पुस्तक -चर्चा
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हमारे सांस्कृतिक इतिहास की लगभग
गुमनाम नायिका पर पहला खण्ड काव्य
(आलेख -स्वराज्य करुण )
भारतीय संस्कृति में पौराणिक पात्रों पर आधारित कहानी, उपन्यास, नाटक और खण्ड -काव्य लिखने की परम्परा तो है, लेकिन ऐसी कृतियाँ कम ही देखने, पढ़ने को मिलती हैं । छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार रूपनारायण वर्मा 'वेणु 'द्वारा रचित अतुकांत शैली का खण्ड -काव्य 'श्रुतकीर्ति' भी ऐसी दुर्लभ कृतियों में से है, जिसका प्रकाशन आज से 44 साल पहले सन 1982 में हुआ था । यह वेणु जी की तीसरी कृति है । यह हमारे देश के सांस्कृतिक इतिहास की एक गुमनाम नायिका पर केंद्रित पहला खण्ड -काव्य है ।
कवि ने इसे भाव -प्रधान लघु काव्य भी कहा है, जबकि पुस्तक में प्रकाशित कुछ विद्वानों ने अपने अभिमत में इसे मुक्त छंद का खण्ड -काव्य बताया है ।इस भाव प्रधान काव्य के प्रणेता रूपनारायण वर्मा 'वेणु' अब इस भौतिक दुनिया में नहीं हैं , लेकिन इस खण्ड -काव्य के माध्यम से वे अपनी एक महत्वपूर्ण कृति को लेकर हमारी यादों में हमेशा बने हुए हैं।वे बहुत सहज -सरल स्वभाव के कवि थे । रायपुर में आज से 105 साल पहले,वर्ष 1921में जन्मे थे । यहीं उनकी साहित्य -साधना 1935 में शुरु हुई थी । आजीवन रायपुर में रहकर ही उन्होंने काव्य सृजन किया। उनकी कई कृतियाँ प्रकाशित हुईं। पहली कृति 'ज्योति निर्झर' सूक्तियों और लघु कथाओं के संकलन के रूप में वर्ष 1971 में प्रकाशित हुई थी ।इसे नागपुर के विश्वभारती प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया था । दूसरी कृति 'सहस्त्र सुमन ' का प्रकाशन वर्ष 1981 में हुआ था । वेणु जी स्वयं इसके प्रकाशक थे । वेणु जी के गीतों का संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी 'वर्ष 1985 में प्रकाशित हुई थी । उनके खण्ड काव्य 'श्रुतकीर्ति' के साथ ही 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' के प्रकाशक गणेश राम नगर, रायपुर के डॉ. लक्ष्मण बजाज थे । स्थानीय समाचार पत्रों में भी वेणु जी की रचनाएँ समय -समय पर प्रकाशित होती रहती थीं । उनके गीत आकाशवाणी रायपुर से भी प्रसारित हुए.
शहर के स्थानीय कवि सम्मेलनों में भी वे शामिल होते थे। गांधी टोपी के साथ खादी का कुरता और खादी की धोती, यही उनका परिधान थाl वे शहर में पैदल घूमते और अपने मित्रों -परिचितों से, बड़े स्नेह से मिलते जुलते थे । स्थानीय अखबारों के दफ्तरों में भी पैदल जाकर सम्पादकों से मिलते और अपनी कविताएँ दे आते थे । पुस्तक 'श्रुतकीर्ति 'के अंतिम आवरण पृष्ठ में छपे वेणु जी के परिचय में उनकी तृतीय कृति के रूप में 'श्रुतकीर्ति ' का उल्लेख खण्ड -काव्य के रूप में किया गया है ।यह काव्य -कृति कालजयी महाकाव्य 'रामायण ' के नायक भगवान श्रीराम के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न की धर्मपत्नी श्रुतकीर्ति पर केंद्रित है ।
