Monday, October 12, 2026

(आलेख )भाषाओं के त्रिवेणी संगम में उर्दू मिश्रित हिन्दी की मिठास घोलती मज़ीद राही की शायरी/ लेखक -स्वराज्य करुण

 अब तक लगभग गुमनाम रहे शायर मज़ीद राही को जनता के सामने लाने का एक विनम्र प्रयास

भाषाओं के त्रिवेणी संगम में  उर्दू मिश्रित हिन्दी की मिठास घोलती  मज़ीद राही की  शायरी  

                             आलेख -स्वराज्य करुण 

 कविता या शायरी चाहे किसी भी भाषा की हो, वह आम जनता को भावनात्मक रूप से जोड़कर रखती है । यह ख़ासियत  मज़ीद राही की शायरी में भी मिलती है। हालांकि शायर के रूप में उनकी जान - पहचान का दायरा बहुत सीमित है, लेकिन उनकी नज़्मों और ग़ज़लों का कैनवास बहुत बड़ा है  । वे ओड़िशा राज्य के खरियार रोड शहर में एक सँकरी -सी गली के बहुत साधारण मकान में रहते हैं । यह शहर ओड़िशा  की पश्चिमी सीमा पर नुआपाड़ा जिले में छत्तीसगढ़ की सरहद से लगा हुआ है। यहाँ के जन -जीवन पर ओड़िया, छत्तीसगढ़ी और हिन्दी भाषाओं का  मिलाजुला गहरा सांस्कृतिक असर देखा जा सकता है ।  खरियार रोड की आम ज़िन्दगी  भी तीन भाषाओं (ओड़िया, छत्तीसगढ़ी और हिन्दी)  के त्रिवेणी संगम जैसी लगती है , जिसमें मज़ीद भाई की शायरी उर्दू मिश्रित हिन्दी की  मिठास घोल रही है  । यह इलाका ब्रिटिश हुकूमत के दौरान पहले छत्तीसगढ़ के तत्कालीन रायपुर जिले में, महासमुंद तहसील का हिस्सा था । उस दौरान जब अंग्रेजों की सरकार ने वर्ष 1936 में भाषावार प्रांतों का गठन किया, तब उसने खरियार रोड को ओड़िशा में शामिल कर लिया। यही कारण है कि आज के दौर में भौगोलिक और प्रशासनिक दृष्टि से अलग -अलग राज्य होते हुए भी यहाँ की आम ज़िन्दगी में दोनों राज्यों की साझा संस्कृति की खूबसूरत तस्वीर नज़र आती है  जोंक नदी यहाँ दोनों राज्यों की सीमा - रेखा बनकर बहती है। इस नदी पर बने पुल को दोनों तरफ से पार करके दोनों राज्यों के कामकाजी  लोग एक दूसरे के राज्य में रोज आते -जाते हैं।  खरियार रोड इस रास्ते पर  पश्चिम ओड़िशा का अंतिम शहर है । यहाँ के निवासी मज़ीद राही  की उर्दू और हिन्दी  शायरी जोंक नदी के  उस पुल की तरह आम जनता के दिलों को जोड़ने का काम करती है,  जो दोनों राज्यों के बीच नियमित आवागमन के साथ -साथ सामाजिक -सांस्कृतिक और व्यावसायिक सम्पर्को का  महत्वपूर्ण सेतु बनकर शान से खड़ा है । देश को मज़ीद भाई की नज़्मों और ग़ज़लों की तरह आज ऐसे ही भावनात्मक पुलों की ज़रूरत है , जो अपनी रचनाओं से  भारतवासियों को जोड़कर रखें । वे सचमुच कौमी एकता के शायर हैं ।  उनका  पूरा नाम अब्दुल मज़ीद खाँ अशरफी है, लेकिन शायरी वे मज़ीद राही के नाम से ही करते हैं ।उनकी  नज़्में और ग़ज़लें भले ही उर्दू ज़ुबान में हों, लेकिन वे उन्हें देवनागरी (हिन्दी )लिपि में लिखते हैं। वैसे भी आम बोलचाल की उर्दू और हिन्दी के बीच फ़र्क कर पाना बहुत मुश्किल है । दोनों ही भाषाओं में अरबी और फ़ारसी  सहित कुछ अन्य भाषाओं के शब्द भी दूध में शक्कर की तरह घुलमिल गए हैं, जिसकी मिठास मज़ीद राही जैसे शायरों की नज़्मों और ग़ज़लों में भी महसूस की जा सकती है ।



मज़ीद राही की कविताएँ  सामान्य उर्दू और सामान्य हिन्दी में होती हैं।हालांकि उन्होंने अपनी कुछ रचनाएँ उर्दू लिपि में भी लिखी हैं, लेकिन अपनी शायरी देवनागरी लिपि में लिखना उन्हें ज़्यादा अच्छा लगता है ।  खरियार रोड  के पास छत्तीसगढ़ के ग्राम नर्रा (वर्तमान जिला -महासमुंद )में 6नवम्बर 1956 को उनका जन्म हुआ था। यह गाँव जोंक नदी के पुल के उस पार है।मज़ीद भाई नर्रा में ही आठवीं तक पढ़ाई करने के बाद आगे चलकर जीवन-यापन के लिए  दर्जी बन गए। वे बताते हैं कि  उन्होंने बचपन में रायपुर के एक मदरसे में उर्दू की भी पढ़ाई की थी ।कुछ साल उन्होंने महासमुन्द जिले के पिथौरा कस्बे में रहकर टेलरिंग का काम किया, फिर वहाँ से लगभग 57 किलोमीटर दूर खरियार रोड आ गए और परिवार सहित यहीं के होकर रह गए। वे स्थानीय मस्जिद के मौलवी भी हैं ।  घर -गृहस्थी संभालते हुए  बड़ी खामोशी से काव्य -सृजन में  लगे हुए हैं। पिथौरा में कुछ साल रहने की वज़ह से वहाँ के लोगों  से उनका आत्मीय रिश्ता जुड़ गया है।इसीलिए जब हम लोगों ने सुना  कि मज़ीद भाई बहुत बीमार हैं,  शायद उन्हें लकवा हो गया है और वे बिस्तर से उठ नहीं पा रहे हैं, तो मुझे और मेरे कवि मित्र प्रवीण प्रवाह को भी बड़ी चिन्ता हुई ।

   हमने सोचा कि खरियार रोड जाकर उन्हें देख आएँ। रास्ते में प्रवीण ने मोबाइल से उन्हें कॉल किया।मज़ीद भाई ने ही कॉल रिसीव किया।उन्हें पता लगा कि हम उनसे मिलने खरियार रोड आ रहे हैं, तो वे बहुत ख़ुश हुए।फोन पर संक्षिप्त बातचीत से हमें कुछ तसल्ली हुई कि मज़ीद भाई स्वस्थ हैं ।खरियार रोड पहुँचकर हमने उन्हें साइकिल चलाते देखा और भला चंगा पाया तो और भी अच्छा लगा।  घर के पास गली के सामने रुककर उन्होंने हमारा स्वागत किया। फिर  घर ले गए।चाय -नाश्ता करवाया। बातचीत में उन्होंने बताया कि वाकई वे बहुत बीमार हो गए थे,लेकिन  ओड़िशा के  बरगढ़ जिले में गोड़भग्गा नामक गाँव के एक वैद्य से इलाज करवाया और ठीक हो गए  ।  

     मुस्कुराहट मज़ीद भाई के व्यक्तित्व की विशेषता है, लेकिन उस मुस्कान के पीछे देश और दुनिया के आम इंसानों का दर्द भी छिपा हुआ है, जिसे वे अपनी कविताओं में आवाज़ देते हैं । उन्होंने शायरी करना  वर्ष 1995 से शुरू किया था ।विगत तीन दशकों से  वे उर्दू और हिन्दी साहित्य की सेवा कर रहे हैं।अपनी कविताओं की डायरी और कापियों को वे अपने पलंग के नीचे  टीन की पुराने किस्म की पेटी में सुरक्षित रखते हैं, जिसे उन्होंने  खोला और अपनी हस्तलिखित रचनाओं की बेशकीमती धरोहर हमारे सामने रख दी  ।वे अपनी अधिकांश रचनाओं में लेखन तिथि और समय भी  ज़रूर अंकित करते हैं । उनकी रचनाओं में  जहाँ आज के मनुष्य का दुःख -दर्द  छलकता नज़र आता है, वहीं  उनमें देशभक्ति की भावनाएँ भी  महसूस की जा सकती हैं । उनकी कई रचनाएँ निराशा के स्याह अंधेरे में भटकते इंसानों को राह दिखाने वाली रौशनी की तरह लगती हैं ।आज से 25 साल पहले, वर्तमान युग की कड़वी सच्चाई बयान करती एक अक्टूबर 2001 को दिन के दो बजे लिखी 'हक़ीक़त' शीर्षक रचना में उनकी इन पंक्तियों को देखिए -


*मैं ये नहीं कहता हूँ कि ईमान नहीं है,

 लेकिन यहाँ सच बोलना आसान नहीं है ।

 हर एक आदमी से ये सवाल करूंगा,

 वो कौन है यहाँ जो परेशान नहीं है  ।

पश्चिमी हवा ने हमें कुछ ऐसा बिगाड़ा,

लगता है  मेरा देश हिन्दुस्तान नहीं है ।

कुछ हद से गुजरे जा रही है बेहयाइयाँ,

शर्म -ओ -हया किसी के दरम्यान नहीं है ।

मतलब परस्त लोगों से है दफ़न कायदा,

रिश्ते हैं, मगर रिश्तों में पहचान नहीं है । *


लेकिन जहाँ वे देश के वर्तमान माहौल से व्यथित हैं, वहीं अपने वतन का गुणगान करना भी नहीं भूलते । वे कहते हैं -


*ये ऊँचों में ऊँचा है आसमान की तरह,

  कोई नहीं है मेरे हिन्दुस्तान की तरह ।

  कुन्दन की मानिन्द मेरे देश के ज़र्रे ,

  हर किरण फूटती है  परवान की तरह ।

 चमचमाती जगमगाती गंगा की लहरें,

 शान पे हिमालय है सुल्तान की तरह ।

 इस मुल्क पे टिकी हैं सारे मुल्क की नज़रें,

 सारे ग़रीबों में जैसे धनवान की तरह ।

 'राही' की औकात से बाहर की बात है,

 तारीफ़ क्या करेगा, है नादान की तरह।* 


आत्मीय मुलाकात में उन्होंने बहुत भावुक होकर हमें अपनी इस ग़ज़ल की पहली दो पंक्तियाँ गाकर भी सुनाई । श्रृंखला साहित्य मंच ने एक बार उन्हें  पिथौरा में हुए अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में  आमंत्रित किया था, जहाँ  'शाने हिन्द ' शीर्षक उनकी  इस देशभक्तिपूर्ण  रचना को उनसे तरन्नुम में सुनकर कविगण और श्रोता दोनों झूम उठे  ।अपनी इस ग़ज़ल से मज़ीद भाई कवि सम्मेलन में छा गए थे ।उन्होंने अपनी यह ग़ज़ल 15 दिसम्बर 2001 को सुबह 7बजे लिखी थी ।मज़ीद भाई ओड़िशा के अपने शहर खरियार रोड की गंगा -जमुनी संस्कृति से भी बहुत प्रभावित हैं । यहाँ सभी समुदायों के लोग मिलजुल कर रहते हैं ।  यहाँ की मिट्टी की इस प्यार भरी तासीर को महसूस करते हुए मज़ीद राही ने 27 फरवरी 2001 को रात 2 बजे लिखा -

   *लाखों में एक शहर -ए -हिन्दुस्तान है,

     खरियार रोड नाम है, अम्नो आमान है ।

     अजीब असर है यहाँ की आबो मिट्टी में,

      सब एक रहते हैं जैसे ज़िस्मो जान हैं ।*


  मज़ीद भाई के शहर की तरह  साझा संस्कृति और सदभावना के कुछ शहर और कुछ गाँव अपवाद स्वरूप ज़रूर हो सकते हैं,लेकिन अफ़सोस की बात हैं कि आज  समय ऐसा आ गया है जब देश और दुनिया के अधिकांश के इंसानों में एक -दूसरे के प्रति प्रेम की भावना कम होती रही है और नफ़रत का माहौल बढ़ता जा रहा है, तब ऐसे नाजुक़ वक़्त में शायर मज़ीद राही लोगों को अपनी इन पंक्तियों में  मोहब्बत का पैगाम देते हैं -

*नफरत निकालिये, सभी नफरत निकालिये,

  मिलकर रहें ऐसी कोई सूरत निकालिये.

  आदमी ही आदमी के काम आता है,

   रहने दें आदमी को,दिल से मत निकालिये.

   फिज़ूल ख़र्च से बचें, कुछ फ़ायदा नहीं,

   हर नेक काम के लिये दौलत निकालिये.*


मज़ीद भाई के दिल की ये भावनाएँ उनकी कलम से 21 मार्च 2001 को दिन के दो बजे  निकली थीं, जो आज भी प्रासंगिक हैं। हर सच्चे कवि को जीवन के संघर्षों में घिरे इंसानों का दुःख -दर्द व्यथित और विचलित करता रहता है।मज़ीद राही  भी उन कवियों में से एक हैं ।उन्होंने अपने लेखन के शुरुआती दिनों में,तीन जुलाई 1995 को शाम 7बजे अपनी कविताओं की डायरी में लिखा -

*सागर का छलकना देखकर 

  ये दिल का छलकना हो न सका,

 लोगों से भरी इस दुनिया में

 कोई भी अपना हो न सका ।*


मज़ीद राही की शायरी में व्यंग्य भी है । वे आज के दौर के नेताओं पर तंज कसते हुए लिखते हैं -

     *मज़ाक समझ लिया है देश का नेता बनना,

     पहले आदमी तो बन, फिर देवता बनना ।

     कुछ बनना है तो माँ -बाप का सपूत बन,

    तब कहीं जाके भारत माता का बेटा बनना ।

     जरा बता दो हवस के पुजारियों को यहाँ 

     इतना आसाँ नहीं, शहीदों का सपना बनना ।*

    

 दुनिया में ऐसा कौन शायर होगा , जिसे ग़रीबों की पीड़ा महसूस नहीं होती ? मेहनतकश  ग़रीबों की दयनीय हालत देखकर मज़ीद राही के भीतर का शायर भी कराह उठता है और 'ग़रीबी ' शीर्षक रचना में 25 फरवरी 2001 को शाम छह बजे उनके दिल से निकलती हैं ये पंक्तियाँ -

   *दुनिया में ग़रीबों को आराम नहीं मिलता,

   रोते हैं तो  रोने का अंजाम नहीं मिलता ।

   सच्ची लगन से मेहनत करें, फिर भी ग़म ही ग़म है,

   कभी मेरी वफ़ाओं का इनआम नहीं मिलता ।

   बूँदों की तरह आना, धरती में समा जाना,

   तवारीख़ में कभी हमारा कहीं नाम नहीं मिलता।*

ग़रीब इंसान  अपने ग़मों से  भी हिम्मत नहीं हारता  ।  वह दुःखों के अंधेरे में भी तारों की मानिन्द चमकता रहता है  । कुछ इसी तरह के जज़्बात मज़ीद भाई के इस मुक्तक में भी उतर आए हैं -

   * तूफ़ाने ग़म में ग़रीबों का ठहरना देखो, 

      काँटों के बीच फूलों का महकना देखो।

      चाँदनी चाँद से होती है ये माना मैंने,

      अंधेरी रात में तारों का चमकना देखो ।*


ग़रीबों के दर्द को अपने दिल की गहराइयों से महसूस करते हुए शायर मज़ीद राही ने 27 मई 2002 को दिन के दस बजे 'गुरबत ' शीर्षक रचना में लिखा था - 

