Tuesday, May 28, 2019

(आलेख) जन -चेतना के अभाव में अस्तित्व खो रही प्राचीन मूर्तियाँ ...!


                                       - स्वराज करुण 
जन-आस्था और जन -विश्वास अपनी जगह है लेकिन यह देखकर दुःख होता है कि अतीत के  अपने समृद्ध सांस्कृतिक गौरव के संरक्षण लिए हमारे भारतीय  समाज में इस आधुनिक युग में भी  जन -चेतना का भारी अभाव है ।
        इसके फलस्वरूप हमारे देश के गांवों ,जंगलों पहाड़ों   में इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण  सैकड़ों , हजारों वर्ष पुरानी कई मूर्तियों का  मूल स्वरूप और सौन्दर्य  नष्ट होता जा रहा है । अगर ऐसा ही चलता रहा तो निकट भविष्य में हमारा इतिहास विलुप्त हो जाएगा और ये प्राचीन मूर्तियाँ  भी अस्तित्व विहीन हो  चुकी होंगी । यह गंभीर चिन्ता का विषय है । हालांकि राज्य संरक्षित स्मारकों में यह स्थिति कम देखने में आती है ,लेकिन जिन प्राचीन धरोहरों को सरकारी तौर पर संरक्षित स्मारक का दर्जा नहीं मिला है ,  वहाँ जन जागरूकता और जन -चेतना का गहरा संकट देखा जा सकता है।
       रासायनिक उपचार के बिना हवा और उसमें उड़ते धूल कणों की वज़ह से प्राचीन प्रस्तर प्रतिमाओं का क्षरण धीरे -धीरे होता रहता है  लेकिन आस्था के नाम पर   इन  पर श्रद्धालुओं द्वारा सिन्दूर आदि के लेपन से  यह क्षरण और भी तेजी से होने लगता है ।


     पश्चिम ओड़िशा के अम्बाभोना (जिला -बरगढ़ )स्थित केदारनाथ मंदिर की कई प्राचीन मूर्तियाँ का मूल स्वरूप भी इसी वज़ह से  धुंधलाने लगा है । हालांकि  मन्दिर ट्रस्ट की सजगता और सक्रियता की  वज़ह से परिसर काफी साफ-सुथरा है ।  लेकिन पुरातत्व विभाग से समन्वय कर  मूर्तियों के वैज्ञानिक ढंग से रख -रखाव की ओर भी ट्रस्ट को ध्यान देना चाहिए ।  सूचना बोर्ड लगाकर  उसमें श्रद्धालुओं से अपील की जानी चाहिए कि वे इन आती धरोहरों के संरक्षण में सहयोगी बनें और इन पर सिन्दूर आदि न लगाएं । पूजा सामग्री मूर्तियों से कुछ दूरी पर भी अर्पित की जा सकती है । 
   
     इस  मन्दिर में  दक्षिणमुखी गणेश ,  पश्चिमी दीवार पर कार्तिकेय ,उत्तरी दीवार पर दुर्गा की मूर्तियों के अलावा परिसर में और भी कई प्राचीन प्रतिमाएं हैं ,जिन्हें समुचित संरक्षण की जरूरत है ।  मन्दिर के पुजारी के अनुसार भगवान केदारनाथ (भगवान शंकर ) यहाँ शिवलिंग के रूप में स्वयं प्रकट हुए थे  । बारे पहाड़ के इस इलाके में तब  घनघोर जंगल था । सम्बलपुर के राजा बलिहार सिंह ने यहाँ पर  लगभग चार सौ -पांच सौ साल पहले इस मंदिर का निर्माण करवाया था ।
   बहरहाल , इसमें दो राय नहीं कि इस मन्दिर की ऐतिहासिकता और उसके पुरातत्व को लेकर व्यापक अध्ययन और अनुसंधान की जरूरत है । ओड़िशा सरकार के पुरातत्व विभाग को इसका संज्ञान लेना चाहिए । ऐतिहासिकता के आधार पर इसे राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है या नहीं, यह तो मुझे नहीं मालूम,क्योंकि ऐसा कोई सूचना पटल देखने में नहीं आया ।  अगर घोषित नहीं हुआ है तो जल्द से जल्द किया जाना  चाहिए ।
              --स्वराज करुण
(तस्वीरें : मेरे मोबाइल कैमरे की आँखों से )

Saturday, May 25, 2019

(आलेख ) कोचिंग सेंटरों का सरकारी पंजीयन अनिवार्य हो !


