Wednesday, May 15, 2019

(ग़ज़ल ) सवाल बेहिसाब और जवाब खो गए !

                      शहरों की भीड़ में  कई गाँव खो गए ,
                      डामर की सड़क पर जैसे  पाँव खो गए  !
                     
                      झील ,नदी और कई तालाब खो गए ,
                      कुछ उम्मीद खो गयी ,कुछ ख़्वाब खो गए !
                     
                      कांक्रीट के जंगल में  पहाड़ खो गए ,
                      सवाल बेहिसाब और जवाब खो गए !
                     
                      आग लगी चमन में उठता नहीं धुंआ ,
                      जाड़ों में वो प्यार के अलाव खो गए !
                     
                      संगीत खो गया , कई गीत खो गए ,
                      लफ़्ज थे लबों पे जिनके भाव खो गए !
                   
                      नोटों की थप्पियों पे  थिरके है सियासत
                      उसूल आज उनके   बेहिसाब खो गए !
                                                  --  स्वराज करुण

(महत्वपूर्ण सुझाव ) बहुत जरूरी है आईसीयू की वीडियो रिकॉर्डिंग ...!

                           - स्वराज करुण
अस्पतालों के आईसीयू  में भी सीसीटीवी कैमरे हों और वहाँ दाखिल गंभीर मरीजों के इलाज की वीडियो रिकार्डिंग  भी उनके परिजनों को दी जाए ।
          आज के समय में यह बहुत जरूरी हो गया है ।  इससे  उन्हें मालूम हो सकेगा  कि  डॉक्टरों के कहे अनुसार जो दवाइयाँ वो खरीदकर लाए थे , आईसीयू में मरीज को वो सभी दवाइयाँ नियमित रूप से दी गयी हैं ,दी जा रही हैं  और उसकी बेहतर देखभाल भी हो रही है  ?   उनके लिए परिजनों द्वारा खरीदकर दी गयी हजारों रुपयों की दवाइयों का वहाँ क्या और कैसा उपयोग हो रहा है ?   वो दवाइयाँ मरीज को दी जा रही हैं या नहीं ? ऐसे कई सवाल मरीजों के परिवार वालों के मन में उमड़ते -घुमड़ते रहते हैं ।           
     चूंकि आईसीयू में मरीजों के परिजनों को हर समय जाने नहीं दिया जाता ,इसलिए वीडियोग्राफी करके उन्हें उसकी रिकार्डिंग उपलब्ध कराए जाने पर उनको तसल्ली तो होगी कि इलाज नियमित रूप से हो रहा है ।   आईसीयू की हर गतिविधि का  बाहर वेटिंग रूम में एलईडी स्क्रीन पर सीधा प्रसारण किया जाना चाहिए ।इससे मरीज़ के परिवार और शुभचिंतकों को भी उसकी सेहत के बारे में पल -प्रतिपल की जानकारी मिलती रहेगी। आज के युग में अस्पतालों के प्रबंधन में और उनकी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की दृष्टि से भी यह जरूरी है । -  स्वराज करुण 

Monday, May 13, 2019

(आलेख )राजा साहब का मनपसंद कोल्ड -ड्रिंक !