   *ज़मीं झाँकती है, गगन झाँकता है,

    वो देखो, किसी का बदन झाँकता है ।

    ग़रीबों से गुरबत का यूँ देखा रिश्ता,

    मैय्यत को जैसे कफ़न झाँकता है ।

    हिकारत से देखो न राही किसी को, 

    तुम्हें जब ग़रीबों का मन झाँकता है ।*

रोजी -रोटी के चक्कर में उलझा हर इंसान अपने आस -पास के माहौल को देखकर कुछ न कुछ सोचता ज़रूर है ।  कुछ न कुछ भावनाएँ उसके दिल में भी उमड़ती -घुमड़ती रहती हैं ।  यह अलग बात है कि ज़िन्दगी की भागदौड़ में व्यस्त रहने की वज़ह से वह उन भावनाओं को शब्द नहीं दे पाता और उसके जज़्बात दिल में ही रह जाते हैं, लेकिन एक शायर या कवि आम इंसान की उन भावनाओं को अपने दिल की गहराइयों से महसूस करता है और अपने चिंतन और लेखन से उन्हें शब्दों के साँचे में ढालकर  दुनिया के सामने रख देता है । मज़ीद राही की रचनाओं को भी हमें उसी नज़रिए से देखना चाहिए ।

आलेख -स्वराज्य करुण,

Tuesday, September 22, 2026

(पुस्तक -चर्चा ) महान संत गुरुनानक देव जी छत्तीसगढ़ यात्रा पर एक महत्वपूर्ण किताब /आलेख -स्वराज्य करुण

 महान संत गुरुनानक देव की छत्तीसगढ़ यात्रा पर एक महत्वपूर्ण किताब 

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         (आलेख  -स्वराज्य करुण )

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महान संत और सिक्ख धर्म के संस्थापक गुरुनानक देव जी आज से लगभग 520  साल पहले छत्तीसगढ़ भी आए थे. वे भारत भ्रमण पर निकले थे और वर्ष 1506 ईस्वी में अमरकंटक से शिवरीनारायण होकर जगन्नाथपुरी जाते हुए छत्तीसगढ़ के ग्राम गढ़फुलझर भी आए थे. इस गाँव से लगे हुए तत्कालीन रानीसागर नामक गाँव में उनका दो दिवसीय पड़ाव था.  गुरुनानक जी के आगमन की याद में रानी सागर का नामकरण 'नानक सागर'  किया गया. गढ़फुलझर और उससे लगा हुआ नानक सागर वर्तमान महासमुंद जिले के अंतर्गत बसना तहसील में हैं . यहाँ पर नानक सागर साहिब गुरुद्वारा भी है.दोनों ओड़िशा के सीमावर्ती गाँव हैं . गढ़फुलझर और नानक सागर आज पूरे देश के सिक्ख समाज की आस्था का प्रमुख केन्द्र बन गए हैं.गुरुनानक जी जगन्नाथ पुरी की यात्रा से वापसी में भी गढ़फुलझर आए थे. उन दिनों छत्तीसगढ़ को दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था. उन दिनों कहीं आने -जाने के लिए आज जैसे साधन नहीं थे. जरा सोचिए, उस दौर में गुरुनानक जी जैसी महान विभूतियाँ अपने प्रेरक विचारों को जन -जन तक पहुँचाने के लिए सैकड़ों, हज़ारों मील की यात्रा कैसे करती रही होंगी! गुरुनानक देव जी भी अपने अनुयायियों के साथ पंजाब से जगन्नाथ पुरी शायद पैदल जा रहे थे. 

                                                        


                                      दिव्य धाम नानक सागर 

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           पूरी दुनिया को सत्य, अहिंसा, दया, करुणा और परोपकार जैसे सर्वश्रेष्ठ मानव मूल्यों का संदेश देने वाले गुरुनानक देव जी के छत्तीसगढ़ प्रवास से जुड़े कई ऐतिहासिक तथ्य हाल के कुछ वर्षों में सामने आए हैं. उनकी छत्तीसगढ़ यात्रा से जुड़े इस प्रकार के विभिन्न ज्ञानवर्धक प्रसंगों पर छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार, पिथौरा (जिला -महासमुंद )निवासी श्री शिवशंकर पटनायक ने 'दिव्य धाम नानक सागर ' शीर्षक से एक महत्वपूर्ण किताब लिखी है.  श्री पटनायक से मिलने मैं उस दिन शाम को उनके घर गया था, जहाँ उनके हाथों मुझे उनकी इस मूल्यवान पुस्तक की सौजन्य प्रति प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त हुआ. उन्होंने प्रबुद्धजनों के विचारों को और उनके द्वारा रखे गए तथ्यों को संकलित और सम्पादित करते हुए  अपने भी विचार इसमें शामिल किए हैं. 

         अब तक 38 किताबें प्रकाशित ; 39 वीं जल्द आएगी 

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पौराणिक और सामाजिक विषयों पर श्री पटनायक की 37 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. यह उनकी 38वीं किताब है, जबकि भगवान श्री रामचंद्र जी के अनुज भरत पर भी उनकी एक पुस्तक जल्द आने वाली है. श्री पटनायक के पौराणिक उपन्यासों में माता कौशल्या पर 'कोशल नंदिनी' रावण की आत्मग्लानि पर 'अग्नि स्नान ', छत्तीसगढ़ के लोक देवता पर 'देवी करिया धुर्वा' , महाभारत के कर्ण पर 'कालजयी कर्ण ' और प्रश्नों की शर शैय्या पर भीष्म ' कहानी संग्रह 'पराजित पुरुष ', 'मंदिर सलामत है' आदि शामिल हैं. 

                उनके साहित्य पर अब तक चार पीएच-डी.

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श्री पटनायक के साहित्य पर शोधर्थियों द्वारा अब तक चार पीएच -डी. भी की जा चुकी है. ताजा शोध प्रबंध वर्ष 2026 में श्री बेनु प्रसाद सिदार ने लिखा है, जिसका विषय है 'शिवशंकर पटनायक के पौराणिक उपन्यासों के नारी -पात्रों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण. यह शोध कार्य पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर के अंतर्गत किया गया है. 

 श्री शिवशंकर पटनायक द्वारा रचित पुस्तक 'दिव्य धाम नानक सागर 'के प्रकाशक पिथौरा निवासी वरिष्ठ पत्रकार श्री रजिन्दर सिंह खनूजा हैं. गुरुनानक देव जी की गढ़फुलझर यात्रा के विभिन्न ऐतिहासिक तथ्यों के खोजकर्ता टाटीबंध, रायपुर के श्री अमृत पाल सिंह (रिंकू ) ओबेरॉय हैं, जो नानक सागर रिसर्च टीम के प्रमुख भी हैं.उल्लेखनीय है .महासमुंद जिले का बसना -सरायपाली क्षेत्र राजवंशों के समय फुलझर राज के  नाम से जाना जाता था. यह एक रियासत थी.लेखक श्री पटनायक ने इस पुस्तक की रचना करने से पहले पत्रकार श्री खनूजा के साथ स्वयं गढ़फुलझर और नानक सागर का अध्ययन दौरा किया था और स्थानीय लोगों से बातचीत करके कई तथ्य भी संकलित किए थे.

         भैना राजवंश के शासन काल में छत्तीसगढ़ आए थे गुरुनानक जी 

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    वर्ष 2023 में प्रकाशित लगभग 150 पन्नों की सुन्दर छपाई और रंगीन चित्रों से सुसज्जित इस पुस्तक के लिए सहयोग राशि 151 रूपए रखी गई है. पुस्तक में गढ़फुलझर के भैना राजवंश की भी जानकारी मिलती है. भैना राजाओं के वंशज श्री राजा राम राजभानू (डिप्टी रजिस्ट्रार -फर्म्स एवं सोसायटीज )ने पुस्तक में 'प्रफ्फुलित मन ' शीर्षक अपने संदेश में लिखा है कि भैना राजा जगत साय ठाकुर के वंशज एवं फुलझर राज्य के संस्थापक राजा फूलसाय  भैना ठाकुर ने गढ़ फुलझर राज की स्थापना की थी. उनकी 18पीढ़ियों ने यहाँ राज किया था.इनमें सभी धर्मानुरागी थे. श्री राजा राम राजभानू के अनुसार जब गढ़फुलझर के राजपाट की ज़िम्मेदारी मानस राज सागरचंद भैना को सौंपी गई, जो अत्यंत कुशल प्रशासक और धर्मशील थे, उनके ही राज काल में गुरुनानक देव जी का गढ़फुलझर आगमन हुआ, जहाँ रानी सागर (अब नानक सागर ) में दो दिन के पड़ाव में उन्होंने लोगों को अपना उपदेश दिया था. गढ़फुलझर के राजा मानस राज सागर चंद भैना ने गुरुनानक जी के नाम पर 5एकड़ ज़मीन भी दी थी.

                       छत्तीसगढ़ और पंजाब के बीच बना ऐतिहासिक रिश्ता 

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मेरे विचार से इसे हम तत्कालीन छत्तीसगढ़ और पंजाब राज्य के बीच बना ऐतिहासिक आत्मीय रिश्ता भी कह सकते हैं. पुस्तक में 'गढ़फुलझर' शीर्षक एक अध्याय में श्री मनमोहन दास वैष्णव को संदर्भित करते हुए भैना राज्य के पूर्व शासक भानुमान का वैवाहिक संबंध चण्डीगढ़ राज्य  उनका  राजकुमारी चंदन कुमारी के साथ होने और इसके फलस्वरूप दोनों राज्यों में प्रगाढ़ मैत्री संबंध स्थापित होने की भी जानकारी दीं गई है. यह भी बताया गया है कि दोनों राज्यों के बीच बहुत दूरी होने के बावजूद प्रजा एक -दूसरे के राज्य में आना -जाना करती थी गुरुनानक जी के अनुयायियों और भक्तों का आगमन भी भैना काल में (गढ़फुलझर क्षेत्र में ) लगातार होता रहा, जिसका प्रभाव यहाँ भी पड़ा.श्रीमनमोहन वैष्णव के अनुसार  समय अबाध गति से बढ़ रहा था, उसी क्रम में पंजाब और गढ़फुलझर के नागरिकों के मध्य संबंध भी बढ़ रहे थे. पंजाब से आए सिखों का मन भी यहाँ रमने लगा था. उन्होंने गढ़फुलझर राज्य में बस जाने का मन बना लिया और स्थायी रूप से रहने लगे. इतने लम्बे संबंधों के कारण स्थानीय रीति -रिवाज, बोली -भाषा, रहन -सहन और संस्कारों को उन्होंने कब स्वीकार कर लिया, यह उन्हें ज्ञात नहीं. इस प्रकार भक्तिकाल में गुरुनानक देव जी के भव्य व्यक्तित्व, वाणी, कीर्तन और उपदेशों का प्रचार -प्रसार भैना राज्य में व्यापक रूप से होने लगा पुस्तक में दिए गए तथ्यों के अनुसार गुरुनानक जी के आगमन पर स्थानीय ग्रामीणों ने उनका शानदार आत्मीय स्वागत किया था.  इस जगह को स्थानीय लोग बावा डेरा भी कहते हैं.

               

             *गुरुनानक जी से प्रभावित हुआ छत्तीसगढ़ का बंजारा समाज *

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 छत्तीसगढ़ का बंजारा समाज भी गुरुनानक जी के उपदेशों को मानने वाला समाज है. पुस्तक से यह भी जानकारी मिलती है कि  लगभग एक हजार बंजारा परिवार इस क्षेत्र के 40 गाँवों में रहते हैं.पुस्तक में नानक सागर रिसर्च टीम के प्रमुख अमृत पाल सिंह (रिंकू )ने  बंजारा समाज के प्रतिनिधियों से हुई चर्चा का भी उल्लेख किया है. उनके हवाले से उन्होंने लिखा है कि बंजारा समाज के पूर्वजों द्वारा गुरुनानक देव जी के नाम से शिवरीनारायण में करीब 5जगहों पर 9 एकड़ जमीन दी गई थी, जो आज भी मौज़ूद है. शिवरीनारायण में और गढ़फुलझर के पास ग्राम लिलेश्वर और जेवरा में गुरुनानक जी का मंदिर है जहाँ मूर्ति भी विराजमान है, जिनकी पूजा वहाँ के स्थानीय बंजारों द्वारा की जाती है. जेवरा में भी गुरुनानक देव जी के नाम 12एकड़ ज़मीन मौज़ूद है. बंजारा समाज के लोगों ने अमृतपाल सिंह को बताया कि वहाँ पर भी समाज ने एक छोटा गुरुद्वारा साहिब का निर्माण किया है.पुस्तक 'दिव्य धाम नानक सागर ' में अन्य विशिष्टजनों के साथ बंजारा समाज महासभा छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष श्री गुहाराम बंजारा का भी शुभकामना संदेश प्रकाशित किया गया है.उनके अलावा छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल, बसना के विधायक श्री सम्पत अग्रवाल, दिल्ली के गुरु सेवक सरदार देवेंदर सिंह,गुरुद्वारा धन धन बाबा बुड्ढा साहिब, तेलीबाँधा रायपुर के प्रधान सरदार हरकिशन सिंह राजपूत, साप्ताहिक 'छत्तीसगढ़ जनादेश ' महासमुंद के प्रधान सम्पादक श्री के. पी. साहू, और हम चाकर गोविन्द के, गतका अखाड़ा कमेटी दुर्ग के अध्यक्ष सरदार हरविंदर सिंह के भी शुभेच्छा संदेश इसमें प्रकाशित किए गए हैं. खोजकर्ता के रूप में अमृतपाल सिंह (रिंकू )ने भी  अपनी बात रखी है.

                     

           कई ऐतिहासिक चित्र भी हैं किताब में 

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पुस्तक में गुरुनानक जी के छत्तीसगढ़ प्रवास से जुड़े कई यादगार चित्र भी दिए गए हैं. इनमें गढ़ फुलझर के प्राचीन किले,गुरुद्वारा नानक सागर साहिब, गढ़फुलझर, मानसरोवर तालाब, भैना राजा के किले और मंदिर, रानी के किले, रानी तालाब,ग्राम नानक सागर में स्थित नानक चबूतरा,बंजारा समाज द्वारा पिथौरा से 31किलोमीटर दूर ग्राम लिलेसर में और ग्राम दाबपाली (बागबाहरा) में निर्मित गुरुनानक जी के मंदिर के फोटोग्राफ़्स भी शामिल हैं. इनके अलावा पिथौरा से लगभग 77किलोमीटर की दूरी पर शिवरी नारायण में भी बंजारा समाज ने  गुरुनानक जी का मंदिर बनवाया था. उसका फोटो भी पुस्तक में दिया गया है. नानक सागर में सिक्ख समाज ने एक भव्य गुरूद्वारे का निर्माण भी 15 मार्च 2026 से शुरू किया गया है.पुस्तक में गुरुनानक जी से जुड़ी 10 प्रेरक घटनाओं की भी जानकारी दी गई है.

                    प्रेरणा का प्रकाश पुंज है 'दिव्य धाम नानक सागर '

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    आज जबकि पूरी दुनिया में जगह -जगह युद्ध, हिंसा और प्रतिहिंसा का भयावह वातावरण है, अराजक तत्वों द्वारा मानव समाज को नफ़रत की आग में झुलसाया जा रहा है, तब  विश्व -शांति, मैत्री और सामाजिक सदभावना के लिए गुरुनानक देव जैसे पवित्र संत -महात्माओं के विचारों से ही मनुष्य को शांतिपूर्ण जीवन जीने का रास्ता मिल सकता है.  इस दृष्टि से देखें तो 'दिव्य धाम नानक सागर ' जैसी पुस्तक  निराशा के अंधकार में भटकते मनुष्यों को सच्चाई और अच्छाई की राह दिखाने वाले प्रेरणा के प्रकाश पुंज की तरह बहुत उपयोगी साबित हो सकती है.