पुस्तक में प्रबोधिनी एकादशी, संवत 2038(8 नवम्बर 1981)के दिन अपने 'आत्म -निवेदन 'में वेणु जी ने लिखा -"संस्कृत और हिंदी में रामायण के प्रायः सभी पात्रों पर कवियों ने ग्रंथ -रत्नों की रचना की है, किंतु देवी 'श्रुतकीर्ति' के जीवन और त्याग पर हमारे कविगण मौन रहे । मैंने प्रस्तुत लघुकृति में इसी अभाव की पूर्ति करने का लघु प्रयास किया है ।आशा है, प्रबुद्ध पाठकों को यह रुचिकर ज्ञात होगी ।" आत्म निवेदन में कृति के रचनाकार वेणु जी ने भूमिका लेखन और अपनी सम्मतियाँ देने वाले सभी विद्वानों के प्रति आभार व्यक्त किया है ।
आवरण के चार पन्नों को मिलाकर यह पुस्तक 54 पेज की है। इसकी कीमत मात्र चार रूपए रखी गई थी ।प्रथम संस्करण में प्रकाशक द्वारा 1982 में इसकी एक हजार प्रतियाँ क्वालिटी प्रिंटर्स, नया बस स्टैंण्ड, बेमेतरा से छपवाई गईं थीं ।
इसमें खण्ड -काव्य की नायिका श्रुतकीर्ति से संबंधित कुल 17 सर्ग हैं, जो अतुकांत शैली (मुक्त छंद )की कविताओं में लिखे गए हैं। पहला सर्ग 'वंश -परम्परा' पर है, जिसकी प्रारंभिक पंक्तियों से पता चलता है कि श्रुतकीर्ति राजा जनक के अनुज कुशध्वज नरेश की सुपुत्री थीं।कवि के अनुसार श्रुतकीर्ति सद्गुण और सत्कर्म, सदधर्म की प्रतीक थी ।
सीताजी के स्वयंवर के समय राजा जनक ने अपने गुरु ऋषि विश्वामित्र के सामने इच्छा प्रकट की थी कि वे लक्ष्मण का विवाह उर्मिला से, भरत का विवाह मांडवी से और श्रुतकीर्ति का विवाह शत्रुघ्न से करना चाहते हैं।इस पर विश्वामित्र जी ने उन्हें मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद दिया था ।दूसरे सर्ग का शीर्षक 'गुण -वर्णन ' है, इसमें अध्याय में सीता जी के अपहरण के बाद अयोध्या में फैली शून्यता, अशोक वाटिका में राक्षसों के बीच मानवता का प्रतीक बनकर बैठी सीता और उधर अयोध्या में कैकेयी के कृत्य पर कभी -कभी कृद्ध होती श्रुतिकीर्ति और पति -भक्ति में अनुरक्त मांडवी जीवन शैली और मनोदशा का वर्णन है।
इस अध्याय की अतुकांत रचना के अंत में कवि वेणु जी ने लिखा है -
*बेचारी श्रुतकीर्ति रात्रि की नीरवता में
जीवन की विभीषिका में
दीपक की तरह जल रही है.
उसे अपने कष्ट का कुछ भी
अनुभव नहीं है.
वह लाजवंती की तरह सलज्जा,
वह चमेली की तरह निर्मला,
वह चम्पा की तरह तेजस्विनी बनी हुई है*.
तीसरे सर्ग में श्री भरत जी के गुणों की प्रशंसा, चौथे में श्रुतकीर्ति के उदगार, पांचवे में शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति का स्वप्न -वर्णन है ।चौथे सर्ग में भगवान श्रीराम द्वारा सीता माता के परित्याग की घटना पर श्रुति कीर्ति के उदगार कवि वेणु जी की इन पंक्तियों में व्यक्त हुए हैं -
*आर्य को इस पर विचार करना चाहिए.
जिस सीता ने अग्नि परीक्षा देकर
अपने सतित्व का प्रखर परिचय दिया,
उसकी इस तरह की उपेक्षा असहनीय है.
क्या यही न्याय है?
और वह भी आर्य का?
जो सती साध्वी अबला के साथ
इस तरह का अत्याचार हो ।
राम -राज्य परिषद के सदस्य
इस दिशा में क्यों मौन बैठे हैं?
जबकि 'मनु स्मृति ' के अनुसार
बालक, वृद्ध, स्त्री को दण्ड देने का
विधान नहीं है ।
फिर सीता ने क्या अपराध किया?
