Wednesday, March 18, 2026

(पुस्तक -चर्चा ) एक साझा कविता -संग्रह की अगले साल होगी स्वर्ण जयंती /लेखक -स्वराज्य करुण

 एक साझा कविता -संग्रह की अगले साल होगी स्वर्ण जयंती 

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लगभग 49 साल पहले के आरंग की हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कविताएँ 

             

 (आलेख -स्वराज्य करुण )

   छत्तीसगढ़ में साझा कविता संग्रहों के प्रकाशन की उत्साहजनक परम्परा आज भले ही कमज़ोर पड़ गई हो, लेकिन उस दौर में शहरों और कस्बाई गाँवों से प्रकाशित हुए कई संकलन आज भी उस परम्परा की याद दिलाते हैं ।  महानदी के समीपवर्ती  शहर आरंग के 22 कवियों के साझा संग्रह 'आरंग के कवि ' का प्रकाशन  लगभग 49 साल पहले जून 1977 में हुआ था   ।  आगामी जून 2027 में इसके  50 साल पूरे हो जाएंगे, जो हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कवियों के इस मिले -जुले  कविता संग्रह की स्वर्ण जयंती होगी  । अभिव्यक्ति की चाहत हर व्यक्ति में होती है । हर किसी के मन में अपने आस -पास हो रही अच्छी -बुरी घटनाओं के बारे में तरह -तरह के विचार उठते रहते हैं , जिन्हें वह बातचीत में किसी न किसी से साझा करता ही है ।  अगर व्यक्ति कवि या लेखक हुआ तो वह अपने विचारों को या अपनी भावनाओं को लिखकर प्रकट करता है । उसकी अभिव्यक्ति कविता, कहानी, निबंध आदि साहित्यिक विधाओं में समाज के सामने आती है ।  आरंग के कवियों का यह साझा -संग्रह भी मनुष्य की वैचारिक अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण दस्तावेज है । छत्तीसगढ़ की साहित्यिक विरासत को और भी ज़्यादा धनवान बनाने में स्थानीय स्तर के ऐसे प्रकाशनों का भी सराहनीय योगदान रहा है  । ऐसे प्रकाशन जिस गाँव, कस्बे या शहर में होते हैं, उसे भी दूर -दूर तक  साहित्यिक पहचान मिलती है ।

                                         


आरंग छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक शहर है जो प्रदेश की राजधानी रायपुर से लगभग 35 किलोमीटर पर राष्ट्रीय राजमार्ग 53के किनारे बसा हुआ है  । स्थानीय साहित्यकारों और साहित्यिक अभिरुचि के नागरिकों ने मिलकर यहाँ हिंदी साहित्य परिषद का गठन किया था, जिसके संयोजक थे सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. विनय कुमार पाठक, जो उन दिनों आरंग महाविद्यालय में हिन्दी के सहायक प्राध्यापक हुआ करते थे और छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के तीसरे अध्यक्ष भी रहे  । अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल 2016 से 2018 तक रहा. डॉ. पाठक इन दिनों अपने गृहनगर बिलासपुर में साहित्य सृजन के साथ -साथ वहाँ के साहित्यिक आयोजनों में  काफी व्यस्त रहते हैं।वे  थावे विद्यापीठ (बिहार) के कुलपति भी हैं  ।   आरंग में सहायक प्राध्यापक के रूप में अपने कार्यकाल में उन्होंने बेहतरीन साहित्यिक वातावरण बनाने का सराहनीय प्रयास किया था, जिसके फलस्वरूप 'आरंग के कवि 'का प्रकाशन  संभव हो पाया । इसका सम्पादन भी उन्होंने किया था।

 इस संकलन में हिंदी के 13 और छत्तीसगढ़ी के 9 कवि शामिल हैं। यह साझा कविता संग्रह कवर पेज सहित 32पेज का है, उन दिनों इसकी कीमत सिर्फ़ एक रूपए रखी गई थी ।  हैण्ड कम्पोजिंग से इसकी छपाई  नंदिनी मार्ग, भिलाई नगर स्थित श्री छत्तीसगढ़ प्रेस में हुई थी । बाइंडिंग स्टेपलर से की गई थी  । कविता -संग्रह 'आरंग के कवि 'का प्रकाशन पचरी घाट, जूना, बिलासपुर स्थित प्रयास प्रकाशन द्वारा किया गया था. यह प्रयास प्रकाशन की तैंतीसवीं भेंट थी  । 

    संग्रह के प्रारंभ में 'आरंग और आरंग के कवि 'शीर्षक अपनी चार पेज की भूमिका में प्रयास प्रकाशन के संचालक डॉ.विनय कुमार पाठक ने इस कस्बे की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठ भूमि पर प्रकाश डाला है । इसके साथ ही उन्होंने यहाँ के यादगार साहित्यिक आयोजनों की भी चर्चा की है । उन्होंने यह भूमिका उन्होंने 11जून 1977 को छत्तीसगढ़ी समारोह दिवस के अवसर पर लिखी थी । डॉ. पाठक भूमिका की शुरुआत करते हुए लिखते हैं -

  "मोरध्वज की दानशीलता के लिए विश्व विख्यात, जैनियों के श्रद्धा का केन्द्र स्थल, कलचुरि युग के सांस्कृतिक -कलात्मक विकास का प्रतीक आरंग  युग के विविध आरोह -अवरोह को अभिव्यक्त करता है, जहाँ शैव, वैष्णव, जैन, बौद्ध और आंचलिक देवी -देवताओं के सामान्य और विशिष्ट रूप अवस्थित हैं । कहीं सत्यनाम की गूंज है तो कहीं कबीर पंथ के चौका का स्वर  । स्वधर्मों में संलग्न यहाँ के वासी और इतर धर्मावलम्बी धर्म -निरपेक्षता और सह -अस्तित्व का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं ।  आरंग छत्तीसगढ़ का संक्षिप्त संस्करण कहा जा सकता है. छत्तीसगढ़ का सही स्वरूप आरंग में केंद्रीभूत है  । " 

डॉ. पाठक आगे लिखते हैं -"खंडहर अतीत की उज्ज्वल गाथा को उदाभाषित करता है.ऐतिहासिक -सांस्कृतिक दृष्टि से आरंग की समृद्धि अभिलेखों और उपलब्ध पुरातत्व सामग्रियों में संरक्षित है । जिस नगरी की सांस्कृतिक -ऐतिहासिक समृद्धि विश्रुत -विख्यात हो, वहाँ की साहित्यिक -थाती निःसंदेह सामर्थ्यवान होगी  । ऐसा आभास होता है कि यहाँ की साहित्यिक -साधना स्वान्तः सुखाय में संलग्न रही ।  उचित पर्यावरण के अभाव में यहाँ की प्रतिभाएँ काल -कवलित हो गईं । नौकरी पेशे से आयातित साहित्यिकों ने यहाँ के साहित्यिकों के साथ संशलिष्ट -समन्वित होकर हिंदी साहित्य समिति की स्थापना की, जिसमें सर्वश्री बाबूलाल चौबे, नत्थूलाल दुबे, चिन्ता प्रसाद द्विवेदी, रामनारायण शुक्ला, रामानुज दास वैष्णव, लखन लाल गुप्ता (वस्त्र विक्रेता )आदि का योगदान उल्लेखनीय रहा  । 

     भूमिका में डॉ. पाठक ने लिखा है कि तीन दिसम्बर 1973 को आरंग में हिन्दी साहित्य परिषद की स्थापना हुई, जिसका विधिवत उदघाटन डॉ. पालेश्वर शर्मा ने किया तथा अध्यक्षता ठाकुर हृदय सिंह चौहान ने की  ।  परिषद के तत्वाधान में 26जनवरी 1974 को कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ, जिसमें 'अकादसी 'का विमोचन भी हुआ.उन्होंने चर्चा के दौरान बताया कि 'अकादसी ' उनकी छत्तीसगढ़ी कविताओं का संग्रह था । डॉ. पाठक भूमिका में आगे लिखते हैं -कवि सम्मेलन में सर्वश्री रविशंकर शुक्ल, पन्नालाल सराठे 'रत्नेश ', रामेश्वर वैष्णव आदि कवियों के साथ स्थानीय प्रतिभाएँ भी मंचित हुईं । प्रथम अधिवेशन में सर्वश्री पवन दीवान, विमल पाठक, लक्ष्मण मस्तूरिया, विश्वनाथ योगी, डॉ. प्रेम त्रिपाठी, मनोहर शर्मा, ईश्वर शर्मा, माखन लाल तम्बोली आदि कवियों की उपस्थिति ने जन मानस पर प्रभाव डाला । द्वितीय अधिवेशन में नवरंग कला केन्द्र, भिलाई नगर के टेलीविजन और आकाशवाणी के ख्याति प्राप्त छत्तीसगढ़ी लोक -कलाकारों का सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ । इसी कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ी साहित्य के युग -प्रवर्तक पंडित द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्र 'का अभिनंदन किया गया । प्रथम और द्वितीय अधिवेशन के साथ छत्तीसगढ़ी समारोह दिवस का तृतीय -चतुर्थ आयोजन समन्वित था ।  तृतीय अधिवेशन में प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी नाटक 'माटी जागिस रे ' का मंचन स्थानीय फ्रेंड्स क्लब के साथ सहयोगार्थ हुआ ।  इस भव्य मंच पर श्री विमल कुमार पाठक का सम्मान परिषद की ओर से किया गया । इसके पूर्व डॉ. शत्रुघ्न पाण्डेय के मुख्य आतिथ्य में हिंदी दिवस मनाया गया  । डॉ. विनय कुमार पाठक ने भूमिका में 'आरंग के कवि ' को आरंग नगरी के प्रकाशित -अप्रकाशित, साधक -आराधक, परिष्कृत -अपरिष्कृत, प्राचीन -अर्वाचीन, समग्र कवियों का संचयन बताया है  । उन्होंने 'आरंग के कवि ' को एक ऐसा पुष्प -स्तवक भी बताया है, जिसमें उनके शब्दों में  "विविध रंगी पुष्प रुपी कवि गण समन्वित -संगुफित हैं और जो आरंग की वर्तमान साहित्यिक चेतना को मुखरित करने का विनम्र प्रयास कर रहा है ।  "

        उल्लेखनीय है कि 22 कविताओं के इस छोटे -से लेकिन महत्वपूर्ण साझा संकलन के हिन्दी कवियों में सर्वश्री चिन्ता प्रसाद द्विवेदी, बाबूलाल चौबे, रामानुज दास वैष्णव, भगत सिंह सोनी, निर्मल कुमार रिछारिया, रामदेव सिंह , अनूपनाथ योगी,गोवर्धन लाल अग्रवाल, राममोहन अग्रवाल,प्रहलाद कुमार मराठा, चुन्नीलाल चंद्रवंशी , रूद्रनाथ चंद्राकर और मनोहर लाल साहू की रचनाएँ शामिल हैं,  वहीं  डॉ. विनय कुमार पाठक, वीरेन्द्र कुमार नामदेव, कृष्णमोहन अग्रवाल, सत्येन्द्र कुमार यदु, अरुण कुमार दुबे, लखन लाल अग्रवाल, दीनदयाल साहू,लखन लाल गुप्ता और श्रीमती रजनी पाठक की छत्तीसगढ़ी कविताएँ भी प्रकाशित की गई हैं । दोनों ही भाषाओं की लगभग सभी कविताओं में  जन भावनाओं को अभिव्यक्ति देने का सार्थक प्रयास किया गया है, जिनमें सामाजिक विसंगतियों के साथ -साथ समाज का दुःख -दर्द भी प्रकट होता है  । 

   हिन्दी खण्ड में पहली कविता चिन्ता प्रसाद द्विवेदी की है, उनके गीत 'अधूरा जीवन 'के इस छंद को देखिए -

     *सुनाऊँ किसे आपबीती कि मैंने 

     युगों से यातनाएँ सही हैं,

     किसी की खुशी के लिए ही हमेशा,

     हमारी जवानी अधूरी रही है । * 

 आगामी कड़ियों में बाबूलाल चौबे ने 'दीप शिखा ', रामानुज दास वैष्णव ने  'विज्ञान का दानव ', भगत सिंह सोनी ने 'धनात्मक ज़िन्दगी ' शीर्षक  कविताओं में अपनी -अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी है.

भगत सिंह सोनी की कविता की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं -

  *सुना है कुछ लोग 

  धनात्मक ज़िन्दगी जीते हैं.

  मुझे नहीं मालूम,

 सिर्फ़ जानता हूँ -

 कुरिया से कब्रिस्तान तक  की 

 ऋणात्मक ज़िन्दगी । *

      प्रहलाद कुमार मराठा की कविता 'नेता नहीं, काम चाहिए ' और चुन्नीलाल चंद्रवंशी की कविता 'चमचावाद 'में राजनीतिक परिस्थितियों पर व्यंग्य प्रहार है  । 


छत्तीसगढ़ी खण्ड में डॉ. विनय कुमार पाठक का गीत 'हमर मया के सुरूज मरगे '  की भावनाएँ बहुत मर्मस्पर्शी हैं -

   *हमर मया के सुरूज मरगे, एमा मोला नइये अचरज,

   अचरज हे तो एक गोठ म, आँसू के तप विरथा होगे  । 

   हमर मया बासी कस गुरतुर,दया -पेज म बूड़े रहै,

   अंगाकर रोटी कस मन तेमा, मिरचा अंतस म गुड़े रहै  । 

   भगवाने के कान फूटगे, एमा मोला नइये अचरज,

   अचरज हे तो एक गोठ म तुलसा के जप विरथा होगे । *

संकलन में वीरेन्द्र कुमार नामदेव ने अपने छत्तीसगढ़ी गीत  'लहू औटाके जिनगी जीथस ' में देश के किसानों को सम्बोधित करते हुए उनकी मेहनत को शब्दों के भावनात्मक साँचे में ढाला है ।  इन पंक्तियों में उनकी अभिव्यक्ति देखिए -

     *जाग जा नगरिहा, उठ जा रे किसान 

     सुरूज अपन अंगठी ले खरोचत हे कान.

     गियान के कुकरा बासत हे,सुन ले देके कान.

     बइला, नाँगर तोर संगवारी 

    वोकरे संग करथस तंय गोठ,

     लहू औटाके जिनगी जीथस,

     मन ल चिटको नइ करस मोठ  । 

     तोर किसानिन कस हरियर लुगरा 

     पहिरे मटमटावय धान । *

संग्रह  में कृष्ण मोहन अग्रवाल का गीत 'हिरदे के सोन चिरइया' और  सत्येन्द्र कुमार यदु का गीत 'हमर नानकुन सुघ्घर गाँव ' भी बहुत प्रभावशाली है,  वहीं ' घुना घुना कस देस 'शीर्षक अरुण कुमार दुबे के छत्तीसगढ़ी गीत में देश की हालत पर मार्मिक व्यंग्य है. लखन लाल अग्रवाल अपनी रचना 'ये धान के कटोरा मोर ' में छत्तीसगढ़ के गाँवों, किसानों और मज़दूरों की पीड़ा को वाणी देते हैं-

  *ये धान के कटोरा मोर, कइसे कंगला बनगे,

  जगह -जगह भिखमंगा बाढ़ीन,

  चरौटा भाजी तक नहीं बाचिस,

खाली होगे गाँव दिन -दिन, रोजी के तलाश में ।  *


हालांकि कवि इस गंभीर संकट से मुक्ति के लिए ग्रामीणों से कहते हैं -

  * तरिया बांध के, नरवा बांध के, सिंचाई ला बढ़ाऔ,

   कुआँ खोदावो, पम्प लगाओ, नहर बढ़ाय के साधन जुटाओ  । 

   अपन बस के जम्मो ताकत, तरक्की बर लगावो  । *

अगले क्रम में कवि लखनलाल गुप्ता छत्तीसगढ़ के लोगों का स्वाभिमान जगाने की कोशिश करते हैं. उनकी इस कविता का शीर्षक है - माथा के करम ला नहीं, हाथ के करम ला देख '. इस रचना की प्रारंभिक पंक्तियों में कवि की भावनाओं को महसूस कीजिए -

 *हमन आन छत्तीसगढ़िया औ रहेन 

 छत्तीसगढ़िया रे छत्तीसगढ़िया,

दुनिया ह जावथे चाँद के ऊपर,

फेर हमन रेहेन मुड़गड़िया रे मुड़गड़िया  । 

छत्तीसगढ़िया छत्तीसगढ़िया ला काटथे,

त दूसर मन काबर हमर दुःख ल हरही,

हमरे हमर ल नइ देखे सकन,

तौ दूसर मन काबर हमर परवाह करहीं । *


कुल मिलाकर  'आरंग के कवि ' हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कविताओं का एक छोटा लेकिन बहुत महत्वपूर्ण संकलन है. इसके प्रकाशन के पाँच दशक अगले साल जून 2027 में पूरे हो जाएंगे  । बहुत संभव है कि छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बिरादरी की  नई पीढ़ी को आज शायद याद भी नहीं होगा कि हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कवियों का ऐसा कोई संयुक्त संकलन 49 साल पहले प्रकाशित हुआ था । साझा कविता संग्रहों के प्रकाशन के इस प्रकार के रचनात्मक प्रयास पहले बहुत हुआ करते थे, एक परम्परा -सी चल पड़ी थी,क्या इसे आज भी रखने की ज़रूरत नहीं है?

