हैं ? अगर नहीं तो . फिर एक-एक
अभिनेता की जिंदगी में पत्नी के अलावा तीन-तीन ,चार-चार घोषित-अघोषित
रखैलें क्यों आती-जाती रहती हैं ? ये कलाकार फिल्मों में कहानी की मांग के अनुसार समाज को नैतिकता का पाठ पढाते नज़र आते हैं .
कई औरतों से खुले आम इश्क लडाने वाले ऐसे
कथित अभिनेता जब दुनिया को अलविदा कह कर विदा हो जाते हैं , अखबार ,रेडियो
और टेलीविजन चैनल दिन रात इनकी शान में कसीदे पढ़ने..
लग जाते हैं और इनकी कथित महानता से भरी जीवनी सुना-सुना कर इन्हें महान
कलाकार घोषित कर देते हैं और इन्हें समाज का और युवा पीढ़ी का 'रोल-मॉडल' साबित करने लगते हैं !अब
इन्हें ही लीजिए ! अखबारों में छपी इनकी महान जीवन गाथा के अनुसार सबसे
पहले इनका अंजू महेन्द्रू नामक महिला कलाकार से अफेयर हुआ ,फिर अपनी उम्र
से पन्द्रह साल छोटी डिम्पल नामक अभिनेत्री से प्यार के इज़हार के साथ शादी
हुई और कुछ साल बाद शादी टूट गयी , हालांकि डिम्पल ने तलाक नहीं लिया , फिर
कोई टीना मुनीम नामक एक अभिनेत्री इनकी जिंदगी में आयी , लेकिन टीना इनकी
गैर-ब्याहता के रूप में कुछ वर्षों तक साथ-साथ रही पर इन्होने टीना के कहने
के बावजूद उसे शादी नहीं की , क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि डिम्पल एक दिन
फिर उनकी जिंदगी में लौट आएगी , हालांकि तब तक तो टीना के साथ ही काम चलता
रहा . बहरहाल डिम्पल इनके पास वापस आ गयी और टीना 'मुनीम ' से एक बहुत बड़े
खरबपति की पत्नी बन गयी .
लगभग इसी तरह की ऐय्याशी भरी प्रेम कथाएँ कई
ऐय्याश कलाकारों की है . दुर्भाग्य की बात है कि इसके बावजूद मीडिया की
मेहरबानी से विज्ञापन-संस्कृति के इस बेशर्म दौर में प्रचार-प्रसार की
बाजारू कला औरतबाजी करने वाले इन कथित कलाकारों को हर हालत में महान साबित
करके ही दम लेती है, . (ऐसे दिवंगत महान कलाकार अगर मेरी बातों का बुरा
लगा हो कृपया क्षमा करें ) -स्वराज्य करुण
Tuesday, July 17, 2012
वरिष्ठ साहित्यकार देवीसिंह चौहान का निधन
रायपुर १७ जुलाई / वरिष्ठ कवि और साहित्यकार तथा छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य मण्डल रायपुर के पूर्व अध्यक्ष प्रो. देवीसिंह चौहान का रविवार १५ जुलाई की रात यहाँ चौबे कॉलोनी स्थित उनके घर में निधन हो गया .स्वर्गीय श्री चौहान ने विगत लगभग छह दशकों से छत्तीसगढ़ को अपनी कर्म भूमि बनाकर राजधानी रायपुर में निवास करते हुए अपना सम्पूर्ण जीवन अध्यापन और साहित्य सेवा में लगा दिया। वह वीर रस के ओजस्वी कवि होने के साथ-साथ एक अच्छे लेखक भी थे। बच्चों के साहित्य में भी उनकी विशेष दिलचस्पी थी। श्री चौहान की 30 किताबें प्रकाशित हुई, जिनमें कई काव्य संग्रह और महान विभूतियों तथा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जीवन गाथा पर आधारित पुस्तकें भी शामिल हैं .