 -स्वराज्य करुण 

Sunday, September 6, 2026

(लघुकथा ) स्वतंत्र देश का 'स्वतंत्र ' गुण्डा / लेखक -स्वराज्य करुण

 लघुकथा 

स्वतंत्र देश का  'स्वतंत्र ' गुण्डा ! 

   (लेखक - स्वराज्य करुण )

    उस दिन  सुबह -सवेरे चार सीधे -सादे , कुछ पढ़े -लिखे मज़दूर आदमी काम पर जाने से पहले  अपने मोहल्ले की एक गुमटी में चाय पी रहे थे और दीन -दुनिया की चर्चा भी कर रहे थे.उनमें से एक ने बाकी तीनों से पूछा - 

"अच्छा, आप लोग जरा ये बताइए, ऐसी स्वतंत्रता और कहाँ मिलेगी, जहाँ दुनिया के किसी स्वतंत्र देश में 'स्वतंत्र' नामक गुण्डा टीव्ही पर खुले आम इंटरव्यू दे और पूरी दमदारी से कहे कि हाँ उसने एक ग़रीब आदमी का सिर फोड़ा, इसके बाद भी कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया?" 
  दूसरा आदमी बोला -"हाँ,उसका यह भी कहना था कि उस स्वतंत्र देश के बड़े -बड़े ताकतवर लोग उसके बड़े भाई हैं और उनका आशीर्वाद हमेशा उसके साथ रहता है और अपराध करने के बाद भी इन ताकतवर लोगों के आशीर्वाद से ही आज वह आज़ाद घूम रहा था."
 तीसरे ने कहा -" लेकिन धन्य है उस स्वतंत्र देश का वह प्राइवेट चैनल, जिसने पॉडकास्ट के रूप में उस अपराधी का इंटरव्यू भी प्रसारित किया.  कल शाम फिर उस देश के एक चैनल में  उसके  एक बयान की यह पट्टी भी दिखाई गई, कि कोई उसका बाल बाँका भी नहीं कर सकता, चाहे ट्रम्प आए या नेतन्याहू ! "
यह सुनकर पहला आदमी बोला -" हालांकि फिर  ये भी ख़बर आई कि उस  'स्वतंत्र  गुण्डे'  को पकड़ लिया गया है.लेकिन पकड़ लिए जाने से पहले वह पूरी अकड़ के साथ गुंडागर्दी के अपने अपराध को गर्व के साथ और  बेशर्मी से टीव्ही पर स्वीकार भी करता रहा  ?सोचने वाली बात ये है कि पकड़ में वह आख़िर कब तक रहेगा? उस देश में तो राम और रहीम के नाम को बदनाम करने वाला एक शातिर अपराधी सीखचों के पीछे आराम फरमाता है और अपनी मर्जी से, जब चाहे, तब थोड़े -थोड़े दिनों के बाद दुनिया की सैर करने  बाहर आता -जाता  है. बताओ भला,उस देश का समाज कहाँ जा रहा है?" 
      चौथे आदमी ने कहा -"समाज कहीं जाए, हमको तो अपने काम पर जाना है, नहीं तो आज की मज़दूरी कैसे मिलेगी? स्वतंत्र नामक वह गुण्डा तो एक न एक दिन अपनी इसी गुंडई ताकत के दम पर उस स्वतंत्र देश को अपना गुलाम बना ही लेगा और वहाँ का नेता भी बन जाएगा,लेकिन फिलहाल तो हमें आज की अपनी मज़दूरी की चिन्ता है." यह कहते हुए वे सब लोग अपने -अपने काम पर निकल पड़े!

     - स्वराज्य करुण 

 

Thursday, July 30, 2026

(पुस्तक -चर्चा )सबकी ख़ुशहाली के लिए 'मेरे दिल की बात ' (आलेख - डॉ. परदेशी राम वर्मा )

 मेरे काव्य -संग्रह पर छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय डॉ. परदेशी राम वर्मा जी के मूल्यवान विचार, उनके समीक्षात्मक आलेख में, जो उन्हें धन्यवाद सहित यहाँ प्रस्तुत हैं -

सबकी ख़ुशहाली के लिए 'मेरे दिल की बात '

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 'मेरे दिल की बात' छत्तीसगढ़ के सुपरिचित कवि स्वराज्य करुण का नया काव्य -संग्रह है. इस संग्रह में उन्होंने अपनी 62 कविताओं को संकलित किया है. भिन्न -भिन्न रंग की रचनाओं के माध्यम से अपने दिल की बात कहने का उन्होंने सुन्दर प्रयत्न किया है. स्वराज्य करुण यूँ तो गद्य लेखक के रूप में भी विशेष पहचान रखते हैं, किन्तु मूलतः वे कवि हैं. विगत चालीस वर्षो से वे कविताएँ लिख रहे हैं. उन्होंने बच्चों के लिए भी ख़ूब लिखा है. गीत विधा और ग़ज़ल पर भी उनका भरपूर अधिकार है. वे सरलता के आग्रही हैं. गीतों, ग़ज़लों में भी उनका यह आग्रह देखते ही बनता है -

     "ये अपनी धरती 

     धान का सागर है,

     दूर -दूर तक फैले 

      प्रेम के आखर हैं."

यह बहुत प्रभावी प्रयोग है. छत्तीसगढ़ धान का कटोरा है -इस मुहावरे पर मुग्ध माटी -पुत्र स्वराज्य  करुण ने कितना विराट आकार देने का यत्न किया है!कटोरे को उन्होंने 'धान का सागर ' कहा और धान के भरे -भरे खेतों को 'प्रेम का आखर 'कहा. छत्तीसगढ़ प्रेम, समता, अहिंसा और मेल -मिलाप की धरती है.यह धान उपजाने वाला 'धान का सागर 'है.धान के खेत इसीलिए 'प्रेम के आखर' के रूप में कविता में आए हैं.  स्वराज्य करुण का जन्म गरियाबंद में हुआ. छत्तीसगढ़ का यह हरा -भरा क्षेत्र बेहद सुन्दर है. इस क्षेत्र की सुन्दरता का असर कवि पर होना स्वाभाविक है. उन्होंने अपने जन्म स्थल के सौंदर्य को सदैव रेखांकित किया है -

       "नीला पर्वत, निर्मल नदियाँ और यह तालाब,

       लगता जैसे दिन में भी कोई सुन्दर ख़्वाब. 

       सौ -सौ जनम इस धरती पर रहे सदा आबाद,

      एक अनोखा सुख देती है हमको इसकी याद."


                          




                                                          डॉ. परदेशी राम वर्मा 

इस संकलन में अधिकांश कविताएँ प्रकृति की सुन्दरता पर हैं. लेकिन हमारे दौर की विसंगतियों पर भी संग्रह में प्रभावी रचनाएँ हैं. एक तरफ प्रकृति की सुन्दरता पर कवि मुग्ध होकर बार -बार इसी छत्तीसगढ़ में जन्म लेने की कामना करता है तो दूसरी ओर विरूपित हो रही दुनिया के संताप को महसूस कर व्यथित भी होता है-

     "बेच रहे देश को आसान किश्तों में,

     ग्राहकों की कमी नहीं इस कारोबार में.

     बिक जाएगा वतन देखते ही देखते,

     ध्यान अगर गया नहीं वतन की पुकार में."

विसंगतियों पर प्रहार करने का करुण जी का यह अंदाज ध्यान आकृष्ट करता है -

      "कैसे -कैसे मंज़र आए गाँधी जी के देश में,  

      फूल नहीं अब खंजर आए गाँधी जी के देश में "

इस संग्रह में गीत, ग़ज़ल और नई कविताएँ एक साथ हैं. दिल की बात है,  जिस ढंग से भी अभिव्यंजित हो. स्वराज्य करुण हिन्दी, छत्तीसगढ़ी और ओड़िया, तीन भाषाओं के जानकार हैं. उन्होंने वर्ष 1985 में नृसिंहनाथ मंदिर पर केंद्रित निराकार महालिक की ओड़िया भाषा में लिखित पुस्तक का हिन्दी अनुवाद किया था. वर्ष 2002 में उनका बालगीत संग्रह प्रकाशित और चर्चित हो चुका है.'   'हिलमिल सब करते हैं झिलमिल' संग्रह में उनकी चर्चित बाल कविताएँ हैं. 

    विद्यार्थी जीवन से ही लगातार लिखते रहने वाले स्वराज्य करुण जब विभिन्न दायित्वों से जुड़कर वैचारिक लेखन करते हैं, तब भी पठनीयता की शर्तों का ध्यान रखते हैं. प्रस्तुत संग्रह 'मेरे दिल की बात 'की कविताओं में उन्हें मुक्त उड़ान भरने का अवसर लगा है, जिसका उन्होंने ख़ूब लाभ भी लिया है. व्यवस्था से जन्मी विसंगतियों पर प्रतीकों में मर्यादित प्रहार करने का अवसर उन्होंने नहीं खोया है. तमाम निराशा और हताशा से भरे दौर में भी वे आशान्वित हैं. वे बहुत बड़ी आशा भी नहीं करते. वे आम आदमी के कवि हैं. इसलिए केवल यही कामना करते हैं -

   "न तरसे कोई दो वक़्त की थाली के लिए,

   दुआ करें सबकी ख़ुशहाली के लिए."

        

         आलेख  -डॉ. परदेशी राम वर्मा 

           एल. आई. जी. 18,

          आमदी नगर, भिलाई 490009 

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कृति : मेरे दिल की बात 

कवि : स्वराज्य करुण 

प्रकाशक : जी. नाइन पब्लिकेशन, 

रायपुर

प्रकाशन वर्ष 2011

मूल्य ; 50 रूपए 

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Thursday, July 2, 2026

(ग़ज़ल ) घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा? - स्वराज्य करुण

 घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा ?

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उजड़ते हैं कई घर, उजड़ती हैं बस्तियाँ 

फिर भी कम होती नहीं उनकी मस्तियाँ.

उनको चाहिए जगह ख़ूब लम्बी चौड़ी 

सियासत में मगन हैं जो बेखौफ़ हस्तियाँ .

उनके लिए तो खेल है ये रोज का यहाँ 

हाथों में जिनके है सिंहासन की रस्सियाँ.

आएगा तूफ़ाँ क्या उनको नहीं पता,

भंवर में छोड़ जाएगा जो उनकी कश्तियाँ.

तिनकों को जोड़ जिसने बनाया था अपना घर 

लुटेरों ने लूट लिया कल उसका आशियाँ.

घर में उसके कैसे जलेगा कहो चूल्हा 

वीरान रसोई में कैसे बनेंगी रोटियाँ .

तबाही का तमाशा हुआ बच्चों के सामने 

क्या सोचेंगी कहो कल नई -नई पीढ़ियाँ.

  -स्वराज्य करुण 


Wednesday, July 1, 2026

(कविता ) हर लफ्ज़ बेअसर हो गया है..! कवि - स्वराज्य करुण

 हर लफ्ज़ बेअसर हो गया है..!

     (कवि -स्वराज्य करुण )

चेहरा उसका ख़ूनी खंजर हो गया है, 

दिल भी बेरहम बुलडोजर हो गया है.

दर्द किसी का क्या जाने वो कुर्सीवाला , 

जिसके हाथों गाँवों का मर्डर हो गया है.

जज्बातों के फूलों को कुचला है जिसने,

 इरादा उसका निर्मम पत्थर हो गया है.

खामोशी से देख रहा सब जुल्म यहाँ,

आदमी जो मंदिर का ईश्वर हो गया है.

कोई रोये या चीखे अब सामने उसके,

प्रार्थना का हर लफ्ज़ बेअसर हो गया है.

सीधे सादे इंसानों  का घर - आंगन,  

पल भर में ही कितना जर्जर हो गया है.

उनके सपनों का बगीचा जा कर देखो, 

आज वहाँ ये कैसा मंजर हो गया है.

फूलों जैसे नाजुक -नाजुक बच्चों में भी,

जाने कौन इतनी दहशत बो गया है.

राजमहल तुम अपने लिए वहाँ बनाओगे,

जहाँ पे उसका खेत बंजर हो गया है.

मज़दूर ने  अपनी मेहनत से जो घर बनाया, 

तुम्हारे हाथों आज वो खंडहर हो गया है.

जिसके ख़्वाबों को  तुमने दफ़न कर दिया,

वह इंसान बागी अब उठकर हो  गया है.

पी रहे हो  तुम जिसे समझकर अमृत,

लिये तुम्हारे पछतावे का जहर हो गया है.

बर्बाद किया है तुमने जिस गाँव को सुनो, 

ग़रीबों के अभिशाप का वो शहर हो गया है.

उनकी आहें तूफानों में इक दिन बदलेंगी, 

देखोगे तब झोंका हवा का बवंडर  हो गया है.

-स्वराज्य करुण 

 



Monday, June 29, 2026

(कविता ) कहाँ जाएँ सब बेघर पंछी? -स्वराज्य करुण

कहाँ जाएँ कहो बेघर पंछी?

      (स्वराज्य करुण )

कहाँ जाएँ कहो बेघर पंछी  धूप और बरसात में 

उजड़ गए  घरौंदे जिनके, सुबह, दोपहर, रात में.

अब न होगी भिनसारे उनकी प्यार भरी चहक यहाँ 

नहीं मिलेगी आंगन में अब मोंगरे की महक यहाँ.

बच्चों की आँखों के आगे उजड़े जिनके गाँव 

उन मेहनतकश परिवारों को कहाँ मिलेगी छाँव.

करते थे जो बहा पसीना, कुछ सपनों की खेती,.

पूछ रही माटी -महतारी कहाँ अपनों की खेती.

अंधियारे में तुलसी चौरा, रोये घर की महतारी 

जाने किसकी नज़र लगी है शोक में डूबे नर -नारी. 

राजाओं के महल बनेंगे खेतों और खलिहानों में,

मजूर किसान की गिनती भी कब होती है इंसानों में.

नहीं छोड़ेंगे गाँव तो उनकी बस्ती में आग लगाएंगे

फिर उनकी खाली जमीन पर वे अपने बाग लगाएंगे.

उनको अपना नौकर समझे, दुत्कारे हर बात में, 

आ गया है छल -कपट से पावर जिनके हाथ में.

शहरों से जो सज -धज कर आए अपनी मोटर कार में,

उनका दिल क्यों डूबेगा बोलो यहाँ के हाहाकार में.

-स्वराज्य करुण 

29 जून 2026 












Friday, June 5, 2026

(आलेख ) पर्यावरण संकट को लेकर हमारी चुप्पी शर्मनाक भी और खतरनाक भी !

