'तुम वीणा मैं बांसुरी' और 'श्रुति कीर्ति'
जैसी कई कृतियों के रचनाकार थे वेणु जी
आलेख - स्वराज्य करुण
क्या आप रूपनारायण वर्मा 'वेणु 'को जानते हैं? छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बिरादरी में नई पीढ़ी के अधिकांश कवियों और साहित्यिक अभिरुचि के लोगों ने उनका नाम भी शायद नहीं सुना होगा । वे बहुत सहज -सरल और सौम्य स्वभाव के कवि थे । रायपुर में आज से 105 साल पहले,वर्ष 1921में जन्मे थे । यहीं उनकी साहित्य -साधना 1935 में शुरु हुई थी । आजीवन रायपुर में रहकर ही उन्होंने काव्य सृजन किया। उनकी कई कृतियाँ प्रकाशित हुईं. शहर के साहित्यिक आयोजनों में भी वे शामिल होते थे। उन दिनों शहर इतना अधिक फैला हुआ नहीं था । सड़कों पर आज की तरह लोगों की और तरह -तरह की तेज रफ्तार मोटर गाड़ियों की भयंकर भीड़ नहीं होती थी।
सड़कें चौड़ी भले ही कम थी, लेकिन खुली -खुली -सी लगती थीं।लोग एक मोहल्ले से दूसरे या तीसरे मोहल्ले तक बड़े आराम से साइकिलों पर या पैदल ही आया -जाया करते थे।मुझे कुछ -कुछ याद है,नाटे कद के वेणु जी गांधी टोपी और खादी का धोती -कुर्ता पहनकर पैदल ही शहर का भ्रमण करते हुए अपने मित्रों और परिचितों से बड़ी आत्मीयता से मिलते थे।वे पैदल ही स्थानीय दैनिक अख़बारों के दफ्तरों में जाकर सम्पादकों को अपनी कविताएँ दे आते थे। स्थानीय वरिष्ठ जनों में भी उनका बड़ा सम्मान था, लेकिन समय की तेज रफ़्तार ने उन्हें भुला दिया ।
ऐसे समर्पित साहित्य साधक, भूले -बिसरे कवि रूपनारायण वर्मा 'वेणु ' के 52 छोटे -बड़े गीतों का संकलन 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' का प्रकाशन 41साल पहले विजयादशमी के दिन 23अक्टूबर 1985 को हुआ था। उन्होंने 6 सितम्बर 1986 के दिन मुझे यह किताब और अपने खण्ड काव्य 'श्रुतिकीर्ति 'की एक सौजन्य प्रति भी सस्नेह अपने हस्ताक्षर के साथ भेंट की थी । इस खण्ड काव्य के अंतिम आवरण पृष्ठ पर वेणु जी के फोटो के साथ उनका साहित्यिक परिचय भी प्रकाशित हुआ है ।सूक्तियों और लघु कथाओं का उनका संकलन 'ज्योति निर्झर' वर्ष 1971 में प्रकाशित हुआ. यह उनकी पहली प्रकाशित कृति थी, जिसे नागपुर के धनवटे चेम्बर्स, सीतावर्डी स्थित विश्व भारती प्रकाशन ने प्रकाशित किया था।
उनकी दूसरी कृति ' सहस्त्र सुमन ' वर्ष 1981 में छपी , जिसके प्रकाशक वे स्वयं थे ।
वेणु जी की तीसरी पुस्तक खण्ड काव्य 'श्रुति कीर्ति 'का प्रकाशन वर्ष 1982 में हुआ, जिसके प्रकाशक गणेशराम नगर, रायपुर के डॉ.लक्ष्मण बजाज थे।कवि ने इसे भाव प्रधान काव्य के रूप में लिखा है। उनके परिचय में इसे खण्ड -काव्य भी बताया गया है, जो भगवान श्रीराम के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न की धर्मपत्नी श्रुतिकीर्ति पर केंद्रित है और मुक्त छन्द में है. उस पर फिर कभी अलग से लिखूँगा ।अभी तो वेणु जी के गीत -संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' की चर्चा करना चाहता हूँ ।
वेणु जी ने अपना यह गीत -संग्रह गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर की पावन स्मृति को समर्पित किया है। इस गीत -संकलन के प्रकाशक, प्रचारक और वितरक 'वेणु' जी के मित्र गणेशराम नगर, रायपुर के डॉ. लक्ष्मण बजाज थे । यह पुस्तक 60 पेज की है । उन दिनों इसकी कीमत केवल छह रूपए थी ।
*वेणुजी रस सिद्ध कवि थे*