उत्तर प्रदेश में आगरा के पास यमुना नदी के तटवर्ती ग्राम रूदमुली में दस मार्च 1923 को जन्मे साहित्यकार श्री देवीसिंह चौहान ने भरतपुर और आगरा में पांच वर्षो तक और रायपुर (छत्तीसगढ़) के एक शताब्दी से भी अधिक पुराने राजकुमार कॉलेज में लगातार 38 वर्षो तक अध्यापन कार्य किया। वह इस कॉलेज में उप-प्राचार्य भी रहे।उन्होंने राजकुमार कॉलेज की पत्रिका ‘मुकुट’ का भी सम्पादन किया। उनकी प्रकाशित प्रमुख पुस्तकों में वर्ष 1963 में प्रकाशित देशभक्तिपूर्ण तथा वीर रस से परिपूर्ण कविता संग्रह ‘रक्त का प्रमाण दो’ वर्ष 1963 में प्रकाशित भावपूर्ण काव्य संग्रह ‘लहर और चांद’, वर्ष 1981 में प्रकाशित राष्ट्रीय चेतना से परिपूर्ण काव्य संकलन ‘क्रांति के शोले’, वर्ष 1985 में प्रकाशित खण्ड काव्य ‘झासी की रानी’, वर्ष 1988 में प्रकाशित ‘आजादी और नेहरू’, वर्ष 1998 में प्रकाशित ‘मुक्ति आंदोलन और क्रांतिकारी’, वर्ष 1998 में ही प्रकाशित गणेशंकर विद्यार्थी, चन्द्रशेखर आजाद, शहीद भगत सिंह और रामप्रसाद बिस्मिल की जीवनी पर आधारित किताबें उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती के मौके पर छत्तीसगढ़ के कवियों के सहयोगी काव्य संकलन ‘सुमनांजलि’ का भी सम्पादन और प्रकाशन किया। उनकी लिखी ‘राष्ट्र नायक छत्रपति शिवाजी’ की जीवन गाथा वर्ष 2001 में, महाराणा प्रताप की जीवन गाथा वर्ष 2002 में, गुरूनानक देव की जीवन गाथा वर्ष 2003 में, गुरू गोविन्द सिंह जीवन गाथा वर्ष 2004 में और देश के अनेक प्रमुख शहीदों की जीवन गाथा ‘याद करो कुर्बानी’ वर्ष 2004 में प्रकाशित हुई। उन्होंने बच्चों के लिए शिशु गीत माला और बाल गीत गंगा जैसे काव्य संग्रहों की भी रचना की।
उनका अंतिम संस्कार कल यहां मारवाड़ी श्मशान घाट में किया गया, जहां छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य मण्डल के अध्यक्ष श्री अमरनाथ त्यागी सहित बड़ी संख्या में साहित्यकारों और प्रबुद्ध नागरिकों ने उपस्थित होकर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की। -- स्वराज्य करुण
Sunday, July 15, 2012
राजनीति को कैरियर समझना लोकतंत्र के लिए खतरनाक !
आश्चर्य और चिन्ता का विषय है कि अब राजनीति को जन सेवा अथवा समाज सेवा के पवित्र माध्यम के रूप में नहीं,बल्कि किसी व्यावसायिक कैरियर के रूप में लिया जा रहा है ,मानो यह कोई सरकारी नौकरी है, जिसमें चाहे काम करें या न भी करें , तो भी लोगों को हमेशा अपनी बेहतर पोस्टिंग और अपने भावी प्रमोशन के लिए बेचैनी बनी रहती है . राजनीति को कैरियर की तरह लेने की व्यक्तिवादी मानसिकता एक दिन हमारे लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित हो सकती है . यह घातक मनोवृत्ति देश में किसी दिन तानाशाही को भी जन्म दे सकती है . राजनीति में सक्रिय कोई व्यक्ति दिखावे के लिए भले ही कुछ भी कहता और करता रहे , लेकिन उसके दिल में तो कुछ और ही भाव छुपे हुए हैं . जब कोई व्यक्ति राजनीति को निजी जिंदगी के लिए तरक्की के पायदान के रूप में इस्तेमाल करेगा ,तो उसे देश और समाज की भलाई की चिन्ता कहाँ होगी ? दुर्भाग्य से अब देश में लोगों को राजनीति में 'कैरियर' बनाने का प्रशिक्षण देने की एक नई परिपाटी शुरू हो रही है .