 आज 5जून ; विश्व पर्यावरण दिवस 

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(आलेख - स्वराज्य करुण )

  हम आख़िर कैसी दुनिया चाहते हैं?क्या हमें हरे -भरे वनों, पर्वतीय झरनों   और नदियों की अमृत धाराओं से परहेज है? अगर नहीं तो क्यों हम ख़ामोश रहकर इनकी बर्बादी देखते रहते हैं? यह ज़रूर है कि हममें से कुछ लोग इनकी रक्षा के लिए संघर्ष करते रहते हैं । उनके जज्बे को प्रणाम और सलाम, लेकिन  पर्यावरण बचाने की लड़ाई में उनका साथ देने वाले हममें से आख़िर हैं कितने लोग? जंगल तबाह हो रहे हैं,पहाड़ उजड़ते जा रहे हैं, नदियाँ सूखती जा रही हैं । विश्व पर्यावरण दिवस आज हमें चीख़- चीख़ कर कह रहा है कि  तेजी से तबाह हो रहे अपने प्राकृतिक पर्यावरण को बचा लो, लेकिन इन चीखों के जवाब में उन्हें मिलती है हमारी कायरतापूर्ण चुप्पी! यह चुप्पी बेहद शर्मनाक है,  चिन्ताजनक है और बेहद खतरनाक भी । 


                                        


विश्व पर्यावरण दिवस सिर्फ़ पौधे लगाने की औपचारिकता तक सीमित नहीं रहना चाहिए । लगाए गए पौधों की देख -भाल भी हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए । देखा जाए तो पर्यावरण के भी कई प्रकार होते हैं । मेरे ख़्याल से इनमें पहला है प्राकृतिक पर्यावरण, जिसमें नदी, पहाड़,तालाब, जंगल और झरनों के साथ -साथ समुद्र और और वायुमंडल भी शामिल है। इसी कड़ी में सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और औद्योगिक पर्यावरण  सहित मनुष्य का स्वयं का मानसिक और पारिवारिक पर्यावरण भी है । हमें इन सभी प्रकार के पर्यावरणों की रक्षा करनी होगी, लेकिन इसके लिए सबसे पहले प्राकृतिक पर्यावरण को बचाना होगा । हमारा प्राकृतिक परिवेश अगर स्वच्छ रहेगा तो बाकी सभी पर्यावरणीय संकट अपने -आप समाप्त होते जाएंगे । अगर हम समाज में सुख ,शांति और समृद्धि चाहते हैं तो सबसे पहले अपने प्राकृतिक पर्यावरण को बचाना होगा ।  स्वच्छ पर्यावरण हमारे शारीरिक पर्यावरण को भी स्वस्थ बनाएगा । 

तरह -तरह की बीमारियों का असली कारण हमारा प्रदूषित पर्यावरण ही तो है! भारत के संदर्भ में मुझे प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वर्ष 2014 में देश में शुरु किए गए स्वच्छ भारत अभियान की याद आ रही है । देश के लाखों गाँवों और हजारों शहरों में इस अभियान के लिए जन भागीदारी के साथ, जैसा उत्साहजनक वातावरण बना था, लगता है कि उसकी आँच अब धीमी पड़ गई है । पर्यावरण की स्वच्छता के लिए जिस अच्छे उद्देश्य से और जिस जोशीले अंदाज में यह अभियान चलाया गया था, क्या  उसी जोश -ओ -खरोश से उसे दोबारा शुरु नहीं किया जा सकता?

      लेकिन दिक्कत यह है कि  हम सब नागरिक अपने पर्यावरण पर गहराते संकट को लेकर बहुत लापरवाह हैं । सब कुछ जानते ,समझते हुए भी इंसान अपने पर्यावरण को दूषित कर रहा है और अपने साथ -साथ अपनी दुनिया को भी तबाही के रास्ते पर ले जा रहा है। पहाड़ों की हरियाली को नोच खसोट कर उनके नैसर्गिक सौंदर्य को नष्ट करने में अब शायद किसी को कष्ट नहीं होता। बढ़ती जनसंख्या ,बढ़ते शहरीकरण और तीव्र गति से फलते -फूलते  औद्योगिक विकास की वजह से जल ,जंगल ,पहाड़ और ज़मीन  आज गंभीर संकट में हैं। अत्यधिक शहरीकरण और सीमेंट कांक्रीट की लगातार पसरती बस्तियों में (अब तो गाँवों में भी )पक्के मकानों का निर्माण हो रहा है। सीमेंट कांक्रीट की सड़कें बन रही हैं। इन सबमें प्राकृतिक पत्थरों के उपयोग के लिए मनुष्य और मशीनों के हाथों पहाड़ उजड़ते जा रहे हैं। 

    हर कोई आज पक्के घरों में रहना चाहता है। इसमें मनुष्य की कई तरह की मज़बूरियाँ भी हैं ।चारे पानी की तलाश में गाँवों में आने जाने वाले बन्दर ग्रामीणों के  खपरैल वाली छतों को उजाड़ देते हैं। जंगल कट रहे हैं ,तो वहाँ रहने वाले पशु -पक्षियों का जीवन भी खतरे में पड़ गया है। हमें इन सबका विकल्प भी सोचना होगा। नये जंगल लगाने होंगे। उजड़ते पहाड़ों में सघन वृक्षारोपण करना होगा।आधुनिक ड्रोन टेक्नोलॉजी के जरिए उनमें बरसात के दिनों में फलदार ,छायादार वृक्षों के बीजों का छिड़काव हो सकता है।  शायद उनमें पीपल जैसे वृक्षों के बीजों का छिड़काव भी हो  तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं ,क्योंकि पीपल की जड़ें कठोर धरती और पत्थरों की दरारों के बीच भी उगने के लिए जगह बना लेती हैं। लोग कहते हैं कि यह चौबीसों घंटे ऑक्सीजन देने वाला वृक्ष है।

    देश में आज प्लास्टिक और पॉलीथिन का कचरा हमारे पर्यावरण के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। शहरों के साथ साथ हमारे गाँव और कस्बे भी प्लास्टिक प्रदूषण के शिंकजे में है। अधिकांश लोग जानते हैं कि  प्लास्टिक कचरे की रिसाइक्लिंग करके उसे दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है ,सड़क निर्माण में प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल हो सकता है , लेकिन इंसान हर तरफ प्लास्टिक के डिब्बों बोतलों और पॉलीथिन की थैलियों का उपयोग करने के बाद उन्हें लापरवाही से इधर उधर फेंककर प्रदूषण फैलाने का अपराध कर रहा है । यहाँ तक कि अब तो हमारे महासागर भी इस प्रदूषण की चपेट में आ गए हैं। यह एक अच्छी पहल है कि भारत सरकार द्वारा देश के कई शहरों में प्लास्टिक इंजीनियरिंग संस्थान संचालित किए जा रहे हैं ,जहाँ युवाओं को इस विषय में प्रशिक्षण के साथ डिग्री /प्रमाणपत्र भी दिये जाते हैं। प्लास्टिक रिसाइकिलिंग में इन युवाओं की प्रतिभा का उपयोग करते हुए उन्हें रोजगार के अवसर दिए जा सकते हैं। 

      अगर देश में कृषि उपजों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की तरह प्लास्टिक कचरे की सरकारी खरीदी के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित हो और जगह जगह खरीदी केंद्र बना दिए जाएं तो जहाँ बड़ी संख्या में गरीबों को कुछ अतिरिक्त आमदनी हो सकती है ,वहीं हमारे चारों ओर प्लास्टिक और पॉलीथिन के बेतरतीब  फैलते लाखों  टुकड़े काफी हद तक साफ़ हो जाएंगे।

   दुनिया भर में कई देशों द्वारा समुद्र और ज़मीन के भीतर और हवा में किया जाने वाला परमाणु हथियारों का परीक्षण भी बढ़ते प्रदूषण का एक ख़तरनाक कारण बन गया है। पूरी दुनिया में परमाणु परीक्षणों और परमाणु हथियारों पर कड़ा  प्रतिबंध लगा देना  चाहिए।  लगभग दो दशक पहले हुए अमेरिका -इराक युद्ध, वर्ष 2021 से चल रहे रूस -यूक्रेन युद्ध और इस वर्ष 2026 में अमेरिका -इजराइल और ईरान के बीच हो रही लड़ाई में 

जिस बड़े पैमाने पर बमबारी हुई और हो भी रही है, क्या उससे जन -धन की हानि के साथ -साथ पर्यावरण का भी विनाश नहीं हुआ होगा? लेबनान पर इजराइली हमलों में भी जन -धन और पर्यावरण का भारी विनाश हुआ ही होगा । आज ज़रूरत इस बात की है कि पर्यावरण और मानवता की रक्षा के लिए ऐसे युद्ध  तत्काल रोके जाएँ और पूरी दुनिया में धरती के मरणासन्न हरित आवरण को नया जीवन दिया जाए ।

      आलेख   -स्वराज्य करुण

      चित्र  -आचार्य ललित मुनि 

Wednesday, March 18, 2026

(पुस्तक -चर्चा ) एक साझा कविता -संग्रह की अगले साल होगी स्वर्ण जयंती /लेखक -स्वराज्य करुण

 एक साझा कविता -संग्रह की अगले साल होगी स्वर्ण जयंती 

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लगभग 49 साल पहले के आरंग की हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कविताएँ 

             

 (आलेख -स्वराज्य करुण )

   छत्तीसगढ़ में साझा कविता संग्रहों के प्रकाशन की उत्साहजनक परम्परा आज भले ही कमज़ोर पड़ गई हो, लेकिन उस दौर में शहरों और कस्बाई गाँवों से प्रकाशित हुए कई संकलन आज भी उस परम्परा की याद दिलाते हैं ।  महानदी के समीपवर्ती  शहर आरंग के 22 कवियों के साझा संग्रह 'आरंग के कवि ' का प्रकाशन  लगभग 49 साल पहले जून 1977 में हुआ था   ।  आगामी जून 2027 में इसके  50 साल पूरे हो जाएंगे, जो हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कवियों के इस मिले -जुले  कविता संग्रह की स्वर्ण जयंती होगी  । अभिव्यक्ति की चाहत हर व्यक्ति में होती है । हर किसी के मन में अपने आस -पास हो रही अच्छी -बुरी घटनाओं के बारे में तरह -तरह के विचार उठते रहते हैं , जिन्हें वह बातचीत में किसी न किसी से साझा करता ही है ।  अगर व्यक्ति कवि या लेखक हुआ तो वह अपने विचारों को या अपनी भावनाओं को लिखकर प्रकट करता है । उसकी अभिव्यक्ति कविता, कहानी, निबंध आदि साहित्यिक विधाओं में समाज के सामने आती है ।  आरंग के कवियों का यह साझा -संग्रह भी मनुष्य की वैचारिक अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण दस्तावेज है । छत्तीसगढ़ की साहित्यिक विरासत को और भी ज़्यादा धनवान बनाने में स्थानीय स्तर के ऐसे प्रकाशनों का भी सराहनीय योगदान रहा है  । ऐसे प्रकाशन जिस गाँव, कस्बे या शहर में होते हैं, उसे भी दूर -दूर तक  साहित्यिक पहचान मिलती है ।

                                         


आरंग छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक शहर है जो प्रदेश की राजधानी रायपुर से लगभग 35 किलोमीटर पर राष्ट्रीय राजमार्ग 53के किनारे बसा हुआ है  । स्थानीय साहित्यकारों और साहित्यिक अभिरुचि के नागरिकों ने मिलकर यहाँ हिंदी साहित्य परिषद का गठन किया था, जिसके संयोजक थे सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. विनय कुमार पाठक, जो उन दिनों आरंग महाविद्यालय में हिन्दी के सहायक प्राध्यापक हुआ करते थे और छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के तीसरे अध्यक्ष भी रहे  । अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल 2016 से 2018 तक रहा. डॉ. पाठक इन दिनों अपने गृहनगर बिलासपुर में साहित्य सृजन के साथ -साथ वहाँ के साहित्यिक आयोजनों में  काफी व्यस्त रहते हैं।वे  थावे विद्यापीठ (बिहार) के कुलपति भी हैं  ।   आरंग में सहायक प्राध्यापक के रूप में अपने कार्यकाल में उन्होंने बेहतरीन साहित्यिक वातावरण बनाने का सराहनीय प्रयास किया था, जिसके फलस्वरूप 'आरंग के कवि 'का प्रकाशन  संभव हो पाया । इसका सम्पादन भी उन्होंने किया था।

 इस संकलन में हिंदी के 13 और छत्तीसगढ़ी के 9 कवि शामिल हैं। यह साझा कविता संग्रह कवर पेज सहित 32पेज का है, उन दिनों इसकी कीमत सिर्फ़ एक रूपए रखी गई थी ।  हैण्ड कम्पोजिंग से इसकी छपाई  नंदिनी मार्ग, भिलाई नगर स्थित श्री छत्तीसगढ़ प्रेस में हुई थी । बाइंडिंग स्टेपलर से की गई थी  । कविता -संग्रह 'आरंग के कवि 'का प्रकाशन पचरी घाट, जूना, बिलासपुर स्थित प्रयास प्रकाशन द्वारा किया गया था. यह प्रयास प्रकाशन की तैंतीसवीं भेंट थी  । 

    संग्रह के प्रारंभ में 'आरंग और आरंग के कवि 'शीर्षक अपनी चार पेज की भूमिका में प्रयास प्रकाशन के संचालक डॉ.विनय कुमार पाठक ने इस कस्बे की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठ भूमि पर प्रकाश डाला है । इसके साथ ही उन्होंने यहाँ के यादगार साहित्यिक आयोजनों की भी चर्चा की है । उन्होंने यह भूमिका उन्होंने 11जून 1977 को छत्तीसगढ़ी समारोह दिवस के अवसर पर लिखी थी । डॉ. पाठक भूमिका की शुरुआत करते हुए लिखते हैं -

  "मोरध्वज की दानशीलता के लिए विश्व विख्यात, जैनियों के श्रद्धा का केन्द्र स्थल, कलचुरि युग के सांस्कृतिक -कलात्मक विकास का प्रतीक आरंग  युग के विविध आरोह -अवरोह को अभिव्यक्त करता है, जहाँ शैव, वैष्णव, जैन, बौद्ध और आंचलिक देवी -देवताओं के सामान्य और विशिष्ट रूप अवस्थित हैं । कहीं सत्यनाम की गूंज है तो कहीं कबीर पंथ के चौका का स्वर  । स्वधर्मों में संलग्न यहाँ के वासी और इतर धर्मावलम्बी धर्म -निरपेक्षता और सह -अस्तित्व का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं ।  आरंग छत्तीसगढ़ का संक्षिप्त संस्करण कहा जा सकता है. छत्तीसगढ़ का सही स्वरूप आरंग में केंद्रीभूत है  । " 

डॉ. पाठक आगे लिखते हैं -"खंडहर अतीत की उज्ज्वल गाथा को उदाभाषित करता है.ऐतिहासिक -सांस्कृतिक दृष्टि से आरंग की समृद्धि अभिलेखों और उपलब्ध पुरातत्व सामग्रियों में संरक्षित है । जिस नगरी की सांस्कृतिक -ऐतिहासिक समृद्धि विश्रुत -विख्यात हो, वहाँ की साहित्यिक -थाती निःसंदेह सामर्थ्यवान होगी  । ऐसा आभास होता है कि यहाँ की साहित्यिक -साधना स्वान्तः सुखाय में संलग्न रही ।  उचित पर्यावरण के अभाव में यहाँ की प्रतिभाएँ काल -कवलित हो गईं । नौकरी पेशे से आयातित साहित्यिकों ने यहाँ के साहित्यिकों के साथ संशलिष्ट -समन्वित होकर हिंदी साहित्य समिति की स्थापना की, जिसमें सर्वश्री बाबूलाल चौबे, नत्थूलाल दुबे, चिन्ता प्रसाद द्विवेदी, रामनारायण शुक्ला, रामानुज दास वैष्णव, लखन लाल गुप्ता (वस्त्र विक्रेता )आदि का योगदान उल्लेखनीय रहा  । 