 -स्वराज्य करुण 

Sunday, March 15, 2026

(पुस्तक -चर्चा )हमारे सांस्कृतिक इतिहास की लगभग गुमनाम नायिका पर पहला खण्ड काव्य /आलेख -स्वराज्य करुण

 पुस्तक -चर्चा 

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हमारे सांस्कृतिक इतिहास की लगभग

 गुमनाम नायिका पर पहला खण्ड काव्य 

             (आलेख -स्वराज्य करुण )

भारतीय संस्कृति में पौराणिक पात्रों पर आधारित कहानी, उपन्यास, नाटक और खण्ड -काव्य लिखने की परम्परा तो है, लेकिन ऐसी कृतियाँ कम ही देखने, पढ़ने को मिलती हैं । छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार रूपनारायण वर्मा 'वेणु 'द्वारा रचित अतुकांत शैली का खण्ड -काव्य 'श्रुतकीर्ति' भी ऐसी दुर्लभ कृतियों में से है, जिसका प्रकाशन आज से 44 साल पहले सन 1982 में हुआ था । यह वेणु जी की तीसरी कृति है । यह हमारे देश के सांस्कृतिक इतिहास की एक गुमनाम नायिका पर केंद्रित  पहला खण्ड -काव्य है 


                                          



कवि ने इसे भाव -प्रधान लघु काव्य भी कहा है, जबकि पुस्तक में प्रकाशित कुछ विद्वानों ने अपने अभिमत में इसे मुक्त छंद का खण्ड -काव्य बताया है ।इस भाव प्रधान काव्य के प्रणेता रूपनारायण वर्मा 'वेणु'  अब इस भौतिक दुनिया में नहीं हैं   , लेकिन इस खण्ड -काव्य के माध्यम से वे अपनी एक महत्वपूर्ण कृति को लेकर हमारी यादों में हमेशा बने हुए हैं।वे बहुत सहज -सरल स्वभाव के कवि थे । रायपुर में आज से 105 साल पहले,वर्ष 1921में जन्मे थे । यहीं उनकी साहित्य -साधना 1935 में शुरु हुई थी । आजीवन रायपुर में रहकर ही उन्होंने काव्य सृजन किया। उनकी कई कृतियाँ प्रकाशित हुईं। पहली कृति 'ज्योति निर्झर'  सूक्तियों और लघु कथाओं के संकलन के रूप में वर्ष 1971 में प्रकाशित हुई थी ।इसे नागपुर के विश्वभारती प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया था । दूसरी कृति 'सहस्त्र सुमन ' का प्रकाशन वर्ष 1981 में हुआ था । वेणु जी स्वयं इसके प्रकाशक थे । वेणु जी के गीतों का संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी 'वर्ष 1985 में प्रकाशित हुई थी । उनके खण्ड काव्य 'श्रुतकीर्ति' के साथ ही 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' के प्रकाशक गणेश राम नगर, रायपुर के डॉ. लक्ष्मण बजाज थे । स्थानीय समाचार पत्रों में भी वेणु जी की रचनाएँ समय -समय पर प्रकाशित होती रहती थीं । उनके गीत आकाशवाणी रायपुर से भी प्रसारित हुए. 

   शहर के स्थानीय कवि सम्मेलनों में भी वे शामिल होते थे। गांधी टोपी के साथ खादी का कुरता और खादी की धोती, यही उनका परिधान थाl   वे शहर में पैदल घूमते और अपने मित्रों -परिचितों से, बड़े स्नेह से मिलते जुलते थे । स्थानीय अखबारों के दफ्तरों में भी पैदल जाकर सम्पादकों से मिलते और अपनी कविताएँ दे आते थे  ।   पुस्तक 'श्रुतकीर्ति 'के अंतिम आवरण पृष्ठ में छपे वेणु जी के परिचय में  उनकी तृतीय कृति के रूप में 'श्रुतकीर्ति ' का उल्लेख खण्ड -काव्य के रूप में किया गया है ।यह काव्य -कृति कालजयी महाकाव्य 'रामायण ' के नायक भगवान श्रीराम के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न की धर्मपत्नी श्रुतकीर्ति पर केंद्रित है ।

 पुस्तक में प्रबोधिनी एकादशी, संवत 2038(8 नवम्बर 1981)के दिन अपने 'आत्म -निवेदन 'में वेणु जी ने लिखा -"संस्कृत और हिंदी में रामायण के प्रायः सभी पात्रों पर कवियों ने ग्रंथ -रत्नों की रचना की है, किंतु देवी 'श्रुतकीर्ति' के जीवन और त्याग पर हमारे कविगण मौन रहे । मैंने प्रस्तुत लघुकृति में इसी अभाव की पूर्ति करने का लघु प्रयास किया है ।आशा है, प्रबुद्ध पाठकों को यह रुचिकर ज्ञात होगी ।" आत्म निवेदन में कृति के रचनाकार वेणु जी ने भूमिका लेखन और अपनी सम्मतियाँ देने वाले सभी विद्वानों के प्रति आभार व्यक्त किया है ।

           आवरण के चार पन्नों को मिलाकर यह पुस्तक 54 पेज  की है। इसकी कीमत मात्र चार रूपए रखी गई थी ।प्रथम संस्करण में प्रकाशक द्वारा 1982 में इसकी एक हजार प्रतियाँ क्वालिटी प्रिंटर्स, नया बस स्टैंण्ड, बेमेतरा से छपवाई गईं थीं ।

 इसमें खण्ड -काव्य की नायिका श्रुतकीर्ति से संबंधित कुल 17 सर्ग हैं, जो अतुकांत शैली (मुक्त छंद )की कविताओं में लिखे गए हैं। पहला सर्ग 'वंश -परम्परा' पर है, जिसकी प्रारंभिक पंक्तियों से पता चलता है कि श्रुतकीर्ति राजा जनक के अनुज कुशध्वज नरेश की सुपुत्री थीं।कवि के अनुसार       श्रुतकीर्ति सद्गुण और सत्कर्म, सदधर्म की प्रतीक थी ।

       सीताजी के स्वयंवर के समय राजा जनक ने अपने गुरु ऋषि विश्वामित्र के सामने इच्छा प्रकट की थी कि वे लक्ष्मण का विवाह उर्मिला से, भरत का विवाह मांडवी से और श्रुतकीर्ति का विवाह शत्रुघ्न से करना चाहते हैं।इस पर विश्वामित्र जी ने उन्हें मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद दिया था ।दूसरे सर्ग का शीर्षक 'गुण -वर्णन ' है, इसमें अध्याय में सीता जी के अपहरण के बाद अयोध्या में फैली शून्यता, अशोक वाटिका में राक्षसों के बीच मानवता का प्रतीक बनकर बैठी सीता और उधर अयोध्या में कैकेयी के कृत्य पर कभी -कभी कृद्ध होती श्रुतिकीर्ति और पति -भक्ति में अनुरक्त मांडवी जीवन शैली और मनोदशा का वर्णन है।

 इस अध्याय की अतुकांत रचना के अंत में कवि वेणु जी ने लिखा है -

  *बेचारी श्रुतकीर्ति रात्रि की नीरवता में 

  जीवन की विभीषिका में 

  दीपक की तरह जल रही है.

  उसे अपने कष्ट का कुछ भी 

  अनुभव नहीं है.

  वह लाजवंती की तरह सलज्जा,

  वह चमेली की तरह निर्मला,

  वह चम्पा की तरह तेजस्विनी बनी हुई है*.

तीसरे सर्ग में श्री भरत जी के गुणों की प्रशंसा, चौथे में श्रुतकीर्ति के उदगार, पांचवे में शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति का स्वप्न -वर्णन है  ।चौथे सर्ग में भगवान श्रीराम द्वारा सीता माता के परित्याग की घटना पर श्रुति कीर्ति के उदगार कवि वेणु जी की इन पंक्तियों में व्यक्त हुए हैं -


*आर्य को इस पर विचार करना चाहिए.

जिस सीता ने अग्नि परीक्षा देकर 

अपने सतित्व का प्रखर परिचय दिया,

 उसकी इस तरह की उपेक्षा असहनीय है.

क्या यही न्याय है?

और वह भी आर्य का?

जो सती साध्वी अबला के साथ 

इस तरह का अत्याचार हो ।

राम -राज्य परिषद के सदस्य 

इस दिशा में क्यों मौन बैठे हैं?

जबकि 'मनु स्मृति ' के अनुसार 

बालक, वृद्ध, स्त्री को दण्ड देने का 

विधान नहीं है  ।

फिर सीता ने क्या अपराध किया?

जिन्हें बिना सूचित किए

निर्वासित कर रहे हैं?*


इस अध्याय की अंतिम पंक्तियाँ और भी अधिक मर्मस्पर्शी हैं -


*एक साधारण स्त्री भी 

अपराधिनी क्यों न हो,

उसे भी बिना सूचित किए 

दण्ड नहीं दिया जाता  ।

फिर गर्भवती स्त्री को इस तरह 

दण्ड देना कहाँ का न्याय है?*

श्रुतिकीर्ति इतना कहकर मौन हो गई  ।


मुझे लगता है कि हैण्ड कंपोर्जिंग पद्धति से प्रिंटिंग के दौरान खण्ड काव्य के अध्यायों की नम्बरिंग में थोड़ी असावधानी हो गई होगी, जिससे दो सर्गों -'श्रुतकीर्ति के उदगार' और 'शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति का स्वप्न -वर्णन 'दोनों में एक ही सर्ग का क्रमांक 4 छप गया है, जबकि 'शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति का स्वप्न -वर्णन 'में  सर्ग क्रमांक 5 होना चाहिए । हालांकि *अनुक्रमणिका* में सभी सर्गों के क्रमांक ठीक हैं ।

इस खण्ड -काव्य का छठवाँ सर्ग 'अयोध्या का संताप'शीर्षक से है, जिसे पढ़कर मुझे तो समझ में नहीं आया कि कवि ने ऐसा शीर्षक क्यों दिया है?

इसमें तो इंद्रधनुषी कल्पना श्रुतकीर्ति की तरह सजीव हो उठने, उर्मिला को आनंद की मूर्ति प्राप्त होने, मांडवी की सदभावना भी श्रुतकीर्ति बनकर आने, स्वर्ग का नंदनवन, भारत का कानन -उपवन सौन्दर्य की राज्य -लक्ष्मी को पाकर धन्य होने जैसी पंक्तियाँ हैं । अंतिम पंक्तियों में भी संताप जैसी कोई भावना प्रकट नहीं होती ।

बहरहाल सभी सर्ग पठनीय हैं । सातवाँ सर्ग 'श्रुतकीर्ति के आराध्य देव -शत्रुघ्न ', आठवाँ सर्ग 'उर्मिला -श्रुतकीर्ति संवाद ' और नवमाँ सर्ग 'विश्व -दर्शन ' शीर्षक से है । दसवें सर्ग का शीर्षक  -'भगवान श्री राम और सीता के जीवन पर श्रुतकीर्ति के विचार -दर्शन ', 11वें  का शीर्षक 'श्रुतकीर्ति की तपश्चर्या ', 12वें का शीर्षक 'लक्ष्मण का स्वप्न ', 13 वें का शीर्षक 'उर्मिला का वियोग', 14वें सर्ग का शीर्षक 'गृहस्थ जीवन पर श्रुतकीर्ति के विचार ' 15 वें का शीर्षक अरूंधती -श्रुतकीर्ति संवाद, 16वें का शीर्षक 'जीवन -दर्शन ' और 17वें का शीर्षक 'अंतिम -प्रश्न 'है।

'गृहस्थ जीवन पर श्रुतकीर्ति के विचार 'शीर्षक अध्याय में दरअसल शत्रुघ्न के ही विचार हैं, जो उन्होंने श्रुतकीर्ति के प्रश्नों के उत्तर में व्यक्त किए थे।उदाहरण स्वरूप जब श्रुतकीर्ति ने अपने स्वामी से प्रश्न किया -

"गृहस्थ जीवन कैसे सुखी हो सकता है 

और पत्नी कैसी हो?

तब शत्रुघ्न ने कहा -

देवि! जो स्त्री अपने पति की अभिरुचि का 

रखकर ध्यान कार्य करती है और अभ्यागतों 

एवं अतिथियों का स्वागत -सम्मान करती है,

वही श्रेष्ठ है.

उससे गृहस्थ जीवन सुखी हो सकता है ।

जिस स्त्री और पुरुष के 

विचार और वाणी में एकरूपता हो,

रूप और गुण में समन्वय हो,

उसी का जीवन सुखी हो सकता है,

अन्यथा नहीं ।

विवाह स्त्री और पुरुष के 

जीवन को सुन्दर बनाता है, विकृत नहीं ।

श्रुतिकीर्ति स्वामी के विचारों

 को हृदयंगम कर रही थी ।"

खण्ड काव्य  के अंतिम सर्ग यानी 17वें सर्ग में  श्रुतकीर्ति के मन में उठता यह 'अंतिम प्रश्न'  पाठकों को व्यथित और विचलित करते हुए सोचने विवश सकता है -

   "क्या स्त्री वरदान है 

    या देव और महापुरुषों की जन्म दात्री?

    फिर क्यों उसे अग्नि में दग्ध होना पड़ता है?

    यही एक विचारणीय प्रश्न है,

   जो बार -बार आकाश में 

   प्रतिध्वनित हो रहा है ।


 कवि रूपनारायण वर्मा 'वेणु' ने अपनी यह कृति हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती महादेवी वर्मा को साहित्य, संगीत और कला की त्रिवेणी बताते हुए उन्हें समर्पित की है । 

 वेणु जी की इस काव्य -कृति की भूमिका वरिष्ठ साहित्यकार और छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर के तत्कालीन प्राचार्य सरयूकांत झा ने तीन जून 1980 को लिखी थी,जबकि रायपुर के एडवोकेट श्री जमालुद्दीन  ने 19अक्टूबर 1974 को वेणु जी का परिचय लिखा था ।उनके शब्दों में -"श्री रूपनारायण वर्मा 'वेणु' छत्तीसगढ़ की साहित्य सेवी बिरादरी के एक शोधपरक रचनाकार हैं ।प्रस्तुत रचना उनके अथक परिश्रम का प्रतिफल है।"

वेणु जी की इस काव्य -कृति में केन्द्रीय महाविद्यालय, सारणी, बैतूल (मध्यप्रदेश )के प्राचार्य डॉ. नत्थूलाल गुप्त द्वारा 20 फरवरी 1982 को प्रेषित विचार भी शामिल हैं ।दैनिक 'नवभारत ', नागपुर के साहित्य सम्पादक शिवनारायण द्विवेदी ने 25 फरवरी 1982 को  लिखा -

"बन्धुवर रूपनारायण वर्मा 'वेणु'ने श्रुतकीर्ति ' एक भावप्रधान काव्य मुक्तक छंद में रचकर निःसंदेह हिंदी साहित्य पर बड़ा उपकार किया ।रामायण के नारी पात्रों में 'उर्मिला' को जो महत्व पहले नहीं मिला था, उसे स्वर्गीय राष्ट्रकवि मैथिली शरण जी गुप्त ने तथा उनके बाद डॉ. बल्देव प्रसाद जी मिश्र ने अपनी बहुप्रशंसित रचनाओं में उन महीयसी नारियों का वर्णन कर, सुधी पाठकों के समक्ष उनके शील आदि सदगुणों को खूब उजागर किया था 

।किंतु वीर शत्रुघ्न एवं उनकी जीवनसंगिनी 'श्रुतकीर्ति' के संबंध में अभी तक किसी कवि ने कुछ नहीं लिखा । इसे ध्यान में रखकर श्री 'वेणु 'जी का यह सदप्रयास स्वागत योग्य है ।इस खण्ड काव्य के प्रोढ़ कवि 'वेणु ' ने इस खटकते अभाव की पूर्ति की है। "

इसी तरह बूढ़ापारा रायपुर के डॉ. रविशंकर व्यास नेश्री कृष्ण जन्माष्टमी संवत 2039, मध्यप्रदेश  साहित्य सम्मेलन, रायपुर के उपाध्याय शा. प्र. तिवारी ने 12अप्रैल 1982 को अपने अभिमतों में इस खण्ड -काव्य की प्रशंसा की है । स्टेशन रोड, रायपुर निवासी डॉ. कैलाशचंद्र दास ने लिखा था -" 'श्रुतकीर्ति ' एक भाव प्रधान खण्ड -काव्य है  । यह मुक्त छंद में लिखा गया है।... इस खण्ड -काव्य के द्वारा कवि ने हमारे सामने एक उत्तम नारी -चरित्र को प्रस्तुत किया है, जिससे राम -काव्य की समृद्धि को एक विश्वसनीय बल मिला है ।" 

  पुस्तक के तीसरे आवरण पृष्ठ पर हिन्दी साहित्य परिषद, बेमेतरा के सचिव ठाकुर लव सिंह दीक्षित की सम्मति भी छपी है ।उन्होंने लिखा है -" श्री रूपनारायण वर्मा 'वेणु ' द्वारा रचित 'श्रुतकीर्ति' की पांडुलिपि मैंने पढ़ी ।इसमें अंतर्निष्ठ दार्शनिक विचार अत्यंत अनूठे व अभिनव हैं । श्री वेणु जी का यह प्रयास रामकथा के प्रकाशन में एक नई कड़ी है । भगवान श्रीराम के चरित्र एवं लीला में जितने भी पात्रों ने भाग लिया, उनमें से एक 'श्रुतकीर्ति ' है 

। इनके महान प्रयास 'श्रुतकीर्ति' के पठन से यह स्पष्ट है कि 'श्रुतकीर्ति रामकथा रुपी विशाल भवन में नींव के पत्थर की भांति महत्वपूर्ण किंतु गुप्त है । अत्यंत अभावों में भी सद -साहित्य के सृजन में संलग्न 'वेणु 'जी की 'श्रुतकीर्ति' इनकी भी कीर्ति को अवश्य ही बढ़ाएगी, ऐसा मेरा विश्वास है ।"

  पुस्तक में छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर के तत्कालीन प्राचार्य प्रोफेसर सरयूकांत झा  द्वारा लिखी गई भूमिका के कुछ अंश  इस प्रकार हैं -

*श्री 'वेणु' साकार साधना हैं. इनसे हुई प्रथम भेंट को एक चतुर्थ शती से भी अधिक समय बीत चुका है, पर मैंने इन्हें सदा एक -सा पाया ।जीवन के अतिशय ग्रीष्म के आतप इन्हें झुलसा नहीं पाये और न शीत -लहरों के झोंके इन्हें किसी सुरक्षित स्थान की ओर दौड़ा सके ।सदैव एक रस, शांत! जीवन की कोई निश्चित राह नहीं । कोई बात नहीं, कोई -न -कोई रास्ता तो है । जहाँ तक पृथ्वी है, वहाँ तक चलने वाले व्यक्ति के लिये राह भी है ।कदाचित 'वेणु 'जी का यही विश्वास है ।

*श्री 'वेणु' जी की रचनायें अनंत साधना -पथ को आलोकित करने वाले प्रकाश स्तम्भ हैं । 'श्रुतिकीर्ति ' उनमें से एक है ।निरंतर गतिमान 'वेणु 'जी के काव्य -प्रवाह की अगली सीमा का विश्वास मैंने इनमें पाया है ।कवि मन की सत्याभिव्यक्ति के लिये छटपटाहट मैंने इनमें देखी है ।कवि कोई बड़ी बात कहना चाह रहा है, भाषा अभी उस बात की गहराई को नापने का प्रयास कर रही है ।

* 'श्रुतिकीर्ति ' में अनेक ऐसे स्थल मुझे मिले, जहाँ पहुँचकर पाठक मन अपने में अभिनव कल्पना का स्फुरण पाता है ।वह चिंतन -मनन के लिये विवश हो जाता है । छंदमुक्त सूत्रात्मक शैली में 'वेणु 'जी ने 'श्रुतिकीर्ति ' को लिखा है।मुझे विश्वास है कि सुधी पाठक इसमें मन के विस्तार में प्रवेश पाने का मार्ग अवश्य पायेंगे ।

* अपने सीमित साधन में 'वेणु ' जी जो कुछ करते जा रहे हैं, उस पर हमें बड़ी आस्था है ।उनकी लेखनी अभी चल रही है । मुझे यह आभास मिल रहा है कि कुछ अनुपम, कुछ अनूठा उनके द्वारा निर्मित होने की प्रतीक्षा में है ।*

 

लेकिन अफ़सोस... 'वेणु' जी की इस महत्वपूर्ण कृति के भूमिका -लेखक प्रोफेसर सरयूकांत झा भी  अब इस दुनिया में नहीं हैं और उनकी तरह 'वेणु 'जी की जीवन -यात्रा भी बहुत पहले थम चुकी है। इसलिए 'वेणु 'जी की लेखनी से "कुछ अनुपम, कुछ अनूठा निर्मित होने "  की भूमिका लेखक की प्रतीक्षा अब कभी पूरी नहीं हो पायेगी, लेकिन 'वेणु 'जी की अन्य छपी हुई कृतियाँ हमें ज़रूर उनकी याद दिलाती रहेंगी। 

  उन्होंने मुझे अपने गीत -संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी 'के साथ अपने खण्ड -काव्य 'श्रुतकीर्ति ' की एक सौजन्य प्रति भी 6सितम्बर 1986 के दिन सस्नेह भेंट की थी। इन काव्य -कृतियों से मुझे भी उनकी याद आने लगती है । लगता है कि हमेशा गांधी टोपी और खादी का धोती -कुर्ता पहने, बगल में अपनी किताबों का झोला लटकाए, शहर की सड़कों पर पैदल घूमते हमारे 'वेणु 'जी मुझे भी कहीं न कहीं दिख जाएँगे और मिल जाएँगे ।  लेकिन काश! ऐसा हो पाता! 