                                                  -- स्वराज करुण
गुजरात के सूरत शहर के एक आर्ट कोचिंग संस्थान में कल भयानक अग्नि दुर्घटना हुई । हालांकि आग बुझाने की तमाम कोशिशें भी हुईं ,लेकिन अचानक लगी आग में  झुलसने से  कई विद्यार्थियों की मौत हो गयी ।  एक अत्यंत हृदयविदारक घटना है  । दिवंगतों को विनम्र श्रद्धांजलि ।  कुछ समय पहले मैंने अपने एक फेसबुक पोस्ट  में यह सुझाव दिया था कि देश भर में फैले कोचिंग सेंटरों का सरकारी  पंजीयन होना चाहिए । मुझे लगता है कि इस भयानक हादसे को देखते हुए  अब  सभी प्रकार के कोचिंग संस्थानों  का पंजीयन अनिवार्य करने का समय आ गया है ।

       उनके  सरकारी पंजीयन के लिए प्रावधान भी तय कर दिए जाएं ,जिनमें कोचिंग फीस , छात्र संख्या के हिसाब से भवन व्यवस्था ,अग्नि सुरक्षा , वहाँ पढ़ाने वाले शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता आदि को लेकर नियम स्पष्ट हों । पंजीयन से उन पर सरकार का प्रशासनिक नियंत्रण रहेगा ,उनके रिकार्ड सरकार के पास भी उपलब्ध रहेंगे और  विद्यार्थियों के हित भी सुरक्षित रहेंगे ।
       वर्तमान में अपने प्रचार -प्रसार के लिए अखबारों और टीव्ही चैनलों में बड़े -बड़े विज्ञापन देने वाली कोचिंग संस्थाओं द्वारा भी अपने सरकारी पंजीयन का कोई उल्लेख विज्ञापनों में नहीं किया जाता ।इससे ऐसा  लगता है कि उनके शासकीय रजिस्ट्रेशन की अभी कोई व्यवस्था नहीं है ।
     मेरा यह भी सुझाव है कि अगर स्कूल स्तर का  कोचिंग सेंटर  है तो स्कूल शिक्षा विभाग में , अगर कॉलेज स्तर की कोचिंग है तो उच्च शिक्षा विभाग में ,अगर मेडिकल पढ़ाई की कोचिंग है तो चिकित्सा शिक्षा विभाग में और अगर इंजीनियरिंग की कोचिंग है तो तकनीकी शिक्षा विभाग में पंजीयन अनिवार्य रूप से होना चाहिए ।शासकीय अधिकारियों द्वारा अनिवार्य रूप से  उनका  नियमित निरीक्षण भी किया जाना चाहिए ।
 (तस्वीर : Google से साभार )

Thursday, May 23, 2019

(आलेख )पश्चिम ओड़िशा का केदारनाथ मन्दिर


                           -स्वराज करुण 
छत्तीसगढ़ की तरह उसके नज़दीकी पड़ोसी ओड़िशा राज्य में भी कई प्राचीन मन्दिर और ऐतिहासिक स्थल हैं ।  पश्चिम ओड़िशा के बरगढ़ जिले का केदारनाथ मन्दिर भी उनमें से एक है ,जिस पर इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से अध्ययन और अनुसंधान की काफी गुंजाइश है ।  घूमते  -फिरते उस दिन मुझे भी इस मन्दिर के परिदर्शन का सौभाग्य मिला ।
    केदारनाथ के नाम से ही स्पष्ट है कि यह एक शिव मन्दिर है ,जो   छत्तीसगढ़ के जिला मुख्यालय रायगढ़ से  ओड़िशा के जिला मुख्यालय बरगढ़ जाने वाले रास्ते में तहसील मुख्यालय अम्बाभोना में मुख्य सड़क के किनारे स्थित है ।  बरगढ़ की तरफ से आएं तो बारा पहाड़ के प्राकृतिक परिवेश में  अम्बाभोना घाटी की हरी -भरी पहाड़ी वादियां आपका मन मोह लेंगी  छत्तीसगढ़ का नज़दीकी तहसील मुख्यालय बरमकेला अम्बाभोना से  लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर है ।  मन्दिर ट्रस्ट ने इसके परिसर को बहुत ही अच्छे ढंग से विकसित किया है  । काफ़ी साफ़ -सुथरे इस  परिसर में बरगद और पीपल के प्राचीन वृक्षों की शीतल छाया श्रद्धालुओं को काफी सुकून देती है । केदार नाथ यानी भगवान शिव के इस मन्दिर के पुजारी हैं श्री ध्रुव गिरि ।  पुजारीजी की  अनुपस्थिति में उनकी  धर्मपत्नी श्रीमती शारदा गिरि  पूजा -अर्चना में श्रद्धालुओं का सहयोग करती हैं ।


