Wednesday, September 14, 2011

हिन्दी और उर्दू के सेतुबंध

                                                                     
       उस छोटे शहर के एक छोटे से मोहल्ले में ड्रायक्लीनिंग की एक  छोटी सी दुकान थी ,जहां सफ़ेद बनियाइन और सफ़ेद पायजामा पहने सुबह से शाम तक ग्राहकों के कपड़ों पर लोहा चलाते शेख मोहम्मद 'गनी आमीपुरी को  जगदलपुर की उस बस्तरिया बस्ती के सभी लोग 'गनी भाई ' के नाम से जानते और मानते थे .साधारण चेहरे और साधारण सी पोशाक में एक असाधारण और अत्यधिक संवेदनशील काव्य-प्रतिभा को संजोया हुआ यह शख्स जहां दिन में अपनी रोजी-रोटी के लिए लोगों के कपड़ों की सलवटों को सपाट करने की कोशिश में इलेक्ट्रिक  आयरन से जूझता , वहीं देश और दुनिया के बारे में अपने  दिल की बात दिल वालों तक पहुंचाने की लिए रात के सन्नाटे में कागज और कलम से हो जाती थी उसकी दोस्ती .
                 उर्दू में 'गनी ' का आशय आर्थिक दृष्टि से संपन्न  एक ऐसे व्यक्ति से है ,जो सहृदय , दयालु और दानी है. आर्थिक सम्पन्नता के नाम पर गनी भाई के पास किराए के  छोटे से एक कमरे वाले मकान के अलावा कुछ भी नहीं था ,लेकिन वह मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण एक सहृदय कवि थे ,जिन्होंने सहज-सरल शब्दों से सजी अपनी रचनाओं के ज़रिये मानव समाज को हमेशा मानवता का पैगाम बाँटा .इसलिए 'गनी' नाम उन पर सार्थक बैठता है.   उनकी छोटी सी दुकान पर लगभग हर शाम हिन्दी ,उर्दू  , छत्तीसगढ़ी और बस्तरिया बोली हल्बी के कवियों की बैठक जमती और चाय की चुस्कियों के साथ साहित्यिक गप्पबाजी और कविताओं का भी दौर चलता .   
              आज  हिन्दी दिवस   के प्रसंग में गनी भाई को याद करना  इसलिए भी ज़रूरी है  क्योंकि हिन्दी भाषा की  जैसी सेवा उन्होंने की ,  शायद  कम ही लोग कर पाते होंगें . गनी जी की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि हिन्दी वाले उनको हिन्दी का कवि मानते और उर्दू वाले उन्हें  उर्दू का शायर . दरअसल वह आजीवन  उर्दू लिपि में हिन्दी की सेवा करते रहे. हिन्दी साहित्य को गनी भाई ने उर्दू लिपि में कई सशक्त रचनाएँ दी. इस तरह देश की दो प्रमुख भाषाओं के बीच उन्होंने एक पुल का काम किया . इसलिए अगर उन्हें 'हिन्दी और उर्दू का सेतुबंध ' कहा जाए ,तो गलत नहीं होगा . उन्होंने हिन्दुस्तान की गंगा-जमुनी तहजीब  को अपने जीवन में साक्षात उतारा  देश और दुनिया के हालात से परिचित और प्रभावित कवियों की रचनाओं  में इंसानी ज़ज्बात दिल की गहराइयों से उभर कर आते हैं .गनी जी की रचनाओं में भी यह बात साफ़ नज़र आती है .उनकी एक ग़ज़ल की इन पंक्तियों में इसे आप भी महसूस कीजिये-
                       
                            बेकार है, ख्वाहिश है उजालों की जो मन में ,
                            सूरज तो अभी कैद है दौलत के भवन में !
                            इस पार है चिथड़ों से लदी जिंदगी उस पार ,
                            इक लाश है लिपटी हुई रेशम के कफ़न में !
                            पूछो तो भला उनसे अमल  करते हैं कितना ,
                            क़ानून बनाते हैं जो दिल्ली के भवन में !
                            है परचम-ए-नफरत को उठाए हुए हर शख्स ,
                            मोहताज़ मोहब्बत है 'गनी 'अपने वतन में !

