Friday 29 October 2010

सुर्ख़ियों के बीच रिश्तों का रहस्य !

 देश भर के अखबारों में ,खास तौर पर हिन्दी के अखबारों में उस दिन दो सुर्खियाँ ऐसी थीं , जिन्हें एक-दूसरे से मिला कर देखने ,पढ़ने और सोचने-समझने की ज़रूरत है. इनमे से एक खबर दिल्ली में हुए कॉमन वेल्थ खेलों के आयोजन से जुड़े आर्थिक अपराधों की जांच के लिए नामी -गिरामी ठेकेदारों के घरों और दफ्तरों में आयकर विभाग द्वारा मारे गए छापों के बारे में है , जिसमे बताया गया है कि लगभग  सौ ठिकानों पर दी गयी दबिश में आयकर वालों ने अरबों रूपयों के अघोषित और अवैध लेन-देन का पता लगाया है ,जबकि दूसरी खबर यह है कि दिल्ली में सोलह करोड़ रूपए कीमत की एक सबसे तेज रफ़्तार कार 'बुगाती-वेरोन' लॉन्च की गयी , जो  इस वक्त दुनिया की सबसे ज्यादा तेज गति की और सबसे महंगी कार है और जो प्रति घंटे अधिकतम चार सौ सात किलोमीटर की रफ़्तार से दौड़ सकती है. भारत में कौन लोग हैं ,जो इसे खरीदेंगें और इसमें घूम -घूम कर देश की सड़कों पर मौज-मस्ती करेंगें  ? मुझे लगता है कि अगर इस सवाल का जवाब हमने खोज लिया ,तो समझ लो कि अखबार की दोनों सुर्ख़ियों के बीच के अघोषित रिश्तों   के रहस्य  को भी हमने पहचान लिया . केन्द्र सरकार की ही एक कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा प्रति दिन सिर्फ बीस रूपए में गुजारा करने को मजबूर है , महंगाई आसमान छू रही है , वहीं आयकर और आर्थिक अपराध जांच एजेंसियों के एक-एक छापे में करोड़ों रूपयों का अघोषित खजाना बरामद हो रहा है. निश्चित ही यह रूपया उन लोगों के बाप-दादों का  नहीं है ,जिनके ठिकानों में इसका पता चल रहा है . यह अदृश्य चोरी और अदृश्य डकैती से अर्जित धन है. यह देश की गरीब जनता का ही धन है , जिसे बड़ी सफाई से लूटा जा रहा है . .इस चोरी और डकैती में सरकारी अधिकारियों से लेकर हर सफेदपोश शामिल है जिन लोगों के घरों  में  यह अनुपातहीन संपत्ति मिल रही है , उसे सरकार ज़ब्त क्यों नहीं कर लेती ? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि देश के हर नागरिक के लिए नगद और चल-अचल संपत्ति रखने की एक सीमा तय कर दी जाए और इस लक्ष्मण -रेखा को लांघने वालों की अतिरिक्त संपत्ति सरकार जनता के पक्ष में ज़ब्त कर ले और उसे देश के विकास और गरीबों की भलाई के कामों पर खर्च करे ? लेकिन यह करेगा कौन ? अगर कोई ऐसा कदम उठाने जाए तो क्या वह कभी सोलह करोड़ रूपए की कार खरीद पाएगा ?  इसलिए मेरी यह सोच कोरी कल्पना के सिवाय और कुछ भी नहीं ! बहरहाल मै सोच रहा हूँ कि उन लोगों को किस उपाधि से सम्मानित करूं ,जिनके घरों और व्यापारिक ठिकानों से अरबों-खरबों रूपयों का जखीरा तरह-तरह के छापों में निकल रहा है ? इस बेशुमार और बेहिसाब दौलत को छुपाकर रखने का आखिर राज क्या था और क्या है ? अगर आप जानते हों , तो ज़रूर बताएं ! क्या आप भी उन्हें किसी खास उपाधि से विभूषित करना चाहेंगे ?  अगर आपका जवाब हाँ में है , तो क्या बताएंगे कि  आपकी ओर से उन्हें  दी जाने वाली उपाधि क्या होगी ? क्या आप ऐसे महान लोगों का किसी चौक-चौराहे पर 'नागरिक-अभिनन्दन ' भी नहीं करना चाहेंगे ? 
                                                                                                                        स्वराज्य करुण

2 comments:

  1. सार्थक चिंतन ...ऐसे कितने ही सवाल एक आम आदमी के ज़हन में पचासों बार उठते ही है लेकिन जवाब कहाँ से लाएं !! सही जवाब पाने की स्थिति होती तो या तो समाज के दो तबकों में इतना बड़ा फासला न होता या होता तो भी भरना शुरू हो गया होता लेकिन इसके आसार तो दूर दूर तक नज़र नहीं आते ...बहुत बड़ी आवश्यकता है की ये महारथी अपनी सम्पतियों का स्पष्टीकरण दे आम जनता को . ये जनता का हक़ भी है .

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  2. नव पूंजीवाद पर आपके ख्याल तो नेक हैं पर उन्हें विभूषित करने की कोशिश में खुद के 'दोषित' हो जाने के खतरे भी हैं क्योंकि सम्पन्नता सत्ता के सहयोग के बिना तो आ ही नहीं सकती !

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