******
उनके इस गीत -संकलन में 'पुरोवाच ' लिखा है पीएच -डी. और डी. लिट. की उपाधि प्राप्त डॉ. विष्णुप्रसाद पाण्डेय ने, जो उन दिनों शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, दुर्ग में हिन्दी के प्राध्यापक हुआ करते थे। उन्होंने लिखा है -"वेणु जी ने छायावादी रोमांटिक कविता के माध्यम से साहित्य -संसार में प्रवेश किया और प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, रहस्यवाद तथा मांसलवाद की धाराओं में अपनी कविता का ताना -बाना बुनते आ रहे हैं ।.... वेणु जी में जनजीवन की ज्योति का चितेरापन है। उनके अन्तः करण में भावमयी सरिता की स्नातकता है ।.... वेणु जी रस सिद्ध कवि हैं।वेणु जी की इन कविताओं में जान है और वे उदात्त संरचनाओं की परम्परा की रक्षा करती हैं ।
*मैं अपना परिचय क्या दूँ?*
गीत -संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' में अपने परिचय के अंतर्गत वेणु जी लिखते हैं -
"मैं अपना परिचय क्या दूँ ? मैं उस वीणा वादिनी की वीणा का तार हूँ, जिसमें जीवन के स्वर निकलते हैं।तुम उस युग की वंशी हो, जिसमें कई छिद्र हैं। उस जगत जननी भगवती माँ भारती की सेवा का ही प्रत्यक्ष फल है, जो मैं आप लोगों के बीच रहकर प्रति वर्ष उस कल्याणी माँ को एक पुष्प चढ़ाता हूँ, जिसके रजकण के प्रताप से मेरे निरगंध फूल सुरभित हो उठते हैं ।....कवि लिखते हैं -मेरे जीवन की अंतिम इच्छा यह है कि मेरे जीते जी मेरी सभी कृतियाँ प्रकाश में आ जाएँ।भारतीय परम्परा के अनुसार जीवित व्यक्ति का मूल्यांकन बहुत कम होता है, लोग मृत्यु होने की बाट देखते रहते हैं ।मेरी कृतियाँ मेरी हृदयतंत्री की आवाज़ है, जिसमें जीवन के सूक्ष्म तत्वों के दर्शन होंगे । वीणा बजाने वाला कुशल होना चाहिए । हे जगत नियन्ता! तुम वीणा हो और मैं श्याम सुन्दर की हूँ वेणु, जिसमें गोपियाँ तथा गोप भी हृदय तंत्री निहित हैं ।' तुम वीणा मैं बांसुरी' मानव जीवन को विकसित करने में समर्थ होगी, ऐसा पूर्ण विश्वास है ।
-विनयावत -रूपनारायण वर्मा वेणु "
वहीं ' उन्होंने स्वयं को 'माँ भारती के कंठहार का पुष्प' बताते हुए 'आत्म निवेदन ' शीर्षक एक अन्य वक्तव्य में लिखा है -"उस वीणा वादिनी के श्रीचरणों से सुवासित 'तुम वीणा मैं बांसुरी '(भाव प्रधान गीत संकलन )रख रहा हूँ, जिसमें जीवन के तथ्य एवं सूक्ष्म तत्वों पर विचार किया गया है । मेरी इस भाव प्रधान कृति में जीवन दर्शन और प्रकृति सौन्दर्य के सूक्ष्म तत्व विद्यमान हैं । उन्होंने इस पुस्तक में भूमिका लेखन के लिए डॉ. विष्णु प्रसाद पाण्डेय, परिचय लेखन के लिए प्रतिभा गुप्ता, सम्मति लेखन के लिए प्रतिभा तिवारी, आवरण और चित्र सज्जा के लिए अपने मित्र दीनदयाल सोनी सहित सभी सहयोगियों और मार्ग प्रदर्शक साहित्यकारों के प्रति आभार व्यक्त किया है ।
बहरहाल, अब हम वेणुजी के इस गीत -संकलन में प्रकाशित रचनाओं को देखें । इनमें कवि ने अपने मनोभावों के जरिए आशा -निराशा और हर्ष -विषाद सहित मानव जीवन के अनेक रंगों का समावेश किया है ।उनका पहला गीत 'वीणा वादिनी 'शीर्षक से देवी सरस्वती को समर्पित है ।
पृष्ठ 2पर प्रकाशित उनके दूसरे गीत में छायावादी स्वर की अनुगूंज है -
*मैं तुम्हारा दीप बनकर जल रहा हूँ ।
निशा जाती मुझको लेकर,
मैं तड़फता तुमको देखकर,
तुम चले हो अस्ताचल को,
मैं भी बुझता जा रहा हूँ । *
आगे की रचनाओं में से एक आज के समाज में व्याप्त नारी -उत्पीड़न और भूख से तड़फते इंसानों को लेकर है. इन गंभीर समस्याओं से आहत वेणु जी का कवि -हृदय अपने संकलन के पृष्ठ 3पर कहता है -
*मानव मिला न अब तक कोई
जो मानव कहलाए ।
एक नारी की लाज लुट रही,
एक खड़ी मुस्काये ।
हँस -हँस फूल लुटाये साजन,
एक पड़ा कुम्हलाये ।
एक दारुण दुःख से तड़फे,
एक खड़ा मुस्काये ।
एक तरसता दाने -दाने,