       उर्दू अक्षरों  में हिन्दी सेवा वाकई गनी जी की एक बड़ी  विशेषता थी ,लेकिन यह उनकी सीधी -सच्ची विनम्रता का ही एक उदाहरण था कि ऐसा कोई ज़िक्र आने पर वह अक्सर कहा करते थे- ''आप भले ही इसे मेरी विशेषता कह लें, पर मै तो इसे अपनी कमजोरी मानता हूँ .काश !  हिन्दी यानी देवनागरी लिपि के मेरे अक्षर सुडौल बन पाते .... लेकिन क्या करूँ ? पढाई -लिखाई मेरी कुल छह  ज़मात तक हो पाई और वह भी केवल उर्दू माध्यम से . यह तो साहित्यिक मित्रों का बड़ा सहारा है ,जो उर्दू लिपि की मेरी रचनाओं को देवनागरी में लिख कर प्रकाशन के लिए पत्र-पत्रिकाओं को भेज भी देते हैं .''
                       गनी जी का कहना था - लिपि चाहे कुछ भी हो , मै जनता की भाषा में लिखता हूँ . मेरे लिए आम बोलचाल की भाषा में हिन्दी और उर्दू का फर्क कर पाना बहुत मुश्किल है. मेरी धारणा है कि जो आम बोलचाल की हिन्दी है,  वही आम बोलचाल की उर्दू भी  है. गनी भाई वास्तव में भाषाई एकता के प्रतीक थे .उनका जन्म नवंबर १९३२ में उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ग्राम आमीपुर में हुआ था. जीवन के कठिन संघर्षों ने उन्हें मुंबई महानगर  की सड़कों पर आठ साल तक भटकाया . वह सन १९५६ से १९६४ तक वहाँ चेम्बूर में एक ड्रायक्लीनिंग की दुकान पर नौकरी करते रहे . फिर १९६४ के आस-पास बस्तर जिले के मुख्यालय शहर  जगदलपुर आ गए और करीब सत्ताईस बरस तक ,यानी वर्ष १९९१ में अपने जीवन के अंतिम क्षण तक वहीं के होकर रह गए . छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की धरती के आंचल में समा गए गनी भाई. एक मुलाक़ात में उन्होंने मुझे बताया था - '' यहाँ जगदलपुर आने के बाद शुरुआती कुछ अरसा तो जिंदगी को व्यवस्थित करने में बीत गया .सन १९६८ में उदगम साहित्य समिति के सदस्यों से संपर्क हुआ और मै भी समिति का सदस्य बन गया . एक स्वस्थ और सुरुचिपूर्ण माहौल मिला और लिखना मेरी आदतों में शुमार हो गया .''
                                   गनी भाई को पहली बार प्रकाशन मिला सन १९७१ में ,जब वहाँ युवा साहित्यकार प्रकाशन द्वारा अपनी सायक्लोस्टाइल्ड पत्रिका 'सृजन' के प्रवेशांक में उनकी एक ग़ज़ल और एक रुबाई छापी गयी . उनकी इस पहली प्रकाशित ग़ज़ल का  मतला कुछ यूं था -
                                  
                                      चमन वालों से फूलों की हँसी देखी नहीं जाती
                                      कभी इनसे गरीबों की खुशी देखी नहीं जाती !

सृजन में ही अपनी प्रथम प्रकाशित रुबाई में उन्होंने लिखा -
                                   
                                       ये दुनिया ख़ाक दुनिया है , जहां इंसान बिकते है,
                                       तबाही ,बेबसी के खौफ से ईमान बिकते हैं ,
                                       सुकून मिलता नहीं दिल को कभी नफरत की आंधी से,
                                       जिधर देखो उधर ही मौत के सामान बिकते हैं !

दुनिया से लगातार गायब होती जा रही इंसानियत को लेकर गनी भाई काफी बेचैन रहा करते थे ,क्योंकि वह इंसानियत के कवि थे . उनको पक्का  यकीन था-
                                      
                                          जब तलक न आएगी इंसानियत इंसान में ,
                                          ज़ुल्म होते ही रहेंगे मेरे हिन्दुस्तान में !

उनकी  यह ग़ज़ल सागर (मध्यप्रदेश ) के साप्ताहिक  'गौर-दर्शन ' के दीपावली विशेषांक में सन १९८३  में छपी थी . इस साप्ताहिक में उन दिनों उनकी रचनाएँ नियमित रूप से प्रकाशित होती थी . अपनी बात कहने के लिए गनी भाई प्रतीकों का सहारा तो लेते ही थे ,लेकिन प्रतीकों की तलाश में अपनी ज़मीन को छोड़ चाँद -तारों तक छलांग लगाने की कोशिश उन्होंने कभी नहीं की .अपने आस-पास की दुनिया में बिखरी चीजों के बीच से ही वह प्रतीक निकाल लिया करते थे . पटना (बिहार ) के साप्ताहिक 'समर क्षेत्र ' में २१ अगस्त १९८२ को छपी उनकी एक ग़ज़ल की बानगी देखिये --
                                                   जलती है जैसे जिंदगी ,जलता है लाईटर ,
                                                   मेरा वजूद आज फलसफा है लाईटर !
                                                   जैसे किसी के दिल में शोला छुपा हुआ ,
                                                   वैसे ही बंद आग का गोला है लाईटर !
                                                   अंधे कुएं में मुझको धकेला है ऐ गनी ,
                                                    कब कौन और किसको दिखाता है लाईटर !

      जीवन की निराशा को गनी भाई ने अपने एक गीत में कुछ इस तरह व्यक्त किया है -
                                            
                                                 पथ मिले अनेको जीवन में ,पर 
                                                 स्वर्ण विहान मिला न  मुझको ,
                                                 इस जग के चौराहे पर भी 
                                                 कोई मीत मिला न मुझको ,
                                                  खोज-खोज आँखें पथराई  ,   
                                                 हर कोशिश नाकाम हो गयी !

