जब कहीं दम तोड़ रही हो
तन -मन और वतन की आबरू ,
जब किसी गुनहगार के हाथों
ज़िंदा जल रहा हो कोई बेगुनाह /
तब जान कर भी सब कुछ
और देख कर भी बहुत कुछ ,
पिघलता नहीं हमारा ह्रदय
सच ! कितना खौफनाक
हो गया है हमारा समय /
सच्चाई की आँखों में आँखें
डाल कर बतियाने से भी
घबराता है हमारा समय /
रास्ते में देख कर अपने ही
जैसे किसी इंसान का खून
और इंसानियत की लाश ,
हमारा समय करने लगता है
किसी सुरक्षित ठिकाने की तलाश /
भागम-भाग से भरी दुनिया में
किसी के पास नहीं है
किसी के लिए एक पल भी
रुकने की फ़ुरसत /
हर किसी को चाहिए बस
दौलत ही दौलत /
एक अंतहीन दौड़ का हिस्सा
बन कर जाने किस दिशा में
प्रकाश की गति से भी तेज
कितनी बदहवासी में भाग रहा है
हमारा समय /
लोग कहते हैं कि
यह सब समय का तकाजा है ,
सुख-सुविधा के जलसे में फिर भी
कुछ लोगों के लिए खुला जो रहता है
वह अदृश्य पिछ्ला दरवाजा है /
कोई नहीं जानता
इस निरर्थक दौड़ में किसकी
होगी विजय और किसकी पराजय /
दोस्तों ! क्या हर मौसम में
अब ऐसा ही रहेगा हमारा समय ?
स्वराज्य करुण
Monday, November 15, 2010
Sunday, November 14, 2010
एक कविता दोस्तों के नाम !
लिखो दोस्तों !
लिखो उनके बारे में -
जो नहीं लिख पाते अपनी आप-बीती
जो छल-कपट से भरी इस दुनिया में
हमेशा झेल रहे अन्याय और अनीति /
हमेशा झेल रहे अन्याय और अनीति /
लिखो उन पर क्या गुज़री - जिनकी अस्मत को लूटा
अस्मत के पहरेदारों ने ,
और सबूतों के अभाव में
जिनको छोड़ा क़ानून के ओहदेदारों ने /
खौफनाक चेहरों के सामने
दहशत से कांपती आँखों ने
पहचान कर भी नहीं पहचाना
अगर उन दरिंदों को ,
क्या सिर्फ इसलिए हम भूल जाएँ
उन घायल परिंदों को ?
क्या इसलिए नहीं लिखेंगे हम उनका दर्द
कि वे नहीं हैं हमारे भाई , हमारी बहन-बेटियाँ ,
जिनकी जिंदगी से हुआ खुलकर खिलवाड़,
जिनके लिए बंद है क़ानून की हर खिड़की
और हर किवाड़ /
अगर होता उनकी जगह हमारा-तुम्हारा
परिवार / तब क्या करते हम-तुम मेरे यार ?
इसलिए गुजारिश है मेरी -
लिखो उनकी बात
जिनकी राहों से अब तक नहीं मिटी
स्याह काली रात /
लिखो दोस्तों ! लिखो !
उनके घर-परिवार की
पीड़ा - जिनको कुचला खुली सड़क पर
किसी दबंग की कारों ने /
ज़ज्बात जिनके गुम हो जाते
लफंगों के लफ्फाज़ नारों में /
बेरहमों और बेईमानों के इस मायावी
संसार को समझ कर,
संसार को समझ कर,
लिखो भी अब इंसानों के बारे में ,
जिनके हिस्से की धरती को निगल रहा आकाश,
बंधक है जिनका भविष्य ,
कैद है जिनका वर्तमान,
तुम लिखो उनका इतिहास /
लिखने से कुछ हो न हो ,
इतना तो होगा ज़रूर-
दिल के किसी कोने में कौंधेगा कोई विचार
होगा अँधेरे में कुछ रौशनी का आभास /
स्वराज्य करुण
Saturday, November 13, 2010
(गज़ल ) गोकुल जैसा गाँव नहीं है !
.
नदियाँ रेगिस्तान हो गयी
पार कहीं भी नांव नहीं है .
नदियाँ रेगिस्तान हो गयी
पार कहीं भी नांव नहीं है .
कोयल की खामोशी देखो
कौए की कांव-कांव नहीं है .
गोधूली की धूल कहाँ अब ,
धूल भरे कहीं पाँव नहीं हैं .
दूध-दही की बात न पूछो
दारू का अभाव नहीं है .
बात-बात पे होते झगड़े
बोल-चाल बर्ताव नहीं है .
लोक -गीत अब नहीं हवा में
चौपालों में अलाव नहीं है.
कहाँ बजे कान्हा की बंशी ,
गोकुल जैसा गाँव नहीं है .
गौरैया भी गायब घर से
आँगन में सदभाव नहीं है .
कब लौटेंगे दिन वो पुराने ,
जिनमें कोई टकराव नहीं है .
स्वराज्य करुण
Friday, November 12, 2010
(गज़ल ) .एक ऐसी कठपुतली !
