आज़ादी के योद्धाओं की वीर गाथा ;छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर
(आलेख ; स्वराज्य करुण )
छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के लिए सुशील यदु आजीवन समर्पित रहे। उन्होंने अपने साहित्यिक मित्रों के सहयोग से वर्ष 1981में रायपुर में छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति की स्थापना की और समिति के कई अधिवेशन तहसील मुख्यालयों और जिला मुख्यालयों में आयोजित किए ।सुशील यदु की प्रकाशित पुस्तकों में 'लोकरंग' दो भागों में है ।इसमें से पहला भाग छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों पर और दूसरा भाग छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों पर केंद्रित है। सुशील यदु ने 'लोक रंग ' शीर्षक से ही दैनिक 'नवभारत ' में 8 वर्षों तक नियमित रूप से लिखा ।
उनका छत्तीसगढ़ी व्यंग्य संग्रह 'घोलघोला बिन मंगलू नइ नाचय ' भी काफी चर्चित और प्रशंसित हुआ था ।उनके द्वारा सम्पादित कृतियों में (1)स्वर्गीय हेमनाथ यदु :व्यक्तित्व एवं कृतित्व(2) छत्तीसगढ़ी कविता -संग्रह 'बन फुलवा ' (3) बद्री विशाल परमानंद का गीत -संग्रह 'पिंवरी लिखे तोर भाग ' और स्वर्गीय उधोराम 'झखमार' की हास्य कविताओं का संग्रह 'ररूहा सपनाय दार भात 'भी शामिल है । सुशील व यदु का जन्म 10 जनवरी 1956 को रायपुर में हुआ था और यहीं 23सितम्बर 2017 को उनकी जीवन -यात्रा हमेशा के लिए थम गई ।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इस राज्य के योद्धाओं के योगदान को उन्होंने 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर ' शीर्षक से वर्ष 1989में प्रकाशित अपनी किताब में कविताओं के रूप में संकलित किया था । छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति रायपुर द्वारा इस पुस्तक के दो संस्करण क्रमशः अगस्त 1989 और नवम्बर 2001में प्रकाशित किए गए थे । यह कवर पेज सहित 60 पेज की है । मूल्य है 50 रूपए। यह हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्पित छत्तीसगढ़ के वीरों की काव्य गाथा है ।
सुशील यदु के इस छत्तीसगढ़ी कविता -संग्रह में 33 रचनाएँ स्वतंत्रता सेनानियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित हैं, जबकि 34वीं कविता 'बियालिस के आंदोलन ' शीर्षक से है, जिसमें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ़ वर्ष 1942 में हुए भारत छोड़ो आंदोलन में छत्तीसगढ़ के सेनानियों के योगदान को याद किया गया है, वहीं 34वीं और अंतिम कविता 'वंदना गीत ' है, जिसमें भारत माता की वंदना है. छत्तीसगढ़ के जिन स्वतंत्रता सेनानियों की वीरता का वर्णन सुशील यदु ने इस संकलन में किया है उनमें कवि ने सबसे पहले अमर शहीद वीर नारायण सिंह और क्रांतिवीर हनुमान सिंह की संघर्ष गाथाओं को याद किया है । तीसरी कविता 'सत्रह शहीद साथी ' शीर्षक से है,को 22जनवरी 1858 को रायपुर की सैन्य छावनी में हनुमान सिंह के नेतृत्व में हुए विद्रोह के वीर योद्धाओं को समर्पित है, जिन्हें उनकी देशभक्ति के लिए फाँसी दे दी गई थी । आगामी पन्नों में चौथी रचना उदयपुर (सरगुजा )के क्रांतिवीर शिवराज सिंह, सम्बलपुर (ओड़िशा )के वीर सुरेन्द्र साय को समर्पित की गई है, जबकि छठवीं रचना 'बस्तर विप्लव'में वर्ष 1910 में वहाँ हुए आदिवासी विद्रोह के वीरों का उल्लेख है । इस विद्रोह को बस्तर के लोकप्रिय राजा रुद्रप्रताप सिंह देव, राजवंश की दीवा पदवी के दावेदार लाल कालेन्द्र सिंह, ग्राम नेतानार के गुण्डाधुर आदि का भरपूर सहयोग मिला था ।ब्रिटिश हुकूमत की गोलिबारी से कई आदिवासी शहीद हो गए थे.इस छंदबद्ध कविता के कुछ अंश देखिए -
*सन उन्नीस सौ दस साल लड़िन बस्तर के आदिवासी मन,
विप्लव खातिर हथियार धरिन बस्तर के आदिवासी मन.