उनका यह गीत १९७३ में दुर्ग के हिन्दी दैनिक 'चिंतक' में प्रकाशित हुआ था . चाहे लखनऊ (उत्तरप्रदेश)  की मासिक पत्रिका 'युवा-रश्मि ' हो , या छत्तीसगढ़ के रायपुर से छपने वाले दैनिक नव-भारत ,युगधर्म, महाकोशल , महासमुंद का साप्ताहिक 'बांगो-टाईम्स ' हो, या जगदलपुर के  ' दण्डकारण्य समाचार ',कांकेर बन्धु,   अंगारा ,
लगभग हर पत्र-पत्रिका ने उनकी रचनाओं को हाथों-हाथ प्रकाशित किया . आकाशवाणी के जगदलपुर केन्द्र से काव्य-पाठ के अलावा समय-समय पर गनी जी के गीतों का संगीतमय प्रसारण भी हुआ . सन १९७८ में प्रयास प्रकाशन ,बिलासपुर से श्री उत्तम गोसाईं द्वारा संपादित सहयोगी काव्य संग्रह 'छत्तीसगढ़ के नए हस्ताक्षर ' में गनी जी को भी शामिल किया गया था . संकलन में गनी जी का परिचय कुछ यूं दिया गया है- '' गनी भाई जंगल के महकते फूल हैं. जीवन पथ के अविरल संघर्षों में सुरभित आपके गीत और ग़ज़ल दिल-दिमाग पर असरकारक होते हैं .  छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ कवि लाला जगदलपुरी द्वारा सम्पादित और सन १९८६ में प्रकाशित चार कवियों के सहयोगी काव्य-संग्रह 'हमसफर ' में गनी आमीपुरी की भी दस रचनाएँ शामिल हैं . इनमें से एक गीत में उन्होंने आज के विचित्र सामाजिक परिवेश का जैसा चित्र खींचा है, वह दिल की आँखों से ही देखा और महसूस किया जा सकता है. इस गीत में उनकी भावनाएं कुछ इस तरह उतरी हैं-
                            
                              भूख ने बदले यहाँ पर जीने वालों के चलन
                             अब नहीं भाते तुलसी और मीरा के भजन !
                             रोटियों  की फ़िक्र ने ही घर से बेघर कर दिया ,
                              आफतों की भीड़ को ला सर पे मेरे धर दिया !
                              बेबसों के घर जलाते शोषकों के आचरण !

वास्तव में  जीवन के चक्रव्यूह में घिरे गनी भाई ने तमाम संघर्षों के बीच अपना जीवन गुज़ारा ,लेकिन समाज को समस्याओं के चक्रव्यूह से हमेशा जूझने की प्रेरणा देते रहे . उनके एक गीत की बानगी देखें -
                          
                          आंसू की धाराओं पर बाँध बनेगा पक्का लेकिन,
                          संघर्षों का सच्चा जीवन फिर से तुम्हें बनाना होगा .
                          आज़ादी का श्रृंगार करो तुम नए सिरे से लेकिन 
                          पहले धरती के बेटों का सोया भाग जगाना होगा !

    गनी भाई जैसे समर्पित हिन्दी सेवकों को अगर हम  याद न करें तो मेरे ख़याल से 'हिन्दी दिवस ' निरर्थक हो जाएगा . राष्ट्र भाषा हिन्दी आज गहरे संकट में है . उस पर अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी मानसिकता वालों का लगातार हमला हो रहा है . हिन्दी की गंगा-जमुनी ज़ुबान को अंग्रेजी मीडिया के ज़रिये 'हिंगलिश ' में तब्दील करने की साज़िश चल रही है,तब  ऐसे निराशाजनक माहौल में हिन्दी के विकास के लिए गनी जी जैसे समर्पित हिन्दी सेवकों द्वारा निःस्वार्थ भाव से  कलम के माध्यम से किए  जाने वाले  छोटे-छोटे प्रयास  अँधेरे में जलते उन नन्हें दीपकों की मानिंद हैं ,जो एक साथ मिलकर हिन्दी जगत को अपनी रौशनी से जगमग कर सकते  हैं . गनी भाई तो लगभग बाईस बरस पहले हमें छोड़ कर दुनिया से चले गए हैं ,पर अपनी रचनाशीलता से समाज को हिन्दी के विकास का एक रास्ता  भी  दिखा गए हैं .
                                                                                                                  -स्वराज्य करुण 

हिन्दी -डे ' सेलिब्रेट 'करना है !