वैसे तो देश और दुनिया के विश्वविद्यालयों में राजनीति शास्त्र की पढ़ाई कोई नई बात नहीं है. यह विगत कई दशकों से होती चली आ रही है,जिसके पाठ्यक्रमों में महान विचारकों के सिद्धांतों की जानकारी विस्तार से दी जाती है अधिकाँश विद्यार्थी इसमें यह सोच कर प्रवेश नहीं लेते कि उन्हें नेता बनना है या राजनीति में कैरियर बनना है . लेकिन अब बेंगलुरु का भारतीय प्रबंध संस्थान (आई.आई. एम.) सेंटर फॉर सोशियल रिसर्च के साथ मिलकर लोगों को नेता बनाने के लिए दस हफ्ते का एक पाठ्यक्रम शुरू करने जा रहा है , जिसकी फीस चार लाख ७५ हजार रूपए तय की गयी है . इस पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों को चुनाव लड़ने ,चुनावी प्रचार और जनमत संग्रह करने और प्रभावी सांसद बनने की भी शिक्षा मिलेगी ! वहाँ राजनीतिक प्रबंधन की ट्रेनिग मिलेगी ! लेकिन क्या उन्हें सच बोलना भी सिखाया जाएगा ?
क्या ज़माना आ गया है ? कहते हैं -राजनीति वास्तव में समाज सेवा का दूसरा नाम है . क्या समाज सेवा के लिए भी किसी प्रशिक्षण और प्रमाण पत्र की ज़रूरत होती है ? अगर हाँ ,तो मेरे ख्याल से गौतम बुद्ध ,महावीर स्वामी , संत कबीर . नानक , महात्मा गांधी , स्वामी विवेकानंद , भगत सिंहचन्द्र शेखर आज़ाद , मदर टेरेसा , बाबा आमटे, नेहरू, और नेता जी सुभाष जैसे लोगों को समाज-सेवक और नेता नहीं माना जा सकता , ,क्योंकि इन्होनें ऐसे किसी प्रबंध संस्थान से राजनीतिक और सामाजिक प्रबंधन का कोई [प्रशिक्षण नहीं लिया था ! उनके पास ऐसी किसी ट्रेनिग का प्रमाण पत्र भी नहीं था !फिर भी जनता ने उन्हें सर -आँखों पर बैठाया ! अगर आप में मानवीय संवेदना है , गरीबों और असहायों के लिए आपके दिल में सच्चा दर्द है और आप उनके लिए कुछ करना चाहते हैं , तो आप अपने अच्छे कार्यों के ज़रिये जनता का दिल जीत कर अच्छे नेता बन सकते हैं ,इसके लिए किसी मैनेजमेंट प्रशिक्षण की क्या ज़रूरत है ? --- स्वराज्य करुण
Friday, March 9, 2012
जाग मुसाफिर जाग !
उठ जाग मुसाफिर जाग ,
होलिका दहन के बाद हरियाणा में
भड़की आरक्षण की आग !
देश के लिए बन गया आरक्षण भस्मासुर
लेकिन भारत भाग्य विधाता
अलमस्त नशे में चूर !
आरक्षण ने फैलाया घनघोर जातिवाद ,
गायब होने लगा समाज से प्यार भरा संवाद !
क्यों ज़रूरी है बोलो आरक्षण की बैसाखी ,
प्रतियोगिता में भी क्यों हो
भेदभाव की झांकी ?
कहते हैं कि जाति-धर्म का
भेद नहीं अपने संविधान में ,
फिर क्यों आग लगाता है कोई अपने हिन्दुस्तान में ?
- - स्वराज्य करुण
Thursday, March 8, 2012
होलियाना हो -हल्ले में एक गुमनाम मौत !
