(आलेख : स्वराज करुण )
जब हमारी बेटियाँ स्कूली यूनिफॉर्म में मुस्कुराती हुई साइकिलों से स्कूल आती - जाती हैं,तब देश की सड़कों पर यह दृश्य कितना मनभावन लगता है ! उन्हें देखकर गर्व की अनुभूति होती है। ऐसा आभास होता है मानो सभी धर्मों की हमारी ये बेटियाँ अपने सपनों की मंजिलों को पाने के लिए दौड़ रही हैं। उनकी आँखों में तैरते सपनों को महसूस कीजिए । इन्हीं में से कोई डॉक्टर ,कोई इंजीनियर ,कोई वैज्ञानिक ,कोई प्रोफेसर ,कोई अध्यापिका बनेगी ,समाज की सेवा करेंगी। समाज का नेतृत्व करेंगी । कर भी रही हैं।
कहने का मतलब भारत की बेटियाँ जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ेंगी। बढ़ भी रही हैं। देश के निर्माण में सहभागी बनेंगी । इन्हें हिजाब और भगवा दुपट्टे के विवाद में झोंककर इनके सपनों को मत कुचलो। यह अच्छी बात है कि देश के कई राज्यों की सरकारें वहाँ की बेटियों को स्कूल आने -जाने के लिए निःशुल्क साइकिल और यूनिफॉर्म भी दे रही है ,ताकि पढ़ लिखकर वो अपना भविष्य गढ़ सकें। बेटियों के लिए सरकारों की यह सदाशयता ,सहृदयता सराहनीय है।
लेकिन कर्नाटक जैसे राज्य में कुछ लोग उनके मासूम सपनों पर सामाजिक वैमनस्यता का ज़हरीला रंग डालकर उनके दिलों में नफ़रत का विष घोल रहे हैं ? उन्हें साइकिलों से स्कूल आती जाती बेटियों के काफिले का ऐसा मनोरम दृश्य देखकर क्यों जलन हो रही है ?ऐसे अराजक तत्वों को चिन्हित कर उनके ख़िलाफ़ कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि यह विवाद कर्नाटक सहित कुछ अन्य राज्यों में भी फैला दिया गया है। ऐसे जिलों में वहाँ के प्रशासन को तुरंत शांति समितियों की बैठक बुलाकर सभी धर्मों के प्रतिनिधियों के साथ चर्चा करनी चाहिए ।हर जिले में सरकारों के निर्देशों के अनुसार जिला और अनुमंडल स्तर पर स्थायी रूप से शांति समितियां होती हैं ,जिनमें सभी समाजों और धर्मो के प्रमुख लोग सदस्य के रूप में शामिल रहते हैं।
त्यौहारों के समय प्रशासन द्वारा इनकी बैठकें बुलाई जाती हैं । कर्नाटक में और अन्य राज्यों में जहाँ हिजाब विवाद चल रहा है ,शांति समितियों की बैठकें हुई हैं या नहीं ,यह मुझे नहीं पता ।अगर नहीं हुई हैं तो तत्काल बुलाई जाए,ताकि प्रभावित जिलों में अमन चैन बहाल हो सके।
जैसे भारत की तीनों सेनाओं का अपना ड्रेस कोड होता है ,जैसे हर राज्य की पुलिस की निर्धारित वर्दी होती है ,जैसे स्कूल कॉलेजों में राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी) के कैडेटों का विशेष यूनिफॉर्म होता है , वकीलों ,जजों , डॉक्टरों और नर्सों के भी अपने ड्रेसकोड होते हैं ,ठीक उसी तरह स्कूलों में भी छात्र -छात्राओं के लिए निर्धारित यूनिफॉर्म का रिवाज आज से नहीं ,बल्कि विगत कई पीढ़ियों से चला आ रहा है।
कर्नाटक में कुछ छात्राएं स्कूल - कॉलेजों में हिजाब के साथ बुर्का पहनकर आने की जिद्द कर रही हैं , उनकी मांग मान ली जाए और बुर्के की आड़ लेकर कोई असामाजिक तत्व स्कूल में घुसकर किसी आपराधिक घटना को अंजाम देकर फरार हो जाए तो इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा ? दुनिया के कई देशों में स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर चेहरे और शरीर को पूरा कव्हर करके आने -जाने की सख़्त मनाही है। वहाँ के लोग ऐसे सरकारी प्रतिबंधों का पालन भी करते हैं।
धार्मिक पोशाक आप अपने घरों में या अपने धार्मिक स्थलों में पहनिए ,कौन मना करेगा ?लेकिन सार्वजनिक और सरकारी संस्थाओं और स्कूल -कॉलेजों को तो बख़्श दीजिए । अगर आप उन संस्थाओं से जुड़े हुए हैं तो वहाँ के ड्रेसकोड का पालन कीजिए।
संस्थाओं के निर्धारित यूनिफॉर्म उन्हें पहनने वालों को एक विशेष पहचान देती हैं । यह पहचान उनमें परस्पर एकता की भावना बढ़ाती है। अगर कोई सैनिक अपने लिए निर्धारित सैन्य वर्दी न पहनें तो उसे सैनिक के रूप में कौन पहचानेगा ?इसी तरह शैक्षणिक संस्थाओं में अगर विद्यार्थी वहाँ की निर्धारित पोशाक न पहनें तो कौन उन्हें उन संस्थाओं के विद्यार्थी के रूप में देखेगा ? मैं तो इस पक्ष में भी हूँ कि न सिर्फ स्कूलों में ,बल्कि कॉलेजों में भी विद्यार्थियों के लिए ड्रेसकोड अनिवार्य होना चाहिए ,उनके शिक्षकों और वहाँ के कर्मचारियों के लिए भी।( वर्तमान में मेडिकल कॉलेजों के विद्यार्थियों को सफ़ेद ड्रेसकोड में देखा जाता है । अच्छी बात है। )
अभी देश भर में नागरिक सेवाओं से जुड़े सरकारी दफ्तरों में लघु वेतन कर्मचारियों यानी चपरासियों के लिए तो वर्दी निर्धारित है ,हर दो साल में सरकार की ओर से उनको वर्दी मिलती भी है और ड्यूटी के समय नियमित रूप से नहीं पहनने पर डाँट फटकार भी सुननी पड़ती है ,लेकिन उन्हीं दफ्तरों में अफसरों के लिए कोई ड्रेसकोड नहीं है। इसलिए मेरा एक सुझाव यह भी है कि केन्द्रीय कर्मचारियों और अधिकारियों समेत देश के सभी राज्यों के कर्मचारियों और अफसरों के लिए भी यूनिफॉर्म ड्रेसकोड अनिवार्य कर दिया जाए। अपनी संस्थाओं की पोशाक पहनकर लोगों को गर्व महसूस करना चाहिए । इसे अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाना चाहिए।
-- स्वराज करुण
बहुत बढ़िया लेख ।
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