                  

                    अजी सुनते हो ! बंटी के स्कूल में हिन्दी दिवस मेरा मतलब  हिन्दी-डे मनाया जाएगा , अरे मनाया  नहीं, सेलिब्रेट किया जाएगा .  अभिभावक , ओफ  ओ , कितना मुश्किल वर्ड है ये भी,  मेरा मतलब पैरेंट्स को ,यानी गार्जियंस को भी  वहाँ बुलाया गया है.
                   अच्छा है जी ,  शादी के बाद तुम्हारी नौकरी लगी और हम लोग  शहर आ गए .बंटी भी शहर में पैदा हुआ ,वरना उसे भी गाँव की हवा लग जाती और वह भी गंवारों की तरह बन जाता , गाँव के स्कूल में गाँव के बच्चों के संग  टाट-पट्टी में ज़मीन पर बैठ कर ए,. बी , सी.डी  नहीं , क,ख, ग , सीखता . ,वन ,टू,थ्री ,फोर की जगह एक,दो, तीन, चार बोलता ., पोयम की जगह कविता रटता .गुड-मॉर्निग की जगह नमस्ते बोलता , शेक-हैंड की जगह अपने से उम्र में बड़े लोगों के चरण छूता  और गलियों में  गिल्ली डंडा खेलता .
            अच्छा हुआ जी,हम लोगों ने अपने बंटी का नाम इंग्लिश स्कूल में लिखवा दिया . कहाँ वो गाँव की टाट पट्टी वाली सरकारी प्राथमिक पाठशाला और कहाँ ये शहर का 'लिटिल फ्लावर' इंग्लिश मीडियम स्कूल . अपना बंटी होशियार ...ओहो , वेरी सौरी, होशियार नहीं, टैलेंटेड हो गया है.  अपनों से बड़ों को वह समय के हिसाब से गुड-मॉर्निंग और गुड-नाईट ,कहना सीख गया है. अपने स्कूल की शिक्षिका ,अरे वही , शिक्षिका यानी मेम   को वह अपने इंग्लिश बुक की हर पोयम  सुनाता है .अजी सुनो, छह महीने बाद हमारे घर एक 'नया मेहमान' भी तो आने वाला है . बंटी के स्कूल वालों ने विज्ञापन छपवाया है- इंग्लिश मीडियम स्कूल में उन बच्चों के लिए भी सीटों की एडवांस बुकिंग हो रही है ,जो अभी पैदा भी नहीं हुए हैं.लेकिन अगले कुछ महीनों में पैदा होने वाले हैं .सुनो जी ! हम लोग भी बुकिंग करवा लेते हैं ना ! छह महीने बाद मेरी गोद में बबला या बबली ,जो भी आए, उसका तो भविष्य ,ओहो ...भविष्य नहीं, फ्यूचर सुरक्षित यानी सिक्योर्ड हो जाएगा .
        अच्छा चलो अब सो जाते हैं. कल १४ सितम्बर को बंटी के स्कूल में 'हिन्दी -डे '  .सेलिब्रेट करने जाना है .
                                                                                              
                                                                                                           -   स्वराज्य करुण 







Sunday, September 11, 2011

उफ़ ! ये भयंकर भक्ति भावना !