एक अन्न को ठुकराये ।
जो जग की आँखों का काँटा था,
वह फूल बन मुस्काये ।
संकलन के पृष्ठ 16 में एक छोटा -सा गीत हमें जीवन के संघर्षो को, दुःख -दर्दो को हँसते हुए झेल जाने की सीख देता है -
*मैंने तो हँसना सीखा है ।
दुःख -दर्दों को झेल -झेल कर
आगे बढ़ना सीखा है ।
आई आँधी मुझे गिराने
आया शीत मुझे कँपाने,
गिर -गिर उठना सीखा है ।*
वेणु जी का कवि इस संसार को छल से भरा मानता है । पृष्ठ 19 में प्रकाशित गीत में यह भावना प्रकट होती है -
*छल भरा संसार तेरा,
रूप में छल, मृत्यु में छल,
जीवन हो गया मेरा गरल,
दुःख भरा संसार तेरा ।
मैं तुम्हारे रूप में मिल रहा हूँ,
मैं तुम्हारी याद में घुल रहा हूँ,
छल भरा अभिसार तेरा ।
गीत संग्रह के पृष्ठ 17 में छपी अपनी रचना में कवि की भावनाओं को महसूस कीजिए -
* तुम मुझे पाषण रहने दो ।
मुझे जीवन न दो,
मुझे सूरत न दो,
मेरा अभिमान रहने दो ।
मेरा संसार है मंगल,
मेरा व्यवहार है उज्ज्वल,
मेरी वाणी है निश्छल,
उसे तुम रस में भरने दो ।
तुम्हारे प्यार में छल है,
तुम्हारा जीवन छलमय है,
मुझे तुम दूर रहने दो ।
मुझे वरदान नहीं होना,
मुझे श्रृंगार नहीं होना,
मैं उस रूप का अनुगामी,
मुझे तुम उसमें मिलने दो । *
संकलन के पृष्ठ 28 में 'गोस्वामी तुलसीदास जी के प्रति' और पृष्ठ 30 में महाकवि 'निराला 'जी के प्रति ' शीर्षक गीत में दोनों महाकवियों के सम्मान में वेणु जी ने अपनी भावनाएँ व्यक्त की हैं । पृष्ठ 33 में 'बसंत के प्रति 'शीर्षक से प्रकाशित गीत में विरह वेदना से पीड़ित नायिका बसंत के वातावरण में अपनी सखी से बातचीत करते हुए अपनी मनोव्यथा प्रकट करती है । इस गीत का प्रारंभिक अंश -
*नभ में लाली क्यों दौड़ रही,
बताओ सखी मुझको आकर,
मैं दिन -रात सुखूं हे आली,
वे आये न अपने निज गृह पर ।
सखी बोली -सुन हे तू प्यारी,
है जंगल में ऋतु बसंत,
चंदा जो हँसता आज यहाँ,
वह भी भूला है राग -रंग । *
वेणु जी पृष्ठ 35 पर प्रकाशित अपने 40 वें गीत में हताश -निराश मनुष्य का मनोबल बढ़ाते हुए कहते हैं -
*अमृत पुत्र होकर भी तुम
क्यों अंगारों से डरते हो ।
कितने युद्ध तुम देख चुके,
कितने देखोगे जीवन में ।
कितने कंटक पथ पार किये,
कितनी विपदा आई मग में ।
मैं उसी भस्म का बना हुआ,
जिसको शिव रोज चढ़ाते हैं ।
मरघट में खुशी मनाते हैं,
तुम उसी शिवा के अग्नि नेत्र,
फिर क्यों उनसे डरते हो । *
कवि रूपनारायण वर्मा 'वेणु ' के गीत आकाशवाणी रायपुर से भी प्रसारित हुए थे।समय -समय पर अनेक पत्र -पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें दैनिक नवभारत, नईदुनिया,देशबन्धु, युगधर्म, महाकोशल, अक्षत, मध्यप्रदेश संदेश, आयुर्वेद -विकास, धन्वंतरि, सुधा निधि, आयुर्वेद महासम्मेलन पत्रिका आदि शामिल हैं, जिनमें उनके गीतों, लघु कथाओं और लेखों का प्रकाशन हुआ।आयुर्वेद से संबंधित पत्रिकाओं में उनकी रचनाओं के प्रकाशन से ऐसा लगता है कि देश की इस अत्यंत प्राचीन चिकित्सा पद्धति में भी उनकी गहरी दिलचस्पी रही होगी, हालांकि इस बारे में उनसे पूछने का मौका मुझे नहीं मिला।
छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बिरादरी उम्मीद की जानी चाहिए कि वह अपने भूले -बिसरे कवि वेणु जी को याद रखने के लिए उनकी अप्रकाशित रचनाओं की खोज -ख़बर लेकर उन्हें प्रकाशित करने का प्रयास करेगी।जो समाज अपने साहित्यकारों को और उनके साहित्य को याद रखता है, उस समाज की मानवीय संवेदनाएँ भी बनी रहती हैं और सामाजिक समरसता के साथ उसकी संस्कृति भी सुरक्षित रहती है।
-स्वराज्य करुण

No comments:
Post a Comment