हलबा, भतरा, मुरिया, माड़िया, बड़ शांत, सरल, सीधा -सादा,
शोसन, अनीत, अनियाव, अति, उन भड़क गइन अड़बड़ जादा.
तब गाँव -गाँव जुवाला सुलगिस अउ बस्तर में धधकिस आगी,
जब रार मचिस विप्लव के, तब जम्मो बस्तर बनगे बागी,*
इस कविता में आगे के एक छंद में बस्तर के निहत्थे बागियों को हथियारबंद फिरंगियों द्वारा गोलियों से भून दिए जाने की घटना की तुलना कवि ने पंजाब के जलियांवाला बाग में हुए हत्याकांड से की है ।
सातवीं कविता छत्तीसगढ़ के गांधी के नाम से लोकप्रिय हुए राजिम के पंडित सुन्दरलाल शर्मा को, आठवीं कविता राजनांदगांव और रायपुर के त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह पर केंद्रित है ।अगले पन्नों में क्रमशः पंडित रविशंकर शुक्ल, शहीद मिन्टू कुम्हार, शहीद रामाधीन गोंड, मौलाना अब्दुल रऊफ 'महवी ', यति यतनलाल, महंत लक्ष्मीनारायण दास और कुंज बिहारी चौबे की गौरव गाथाएँ लिखी गई हैं। इसी कड़ी में 'सिहावा के सिंह -सुखराम नागे' 'बालोद के बाघ -नरसिंह अग्रवाल ', और 'वानर सेना कप्तान -बलिराम 'आज़ाद ' शीर्षक कविताओं में इन वीरों को याद किया गया है।
कवि ने स्वतंत्रता आंदोलन में रायपुर के डॉ. खूबचंद बघेल और धमतरी के बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव सहित नारायण राव मेघावाले और नत्थू राव जगताप के योगदान को भी अपने छंदों में लिपिबद्ध किया है । सुशील यदु की लेखनी ने अपने इस कविता -संग्रह में मदन ठेठवार, बलौदा बाज़ार के राज महंत नैनदास जी, दुर्ग जिले के रामप्रसाद देशमुख, घनश्याम सिंह गुप्त और विश्वनाथ यादव तामस्कर के सत्याग्रही जीवन को भी अपनी रचनाओं में रेखांकित किया है । 'छत्तीसगढ़ के सुराजी वीरों ' की इन गौरव गाथाओं में शंकर राव गनौदवाले,ग्राम चंदखुरी के अनंत राम बरछिहा,रायपुर के पंडित वामनराव लाखे, यहीं की डॉ. राधाबाई, महासमुन्द तहसील की वीरांगना दयाबाई और अकलतरा (वर्तमान जिला -जांजगीर -चाम्पा )के बैरिस्टर छेदीलाल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भी काव्यात्मक प्रकाश डाला गया है ।
प्रदेश के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पत्रकार और इतिहासकार स्वर्गीय हरि ठाकुर ने 18मई 1989 को सात पेज में 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर ' की भूमिका लिखी थी । भूमिका की शुरुआत करते हुए वे लिखते हैं -
-"छत्तीसगढ़ की मिट्टी बड़ी उपजाऊ है । सिंचाई सुविधाओं के अभाव में भी वह धान उपजा सकती है, तो विप्लव के लिए भी उसमें कम उर्वरता नहीं है ।स्वाधीनता के दीर्घकालीन आंदोलन में छत्तीसगढ़ का योगदान, त्याग और बलिदान किसी से कम नहीं है ।प्रस्तुत पुस्तक में श्री सुशील यदु ने ऐसे ही स्वातंत्रय -वीरों की गाथाओं की गूँथकर काव्य -माला तैयार की है ।"
हरि ठाकुर आगे लिखते हैं - त्यागवीर और संघर्षशील पुरुष ही वीर -गाथाओं के नायक होते हैं । किन्तु वीर -गाथाओं के गायक भी किसी नायक से कम नहीं होते ।चंदबरदाई और भूषण इसी श्रेणी के नायक हैं ।छत्तीसगढ़ी लोक -काव्य में वीर गाथाएँ राउतों और देवारों के गीतों में संरक्षित हैं ।वीर काव्य हमें त्याग, बलिदान, निर्भयता और साहस की प्रेरणा देते हैं ।छत्तीसगढ़ के सुराजी वीरों ने स्वतंत्रता के लिए जो संघर्ष किया, उसके पीछे उनका महान त्याग और बलिदान है ।उनके महान चरित्रों का गुणगान ही इस काव्य -कृति का लक्ष्य है ।जो जाति अपने पुरखों के पुरुषार्थ को विस्मृत कर देती है, उसे आत्मग्लानि और हीन भावना का शिकार बनना पड़ता है । अपने महान पुरुषों को स्मरण करने के लिए यह कृति हमें अवसर प्रदान करती है ।