                                                                                            -  स्वराज्य करुण

          
      दफ्तर पहुँचने में देर हो रही थी . फोर-लेन पर एक अधूरे  ओव्हर ब्रिज के आजू -बाजू बिखरे मलबे की वजह से मुख्य सड़क पर लगभग दो किलोमीटर लम्बा ट्रैफिक जाम लगा हुआ था . मैंने इस रुकावट  से बच निकलने के लिए बगल के शॉर्ट -कट रास्ते से निकलना चाहा और वाहन उधर घुमाया ,लेकिन यह क्या ? कुछ दूर जाने पर वहाँ एक बड़ा पंडाल तना हुआ था और उस रास्ते के दोनों तरफ से चार चक्के तो क्या , दो चक्के वाली गाड़ियों का  भी आना-जाना बंद हो गया था .वहाँ किसी तथा कथित सार्वजनिक गणेश उत्सव समिति ने गणेश जी की प्रतिमा रखकर अपनी भक्ति-भावना के प्रदर्शन के लिए राहगीरों का और वाहनों का चलना-फिरना अघोषित रूप से बंद करवा दिया था . मुझे मजबूरी में उसी फोर लेन पर आना पड़ा ,जिस पर ट्रैफिक जाम जस का तस बना हुआ था और ट्रक,बस , जीप, कार आदि हर तरह की गाडियां टस से मस नहीं हो रहीं  थी .
                   बड़ी मुश्किल से जाम हटा और मै उस दिन बहुत विलम्ब से दफ्तर पहुंचा. खैर, इस देरी की भरपाई के लिए जब मै देर रात तक  दफ्तरिया कामों को निबटा कर घर के लिए निकला  तो दो किलोमीटर जाने पर बीच सड़क में आम-सभा जैसा नजारा देख  किसी शॉर्ट-कट वैकल्पिक रास्ते की खोज में गाड़ी वापस मोड़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. मेरे जैसे कुछ अभागे राहगीरों से पूछने पर मालूम हुआ कि कुछ तथा कथित  गणेश भक्तों की स्वघोषित समिति ने बीच सड़क पर गीत-संगीत का आयोजन किया है. सड़क के दोनों ओर से यातायात अवरुद्ध है .मुसाफिर और राहगीर हलाकान हैं ,लेकिन आयोजकों को उनसे भला क्या लेना-देना ?       उन्हें तो देर रात तक लाऊड स्पीकरों  पर गगन-भेदी गीत-संगीत के ज़रिये बरसने वाले भक्ति-रस की बहती गंगा में हाथ धोते रहना है . पास-पड़ोस के लोग भले ही  कर्ण-भेदी शोर से परेशान होते रहें !  शहर की एक सड़क से गाड़ी में गुजरते हुए उस दिन फिर कुछ ऐसा ही हुआ .उस एक ही सड़क पर सिर्फ एक किलोमीटर के छोटे से हिस्से में गणेश जी के कम से कम  बीस पंडाल सजे हुए थे .अनन्त-त्रयोदशी पर भक्तों की भारी भीड़ थी और भगवान की एक शोभा-यात्रा भी चल रही थी . इस मार्ग पर आने से पहले मुझे इसका अंदाजा नहीं था . लिहाजा , कम से कम डेढ़ घंटे उस ट्रैफिक जाम को मजबूरन झेलना पड़ा.
     बहरहाल , मै और मेरे जैसे कितनों ने  तो ट्रैफिक-व्यवधान की  इन तीनों घटनाओं में अपने कीमती वक्त की बर्बादी को किसी तरह बर्दाश्त कर लिया ,लेकिन ज़रा  सोचिये ,अगर  अपने परिवार के किसी गम्भीर बीमार सदस्य को लेकर कोई अस्पताल जा रहा हो ,और सड़क पर ऐसी कई रुकावटें खड़ी हों, तब क्या होगा ?  अगर कहीं आग लगी हो और फायर-ब्रिगेड को उसी रास्ते से आना-जाना हो , लेकिन   बीच सड़क पर किसी के द्वारा अपनी निजी भगवान भक्ति के प्रदर्शन के लिए पंडाल तान दिया गया हो, किसी  ने बीच रास्ते पर नाच-गाने की महफ़िल सजा रखी हो, भगवानों की शोभा यात्रा सड़कों को घेर कर चल रही हो, तब आग बुझाने के लिए निकले फायर -ब्रिगेड का और जहां आग लगी हो उस जगह का  क्या होगा ? परिणामों के बारे में सोच कर ही सिहरन होने लगती है. जिन लोगों को सरकार ने सार्वजनिक यातायात बनाए रखने की जिम्मेदारी दी है, वे पता नहीं ऐसे समय में कहाँ रह जाते हैं ? भगवान गणेश तो विघ्न-विनाशक हैं ,वो भला आम जनता के सामान्य यातायात में विघ्न क्यों डालेंगे ?  विघ्न तो विघ्न-संतोषियों द्वारा ही डाला जाता है  !
                            आधुनिक युग में  हमारे देश में सार्वजनिक गणेश उत्सवों का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम के गौरवशाली इतिहास से जुड़ा हुआ है . आज़ादी के महान योद्धा, महान चिंतक और  लेखक लोकमान्य पंडित बाल गंगाधर तिलक ने उन दिनों आम जनता में राष्ट्रीयता और देश की स्वतंत्रता  के लिए चेतना जगाने और इस अभियान में समाज को साथ जोड़ने के लिए सार्वजनिक गणेश-पूजन की शुरुआत की थी ,लेकिन यह भी सच है   कि तिलक जी ने कहीं भी यह नहीं कहा कि इस अनुष्ठान के लिए यातायात को ही रोक दिया जाए !
              हम इक्कीसवीं सदी में आ गए हैं . समाज में शिक्षा और साक्षरता की दर पहले की तुलना में काफी बढ़ गयी है,लेकिन इसका क्या फायदा , जब  हम एक-दूसरे की तकलीफों को समझने की कोशिश नहीं करते ! गाजे-बाजे के साथ धार्मिक जुलूस निकालना , अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर  धरना-प्रदर्शन करना , सड़क पर नाचते-गाते बारात निकालना ,अपनी शान दिखाने के लिए ध्वनि-प्रदूषण  के साथ धमाकेदार कान-फोड़ू संगीत बजाना और बीच-बीच में धमाकेदार पटाखे फोड़ना भी  कहीं न कहीं ,किसी न किसी विचार या किसी न किसी व्यक्ति अथवा संस्था के प्रति हमारी व्यक्तिगत आस्था और भक्ति-भावना को ही प्रकट करता है  जो  हमें  निजी तौर पर तो सुख देता है ,लेकिन यह सब देख कर आस-पास के घरों, राह चलते और वाहनों में आते-जाते लोगों के दिलों में  क्या प्रतिक्रिया होती होगी , क्या उन लोगों ने कभी सोचा है ,जो अपने किसी खास प्रयोजन से ऐसा आयोजन  करते हैं ? क्या ऐसा कोई भी सामूहिक या सार्वजनिक आयोजन दूसरों को तकलीफ दिए बिना नहीं हो सकता ?
                बीच सड़क पर देवी-देवताओं की मूरत रख कर , बिजली की जगमग रौशनी से उनके मंडप सजा कर सार्वजनिक रास्ते को रोकने का अधिकार हमें किसने दिया ? क्या ऐसा करके हम यातायात नियमों की धज्जियां नहीं उड़ाते ? क्या भगवान गणेश या किन्ही और देवी -देवताओं ने हमसे कहा है कि हम उनकी पूजा के लिए आम जनता के आने-जाने के रास्तों  को ही ठप्प कर दें ? अगर नहीं तो फिर भगवान के नाम पर ऐसी भयानक भक्ति क्यों, जिसे देख कर  सीधे सादे लोग  भयभीत हो जाएँ  और ऐसे भक्तों , जुलूसियों और बारातियों को दिल ही दिल में कोसते हुए  दबी ज़ुबान में झल्लाएं -उफ़ ! ये भयंकर भक्ति-भावना !                   
                                                                                                                  -   स्वराज्य करुण
                                                                                        
                                
(फोटो : गूगल से साभार )

Thursday, September 8, 2011

शहरों में आती है मानव-निर्मित बाढ़ !