कितनी स्वार्थी ,बेरहम और बेशरम है हमारी यह दुनिया . होली के हो-हल्ले में खोए हुए ज्यादातर लोगों को इस बात से भला क्या मतलब कि भारतीय संगीत जगत के गहरे-नीले आसमान का एक चमकीला सितारा कल होली की पूर्व संध्या पर हमेशा के लिए अस्त हो गया . रंगों के मस्ती भरे शोर-शराबे में एक प्रसिद्ध संगीत-शिल्पी की मौत की घटना गुमनामी के अँधेरे में खो गयी . टेलीविजन चैनलों में होली के हँसी -ठहाकों के बीच केवल एक पट्टी चलती रही - संगीतकार रविशंकर शर्मा का मुंबई में निधन,लेकिन उस महान संगीतकार की पचास-साठ वर्षों की संगीत साधना पर कोई कार्यक्रम प्रसारित नहीं किया गया,जैसा कि महान गज़ल गायक जगजीतसिंह और अभिनेता देवानन्द के निधन पर किया गया था .
महान संगीत शिल्पी : रवि
(०३ मार्च १९२६- ०७ मार्च २०१२)
टी.व्ही. चैनलों में संगीतकार रविशंकर शर्मा के निधन के शोक-समाचार की पट्टी के ऊपर फ़िल्मी जोकरों के फूहड़ होलियाना हँसी-मजाक छाए रहे . शोक समाचार की पट्टी देखकर मैंने फेसबुक पर यह दुखद खबर लिखी , दिवंगत महान संगीतज्ञ का संक्षिप्त जीवन परिचय भी लिखा ,लेकिन फेसबुक की दुनिया में मगन अधिकाँश लोग केवल होली की मस्ती पर आधारित टीका -टिप्पणियों में आपस में व्यस्त नज़र आए .उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि बाबुल की दुआएं लेती जा , आज मेरे यार की शादी है , डोली चढ़ के दुल्हन ससुराल चली और दिल के अरमां आंसुओं में बह गए जैसे सदाबहार फ़िल्मी गीतों को अपने संगीत से सजाने और संवारने वाले संगीतकार 'रवि' अब नहीं रहे . मुंबई के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया .
उन्होंने हिन्दी और मलयालम की कई लोकप्रिय फिल्मों के लिए संगीत दिया. रवि के संगीत से सजी हिन्दी फिल्मों में 'अलबेली (१९५५) , चौदहवीं का चाँद (१९६०), घराना (१९६१) ,खानदान (१९६५) , दो बदन (१९६६), हमराज (१९६७), आँखें (१९६८) और निकाह (१९८२ ) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं .उन्होंने 'वक्त ' ,नील कमल ' और 'गुमराह' जैसी लोकप्रिय हिन्दी फिल्मों में अपना यादगार संगीत दिया. हिन्दी फिल्म 'घराना' और 'खानदान ' के लिए उन्हें प्रतिष्ठित 'फिल्म फेयर अवार्ड से भी नवाजा गया था. वह मलयालम फ़िल्म जगत में 'बाम्बे रवि' और 'रवि बाम्बे' के नाम से भी लोकप्रिय थे. उनका जन्म दिल्ली में तीन मार्च १९२६ को हुआ था . उनका पारिवारिक नाम रविशंकर शर्मा था. उनके निधन से भारतीय फिल्म संगीत के एक स्वर्णिम युग का अंत हो गया.
यह कैसी विडम्बना है कि एक संगीतकार की दिलकश धुनों से सजे गीतों को गुनगुनाने का लोभ हम नहीं सम्भाल पाते , लेकिन उनकी मौत का कोई नोटिस नहीं लेते ? बहरहाल , दिल को छू लेने वाले रवि के संगीत से सजे सदाबहार फ़िल्मी गीत विभिन्न महफ़िलों में , शादी-ब्याह के आयोजनों में और रेडियो और टेलीविजन पर जब कभी गूंजेंगे , रवि साहब की हमें बहुत याद आएगी. विनम्र श्रद्धांजलि.
Friday, February 24, 2012
कहाँ तुम चले गए ?