         श्री ध्रुव गिरि ने स्मृतियों को टटोलते हुए बताया  कि  उनकी यह पाँचवी पीढ़ी है ,जो  मन्दिर की देखभाल के साथ पूजा -अर्चना की भी जिम्मेदारी निभा रही  है । इतिहास की सटीक जानकारी तो उन्हें नहीं है ,लेकिन  जितना उनको मालूम है ,उस आधार पर वो यह जरूर बताते हैं कि लगभग 400 से  500 वर्ष पहले सम्बलपुर के राजा बलियारसिंह ने इसका निर्माण करवाया था । उस ज़माने में यहाँ घनघोर जंगल था । शिवलिंग यहाँ प्राकृतिक रूप से प्रकट हुआ था ।  मन्दिर के गर्भगृह में  इसे देखा जा सकता है ,जहाँ एक नैसर्गिक जल कुण्ड में यह स्थित है ।
                     
   प्राचीन काल में इस मन्दिर के बाजू में एक प्राकृतिक जल स्रोत प्रस्फुटित हुआ था ,जिससे एक छोटा -सा सरोवर वहाँ बन गया । कुछ श्रद्धालुओं ने मुझे बताया कि  इस सरोवर का पानी बहुत स्वच्छ और इतना पारदर्शी  रहता था कि  उसमें तैरती हुई मछलियों और पानी वाले साँपों को भी साफ़ देखा जा सकता था । लेकिन जब से लोग इसमें नहाने लगे ,  सरोवर के पानी की यह पारदर्शिता ख़त्म हो गयी । प्राकृतिक जल स्रोत विलुप्त हो गया ।
                     
       मैंने भी देखा कि सरोवर में  पॉलिथीन की खाली थैलियों के साथ -साथ मिनरल वाटर के खाली बोतल और साबुन के खाली पैकेट  भी तैर रहे हैं । केदारनाथ मन्दिर ट्रस्ट बोर्ड को इस पर ध्यान देना चाहिए । प्राचीन भारतीय इतिहास और पुरातत्व में दिलचस्पी लेने वाले अध्येताओं को यहाँ जरूर आना चाहिए । वैसे ओड़िशा के इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने इस दिशा में कुछ कार्य किया भी होगा तो  उसकी जानकारी न तो पुजारीजी को है और न ही मुझे । हाँ ,यह जरूर उल्लेख करना चाहूँगा   कि इस तीर्थ स्थान के बारे में बरगढ़ जिले के ग्राम उत्तम निवासी अध्यापक श्री अलेख प्रधान द्वारा रचित ओड़िया  काव्य कृति 'केदारनाथ ' शीर्षक से छपी है ,जो मन्दिर के सामने पूजा सामग्री की एक दुकान में मुझे  दस रुपए में मिल गयी । इसका प्रकाशन 'केदारनाथ  साहित्य संसद ' अम्बाभोना द्वारा वर्ष 1997 में  किया गया था । कवि अलेख प्रधान ने पाँच सर्गों की अपनी इस काव्य कृति के प्रथम सर्ग की प्रारंभिक पंक्तियों में केदारनाथ को आम्रवन और बांस वन से घिरे परिवेश में   'गुप्त गंगा ' के तट पर और 'ज्ञान वट ' के मूल में स्थित    तीर्थ बताया है और उनकी अभ्यर्थना की है ---
 "गुप्त गंगा कूले ,
 ज्ञान-वट मूले
 सेवित जे पँचमाथ
आम्र- वन, बांश -वन समादृत
जय हे केदारनाथ ।।
आम्र ;वन रु  वट - दुर्ग
दुर्गतम पथ रे
पथ र नाथ ।
चित्रोत्पला तीर्थ सलिले सेवित
द्वादश कानन कुसुमे शोभित
जय हे केदारनाथ ।। "
    कवि ने प्रथम सर्ग के फुटनोट में  यह भी स्पष्ट किया है कि आम्रवन से उनका आशय अम्बाभोना से है । इन्हीं प्रारंभिक पंक्तियों में 'केदारनाथ' को ' आम्र- वन ' से 'वट-दुर्ग  के दुर्गम और पथरीले पथ का नाथ भी बताया है ,जो  स्वच्छ परिवेश में स्थित हैं ।। कवि ने फुटनोट में सूचित किया है की 'वट -दुर्ग ' से उनका आशय बरगढ़ से है ।  चित्रोत्पला यानी महानदी और द्वादश कानन मतलब इस क्षेत्र में स्थित  'बारा पहाड़ " है ।
      वैसे भी देखा जाए तो छत्तीसगढ़ के सिहावा पर्वत से निकली चित्रोत्पला गंगा (महानदी ) अम्बाभोना से लगभग 45 से 50 किलोमीटर पर   जांजगीर और रायगढ़ जिले में भी प्रवाहित हो रही है । दोनों जिले छत्तीसगढ़ में हैं  । महानदी और माण्ड नदियों के पवित्र संगम पर  चन्द्रपुर (जिला -जांजगीर चाम्पा ) स्थित  चंद्रहासिनी और नाथलदाई के प्राचीन मन्दिर भी अम्बाभोना से करीब 50 किलोमीटर पर हैं ।