                     -- स्वराज करुण 
तकरीबन हर शाम पहाड़ी से उतरकर अपने कुनबे के साथ इस मन्दिर में आने वाले इन 'जामवन्त ' महोदय का नाम पुजारी जी ने 'राजा' रखा है । गर्मी के इस मौसम में  'राजा साहब ' को पके आम के मीठे स्वाद वाला शीतल पेय (कोल्ड -ड्रिंक ) पीना बहुत पसंद है ।  इनकी एक बहन भी है ,जिसे पुजारी जी   'रानी 'कहकर बुलाते हैं । दोनों भाई - बहनों के अलावा जामवन्तों ( जंगली भालुओं  ) का एक परिवार और है ,जिसमें दो नन्हें शावक भी हैं ।
      आप ये दिलचस्प नज़ारा देख सकते हैं - छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 80 किलोमीटर दूर ग्राम पटेवा के नज़दीक मुंगई माता के मन्दिर परिसर में । उस दिन उधर से निकलते हुए रात्रि करीब  7.15  बजे मुझे भी  इन जामवन्तों के दर्शन हुए । मैंने बाजू के पान ठेले से चालीस रुपए का एक बोतल आम रस वाला कोल्ड - ड्रिंक खरीदा और पुजारीजी ने उसे राजा साहब के सामने पेश किया । फिर तो  'राजा साहब ' बड़े मजे से पूरी बोतल देखते ही देखते खाली कर गए । मेरे मोबाइल फोन की आँखों ने इस दृश्य को तत्काल कैद कर लिया  । 
       यह स्थान मुम्बई -कोलकाता राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक -53 के किनारे एक पहाड़ी के नीचे है । आम तौर पर  जामवन्तों का यह कुनबा हर शाम मन्दिर में संध्या -आरती के समय पूजा की घण्टियों की आवाज़ सुनते ही पहाड़ी से उतर कर वहाँ पहुँच जाता है । राष्ट्रीय राजमार्ग से  गुजरने वाले वाहन चालक और यात्री बड़ी  उत्सुकता से गाड़ी रोककर इन जामवन्तों को न सिर्फ़ देखते हैं ,बल्कि काँटेदार सुरक्षा घेरे के इस पार से उन्हें बिस्किट आदि भी खिलाते हैं । नारियल और नमकीन 'नड्डा ' भी ये बड़े चाव से खाते हैं , आम के मीठे स्वाद और सुगंध वाला कोल्ड - ड्रिंक भी मजे से पी लेते हैं लेकिन केला और सेब जैसे फल इन्हें पसन्द नहीं ।
       कुछ साल पहले वन विभाग ने दर्शनार्थियों और इन जामवन्तों की सुरक्षा के लिए भी लोहे के काँटेदार तारों का घेरा डाल दिया था ,लेकिन संध्या उपासना के  समय एक-दो जामवन्त सुरक्षा घेरे के आजू - बाजू से निकलकर मन्दिर के दरवाजे तक और कई बार गर्भगृह के सामने  पहुँच जाते हैं । पुजारी श्री टिकेश्वर दास  वैष्णव ने बताया कि   दीये के लिए रखे तेल और मन्दिर के प्रसाद को ये बड़े चाव से खाते हैं । पुजारी जी ने ये भी बताया कि 'राजा ' तो कई बार  तेल को डिब्बे सहित ले जाता है ।  ये  जामवन्त किसी  भी मनुष्य को नुकसान नहीं  पहुँचाते । हाँ ,अगर कोई इन्हें छेड़े तो शायद ये उनको छोड़ें भी न !
         मुंगई माता के मन्दिर से लगभग तीस -पैंतीस किलोमीटर पर महासमुंद जिले के ग्राम घुंचापाली ( तहसील -बागबाहरा ) में एक पहाड़ी पर चण्डी माता का मन्दिर है । वहाँ भी जामवन्तों का एक  कुनबा पहाड़ी गुफ़ा में  रहता है । इस कुनबे के सदस्य जामवन्त भी  शाम को पूजा के समय मन्दिर प्रांगण में पहुँच जाते हैं । भक्तगण बड़ी श्रद्धा से उन्हें प्रसाद खिलाते हैं ।  मेरे एक मित्र ने बताया कि चण्डी मन्दिर की पहाड़ी में रहने वाले इन जामवन्तों को भी आम रस के स्वाद वाला शीतल पेय बहुत पसंद है ।मेरे  मित्र का एक मित्र तो उनकी गुफ़ा तक पहुँचकर उन्हें इस प्रकार का कोल्ड -ड्रिंक पिलाते हुए मन्दिर परिसर तक ले आता है ।
                                     - स्वराज करुण 

Tuesday, May 7, 2019

( आलेख ) क्या होता है 'आईसीयू ' में जाने वाली दवाइयों का ?