                         
                  पिछले तीन-चार दिनों से प्रदेश में  व्यापक रूप से लगातार बारिश हो रही है. नदी-नाले उफान पर हैं. कुछ जिलों में बाढ़ के हालात भी देखे जा रहे हैं .यह  मौसम का उतार-चढाव है . मिजाज़ मौसम का कब कैसा हो , कहा नहीं जा सकता . अभी जबकि ये पंक्तियाँ  लिखी जा रही हैं , अगले कुछ घंटों या कुछ दिनों में  बारिश के हालात क्या होंगे , कुछ कहना मुश्किल है. हो सकता है द्रोणिका का प्रभाव  कम होने पर  बारिश की रफ्तार भी धीमी हो जाए ताकि  मौसम खुलने पर जन-जीवन सामान्य ढर्रे पर लौट सके ,लेकिन अभी तो बादलों का बरसना जारी है. भादों में बादल बरसों बाद इतना बरस रहे हैं . किसानों का कहना है कि इससे जहां धान की फसल को फायदा होगा , वहीं दलहन-तिलहन की खेती प्रभावित होगी,लेकिन लगातार बारिश जारी रहने पर धान की फसल भी खराब हो सकती है.  शहरों में निचली बस्तियों में बारिश का पानी घरों में घुसने पर लोग परेशान हो रहे हैं .लगभग सभी शहरों में सड़कों पर पानी बह रहा है ,क्योंकि निकासी की नालियां कचरे ,विशेष रूप से पॉलीथिन की थैलियों से अटी हुई हैं .
              मुझे लगता है कि हमारे गाँवों में अति-वर्षा से अगर बाढ़ के हालात बनते हैं, तो उसके लिए कुछ हद तक हम कुदरत को ज़िम्मेदार मान सकते हैं, लेकिन आज की स्थिति में अगर शहरों में ऐसे हालात बनते हैं, तो उसके लिए हम शहरवासी खुद ज़िम्मेदार हैं. हमें किसने कहा कि हम अपने घरों का कूड़ा-करकट उन तमाम नालियों में डालकर उन्हें अवरुद्ध कर दें , जिनका निर्माण करोड़ों रुपयों  की लागत से कराया गया था, और वह सारा खर्च  भी टैक्स के रूप में हमी लोगों ने दिया था . सड़कों के किनारे अपनी दुकान और अपने मकान की सरहद को चोरी-चोरी चुपके-चुपके बढाते हुए  हम नालियों पर भी कब्जा जमा लेते  हैं .ऐसे में अगर नालियां जाम हो जाएँ तो, पानी की निकासी कहाँ से होगी  ? फिर तो कुछ ही  मिनटों की बारिश में शहर की सड़कों में बाढ़ का नजारा दिखने लगेगा.  यह ज़रूर है कि हमारी इस लापरवाही को भी नगर-पालिकाओं के अधिकारी -कर्मचारी लापरवाही से या फिर 'सहयोग-शुल्क' लेकर नज़रंदाज़ कर जाते हैं. शहरों के नजदीक प्रवाहित नदियों में दुनिया भर का प्रदूषण हम लोग या हमारे ही लोग फैला रहे हैं ,जिससे नदियाँ सिमटने लगी हैं .फिर बारिश में शहर की सड़कों का पानी आखिर जाए तो जाए कहाँ ? उसे निकलने का रास्ता नहीं मिलेगा तो वह बस्तियों में ही फैलेगा और घरों में घुसेगा . इस प्रकार शहरों में बरसात में आने वाली बाढ़ वास्तव में कुदरती नहीं ,बल्कि मानव-निर्मित होती हैं .
           एक बात और ! जीवन के लिए पानी अनमोल है. यह जो बारिश हो रही है, वह कुदरत से हमें मुफ्त मिल रहा एक ऐसा अमृत है, जिसे पाने के लिए   देवी -  देवता भी तरसते होंगे . यह अमृत कहीं घर की छत से,तो कहीं सड़कों से बेकार बह जा रहा है, इसे समुचित जल-प्रबंधन के ज़रिये रोका जाना चाहिए ,ताकि वह सूखे मौसमों में भी भू-जल स्तर को संतुलित रख सके .रेन-वाटर हार्वेस्टिंग की तकनीक इसमें काफी मददगार हो सकती है. कुछ नगरीय निकायों में यह नियम भी लागू किया गया है कि उन्हीं  भवनों और मकानों के नक्शे पास होंगें ,जिनमे रेन-वाटर हार्वेस्टिंग का प्रावधान होगा,. नगरीय-निकायों के अधिकारी ऐसे नक्शों को पास तो कर देते हैं ,लेकिन बाद में उनके पास  मौके पर जाने और इसकी  तस्दीक करने की फुर्सत नहीं होती कि वास्तव में नक्शे के अनुरूप काम हुआ भी है कि नहीं . अगर  प्रत्येक मकान की छत से बारिश के पानी को एकत्रित कर हैंड-पम्पों के आस-पास कम लागत की एक विशेष तकनीक से ज़मीन  के भीतर भेज दिया जाए ,तो गर्मियों में ऐसे हैंड-पम्प कभी नहीं सूखते . लेकिन हम लोगों ने ठान रखा है कि इस तरफ देखना भी नहीं है, क्योंकि ऐसे कामों के लिए हमें फुर्सत नहीं है.
                       हम पहाड़ी-ढलानों से बारिश के बेकार बह जाने वाले पानी को रोकने के लिए भी गम्भीर नहीं है, जबकि ऐसा करके अन्ना हजारे ने अपने गाँव रालेगांव -सिद्धि को प्रसिद्धि के शिखर तक पहुंचा दिया .जल-ग्रहण क्षेत्र विकास या वाटर-शेड की उनकी इस तकनीक को सरकारी योजना का भी अंग बनाया जा चुका है . जी हाँ ! ये वही अन्ना हजारे हैं .-,जन-लोकपाल वाले  चौहत्तर साल के युवा , जिनके सामने कथित युवा -ह्रदय सम्राटों की चमक भी अब बहुत फीकी हो गयी है.
                                                                                                          - स्वराज्य करुण 