   संभवतः कवि अलेख प्रधान  ने अपनी काव्य कृति 'केदारनाथ 'में जिस ' गुप्त गंगा ' का जिक्र किया है ,वह अम्बाभोना मन्दिर  परिसर में बने सरोवर का प्राकृतिक जल स्रोत ही है ,जो अब प्रदूषण के कारण विलुप्तप्राय है । मैंने  देखा कि सरोवर में  पॉलिथीन की खाली थैलियों के साथ -साथ मिनरल वाटर के खाली बोतल और साबुन के खाली पैकेट  भी तैर रहे हैं । केदारनाथ मन्दिर ट्रस्ट बोर्ड को इस पर ध्यान देना चाहिए । प्राचीन भारतीय इतिहास और पुरातत्व में दिलचस्पी लेने वाले अध्येताओं को यहाँ जरूर आना चाहिए । वैसे ओड़िशा के इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने इस दिशा में कुछ कार्य किया भी होगा तो  उसकी जानकारी न तो पुजारीजी को है और न ही मुझे ।
     बहरहाल ,पुजारीजी ने  मुझे मन्दिर का अवलोकन करवाया । मन्दिर की दक्षिणी दीवार पर दक्षिणमुखी गणेश , पश्चिमी दीवार पर  कार्तिक और उत्तरी दीवार पर देवी दुर्गा की अत्यंत प्राचीन प्रतिमाएं लगी हुई हैं ।  गर्भगृह में भगवान शिव पूर्वाभिमुख विराजमान हैं । मन्दिर में ऊपर देखने पर एक कलात्मक गोल घेरे में भगवान चंद्रशेखर की मूर्ति के दर्शन होते हैं । मन्दिर और परिसर में रखी अधिकांश मूर्तियाँ  पुरातत्व की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हैं । उनके समुचित संरक्षण की जरूरत है ।
       परिसर में पीपल के विशाल वृक्ष के नीचे निर्मित गोलाकार चबूतरे पर  भगवान शंकर सहित  शेषनाग और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण  विभिन्न वस्तुओं को सुव्यवस्थित रूप से रखा गया है । एक कमरे में  भैरव बाबा की भी पूजा होती है,जो वास्तव में भगवान शिव का ही एक पौराणिक नाम है । अम्बाभोना के  इस प्राचीन  मन्दिर में हर साल महाशिवरात्रि पर विशाल मेले का भी आयोजन किया जाता है
     -स्वराज करुण
(सभी तस्वीरें : मेरे मोबाइल की आँखों से )

Tuesday, May 21, 2019

(आलेख ) हमारी आधुनिक जीवन शैली के लिए कुर्बान होते पहाड़ ..!