जिन्हें बिना सूचित किए
निर्वासित कर रहे हैं?*
इस अध्याय की अंतिम पंक्तियाँ और भी अधिक मर्मस्पर्शी हैं -
*एक साधारण स्त्री भी
अपराधिनी क्यों न हो,
उसे भी बिना सूचित किए
दण्ड नहीं दिया जाता ।
फिर गर्भवती स्त्री को इस तरह
दण्ड देना कहाँ का न्याय है?*
श्रुतिकीर्ति इतना कहकर मौन हो गई ।
मुझे लगता है कि हैण्ड कंपोर्जिंग पद्धति से प्रिंटिंग के दौरान खण्ड काव्य के अध्यायों की नम्बरिंग में थोड़ी असावधानी हो गई होगी, जिससे दो सर्गों -'श्रुतकीर्ति के उदगार' और 'शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति का स्वप्न -वर्णन 'दोनों में एक ही सर्ग का क्रमांक 4 छप गया है, जबकि 'शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति का स्वप्न -वर्णन 'में सर्ग क्रमांक 5 होना चाहिए । हालांकि *अनुक्रमणिका* में सभी सर्गों के क्रमांक ठीक हैं ।
इस खण्ड -काव्य का छठवाँ सर्ग 'अयोध्या का संताप'शीर्षक से है, जिसे पढ़कर मुझे तो समझ में नहीं आया कि कवि ने ऐसा शीर्षक क्यों दिया है?
इसमें तो इंद्रधनुषी कल्पना श्रुतकीर्ति की तरह सजीव हो उठने, उर्मिला को आनंद की मूर्ति प्राप्त होने, मांडवी की सदभावना भी श्रुतकीर्ति बनकर आने, स्वर्ग का नंदनवन, भारत का कानन -उपवन सौन्दर्य की राज्य -लक्ष्मी को पाकर धन्य होने जैसी पंक्तियाँ हैं । अंतिम पंक्तियों में भी संताप जैसी कोई भावना प्रकट नहीं होती ।
बहरहाल सभी सर्ग पठनीय हैं । सातवाँ सर्ग 'श्रुतकीर्ति के आराध्य देव -शत्रुघ्न ', आठवाँ सर्ग 'उर्मिला -श्रुतकीर्ति संवाद ' और नवमाँ सर्ग 'विश्व -दर्शन ' शीर्षक से है । दसवें सर्ग का शीर्षक -'भगवान श्री राम और सीता के जीवन पर श्रुतकीर्ति के विचार -दर्शन ', 11वें का शीर्षक 'श्रुतकीर्ति की तपश्चर्या ', 12वें का शीर्षक 'लक्ष्मण का स्वप्न ', 13 वें का शीर्षक 'उर्मिला का वियोग', 14वें सर्ग का शीर्षक 'गृहस्थ जीवन पर श्रुतकीर्ति के विचार ' 15 वें का शीर्षक अरूंधती -श्रुतकीर्ति संवाद, 16वें का शीर्षक 'जीवन -दर्शन ' और 17वें का शीर्षक 'अंतिम -प्रश्न 'है।
'गृहस्थ जीवन पर श्रुतकीर्ति के विचार 'शीर्षक अध्याय में दरअसल शत्रुघ्न के ही विचार हैं, जो उन्होंने श्रुतकीर्ति के प्रश्नों के उत्तर में व्यक्त किए थे।उदाहरण स्वरूप जब श्रुतकीर्ति ने अपने स्वामी से प्रश्न किया -
"गृहस्थ जीवन कैसे सुखी हो सकता है
और पत्नी कैसी हो?
तब शत्रुघ्न ने कहा -
देवि! जो स्त्री अपने पति की अभिरुचि का
रखकर ध्यान कार्य करती है और अभ्यागतों
एवं अतिथियों का स्वागत -सम्मान करती है,
वही श्रेष्ठ है.
उससे गृहस्थ जीवन सुखी हो सकता है ।
जिस स्त्री और पुरुष के
विचार और वाणी में एकरूपता हो,
रूप और गुण में समन्वय हो,
उसी का जीवन सुखी हो सकता है,
अन्यथा नहीं ।
विवाह स्त्री और पुरुष के
जीवन को सुन्दर बनाता है, विकृत नहीं ।
श्रुतिकीर्ति स्वामी के विचारों
को हृदयंगम कर रही थी ।"
खण्ड काव्य के अंतिम सर्ग यानी 17वें सर्ग में श्रुतकीर्ति के मन में उठता यह 'अंतिम प्रश्न' पाठकों को व्यथित और विचलित करते हुए सोचने विवश सकता है -
"क्या स्त्री वरदान है
या देव और महापुरुषों की जन्म दात्री?
फिर क्यों उसे अग्नि में दग्ध होना पड़ता है?