           -- स्वराज करुण
बड़े -बड़े प्राइवेट सुपरस्पेशलिटी अस्पतालों के गहन चिकित्सा कक्ष यानी  'आईसीयू'  में भर्ती गंभीर मरीजों के लिए उनके परिजनों को  महँगी दवाओं की लिस्ट हर दिन कम से कम दो -तीन बार थमा दी जाती है । हजारों रुपयों की दवाइयां आने के बाद वह  मरीजों  को दी जाती है या नहीं , उनके परिवार वालों को  कौन बताएगा ?
         यह कैसे पता चलेगा कि मरीज़ को  लिस्ट के अनुसार खरीदी गयी  दवाइयां दी गयी हैं , क्योंकि आईसीयू के भीतर मरीजों से मिलने का एक निश्चित समय निर्धारित कर दिया जाता है ।  उस अवधि के बाद वहाँ किसी के भी जाने की मनाही रहती है। इसलिए परिजनों को पता ही नहीं चल पाता कि डॉक्टरों द्वारा उनसे ख़रीदवाई गयी मेडिसीन का उपयोग मरीज़ के लिए हो रहा है या नहीं ? इन परिस्थितियों में मेरा सुझाव है कि प्रत्येक अस्पताल के आईसीयू (गहन चिकित्सा कक्ष ) में सीसीटीवी और लगातार वीडियो रिकार्डिंग की व्यवस्था रखी जाए और  मरीज़ के परिवार को वीडियो रिकार्डिंग पेन ड्राइव या डीवीडी में दी जाए । साथ ही आईसीयू के बाहर वेटिंग रूम में एलईडी स्क्रीन लगाकर आईसीयू की प्रत्येक गतिविधि का प्रसारण भी किया जाए ,ताकि मरीजों के परिजनों को उनके इलाज को लेकर तसल्ली हो सके । इससे अस्पतालों के प्रबंधन में भी पारदर्शिता आएगी ।

   फिलहाल तो अस्पतालों में सब कुछ भरोसे पर ही निर्भर रहता है । मरीज़ के परिजन डॉक्टरों पर भरोसा करके अपने प्रियजन के स्वस्थ होने की प्रतीक्षा करते रहते हैं । लेकिन हाल ही में अक्षय कुमार अभिनीत एक फ़िल्म के  एक दृश्य को देखकर हमारे जैसे साधारण लोगों का  यह भरोसा टूट जाता है ।
  फ़िल्म का नाम मुझे याद नहीं आ रहा ,जिसमें दिखाया गया है कि अक्षय कुमार एक मृत मरीज़ को किसी सुपरस्पेशलिटी अस्पताल में ले जाते हैं ,जहाँ पेशेंट को डॉक्टर आनन -फानन में आईसीयू में दाखिल कर देते हैं ।  डॉक्टरों को पता रहता है कि जिस पेशेंट को लाया गया है ,वह निष्प्राण है । इसके बावज़ूद इस मरे हुए मरीज़ के परिवार को चार लाख रुपए से ज्यादा के बिल थमा दिए जाते हैं । पैसों के प्रलोभन में जकड़े अस्पताल वाले  निर्जीव शरीर को भी अपने कारोबार के  लिए भर्ती कर लेते हैं । वो आईसीयू के भीतर आपसी बातचीत में  इस मरे हुए मरीज़ को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बताकर खुश होते रहते हैं । उसके परिजनों से ख़रीदवाई गयी दवाइयों को बड़े ही शातिराना तरीके से मेडिकल स्टोर में वापस  भिजवा दिया जाता है ।
          क्लाइमेक्स में  अक्षय कुमार द्वारा मरीज़ का डेथ सर्टिफिकेट दिखाकर डॉक्टरों को असलियत बताई जाती है । इस पर डॉक्टरों के होश उड़ जाते हैं । फ़िल्म का हीरो यानी अक्षय कुमार इस पर अस्पताल प्रबंधन से मरीज़ की पत्नी को 50 लाख रुपए का मुआवजा दिलवाता है ।
यह फ़िल्म आज की चिकित्सा व्यवस्था की गोपनीयता आधारित व्यवसाय पर कड़ा प्रहार करती है ।
       हालांकि सभी डॉक्टर और सभी प्राइवेट अस्पताल ऐसे नहीं होते । समाज में  कई अच्छे सेवाभावी चिकित्सक और मानवता के कल्याण के लिए समर्पित अस्पताल भी  हैं , लेकिन अधिकांश डॉक्टर और अस्पताल चिकित्सा व्यवसाय को अधिक से अधिक मुनाफा देने वाली मशीन मानकर चल रहे हैं । ऐसे लोगों ने इस पवित्र व्यवसाय को  बदनाम कर दिया है ।
 आलेख : स्वराज करुण
(फोटो : Google से साभार )

Friday, May 3, 2019

(आलेख ) ओड़िशा के गाँवों में भी कंस की मथुरा नगरी !