     भूमिका में डॉ. पाठक ने लिखा है कि तीन दिसम्बर 1973 को आरंग में हिन्दी साहित्य परिषद की स्थापना हुई, जिसका विधिवत उदघाटन डॉ. पालेश्वर शर्मा ने किया तथा अध्यक्षता ठाकुर हृदय सिंह चौहान ने की  ।  परिषद के तत्वाधान में 26जनवरी 1974 को कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ, जिसमें 'अकादसी 'का विमोचन भी हुआ.उन्होंने चर्चा के दौरान बताया कि 'अकादसी ' उनकी छत्तीसगढ़ी कविताओं का संग्रह था । डॉ. पाठक भूमिका में आगे लिखते हैं -कवि सम्मेलन में सर्वश्री रविशंकर शुक्ल, पन्नालाल सराठे 'रत्नेश ', रामेश्वर वैष्णव आदि कवियों के साथ स्थानीय प्रतिभाएँ भी मंचित हुईं । प्रथम अधिवेशन में सर्वश्री पवन दीवान, विमल पाठक, लक्ष्मण मस्तूरिया, विश्वनाथ योगी, डॉ. प्रेम त्रिपाठी, मनोहर शर्मा, ईश्वर शर्मा, माखन लाल तम्बोली आदि कवियों की उपस्थिति ने जन मानस पर प्रभाव डाला । द्वितीय अधिवेशन में नवरंग कला केन्द्र, भिलाई नगर के टेलीविजन और आकाशवाणी के ख्याति प्राप्त छत्तीसगढ़ी लोक -कलाकारों का सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ । इसी कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ी साहित्य के युग -प्रवर्तक पंडित द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्र 'का अभिनंदन किया गया । प्रथम और द्वितीय अधिवेशन के साथ छत्तीसगढ़ी समारोह दिवस का तृतीय -चतुर्थ आयोजन समन्वित था ।  तृतीय अधिवेशन में प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी नाटक 'माटी जागिस रे ' का मंचन स्थानीय फ्रेंड्स क्लब के साथ सहयोगार्थ हुआ ।  इस भव्य मंच पर श्री विमल कुमार पाठक का सम्मान परिषद की ओर से किया गया । इसके पूर्व डॉ. शत्रुघ्न पाण्डेय के मुख्य आतिथ्य में हिंदी दिवस मनाया गया  । डॉ. विनय कुमार पाठक ने भूमिका में 'आरंग के कवि ' को आरंग नगरी के प्रकाशित -अप्रकाशित, साधक -आराधक, परिष्कृत -अपरिष्कृत, प्राचीन -अर्वाचीन, समग्र कवियों का संचयन बताया है  । उन्होंने 'आरंग के कवि ' को एक ऐसा पुष्प -स्तवक भी बताया है, जिसमें उनके शब्दों में  "विविध रंगी पुष्प रुपी कवि गण समन्वित -संगुफित हैं और जो आरंग की वर्तमान साहित्यिक चेतना को मुखरित करने का विनम्र प्रयास कर रहा है ।  "

        उल्लेखनीय है कि 22 कविताओं के इस छोटे -से लेकिन महत्वपूर्ण साझा संकलन के हिन्दी कवियों में सर्वश्री चिन्ता प्रसाद द्विवेदी, बाबूलाल चौबे, रामानुज दास वैष्णव, भगत सिंह सोनी, निर्मल कुमार रिछारिया, रामदेव सिंह , अनूपनाथ योगी,गोवर्धन लाल अग्रवाल, राममोहन अग्रवाल,प्रहलाद कुमार मराठा, चुन्नीलाल चंद्रवंशी , रूद्रनाथ चंद्राकर और मनोहर लाल साहू की रचनाएँ शामिल हैं,  वहीं  डॉ. विनय कुमार पाठक, वीरेन्द्र कुमार नामदेव, कृष्णमोहन अग्रवाल, सत्येन्द्र कुमार यदु, अरुण कुमार दुबे, लखन लाल अग्रवाल, दीनदयाल साहू,लखन लाल गुप्ता और श्रीमती रजनी पाठक की छत्तीसगढ़ी कविताएँ भी प्रकाशित की गई हैं । दोनों ही भाषाओं की लगभग सभी कविताओं में  जन भावनाओं को अभिव्यक्ति देने का सार्थक प्रयास किया गया है, जिनमें सामाजिक विसंगतियों के साथ -साथ समाज का दुःख -दर्द भी प्रकट होता है  । 

   हिन्दी खण्ड में पहली कविता चिन्ता प्रसाद द्विवेदी की है, उनके गीत 'अधूरा जीवन 'के इस छंद को देखिए -

     *सुनाऊँ किसे आपबीती कि मैंने 

     युगों से यातनाएँ सही हैं,

     किसी की खुशी के लिए ही हमेशा,

     हमारी जवानी अधूरी रही है । * 

 आगामी कड़ियों में बाबूलाल चौबे ने 'दीप शिखा ', रामानुज दास वैष्णव ने  'विज्ञान का दानव ', भगत सिंह सोनी ने 'धनात्मक ज़िन्दगी ' शीर्षक  कविताओं में अपनी -अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी है.

भगत सिंह सोनी की कविता की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं -

  *सुना है कुछ लोग 

  धनात्मक ज़िन्दगी जीते हैं.

  मुझे नहीं मालूम,

 सिर्फ़ जानता हूँ -

 कुरिया से कब्रिस्तान तक  की 

 ऋणात्मक ज़िन्दगी । *

      प्रहलाद कुमार मराठा की कविता 'नेता नहीं, काम चाहिए ' और चुन्नीलाल चंद्रवंशी की कविता 'चमचावाद 'में राजनीतिक परिस्थितियों पर व्यंग्य प्रहार है  । 


छत्तीसगढ़ी खण्ड में डॉ. विनय कुमार पाठक का गीत 'हमर मया के सुरूज मरगे '  की भावनाएँ बहुत मर्मस्पर्शी हैं -

   *हमर मया के सुरूज मरगे, एमा मोला नइये अचरज,

   अचरज हे तो एक गोठ म, आँसू के तप विरथा होगे  । 

   हमर मया बासी कस गुरतुर,दया -पेज म बूड़े रहै,

   अंगाकर रोटी कस मन तेमा, मिरचा अंतस म गुड़े रहै  । 

   भगवाने के कान फूटगे, एमा मोला नइये अचरज,

   अचरज हे तो एक गोठ म तुलसा के जप विरथा होगे । *

संकलन में वीरेन्द्र कुमार नामदेव ने अपने छत्तीसगढ़ी गीत  'लहू औटाके जिनगी जीथस ' में देश के किसानों को सम्बोधित करते हुए उनकी मेहनत को शब्दों के भावनात्मक साँचे में ढाला है ।  इन पंक्तियों में उनकी अभिव्यक्ति देखिए -

     *जाग जा नगरिहा, उठ जा रे किसान 

     सुरूज अपन अंगठी ले खरोचत हे कान.

     गियान के कुकरा बासत हे,सुन ले देके कान.

     बइला, नाँगर तोर संगवारी 

    वोकरे संग करथस तंय गोठ,

     लहू औटाके जिनगी जीथस,

     मन ल चिटको नइ करस मोठ  । 

     तोर किसानिन कस हरियर लुगरा 

     पहिरे मटमटावय धान । *

संग्रह  में कृष्ण मोहन अग्रवाल का गीत 'हिरदे के सोन चिरइया' और  सत्येन्द्र कुमार यदु का गीत 'हमर नानकुन सुघ्घर गाँव ' भी बहुत प्रभावशाली है,  वहीं ' घुना घुना कस देस 'शीर्षक अरुण कुमार दुबे के छत्तीसगढ़ी गीत में देश की हालत पर मार्मिक व्यंग्य है. लखन लाल अग्रवाल अपनी रचना 'ये धान के कटोरा मोर ' में छत्तीसगढ़ के गाँवों, किसानों और मज़दूरों की पीड़ा को वाणी देते हैं-

  *ये धान के कटोरा मोर, कइसे कंगला बनगे,

  जगह -जगह भिखमंगा बाढ़ीन,

  चरौटा भाजी तक नहीं बाचिस,

खाली होगे गाँव दिन -दिन, रोजी के तलाश में ।  *


हालांकि कवि इस गंभीर संकट से मुक्ति के लिए ग्रामीणों से कहते हैं -

  * तरिया बांध के, नरवा बांध के, सिंचाई ला बढ़ाऔ,

   कुआँ खोदावो, पम्प लगाओ, नहर बढ़ाय के साधन जुटाओ  । 

   अपन बस के जम्मो ताकत, तरक्की बर लगावो  । *

अगले क्रम में कवि लखनलाल गुप्ता छत्तीसगढ़ के लोगों का स्वाभिमान जगाने की कोशिश करते हैं. उनकी इस कविता का शीर्षक है - माथा के करम ला नहीं, हाथ के करम ला देख '. इस रचना की प्रारंभिक पंक्तियों में कवि की भावनाओं को महसूस कीजिए -

 *हमन आन छत्तीसगढ़िया औ रहेन 

 छत्तीसगढ़िया रे छत्तीसगढ़िया,

दुनिया ह जावथे चाँद के ऊपर,

फेर हमन रेहेन मुड़गड़िया रे मुड़गड़िया  । 

छत्तीसगढ़िया छत्तीसगढ़िया ला काटथे,

त दूसर मन काबर हमर दुःख ल हरही,

हमरे हमर ल नइ देखे सकन,

तौ दूसर मन काबर हमर परवाह करहीं । *


कुल मिलाकर  'आरंग के कवि ' हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कविताओं का एक छोटा लेकिन बहुत महत्वपूर्ण संकलन है. इसके प्रकाशन के पाँच दशक अगले साल जून 2027 में पूरे हो जाएंगे  । बहुत संभव है कि छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बिरादरी की  नई पीढ़ी को आज शायद याद भी नहीं होगा कि हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कवियों का ऐसा कोई संयुक्त संकलन 49 साल पहले प्रकाशित हुआ था । साझा कविता संग्रहों के प्रकाशन के इस प्रकार के रचनात्मक प्रयास पहले बहुत हुआ करते थे, एक परम्परा -सी चल पड़ी थी,क्या इसे आज भी रखने की ज़रूरत नहीं है?

 -स्वराज्य करुण 

Sunday, March 15, 2026

(पुस्तक -चर्चा )हमारे सांस्कृतिक इतिहास की लगभग गुमनाम नायिका पर पहला खण्ड काव्य /आलेख -स्वराज्य करुण

 पुस्तक -चर्चा 

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हमारे सांस्कृतिक इतिहास की लगभग

 गुमनाम नायिका पर पहला खण्ड काव्य 

             (आलेख -स्वराज्य करुण )

भारतीय संस्कृति में पौराणिक पात्रों पर आधारित कहानी, उपन्यास, नाटक और खण्ड -काव्य लिखने की परम्परा तो है, लेकिन ऐसी कृतियाँ कम ही देखने, पढ़ने को मिलती हैं । छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार रूपनारायण वर्मा 'वेणु 'द्वारा रचित अतुकांत शैली का खण्ड -काव्य 'श्रुतकीर्ति' भी ऐसी दुर्लभ कृतियों में से है, जिसका प्रकाशन आज से 44 साल पहले सन 1982 में हुआ था । यह वेणु जी की तीसरी कृति है । यह हमारे देश के सांस्कृतिक इतिहास की एक गुमनाम नायिका पर केंद्रित  पहला खण्ड -काव्य है ।


                                          



कवि ने इसे भाव -प्रधान लघु काव्य भी कहा है, जबकि पुस्तक में प्रकाशित कुछ विद्वानों ने अपने अभिमत में इसे मुक्त छंद का खण्ड -काव्य बताया है ।इस भाव प्रधान काव्य के प्रणेता रूपनारायण वर्मा 'वेणु'  अब इस भौतिक दुनिया में नहीं हैं   , लेकिन इस खण्ड -काव्य के माध्यम से वे अपनी एक महत्वपूर्ण कृति को लेकर हमारी यादों में हमेशा बने हुए हैं।वे बहुत सहज -सरल स्वभाव के कवि थे । रायपुर में आज से 105 साल पहले,वर्ष 1921में जन्मे थे । यहीं उनकी साहित्य -साधना 1935 में शुरु हुई थी । आजीवन रायपुर में रहकर ही उन्होंने काव्य सृजन किया। उनकी कई कृतियाँ प्रकाशित हुईं। पहली कृति 'ज्योति निर्झर'  सूक्तियों और लघु कथाओं के संकलन के रूप में वर्ष 1971 में प्रकाशित हुई थी ।इसे नागपुर के विश्वभारती प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया था । दूसरी कृति 'सहस्त्र सुमन ' का प्रकाशन वर्ष 1981 में हुआ था । वेणु जी स्वयं इसके प्रकाशक थे । वेणु जी के गीतों का संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी 'वर्ष 1985 में प्रकाशित हुई थी । उनके खण्ड काव्य 'श्रुतकीर्ति' के साथ ही 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' के प्रकाशक गणेश राम नगर, रायपुर के डॉ. लक्ष्मण बजाज थे । स्थानीय समाचार पत्रों में भी वेणु जी की रचनाएँ समय -समय पर प्रकाशित होती रहती थीं । उनके गीत आकाशवाणी रायपुर से भी प्रसारित हुए. 

   शहर के स्थानीय कवि सम्मेलनों में भी वे शामिल होते थे। गांधी टोपी के साथ खादी का कुरता और खादी की धोती, यही उनका परिधान थाl   वे शहर में पैदल घूमते और अपने मित्रों -परिचितों से, बड़े स्नेह से मिलते जुलते थे । स्थानीय अखबारों के दफ्तरों में भी पैदल जाकर सम्पादकों से मिलते और अपनी कविताएँ दे आते थे  ।   पुस्तक 'श्रुतकीर्ति 'के अंतिम आवरण पृष्ठ में छपे वेणु जी के परिचय में  उनकी तृतीय कृति के रूप में 'श्रुतकीर्ति ' का उल्लेख खण्ड -काव्य के रूप में किया गया है ।यह काव्य -कृति कालजयी महाकाव्य 'रामायण ' के नायक भगवान श्रीराम के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न की धर्मपत्नी श्रुतकीर्ति पर केंद्रित है ।

 पुस्तक में प्रबोधिनी एकादशी, संवत 2038(8 नवम्बर 1981)के दिन अपने 'आत्म -निवेदन 'में वेणु जी ने लिखा -"संस्कृत और हिंदी में रामायण के प्रायः सभी पात्रों पर कवियों ने ग्रंथ -रत्नों की रचना की है, किंतु देवी 'श्रुतकीर्ति' के जीवन और त्याग पर हमारे कविगण मौन रहे । मैंने प्रस्तुत लघुकृति में इसी अभाव की पूर्ति करने का लघु प्रयास किया है ।आशा है, प्रबुद्ध पाठकों को यह रुचिकर ज्ञात होगी ।" आत्म निवेदन में कृति के रचनाकार वेणु जी ने भूमिका लेखन और अपनी सम्मतियाँ देने वाले सभी विद्वानों के प्रति आभार व्यक्त किया है ।

           आवरण के चार पन्नों को मिलाकर यह पुस्तक 54 पेज  की है। इसकी कीमत मात्र चार रूपए रखी गई थी ।प्रथम संस्करण में प्रकाशक द्वारा 1982 में इसकी एक हजार प्रतियाँ क्वालिटी प्रिंटर्स, नया बस स्टैंण्ड, बेमेतरा से छपवाई गईं थीं ।

 इसमें खण्ड -काव्य की नायिका श्रुतकीर्ति से संबंधित कुल 17 सर्ग हैं, जो अतुकांत शैली (मुक्त छंद )की कविताओं में लिखे गए हैं। पहला सर्ग 'वंश -परम्परा' पर है, जिसकी प्रारंभिक पंक्तियों से पता चलता है कि श्रुतकीर्ति राजा जनक के अनुज कुशध्वज नरेश की सुपुत्री थीं।कवि के अनुसार       श्रुतकीर्ति सद्गुण और सत्कर्म, सदधर्म की प्रतीक थी ।

       सीताजी के स्वयंवर के समय राजा जनक ने अपने गुरु ऋषि विश्वामित्र के सामने इच्छा प्रकट की थी कि वे लक्ष्मण का विवाह उर्मिला से, भरत का विवाह मांडवी से और श्रुतकीर्ति का विवाह शत्रुघ्न से करना चाहते हैं।इस पर विश्वामित्र जी ने उन्हें मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद दिया था ।दूसरे सर्ग का शीर्षक 'गुण -वर्णन ' है, इसमें अध्याय में सीता जी के अपहरण के बाद अयोध्या में फैली शून्यता, अशोक वाटिका में राक्षसों के बीच मानवता का प्रतीक बनकर बैठी सीता और उधर अयोध्या में कैकेयी के कृत्य पर कभी -कभी कृद्ध होती श्रुतिकीर्ति और पति -भक्ति में अनुरक्त मांडवी जीवन शैली और मनोदशा का वर्णन है।

 इस अध्याय की अतुकांत रचना के अंत में कवि वेणु जी ने लिखा है -

  *बेचारी श्रुतकीर्ति रात्रि की नीरवता में 

  जीवन की विभीषिका में 

  दीपक की तरह जल रही है.