यही एक विचारणीय प्रश्न है,
जो बार -बार आकाश में
प्रतिध्वनित हो रहा है ।
कवि रूपनारायण वर्मा 'वेणु' ने अपनी यह कृति हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती महादेवी वर्मा को साहित्य, संगीत और कला की त्रिवेणी बताते हुए उन्हें समर्पित की है ।
वेणु जी की इस काव्य -कृति की भूमिका वरिष्ठ साहित्यकार और छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर के तत्कालीन प्राचार्य सरयूकांत झा ने तीन जून 1980 को लिखी थी,जबकि रायपुर के एडवोकेट श्री जमालुद्दीन ने 19अक्टूबर 1974 को वेणु जी का परिचय लिखा था ।उनके शब्दों में -"श्री रूपनारायण वर्मा 'वेणु' छत्तीसगढ़ की साहित्य सेवी बिरादरी के एक शोधपरक रचनाकार हैं ।प्रस्तुत रचना उनके अथक परिश्रम का प्रतिफल है।"
वेणु जी की इस काव्य -कृति में केन्द्रीय महाविद्यालय, सारणी, बैतूल (मध्यप्रदेश )के प्राचार्य डॉ. नत्थूलाल गुप्त द्वारा 20 फरवरी 1982 को प्रेषित विचार भी शामिल हैं ।दैनिक 'नवभारत ', नागपुर के साहित्य सम्पादक शिवनारायण द्विवेदी ने 25 फरवरी 1982 को लिखा -
"बन्धुवर रूपनारायण वर्मा 'वेणु'ने श्रुतकीर्ति ' एक भावप्रधान काव्य मुक्तक छंद में रचकर निःसंदेह हिंदी साहित्य पर बड़ा उपकार किया ।रामायण के नारी पात्रों में 'उर्मिला' को जो महत्व पहले नहीं मिला था, उसे स्वर्गीय राष्ट्रकवि मैथिली शरण जी गुप्त ने तथा उनके बाद डॉ. बल्देव प्रसाद जी मिश्र ने अपनी बहुप्रशंसित रचनाओं में उन महीयसी नारियों का वर्णन कर, सुधी पाठकों के समक्ष उनके शील आदि सदगुणों को खूब उजागर किया था
।किंतु वीर शत्रुघ्न एवं उनकी जीवनसंगिनी 'श्रुतकीर्ति' के संबंध में अभी तक किसी कवि ने कुछ नहीं लिखा । इसे ध्यान में रखकर श्री 'वेणु 'जी का यह सदप्रयास स्वागत योग्य है ।इस खण्ड काव्य के प्रोढ़ कवि 'वेणु ' ने इस खटकते अभाव की पूर्ति की है। "
इसी तरह बूढ़ापारा रायपुर के डॉ. रविशंकर व्यास नेश्री कृष्ण जन्माष्टमी संवत 2039, मध्यप्रदेश साहित्य सम्मेलन, रायपुर के उपाध्याय शा. प्र. तिवारी ने 12अप्रैल 1982 को अपने अभिमतों में इस खण्ड -काव्य की प्रशंसा की है । स्टेशन रोड, रायपुर निवासी डॉ. कैलाशचंद्र दास ने लिखा था -" 'श्रुतकीर्ति ' एक भाव प्रधान खण्ड -काव्य है । यह मुक्त छंद में लिखा गया है।... इस खण्ड -काव्य के द्वारा कवि ने हमारे सामने एक उत्तम नारी -चरित्र को प्रस्तुत किया है, जिससे राम -काव्य की समृद्धि को एक विश्वसनीय बल मिला है ।"
पुस्तक के तीसरे आवरण पृष्ठ पर हिन्दी साहित्य परिषद, बेमेतरा के सचिव ठाकुर लव सिंह दीक्षित की सम्मति भी छपी है ।उन्होंने लिखा है -" श्री रूपनारायण वर्मा 'वेणु ' द्वारा रचित 'श्रुतकीर्ति' की पांडुलिपि मैंने पढ़ी ।इसमें अंतर्निष्ठ दार्शनिक विचार अत्यंत अनूठे व अभिनव हैं । श्री वेणु जी का यह प्रयास रामकथा के प्रकाशन में एक नई कड़ी है । भगवान श्रीराम के चरित्र एवं लीला में जितने भी पात्रों ने भाग लिया, उनमें से एक 'श्रुतकीर्ति ' है