      -स्वराज्य करुण 


Saturday, March 14, 2026

( पुस्तक चर्चा )आज़ादी के योद्धाओं की वीर गाथाएँ ; छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर / आलेख -स्वराज्य करुण

       आज़ादी के योद्धाओं की वीर गाथाएँ ;छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर 

                  (आलेख ; स्वराज्य करुण )

छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के लिए  सुशील यदु  आजीवन समर्पित रहे। उन्होंने अपने साहित्यिक मित्रों के सहयोग से वर्ष 1981में रायपुर में छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति की स्थापना की और समिति के कई अधिवेशन तहसील मुख्यालयों और जिला मुख्यालयों में आयोजित किए  ।सुशील यदु की प्रकाशित पुस्तकों में 'लोकरंग' दो भागों में है ।इसमें से पहला भाग छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों पर और दूसरा भाग छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों पर केंद्रित है। सुशील यदु ने 'लोक रंग ' शीर्षक से ही दैनिक 'नवभारत ' में 8 वर्षों तक नियमित रूप से लिखा ।

उनका  छत्तीसगढ़ी व्यंग्य संग्रह 'घोलघोला बिन मंगलू नइ नाचय ' भी काफी चर्चित और प्रशंसित हुआ था ।उनके द्वारा सम्पादित कृतियों में (1)स्वर्गीय हेमनाथ यदु :व्यक्तित्व एवं कृतित्व(2) छत्तीसगढ़ी कविता -संग्रह 'बन फुलवा ' (3) बद्री विशाल परमानंद का गीत -संग्रह 'पिंवरी लिखे तोर भाग ' और स्वर्गीय उधोराम 'झखमार' की हास्य कविताओं का संग्रह 'ररूहा सपनाय दार भात 'भी शामिल है । सुशील व यदु का जन्म 10 जनवरी 1956 को रायपुर में हुआ था और यहीं 23सितम्बर 2017 को उनकी जीवन -यात्रा हमेशा के लिए थम गई ।

                                                

 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इस राज्य के योद्धाओं के योगदान को उन्होंने 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर ' शीर्षक से वर्ष 1989में प्रकाशित अपनी किताब   में कविताओं के रूप में संकलित किया था  ।  छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति रायपुर द्वारा इस पुस्तक के दो संस्करण क्रमशः अगस्त 1989 और नवम्बर 2001में प्रकाशित किए गए थे । यह कवर पेज सहित 60 पेज की है  । मूल्य है 50 रूपए। यह हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्पित छत्तीसगढ़ के वीरों की काव्य गाथा है ।

सुशील यदु के इस छत्तीसगढ़ी कविता -संग्रह में 33 रचनाएँ स्वतंत्रता सेनानियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित हैं, जबकि 34वीं कविता 'बियालिस के आंदोलन ' शीर्षक से है, जिसमें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ़ वर्ष 1942 में हुए भारत छोड़ो आंदोलन में छत्तीसगढ़ के सेनानियों के योगदान को याद किया गया है, वहीं 34वीं और अंतिम कविता 'वंदना गीत ' है, जिसमें भारत माता की वंदना है. छत्तीसगढ़ के जिन स्वतंत्रता सेनानियों की वीरता का वर्णन सुशील यदु ने इस संकलन में किया है उनमें कवि ने सबसे पहले अमर शहीद वीर नारायण सिंह और क्रांतिवीर हनुमान सिंह की संघर्ष गाथाओं को याद किया है  । तीसरी कविता 'सत्रह शहीद साथी ' शीर्षक से है,को 22जनवरी 1858 को रायपुर की सैन्य छावनी में हनुमान सिंह के नेतृत्व में हुए विद्रोह के वीर योद्धाओं को समर्पित है, जिन्हें उनकी देशभक्ति के लिए फाँसी दे दी गई थी । आगामी पन्नों में चौथी रचना उदयपुर (सरगुजा )के क्रांतिवीर शिवराज सिंह, सम्बलपुर (ओड़िशा )के वीर सुरेन्द्र साय को समर्पित की गई है, जबकि छठवीं रचना 'बस्तर विप्लव'में वर्ष 1910 में वहाँ हुए आदिवासी विद्रोह के वीरों का उल्लेख है  । इस विद्रोह को बस्तर के लोकप्रिय राजा रुद्रप्रताप सिंह देव, राजवंश की दीवा पदवी के दावेदार लाल कालेन्द्र सिंह, ग्राम नेतानार के गुण्डाधुर आदि का भरपूर सहयोग मिला था ।ब्रिटिश हुकूमत की गोलिबारी से कई आदिवासी शहीद हो गए थे.इस छंदबद्ध कविता के कुछ अंश देखिए -

   *सन उन्नीस सौ दस साल लड़िन बस्तर के आदिवासी मन,

     विप्लव खातिर हथियार धरिन बस्तर के आदिवासी मन.

     हलबा, भतरा, मुरिया, माड़िया, बड़ शांत, सरल, सीधा -सादा, 

    शोसन, अनीत, अनियाव, अति, उन भड़क गइन अड़बड़ जादा.

    तब गाँव -गाँव जुवाला सुलगिस अउ बस्तर में धधकिस आगी,

    जब रार मचिस विप्लव के, तब जम्मो बस्तर बनगे बागी,*


इस कविता में आगे के एक छंद में बस्तर के निहत्थे बागियों को हथियारबंद फिरंगियों द्वारा गोलियों से भून दिए जाने की घटना की तुलना कवि ने पंजाब के जलियांवाला बाग में हुए हत्याकांड से की है ।

सातवीं कविता छत्तीसगढ़ के गांधी के नाम से लोकप्रिय हुए राजिम के पंडित सुन्दरलाल शर्मा को, आठवीं कविता राजनांदगांव और रायपुर के त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह पर केंद्रित है ।अगले पन्नों में क्रमशः पंडित रविशंकर शुक्ल, शहीद मिन्टू कुम्हार, शहीद रामाधीन गोंड, मौलाना अब्दुल रऊफ 'महवी ', यति यतनलाल, महंत लक्ष्मीनारायण दास और कुंज बिहारी चौबे की गौरव गाथाएँ लिखी गई हैं। इसी कड़ी में 'सिहावा के सिंह -सुखराम नागे' 'बालोद के बाघ -नरसिंह अग्रवाल ', और 'वानर सेना कप्तान -बलिराम 'आज़ाद ' शीर्षक कविताओं में इन वीरों को याद किया गया है।

कवि ने स्वतंत्रता आंदोलन में रायपुर के डॉ. खूबचंद बघेल और धमतरी के बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव सहित नारायण राव मेघावाले और नत्थू राव जगताप के योगदान को भी अपने छंदों में लिपिबद्ध किया है । सुशील यदु की लेखनी ने अपने इस कविता -संग्रह में मदन ठेठवार, बलौदा बाज़ार के राज महंत नैनदास जी, दुर्ग जिले के रामप्रसाद देशमुख,  घनश्याम सिंह गुप्त और विश्वनाथ यादव तामस्कर के सत्याग्रही जीवन को भी अपनी रचनाओं में रेखांकित किया है । 'छत्तीसगढ़ के सुराजी वीरों ' की इन गौरव गाथाओं में शंकर राव गनौदवाले,ग्राम चंदखुरी के अनंत राम बरछिहा,रायपुर के पंडित वामनराव लाखे, यहीं की डॉ. राधाबाई, महासमुन्द तहसील की वीरांगना दयाबाई और अकलतरा (वर्तमान जिला -जांजगीर -चाम्पा )के बैरिस्टर छेदीलाल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भी काव्यात्मक प्रकाश डाला गया है ।

    प्रदेश के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पत्रकार और इतिहासकार स्वर्गीय हरि ठाकुर ने 18मई 1989 को सात पेज में 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर ' की भूमिका लिखी थी । भूमिका की शुरुआत करते हुए वे लिखते हैं - 

-"छत्तीसगढ़ की मिट्टी बड़ी उपजाऊ है । सिंचाई सुविधाओं के अभाव में भी वह धान उपजा सकती है, तो विप्लव के लिए भी उसमें कम उर्वरता नहीं है ।स्वाधीनता के दीर्घकालीन आंदोलन में छत्तीसगढ़ का योगदान, त्याग और बलिदान किसी से कम नहीं है ।प्रस्तुत पुस्तक में श्री सुशील यदु ने ऐसे ही स्वातंत्रय -वीरों की गाथाओं की गूँथकर काव्य -माला तैयार की है ।"

हरि ठाकुर आगे लिखते हैं - त्यागवीर और संघर्षशील पुरुष ही वीर -गाथाओं के नायक होते हैं । किन्तु वीर -गाथाओं के गायक भी किसी नायक से कम नहीं होते ।चंदबरदाई और भूषण इसी श्रेणी के नायक हैं ।छत्तीसगढ़ी लोक -काव्य में वीर गाथाएँ राउतों और देवारों के गीतों में संरक्षित हैं ।वीर काव्य हमें त्याग, बलिदान, निर्भयता और साहस की प्रेरणा देते हैं ।छत्तीसगढ़ के सुराजी वीरों ने स्वतंत्रता के लिए जो संघर्ष किया, उसके पीछे उनका महान त्याग और बलिदान है ।उनके महान चरित्रों का गुणगान ही इस काव्य -कृति का लक्ष्य है ।जो जाति अपने पुरखों के पुरुषार्थ को विस्मृत कर देती है, उसे आत्मग्लानि और हीन भावना का शिकार बनना पड़ता है । अपने महान पुरुषों को स्मरण करने के लिए यह कृति हमें अवसर प्रदान करती है ।

    अपनी लम्बी भूमिका में हरि ठाकुर ने छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुई महत्वपूर्ण क्रांतिकारी घटनाओं का भी उल्लेख किया है ।उन्होंने अंत में लिखा है -"इतिहास को काव्यबद्ध करना आसान काम नहीं है । इस कठिन काम को श्री सुशील यदु ने अंजाम दिया है, वह सराहनीय है ।अपने विषय के प्रति उनका अध्ययन गहरा, दृष्टिकोण स्पष्ट तथा राष्ट्रीयता से ओत -प्रोत है । छत्तीसगढ़ी में अपने ढंग का यह पहला प्रयास है ।मुझे विश्वास है कि अन्य कवि भी इस दिशा में आगे आयेंगे और काव्य के सुरुचिपूर्ण माध्यम से अपने गौरवपूर्ण इतिहास को अमरत्व प्रदान करेंगे ।" हरि ठाकुर ने भूमिका में सुशील यदु को उनकी काव्य प्रतिभा और उत्कृष्ट विषय चयन के लिए बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की थी, लेकिन अफ़सोस कि वे दोनों ही हमारे बीच नहीं हैं ।

  सुशील यदु की काव्य -कृति 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर ' में 'दू शब्द ' शीर्षक से स्वर्गीय ललित मोहन श्रीवास्तव के विचार भी प्रकाशित हैं । उन्होंने लिखा था -"इस छत्तीसगढ़ी काव्य गाथा की भूमिका हम सबके परिचित भाई हरि ठाकुर ने लिखी है उन्होंने लिखा था -"इस छत्तीसगढ़ी 'काव्य गाथा ' की भूमिका हम सबके परिचित भाई हरि ठाकुर ने लिखी है । यह भूमिका इस पुस्तक की कुंजी है, जो इस क्षेत्र के स्वातंत्रय -समर के इतिहास में हमें 'प्रवेश 'दिलाती है  ।  1947 के उपरांत जन्मी पीढ़ी को यह भूमिका वह सब याद दिलाजीव, जो वह भूलती जा रही है  ।इसके बाद आती है श्री सुशील यदु की अपनी बात  ।स्वाधीनता संग्राम के इतिहास की जानकारियों के लिये श्री हरि ठाकुर उनके प्रमुख प्रेरणा स्रोत रहे  ।सुशील यदु का अपना योगदान स्वतन्त्रता संग्रामियों के पद्यात्मक प्रस्तुतिकरण में है ।जाहिर है कि ऐसे प्रयास में कुछ योद्धा (जैसे नगरी के श्याम लाल सोम )छूट जा सकते हैं  ।किन्तु लेखक ने अधिकांश स्वतंत्रता सेनानियों के साथ न्याय किया है  ।प्रथम प्रयास की दृष्टि से यह इस पुस्तक की उपलब्धि है । मैं सुशील यदु को बधाई देना चाहता हूँ कि उन्होंने मिन्दू कुम्हार, रामाधीन गोंड जैसे उपेक्षित नामों को शीर्षकों में जगह दी"

   आज सुशील यदु इस दुनिया में मौज़ूद नहीं हैं, हरि ठाकुर और ललित मोहन श्रीवास्तव भी इस भौतिक संसार से जा चुके हैं, लेकिन इस कृति में उनका लिखा हुआ बहुत कुछ हमारे सामने है, जिसे पढ़कर हमें उनकी याद आती रहेगी  ।  इन तीनों सरस्वती -पुत्रों को विनम्र नमन  ।  बहुत पहले ही 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर 'भी अपनी -अपनी यादगार भूमिकाएँ निभा कर इस धरती को छोड़ चुके हैं । उन वीरों को भी विनम्र श्रद्धांजलि  ।  सुशील यदु ने इसी शीर्षक की अपनी इस काव्य -कृति में उनसे जुड़ी स्मृतियों को हमसे जोड़कर रखने का सार्थक प्रयास किया है   ।   किसी भी देश या प्रदेश के इतिहास और साहित्य को, वहाँ की संस्कृति को हमेशा याद रखने के लिए ऐसा रचनात्मक प्रयास बहुत महत्वपूर्ण होते हैं  ।

-स्वराज्य करुण 

Tuesday, March 10, 2026

(कविता ) बोलो, तानाशाह ! तुम कब मरोगे (कवि -स्वराज्य करुण )

 बोलो तानाशाह ! तुम कब मरोगे ?

 (कविता : स्वराज्य करुण )

        *****

जब मरोगे तब 

कितनी ज़मीन, कितने जंगल 

कितनी नदियाँ, कितने पहाड़ 

कितनी खदानें और कितने 

देश अपने साथ लेकर 

दुनिया से जाओगे?

बोलो,  तानाशाह!

क्या  तुम्हें शर्म नहीं आती ,

जो निरीह ,निःशस्त्र मनुष्यों की हत्या 

करवाके भी बड़ी बेशर्मी से  

अपनी पथराई आँखों और 

ख़ून के प्यासे होठों  से

मुस्कुराते रहते हो ? 

तुम्हारी सेनाएं छोटे -छोटे देशों के 

शहरों ,कस्बों और गाँवों पर बमों की 

बरसात करके मासूम बच्चों को

अनाथ कर जाती हैं ।

हवाई हमलों के जरिए 

चहल -पहल से भरी मानव बस्तियों 

को बदल देती हैं श्मशानों में!

तुम्हारे सैनिक आकाश मार्ग से

जमीन पर उतरकर तुम्हारे आदेश पर 

महिलाओं ,बच्चों ,जवानों और 

बुजुर्गों को बेरहमी से मार डालते हैं! 

वो जब मनुष्यों पर इतना ज़ुल्म ढाते हैं 

तो फिर वहाँ उनके जुल्मों के 

आगे  मूक ,निरीह जानवरों ,

चहकते पंछियों और 

हरे भरे वृक्षों , जल से भरी नदियों , 

का क्रंदन कौन सुनेगा ?

तुम्हारे हमलावर फौजियों के 

खूनी पंजों में छटपटाती 

प्रकृति का रुदन कौन सुनेगा ?

तानाशाह फिर भी अपने 

वातानुकूलित 'वार रूम ' में 

बैठ कर तबाही के खूनी नज़ारों को , 

कत्ल होती इंसानियत को 

ठंडी हवाओं के बीच

शराब की चुस्कियों के साथ 

रुपहले स्क्रीन पर देखते हुए 

मुस्कुराते रहते हो,

नाचते, गाते, मस्ती करते रहते हो !

बमों के धमाकों और बारूद से 

भरे आसमान को देखकर भी 

नहीं दहलता तुम्हारा दिल !