         
     पूरा गाँव बन जाता है सजीव
     रंगमंच : कलाकार के रूप में ग्रामीण निभाते हैं भूमिका    
                                   --स्वराज करुण 
फिलहाल  वीरान लग रहा यह  रंगमंच कोई साधारण रंगमंच  नहीं ,बल्कि 'मथुरा नगरी " में कंस का राज दरबार है । इसमें ओड़िया लिपि में लिखा हुआ है 'कंस राज दरबार मथुरा नगरी । लेकिन कंस का यह राज दरबार उत्तरप्रदेश की  मथुरा नगरी में नहीं ,ओड़िशा के एक छोटे से सीमावर्ती गाँव चिचोली में है । 
    यह छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 65 किलोमीटर पर ओड़िशा की भुक्ता ग्राम पंचायत का आश्रित गाँव है । यहां बना  साधारण -सा दिखने वाला यह रंगमंच इसलिए असाधारण है कि हर साल माघ के महीने में एक सप्ताह तक इसके सामने हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती रहती है । यह मौका होता है  एक चलते -फिरते नाटक 'धनु जात्रा ' का ,जिसमें कृष्ण ,देवकी , वासुदेव , नन्द  बाबा , यशोदा , राधा और गोप -गोपिकाओं की भूमिका स्वयं स्थानीय ग्रामीण निभाया करते हैं । बाकायदा कंस का राज दरबार अपनी पूरी भव्यता के साथ सजता है । ग्रामीणों के अनुसार उन्हें इस आयोजन के लिए बाहर से कलाकार बुलाने की जरूरत नहीं होती ।

         सिर्फ कंस की भूमिका के लिए गाँव की ओर से बौद्ध जिले के ग्राम बरिहा पाली के कलाकार श्री गोपाल पण्डा को आमंत्रित किया जाता है ।वह भी इसलिए ,क्योंकि पहले यह भूमिका चिचोली के ही श्री ऋषिकेश भोई निभाया करते थे ,लेकिन  विगत कुछ वर्षों से  वह जिला मुख्यालय बरगढ़ में होने वाली 'धनु जात्रा ' में कंस बन रहे हैं । उल्लेखनीय है कि चलित नाटक के रूप में ओड़िशा के बरगढ़ की ' धनु जात्रा ' विश्व प्रसिद्ध है । इसके लिए कलाकारों का चयन जिला प्रशासन द्वारा  बाकायदा इंटरव्यू के जरिए किया जाता है । चिचोली के ऋषिकेश भोई का चयन भी बरगढ़ की धनु जात्रा में कंस की भूमिका के लिए इंटरव्यू के जरिए हुआ है ।
      बहरहाल ,हम बात कर रहे हैं चिचोली की 'धनु जात्रा' के बारे में । उस दिन 'कंस राज दरबार मथुरा नगरी " लिखे हुए इस रंगमंच को देखकर मैंने  जब उत्सुकता वश वहाँ कुछ पल के लिए रुककर ग्रामीणों से चर्चा की , तो इस प्रकार की  कई दिलचस्प बातें सामने आई ।  ग्रामीण परिवेश में चूना बनाने की की एक छोटी -सी भट्टी चलाने वाले ,पेशे से  लुहार श्री अशोक कुमार गुरु और एक स्थानीय नौजवान श्री नुनु साव ने बताया कि गाँव वालों की अपनी धनु जात्रा समिति है ।  विगत पच्चीस वर्षो से हर साल माघ के   महीने में उनकी समिति इस चलित नाटक का आयोजन कर रही है।  उन्होंने दावा किया कि जिला मुख्यालय  बरगढ़ की 'धनु जात्रा ' के बाद उनका आयोजन पूरे इलाके में दूसरे नम्बर पर माना जाता है । सीमावर्ती होने के कारण छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के सरिया ,बरमकेला और उधर जांजगीर जिले के शिवरीनारायण क्षेत्र से भी लोग इस चलित नाटक को देखने चिचोली आते हैं ।एक सप्ताह तक गाँव में काफी रौनक और चहल -पहल बनी रहती है । पूरा गाँव एक सजीव रंगमंच बन जाता है ।
  उन्होंने बताया  कि कृष्ण जी की बाल लीलाओं में कृष्ण और  गोप -गोपिकाओं की भूमिका स्थानीय  बालक -बालिकाओं द्वारा  निभायी जाती  है । कृष्ण  द्वारा ग्वालिनों की मटकी फोड़ने का अभिनय काफी रोचक होता है ।कुछ स्त्री पात्रों का अभिनय पुरुष भी कर लेते हैं ।गाँव के अलग -अलग हिस्सों को  मथुरा ,वृंदावन और द्वारिका  के रूप  बाँट लिया जाता है । यमुना नदी के प्रतीक के रूप में  ग्रामीणों ने पास ही एक छोटा -सा स्विमिंग पुल जैसा बनाया है । उसके इस पार को  मथुरा और उस पार को वृंदावन मान लिया जाता है । हाथी और ऊँट भी इस धनु जात्रा में भूमिका अदा करते हैं ।
      समिति द्वारा इसके लिए इलाहाबाद (उत्तरप्रदेश) के पेरुआँ पहाड़ नामक गाँव  से एक हाथी और चार ऊँट किराए पर लाए जाते  हैं ।   चिचोली के  अलावा इस इलाके में लेलहेर और नुआगढ़ में भी वहाँ की समितियों द्वारा "धनु जात्रा 'का आयोजन किया जाता है । सबसे पहले जिला मुख्यालय बरगढ़ की 'धनु जात्रा 'होती है ।फिर इन गाँवों की धनु जात्रा समितियों के आवेदन पर जिला प्रशासन द्वारा इन्हें अलग -अलग तारीखें दी जाती हैं ,ताकि हर आयोजन सुव्यस्थित रूप से हो सके ।
    पौराणिक कथाओं के जानकार पण्डितों के अनुसार  कृष्ण जी माघ के महीने में गोकुल से मथुरा गए थे ।  कृष्ण जी का वध करवाने के लिए कंस ने  धेनुकासुर और वकासुर जैसे कई राक्षसों को गोकुल भेजा था ,लेकिन वो सब उनके हाथों मारे गए । इस पर कंस ने कृष्ण को मथुरा लाने अक्रूर को गोकुल भेजा । मथुरा में कंस ने कृष्ण के लिए मल्लयुद्ध का आयोजन किया ,जहाँ  कृष्णजी  ने कंस का वध कर दिया । माघ के महीने में  गोकुल से श्रीकृष्ण की मथुरा यात्रा की स्मृति में धनु जात्रा का आयोजन किया जाता है ।
                           --  स्वराज करुण