देखो जरा आस-पास कैसा जमाना है .
निठल्लों को घर बैठे खीर खाना है !
जनता की अर्जी पर अफसर की मर्जी ,
फाइलों का टेबल पर आना और जाना है !
पहुँच जिसकी दूर तक हो सबसे पहले ,
नज़रों ही नज़रों में उसे मुस्कुराना है !
दफ्तर को चाहिए एक ऐसी कठपुतली,
ईमानदारी से जिसका झगड़ा पुराना है !
बहुतों की होती है कुछ ऐसी फितरत,
काम करने वालों की खिल्ली उड़ाना है !
शायद ये लिखा है देश की किस्मत में ,
कामचोरी का तो ये आलम पुराना है !
रौब-दाब से रहते यहाँ सारे आलसी ,
हमको तो रात-दिन पसीना बहाना है !
स्वराज्य करुण
Thursday, November 11, 2010
(गीत ) पथ-विहीन पृथ्वी पर !
ज़माने की नब्ज़ को टटोल कर देख लिया ,
कहीं भी ज़रा -सी धड़कन नहीं है !
खेतों में दूर तक फ़ैली है खामोशी
हरियाली खो गयी जानी किन घोंसलों में,
अपने ही कदमों का भरोसा जब नहीं
कैसे यकीन करें रास्तों के हौसलों में !
अँधेरे की भुजाओं में कैद हुई रोशनी ,
आज-कल सुबह कहीं जागरण नहीं है !
इतनी जल्दी कैसे कमीज़ पुरानी हुई
नयी कमीज़ की तलाश में देखो आत्मा ,
तस्वीर अपने जीवन की बदल नहीं पाए हम,
कर रहे हैं अपनी उम्मीद का भी खात्मा !
जल रहे हैं गाँव-शहर ,भयभीत भाग रहे सब ,
हाल चाल पूछने का वातावरण नहीं है !
चल रहा है सपनों के कत्ल का सिलसिला
इक-दूजे को ढकेल बढ़ रही है दुनिया ,
हमसफर के पांवों में बांधकर जंजीर आज
उन्नति के शिखरों पर चढ़ रही है दुनिया !
मिट गए हैं भगदड़ में सूरज के चरण-चिन्ह ,
पथ-विहीन पृथ्वी पर कोई किरण नहीं है !
- स्वराज्य करुण
Wednesday, November 10, 2010
(गीत ) नया सवेरा होने तक !
दुनिया के इस कोने से उस कोने तक ,
हम तो चलते जाएंगे नया सवेरा होने तक !
पर्वत -पत्थर आएँगे ही
बहती नदियों के पथ पर ,
लेकिन हम गतिमान रहेंगे
अपने संकल्पों के रथ पर !
रात भले कितनी ही लम्बी क्यों न हो ,
हम नहीं जाएंगे निंदिया के नरम बिछौने तक !
कितनी दूर चले हैं साथी
देखो ज़रा तुम पीछे मुड़ कर ,
गुज़र गयी कितनी ही सदियाँ
इस लम्बे सफर से जुड़ कर !
उत्साह जागने और अलस के सोने तक ,
हम तो चलते जाएंगे नया सवेरा होने तक !
धर्म -जाति की ऊंची-नीची
दीवारों को तोड़ चलें ,
इक-दूजे से मानवता का
आओ नाता जोड़ चलें !
समता के धागे में ममता के मोती पिरोने तक ,
हम तो चलते जाएंगे नया सवेरा होने तक !
स्वराज्य करुण
Tuesday, November 9, 2010
(गीत) फसल काटने का मौसम है !
सपनों की बाती में उम्मीदों की रोशनी पले
मेहनत के दीप जलें ,मेहनत के दीप जलें !
खेतों से खलिहानों तक
नदियों ,पर्वत ,मैदानों तक ,
इक-दूजे का बोझ उठाते ,
इक-दूजे पर प्यार लुटाते !
जीवन की इस कठिन राह पर मिलकर सभी चलें,
मेहनत के दीप जलें ,मेहनत के दीप जलें !
फसल काटने का मौसम है ,
अधिकार बांटने का मौसम है ,
मालिक और मजदूर बीच अब
खाई पाटने का मौसम है !
सुख-समता का चमके सूरज , फिर न कभी ढले,
मेहनत के दीप जलें मेहनत के दीप जलें !
भटके न कोई अन्धकार में ,
मेरे देश में और संसार में ,
कहीं न कोई वृक्ष हो सूखा ,
मेहनतकश अब रहे न भूखा !
सबके हिस्से की खेती हर मौसम खूब खिले
मेहनत के दीप जलें ,मेहनत के दीप जलें !
हर फूल खुशी से महक उठे ,
हर चिड़िया चहक-चहक उठे ,
हो भ्रमर -गीत सब राहों में
फुलवारी की बांहों में !
हर आंगन फूले-फले , इस नीले नभ के तले ,
मेहनत के दीप जलें ,मेहनत के दीप जलें !
स्वराज्य करुण
Subscribe to:
Posts (Atom)