Wednesday, September 7, 2011

प्यार की निशानी !

                                   


                                             खेत-खेत और जंगल-जंगल बरस रहा  है पानी
                                             देखो-देखो मानसून  बन गया  है औघड दानी !

                                             धरती के आंगन में  बिछ गयी   हरियाली की चादर  ,
                                             बैठ के जिस पर प्रेम के पंछी बोलें अपनी बानी  !  
                  
                                            सोने-चांदी की चमक भी   इसके आगे फीकी
                                            बादलों से बरस रही जो  प्यार की   निशानी !

                                             थाम लो अपनी अंजुरियों में,वरना पछताओगे
                                             आज  तुम्हारी बेरुखी कल होगी एक कहानी !
                                    
                                            अमृत की  ये  बूँदें अनमोल तुम  मोल इनका समझो ,
                                            नहीं तो मौसम  तय कर देगा कीमत मनमानी !
                            
                                            पढ़-लिख वाकई आज बन गए  लोग बहुत ज्ञानी ,
                                            न जाने फिर  क्यों करते हैं  वो  ऐसी नादानी  !
                           
                                             अम्बर से बरसते आशीषों  को व्यर्थ बहा देते हैं
                                             फिर कैसे मिल पाएगी बोलो उसकी मेहरबानी !

                                                                                         स्वराज्य करुण


                                        
                                              
                             


                                  
                                         
                                             

Tuesday, September 6, 2011

हेलीकॉप्टर वाले डाकू !

                                                महंगाई से परेशान 
                                                कोई किराने की दुकान पर 
                                                तो कोई आटे की चक्की पर है ,
                                                फिर भी उनका कहना है कि
                                                देश तरक्की पर है  !

                                                कभी -कभी लगता है कि
                                                उनकी बातों में दम है ,
                                                तरक्की के रास्ते पर
                                                उनके ही बढते कदम हैं !
                                                इसीलिए उन्हें लगता है कि
                                                देश तरक्की  पर है ,
                                                कोई माने या न माने ,
                                                उन्हें किस बात का डर है  ?
                                           
                                               पहले लूटमार के लिए
                                               एक चाकू काफी था
                                               घोड़े पर बैठा डाकू काफी था  /
                                               अब डाकुओं के घरों में
                                               घोड़ों की जगह 
                                               मिलने लगे हैं हेलीकॉप्टर ,
                                               वह भी एक नहीं ,चार-चार ,
                                               विश्वास न हो तो
                                               देख लो आज का अखबार !
                                           
                                               महंगाई के चलते 
                                               भले ही भर न पाए हमारा झोला ,
                                               हमारे देश के डाकू
                                               रखने लगे हैं
                                               आधुनिक उड़न खटोला !

                                               फिर क्यों न कहें 
                                               देश तरक्की पर है आज ,
                                               अभी तो वे हेलीकॉप्टर से
                                               जाते हैं डाका डालने,
                                               कल उसकी जगह होगा
                                               तेज-रफ्तार हवाई जहाज !

                                               डाकू जी आएँगे फ्लाईट से,
                                               जाएंगे भी फ्लाईट से
                                               डालकर डाका ,
                                               कोई नहीं कर पाएगा
                                               उनका बाल बांका !
                                               आज तो वे लूट रहे हैं खेत
                                               और  खदान ,
                                               कल लूट कर ले जाएंगे
                                               पूरा हिन्दुस्तान !
                                                                          -स्वराज्य करुण
                                         

Monday, September 5, 2011

सच्चाई को नही चाहिए सुरक्षा घेरा !