अपनी सायकल या मोटर सायकल पर सर्दी-जुकाम,बुखार की दवाइयों से भरे काले रंग का बैग लेकर घर-घर जाने वाले , घड़ी-दो घड़ी उन घरों के लोगों के साथ खटिया पर ,नहीं तो पटिये पर बैठ कर चाय सुड़कने , सुख-दुःख की बातें करने और बच्चों और बुजुर्गों से उनकी सेहत का हाल-चाल पूछने वाले , किसी की भी सेहत के प्रति जरा सी लापरवाही दिखने पर अभिभावक की तरह प्यार भरा गुस्सा दिखाने और नसीहत देने वाले , दो चार , पांच रूपए की अपनी बकाया फीस यूं ही छोड़ देने वाले, हम सबके अपने वो घरेलू डॉक्टर अब कहीं नज़र क्यों नहीं आते ? महाजनी सभ्यता की चमक- दमक में क्या उन्होंने अपना चोला बदल लिया है ? क्या अब वो गली-कूचे के हमारे घरों की ओर देखना भी अपनी शान के खिलाफ मानते हैं ? क्या आज-कल वो मेडिकल कॉलेजों से लाखों रुपयों की डिग्री लेकर और आलीशान इमारतों में अपने महंगे से महंगे नर्सिंग होम खोल कर लोगों की सेहत का व्यापार कर रहे हैं?
ज्यादा नहीं, शायद बीस -पच्चीस बरस पहले तक हर गाँव-कस्बे में हर एक घर तक घरेलू डॉक्टरों की अपनी पहचान ,प्रतिष्ठा और पहुँच थी . मोहन के पिताजी रजिस्टर्ड मेडिकल प्रेक्टिशनर थे . आस-पास के कम से कम पचास गाँवों में लगभग प्रत्येक परिवार में उनका उठना -बैठना होता था . वो हर सुबह चार बजे अपनी सायकल से निकलते और दस बजे तक पांच-छह गाँवों का दौरा निपटा आते . वह बताते थे कि मुंह -अँधेरे कई बार जंगल के रास्तों में बाघों और भालुओं से भी उनका आमना-सामना हो जाता था . ग्रामीणों के बीच एक सहज-सरल डॉक्टर के रूप में वह काफी लोकप्रिय हो गए थे . उनके अनुभवी हाथों की दवाइयां मरीजों को काफी आराम दिलाती थीं . आज भले ही लंबी-चौड़ी डिग्रियों के मालिक बने डॉक्टर ऐसे सहज-सरल विलुप्तप्राय घरेलू डॉक्टरों को 'झोला छाप' कह कर उनका मजाक उड़ाते हों ,लेकिन लाखों-करोड़ों गरीब-मेहनतकशों के समाज में उनकी जो अहमियत थी ,उसे भला कौन नकार सकता है ?
समाज में प्रत्येक परिवार से हर घरेलू डॉक्टर का आत्मीय जुड़ाव हुआ करता था . हर घर की नब्ज पर उसकी प्यार भरी पकड़ रहती थी. उसे देखते ही घर के लोग सादगी भरी आत्मीयता से उसका स्वागत करते -- आइये डाक्टर साहब ! अरे पप्पू ! चाय लाना डाक्टर चाचा के लिए ! 'डाक्टर साहब कहने लगते - आज रहने दीजिए ! शर्मा जी के घर से चाय पी कर इधर ही चला आ रहा हूँ ! क्या हाल है ? तबीयत तो ठीक है न सबकी ? चुन्नू ने पेन्सिल और मुन्नी ने मिट्टी खाना बंद नहीं किया ? कितनी बार कहा है मैंने ! इन पर ध्यान तो दीजिए आप लोग ! वरना इनके पेट में कीड़े हो जाएंगे ! अच्छा चलो , मै देता हूँ ये दवाई ! दिन में दो बार बिल्कुल टाइम से खिला देना ! हाँ ,तो गुड्डू इस बार मेट्रिक की परीक्षा में बैठ रहा है ! आगे क्या करने का इरादा है ? श्यामू अभी-अभी टायफाइड से उठा है, कुछ दिनों तक परहेज से रहना बेटा और हाँ !गुड़िया के लिए जलगांव वालों का रिश्ता पक्का हुआ या नहीं ? अच्छा तो अब चलूँ ! गोपाल के घर भी जाना है !