अपनी लम्बी भूमिका में हरि ठाकुर ने छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुई महत्वपूर्ण क्रांतिकारी घटनाओं का भी उल्लेख किया है ।उन्होंने अंत में लिखा है -"इतिहास को काव्यबद्ध करना आसान काम नहीं है । इस कठिन काम को श्री सुशील यदु ने अंजाम दिया है, वह सराहनीय है ।अपने विषय के प्रति उनका अध्ययन गहरा, दृष्टिकोण स्पष्ट तथा राष्ट्रीयता से ओत -प्रोत है । छत्तीसगढ़ी में अपने ढंग का यह पहला प्रयास है ।मुझे विश्वास है कि अन्य कवि भी इस दिशा में आगे आयेंगे और काव्य के सुरुचिपूर्ण माध्यम से अपने गौरवपूर्ण इतिहास को अमरत्व प्रदान करेंगे ।" हरि ठाकुर ने भूमिका में सुशील यदु को उनकी काव्य प्रतिभा और उत्कृष्ट विषय चयन के लिए बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की थी, लेकिन अफ़सोस कि वे दोनों ही हमारे बीच नहीं हैं ।
सुशील यदु की काव्य -कृति 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर ' में 'दू शब्द ' शीर्षक से स्वर्गीय ललित मोहन श्रीवास्तव के विचार भी प्रकाशित हैं । उन्होंने लिखा था -"इस छत्तीसगढ़ी काव्य गाथा की भूमिका हम सबके परिचित भाई हरि ठाकुर ने लिखी है उन्होंने लिखा था -"इस छत्तीसगढ़ी 'काव्य गाथा ' की भूमिका हम सबके परिचित भाई हरि ठाकुर ने लिखी है । यह भूमिका इस पुस्तक की कुंजी है, जो इस क्षेत्र के स्वातंत्रय -समर के इतिहास में हमें 'प्रवेश 'दिलाती है । 1947 के उपरांत जन्मी पीढ़ी को यह भूमिका वह सब याद दिलाजीव, जो वह भूलती जा रही है ।इसके बाद आती है श्री सुशील यदु की अपनी बात ।स्वाधीनता संग्राम के इतिहास की जानकारियों के लिये श्री हरि ठाकुर उनके प्रमुख प्रेरणा स्रोत रहे ।सुशील यदु का अपना योगदान स्वतन्त्रता संग्रामियों के पद्यात्मक प्रस्तुतिकरण में है ।जाहिर है कि ऐसे प्रयास में कुछ योद्धा (जैसे नगरी के श्याम लाल सोम )छूट जा सकते हैं ।किन्तु लेखक ने अधिकांश स्वतंत्रता सेनानियों के साथ न्याय किया है ।प्रथम प्रयास की दृष्टि से यह इस पुस्तक की उपलब्धि है । मैं सुशील यदु को बधाई देना चाहता हूँ कि उन्होंने मिन्दू कुम्हार, रामाधीन गोंड जैसे उपेक्षित नामों को शीर्षकों में जगह दी"
आज सुशील यदु इस दुनिया में मौज़ूद नहीं हैं, हरि ठाकुर और ललित मोहन श्रीवास्तव भी इस भौतिक संसार से जा चुके हैं, लेकिन इस कृति में उनका लिखा हुआ बहुत कुछ हमारे सामने है, जिसे पढ़कर हमें उनकी याद आती रहेगी । इन तीनों सरस्वती -पुत्रों को विनम्र नमन । बहुत पहले ही 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर 'भी अपनी -अपनी यादगार भूमिकाएँ निभा कर इस धरती को छोड़ चुके हैं । उन वीरों को भी विनम्र श्रद्धांजलि । सुशील यदु ने इसी शीर्षक की अपनी इस काव्य -कृति में उनसे जुड़ी स्मृतियों को हमसे जोड़कर रखने का सार्थक प्रयास किया है । किसी भी देश या प्रदेश के इतिहास और साहित्य को, वहाँ की संस्कृति को हमेशा याद रखने के लिए ऐसा रचनात्मक प्रयास बहुत महत्वपूर्ण होते हैं ।
-स्वराज्य करुण

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