रोते बिलखते बच्चों और

बदहवास माताओं को स्क्रीन पर 

देखकर भी नहीं पसीजता तुम्हारा दिल !

बोलो तानाशाह !

क्या तानाशाहों को 

कभी रोना नहीं आता ? 

क्या तानाशाहों के माँ -बाप,

बीवी -बच्चे,भाई -बहन और 

घर -परिवार नहीं होते?

दुनिया से इंसानी ज़िन्दगी को  

मिटाने पर आमादा तानाशाह ! 

क्या तुम्हें आत्मग्लानि नहीं होती ?

तुम्हें तो शर्म से और पीड़ितों की 

आहों से मर जाना चाहिए !

बोलो ,तानाशाह!तुम कब मरोगे ?

जल्दी मरो...!

हम तुम्हारी मौत की कामना करते हैं।

-- स्वराज्य करुण

Sunday, March 8, 2026

(आलेख )भूले -बिसरे कवि वेणु जी से जुड़ी कुछ यादें /लेखक -स्वराज्य करुण

 'तुम वीणा मैं बांसुरी' और 'श्रुति कीर्ति' 

 जैसी कई कृतियों के रचनाकार थे वेणु जी 

       आलेख  - स्वराज्य करुण 

क्या आप रूपनारायण वर्मा 'वेणु 'को जानते हैं? छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बिरादरी में नई पीढ़ी के अधिकांश कवियों और साहित्यिक अभिरुचि के लोगों ने उनका नाम भी शायद नहीं सुना होगा । वे बहुत सहज -सरल और सौम्य स्वभाव के कवि थे । रायपुर में आज से 105 साल पहले,वर्ष 1921में जन्मे थे । यहीं उनकी साहित्य -साधना 1935 में शुरु हुई थी । आजीवन रायपुर में रहकर ही उन्होंने काव्य सृजन किया। उनकी कई कृतियाँ प्रकाशित हुईं. शहर के साहित्यिक आयोजनों में भी वे शामिल होते थे। उन दिनों शहर इतना अधिक फैला हुआ नहीं था । सड़कों पर आज की तरह लोगों की और तरह -तरह की तेज रफ्तार मोटर गाड़ियों की भयंकर भीड़ नहीं होती थी। 

सड़कें चौड़ी भले ही कम थी, लेकिन खुली -खुली -सी लगती थीं।लोग एक मोहल्ले से दूसरे या तीसरे मोहल्ले तक बड़े आराम से साइकिलों पर या पैदल ही आया -जाया करते थे।मुझे कुछ -कुछ याद है,नाटे कद के वेणु जी गांधी टोपी और खादी का धोती -कुर्ता पहनकर पैदल ही  शहर का भ्रमण करते हुए अपने मित्रों और परिचितों से बड़ी आत्मीयता से मिलते थे।वे पैदल ही स्थानीय दैनिक अख़बारों के दफ्तरों में जाकर सम्पादकों को अपनी कविताएँ दे आते थे। स्थानीय वरिष्ठ जनों में भी उनका बड़ा सम्मान था, लेकिन समय की तेज रफ़्तार ने उन्हें भुला दिया ।


                                             


ऐसे समर्पित साहित्य साधक,  भूले -बिसरे कवि रूपनारायण वर्मा 'वेणु ' के 52 छोटे -बड़े गीतों का संकलन 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' का प्रकाशन 41साल पहले विजयादशमी के दिन 23अक्टूबर 1985 को हुआ था। उन्होंने  6 सितम्बर 1986 के दिन मुझे यह किताब और  अपने खण्ड काव्य 'श्रुतिकीर्ति 'की एक सौजन्य प्रति भी सस्नेह अपने हस्ताक्षर के साथ भेंट की थी । इस खण्ड काव्य के अंतिम आवरण पृष्ठ पर वेणु जी के फोटो के साथ उनका साहित्यिक परिचय भी प्रकाशित हुआ है ।सूक्तियों और लघु कथाओं का उनका संकलन 'ज्योति निर्झर'  वर्ष 1971 में प्रकाशित हुआ. यह उनकी पहली प्रकाशित कृति थी, जिसे नागपुर के धनवटे चेम्बर्स, सीतावर्डी स्थित विश्व भारती प्रकाशन ने प्रकाशित किया था।

उनकी दूसरी कृति ' सहस्त्र सुमन ' वर्ष 1981 में छपी , जिसके प्रकाशक वे स्वयं थे ।

वेणु जी की तीसरी पुस्तक खण्ड काव्य 'श्रुति कीर्ति 'का प्रकाशन वर्ष 1982 में हुआ, जिसके प्रकाशक गणेशराम नगर, रायपुर के डॉ.लक्ष्मण बजाज थे।कवि ने इसे भाव प्रधान काव्य के रूप में लिखा है। उनके परिचय में इसे  खण्ड -काव्य भी बताया गया है, जो भगवान श्रीराम के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न की धर्मपत्नी श्रुतिकीर्ति पर केंद्रित है और मुक्त छन्द में है. उस पर फिर कभी  अलग से लिखूँगा ।अभी तो वेणु जी के गीत -संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' की चर्चा करना चाहता हूँ ।

     वेणु जी ने अपना यह गीत -संग्रह  गुरुदेव  रवीन्द्र नाथ ठाकुर की पावन स्मृति को समर्पित किया है।   इस गीत -संकलन के प्रकाशक, प्रचारक और वितरक 'वेणु' जी के मित्र गणेशराम नगर, रायपुर के डॉ. लक्ष्मण बजाज थे । यह पुस्तक 60 पेज की है । उन दिनों इसकी कीमत केवल छह रूपए थी । 

    

  *वेणुजी रस सिद्ध कवि थे* 

                     ******

     उनके इस गीत -संकलन  में 'पुरोवाच ' लिखा है पीएच -डी. और डी. लिट. की उपाधि प्राप्त डॉ. विष्णुप्रसाद पाण्डेय ने,  जो  उन दिनों शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, दुर्ग में हिन्दी के प्राध्यापक हुआ करते थे। उन्होंने  लिखा है -"वेणु जी ने छायावादी रोमांटिक कविता के माध्यम से साहित्य -संसार में प्रवेश किया और प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, रहस्यवाद तथा मांसलवाद की धाराओं में अपनी कविता का ताना -बाना बुनते आ रहे हैं ।.... वेणु जी में जनजीवन की ज्योति का चितेरापन है। उनके अन्तः करण में भावमयी सरिता की स्नातकता है ।.... वेणु जी रस सिद्ध कवि हैं।वेणु जी की इन कविताओं में जान है और वे उदात्त संरचनाओं की परम्परा की रक्षा करती हैं । 

        *मैं अपना परिचय क्या दूँ?*

         गीत -संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' में अपने परिचय के अंतर्गत वेणु जी लिखते हैं -

    "मैं अपना परिचय क्या दूँ ? मैं उस वीणा वादिनी की वीणा का तार हूँ, जिसमें जीवन के स्वर निकलते हैं।तुम उस युग की वंशी हो, जिसमें कई छिद्र हैं। उस जगत जननी भगवती माँ भारती की सेवा का ही प्रत्यक्ष फल है, जो मैं आप लोगों के बीच रहकर प्रति वर्ष उस कल्याणी माँ को एक पुष्प चढ़ाता हूँ, जिसके रजकण के प्रताप से मेरे  निरगंध फूल सुरभित हो उठते हैं ।....कवि  लिखते हैं -मेरे जीवन की अंतिम इच्छा यह है कि मेरे जीते जी मेरी सभी कृतियाँ प्रकाश में आ जाएँ।भारतीय परम्परा के अनुसार जीवित व्यक्ति का मूल्यांकन बहुत कम होता है, लोग मृत्यु होने की बाट देखते रहते हैं ।मेरी कृतियाँ मेरी हृदयतंत्री की आवाज़ है, जिसमें जीवन के सूक्ष्म तत्वों के दर्शन होंगे । वीणा बजाने वाला कुशल होना चाहिए । हे जगत नियन्ता! तुम वीणा हो और मैं श्याम सुन्दर की हूँ वेणु, जिसमें गोपियाँ तथा गोप भी हृदय तंत्री निहित हैं ।' तुम वीणा मैं बांसुरी' मानव जीवन को विकसित करने में समर्थ होगी, ऐसा पूर्ण विश्वास है ।   

-विनयावत -रूपनारायण वर्मा वेणु "

 वहीं ' उन्होंने स्वयं को 'माँ भारती के कंठहार का पुष्प' बताते हुए 'आत्म निवेदन ' शीर्षक एक अन्य वक्तव्य में लिखा है -"उस वीणा वादिनी के श्रीचरणों से सुवासित 'तुम वीणा मैं बांसुरी '(भाव प्रधान गीत संकलन )रख रहा हूँ, जिसमें जीवन के तथ्य एवं सूक्ष्म तत्वों पर विचार किया गया है ।  मेरी इस भाव प्रधान कृति में जीवन दर्शन और प्रकृति सौन्दर्य के सूक्ष्म तत्व विद्यमान हैं । उन्होंने इस पुस्तक में भूमिका लेखन के लिए डॉ. विष्णु प्रसाद पाण्डेय, परिचय लेखन के लिए प्रतिभा गुप्ता, सम्मति लेखन के लिए प्रतिभा तिवारी, आवरण और चित्र सज्जा के लिए अपने मित्र दीनदयाल सोनी सहित सभी सहयोगियों और मार्ग प्रदर्शक साहित्यकारों के प्रति आभार व्यक्त किया है ।

   बहरहाल, अब हम वेणुजी के इस गीत -संकलन में प्रकाशित  रचनाओं को देखें । इनमें कवि ने अपने मनोभावों के जरिए आशा -निराशा और हर्ष -विषाद सहित मानव जीवन के अनेक रंगों का समावेश किया है ।उनका पहला गीत 'वीणा वादिनी 'शीर्षक से देवी सरस्वती को समर्पित है । 

पृष्ठ 2पर प्रकाशित उनके दूसरे गीत में छायावादी स्वर की अनुगूंज है -

*मैं तुम्हारा दीप बनकर जल रहा हूँ । 

  निशा जाती मुझको लेकर,

  मैं तड़फता तुमको देखकर,

  तुम चले हो अस्ताचल को,

  मैं भी बुझता जा रहा हूँ । *


आगे की रचनाओं में से एक आज के समाज में व्याप्त नारी -उत्पीड़न और भूख से तड़फते इंसानों को लेकर है. इन गंभीर समस्याओं से आहत वेणु जी का कवि -हृदय अपने  संकलन के पृष्ठ 3पर कहता है -

     *मानव मिला न अब तक कोई 

       जो मानव कहलाए । 

       एक नारी की लाज लुट रही,

       एक खड़ी मुस्काये । 

       हँस -हँस फूल लुटाये साजन,

       एक पड़ा कुम्हलाये । 

       एक दारुण दुःख से तड़फे,

       एक खड़ा मुस्काये । 

        एक तरसता दाने -दाने,

       एक अन्न को ठुकराये । 

        जो जग की आँखों का काँटा था,

        वह फूल बन मुस्काये । 


संकलन के पृष्ठ 16 में एक छोटा -सा गीत हमें जीवन के संघर्षो को, दुःख -दर्दो को हँसते हुए झेल जाने की सीख देता है -

    *मैंने तो हँसना सीखा है । 

     दुःख -दर्दों को झेल -झेल कर 

      आगे बढ़ना सीखा है । 

      आई आँधी मुझे गिराने 

     आया शीत मुझे कँपाने,

     गिर -गिर उठना सीखा है ।* 

  

वेणु जी का कवि इस संसार को छल से भरा मानता है । पृष्ठ 19 में प्रकाशित गीत में यह भावना प्रकट होती है -

*छल भरा संसार तेरा,

 रूप में छल, मृत्यु में छल,

 जीवन हो गया मेरा गरल,

  दुःख भरा संसार तेरा । 

 मैं तुम्हारे रूप में मिल रहा हूँ,

 मैं तुम्हारी याद में घुल रहा हूँ,

  छल भरा अभिसार तेरा । 


गीत संग्रह के पृष्ठ 17 में छपी अपनी रचना में कवि की भावनाओं को महसूस कीजिए -

   * तुम मुझे पाषण रहने दो । 

    मुझे जीवन न दो,

     मुझे सूरत न दो,

    मेरा अभिमान रहने दो । 

    मेरा संसार है मंगल,

    मेरा व्यवहार है उज्ज्वल,

    मेरी वाणी है निश्छल,

   उसे तुम रस में भरने दो । 

    तुम्हारे प्यार में छल है,

    तुम्हारा जीवन छलमय है,

    मुझे तुम दूर रहने दो । 

     मुझे वरदान नहीं होना,

     मुझे श्रृंगार नहीं होना,

     मैं उस रूप का अनुगामी,

    मुझे तुम उसमें मिलने दो । *


संकलन के पृष्ठ 28 में 'गोस्वामी तुलसीदास जी के प्रति' और पृष्ठ 30 में  महाकवि 'निराला 'जी के प्रति ' शीर्षक गीत में दोनों महाकवियों के सम्मान में वेणु जी ने अपनी भावनाएँ व्यक्त की हैं । पृष्ठ 33 में  'बसंत के प्रति 'शीर्षक से प्रकाशित गीत में विरह वेदना से पीड़ित नायिका बसंत के वातावरण में अपनी सखी से बातचीत करते हुए अपनी मनोव्यथा प्रकट करती है  । इस गीत का प्रारंभिक अंश -

*नभ में लाली क्यों दौड़ रही,

बताओ सखी मुझको आकर,

मैं दिन -रात सुखूं हे आली,

वे आये न अपने निज गृह पर । 

सखी बोली -सुन हे तू प्यारी,

है जंगल में ऋतु बसंत,

चंदा जो हँसता आज यहाँ,

वह भी भूला है राग -रंग  । *


वेणु जी पृष्ठ 35 पर प्रकाशित  अपने 40 वें गीत में हताश -निराश मनुष्य का मनोबल बढ़ाते हुए कहते हैं -

  *अमृत पुत्र होकर भी तुम 

     क्यों अंगारों से डरते हो । 

     कितने युद्ध तुम देख चुके,

     कितने देखोगे जीवन में  । 

     कितने कंटक पथ पार किये,

     कितनी विपदा आई मग में  । 

     मैं उसी भस्म का बना हुआ,

     जिसको शिव रोज चढ़ाते हैं  । 

     मरघट में खुशी मनाते हैं,

    तुम उसी शिवा के अग्नि नेत्र,

    फिर क्यों उनसे डरते हो  । *


कवि रूपनारायण वर्मा 'वेणु ' के गीत आकाशवाणी रायपुर से भी प्रसारित हुए थे।समय -समय पर अनेक पत्र -पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें दैनिक नवभारत, नईदुनिया,देशबन्धु, युगधर्म, महाकोशल, अक्षत, मध्यप्रदेश संदेश, आयुर्वेद -विकास, धन्वंतरि, सुधा निधि, आयुर्वेद महासम्मेलन पत्रिका आदि शामिल हैं, जिनमें उनके गीतों, लघु कथाओं और लेखों का प्रकाशन हुआ।आयुर्वेद से संबंधित पत्रिकाओं में उनकी रचनाओं के प्रकाशन से ऐसा लगता है कि देश की इस अत्यंत प्राचीन चिकित्सा पद्धति में भी उनकी गहरी दिलचस्पी रही होगी, हालांकि इस बारे में उनसे पूछने का मौका मुझे नहीं मिला।

   छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बिरादरी  उम्मीद की जानी चाहिए कि वह अपने भूले -बिसरे कवि वेणु जी को याद रखने के लिए उनकी अप्रकाशित रचनाओं की खोज -ख़बर लेकर उन्हें प्रकाशित करने का प्रयास करेगी।जो समाज अपने साहित्यकारों को और उनके साहित्य को याद रखता है, उस समाज की मानवीय संवेदनाएँ भी बनी रहती हैं और सामाजिक समरसता के साथ उसकी संस्कृति भी सुरक्षित रहती है।

-स्वराज्य करुण 

Saturday, March 7, 2026

(आलेख ) श्री राम चरित मानस के 'अरण्य काण्ड ' और 'सुन्दर काण्ड 'का हुआ उड़िया अनुवाद /लेखक -स्वराज्य करुण )

 

छत्तीसगढ़ के बाबा विष्णु शरण 65 साल पहले 

कर चुके थे  उड़िया भाषा में सम्पूर्ण 'मानस 'का अनुवाद 

           (आलेख  -स्वराज्य करुण )

गोस्वामी तुलसीदास के अवधी में रचित महाकाव्य श्रीरामचरित मानस की लोकप्रियता बहुत दूर तक फैली हुई है. छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार स्वर्गीय बाबा विष्णु शरण ने इस महाकाव्य के तृतीय सोपान 'अरण्य काण्ड ' और पंचम सोपान 'सुन्दर काण्ड ' का ओड़िया भाषा में अनुवाद किया था, जो उनके निधन के लगभग 37 साल बाद वर्ष 2024 में प्रकाशित हुआ. दोनों अनुवाद देवनागरी लिपि में छपे हैं. वैसे तो बाबा विष्णु शरण ने आज से 65 साल पहले वर्ष 1961में श्री रामचरित मानस का उड़िया में शाब्दिक अनुवाद कर लिया था, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के कारण प्रकाशन संभव नहीं हो पा रहा था.

                              

               


इसमें से इन दो सोपानों को बसना (जिला -महासमुन्द )स्थित मानव मंगल संस्थान ने प्रकाशित किया है.बाबा के प्रमुख शिष्य और संस्थान के अध्यक्ष नारायण प्रसाद नैरोजी ने दोनों पुस्तकों में 'दो शब्द ' शीर्षक अपने वक्तव्य में लिखा है कि बसना क्षेत्र से बाबा (विष्णु शरण जी )का विशेष लगाव रहा, बाबा ने इस क्षेत्र की उड़िया भाषा भाषी जनता को श्रीमद गोस्वामी तुलसीदास विरचित रामचरित मानस के जीवन दर्शन, भक्ति और ज्ञान से लाभान्वित करने के लिए उड़िया भाषा में सन 1961में उसका शब्दशःछन्दबद्ध अनुवाद किया था, जिसे प्रकाशित कर आम जनता में वितरित करनाचाहते थे.परन्तु अर्थाभाव के कारण यह संभव नहीं हो सका. अब उनकी स्मृति में स्थापित मानव मंगल संस्थान, बसना द्वारा छत्तीसगढ़ सर्व उड़िया समाज के अध्यक्ष एवं रायपुर उत्तर के विधायक श्री पुरन्दर मिश्रा जी के सौजन्य से सिर्फ़ ' सुन्दर काण्ड ' का प्रकाशन किया जा रहा है. हमें विश्वास है कि उड़िया भाषा भाषी भक्तगण इसे गाकर, पाठ कर हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त कर सकेंगे. इसी कड़ी में 'अरण्य काण्ड' में ' दो शब्द 'शीर्षक अपने वक्तव्य में श्री नैरोजी ने लिखा है कि डॉ. संध्या राजेन्द्र राघवेन्द्र भोई, सरायपाली तथा नैरोजी परिवार, देवरी (पिलवापाली )एवं गणेशपुर के सौजन्य से सिर्फ़ 'अरण्य काण्ड ' का प्रकाशन किया जा रहा है. हमें विश्वास है कि उड़िया भाषा भाषी भक्तगण इसे गाकर, पाठकर भक्ति पथ पर अग्रसर होंगे.