  उसे अपने कष्ट का कुछ भी 

  अनुभव नहीं है.

  वह लाजवंती की तरह सलज्जा,

  वह चमेली की तरह निर्मला,

  वह चम्पा की तरह तेजस्विनी बनी हुई है*.

तीसरे सर्ग में श्री भरत जी के गुणों की प्रशंसा, चौथे में श्रुतकीर्ति के उदगार, पांचवे में शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति का स्वप्न -वर्णन है  ।चौथे सर्ग में भगवान श्रीराम द्वारा सीता माता के परित्याग की घटना पर श्रुति कीर्ति के उदगार कवि वेणु जी की इन पंक्तियों में व्यक्त हुए हैं -


*आर्य को इस पर विचार करना चाहिए.

जिस सीता ने अग्नि परीक्षा देकर 

अपने सतित्व का प्रखर परिचय दिया,

 उसकी इस तरह की उपेक्षा असहनीय है.

क्या यही न्याय है?

और वह भी आर्य का?

जो सती साध्वी अबला के साथ 

इस तरह का अत्याचार हो ।

राम -राज्य परिषद के सदस्य 

इस दिशा में क्यों मौन बैठे हैं?

जबकि 'मनु स्मृति ' के अनुसार 

बालक, वृद्ध, स्त्री को दण्ड देने का 

विधान नहीं है  ।

फिर सीता ने क्या अपराध किया?

जिन्हें बिना सूचित किए

निर्वासित कर रहे हैं?*


इस अध्याय की अंतिम पंक्तियाँ और भी अधिक मर्मस्पर्शी हैं -


*एक साधारण स्त्री भी 

अपराधिनी क्यों न हो,

उसे भी बिना सूचित किए 

दण्ड नहीं दिया जाता  ।

फिर गर्भवती स्त्री को इस तरह 

दण्ड देना कहाँ का न्याय है?*

श्रुतिकीर्ति इतना कहकर मौन हो गई  ।


मुझे लगता है कि हैण्ड कंपोर्जिंग पद्धति से प्रिंटिंग के दौरान खण्ड काव्य के अध्यायों की नम्बरिंग में थोड़ी असावधानी हो गई होगी, जिससे दो सर्गों -'श्रुतकीर्ति के उदगार' और 'शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति का स्वप्न -वर्णन 'दोनों में एक ही सर्ग का क्रमांक 4 छप गया है, जबकि 'शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति का स्वप्न -वर्णन 'में  सर्ग क्रमांक 5 होना चाहिए । हालांकि *अनुक्रमणिका* में सभी सर्गों के क्रमांक ठीक हैं ।

इस खण्ड -काव्य का छठवाँ सर्ग 'अयोध्या का संताप'शीर्षक से है, जिसे पढ़कर मुझे तो समझ में नहीं आया कि कवि ने ऐसा शीर्षक क्यों दिया है?

इसमें तो इंद्रधनुषी कल्पना श्रुतकीर्ति की तरह सजीव हो उठने, उर्मिला को आनंद की मूर्ति प्राप्त होने, मांडवी की सदभावना भी श्रुतकीर्ति बनकर आने, स्वर्ग का नंदनवन, भारत का कानन -उपवन सौन्दर्य की राज्य -लक्ष्मी को पाकर धन्य होने जैसी पंक्तियाँ हैं । अंतिम पंक्तियों में भी संताप जैसी कोई भावना प्रकट नहीं होती ।

बहरहाल सभी सर्ग पठनीय हैं । सातवाँ सर्ग 'श्रुतकीर्ति के आराध्य देव -शत्रुघ्न ', आठवाँ सर्ग 'उर्मिला -श्रुतकीर्ति संवाद ' और नवमाँ सर्ग 'विश्व -दर्शन ' शीर्षक से है । दसवें सर्ग का शीर्षक  -'भगवान श्री राम और सीता के जीवन पर श्रुतकीर्ति के विचार -दर्शन ', 11वें  का शीर्षक 'श्रुतकीर्ति की तपश्चर्या ', 12वें का शीर्षक 'लक्ष्मण का स्वप्न ', 13 वें का शीर्षक 'उर्मिला का वियोग', 14वें सर्ग का शीर्षक 'गृहस्थ जीवन पर श्रुतकीर्ति के विचार ' 15 वें का शीर्षक अरूंधती -श्रुतकीर्ति संवाद, 16वें का शीर्षक 'जीवन -दर्शन ' और 17वें का शीर्षक 'अंतिम -प्रश्न 'है।

'गृहस्थ जीवन पर श्रुतकीर्ति के विचार 'शीर्षक अध्याय में दरअसल शत्रुघ्न के ही विचार हैं, जो उन्होंने श्रुतकीर्ति के प्रश्नों के उत्तर में व्यक्त किए थे।उदाहरण स्वरूप जब श्रुतकीर्ति ने अपने स्वामी से प्रश्न किया -

"गृहस्थ जीवन कैसे सुखी हो सकता है 

और पत्नी कैसी हो?

तब शत्रुघ्न ने कहा -

देवि! जो स्त्री अपने पति की अभिरुचि का 

रखकर ध्यान कार्य करती है और अभ्यागतों 

एवं अतिथियों का स्वागत -सम्मान करती है,

वही श्रेष्ठ है.

उससे गृहस्थ जीवन सुखी हो सकता है ।

जिस स्त्री और पुरुष के 

विचार और वाणी में एकरूपता हो,

रूप और गुण में समन्वय हो,

उसी का जीवन सुखी हो सकता है,

अन्यथा नहीं ।

विवाह स्त्री और पुरुष के 

जीवन को सुन्दर बनाता है, विकृत नहीं ।

श्रुतिकीर्ति स्वामी के विचारों

 को हृदयंगम कर रही थी ।"

खण्ड काव्य  के अंतिम सर्ग यानी 17वें सर्ग में  श्रुतकीर्ति के मन में उठता यह 'अंतिम प्रश्न'  पाठकों को व्यथित और विचलित करते हुए सोचने विवश सकता है -

   "क्या स्त्री वरदान है 

    या देव और महापुरुषों की जन्म दात्री?

    फिर क्यों उसे अग्नि में दग्ध होना पड़ता है?

    यही एक विचारणीय प्रश्न है,

   जो बार -बार आकाश में 

   प्रतिध्वनित हो रहा है ।


 कवि रूपनारायण वर्मा 'वेणु' ने अपनी यह कृति हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती महादेवी वर्मा को साहित्य, संगीत और कला की त्रिवेणी बताते हुए उन्हें समर्पित की है । 

 वेणु जी की इस काव्य -कृति की भूमिका वरिष्ठ साहित्यकार और छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर के तत्कालीन प्राचार्य सरयूकांत झा ने तीन जून 1980 को लिखी थी,जबकि रायपुर के एडवोकेट श्री जमालुद्दीन  ने 19अक्टूबर 1974 को वेणु जी का परिचय लिखा था ।उनके शब्दों में -"श्री रूपनारायण वर्मा 'वेणु' छत्तीसगढ़ की साहित्य सेवी बिरादरी के एक शोधपरक रचनाकार हैं ।प्रस्तुत रचना उनके अथक परिश्रम का प्रतिफल है।"

वेणु जी की इस काव्य -कृति में केन्द्रीय महाविद्यालय, सारणी, बैतूल (मध्यप्रदेश )के प्राचार्य डॉ. नत्थूलाल गुप्त द्वारा 20 फरवरी 1982 को प्रेषित विचार भी शामिल हैं ।दैनिक 'नवभारत ', नागपुर के साहित्य सम्पादक शिवनारायण द्विवेदी ने 25 फरवरी 1982 को  लिखा -

"बन्धुवर रूपनारायण वर्मा 'वेणु'ने श्रुतकीर्ति ' एक भावप्रधान काव्य मुक्तक छंद में रचकर निःसंदेह हिंदी साहित्य पर बड़ा उपकार किया ।रामायण के नारी पात्रों में 'उर्मिला' को जो महत्व पहले नहीं मिला था, उसे स्वर्गीय राष्ट्रकवि मैथिली शरण जी गुप्त ने तथा उनके बाद डॉ. बल्देव प्रसाद जी मिश्र ने अपनी बहुप्रशंसित रचनाओं में उन महीयसी नारियों का वर्णन कर, सुधी पाठकों के समक्ष उनके शील आदि सदगुणों को खूब उजागर किया था 

।किंतु वीर शत्रुघ्न एवं उनकी जीवनसंगिनी 'श्रुतकीर्ति' के संबंध में अभी तक किसी कवि ने कुछ नहीं लिखा । इसे ध्यान में रखकर श्री 'वेणु 'जी का यह सदप्रयास स्वागत योग्य है ।इस खण्ड काव्य के प्रोढ़ कवि 'वेणु ' ने इस खटकते अभाव की पूर्ति की है। "

इसी तरह बूढ़ापारा रायपुर के डॉ. रविशंकर व्यास नेश्री कृष्ण जन्माष्टमी संवत 2039, मध्यप्रदेश  साहित्य सम्मेलन, रायपुर के उपाध्याय शा. प्र. तिवारी ने 12अप्रैल 1982 को अपने अभिमतों में इस खण्ड -काव्य की प्रशंसा की है । स्टेशन रोड, रायपुर निवासी डॉ. कैलाशचंद्र दास ने लिखा था -" 'श्रुतकीर्ति ' एक भाव प्रधान खण्ड -काव्य है  । यह मुक्त छंद में लिखा गया है।... इस खण्ड -काव्य के द्वारा कवि ने हमारे सामने एक उत्तम नारी -चरित्र को प्रस्तुत किया है, जिससे राम -काव्य की समृद्धि को एक विश्वसनीय बल मिला है ।" 

  पुस्तक के तीसरे आवरण पृष्ठ पर हिन्दी साहित्य परिषद, बेमेतरा के सचिव ठाकुर लव सिंह दीक्षित की सम्मति भी छपी है ।उन्होंने लिखा है -" श्री रूपनारायण वर्मा 'वेणु ' द्वारा रचित 'श्रुतकीर्ति' की पांडुलिपि मैंने पढ़ी ।इसमें अंतर्निष्ठ दार्शनिक विचार अत्यंत अनूठे व अभिनव हैं । श्री वेणु जी का यह प्रयास रामकथा के प्रकाशन में एक नई कड़ी है । भगवान श्रीराम के चरित्र एवं लीला में जितने भी पात्रों ने भाग लिया, उनमें से एक 'श्रुतकीर्ति ' है 

। इनके महान प्रयास 'श्रुतकीर्ति' के पठन से यह स्पष्ट है कि 'श्रुतकीर्ति रामकथा रुपी विशाल भवन में नींव के पत्थर की भांति महत्वपूर्ण किंतु गुप्त है । अत्यंत अभावों में भी सद -साहित्य के सृजन में संलग्न 'वेणु 'जी की 'श्रुतकीर्ति' इनकी भी कीर्ति को अवश्य ही बढ़ाएगी, ऐसा मेरा विश्वास है ।"

  पुस्तक में छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर के तत्कालीन प्राचार्य प्रोफेसर सरयूकांत झा  द्वारा लिखी गई भूमिका के कुछ अंश  इस प्रकार हैं -

*श्री 'वेणु' साकार साधना हैं. इनसे हुई प्रथम भेंट को एक चतुर्थ शती से भी अधिक समय बीत चुका है, पर मैंने इन्हें सदा एक -सा पाया ।जीवन के अतिशय ग्रीष्म के आतप इन्हें झुलसा नहीं पाये और न शीत -लहरों के झोंके इन्हें किसी सुरक्षित स्थान की ओर दौड़ा सके ।सदैव एक रस, शांत! जीवन की कोई निश्चित राह नहीं । कोई बात नहीं, कोई -न -कोई रास्ता तो है । जहाँ तक पृथ्वी है, वहाँ तक चलने वाले व्यक्ति के लिये राह भी है ।कदाचित 'वेणु 'जी का यही विश्वास है ।

*श्री 'वेणु' जी की रचनायें अनंत साधना -पथ को आलोकित करने वाले प्रकाश स्तम्भ हैं । 'श्रुतिकीर्ति ' उनमें से एक है ।निरंतर गतिमान 'वेणु 'जी के काव्य -प्रवाह की अगली सीमा का विश्वास मैंने इनमें पाया है ।कवि मन की सत्याभिव्यक्ति के लिये छटपटाहट मैंने इनमें देखी है ।कवि कोई बड़ी बात कहना चाह रहा है, भाषा अभी उस बात की गहराई को नापने का प्रयास कर रही है ।

* 'श्रुतिकीर्ति ' में अनेक ऐसे स्थल मुझे मिले, जहाँ पहुँचकर पाठक मन अपने में अभिनव कल्पना का स्फुरण पाता है ।वह चिंतन -मनन के लिये विवश हो जाता है । छंदमुक्त सूत्रात्मक शैली में 'वेणु 'जी ने 'श्रुतिकीर्ति ' को लिखा है।मुझे विश्वास है कि सुधी पाठक इसमें मन के विस्तार में प्रवेश पाने का मार्ग अवश्य पायेंगे ।

* अपने सीमित साधन में 'वेणु ' जी जो कुछ करते जा रहे हैं, उस पर हमें बड़ी आस्था है ।उनकी लेखनी अभी चल रही है । मुझे यह आभास मिल रहा है कि कुछ अनुपम, कुछ अनूठा उनके द्वारा निर्मित होने की प्रतीक्षा में है ।*

 

लेकिन अफ़सोस... 'वेणु' जी की इस महत्वपूर्ण कृति के भूमिका -लेखक प्रोफेसर सरयूकांत झा भी  अब इस दुनिया में नहीं हैं और उनकी तरह 'वेणु 'जी की जीवन -यात्रा भी बहुत पहले थम चुकी है। इसलिए 'वेणु 'जी की लेखनी से "कुछ अनुपम, कुछ अनूठा निर्मित होने "  की भूमिका लेखक की प्रतीक्षा अब कभी पूरी नहीं हो पायेगी, लेकिन 'वेणु 'जी की अन्य छपी हुई कृतियाँ हमें ज़रूर उनकी याद दिलाती रहेंगी। 

  उन्होंने मुझे अपने गीत -संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी 'के साथ अपने खण्ड -काव्य 'श्रुतकीर्ति ' की एक सौजन्य प्रति भी 6सितम्बर 1986 के दिन सस्नेह भेंट की थी। इन काव्य -कृतियों से मुझे भी उनकी याद आने लगती है । लगता है कि हमेशा गांधी टोपी और खादी का धोती -कुर्ता पहने, बगल में अपनी किताबों का झोला लटकाए, शहर की सड़कों पर पैदल घूमते हमारे 'वेणु 'जी मुझे भी कहीं न कहीं दिख जाएँगे और मिल जाएँगे ।  लेकिन काश! ऐसा हो पाता! 