                  एक खबर जो  कुछ अखबारों में पढ़ने को मिली, उसके अनुसार सुप्रसिद्ध और शत-प्रतिशत असली गांधीवादी समाज-सेवी अन्ना हजारे की सुरक्षा  को जन-लोकपाल मुद्दे पर उनके विशाल जन-आंदोलन के कारण खतरा उत्पन्न हो गया है,.इस वजह से महाराष्ट्र सरकार के निर्देश पर अहमदनगर पुलिस के जवान  उन्हें जेड श्रेणी के सुरक्षा घेरे में ले चुके हैं . इधर अन्ना हैं कि मान ही नही रहे हैं. वह ऐसी कोई सुरक्षा नहीं चाहते ,जिससे आम जनता को  तकलीफ झेलनी पड़े .
      यही वज़ह है कि उन्होंने सुरक्षा घेरा लेने से इंकार कर दिया है  और कहा है कि वह इस बारे में महाराष्ट्र के गृह मंत्री को चिट्ठी लिखेंगे . उन्होंने अपने गृह ग्राम रालेगन सिद्धि में पद्मा देवी मंदिर में पूजा करने के बाद कहा कि उन्हें सुरक्षा घेरा नहीं  चाहिए .वह जनता के बीच रह कर काम करते रहेंगे . अन्ना ने यह भी कहा कि देश की आज़ादी के लिए संघर्ष कर अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीद भगत सिंह ,सुखदेव और राजगुरु ने भी अपने किसे काम के लिए किसी तरह की सुरक्षा नहीं ली थी . हिम्मत और हौसले के साथ अन्ना जी ने जिस साफगोई से यह बात कही है, क्या वह आज के उन एक से बढकर एक तथा कथित जन-सेवकों के लिए एक सबक नहीं है, जो हमेशा किसी न किसी सुरक्षा घेरे में रहना अपनी शान समझते हैं  ? हमारे यहाँ तो कहावत भी है - 'सांच को आंच नहीं ' , फिर किस बात का और कैसा डर ?
           अगर आप और हम किसी जन-सेवा की राह पर निकले हैं , तो किसी बनावटी और दिखावटी सुरक्षा की  ज़रूरत ही क्या है ? अगर हमारी सेवा भावना में सच्चाई है, तो जिस जनता-जनार्दन की हम सेवा करने का दावा करते हैं , वही जनता हमें सुरक्षा देगी . यह बात क्या जन-सेवकों को समझ में नहीं आती. आखिर उन्हें इतना डरने की क्या ज़रूरत है कि सुरक्षा घेरा ही उनके लिए सबसे बड़ी ज़रूरत बन जाए ?अन्ना जी सच्चाई की राह पर चल रहे हैं .उन्हें मालूम है कि खतरा चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो,  सच्चाई को किसी भौतिक सुरक्षा घेरे की ज़रूरत नहीं होती. सच्चाई अगर सुरक्षा घेरे में रहेगी , तो सत्य और अहिंसा का दम  घुट जाएगा . वास्तव में उनके जैसे समाज-सेवक के लिए जनता का प्यार और दुलार ही असली सुरक्षा  घेरा है , जिसका कोई अभाव अन्नाजी को नहीं है . हमारी भारतीय संस्कृति में भगवान गौतम बुद्ध ,महावीर स्वामी , संत कबीर, गुरुनानक , स्वामी विवेकानंद जैसे कई मनीषी और समाज सुधारक हुए, जिन्हें कभी किसी बाहरी सुरक्षा घेरे की ज़रूरत नहीं पड़ी. सच्चाई और अच्छाई की मशाल लेकर वे हमेशा जनता के बीच काम करते रहे.
       अन्ना जी गांधीवादी हैं.उन्हें यह भी मालूम है कि  सत्य और अहिंसा के पुजारी  राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी अपने निजी जीवन के लिए आजीवन कोई सुरक्षा नहीं ली ,भले ही उन्हें अपने सिद्धांतों के लिए अपना जीवन भी कुर्बान करना पड़ा , लेकिन वह देश और दुनिया को अहिंसा और सच्चाई का रास्ता बता गए .  आज अन्ना हजारे भी हमें गांधी जी का बनाया यह मार्ग दिखा रहे हैं  वह भारत के आकाश में भारतीयों के लिए नयी आशाओं का एक नया रोल-मॉडल बनकर नए सितारे की तरह अपनी चमक बिखेर रहे हैं. अन्नाजी का जीवन देश की १२१ करोड जनता के लिए एक अनमोल धरोहर बन गया है. हमारी यह धरोहर सुरक्षित रहे ,अन्नाजी का सार्वजनिक जीवन स्वस्थ ,सुदीर्घ और यशस्वी हो  ,अन्याय  और अत्याचार के खिलाफ  वह देशवासियों को संगठित कर सबको सच्चाई का रास्ता दिखाते रहें , बस, यही कामना है.
                                                                                                            -    स्वराज्य करुण