Saturday, October 17, 2026

(पुस्तक -चर्चा )छत्तीसगढ़ के नारी रत्न ; स्वतंत्रता संग्राम और समाज सेवा में अग्रणी महिलाओं की जीवन गाथा (आलेख -स्वराज्य करुण )

 छत्तीसगढ़ के नारी रत्न ; स्वतंत्रता संग्राम और समाज सेवा में अग्रणी महिलाओं की जीवन गाथा

        (आलेख -स्वराज्य करुण )

आधुनिक युग में हमारे देश के हर राज्य में ऐसी अनेक महान नारी विभूतियाँ ज़रूर हुई हैं, जिनकी जीवन गाथा देशवासियों के लिए प्रेरणादायक हो सकती हैं, लेकिन जिन्हें आज की पीढ़ी लगभग भूल चुकी है । छत्तीसगढ़ भी ऐसी कर्मठ महिलाओं की पवित्र भूमि है, जिन्होंने  आज़ादी के आंदोलन के साथ -साथ समाज सेवा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है । स्वर्गीय श्री केयूर भूषण  की पुस्तक 'छत्तीसगढ़ के नारी रत्न ' इस राज्य की ऐसी 16 महिला -विभूतियों की प्रेरक जीवन -गाथाओं का संकलन है, जिनके बारे में हमें ज़रूर जानना चाहिए ।


                                                 


पुस्तक के लेखक श्री केयूर भूषण स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और गांधीवादी विचारक होने के साथ -साथ हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं के भी बड़े साहित्यकार  थे । उनका जन्म एक मार्च 1928 को छत्तीसगढ़ के तत्कालीन दुर्ग (वर्तमान बेमेतरा )जिले के ग्राम जाँता में और निधन तीन मई 2018 को राजधानी रायपुर में हुआ । केयूर भूषण जी वर्ष 1980 से 1990 तक दो बार रायपुर लोकसभा क्षेत्र के सांसद भी रहे । उस दौरान भी जनता से मिलने -जुलने के लिए शहर का भ्रमण वे अपनी साइकिल से ही करते थे । सादगी और सौम्यता उनके व्यक्तित्व की पहचान थी। वे हमेशा धोती -क़ुरता पहना करते थे साहित्य सृजन तो वे  लम्बे समय से करते आ रहे थे, लेकिन सांसद बनने के बाद एक कर्मठ जनप्रतिनिधि के रूप में सार्वजनिक जीवन में व्यस्त रहने के बावजूद उनका साहित्य सृजन जारी रहा। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में (1) छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह  -लहर ' (2)छत्तीसगढ़ी उपन्यास  -कुल के मरजाद  (3) छत्तीसगढ़ी उपन्यास -कहाँ बिलागे मोर धान के कटोरा (4) छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह -कालू भगत (5) हिन्दी भजन और प्रार्थना संग्रह -नित्य प्रवाह और (6) हिन्दी में ही -छत्तीसगढ़ के नारी रत्न उल्लेखनीय हैं । वे पत्रकार भी रहे । उन्होंने साप्ताहिक 'छत्तीसगढ़ ' और साप्ताहिक 'छत्तीसगढ़ संदेश ' सहित नई दिल्ली की तिमाही पत्रिका 'हरिजन सेवा और इंदौर की मासिक पत्रिका 'अंत्योदव ' का  सम्पादन किया ।इन प्रकाशनों के अलावा छत्तीसगढ़ी और हिन्दी में उनकी कई पुस्तकें अप्रकाशित भी रह गईं हैं ।


                                            