         

                                                     



                                     *कवि, लेखक और पत्रकार भी रहे विष्णु शरण*

                                                     *****

      उल्लेखनीय है कि बाबा विष्णु शरण छत्तीसगढ़ के धीर -गंभीर सर्वोदयी विचारक,अध्यापक, वरिष्ठ कवि,लेखक और पत्रकार थे. उनका जन्म बसना क्षेत्र के ग्राम पझरापाली में 19 सितम्बर 1919 को हुआ था. अपनी 69 वर्षीय जीवन यात्रा को अपने साधना कुटीर बसना में 7नवम्बर 1988 को पूर्ण विराम देकर वे ब्रम्हलीन हो गए .  उनके हिन्दी कविता संग्रहों में वर्ष 1986 में प्रकाशित 'पंचविंशिका', वर्ष 1988में प्रकाशित 'युगे -युगे ' और ' प्राणाधिके' शामिल है. इन तीनों संग्रहों के प्रकाशक श्री गोपेश्वर प्रसाद नैरोजी हैं.बाबा विष्णु शरण के देहावसान के कुछ महीनों बाद मई 1989 में 'यमुना तीरे 'का प्रकाशन हुआ, जबकि 35 साल बाद वर्ष 2023 में उनका एक और हिन्दी कविता -संग्रह 'धीर -समीरे ' वैभव प्रकाशन, रायपुर द्वारा प्रकाशित किया गया.बाबा जी के गहन दार्शनिक और आध्यात्मिक आलेखों के संकलन 'ज्ञान गंगा ' का प्रकाशन  उनके निधन के करीब 5साल बाद सितम्बर 1993 में मानव मंगल साधना संस्थान, बसना द्वारा किया गया. इसमें प्रकाशित जीवन परिचय में उनके शिष्य नारायण प्रसाद नैरोजी ने बताया  है कि बाबा विष्णु शरण वैष्णव वंशी थे. उनके पिता भरत दास उड़िया भाषा के कुशल कवि और हिन्दी साहित्य के विदग्ध मर्मज्ञ थे. अनुताप तरंग, गौर संकीर्तन, मंगलास्तव, संबलेश्वरी जणाण, कृष्ण -सुदामा पांडवंकर भातृ -प्रेम आदि उड़िया में इनकी जन -प्रिय पुस्तकें हैं. 

      हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से साहित्य रत्न की उपाधि प्राप्त बाबा विष्णु शरण रायपुर के शासकीय नार्मल स्कूल में अध्यापक भी रहे. उन्हें   महात्मा गांधी की बुनियादी शिक्षा योजना का रायपुर जिला संयोजक भी बनाया गया था. अध्यापन कार्य के प्रशिक्षण के लिए वे गांधीजी के सेवाग्राम वर्धा में भी रहे, जहाँ महात्मा गांधी के जीवन -दर्शन का उन पर गहरा असर हुआ. सेवाग्राम में उन्हें महात्मा गांधी सहित दादा कृपलानी, आर्य नायकम, कुमारप्पा आदि कई विद्वानों का भी सानिध्य मिला. 

         बाबा विष्णु शरण ने रायपुर में वर्ष 1950 में  ठाकुर प्यारेलाल सिंह  के अर्ध -साप्ताहिक 'राष्ट्रबन्धु' में सहयोगी सम्पादक के रूप में पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपनी अहम भूमिका निभाई. वर्ष 1959 -60 में बाबा विष्णु शरण को रायपुर जिला सर्वोदय मंडल का जिला संयोजक बनाया गया. इस महत्वपूर्ण दायित्व का भी उन्होंने बखूबी निर्वहन किया. उनकी लोकप्रियता सिर्फ़ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं थी, बल्कि मध्यप्रदेश के इंदौर, उज्जैन और सोनकच्छ तक उनकी प्रसिद्धि का विस्तार हुआ.उनके कविता -संग्रहों 'प्राणाधि के ' और 'युगे -युगे ' का लोकार्पण 21 मई 1988 को इंदौर में हुआ. लोकार्पण समारोह विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के हिन्दी विभाग और हिन्दी साहित्य समिति इंदौर द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था.बाबाजी अपने शिष्यों के आग्रह पर 29 नवम्बर 1986 से 16 जनवरी 1987 तक इंदौर प्रवास पर थे. इस दौरान उनके प्रथम कविता -संग्रह 'पंचविंशिका'का लोकार्पण हिन्दी विभाग,विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के सौजन्य से सम्पन्न हुआ.

   छत्तीसगढ़ का बसना उनका कार्यक्षेत्र रहा.  वे बसना के अपने 'साधना कुटीर ' में  आम जनता की समस्याओं को सुनकर उन्हें हल करने के लिए मार्ग दर्शन देते हुए मददगार की भूमिका में भी रहते थे. उनका साहित्य सृजन भी इसी 'साधना कुटीर ' में चलता रहता था, जो आज भी उनके चाहने वालों के लिए आस्था का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है.

      -स्वराज करुण


Thursday, March 5, 2026

(कविता ) यह कोई देशभक्ति नहीं / कवि -स्वराज्य करुण

 यह कोई देशभक्ति नहीं 

  ************

( स्वराज करुण )

हम और आप मनाते रहे 

रंगों का त्यौहार होली 

और उधर कोई ख़ून की होली 

खेल कर उजाड़ता रहा 

हम जैसे करोड़ों लोगों की 

रंग -बिरंगी ज़िन्दगी.

हमसे बहुत दूर उस देश की

धरती पर सिसकती रही मानवता 

बिलखती रही माताएँ,

बिलखती रही बहनें,

बिलखते रहे पिता.

जलते रहे मकान,

जलती रही बस्तियाँ. 

युद्ध ने उजाड़ा करोड़ों लोगों 

का जीवन. 

इसलिए तो कह रहा हूँ,

किसी दूसरे देश पर जबरन 

हमला कोई देशभक्ति नहीं है,

मानवता के खिलाफ़ अपराध है.

इसीलिए तो कह रहा हूँ...

हो सके तो 

इतना ज़रूर करना, 

उन परमाणु बमों को 

नष्ट कर देना, जिनसे 

हमारी इस हरी -भरी 

धरती और उस पर 

रंग -बिरंगे फूलों की तरह 

खिलते जन -जीवन के 

हमेशा के लिए नष्ट हो 

जाने का खतरा है, 

नष्ट हो भी रहा है.

हो सके तो रोक लेना 

उस  बेरहम युद्ध को, जो 

स्कूलों और अस्पतालों पर 

बम बरसा रहा है.

हो सके तो याद कर लेना 

ईरान की उन 165 नन्हीं बेटियों को 

जो गईं थीं स्कूल 

कुछ सीखने और अपनी 

ज़िन्दगी संवारने का 

सपना लिए, लेकिन

फिर कभी घर नहीं लौट पाईं 

अपने सपनों के साथ. 

उनके स्कूल पर हुआ हमला 

उनके मासूम सपनों पर आक्रमण था.

नष्ट कर देना इंसानियत के दुश्मन 

उन घातक बमों को,

जिनसे फिर न झुलसे कोई 

हिरोशिमा और कोई नागासाकी,

घायल न हों किसी बच्चे के,

किसी बेटी के फूलों जैसे कोमल सपने.

हो सके तो 

नष्ट कर देना उन वैक्यूम बमों को 

जिनसे भाप बनाकर

उड़ा दिए गए गज़ा पट्टी 

के हजारों इंसान.

नष्ट कर देना उन 

निर्मम हृदयों के पथरीले 

इरादों को, जिन्होंने 

इंसानियत के खिलाफ़ युद्ध में उजाड़ा 

इराक, अफगानिस्तान,

सीरिया और फिलिस्तीन सहित 

और भी कई देशों को, 

तबाह कर दी

वहाँ के लोगों की ज़िन्दगी.

हो सके तो नष्ट कर देना 

उन प्रयोग शालाओं को 

जहाँ बनते हैं मानवता को 

मटियामेट करने के इरादे से 

ऐसे घातक हथियार,

बनती हैं  दरिंदगी करने वाली 

मिसाइलें,

हो सके तो नष्ट 

कर देना  उन बेरहम दिमागों को,

जिनमें जन्म लेते हैं 

पृथ्वी को नष्ट करने के 

विनाशकारी इरादे, 

जिनमें पैदा होते हैं 

ऐसे घातक हथियार बनाने के विचार 

हो सके तो 

नष्ट कर देना उन हाथों को 

जो बनाते हैं मानवता के खिलाफ़ 

ऐसे हथियार.

इन सबके नष्ट होने पर ही 

बची रहेगी हमारी धरती,

बचे रहेंगे हम और तुम 

और हमारे जैसे 

करोड़ों -अरबों इंसान

एक खुशनुमा ज़िन्दगी के लिए.

     -स्वराज्य करुण


Saturday, February 28, 2026

(आलेख )अलविदा भाई सुशील भोले.../लेखक -स्वराज्य करुण

 अलविदा भाई सुशील भोले 

       ********

छत्तीसगढ़ी भाषा के जाने -माने कवि, चिंतक, लेखक और पत्रकार, सबके चहेते भाई सुशील भोले अत्यंत शोकाकुल वातावरण में पंचतत्व में विलीन हो गए । कल 27 फरवरी 2026 को पूर्वान्ह राजधानी रायपुर के मारवाड़ी श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार हुआ । ज्ञातव्य है कि  स्वर्गीय सुशील भोले स्थानीय संजय नगर (टिकरा पारा ) के निवासी थे । उनका 26 फरवरी 2026 को रायपुर शहर के एक अस्पताल में  निधन हो गया था ।उन्हें अंतिम विदाई देने  उनके परिजनों सहित बड़ी संख्या में नागरिक और अनेक साहित्यकार और पत्रकार श्मशान घाट पहुँचे । शोक सभा में दिवंगत आत्मा के सम्मान में दो मिनट का मौन धारण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई । लोगों ने छत्तीसगढ़ी साहित्य को समृद्ध बनाने में उनके लगभग चार दशकों के सुदीर्घ योगदान को याद  करते हुए उनसे जुड़ी अपनी स्मृतियों को साझा किया ।


                                                  


अंतिम संस्कार में पहुँचे लोगों में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा, साप्ताहिक 'छत्तीसगढ़ी सेवक' रायपुर के पूर्व सम्पादक जागेश्वर प्रसाद,खेतिहर मजदूर किसान मोर्चा के छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष ठाकुर रामगुलाम सिंह तथा वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार ग़ुलाल वर्मा, परमानंद वर्मा,स्वराज्य करुण,  रसिक बिहारी अवधिया,सुखदेवराम साहू 'सरस ' छत्तीसगढ़ी फिल्मों के निर्माता और अभिनेता चन्द्रशेखर चकोर और राजिम के साहित्यकार दिनेश चौहान सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन शामिल थे ।

    उल्लेखनीय है कि कवि, लेखक और पत्रकार के रूप में स्वर्गीय सुशील भोले छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के विकास के लिए विगत लगभग चालीस वर्षों से सक्रिय थे।कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ की महान विभूतियों से जुड़े संस्मरणों  पर आधारित उनकी पुस्तक 'सुरता के संसार 'भी काफी चर्चित और प्रशंसित हुई थी।इसमें उनके 39 छत्तीसगढ़ी आलेख शामिल हैं । सुशील भोले (पूर्व नाम -सुशील वर्मा ) ने  दिसम्बर  1987 में छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका ' मयारू माटी ' का सम्पादन और प्रकाशन शुरु किया था । आर्थिक कठिनाइयों के कारण इसके 13 अंक ही प्रकाशित हो पाए। वर्ष 1989 में  उनके काव्य संग्रह 'छितका कुरिया ' और वर्ष 2009 में छत्तीसगढ़ी कहानी -संग्रह 'ढेंकी' का प्रकाशन हुआ । सुशील भोले की अन्य छत्तीसगढ़ी कविता -पुस्तकों में 'दरस के साध' और 'जिनगी के रंग' भी उल्लेखनीय हैं। मूल संस्कृति पर आधारित उनका आलेख -संग्रह 'आखर अंजोर' भी खूब चर्चित हुआ था । वर्ष 2018 के माह नवम्बर में उन्हें पक्षाघात हो गया था, लेकिन वे इस गंभीर शारीरिक समस्या का हिम्मत के साथ मुकाबला करते हुए निरंतर साहित्य सृजन में लगे रहे।मेरा -उनका लगभग चार दशकों तक साथ रहा 

  मुझे सांध्य दैनिक 'चैनल इंडिया ' के साहित्य सम्पादक के रूप में अख़बार के साप्ताहिक साहित्य परिशिष्ट में समय -समय पर  उनकी अनेक रचनाओं के प्रकाशन का सौभाग्य मिला । उनकी अधिकांश रचनाओं में छत्तीसगढ़ी लोक जीवन और लोक संस्कृति की सोंधी महक हुआ करती थी।उन रचनाओं को पढ़कर आज भी इसे महसूस किया जा सकता है ।  विगत कुछ वर्षों से वे कुछ अखबारों में 'कोंदा -भैरा के गोठ ' शीर्षक से सम -सामयिक विषयों पर छत्तीसगढ़ी में व्यंग्यात्मक स्तंभ लेखन भी कर रहे थे। अपनी वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए वे सोशल मीडिया का भी उपयोग कर रहे थे  ।  यूट्यूब पर भी छोटी -छोटी छत्तीसगढ़ी कविताओं के साथ अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। स्वर्गीय सुशील भोले ने 'मयारू माटी ' के नाम से प्रदेश के छत्तीसगढ़ी और हिन्दी  कवियों और लेखकों का एक वाट्सएप ग्रुप भी बनाया था । वे कुछ वर्षों तक वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार के सांध्य दैनिक 'छत्तीसगढ़ ' के साप्ताहिक 'इतवारी अख़बार ' में सहायक सम्पादक भी रहे। 

-स्वराज्य करुण 

 

Wednesday, February 18, 2026

(आलेख ) महाकवि कालिदास के 'मेघदूत' से छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी का रिश्ता /लेखक -स्वराज्य करुण

 महाकवि कालिदास के 'मेघदूत' से 

  छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी का रिश्ता 

      (लेखक -स्वराज्य करुण )

                   ******

महाकवि कालिदास की कालजयी कृति 'मेघदूतम ' का उल्लेख किए बिना प्राचीन भारतीय साहित्य अपूर्ण ही माना जाएगा. कई विद्वान छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में उदयपुर के पास खड़े रामगढ़ (रामगिरि) पर्वत को 'मेघदूत ' की रचना -स्थली मानते हैं.इसे लेकर विद्वानों में मत -भिन्नता है, लेकिन अगर कुछ विद्वान इस रामगिरि को ही 'मेघदूत ' की रचना स्थली मानते हैं तो इससे पता चलता है कि महाकवि कालिदास और उनकी इस लोकप्रिय कृति से छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक और भावनात्मक सम्बन्ध प्रारम्भ से ही जुड़ा हुआ है. आधुनिक युग  में प्रदेश के तपस्वी साहित्यकार पद्मश्री पंडित मुकुटधर पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ी भाषा से भी इसका रिश्ता जोड़ दिया .  उन्होंने  'मेघदूत 'का पहला छत्तीसगढ़ी अनुवाद किया था. लेकिन प्रकाशित अनुवाद के प्राक्कथन में पाण्डेय जी ने विनम्रता पूर्वक लिखा है -

"आंचलिक बोलियों में कदाचित छत्तीसगढ़ी में यह सर्वप्रथम अनुवाद है. यह न तो अविकल अनुवाद है और न भावानुवाद, दोनों के मध्य की वस्तु है. कहीं कुछ शब्द या वाक्यांश छूट गये हैं तो कहीं नये जुड़ गये हैं. छूटे हुए अंश कुछ ऐसे नहीं कि उनके बिना मूल भाव में कुछ अधिक अंतर पड़ता हो.प्रस्तुत अनुवाद में मूल का शतांश आनन्द भी पाठकों को प्राप्त हो जाए तो मैं अपना परिश्रम सफल समझूंगा."

             



छत्तीसगढ़ लेखक संघ रायगढ़ ने 'मेघदूत'का छत्तीसगढ़ी अनुवाद वर्ष 1984 में प्रकाशित किया था. यह अनुवाद पाण्डेय जी के प्राक्कथन सहित 55 पृष्ठों में है. कथानक के प्रथम खण्ड में 63 छन्द और द्वितीय खण्ड उत्तर मेघ में 52 छन्द हैं. 

          

        छोटा -सा गीति -काव्य है 'मेघदूत'

                          *****

   अनुवादक स्वर्गीय पंडित मुकुटधर पाण्डेय अपने प्राक्कथन में काव्य -कला की दृष्टि से 'मेघदूत ' को कालिदास की एक अनूठी कृति और  एक छोटा -सा गीति -काव्य मानते हैं. उनकी कलम से इसका यह छत्तीसगढ़ी अनुवाद  अत्यंत सम्मोहक बनपड़ा हैं. प्रथम खण्ड (पूर्व मेघ ) के इन अंशों को देखिए -

                     (1)

    यक्ष एक हर अपन काम म गलती कछु कर डारिस 

     तब कुबेर हर शाप छोड़ (अलका ले ओला निकारिस) 

    "बच्छर दिन नारी ले ओला विलग रहे बर परही

     (मोर नगर ला छोड़ कहूँ दुरिहा म बासा करही)

      बूडिस महिमा, यक्ष रामगिरि म जा छाइस छानी,

     जिहाँ जानकी के असनाँधे भरे कुण्ड म पानी.