अब कहाँ सुनने को मिलती है ऐसी अपनेपन की बातें ? अब तो हर कहीं डॉक्टरों की अपनी-अपनी दुकानें खुल गयी हैं. इलाज कराने वहाँ जाने से पहले अपनी बुकिंग करानी होती है., समय लेना होता है. पहले किसी के भी घर से किसी के बीमार होने का सन्देश मिलते ही घरेलू डाक्टर स्वयम दौड़कर वहाँ पहुँच जाते थे .आज तो हममें से अधिकाँश लोग किसी डॉक्टर को मरीज देखने घर पर बुलाने की हिम्मत भी नहीं कर पाएंगे . जाने कहाँ गए वो दिन जब घरेलू डॉक्टर की सबसे बड़ी खासियत यह होती थी कि वह डॉक्टर बाद में और मरीज के घर वालों के सुख-दुःख के साथी की भूमिका में पहले हुआ करता था . मरीज के परिवार से उसका भावनात्मक लगाव रहता था. आज के डॉक्टर इमोशनल नहीं ,विशुद्ध कमर्शियल हो गए हैं.धन्ना सेठों ने बड़ी-बड़ी कंपनियां बना कर पांच सितारा होटलों जैसे अस्पताल खोल लिए हैं . उनमें विशेषज्ञ डॉक्टरों की फ़ौज हमेशा तैनात मिलती है ,लेकिन किसके लिए ? उन्हीं के लिए न जो वहाँ हजारों-लाखों रूपयों की फीस दे सके ? कई डॉक्टरों के स्वयं के भी बड़े-बड़े अस्पताल हैं . उन्हें छोड़ कर वो भला किसी आम नागरिक के घरेलू डॉक्टर की भूमिका में क्यों आएँगे ? कुछ साल पहले तक भारतीय फिल्मों में भी घरेलू डॉक्टर नज़र आ जाते थे ,लेकिन अब तो हमारे सिनेमा और टी. व्ही. सीरियलों में नायक-नायिका के बीमार होने पर कहानी उन्हें फाइव-स्टार होटलनुमा अस्पताल पहुंचा देती है . कोई फेमिली डॉक्टर उनके घर नहीं आता .
पहले हर मर्ज़ का एक ही डॉक्टर होता था . चिकित्सा विज्ञान के नए-नए आविष्कारों के चलते आज विशेषज्ञता यानी 'स्पेशलाइजेशन ' का जमाना आ गया है . इतना ही नहीं ,बल्कि अब तो ' सुपर -स्पेशियलिटी ' अस्पतालों का का दौर है . नाक ,कान ,गला , दिल, दिमाग , आँख ,सबके डॉक्टर अलग-अलग ! यानी शरीर में जितने अंग, बाज़ार में उतने ही डॉक्टर ! समझ में नहीं आता -अगर दिल और नाक-कान की बीमारियाँ एक साथ पीछे लग जाएँ , तो मरीज सबसे पहले कहाँ ,किस डॉक्टर के पास जाए ? अगर इनमे से किसी के पास चला भी गया ,तो इ .सी. जी. और , सी.टी. स्कैन करवाने और तरह-तरह के टेस्ट करवाने में ही मरीज और उसके परिवार का दम निकलने लगता है ! चिकित्सा के क्षेत्र में नए आविष्कार ज़रूर हों ,लेकिन यह भी देखना ज़रूरी है कि आविष्कारों की भीड़ में मानवीय संवेदनाएं विलुप्त न हों जाएँ ! जैसे आज हमारे घरेलू डॉक्टर लगभग विलुप्त हो चुके हैं !
डाक्टर और मरीज के रिश्तों में पहले इंसानियत की सोंधी खुश्बू हुआ करती थी ! कहाँ खो गयी वो सामाजिक संवेदनाओं की महक और अपनेपन की चहक ?
--- स्वराज्य करुण
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