बोलो तानाशाह ! तुम कब मरोगे ?
(कविता : स्वराज्य करुण )
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जब मरोगे तब
कितनी ज़मीन, कितने जंगल
कितनी नदियाँ, कितने पहाड़
कितनी खदानें और कितने
देश अपने साथ लेकर
दुनिया से जाओगे?
बोलो, तानाशाह!
क्या तुम्हें शर्म नहीं आती ,
जो निरीह ,निःशस्त्र मनुष्यों की हत्या
करवाके भी बड़ी बेशर्मी से
अपनी पथराई आँखों और
ख़ून के प्यासे होठों से
मुस्कुराते रहते हो ?
तुम्हारी सेनाएं छोटे -छोटे देशों के
शहरों ,कस्बों और गाँवों पर बमों की
बरसात करके मासूम बच्चों को
अनाथ कर जाती हैं ।
हवाई हमलों के जरिए
चहल -पहल से भरी मानव बस्तियों
को बदल देती हैं श्मशानों में!
तुम्हारे सैनिक आकाश मार्ग से
जमीन पर उतरकर तुम्हारे आदेश पर
महिलाओं ,बच्चों ,जवानों और
बुजुर्गों को बेरहमी से मार डालते हैं!
वो जब मनुष्यों पर इतना ज़ुल्म ढाते हैं
तो फिर वहाँ उनके जुल्मों के
आगे मूक ,निरीह जानवरों ,
चहकते पंछियों और
हरे भरे वृक्षों , जल से भरी नदियों ,
का क्रंदन कौन सुनेगा ?
तुम्हारे हमलावर फौजियों के
खूनी पंजों में छटपटाती
प्रकृति का रुदन कौन सुनेगा ?
तानाशाह फिर भी अपने
वातानुकूलित 'वार रूम ' में
बैठ कर तबाही के खूनी नज़ारों को ,
कत्ल होती इंसानियत को
ठंडी हवाओं के बीच
शराब की चुस्कियों के साथ
रुपहले स्क्रीन पर देखते हुए
मुस्कुराते रहते हो,
नाचते, गाते, मस्ती करते रहते हो !
बमों के धमाकों और बारूद से
भरे आसमान को देखकर भी
नहीं दहलता तुम्हारा दिल !
रोते बिलखते बच्चों और
बदहवास माताओं को स्क्रीन पर
देखकर भी नहीं पसीजता तुम्हारा दिल !
बोलो तानाशाह !
क्या तानाशाहों को
कभी रोना नहीं आता ?
क्या तानाशाहों के माँ -बाप,
बीवी -बच्चे,भाई -बहन और
घर -परिवार नहीं होते?
दुनिया से इंसानी ज़िन्दगी को
मिटाने पर आमादा तानाशाह !
क्या तुम्हें आत्मग्लानि नहीं होती ?
तुम्हें तो शर्म से और पीड़ितों की
आहों से मर जाना चाहिए !
बोलो ,तानाशाह!तुम कब मरोगे ?
जल्दी मरो...!
हम तुम्हारी मौत की कामना करते हैं।
-- स्वराज्य करुण
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