                           - स्वराज करुण 
कभी इस पहाड़  के सघन और हरे -भरे वन  सबको  सम्मोहित करते थे  ,लेकिन आज ...?
    पिछले कुछ वर्षों से इसके तन -बदन  की हरियाली को जिस बेरहमी और बेशर्मी से  नोचा-खसोटा जा रहा है ,उसकी वज़ह से आज यह इस  हालत में पहुँच गया है ! जिन्होंने वर्षों पहले इसके प्राकृतिक वैभव को ,इसकी हरियाली को नज़दीक से देखा था , आज वो इसकी उजड़ी हुई बाँहों को देखकर मायूस हो जाते हैं ।  जब हरियाली ख़त्म होगी ,तो स्वाभाविक है कि  गर्मी अपना प्रचण्ड और रौद्र रूप दिखाएगी !  बारिश भी साल -दर -साल कम होती जाएगी और मौसम का संतुलन बिगड़ता चला जाएगा ।
       ऐसा हो भी रहा है ।पहाड़ उजड़ने पर जंगल भी उजड़ रहे हैं । जब जंगल उजड़ रहे हैं तो  वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास भी उजड़ते जा रहे हैं । उनके लिए जंगली कन्द- मूल और फलों के साथ -साथ पानी की भी कमी होने लगी है । इसके फलस्वरूप बन्दर ,भालू ,हाथी और तेन्दुए जैसे वन्य प्राणियों को मजबूर होकर   मानव बस्तियों की ओर पलायन करना पड़ रहा है ।
           
      अपनी बदहाली और खोयी हुई हरियाली पर आँसू बहा रहा यह कोई अकेला पहाड़ नहीं है  । देश और दुनिया में ऐसे कई पहाड़ और पहाड़ियाँ हैं , जिनकी चट्टानें मनुष्य की आधुनिक जीवन शैली के लिए ,और समाज के  आधुनिक विकास के लिए कुर्बान हो रही हैं।   तेजी से पाँव पसारते शहरीकरण के इस बदहवास दौर में क्या गाँव और क्या शहर , सब दूर सीमेन्ट कांक्रीट के पक्के मकान बन रहे हैं । शहरों में भारी भरकम दैत्याकार बहुमंजिली इमारतें बन रही हैं । अब तो पूरे देश में डामर की जगह  सीमेन्ट कांक्रीट की सड़क बनाने का भी  दौर आ गया है । ऐसे में कच्चे माल के लिए पहाड़ों को तोड़ना शायद एक बड़ी विवशता है ।
       हम सब मिलकर इसकी उजड़ी  और मरी हुई हरियाली को नया जीवन दे सकते हैं । सिर्फ मज़बूत इच्छा शक्ति की ज़रूरत है । हमें सीमेन्ट और कांक्रीट का कोई न कोई विकल्प खोजना होगा । हमारे यहाँ एक से बढ़कर एक प्रतिभावान वैज्ञानिक हैं , प्रौद्योगिकी संस्थान हैं । संकट के इस नाज़ुक दौर में उन्हें आगे आना चाहिए ।  सड़क निर्माण में प्लास्टिक के इस्तेमाल की टेक्नॉलजी आ गयी है । इसका अधिक से अधिक उपयोग होना चाहिए । इससे प्लास्टिक कचरे का सदुपयोग होगा और प्रदूषण की समस्या कम होगी । उजड़ते हुए पहाड़ों में पत्थरों के अवैध  उत्खनन और वनों की अवैध कटाई को सख़्ती से रोकना होगा ।
    बहरहाल , कुछ न कुछ उपाय तो करने ही होंगे । अन्यथा ये पहाड़ नये ज़माने   के विकास की  नयी सुनामी का शिकार होते रहेंगे और हम सब उजड़ते हुए पर्यावरण का रोना रोते रहेंगे ।
 -- स्वराज करुण
(तस्वीर : मेरे मोबाइल की आँखों से )

Saturday, May 18, 2019

(सुझाव ) मेरिट लिस्ट वालों का होना चाहिए लिखित और मौखिक इंटरव्यू !