                       (2)

    ओ पहाड़ म कै महिना कटगे बिछोह दुःख भारी 

    सोनहा चूरा तरी खसकगे, बिसरे कभू न नारी.

   परथम दिन असाढ़ के देखिस (बड़ीहन)बादर छाए,

    परबत छत ला खीसा मारत हाँथी कस बौराए.


                   (3) 

जे बादर ला देख काम -कौतुक हर मन  में जागे 

ओकर आगू केसनो करके ठाढ़े रस म पागे.

बहुत बेर ले सोंचत रहिगे (मगन भाव म होके ),

यक्ष राज के अनुचर हर आँखी म आँसू रोके.

मेघ देख के सुखिया के मन घलो बदल जब जाथे, 

 विरही मन के का कहना, दुरिहा म जी अकुलाथे.

          (4)

सावन लकठाइस, बिरहिन हर जेमाँ प्रान बचाए 

बादर हाथ संदेसा भेजे के विचार ठहराए.

फूल कोरिया अंजुरा म लेके अरघ बनाए,

कुशल -क्षेम पूछ के यक्ष हर स्वागत ओकर गाए.

         (5)

बादर बन थे धूँका, धूआँ, मिल के आगी -पानी 

कहाँ संदेसा ले जा सकथे जीयत-जागत प्रानी.

व्याकुल जी म यक्ष नि बूझिस, बादर दूत बनाइस,

कामी हर जड़ -चेतन मा भेद कहाँ कर पाइस?

             (6) 

जग -जाहिर पुष्कर आवर्तक, कुल म तैं जनमे, 

इन्दर राजा के मंत्री अस, (दया बहुत तोर मन में ).

अइसे जान गोहारौँ तोला, बिपद परे है भारी,

दूर देश म परे आज हौँ, छोड़ पियारी नारी.

जो माँगै तो गुनवन्ता ला माँगै, भले नि पावै,

फेर अधम ला कभू न, पूरन माँग भले हो जावै.

         (7)

मैं बिरहा के सरन लगे है हिरदे म मोर आगी,

धनपति के रिस कारन बिछुरे हौँ, मैं बड़े अभागी.

पहुँचा दे सन्देस पियारी ला अलका म जाके,

(जेहर राजधानी कुबेर के ) नगर यक्ष राजा के.

पुर बाहिर है बाग -बगइचा, लगे बहुत फुलवारी,

चन्द्रचूड़ के चन्द्र किरन म धोए महल -अटारी.


अनुवाद के प्राक्कथन में पंडित मुकुटधर पाण्डेय लिखते हैं -

*संसार की अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है. हिन्दी में तो इसके कई अनुवाद हुए हैं. ब्रज भाषा में राजा लक्ष्मण सिंह और राय देवी प्रसाद 'पूर्ण 'के अनुवाद प्रसिद्ध हैं.

   *मैंने अनुवाद में मल्लीनाथ की टीका से सहायता ली है. पाठ भी उन्हीं का रखा है सिर्फ़ एक जगह 'क्षण मुख पट ' का अर्थ मल्लीनाथ से भिन्न मिलेगा.

* अनुवाद की भाषा छत्तीसगढ़ी का वह रूप है, जो रायगढ़, सारंगढ़ और चन्द्रपुर अंचल में प्रयुक्त होता है. कहीं कारक प्रत्ययों के रूप में आधुनिकीकरण भी दृष्टिगत होगा.उदाहरण के लिए तृतीय करण कारक के चिन्ह 'से' को ले लीजिए. छत्तीसगढ़ी में 'से' की जगह कहीं 'में ', कहीं 'मँ' या 'माँ' तो कहीं 'ले' का प्रयोग होता है. इसमें एकाध जगह 'से' भी मिलेगा, जैसा कि आजकल पढ़े -लिखे लोग बोलते हैं. 

 *रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग की छत्तीसगढ़ी से इसमें अन्तर स्वाभाविक है, क्योंकि कहा जाता है कि चार -चार कोस के अन्तर में बोली में कुछ न कुछ फ़र्क आ जाता है.

* अनुवाद की भाषा क्रिया -पदों को छोड़कर कहीं -कहीं संस्कृत -शब्द -बहुल हो गई है. बिना संस्कृत शब्दों की सहायता लिए जब हिन्दी में ही अनुवाद नहीं हो सकता तब छत्तीसगढ़ी में होना तो और भी कठिन है. दूसरी बात गद्यनुवाद की अपेक्षा पद्यानुवाद में एक और कठिनाई छन्द और तुकों की सामने आती है. 

 पाण्डेय जी कहते हैं -"अनुवाद की भाषा क्रिया -पदों को छोड़कर कहीं -कहीं संस्कृत -शब्द -बहुल हो गई है. बिना संस्कृत शब्दों की सहायता लिए जब हिन्दी में ही अनुवाद नहीं हो सकता तब छत्तीसगढ़ी में होना तो और भी कठिन है. दूसरी बात गद्यनुवाद की अपेक्षा पद्यानुवाद में एक और कठिनाई छन्द और तुकों की सामने आती है." 

   उल्लेखनीय है कि साहित्य ऋषि पंडित मुकुटधर पाण्डेय हिन्दी कविता में छायावादी भावधारा के प्रवर्तक माने जाते हैं. वर्ष 1920 में जबलपुर की पत्रिका 'श्रीशारदा'  में छायावाद पर उनके 4निबंध धारावाहिक प्रकाशित हुए थे.हिन्दी साहित्य के इतिहास में उन्हें द्विवेदी युग का महत्वपूर्ण कवि माना जाता है.

 भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1976 में पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया था.पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर से उन्हें डी. लिट. की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया था.

उनकी पहली कविता 14साल की उम्र में आगरा की पत्रिका स्वदेश बांधव में छपी, पहला कविता -संग्रह 'पूजा के फूल ' वर्ष 1919 में, एक निबंध संग्रह 'छायावाद और अन्य निबंध 1983 में और मेघदूत का छत्तीसगढ़ी अनुवाद 1984 में प्रकाशित हुआ.

पंडित मुकुटधर पाण्डेय का जन्म 30 सितम्बर 1895 को महानदी के किनारे ग्राम -बालपुर (तत्कालीन जिला बिलासपुर, वर्तमान जिला जांजगीर चाम्पा)में हुआ था.  उनका निधन अपने गृह नगर रायगढ़ में 6 नवम्बर 1989 को हुआ. वे वर्ष 1919 से 1929 तक अध्यापक रहे. वर्ष 1931 से 1937 तक उन्होंने नटवर हाई स्कूल रायगढ़ में अध्यापन किया.वर्ष 1937 से 1940 रायगढ़ रियासत के मजिस्ट्रेट, द्वितीय श्रेणी दंडाधिकारी रहे. 

                

मेघदूत के छत्तीसगढ़ी अनुवाद पर

 पंडित मुकुटधर पाण्डेय के विचार -

          *****

उन्होंने प्राक्कथन में जो लिखा, उनमें से कुछ बिंदुवार इस प्रकार है -

*मेघदूत के कवि कालिदास का परिचय देना सूर्य को दीपक दिखाना है. कालिदास 473 ईस्वी के पहले हुए हैं.(मंदसौर में प्राप्त वत्सभट्टी लिखित एक शिलालेख )

* कालिदास के लिखे निम्न लिखित ग्रंथ कहे जाते हैं -

(1)ऋतु संहार (2) विक्रमोंर्वशीयम (3) मालविका अग्नि मित्रम 

(4) अभिज्ञान शाकुंतलम (5) कुमार संभव (6)रघुवंशम (7) मेघदूतम (8)श्रृंगारतिलकम (9)श्रुतबोध (10)नलोदय (11) राक्षस काव्यम.इनमें से प्रथम सात सुप्रसिद्ध हैं.'ऋतु संहार ' उनकी प्रारम्भिक रचना कही जाती है. शेष ग्रंथों के कालिदास -रचित होने में विद्वानों को संदेह है.

 *कालिदास के काव्यों की काव्य -मर्मग्यों ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की है.भारतीय ही नहीं, विदेशी विद्वान भी उनके काव्य के सौन्दर्य पर मुग्ध हैं. वास्तव में जर्मन कवि गेटे के कथनानुसार यदि कोई स्वर्ग लोक और मर्त्य लोक के एश्वर्य को एकत्र देखना चाहता हो तो उसे कालिदास का 'अभिज्ञान शाकुंतलम 'देखना चाहिए.

* कालिदास ने अपने काव्य में बाह्य प्रकृति और अंतः प्रकृति, दोनों का चित्रण किया है. उनके काव्य में जड़ प्रकृति चेतन का सा व्यवहार करती है वह मनुष्य के प्रत्येक सुःख -दुःख में भाग लेती है. निर्वासिता सीता का रुदन सुनकर मयूर नृत्य करना छोड़ देते हैं. वृक्ष फूलों का परित्याग कर देते हैं  और हरिण अपने मुख में लिए तृण कंवल को गिरा देते हैं.रामगिरि केवल प्रस्तर-खण्डों का ढेर नहीं है, वह एक मित्र का ह्रदय रखता है. एक वर्ष की दीर्घ अवधि के बाद मेघ से मिलने पर उसके नेत्र उश्न वाष्प से सजल हो उठते हैं..

 *कालिदास के काव्य में देशकाल का कोई व्यवधान नहीं है. दो हजार वर्ष बीत जाने पर भी उनकी कविता पुरानी नहीं हुई है. उसमें वैसी ही ताजगी है. कालिदास सार्वकालिक एवं सार्वभौम कवि हैं.

  *मेघदूत काव्य कला की दृष्टि से कालिदास की एक अनूठी कृति है. यह एक छोटा -सा गीति -काव्य है, पर इसके संबंध में पंडितों में यह उक्ति प्रसिद्ध है -"मेघे माघे गतं वयः " कहा जाता है कि संसार की किसी भी भाषा के साहित्य में इसके समान सुन्दर काव्य नहीं है. जैसा कि पहिले ही कहा जा चुका है, देशी -विदेशी सभी विद्वान इसके सौन्दर्य पर मुग्ध हैं 

*मेघदूत के पहिले वाल्मीकि रामायण को छोड़कर कदाचित कहीं दूत प्रेषण की परम्परा नहीं पाई जाती.रामायण में भगवान राम का सन्देश लेकर हनुमान सीता जी के पास लंका गए थे. कालिदास के ध्यान में यह बात अवश्य रही होगी. उत्तरमेघ में उन्होंने इसका उल्लेख भी किया है.

 *मेघदूत के बाद फिर हंसदूत, पवनदूत आदि कई काव्यों की रचना हुई.भारत में ही नहीं, विदेश में भी उसके अनुकरण में काव्य -रचना की गई. शीलर (Schillar)ने 'Maria Stuart' लिखा, जिसमें स्काट लैंड की बंदिनी रानी मेघोँ को देखकर उनसे अपने देश होकर जाने के लिए निवेदन करती हैं.

   * यक्ष ने मेघ के द्वारा जो सन्देश भेजा, वह शाश्वत सन्देश है. आज भी आषाढ़ के आरम्भ में नवीन मेघोँ को आकाश में मंडराते देखकर विरहिणी स्त्रियाँ अपने प्रियतमों से मिलने को आतुर हो उठती हैं. मेघ अपनी मधुर मन्द्रध्वनि से उन्हें ढाढ़स बँधाता और उनके प्रियतमों के शीघ्र प्रत्यागमन की सूचना देता है.

   *जहाँ तक कथानक का सम्बन्ध है, कालिदास की अन्यान्य कृतियों में पौराणिक या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पाई जाती है, पर 'मेघदूत 'का ऐसा कोई आधार नहीं पाया जाता. यह एकमात्र उनकी कल्पना की उपज है. यक्ष ने अपने काम में गलती की तो यक्षराज कुबेर ने उसे शाप दिया कि वह एक वर्ष तक अपनी पत्नी से अलग रहे. कहा जाता है कि कर्तव्य में प्रमाद का कारण उसका पत्नी -प्रेम था. इसलिए उसे वर्ष भर पत्नी -वियोग सहने का दण्ड दिया गया था.

*अलका (अलकापुरी ) छोड़ उसने रामगिरि में आश्रय लिया. वहाँ आठ माह किसी प्रकार काटने के बाद एक दिन आषाढ़ के आरम्भ में उसने पर्वत -शिखर पर बादलों को छाए हुए देखा. उसे अपनी पत्नी की याद आ गई. उसे विश्वास था कि मेरे विरह में मेरी पत्नी की भी यही दशा होगी. उसने सोचा, आषाढ़ के बाद श्रावण का महीना लग जाएगा, वर्षा -ऋतु में वियोग -व्यथा बढ़ जाती है, कहीं ऐसा न हो कि मेरे वियोग में मेरी पत्नी प्राण ही त्याग दे. इस आशंका से उसने मेघ को दूत वरण कर पत्नी को सन्देश भेजा कि मैं जीवित हूँ, तुम धैर्य धारण कर चार महीना किसी प्रकार और काटो, देवोत्थान के बाद फिर हम दोनों का मधुर मिलन होगा. 

    *यक्ष की प्रेमिका उसकी विवाहिता धर्म -पत्नी है, परकीया स्त्री नहीं. वह पतिव्रता है, विरह -काल में एक वेणी, मलिन -वसना और भूमि -शयना होकर काल -यापन करती है. उसी प्रकार यक्ष भी एक पत्नी व्रती था.

* मेघदूत यद्यपि एक प्रेम -काव्य है, तथापि उसमें कवि की धर्म -परायणता पद -पद पर परिलक्षित होती है.

*मेघदूत में कालिदास का प्रकृति -चित्रण दर्शनीय है. पूर्व मेघ को तो आप विन्ध्य से लेकर हिमालय तक सारे उत्तर भारत की प्राकृतिक -सुषमा का दर्पण ही समझिये. पर्वत -शिखर का आलिंगन करने वाले मेघ से लेकर गाँव के पेड़ पर नीड़ निर्माण करने वाले कौआ तक उनके प्रकृति -वर्णन के दायरे में आते हैं 

     कहाँ था कालिदास के मेघदूत का रामगिरि  पर्वत?

                     **********

पंडित मुकुटधर पाण्डेय ने प्राक्कथन में रामगिरि की अवस्थिति को लेकर भी अपने अभिमत दिए हैं.  उनके अभिमत बिंदुवार कुछ इस प्रकार हैं -

 *रामगिरि की अवस्थिति के सम्बन्ध में मतभेद पाया जाता है. कोई चित्रकूट तो कोई रामटेक (नागपुर ) तो कोई रामगिरि (सरगुजा )को 'मेघदूत' का रामगिरि मानता है. हाल ही में जिला बस्तर से लगे हुए कोरापुट जिले में भी एक रामगिरि होने की बातसुनी गई है .

*सभी तर्क -वितर्क द्वारा अपने -अपने पक्ष का समर्थन करते हैं. मैं इस सम्बन्ध में स्वयं कुछ न कहकर 'मेघदूत 'में कथित रामगिरि की स्थिति तथा मेघ के मार्ग से पाठकों को परिचित करा दे रहा हूँ, ताकि वे स्वयं इस पर विचार कर सकें.

* 'मेघदूत' में रामगिरि की पहचान के सम्बन्ध में मुख्य तीन बातें पाई जाती हैं -(पाण्डेय जी ने संस्कृत श्लोक भी दिए हैं )

(1) वहाँ जल -कुण्ड या जलाशय या जल स्रोत होना चाहिए, जहाँ जानकी ने स्नान किया था.

(2)वहाँ किसी शिला या चट्टान पर राम के चरण -चिन्ह अंकित होने चाहिए.

(3) वहाँ बेत -वृक्षों की झाड़ी होनी चाहिए 

   *रामगिरि के उत्तराभिमुख से यात्रा आरम्भ होती है.

सर्वप्रथम 'मालक्षेत्र 'पड़ता है.'मालक्षेत्र ' को कृषि -प्रधान होना चाहिए. 'मालक्षेत्र' से फिर उत्तराभिमुख प्रस्थान करने पर पहिले आम्रकूट आता है. आम्रकूट के उपान्त भाग में जंगली आम के पेड़ों की बहुलता थी.

* मतभेद रामगिरि, मालक्षेत्र और आम्रकूट, इन तीनों स्थानों को लेकर ही है.

*आम्रकूट से आगे बढ़ने पर विन्ध्य के पाद -देश में बहती हुई रेवा (नर्मदा ) के दर्शन होते हैं 

*विंध्याचल में जंगली हाथियों और जामुन के वृक्षों की विपुलता रही होगी.

*उसके बाद दशार्ण देश आता है, जिसकी राजधानी 'विदिशा ' है. निकट ही वेत्रवती (बेतवा ) नदी बहती है.विदिशा से उत्तराभिमुख जाते हुए उज्जयिनी (उज्जैन ) जाने को मार्ग का कुछ घुमाव पड़ता है. मार्ग में निविंध्या नदी पड़ती है तब

अवंति देश आता है, जिसकी राजधानी उज्जयिनी है.

*उज्जयिनी में महाकाल के दर्शन होते हैं. 

* इसके बाद गंभीरा नदी मिलती है. फिर देवगिरि (देवगढ़ )आता है, जहाँ स्कंद का निवास है. फिर चर्मणवती (चम्बल ) नदी मिलती है. दशपुर आता है.

*ब्रम्हावर्त जनपद, फिर कुरुक्षेत्र आता है. सरस्वती नदी मिलती है.कनखल आता है, जहाँ गंगाजी हिमालय से नीचे उतरती हैं. इसके बाद हिमालय, फिर कैलाश के दर्शन होते हैं. कैलाश में ही अलकापुरी की अवस्थिति बतलाई गई है 

*ऐसा जान पड़ता है कि कालिदास ने जिन -जिन स्थानों का वर्णन किया है, वहाँ वे अवश्य गए रहे होंगे. जिस बारीकी से और जिस ख़ूबी के साथ उन्होंने उन स्थानों का वर्णन किया है, वह प्रत्यक्ष देखे बिना संभव नहीं था.