। इनके महान प्रयास 'श्रुतकीर्ति' के पठन से यह स्पष्ट है कि 'श्रुतकीर्ति रामकथा रुपी विशाल भवन में नींव के पत्थर की भांति महत्वपूर्ण किंतु गुप्त है । अत्यंत अभावों में भी सद -साहित्य के सृजन में संलग्न 'वेणु 'जी की 'श्रुतकीर्ति' इनकी भी कीर्ति को अवश्य ही बढ़ाएगी, ऐसा मेरा विश्वास है ।"
पुस्तक में छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर के तत्कालीन प्राचार्य प्रोफेसर सरयूकांत झा द्वारा लिखी गई भूमिका के कुछ अंश इस प्रकार हैं -
*श्री 'वेणु' साकार साधना हैं. इनसे हुई प्रथम भेंट को एक चतुर्थ शती से भी अधिक समय बीत चुका है, पर मैंने इन्हें सदा एक -सा पाया ।जीवन के अतिशय ग्रीष्म के आतप इन्हें झुलसा नहीं पाये और न शीत -लहरों के झोंके इन्हें किसी सुरक्षित स्थान की ओर दौड़ा सके ।सदैव एक रस, शांत! जीवन की कोई निश्चित राह नहीं । कोई बात नहीं, कोई -न -कोई रास्ता तो है । जहाँ तक पृथ्वी है, वहाँ तक चलने वाले व्यक्ति के लिये राह भी है ।कदाचित 'वेणु 'जी का यही विश्वास है ।
*श्री 'वेणु' जी की रचनायें अनंत साधना -पथ को आलोकित करने वाले प्रकाश स्तम्भ हैं । 'श्रुतिकीर्ति ' उनमें से एक है ।निरंतर गतिमान 'वेणु 'जी के काव्य -प्रवाह की अगली सीमा का विश्वास मैंने इनमें पाया है ।कवि मन की सत्याभिव्यक्ति के लिये छटपटाहट मैंने इनमें देखी है ।कवि कोई बड़ी बात कहना चाह रहा है, भाषा अभी उस बात की गहराई को नापने का प्रयास कर रही है ।
* 'श्रुतिकीर्ति ' में अनेक ऐसे स्थल मुझे मिले, जहाँ पहुँचकर पाठक मन अपने में अभिनव कल्पना का स्फुरण पाता है ।वह चिंतन -मनन के लिये विवश हो जाता है । छंदमुक्त सूत्रात्मक शैली में 'वेणु 'जी ने 'श्रुतिकीर्ति ' को लिखा है।मुझे विश्वास है कि सुधी पाठक इसमें मन के विस्तार में प्रवेश पाने का मार्ग अवश्य पायेंगे ।
* अपने सीमित साधन में 'वेणु ' जी जो कुछ करते जा रहे हैं, उस पर हमें बड़ी आस्था है ।उनकी लेखनी अभी चल रही है । मुझे यह आभास मिल रहा है कि कुछ अनुपम, कुछ अनूठा उनके द्वारा निर्मित होने की प्रतीक्षा में है ।*
लेकिन अफ़सोस... 'वेणु' जी की इस महत्वपूर्ण कृति के भूमिका -लेखक प्रोफेसर सरयूकांत झा भी अब इस दुनिया में नहीं हैं और उनकी तरह 'वेणु 'जी की जीवन -यात्रा भी बहुत पहले थम चुकी है। इसलिए 'वेणु 'जी की लेखनी से "कुछ अनुपम, कुछ अनूठा निर्मित होने " की भूमिका लेखक की प्रतीक्षा अब कभी पूरी नहीं हो पायेगी, लेकिन 'वेणु 'जी की अन्य छपी हुई कृतियाँ हमें ज़रूर उनकी याद दिलाती रहेंगी।
उन्होंने मुझे अपने गीत -संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी 'के साथ अपने खण्ड -काव्य 'श्रुतकीर्ति ' की एक सौजन्य प्रति भी 6सितम्बर 1986 के दिन सस्नेह भेंट की थी। इन काव्य -कृतियों से मुझे भी उनकी याद आने लगती है । लगता है कि हमेशा गांधी टोपी और खादी का धोती -कुर्ता पहने, बगल में अपनी किताबों का झोला लटकाए, शहर की सड़कों पर पैदल घूमते हमारे 'वेणु 'जी मुझे भी कहीं न कहीं दिख जाएँगे और मिल जाएँगे । लेकिन काश! ऐसा हो पाता!
-स्वराज्य करुण


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