                                  - स्वराज करुण 
   बोर्ड परीक्षाओं में मेरिट लिस्ट में आने वाले विद्यार्थियों का एक विशेष  लिखित और मौखिक  इंटरव्यू  लिया जाना चाहिए ,जो विषय -विशेषज्ञों की समिति के सामने हो ,ताकि उनकी प्रावीण्यता की पुष्टि हो सके । कुछ वर्ष पहले बिहार में ऐसा किया गया था । मेरिट लिस्ट वाले अधिकांश विद्यार्थी आसान सवालों के भी जवाब नहीं दे पाए ।
        वर्तमान में देश के लगभग सभी राज्यों में यह देखा जा रहा है कि बोर्ड परीक्षाओं में 90 प्रतिशत से ज्यादा विद्यार्थी हर विषय में 80 से 99 प्रतिशत तक अंक हासिल कर रहे हैं । लम्बी -लम्बी मेरिट सूची निकल रही है । निश्चित रूप से उनकी गिनती मेधावी विद्यार्थियों में होती है और होनी भी चाहिए ,लेकिन  आज से दो -तीन दशक पहले 60 प्रतिशत या उससे ज्यादा अंकों वाले विद्यार्थियों को प्रथम श्रेणी में माना जाता था और उनकीअंक -सूची में भी इसका उल्लेख होता था ।राज्य स्तर पर मेरिट के अंक 70 प्रतिशत या उससे ऊपर के हुआ करते थे । पिछले कुछ वर्षों में कई फर्जी टॉपर भी पकड़े गए हैं ।
           यह सच है कि समय के साथ-साथ  शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में भी बदलाव आया है । होना भी चाहिए ।कम्प्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे नये विषय आ गए हैं , जो स्वाभाविक है । इसके बावज़ूद देश के विभिन्न राज्यों में 10-12 वीं बोर्ड की परीक्षाओं में भारी संख्या में विद्यार्थियों का 80 प्रतिशत से ज्यादा अंक हासिल करना हम जैसे सामान्य नागरिकों के लिए आश्चर्य का विषय है !  शायद ऑब्जेक्टिव टाइप प्रश्नों की भरमार इसका एक प्रमुख कारण होगा। वैसे इस बारे में विद्वान शिक्षाविद बेहतर बता पाएंगे  ।
फिर भी हमारा सुझाव है कि परीक्षा परिणाम घोषित होने के कुछ दिनों के बाद मेरिट सूची के विद्यार्थियों का मौखिक और लिखित इंटरव्यू लिया जाए और उसमें सफल होने वालों को ही मेरिट सूची में रखा जाए । 
     मिट्टी के घड़े को परखने  के लिए उसे कई बार ठोक बजाकर देखना पड़ता है । असली सोने या हीरे की पहचान के लिए और लोहे को इस्पात बनाने के लिए  उन्हें कई कठिन प्रक्रियाओं से  गुजारा जाता है । तो फिर मेरिट सूची की पुष्टि करने  के लिए एक सामान्य मौखिक और लिखित साक्षात्कार लेने में क्या हर्ज है ?  विश्वविद्यालयों की मेरिट सूचियों  को परखने के लिए भी कुछ इसी तरह की प्रक्रिया अपनायी जा सकती है ।
         - स्वराज करुण

Friday, May 17, 2019

(आलेख) गंभीर मरीजों के लिए ' रेडक्रॉस ' बने मददगार !


                                        -स्वराज करुण 
  युद्ध में घायल सैनिकों और आम नागरिकों को त्वरित चिकित्सा सहायता पहुँचाना रेडक्रॉस सोसायटी का प्रमुख उद्देश्य है ।जीवन भी एक युद्ध है और इसमें कई बार लोग गंभीर रूप से घायल याने कि बीमार भी हो जाते हैं ।  हृदयरोग ,कैन्सर, मस्तिष्क ,  किडनी और लिवर आदि के बेहद खर्चीले इलाज वाली गंभीर बीमारियों के इलाज में रेडक्रॉस सोसायटी  असहाय मरीजों की भरपूर मदद कर सकती है ।
     आख़िर ये मरीज़ मनुष्य के रूप में ज़िन्दगी की लड़ाई में घायल सैनिक ही तो हैं । इस घायल मानवता की मदद के लिए भी रेडक्रॉस की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है ।उसे आगे आना चाहिए । विगत 8 मई को विश्व रेडक्रॉस दिवस था ।यह अत्यंत दुःखद है कि इस बार भारत में इसकी कहीं कोई चर्चा सुनने में नहीं आयी । शायद शोरगुल भरी चुनावी चर्चाओं के बीच भारतीय रेडक्रॉस वालों को भी इसका ख़्याल नहीं आया । कहीं कोई आयोजन हुआ भी होगा तो उसका कोई समाचार मुझे तो किसी अख़बार  में नज़र नहीं आया ।
 अंतर्राष्ट्रीय रेडक्रॉस सोसायटी की स्थापना  इटली युद्ध के भयानक खून -खराबे को देखकर वर्ष 1864 में जीन हेनरी ड्यूडेन्ट द्वारा की गयी थी । उनकी जयंती विश्व भर में रेडक्रॉस दिवस के रूप में मनाई जाती है । उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि । उन्होंने जेनेवा समझौते के तहत अपने सहयोगियों के साथ अंतर्राष्ट्रीय रेडक्रॉस आंदोलन की बुनियाद रखी ।उद्देश्य था - युद्ध में घायल सैनिकों और आम नागरिकों का त्वरित इलाज करना । आगे चलकर अकाल ,बाढ़ ,तूफ़ान आदि प्राकृतिक विपदाओं में राहत और बचाव कार्यो में भी यह संस्था लोगों को मदद पहुंचाने लगी ।   जीन हेनरी ड्यूडेन्ट को वर्ष 1901 में विश्व का पहला नोबेल शान्ति पुरस्कार से भी नवाजा गया था ।
       