Thursday, May 2, 2019

(ग़ज़ल ) कल मिला था गाँव में ...!

                         -स्वराज करुण 
भ्रांतियों की भीड़ में
खो गया अपना वतन ,
कल मिला था गाँव में
रो गया अपना वतन ।
कह रहा था जा रहा हूँ
ढूंढने रोजगार कोई ,
परिवार को  उम्मीद के
काँधे  ढो गया  वतन !
छोड़कर खलिहान -खेत ,
तालाब और जंगल - पहाड़ ,
पत्थरों की इक  नदी -सा
हो गया अपना वतन ।
आ गया है इस शहर में
चाहतों के बोझ संग ,
ओढ़कर फुटपाथ अब
सो गया अपना वतन !
              -स्वराज करुण
   

Wednesday, May 1, 2019

(आलेख ) लाशों से हो रही लाखों की लूट !


                                            -स्वराज करुण 
भारत के बड़े -बड़े शहरों में अत्याधुनिक उपकरणों से सुसज्जित कुछ प्राइवेट अस्पताल मृत मरीजों की लाशों से भी लाखों रुपए कमाने का गन्दा खेल बड़ी बेशर्मी से खेल रहे हैं । मरीज की सांसें थम चुकी हैं ,फिर भी उसे वेंटिलेटर पर रखकर उसके परिजनों को बताया जाता है कि मरीज के हॄदय की धड़कनें चालू हैं ।
      मृत मरीज को जीवित बताकर उसके परिवार वालों को धोखे में रखा जाता है ,ताकि वेंटिलेटर चालू रहे और  मीटर  तेज़ी से घूमकर हजारों रुपयों की बिलिंग करता रहे । वेंटिलेटर का रोज का किराया ही हजारों रुपए का हो जाता है !
     अगर किसी मृत मरीज को पन्द्रह दिनों तक आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखकर उसके दुखी -पीड़ित  परिवार से
 कोई प्राइवेट अस्पताल लाखों रुपए ऐंठ ले तो इसे क्या कहेंगे ? कुछ बड़े अस्पतालों में जब किसी गरीब मृत मरीज के परिजन बिल जमा नहीं कर पाते तो अस्पताल प्रबंधन लाश को ही बंधक बना लेता है !
        पता नहीं,  यह सच है या झूठ ,लेकिन  लोग कहते हैं कि ऐसे अस्पतालों में लाशों से हो रही है लाखों की लूट !
    -स्वराज करुण
(मुम्बई की लोकल ट्रेन में यात्रियों के बीच हुई  चर्चा का एक अंश )