      -स्वराज्य करुण 


Saturday, March 14, 2026

( पुस्तक चर्चा )आज़ादी के योद्धाओं की वीर गाथाएँ ; छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर / आलेख -स्वराज्य करुण

       आज़ादी के योद्धाओं की वीर गाथाएँ ;छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर 

                  (आलेख ; स्वराज्य करुण )

छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के लिए  सुशील यदु  आजीवन समर्पित रहे। उन्होंने अपने साहित्यिक मित्रों के सहयोग से वर्ष 1981में रायपुर में छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति की स्थापना की और समिति के कई अधिवेशन तहसील मुख्यालयों और जिला मुख्यालयों में आयोजित किए  ।सुशील यदु की प्रकाशित पुस्तकों में 'लोकरंग' दो भागों में है ।इसमें से पहला भाग छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों पर और दूसरा भाग छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों पर केंद्रित है। सुशील यदु ने 'लोक रंग ' शीर्षक से ही दैनिक 'नवभारत ' में 8 वर्षों तक नियमित रूप से लिखा ।

उनका  छत्तीसगढ़ी व्यंग्य संग्रह 'घोलघोला बिन मंगलू नइ नाचय ' भी काफी चर्चित और प्रशंसित हुआ था ।उनके द्वारा सम्पादित कृतियों में (1)स्वर्गीय हेमनाथ यदु :व्यक्तित्व एवं कृतित्व(2) छत्तीसगढ़ी कविता -संग्रह 'बन फुलवा ' (3) बद्री विशाल परमानंद का गीत -संग्रह 'पिंवरी लिखे तोर भाग ' और स्वर्गीय उधोराम 'झखमार' की हास्य कविताओं का संग्रह 'ररूहा सपनाय दार भात 'भी शामिल है । सुशील व यदु का जन्म 10 जनवरी 1956 को रायपुर में हुआ था और यहीं 23सितम्बर 2017 को उनकी जीवन -यात्रा हमेशा के लिए थम गई ।

                                                

 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इस राज्य के योद्धाओं के योगदान को उन्होंने 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर ' शीर्षक से वर्ष 1989में प्रकाशित अपनी किताब   में कविताओं के रूप में संकलित किया था  ।  छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति रायपुर द्वारा इस पुस्तक के दो संस्करण क्रमशः अगस्त 1989 और नवम्बर 2001में प्रकाशित किए गए थे । यह कवर पेज सहित 60 पेज की है  । मूल्य है 50 रूपए। यह हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्पित छत्तीसगढ़ के वीरों की काव्य गाथा है ।

सुशील यदु के इस छत्तीसगढ़ी कविता -संग्रह में 33 रचनाएँ स्वतंत्रता सेनानियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित हैं, जबकि 34वीं कविता 'बियालिस के आंदोलन ' शीर्षक से है, जिसमें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ़ वर्ष 1942 में हुए भारत छोड़ो आंदोलन में छत्तीसगढ़ के सेनानियों के योगदान को याद किया गया है, वहीं 34वीं और अंतिम कविता 'वंदना गीत ' है, जिसमें भारत माता की वंदना है. छत्तीसगढ़ के जिन स्वतंत्रता सेनानियों की वीरता का वर्णन सुशील यदु ने इस संकलन में किया है उनमें कवि ने सबसे पहले अमर शहीद वीर नारायण सिंह और क्रांतिवीर हनुमान सिंह की संघर्ष गाथाओं को याद किया है  । तीसरी कविता 'सत्रह शहीद साथी ' शीर्षक से है,को 22जनवरी 1858 को रायपुर की सैन्य छावनी में हनुमान सिंह के नेतृत्व में हुए विद्रोह के वीर योद्धाओं को समर्पित है, जिन्हें उनकी देशभक्ति के लिए फाँसी दे दी गई थी । आगामी पन्नों में चौथी रचना उदयपुर (सरगुजा )के क्रांतिवीर शिवराज सिंह, सम्बलपुर (ओड़िशा )के वीर सुरेन्द्र साय को समर्पित की गई है, जबकि छठवीं रचना 'बस्तर विप्लव'में वर्ष 1910 में वहाँ हुए आदिवासी विद्रोह के वीरों का उल्लेख है  । इस विद्रोह को बस्तर के लोकप्रिय राजा रुद्रप्रताप सिंह देव, राजवंश की दीवा पदवी के दावेदार लाल कालेन्द्र सिंह, ग्राम नेतानार के गुण्डाधुर आदि का भरपूर सहयोग मिला था ।ब्रिटिश हुकूमत की गोलिबारी से कई आदिवासी शहीद हो गए थे.इस छंदबद्ध कविता के कुछ अंश देखिए -

   *सन उन्नीस सौ दस साल लड़िन बस्तर के आदिवासी मन,

     विप्लव खातिर हथियार धरिन बस्तर के आदिवासी मन.

     हलबा, भतरा, मुरिया, माड़िया, बड़ शांत, सरल, सीधा -सादा, 

    शोसन, अनीत, अनियाव, अति, उन भड़क गइन अड़बड़ जादा.

    तब गाँव -गाँव जुवाला सुलगिस अउ बस्तर में धधकिस आगी,

    जब रार मचिस विप्लव के, तब जम्मो बस्तर बनगे बागी,*


इस कविता में आगे के एक छंद में बस्तर के निहत्थे बागियों को हथियारबंद फिरंगियों द्वारा गोलियों से भून दिए जाने की घटना की तुलना कवि ने पंजाब के जलियांवाला बाग में हुए हत्याकांड से की है ।

सातवीं कविता छत्तीसगढ़ के गांधी के नाम से लोकप्रिय हुए राजिम के पंडित सुन्दरलाल शर्मा को, आठवीं कविता राजनांदगांव और रायपुर के त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह पर केंद्रित है ।अगले पन्नों में क्रमशः पंडित रविशंकर शुक्ल, शहीद मिन्टू कुम्हार, शहीद रामाधीन गोंड, मौलाना अब्दुल रऊफ 'महवी ', यति यतनलाल, महंत लक्ष्मीनारायण दास और कुंज बिहारी चौबे की गौरव गाथाएँ लिखी गई हैं। इसी कड़ी में 'सिहावा के सिंह -सुखराम नागे' 'बालोद के बाघ -नरसिंह अग्रवाल ', और 'वानर सेना कप्तान -बलिराम 'आज़ाद ' शीर्षक कविताओं में इन वीरों को याद किया गया है।

कवि ने स्वतंत्रता आंदोलन में रायपुर के डॉ. खूबचंद बघेल और धमतरी के बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव सहित नारायण राव मेघावाले और नत्थू राव जगताप के योगदान को भी अपने छंदों में लिपिबद्ध किया है । सुशील यदु की लेखनी ने अपने इस कविता -संग्रह में मदन ठेठवार, बलौदा बाज़ार के राज महंत नैनदास जी, दुर्ग जिले के रामप्रसाद देशमुख,  घनश्याम सिंह गुप्त और विश्वनाथ यादव तामस्कर के सत्याग्रही जीवन को भी अपनी रचनाओं में रेखांकित किया है । 'छत्तीसगढ़ के सुराजी वीरों ' की इन गौरव गाथाओं में शंकर राव गनौदवाले,ग्राम चंदखुरी के अनंत राम बरछिहा,रायपुर के पंडित वामनराव लाखे, यहीं की डॉ. राधाबाई, महासमुन्द तहसील की वीरांगना दयाबाई और अकलतरा (वर्तमान जिला -जांजगीर -चाम्पा )के बैरिस्टर छेदीलाल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भी काव्यात्मक प्रकाश डाला गया है ।

    प्रदेश के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पत्रकार और इतिहासकार स्वर्गीय हरि ठाकुर ने 18मई 1989 को सात पेज में 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर ' की भूमिका लिखी थी । भूमिका की शुरुआत करते हुए वे लिखते हैं - 

-"छत्तीसगढ़ की मिट्टी बड़ी उपजाऊ है । सिंचाई सुविधाओं के अभाव में भी वह धान उपजा सकती है, तो विप्लव के लिए भी उसमें कम उर्वरता नहीं है ।स्वाधीनता के दीर्घकालीन आंदोलन में छत्तीसगढ़ का योगदान, त्याग और बलिदान किसी से कम नहीं है ।प्रस्तुत पुस्तक में श्री सुशील यदु ने ऐसे ही स्वातंत्रय -वीरों की गाथाओं की गूँथकर काव्य -माला तैयार की है ।"

हरि ठाकुर आगे लिखते हैं - त्यागवीर और संघर्षशील पुरुष ही वीर -गाथाओं के नायक होते हैं । किन्तु वीर -गाथाओं के गायक भी किसी नायक से कम नहीं होते ।चंदबरदाई और भूषण इसी श्रेणी के नायक हैं ।छत्तीसगढ़ी लोक -काव्य में वीर गाथाएँ राउतों और देवारों के गीतों में संरक्षित हैं ।वीर काव्य हमें त्याग, बलिदान, निर्भयता और साहस की प्रेरणा देते हैं ।छत्तीसगढ़ के सुराजी वीरों ने स्वतंत्रता के लिए जो संघर्ष किया, उसके पीछे उनका महान त्याग और बलिदान है ।उनके महान चरित्रों का गुणगान ही इस काव्य -कृति का लक्ष्य है ।जो जाति अपने पुरखों के पुरुषार्थ को विस्मृत कर देती है, उसे आत्मग्लानि और हीन भावना का शिकार बनना पड़ता है । अपने महान पुरुषों को स्मरण करने के लिए यह कृति हमें अवसर प्रदान करती है ।

    अपनी लम्बी भूमिका में हरि ठाकुर ने छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुई महत्वपूर्ण क्रांतिकारी घटनाओं का भी उल्लेख किया है ।उन्होंने अंत में लिखा है -"इतिहास को काव्यबद्ध करना आसान काम नहीं है । इस कठिन काम को श्री सुशील यदु ने अंजाम दिया है, वह सराहनीय है ।अपने विषय के प्रति उनका अध्ययन गहरा, दृष्टिकोण स्पष्ट तथा राष्ट्रीयता से ओत -प्रोत है । छत्तीसगढ़ी में अपने ढंग का यह पहला प्रयास है ।मुझे विश्वास है कि अन्य कवि भी इस दिशा में आगे आयेंगे और काव्य के सुरुचिपूर्ण माध्यम से अपने गौरवपूर्ण इतिहास को अमरत्व प्रदान करेंगे ।" हरि ठाकुर ने भूमिका में सुशील यदु को उनकी काव्य प्रतिभा और उत्कृष्ट विषय चयन के लिए बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की थी, लेकिन अफ़सोस कि वे दोनों ही हमारे बीच नहीं हैं ।

  सुशील यदु की काव्य -कृति 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर ' में 'दू शब्द ' शीर्षक से स्वर्गीय ललित मोहन श्रीवास्तव के विचार भी प्रकाशित हैं । उन्होंने लिखा था -"इस छत्तीसगढ़ी काव्य गाथा की भूमिका हम सबके परिचित भाई हरि ठाकुर ने लिखी है उन्होंने लिखा था -"इस छत्तीसगढ़ी 'काव्य गाथा ' की भूमिका हम सबके परिचित भाई हरि ठाकुर ने लिखी है । यह भूमिका इस पुस्तक की कुंजी है, जो इस क्षेत्र के स्वातंत्रय -समर के इतिहास में हमें 'प्रवेश 'दिलाती है  ।  1947 के उपरांत जन्मी पीढ़ी को यह भूमिका वह सब याद दिलाजीव, जो वह भूलती जा रही है  ।इसके बाद आती है श्री सुशील यदु की अपनी बात  ।स्वाधीनता संग्राम के इतिहास की जानकारियों के लिये श्री हरि ठाकुर उनके प्रमुख प्रेरणा स्रोत रहे  ।सुशील यदु का अपना योगदान स्वतन्त्रता संग्रामियों के पद्यात्मक प्रस्तुतिकरण में है ।जाहिर है कि ऐसे प्रयास में कुछ योद्धा (जैसे नगरी के श्याम लाल सोम )छूट जा सकते हैं  ।किन्तु लेखक ने अधिकांश स्वतंत्रता सेनानियों के साथ न्याय किया है  ।प्रथम प्रयास की दृष्टि से यह इस पुस्तक की उपलब्धि है । मैं सुशील यदु को बधाई देना चाहता हूँ कि उन्होंने मिन्दू कुम्हार, रामाधीन गोंड जैसे उपेक्षित नामों को शीर्षकों में जगह दी"

   आज सुशील यदु इस दुनिया में मौज़ूद नहीं हैं, हरि ठाकुर और ललित मोहन श्रीवास्तव भी इस भौतिक संसार से जा चुके हैं, लेकिन इस कृति में उनका लिखा हुआ बहुत कुछ हमारे सामने है, जिसे पढ़कर हमें उनकी याद आती रहेगी  ।  इन तीनों सरस्वती -पुत्रों को विनम्र नमन  ।  बहुत पहले ही 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर 'भी अपनी -अपनी यादगार भूमिकाएँ निभा कर इस धरती को छोड़ चुके हैं । उन वीरों को भी विनम्र श्रद्धांजलि  ।  सुशील यदु ने इसी शीर्षक की अपनी इस काव्य -कृति में उनसे जुड़ी स्मृतियों को हमसे जोड़कर रखने का सार्थक प्रयास किया है   ।   किसी भी देश या प्रदेश के इतिहास और साहित्य को, वहाँ की संस्कृति को हमेशा याद रखने के लिए ऐसा रचनात्मक प्रयास बहुत महत्वपूर्ण होते हैं  ।

-स्वराज्य करुण 

Tuesday, March 10, 2026

(कविता ) बोलो, तानाशाह ! तुम कब मरोगे (कवि -स्वराज्य करुण )

 बोलो तानाशाह ! तुम कब मरोगे ?

 (कविता : स्वराज्य करुण )

        *****

जब मरोगे तब 

कितनी ज़मीन, कितने जंगल 

कितनी नदियाँ, कितने पहाड़ 

कितनी खदानें और कितने 

देश अपने साथ लेकर 

दुनिया से जाओगे?

बोलो,  तानाशाह!

क्या  तुम्हें शर्म नहीं आती ,

जो निरीह ,निःशस्त्र मनुष्यों की हत्या 

करवाके भी बड़ी बेशर्मी से  

अपनी पथराई आँखों और 

ख़ून के प्यासे होठों  से

मुस्कुराते रहते हो ? 

तुम्हारी सेनाएं छोटे -छोटे देशों के 

शहरों ,कस्बों और गाँवों पर बमों की 

बरसात करके मासूम बच्चों को

अनाथ कर जाती हैं ।

हवाई हमलों के जरिए 

चहल -पहल से भरी मानव बस्तियों 

को बदल देती हैं श्मशानों में!

तुम्हारे सैनिक आकाश मार्ग से

जमीन पर उतरकर तुम्हारे आदेश पर 

महिलाओं ,बच्चों ,जवानों और 

बुजुर्गों को बेरहमी से मार डालते हैं! 

वो जब मनुष्यों पर इतना ज़ुल्म ढाते हैं 

तो फिर वहाँ उनके जुल्मों के 

आगे  मूक ,निरीह जानवरों ,

चहकते पंछियों और 

हरे भरे वृक्षों , जल से भरी नदियों , 

का क्रंदन कौन सुनेगा ?

तुम्हारे हमलावर फौजियों के 

खूनी पंजों में छटपटाती 

प्रकृति का रुदन कौन सुनेगा ?

तानाशाह फिर भी अपने 

वातानुकूलित 'वार रूम ' में 

बैठ कर तबाही के खूनी नज़ारों को , 

कत्ल होती इंसानियत को 

ठंडी हवाओं के बीच

शराब की चुस्कियों के साथ 

रुपहले स्क्रीन पर देखते हुए 

मुस्कुराते रहते हो,

नाचते, गाते, मस्ती करते रहते हो !

बमों के धमाकों और बारूद से 

भरे आसमान को देखकर भी 

नहीं दहलता तुम्हारा दिल !

रोते बिलखते बच्चों और

बदहवास माताओं को स्क्रीन पर 

देखकर भी नहीं पसीजता तुम्हारा दिल !

बोलो तानाशाह !