जीन हेनरी ड्यूडेन्ट
रेडक्रॉस के संस्थापक 

  बदलते दौर  में गंभीर रोगियों की सहायता करना भी रेडक्रॉस के  उद्देश्यों में शामिल किया जाना  चाहिए । ऐसा कोई प्रावधान रेडक्रॉस वालों ने किया है या नहीं ,मुझे नहीं मालूम । किया होगा तो  अच्छी बात है और अगर नहीं किया है तो वह जल्द से जल्द ऐसा प्रावधान करते हुए अपनी सभी शाखाओं को निर्देश जारी करे ।
     भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी की स्थापना वर्ष  1920 में तत्कालीन पार्लियामेंट्री अधिनियम के तहत की गयी थी । आज देश भर में इसकी लगभग 750 शाखाएं   हैं । हर जिले में प्रशासन की देखरेख में रेडक्रॉस की गतिविधियों का संचालन होता है । यह संस्था ब्लड बैंकों का और कई जिलों के बड़े सरकारी अस्पतालों में दवाई दुकानों का भी संचालन करती है । इसके अलावा आम तौर पर रेडक्रॉस की और कोई जन-कल्याणकारी गतिविधि देखने में नहीं आती ,जबकि स्थानीय नागरिकों ,उद्योगों और सम्पन्न वर्ग के दानदाताओं से रेडक्रॉस की शाखाओं को काफ़ी आर्थिक सहायता मिलती है ।  जिन औद्योगिक जिलों  में रेडक्रॉस की शाखाएं हैं ,वहाँ वो उद्योग मालिकों से कार्पोरेट  सामाजिक जिम्मेदारी ( सी .एस .आर .) के तहत उनसे भी दान के रूप में आर्थिक मदद हासिल कर सकती हैं । जानकार लोग बताते हैं कि कई जिलों की रेडक्रॉस शाखाओं के खातों में में दानराशि के रूप में करोड़ों रुपए जमा हैं ।
       अगर रेडक्रॉस की जिला शाखाएँ चाहें तो अपने -अपने जिले में हॄदय रोग ,कैन्सर ,किडनी ,मस्तिष्क , लिवर,  आदि से सम्बंधित गंभीर मरीजों को   अत्यधिक  खर्चीले इलाज में हर प्रकार की मदद कर सकती हैं । यह पुण्य का कार्य होगा ।  हो सकता है -कुछ शाखाएं  ऐसा कर भी रही हों  । उसकी जानकारी हमें नहीं है । वैसे  फ़िलहाल तो भारत में  रेडक्रॉस की गतिविधियों का कोई खास प्रचार -प्रसार नज़र नहीं आ रहा है । दुनिया की 156 वर्ष पुरानी यह संस्था  भारत में अगले वर्ष  2020 में अपनी स्थापना के 100 साल पूरे करने जा रही है । संस्था की विभिन्न शाखाओं को अपने काम -काज का और अपनी योजनाओं का मीडिया के जरिए  ज्यादा से ज्यादा प्रचार करना चाहिए ,ताकि जरूरतमंद लोग और मरीज़ उनकी सेवाओं का लाभ ले सकें ।
              -- स्वराज करुण

Thursday, May 16, 2019

(आलेख) ज्यादा क्यों नहीं चलती इस दौर की फिल्में ?