  छत्तीसगढ़ लेखक संघ, रायगढ़ ने पंडित मुकुटधर पाण्डेय की इस कृति को प्रकाशित करके सराहनीय कार्य किया था.वर्ष 1984 में इलाहबाद के एक प्रिंटिंग प्रेस से मुद्रित इस पुस्तक की सामान्य कीमत 10 रूपए और सजिल्द कीमत 15 रूपए थी.उन दिनों छत्तीसगढ़ लेखक संघ रायगढ़ के संरक्षक ठाकुर जीवन सिंह और प्रो. दिनेश पाण्डेय, अध्यक्ष डॉ. बिहारी लाल साहू, उपाध्यक्ष प्रो. मेदिनी नायक, सचिव डॉ. बलदेव, सह -सचिव शिखा नन्दे, कोषाध्यक्ष प्रो. धनीराम पटेल, सम्पर्क सचिव रामलाल निषाद और प्रबंध सचिव मीनकेतन प्रेमिल हुआ करते थे.  प्रकाशक के रूप में उन्होंने "आपकी वस्तु आपको ही समर्पित सादर "लिखकर पाण्डेय जी की यह कृति उन्हें ही समर्पित की है.

-स्वराज्य करुण 

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Friday, February 13, 2026

(आलेख ) सौ से ज़्यादा कवियों का यादगार संग्रह ; राजनांदगांव 77 / लेखक -स्वराज्य करुण

 सौ से ज़्यादा कवियों का यादगार संग्रह ; 'राजनांदगांव 77'

    (लेखक -स्वराज्य करुण )

           *****             

आज से कुछ दशक पहले कवियों में साझा कविता -संग्रह छपवाने का उत्साह हुआ करता था, अभिव्यक्ति की चाहत लिए रचनाकार परस्पर सहयोग से संयुक्त काव्य -संग्रह छपवा लिया करते थे. उनकी स्थानीय साहित्यिक संस्थाओं की भी इसमें सक्रिय भूमिका रहती थी. प्रकाशन के लिए स्थानीय नागरिकों और छोटे -बड़े दुकानदारों से आग्रह करने पर कुछ आर्थिक सहयोग भी मिल जाता था,लेकिन लगता है कि वह बात अब नहीं रह गई है. संयुक्त काव्य संग्रह छपवाने में कवियों की दिलचस्पी कम होती जा रही है.  इस घटती दिलचस्पी के  कई कारण हो सकते हैं. उन कारणों पर जाए बिना आज मैं छत्तीसगढ़ की साहित्यिक संस्कारधानी राजनांदगांव से लगभग 49 साल पहले प्रकाशित एक साझा कविता -संग्रह की चर्चा करना चाहूंगा, जो 'राजनांदगांव 77' के नाम से वर्ष 1977 -78 में प्रकाशित हुआ था.इसके प्रकाशक के रूप में किसी साहित्यिक संस्था का नाम नहीं है, बल्कि  'सम्पादक मंडल ' लिखा हुआ है.  छत्तीसगढ़ में उन दिनों कम्प्यूटर आधारित छपाई मशीनों का चलन व्यापक रूप से नहीं हुआ था. इसी वजह से सहयोगी कविता -संग्रह 'राजनांदगांव 77 ' की छपाई हैण्ड कम्पोजिंग से ट्रेडल मशीन पर वहाँ के ब्राम्हण पारा स्थित चेतना प्रिंटर्स द्वारा की गई थी.

इसमें तत्कालीन राजनांदगांव जिले के लगभग 130 कवियों की रचनाएँ शामिल हैं.यह जिला वर्ष 2022 में तीन जिलों में बँट गया है - (1) राजनांदगांव (2) मोहला -मानपुर -अम्बागढ़ चौकी और (3) खैरागढ़-छुईखदान -गंडई.हिन्दी साहित्य की दुनिया में सभी जानते हैं कि राजनांदगांव जिला देश के तीन दिग्गज साहित्यकारों -पदुम लाल पुन्नालाल बख्शी, डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र  और गजानन माधव मुक्तिबोध की कर्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध है. बख्शी जी और मिश्रजी का जन्म इसी जिले में हुआ था. मुक्तिबोध जी कुछ वर्षों तक राजनांदगांव के कॉलेज में प्राध्यापक रहे.साझा काव्य संग्रह 'राजनांदगांव 77' के सम्पादक थे सर्वश्री सरोज द्विवेदी, रमेश वर्मा 'सरस' और संजय यादव. सम्पादक मंडल में शामिल थे -सर्वश्री राजेश तिवारी, जीवन यदु 'राही ', गणेश शरण सोनी 'प्रतीक ', सुरेश अतीत, हरजीत एस. राजा, गनपत दुबे, रमाकांत शर्मा, मोहन अग्रहरि और कृष्ण कुमार नायक. 

                                                          


इसमें  इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के तत्कालीन उप कुलपति श्री अरुण कुमार सेन ने संकलन के सम्पादक मंडल के सदस्य श्री सरोज द्विवेदी को सम्बोधित शुभकामना संदेश में लिखा है -"आपका 25 -10 -77 का पत्र प्राप्त हुआ.यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि राजनांदगांव जिले के समस्त कवियों की कविताओं का एक संकलन प्रकाशित करने की योजना आप लोगों ने तैयार की है".डॉ. सेन के अलावा इसमें राजनांदगांव के तत्कालीन सांसद मदन तिवारी, मध्यप्रदेश की तत्कालीन जनता पार्टी सरकार के मंत्रियों पवन दीवान और दरबार सिंह, तत्कालीन राजनांदगांव कलेक्टर एम. के. सक्सेना, छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार, धमतरी निवासी नारायण लाल परमार,  राजनांदगांव के तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी जी. एल . जोशी और वाराणसी के मुकुन्दी लाल श्रीवास्तव के शुभकामना संदेश भी इसमें प्रकाशित हैं. 

   छत्तीसगढ़ के संत कवि पवन दीवान उन दिनों राजिम से विधायक निर्वाचित होकर मध्यप्रदेश सरकार के जेल मंत्री थे. उन्होंने शुभकामना संदेश में लिखा था -" राजनांदगांव 77का प्रकाशन एक सुखद कदम है. इस नगर को मैं साहित्य का एक इतिहास और इतिहास का साहित्य मानता हूँ.सर्वश्री बख्शी जी, मिश्रजी एवं मुक्तिबोध जी के त्रिकाल जयी संघर्ष को आप अपने संकलन में सार्थकता देंगे, यह निश्चित है . "

     नारायण लाल परमार ने अपने संदेश में लिखा -"राजनांदगांव 77 की योजना कुछ इस तरह भा गई है कि मैं चाहता हूँ कि सम्पूर्ण प्रदेश में ऐसे आत्म विश्वासी कदम उठें. राजनांदगांव तो छत्तीसगढ़ अंचल  की संस्कारधानी है. राजनांदगांव 77के माध्यम से जन सामान्य को साहित्य में तब से अब तक की सम्पूर्ण यात्रा का आस्वाद मिले, ऐसी कामना है."

   इस काव्य -संग्रह की भूमिका लिखी थी वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार शरद कोठारी ने, जो राजनांदगांव के साप्ताहिक और आगे चलकर दैनिक हुए 'सवेरा संकेत' के सम्पादक रह चुके थे . उन्होंने लिखा -"अक्सर मित्रों के प्रति अति प्रेम या उपेक्षित साहित्यकारों द्वारा संयुक्त रूप से आत्म ज्ञापन की भावना से काव्य -संग्रह प्रकाशित होते हैं, जिसमें रचना का स्तर सबसे पहला शिकार होता है. आलोच्य काव्य संग्रह में जिन तरुण कवियों को संकलित किया गया है, वे नई कविता की सृजनात्मक प्रतिभा सिद्ध होंगी, इसमें संदेह नहीं. " अपनी भूमिका में कोठारी जी ने आगे लिखा है -प्रस्तुत काव्य संग्रह के कतिपय कवियों को व्यक्तिगत रूप से जानने -पहिचानने का संयोग मुझे प्राप्त हुआ है. इनकी सृजनmशीलता से भी परिचित हूँ, तथा उनकी रचनाओं को यदकदा छापने का अवसर भी मिला है. इस संकलन में वे ज़रा भिन्न रूप में सामने आ रहे हैं. साहित्य जगत का एक कार्यकर्ता होने के नाते मैं उनका अभिनंदन करता हूँ. मैं इस समय संकलित रचनाओं के बारे में कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हूँ. एतदर्थ, यह संकलन एक ऐसी साहित्य -यात्रा के प्रथम सोपान के रूप में समझा जाए, जिस मार्ग पर छत्तीसगढ़ का साहित्यकार नये -नये प्रयोग कर रहा है. रचनाओं में अनगढ़पन   अथवा अभिव्यक्ति की  अपरिपक्वता भले ही हो, किन्तु भावी संभावनाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता. "

      सम्पादक मंडल की ओर से सम्पादकीय वक्तव्य में लिखने वाले का नाम तो स्पष्ट नहीं छपा है, लेकिन हस्ताक्षर सरोज द्विवेदी का प्रतीत होता है. उन्होंने लिखा था - राजनांदगांव का कलात्मक इतिहास बहुत गौरवशाली है. जिले में विभिन्न प्रकार की बहुत -सी प्रतिभाएँ अभी भी लुकी -छिपी हैं या उन्हें अवसर नहीं मिल पाया है.उभरने का अवसर मिलते ही वे यहाँ की गौरव गाथा में चार चाँद लगा देंगी.बहुत दिनों से इस बात की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी कि यहाँ की साहित्यिक प्रतिभाओं को कभी एक साथ किसी मंच पर लाया जाए. हम कह तो नहीं सकते कि इस पुस्तक ने इस आवश्यकता की पूर्ति की है, किन्तु इतना ज़रूर कह सकते हैं कि इस दिशा में यह एक ठोस प्रयास सिद्ध होगा. सम्पादकीय में राजनांदगांव 77के प्रकाशन में काफी विलम्ब होने के कारणों का उल्लेख करते हुए कहा गया है -"साहित्यिक प्रयासों में अर्थाभाव होता है. साथ ही रचनाकारों का स्वभाव (फक्कड़पन) इसे और जटिल बना देता है. इस पुस्तक के साथ भी यही समस्या अंत तक बनी रही और यही कारण है कि इसे नियत समय से काफी विलम्ब हो गया. तथापि बड़ों के आशीर्वाद और मित्रों के सतत सहयोग के साथ ही इस जिले की प्रबुद्ध जनता का भरपूर स्नेह मिला. हम सबके प्रति कृतज्ञ हैं. प्रयास की सफलता और असफलता का निर्णय तो पाठक गण ही करेंगे, किन्तु जिले की काव्यात्मक -प्रतिभाओं को एक साथ प्रस्तुत करने में हमें बहुत गर्व हुआ है. "

     संग्रह की प्रस्तावना राजनांदगांव के वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक 'छत्तीसगढ़ झलक ' के प्रधान सम्पादक चन्द्रकांत ठाकुर ने लिखी थी.यह पुस्तक छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कवि डॉ. नंदू लाल चोटिया जी को समर्पित की गई है, जो राजनांदगांव के निवासी थे और कवि सम्मेलनों के कुशल मंच संचालक के रूप में भी उनकी बड़ी ख्याति थी.

    संकलन में जिन कवियों की रचनाएँ प्रकाशित हैं उनमें डॉ. गणेश खरे, सरोज द्विवेदी, चन्द्रकांत ठाकुर,डॉ. मलय, राजेश तिवारी, गिरीश बख्शी, नारायण दास चोटिया, रमेश वर्मा 'सरस ', संजय यादव, जीवन यदु 'राही ', रमाकांत श्रीवास्तव, बालकृष्ण गुप्ता, ला. रा. तम्बोली, एस. डी. डडसेना, रसिक ठक्कर, राम कुमार वेणु, गणेश सोनी 'प्रतीक ', सुरेश अतीत, करीम बख्श गाजी, गोपाल देव, मोहन अग्रहरि, सेवाराम दुबे, महेन्द्र कुमार ठाकुर, प्रभा सरस, गनपत दुबे, जी. एल. जोशी, श्रीमती उषा जोशी, कृष्ण कुमार नायक, ए. सत्तार सरोज, शेखर, हेमंत कुमार वर्मा, चन्द्रभूषण झा, ए. एल  यदु, शत्रुघन सिंह राजपूत, अशोक कुमार अग्रवाल, दादूलाल जोशी,श्रीमती शकुंतला 'प्रतीक ', सुन्दर शर्मा, चन्द्र कुमार 'चन्द्र', कैलाश सोनी, कन्हैया लाल देवांगन, हफ़ीज खान,प्रभात बख्शी, अनिल पाली,गंगाधर चौधरी, ज्ञानेंद्र तिवारी, नलिन श्रीवास्तव, दिनेश 'बदनसीब', हीरालाल अग्रवाल, लोक बाबू,डोरेलाल श्रीवास्तव,शरण ठाकुर, गुण रमन शर्मा, रवि शुक्ल, बृजमोहन शाह, एच. बी.बागड़े, चंद्रशेखर सोनी, श्रीनिवास अग्रवाल, डी. पी. नागवंशी, हरेंद्र जोगेवार, पृथ्वीपाल सिंह भाटिया, मेवराम साहू,कमल नारायण साहू, ज्ञानचंद जैन, रामनारायण श्रीवास्तव, कामता प्रसाद त्रिपाठी 'पीयूष ', सुभाष वैष्णव, पाठक परदेशी, नरेश कुमार मेश्राम, विजय वादिया, गजाधर प्रसाद साहू, करुणा कल्पना, समयलाल तम्बोली,प्रभात कुमार तिवारी, रमाकांत शर्मा, डॉ. रतन जैन, अजय कुमार ठाकुर, तेज करण जैन, के. एन. महाजन, नीतेश कुमार, आसिफ कुरैशी, नारायण सिंह ठाकुर, प्रभुदास काचलवार,रूपेंद्र कुमार सिंह, तुलसीराम जायसवाल, मनहरण दुबे, सत्येन्द्र गुप्ता, दर्शन राय, एम. इलियास साजन, मन्नूलाल प्यासा,वि. ना. मजूमदार, बोधन सिंह चंदेल, नंदन नादान, माणिक लाल गोसाई, प्रमोद कुमार श्रीवास्तव, देवेंद्र आहूजा 'आँसू', के. गुलाब झाबक, सरोज भटनागर, जगदीश तिवारी, राजमोहन चौहान, अब्दुल सलाम कौसर, करुणा प्रसाद पाण्डेय, महेश मंजू जोशी, वीरेन्द्र कुमार शुक्ला, रामनरेश त्रिपाठी, हरजीत एस. राजा, 'जैड' अब्दुल, केवल सिंह, लक्ष्मण नन्दगईहां, कृष्णा यादव, चन्द्रकिशोर दास वैष्णव,गौतम कोठारी, गणेश प्रसाद गुप्ता, विजय कुमार नामदेव, गुलाब सिंह ठाकुर, रामनारायण नैय्यर, पलटनराम कोसरिया, पीसीलाल यादव,अरविन्द रायचा,  छन्नूलाल वर्मा, आर. एम. दुबे, शिव कुमार द्विवेदी और नीति भूषण भट्ट शामिल हैं.

छत्तीसगढ़ में सहयोगी कविता संग्रहों के प्रकाशन की परम्परा इस युग में  1950 के दशक में शुरु हुई थी, जब हरि ठाकुर और उनके साथी कवियों द्वारा  'नये स्वर' शीर्षक से सहयोगी संकलनों के प्रकाशन का सिलसिला प्रारंभ किया था.नये स्वर के तीन सहयोगी संकलन प्रकाशित हुए थे, जिनमें हरि ठाकुर, नारायण लाल परमार, गुरुदेव कश्यप, कुंज बिहारी चौबे आदि शामिल थे.वर्ष 1977 के आस - पास डॉ. विनय कुमार पाठक के सम्पादन में 'आरंग के कवि ' शीर्षक से एक संग्रह प्रकाशित हुआ था. इसमें आरंग कस्बे के कुछ कवियों की रचनाएँ छपी थीं.

   साझा कविता -संग्रहों के प्रकाशन का एक और अच्छा उदाहरण महासमुन्द जिले के पिथौरा में भी देखा जा सकता है,जहाँ श्रृंखला साहित्य मंच द्वारा वर्ष 1989 से 2018 के बीच आंचलिक कवियों के चार संकलन क्रमशः श्रृंखला -एक, श्रृंखला -2, श्रृंखला -3 और श्रृंखला -4 के नाम से प्रकाशित किए जा चुके हैं. मंच ने स्थानीय कवि शिवानंद महान्ति की क्षणिकाओं का संकलन 'संशय के बादल ' वर्ष 2028 में प्रकाशित किया था. वर्ष 2022 में सड़क हादसे में उनका निधन हो गया. मरणोपरांत उनकी क्षणिकाओं का एक संकलन वर्ष 2023में प्रकाशित हुआ. इसे भी श्रृंखला साहित्य मंच ने प्रकाशित किया था. इसी कड़ी में अंचल के ग्राम खुटेरी निवासी कवि स्वर्गीय मधु धांधी के छत्तीसगढ़ी गीतों का संकलन 'मोर सुरता के गाँव ' उनके निधन के लगभग 45वर्ष बाद वर्ष 2022 में प्रकाशित हुआ. इस संग्रह का प्रकाशन भी श्रृंखला साहित्य मंच द्वारा किया गया था.

   सहयोगी संकलन 'राजनांदगांव 77' की एक सौजन्य प्रति महासमुन्द जिले के पिथौरा निवासी कवि एस. डी. डडसेना (शशि डडसेना)को भेंट की गई थी, जो उन दिनों पंचायत निरीक्षक के पद पर राजनांदगांव जिले के अम्बागढ़ चौकी में पदस्थ थे. उनकी एक कविता भी इसमें शामिल है. उन्होंने यह संकलन पढ़ने के लिए मुझे दिया था. बहुत समय से सोच रहा था कि इस पर कुछ लिखा जाए. आज यह इच्छा पूरी हुई. 