क्या तानाशाहों को 

कभी रोना नहीं आता ? 

क्या तानाशाहों के माँ -बाप,

बीवी -बच्चे,भाई -बहन और 

घर -परिवार नहीं होते?

दुनिया से इंसानी ज़िन्दगी को  

मिटाने पर आमादा तानाशाह ! 

क्या तुम्हें आत्मग्लानि नहीं होती ?

तुम्हें तो शर्म से और पीड़ितों की 

आहों से मर जाना चाहिए !

बोलो ,तानाशाह!तुम कब मरोगे ?

जल्दी मरो...!

हम तुम्हारी मौत की कामना करते हैं।

-- स्वराज्य करुण

Sunday, March 8, 2026

(आलेख )भूले -बिसरे कवि वेणु जी से जुड़ी कुछ यादें /लेखक -स्वराज्य करुण

 'तुम वीणा मैं बांसुरी' और 'श्रुति कीर्ति' 

 जैसी कई कृतियों के रचनाकार थे वेणु जी 

       आलेख  - स्वराज्य करुण 

क्या आप रूपनारायण वर्मा 'वेणु 'को जानते हैं? छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बिरादरी में नई पीढ़ी के अधिकांश कवियों और साहित्यिक अभिरुचि के लोगों ने उनका नाम भी शायद नहीं सुना होगा । वे बहुत सहज -सरल और सौम्य स्वभाव के कवि थे । रायपुर में आज से 105 साल पहले,वर्ष 1921में जन्मे थे । यहीं उनकी साहित्य -साधना 1935 में शुरु हुई थी । आजीवन रायपुर में रहकर ही उन्होंने काव्य सृजन किया। उनकी कई कृतियाँ प्रकाशित हुईं. शहर के साहित्यिक आयोजनों में भी वे शामिल होते थे। उन दिनों शहर इतना अधिक फैला हुआ नहीं था । सड़कों पर आज की तरह लोगों की और तरह -तरह की तेज रफ्तार मोटर गाड़ियों की भयंकर भीड़ नहीं होती थी। 

सड़कें चौड़ी भले ही कम थी, लेकिन खुली -खुली -सी लगती थीं।लोग एक मोहल्ले से दूसरे या तीसरे मोहल्ले तक बड़े आराम से साइकिलों पर या पैदल ही आया -जाया करते थे।मुझे कुछ -कुछ याद है,नाटे कद के वेणु जी गांधी टोपी और खादी का धोती -कुर्ता पहनकर पैदल ही  शहर का भ्रमण करते हुए अपने मित्रों और परिचितों से बड़ी आत्मीयता से मिलते थे।वे पैदल ही स्थानीय दैनिक अख़बारों के दफ्तरों में जाकर सम्पादकों को अपनी कविताएँ दे आते थे। स्थानीय वरिष्ठ जनों में भी उनका बड़ा सम्मान था, लेकिन समय की तेज रफ़्तार ने उन्हें भुला दिया ।


                                             


ऐसे समर्पित साहित्य साधक,  भूले -बिसरे कवि रूपनारायण वर्मा 'वेणु ' के 52 छोटे -बड़े गीतों का संकलन 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' का प्रकाशन 41साल पहले विजयादशमी के दिन 23अक्टूबर 1985 को हुआ था। उन्होंने  6 सितम्बर 1986 के दिन मुझे यह किताब और  अपने खण्ड काव्य 'श्रुतिकीर्ति 'की एक सौजन्य प्रति भी सस्नेह अपने हस्ताक्षर के साथ भेंट की थी । इस खण्ड काव्य के अंतिम आवरण पृष्ठ पर वेणु जी के फोटो के साथ उनका साहित्यिक परिचय भी प्रकाशित हुआ है ।सूक्तियों और लघु कथाओं का उनका संकलन 'ज्योति निर्झर'  वर्ष 1971 में प्रकाशित हुआ. यह उनकी पहली प्रकाशित कृति थी, जिसे नागपुर के धनवटे चेम्बर्स, सीतावर्डी स्थित विश्व भारती प्रकाशन ने प्रकाशित किया था।

उनकी दूसरी कृति ' सहस्त्र सुमन ' वर्ष 1981 में छपी , जिसके प्रकाशक वे स्वयं थे ।

वेणु जी की तीसरी पुस्तक खण्ड काव्य 'श्रुति कीर्ति 'का प्रकाशन वर्ष 1982 में हुआ, जिसके प्रकाशक गणेशराम नगर, रायपुर के डॉ.लक्ष्मण बजाज थे।कवि ने इसे भाव प्रधान काव्य के रूप में लिखा है। उनके परिचय में इसे  खण्ड -काव्य भी बताया गया है, जो भगवान श्रीराम के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न की धर्मपत्नी श्रुतिकीर्ति पर केंद्रित है और मुक्त छन्द में है. उस पर फिर कभी  अलग से लिखूँगा ।अभी तो वेणु जी के गीत -संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' की चर्चा करना चाहता हूँ ।

     वेणु जी ने अपना यह गीत -संग्रह  गुरुदेव  रवीन्द्र नाथ ठाकुर की पावन स्मृति को समर्पित किया है।   इस गीत -संकलन के प्रकाशक, प्रचारक और वितरक 'वेणु' जी के मित्र गणेशराम नगर, रायपुर के डॉ. लक्ष्मण बजाज थे । यह पुस्तक 60 पेज की है । उन दिनों इसकी कीमत केवल छह रूपए थी । 

    

  *वेणुजी रस सिद्ध कवि थे* 

                     ******

     उनके इस गीत -संकलन  में 'पुरोवाच ' लिखा है पीएच -डी. और डी. लिट. की उपाधि प्राप्त डॉ. विष्णुप्रसाद पाण्डेय ने,  जो  उन दिनों शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, दुर्ग में हिन्दी के प्राध्यापक हुआ करते थे। उन्होंने  लिखा है -"वेणु जी ने छायावादी रोमांटिक कविता के माध्यम से साहित्य -संसार में प्रवेश किया और प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, रहस्यवाद तथा मांसलवाद की धाराओं में अपनी कविता का ताना -बाना बुनते आ रहे हैं ।.... वेणु जी में जनजीवन की ज्योति का चितेरापन है। उनके अन्तः करण में भावमयी सरिता की स्नातकता है ।.... वेणु जी रस सिद्ध कवि हैं।वेणु जी की इन कविताओं में जान है और वे उदात्त संरचनाओं की परम्परा की रक्षा करती हैं । 

        *मैं अपना परिचय क्या दूँ?*

         गीत -संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' में अपने परिचय के अंतर्गत वेणु जी लिखते हैं -

    "मैं अपना परिचय क्या दूँ ? मैं उस वीणा वादिनी की वीणा का तार हूँ, जिसमें जीवन के स्वर निकलते हैं।तुम उस युग की वंशी हो, जिसमें कई छिद्र हैं। उस जगत जननी भगवती माँ भारती की सेवा का ही प्रत्यक्ष फल है, जो मैं आप लोगों के बीच रहकर प्रति वर्ष उस कल्याणी माँ को एक पुष्प चढ़ाता हूँ, जिसके रजकण के प्रताप से मेरे  निरगंध फूल सुरभित हो उठते हैं ।....कवि  लिखते हैं -मेरे जीवन की अंतिम इच्छा यह है कि मेरे जीते जी मेरी सभी कृतियाँ प्रकाश में आ जाएँ।भारतीय परम्परा के अनुसार जीवित व्यक्ति का मूल्यांकन बहुत कम होता है, लोग मृत्यु होने की बाट देखते रहते हैं ।मेरी कृतियाँ मेरी हृदयतंत्री की आवाज़ है, जिसमें जीवन के सूक्ष्म तत्वों के दर्शन होंगे । वीणा बजाने वाला कुशल होना चाहिए । हे जगत नियन्ता! तुम वीणा हो और मैं श्याम सुन्दर की हूँ वेणु, जिसमें गोपियाँ तथा गोप भी हृदय तंत्री निहित हैं ।' तुम वीणा मैं बांसुरी' मानव जीवन को विकसित करने में समर्थ होगी, ऐसा पूर्ण विश्वास है ।   

-विनयावत -रूपनारायण वर्मा वेणु "

 वहीं ' उन्होंने स्वयं को 'माँ भारती के कंठहार का पुष्प' बताते हुए 'आत्म निवेदन ' शीर्षक एक अन्य वक्तव्य में लिखा है -"उस वीणा वादिनी के श्रीचरणों से सुवासित 'तुम वीणा मैं बांसुरी '(भाव प्रधान गीत संकलन )रख रहा हूँ, जिसमें जीवन के तथ्य एवं सूक्ष्म तत्वों पर विचार किया गया है ।  मेरी इस भाव प्रधान कृति में जीवन दर्शन और प्रकृति सौन्दर्य के सूक्ष्म तत्व विद्यमान हैं । उन्होंने इस पुस्तक में भूमिका लेखन के लिए डॉ. विष्णु प्रसाद पाण्डेय, परिचय लेखन के लिए प्रतिभा गुप्ता, सम्मति लेखन के लिए प्रतिभा तिवारी, आवरण और चित्र सज्जा के लिए अपने मित्र दीनदयाल सोनी सहित सभी सहयोगियों और मार्ग प्रदर्शक साहित्यकारों के प्रति आभार व्यक्त किया है ।

   बहरहाल, अब हम वेणुजी के इस गीत -संकलन में प्रकाशित  रचनाओं को देखें । इनमें कवि ने अपने मनोभावों के जरिए आशा -निराशा और हर्ष -विषाद सहित मानव जीवन के अनेक रंगों का समावेश किया है ।उनका पहला गीत 'वीणा वादिनी 'शीर्षक से देवी सरस्वती को समर्पित है । 

पृष्ठ 2पर प्रकाशित उनके दूसरे गीत में छायावादी स्वर की अनुगूंज है -

*मैं तुम्हारा दीप बनकर जल रहा हूँ । 

  निशा जाती मुझको लेकर,

  मैं तड़फता तुमको देखकर,

  तुम चले हो अस्ताचल को,

  मैं भी बुझता जा रहा हूँ । *


आगे की रचनाओं में से एक आज के समाज में व्याप्त नारी -उत्पीड़न और भूख से तड़फते इंसानों को लेकर है. इन गंभीर समस्याओं से आहत वेणु जी का कवि -हृदय अपने  संकलन के पृष्ठ 3पर कहता है -

     *मानव मिला न अब तक कोई 

       जो मानव कहलाए । 

       एक नारी की लाज लुट रही,

       एक खड़ी मुस्काये । 

       हँस -हँस फूल लुटाये साजन,

       एक पड़ा कुम्हलाये । 

       एक दारुण दुःख से तड़फे,

       एक खड़ा मुस्काये । 

        एक तरसता दाने -दाने,

       एक अन्न को ठुकराये । 

        जो जग की आँखों का काँटा था,

        वह फूल बन मुस्काये । 


संकलन के पृष्ठ 16 में एक छोटा -सा गीत हमें जीवन के संघर्षो को, दुःख -दर्दो को हँसते हुए झेल जाने की सीख देता है -

    *मैंने तो हँसना सीखा है । 

     दुःख -दर्दों को झेल -झेल कर 

      आगे बढ़ना सीखा है । 

      आई आँधी मुझे गिराने 

     आया शीत मुझे कँपाने,

     गिर -गिर उठना सीखा है ।* 

  

वेणु जी का कवि इस संसार को छल से भरा मानता है । पृष्ठ 19 में प्रकाशित गीत में यह भावना प्रकट होती है -

*छल भरा संसार तेरा,

 रूप में छल, मृत्यु में छल,

 जीवन हो गया मेरा गरल,

  दुःख भरा संसार तेरा । 

 मैं तुम्हारे रूप में मिल रहा हूँ,

 मैं तुम्हारी याद में घुल रहा हूँ,

  छल भरा अभिसार तेरा । 


गीत संग्रह के पृष्ठ 17 में छपी अपनी रचना में कवि की भावनाओं को महसूस कीजिए -

   * तुम मुझे पाषण रहने दो । 

    मुझे जीवन न दो,

     मुझे सूरत न दो,

    मेरा अभिमान रहने दो । 

    मेरा संसार है मंगल,

    मेरा व्यवहार है उज्ज्वल,

    मेरी वाणी है निश्छल,

   उसे तुम रस में भरने दो । 

    तुम्हारे प्यार में छल है,

    तुम्हारा जीवन छलमय है,

    मुझे तुम दूर रहने दो । 

     मुझे वरदान नहीं होना,

     मुझे श्रृंगार नहीं होना,

     मैं उस रूप का अनुगामी,

    मुझे तुम उसमें मिलने दो । *


संकलन के पृष्ठ 28 में 'गोस्वामी तुलसीदास जी के प्रति' और पृष्ठ 30 में  महाकवि 'निराला 'जी के प्रति ' शीर्षक गीत में दोनों महाकवियों के सम्मान में वेणु जी ने अपनी भावनाएँ व्यक्त की हैं । पृष्ठ 33 में  'बसंत के प्रति 'शीर्षक से प्रकाशित गीत में विरह वेदना से पीड़ित नायिका बसंत के वातावरण में अपनी सखी से बातचीत करते हुए अपनी मनोव्यथा प्रकट करती है  । इस गीत का प्रारंभिक अंश -

*नभ में लाली क्यों दौड़ रही,

बताओ सखी मुझको आकर,

मैं दिन -रात सुखूं हे आली,

वे आये न अपने निज गृह पर । 

सखी बोली -सुन हे तू प्यारी,

है जंगल में ऋतु बसंत,

चंदा जो हँसता आज यहाँ,

वह भी भूला है राग -रंग  । *


वेणु जी पृष्ठ 35 पर प्रकाशित  अपने 40 वें गीत में हताश -निराश मनुष्य का मनोबल बढ़ाते हुए कहते हैं -

  *अमृत पुत्र होकर भी तुम 

     क्यों अंगारों से डरते हो । 

     कितने युद्ध तुम देख चुके,

     कितने देखोगे जीवन में  । 

     कितने कंटक पथ पार किये,

     कितनी विपदा आई मग में  । 

     मैं उसी भस्म का बना हुआ,

     जिसको शिव रोज चढ़ाते हैं  । 

     मरघट में खुशी मनाते हैं,

    तुम उसी शिवा के अग्नि नेत्र,

    फिर क्यों उनसे डरते हो  । *


कवि रूपनारायण वर्मा 'वेणु ' के गीत आकाशवाणी रायपुर से भी प्रसारित हुए थे।समय -समय पर अनेक पत्र -पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें दैनिक नवभारत, नईदुनिया,देशबन्धु, युगधर्म, महाकोशल, अक्षत, मध्यप्रदेश संदेश, आयुर्वेद -विकास, धन्वंतरि, सुधा निधि, आयुर्वेद महासम्मेलन पत्रिका आदि शामिल हैं, जिनमें उनके गीतों, लघु कथाओं और लेखों का प्रकाशन हुआ।आयुर्वेद से संबंधित पत्रिकाओं में उनकी रचनाओं के प्रकाशन से ऐसा लगता है कि देश की इस अत्यंत प्राचीन चिकित्सा पद्धति में भी उनकी गहरी दिलचस्पी रही होगी, हालांकि इस बारे में उनसे पूछने का मौका मुझे नहीं मिला।

   छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बिरादरी  उम्मीद की जानी चाहिए कि वह अपने भूले -बिसरे कवि वेणु जी को याद रखने के लिए उनकी अप्रकाशित रचनाओं की खोज -ख़बर लेकर उन्हें प्रकाशित करने का प्रयास करेगी।जो समाज अपने साहित्यकारों को और उनके साहित्य को याद रखता है, उस समाज की मानवीय संवेदनाएँ भी बनी रहती हैं और सामाजिक समरसता के साथ उसकी संस्कृति भी सुरक्षित रहती है।

-स्वराज्य करुण