                   - स्वराज करुण
अक्सर कई प्रबुद्ध जन यह सवाल उठाते हैं कि इस आधुनिक युग में हमारे देश में बनने वाली फिल्में ज्यादा दिनों तक क्यों नहीं चलतीं ? विशेष रूप से आंचलिक भाषाओं के फिल्मकार इसे लेकर काफी चिन्तित नज़र आते हैं । सिनेमाघरों की कम होती संख्या भी इसका एक कारण हो सकता है ,लेकिन एक सामान्य  दर्शक के नाते मेरा यह मानना है कि फिल्मों के कन्टेन्ट पर भी यह  निर्भर करता है कि वो कितने दिनों तक चलेगी ।
      आज के दौर की अधिकांश फिल्मों में वो बात नज़र नहीं आती ,जो कुछ दशक पहले की कालजयी फिल्मों में हुआ करती थी , जबकि उस दौर के मुकाबले देखा जाए तो फ़िल्म निर्माण की तकनीक आज कई गुना ज्यादा उन्नत है ।

        छत्तीसगढ़ी भाषा में ' कहि देबे सन्देस ' ,' घर द्वार ', और ' मोर छइहाँ भुइयाँ '  हिन्दी में ' मदर इंडिया ' 'नील कमल ' 'उपकार ', 'गीत गाता चल ' मुगलेआजम 'और मेरा नाम जोकर ' ' जैसी कई कालजयी फिल्में आज भी लोगों को याद हैं । उनके गाने आज भी लोगों की जुबान पर हैं ।भारतीय फिल्मों के इतिहास में भी कमोबेश इनकी चर्चा होती है ,क्योंकि इस प्रकार की  फिल्मों की  कहानियों में समाज के ज्वलन्त मुद्दे भी उठाए जाते थे । मुझे भोजपुरी भाषा में बनी फिल्म 'नदिया के पार ' और उसके गानों की भी याद आती है । मुझे लगता है कि  पहले के फिल्म निर्माताओं में ,उन फिल्मों के कहानीकारों , कलाकारों ,गीतकारों और संगीतकारों में सामाजिक प्रतिबध्दता होती थी । व्यावसायिकता और मनोरंजन का उद्देश्य भी होता था ,लेकिन उनके निर्माताओं में समाज और देश के प्रति जिम्मेदारी की भावना भी होती थी ।
        सामान्य  दर्शक होने की वज़ह से मुझे  फ़िल्म निर्माण के तकनीकी पहलुओं की और बारीकियों की जानकारी लगभग नहीं के बराबर है । इसके बावज़ूद  मैं यह महसूस कर रहा हूँ कि हमारे देश में फ़िल्म बनाने  की तकनीक जितनी ज्यादा  उच्च से उच्चतर और उच्चतम स्तर तक जा पहुँची  है  ,कुछ एक अपवादों को छोड़कर देखा जाए तो इस दौर की  फिल्मों के कंसेप्ट  और कन्टेन्ट का स्तर उतना ही निम्न से निम्नतर और निम्नतम होता गया है ।
      हम जैसे साधारण लोग सिर्फ़ दुःख  व्यक्त कर सकते हैं कि कालजयी और यादगार फिल्मों का जमाना  चला गया । अब तो किसी भी भाषा में कितनी ही फिल्में  बनती हैं और हफ्ते - दो हफ्ते बाद लोगों के  स्मृति पटल से गायब हो जाती हैं ,क्योंकि उनकी  कहानियाँ सिर्फ़ मनोरंजन के लिए होती हैं । फास्टफूड की तरह एकदम तात्कालिक । उनमें देश और समाज के लिए कोई सन्देश नहीं होता । एक जैसी पटकथाओं से भी दर्शक बोर हो जाते हैं । गाने भी ऊलजलूल ! अब दर्शक झेले भी तो कितना ?
    यह स्थिति कमोबेश हमारे देश के सभी राज्यों में है । फ़िल्म चाहे वो किसी भी भारतीय भाषा की क्यों न हो ,अगर उसकी कहानी में दम होगा ,वह जनता के दुःख-दर्द के करीब होगी , उसमें  जन भावनाओं की सुरुचिपूर्ण अभिव्यक्ति होगी तो वह जरूर चलेगी ।
            -स्वराज करुण