-स्वराज्य करुण 

Wednesday, February 11, 2026

(विशेष बातचीत ) इशारों की भाषा है ग़ज़ल : पद्मश्री मदन चौहान /आलेख -स्वराज्य करुण


छह  दिन पुरानी तस्वीर के साथ  छह साल पुरानी बातचीत, जो आज भी प्रासंगिक है -

                             (स्वराज्य करुण )

छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय गायक, संगीतकार, हारमोनियम और तबला वादक श्री मदन चौहान  से इस बार 5 फरवरी 2026 की शाम उनके घर हुई मुलाक़ात में छह साल पहले उनसे लिया गया मेरा वह इंटरव्यू भी याद आ गया, जो उन्हें पद्मश्री सम्मान दिए जाने की घोषणा के बाद उनके इसी मकान में इसी जगह पर मैंने उनसे लिया था.इस विशेष बातचीत पर आधारित मेरा आलेख सांध्य दैनिक 'चैनल इंडिया' के 'साहित्य विशेष' में 10 फरवरी 2020 को प्रकाशित हुआ था -

 *ग़ज़ल इशारों की भाषा है। सूफ़ी नज़्मों और ग़ज़लों में भी इशारों -इशारों में रूहानी प्रेम के जरिए ईश्वर तक पहुँचने की बात होती है।  सूफ़ी एक स्वभाव का नाम  है । सूफ़ी रचनाओं का सार भी यही है कि ईश्वरीय प्रेम के लिए धरती पर इंसान और इंसान के बीच परस्पर प्रेम का रिश्ता हो । संगीत भी  मानव जीवन के लिए प्यार और शांति की भाषा है।  --यह कहना है छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध संगीत शिल्पी मदन सिंह चौहान का ,जिन्हें भारत सरकार ने इस वर्ष  2020 में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर  पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित करने की घोषणा की है। मार्च  के आख़िरी या अप्रैल के पहले हफ़्ते में नई दिल्ली में होने वाले जलसे में राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद 141 हस्तियों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित करेंगे । इनमें से 7 लोगों को पद्मविभूषण ,16 लोगों को पद्मभूषण और  श्री चौहान सहित   118 शख़्सियतों को  पद्मश्री अलंकरण से  नवाज़ने का ऐलान किया गया है।  उधर गणतंत्र दिवस के एक दिन पहले 25 जनवरी की शाम नई दिल्ली में यह ऐलान हुआ और इधर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के राजा तालाब मोहल्ले में श्री चौहान के घर पर उन्हें मुबारकबाद देने  उनके चाहने वालों का सैलाब उमड़ पड़ा।उन्हें बधाई देने कुछ दिनों बाद मैं भी  अपने कवि मित्र और श्रृंखला साहित्य मंच पिथौरा के अध्यक्ष प्रवीण प्रवाह के साथ  उनके घर पहुँचा। उन्होंने बड़ी आत्मीयता से हमारा स्वागत किया । मैंने उन्हें अपने काव्य संग्रह 'मेरे दिल की बात' की एक सौजन्य प्रति  भेंटकर उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट किया । अंतरंग बातचीत में श्री चौहान ने अपनी सुदीर्घ कला यात्रा के कई अनुभवों और स्मृतियों को हमारे साथ साझा किया ।

                                            


                                              पद्मश्री मदन चौहान से मेरी मुलाकात 5 फरवरी 2026 

    श्री मदन चौहान छत्तीसगढ़ के उन प्रतिभावान सितारों में से हैं ,जो अपने हुनर की रौशनी से देश और प्रदेश के  सांस्कृतिक आकाश को लगातार आलोकित कर रहे हैं । सहज ,सरल और सौम्य स्वभाव के श्री  चौहान  हिन्दी और  उर्दू  में गीत ,ग़ज़लों और भजनों के सुमधुर गायक के रूप में प्रसिद्ध हैं और सूफ़ी गायन में भी पूरे देश में उनकी ख्याति है। लेकिन 73 वर्षीय श्री चौहान ने  50 वर्षों से जारी अपनी संगीत साधना की शुरुआत छत्तीसगढ़ी लोक संगीत से की । उस दौर के मशहूर लोक गायक शेख हुसैन के साथ उन्होंने वर्षो तक  तबले पर संगत की। शेख हुसैन अक्सर अपने साथी सन्त मसीह दास के  लिखे गाने गाते थे। ये गाने छत्तीसगढ़ी लोक गीतों की एक लोकप्रिय विधा 'ददरिया ' के रूप में होते थे। वह रेडियो का ज़माना था और रायपुर में आकाशवाणी केन्द्र खुले दस साल से कुछ ज्यादा वक्त हो चुका था।  इस केन्द्र से छत्तीसगढ़ी लोक गीतों के फरमाइशी कार्यक्रमों में शेख हुसैन की मधुर आवाज़ में और मदन चौहान के तबला वादन के साथ प्रसारित संत मसीहदास के लोकगीतों ने पूरे छत्तीसगढ़ में तहलका  मचा दिया । इन गीतों की अपार लोकप्रियता की सबसे बड़ी वज़ह थी इनकी कर्णप्रियता और अपनी माटी  की सोंधी महक से भरपूर अपनी भाषा में लोक -जीवन की रंग -बिरंगी  अभिव्यक्ति । इनमें से 'चना के दार राजा ' 'गुल -गुल भजिया खा ले ' और 'मन के मनमोहनी " जैसे कई सदाबहार गीत सुनकर लोग आज भी झूम उठते हैं। उन दिनों लोक गीतों के कार्यक्रमों के प्रसारण के समय लोग अपने -अपने रेडियो सेट के सामने बड़ी तल्लीनता से  बैठे रहते थे। चाय और पान की दुकानों में ग्राहकों के साथ संगीत प्रेमी श्रोताओं की भीड़ लग जाती थी ।


आकाशवाणी रायपुर के अलावा  - विविध भारती से भी इन गीतों का प्रसारण यदाकदा  होता रहता है ।   इन लोक गीतों की असली मिठास को  तो हम इन्हें सुनकर ही महसूस कर सकते हैं ,फिर भी छत्तीसगढ़ी  लोक संगीत के रसिक जन  आज भी अक्सर इन्हें  गुनगुना उठते हैं ।जैसे यह लोकप्रिय ददरिया गीत -


"बटकी म बासी अऊ चुटकी म नून 

मंय गावत हौं ददरिया ,तयं कान देके सुन ...

ओ चना के दार ।

टुरा पर बुधिया ,होटल म भजिया झडक़त हे ओ ....!" 

आत्मीय बातचीत में मदन चौहान ने एक दिलचस्प संस्मरण भी  सुनाया । उन्होंने बताया- उन दिनों शेख हुसैन साहब की आवाज़ में एक और छत्तीसगढ़ी गीत काफी हिट  हुआ था ,जिसकी पंक्तियाँ थीं --

"एक पइसा के भाजी ल दू पइसा म बेचे गोई -बइठे .... बज़ार म " सब्जी विक्रेताओं के बीच यह गाना बहुत पसंद किया गया ।  इससे प्रभावित होकर  छुईखदान (जिला-राजनांदगांव ) के सब्जी विक्रेताओं ने शेख साहब को अपनी टीम के साथ कार्यक्रम पेश करने वहाँ आमंत्रित किया था। वहाँ सादगीपूर्ण ढंग से आयोजित कार्यक्रम में हम लोगों को दर्शकों और श्रोताओं का भरपूर  स्नेह मिला । वह हमारे लिए एक यादगार आयोजन था।

शेख हुसैन और संत मसीह दास अब इस दुनिया में नहीं हैं ,लेकिन अपने इन दोनों पुराने साथियों को याद करते हुए मदन चौहान बहुत भावुक हो जाते हैं।  यह पूछे जाने पर कि तबला वादन की ओर झुकाव कैसे हुआ ,चौहान जी अपनी यादों को खंगालते हुए बताते हैं कि बचपन में वनस्पति घी के खाली कनस्तरों को तबले की तरह बजाना उन्हें अच्छा लगता था। बाद में यही शौक उनको तबला वादन की ओर ले आया। कुछ स्थानीय आर्केस्ट्रा पार्टियों के साथ भी वह जुड़े रहे ।श्री  चौहान कहते हैं -  तबला  सीखने और तबला वादक के रूप में कामयाब होने में तीस साल लग गए। तबला वादन किसी भी गायन और संगीत का ज़रूरी हिस्सा होता है। 

 श्री चौहान आकाशवाणी रायपुर के मशहूर तबला वादक कन्हैयालाल भट्ट को अपना पहला  गुरु मानते हैं ,जिनसे उन्होंने इसका अनौपचारिक शास्त्रीय ज्ञान  हासिल किया । जयपुर के उस्ताद काले खां साहब उन दिनों कार्यक्रमों के सिलसिले में यहां आकाशवाणी आते -जाते थे।  तबला वादन की कई बारीकियां उनसे भी सीखी । भिलाई नगर के रतनचंद वर्मा से गायन कला का अनौपचारिक प्रशिक्षण लिया। श्री चौहान आकाशवाणी रायपुर के उस दौर के एक वरिष्ठ तबला वादक आशिक अली खां को भी याद करते हैं । वह कहते हैं -मैंने उनसे भी बहुत कुछ सीखा ।

मदन सिंह चौहान का जन्म  रायपुर के  राजा तालाब मोहल्ले में  15 अक्टूबर 1947 को  हुआ था । उनके पिता भिलाई इस्पात संयंत्र के कर्मचारी थे । रिटायर होने के बाद रायपुर में बस गए । मदन चौहान की पांचवीं तक की पढ़ाई  इसी राजा तालाब  मोहल्ले की प्राथमिक पाठशाला में हुई।  रायपुर के ही प्रतिष्ठित राष्ट्रीय विद्यालय में उन्होंने मिडिल और मेट्रिक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने मित्र शेख हुसैन के साथ उन्होंने कुछ दिनों तक ऑटो पार्ट्स की एक दुकान में नौकरी की । फिर कुछ समय स्थानीय श्यामनगर गुरुद्वारे में  120 रुपए मासिक मानदेय पर तबला वादक के रूप में गुरुवाणी के कार्यक्रमों में संगत करने लगे। शबद -कीर्तन  की रचनाओं का उन पर गहरा असर हुआ।यहीं से उनका झुकाव आध्यात्मिक संगीत की ओर हुआ। इस बीच स्थानीय नगर निगम द्वारा  संचालित निवेदिता कन्या हायर सेकेंडरी स्कूल में उन्हें वर्ष 1977 में तबला संगतकार के रूप में सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिल गयी ,जहाँ 32 वर्षो की लम्बी नौकरी के  बाद वर्ष 2009 में वह सेवानिवृत्त हो गए। 

    उन्होंने पुरानी यादों के झरोखे से  झाँकते हुए यह भी बताया कि   छत्तीसगढ़ी गीतों की लोकप्रिय गायिका श्रीमती निर्मला इंगले की प्रेरणा से   वह तबला वादन के साथ -साथ गायन में भी रुचि लेने लगे। आज  सुगम संगीत के मंजे हुए गायक कलाकारों में उनकी गिनती होती है। मदन चौहान की खनकदार मख़मली आवाज़ में  हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भजनों के अनेक एलबम जारी हो चुके हैं  । इनमें माँ दुर्गा की आराधना पर आधारित 'दयामयी दया करो ' शिरडी वाले साईं बाबा को समर्पित 'दो अक्षर का नाम साईं' और 'बच्चों पे रहम ' और गणेश वंदना 'गजानंद स्वामी ' शीर्षक से जारी म्यूज़िक एलबम भी शामिल हैं। उनकी आवाज़ में शिरडी के साईं बाबा पर केन्द्रित म्यूज़िक एलबम  'रहम नज़र करो अब मोर साईं ' भी काफी पसंद किया जा रहा है। भजन एलबमों में कई रचनाएँ चौहान जी द्वारा स्वयं लिखी गयी हैं। उर्दू में भक्ति गीतों का उनका एक म्यूज़िक एलबम  'आओ आओ नबी ' शीर्षक से आया है,जिसके गीतकार इसरार इलाहाबादी हैं। श्री चौहान के  भजनों के  कई एलबम छत्तीसगढ़ी में भी हैं।  छत्तीसगढ़ में  18 वीं सदी में हुए  महान समाज सुधारक बाबा गुरु घासीदास को समर्पित,  दिलीप पटेल का  लिखा पंथी गीत  'जगमग लागे अंजोर '  भी मदन चौहान की आवाज़ में काफी लोकप्रिय हो रहा  है। सूफ़ियाना रंगत की उनकी प्रस्तुतियां श्रोताओं का मन मोह लेती हैं । 

श्री चौहान  के अनेक  म्यूजिक एलबम, विभिन्न कार्यक्रमों में दी गयी प्रस्तुतियां और समय -समय पर  टेलीविजन चैनलों में दिए गए  इंटरव्यू आदि की रिकार्डिंग  यूट्यूब पर भी उपलब्ध है। उनकी आवाज़ में एक 'जस गीत' छत्तीसगढ़ी फीचर फ़िल्म ' तहुँ कंवारा - महुँ कुंवारी ' में भी शामिल किया गया है। श्री चौहान ने संत कबीर सहित अनेक प्राचीन कवियों की पारम्परिक  रचनाओं के अलावा नये दौर के कवियों और शायरों की रचनाओं को भी अपना स्वर और संगीत दिया है। उनकी धीर -गंभीर ,लेकिन मीठी आवाज़ में  उत्तरप्रदेश के वरिष्ठ कवि उदयभानु 'हंस'  की यह ग़ज़ल  किसी भी महफ़िल की रौनक और रंगत को और भी गाढ़ा कर देती  है ,जिसकी  कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं --


" कब तक यूं बहारों में पतझर का चलन होगा ,

कलियों की चिता होगी ,फूलों का हवन होगा ।

हर धर्म की रामायण कहती है ये युग -युग से ,

सोने का हिरन लोगे ,सीता का हरण होगा ।"

इस रचना के बारे में चौहान जी अपनी यादों को शेयर करते हुए एक दिलचस्प प्रसंग भी सुनाते हैं - -  वर्षों पहले पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर एक बार ओड़िशा जाते हुए कुछ समय रायपुर में रुके थे। उन दिनों वह प्रधानमंत्री के पद से त्यागपत्र दे चुके थे ।स्थानीय लोगों ने उनके सम्मान में एक आयोजन किया था  ,जहां उनके आग्रह पर मेरे द्वारा  उदयभानु ' हंस'  की यह रचना  अपनी आवाज़ में पेश की गयी । चंद्रशेखर जी इस रचना से इतने प्रभावित हुए कि वापसी में उन्होंने अपने एक सुरक्षा अधिकारी को मेरे पास भेजकर इसकी रिकार्डिंग मंगवाई । यह निश्चित रूप से  रचनाकार  और गायक के लिए सम्मान की बात थी। मजे की बात यह कि उदयभानु 'हंस' से श्री चौहान की कोई मुलाकात अब तक नहीं हुई है ,लेकिन उनकी इस ग़ज़ल ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वो इसे सुरों में सजाकर सांगीतिक आयोजनों में प्रस्तुत करने लगे ।पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्वर्गीय अरुण जेटली  भी रायपुर में एक बार  मदन चौहान  का कार्यक्रम देखकर उनसे काफी  प्रभावित हुए थे। 

 चौहान जी ने  रायपुर के स्थानीय शायर  अता रायपुरी की कई ग़ज़लों और नज़्मों को भी स्वर दिया है। जैसे अता की एक ग़ज़ल की इन पंक्तियों को देखिए -

"तमाशा मैं बन जाऊं  ये डर नहीं है ,

मेरा पाँव चादर से बाहर नहीं है ।

बहुत ऊँचे लोगों की बस्ती है लेकिन 

कोई मेरे कद के बराबर नहीं है।

अता को भी खुरच कर देखा है हमने 

कोई चेहरा चेहरे के ऊपर नहीं है ।

हमारी मोहब्बत बड़ी सीधी -सादी ,इ

इशारों -विशारों का चक्कर नहीं है।"

श्री चौहान ने  पिथौरा (जिला-महासमुन्द )के कवि   प्रवीण 'प्रवाह' की कई रचनाओं को भी अपनी आवाज़ दी है। राजधानी रायपुर के अनेक सरकारी और गैर सरकारी सामाजिक -सांस्कृतिक-धार्मिक  आयोजनों  में गीत -संगीत के प्रस्तुतिकरण के लिए मदन चौहान को सम्मानपूर्वक आमंत्रित किया जाता है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की जयंती और पुण्यतिथि पर होने वाली प्रार्थना सभाओं में भी वह सर्वधर्म समभाव पर आधारित भजन और गीत प्रस्तुत करते हैं।सूफ़ी गायन में बाबा बुल्ले शाह , बाबा फ़रीद ,अमीर ख़ुसरो  और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया और ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती  उनके मनपसंद शायर हैं।  छत्तीसगढ़ सरकार ने कला के क्षेत्र में  असाधारण योगदान के लिए मदन चौहान को वर्ष 2017 में राजा चक्रधर सिंह राज्य अलंकरण से सम्मानित किया था।  राजधानी रायपुर में आयोजित राज्य स्थापना दिवस समारोह 'राज्योत्सव' में मुख्य अतिथि की आसंदी से राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने उन्हें इस अलंकरण से नवाज़ा था ।  

सुगम संगीत के क्षेत्र में आज के अनेक नामचीन कलाकार श्री  मदन चौहान के शिष्य रह चुके हैं। इनमें  गायिका गरिमा दिवाकर और अभ्रदिता मोइत्रा जैसे कई मशहूर नाम शामिल हैं। अभ्रदिता पहले रायपुर में रहती थीं । वह अब  त्रिवेंद्रम(केरल )  में रहकर हिंदुस्तानी संगीत पर काम कर रही हैं । मध्यप्रदेश सरकार ने कुछ साल पहले अभ्रदिता को  'लता मंगेशकर पुरस्कार' से सम्मानित किया था। 

श्री चौहान कहते हैं - संगीत हर इंसान को  कुदरत की एक अनमोल देन है। गाना -गुनगुनाना  हर इंसान के स्वभाव में होता है। रियाज़ अथवा  अभ्यास से उसे निखारा जा सकता है। भारत में संगीत की वर्तमान स्थिति पर उनका विचार है कि इस कम्प्यूटर युग में नये कलाकारों के लिए पहले की तुलना में आज कहीं ज़्यादा व्यापक संभावनाएं हैं । हमारे समय में इस फील्ड में काफी चुनौतियाँ थीं ।  यह सुगम संगीत का दौर है ,लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शास्त्रीय संगीत ही इसकी बुनियाद है।  सुगम संगीत में आगे बढ़ने के लिए  शास्त्रीय संगीत की बारीकियों को  समझना  ज़रूरी है।   नये लोग जो इस क्षेत्र में आना चाहते हैं ,वे अगर संगीत को  पूजा अथवा इबादत के रूप में लें और मेहनत करें  तो उन्हें क़ामयाबी जरूर मिलेगी।

(यह बातचीत फरवरी 2020 में हुई थी )

-स्वराज्य करुण