                                                              स्वर्गीय श्री केयूर भूषण 

 केयूर भूषण जी द्वारा संकलित, लिखित और सम्पादित 92 पन्नों की पुस्तक 'छत्तीसगढ़ के नारी रत्न ' जनचेतना प्रकाशन, सुन्दर नगर, रायपुर द्वारा वर्ष 2002 में प्रकाशित की गई थी । यह उनका स्वयं का प्रकाशन गृह था । पुस्तक में केयूर भूषण जी ने छत्तीसगढ़ की 16 नारी विभूतियों का विस्तृत  परिचय दिया है । सबके बारे में उन्होंने अलग -अलग आलेख लिखे हैं।स्वतंत्रता संग्राम और समाज सेवा से जुड़ी इन महिलाओं में डॉ. राधाबाई का परिचय भी शामिल है, जिनके नाम पर राजधानी रायपुर में शासकीय महिला कॉलेज भी संचालित हो रहा है। पहला आलेख उन्हीं पर केंद्रित है ।केयूर भूषण जी लिखते हैं -"डॉ. राधाबाई छत्तीसगढ़ क्षेत्र की उन विभूतियों में थीं, जिन्होंने राष्ट्र सेवा को ही अपना धर्म माना ।"  उनके बेहद कठिन जीवन संघर्ष का विवरण केयूर भूषण जी ने अपने प्रथम आलेख में दिया है । उनके आलेख से पता चलता है कि सन् 1875 के आसपास इतवारा (नागपुर )में  राधाबाई का जन्म हुआ था । तत्कालीन भारतीय समाज में प्रचलित बाल विवाह की कुरीति के चलते बचपन में ही उनकी शादी होने के बाद वे सिर्फ़ 9 साल की उम्र में ही विधवा हो गईं थीं । उनका आगे का जीवन बहुत संघर्षमय रहा । किसी तरह बड़ी होने के बाद  पहले नागपुर में नौकरी की  और आगे कामठी, रामटेक, अकोला और बिलासपुर रेलवे में नौकरी करते हुए अंत में सन् 1918 में  रायपुर आ गईं  । उन्हें रायपुर नगरपालिका में  'मिड वाइफ ' यानी दाई का काम मिला ।केयूर भूषण जी के शब्दों में -- "वह अपने हृदय में इतनी ममता संजोकर रखी थीं कि नगर के समस्त जच्चा -बच्चों की जीवनदायिनी माँ बन गईं । चाहे ग़रीब हो या अमीर, सबके मुख से राधाबाई का नाम निकलता था । तब वे जन -उपाधि के रूप में डॉ. राधाबाई कहलाने लगीं  । उनके समय में रायपुर नगरपालिका के अध्यक्ष हुए राय चौधरी, वामनराव लाखे, पं. बद्रीप्रसाद पुजारी, पं. रविशंकर शुक्ल, सुनील कुमार बोस, हक्कुन, ठाकुर प्यारेलाल सिंह । उनकी सेवा और लगन से प्रभावित होकर नगरपालिका की ओर से उन्हें ताँगा और घोड़े की सुविधा प्रदान की गई थी ।"    महात्मा गांधी के व्यक्तित्व और विचारों से प्रभावित डॉ. राधाबाई ने रायपुर में स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय और अग्रणी भूमिका निभाई  । केयूर भूषण के अनुसार वे सन् 1930 से 1942 तक हर एक सत्याग्रह में भाग लेती रहीं । जेल के भीतर की बहिनों को राष्ट्रभक्ति एवं सेवा की शिक्षा देतीं । साधारण महिला कैदी एवं जेल के अधिकारी भी उनका आदर करते थे । वे सबकी माता होती थीं  ।जेल से छूटते ही सेवा के क्षेत्र में कूद पड़तीं  ।अस्पृश्यता निवारण उनका ख़ास कार्य था ।सफाई कामगारों की बस्ती में जाकर वे स्वयं उस मुहल्ले की सफाई किया करती थीं ।उनके बच्चों को नहलाना -धुलाना, उन्हें पढ़ाना उनका सबसे रुचिकर काम होता था । वे पूजा पाठ वाली थीं, पर उन्होंने कभी धर्म भेद नहीं माना। उनका घर सबके लिए खुला रहता था ।भाईदूज के दिन  अपने रक्षाबंद मुस्लिम भाइयों की पूजा कर उन्हें अपने घर में अपने हाथ से भोजन पका कर खिलाती थीं ।"   केयूर भूषण जी ने यह भी लिखा है - " डॉ. राधाबाई जीवन पर्यन्त निस्वार्थ सेवा करती रहीं ।रायपुर नगर के कांग्रेस भवन के निर्माण में उनका  बहुत बड़ा योगदान रहा । वे स्वयं तगाडी में गारा भर उसे अपने सिर पर रखकर पहुँचाती रहीं और अंशदान के साथ श्रमदान भी किया । स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य को पूरा कर   2जनवरी 1950 को 9बजे सुबह  माघ पूर्णिमा के दिन वे अपनी 85 वर्ष की आयु में इस संसार को छोड़कर चली गईं  । "

       केयूर भूषण जी ने 'छत्तीसगढ़ के नारी रत्न ' में स्वतंत्रता संग्राम और समाज सेवा के कार्यों के लिए अपना जीवन लगा देनेवाली जिन अन्य महिलाओं की संघर्ष गाथाओं को आलेखों के रूप में प्रस्तुत किया है,  उनके शीर्षक पढ़कर उन महान विभूतियों के बारे में जानने की उत्सुकता होने लगती है । केयूर भूषण जी के इन आलेखों के शीर्षक हैं -(1) स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना रोहणी बाई परगनिहा (2) स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मातेश्वरी केकती बाई बघेल (3) ममतामयी माँ मिनी माता (4) सामाजिक क्रांति में अग्रणी -पद्मश्री माता राजमोहिनी देवी (5) महारानी पद्मावती देवी (6) साध्वी श्री सुविजिता श्री जी (विजिया देवी )(7) स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रीमती भानाबाई यादव (8) स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रीमती बेला बाई (9)स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रीमती फूल कुँवर बाई (10 ) तमोरा सत्याग्रह की वीरांगना दयावती (11) कंचन -सी खरी श्रीमती कौशिल्या देवी (12) सेवाव्रती कु. नाज खान (13) नगर माता बिन्नी बाई सोनकर (14) खादी और गांधी को समर्पित सरस्वती दुबे और (15) श्रीमती मारग्रेट दास । सार्वजनिक जीवन में इन सभी महिलाओं के योगदान पर अपने आलेखों में केयूर भूषण जी ने बहुत विस्तार से लिखा है ।

   इनमें से  श्रीमती केकती बाई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी,छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के अग्रणी नेता, साहित्यकार, विधायक और राज्य सभा सांसद रहे डॉ. खूबचंद बघेल की माता थीं । वे स्वयं अस्पृश्यता निवारण और सत्याग्रह सहित स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न आंदोलनों में शामिल होती थीं  ।वर्ष 1932 में रायपुर में सत्याग्रह आंदोलन के दौरान विदेशी वस्तुओं की एक दुकान पर सत्याग्रहियों के साथ धरना देते समय उन्हें भी गिरफ्तार किया गया था ।

 मिनी माता वर्ष 1952 में छत्तीसगढ़ की पहली महिला सांसद बनीं । वर्ष 1897 से 1899 तक छत्तीसगढ़ में भयानक सूखा पड़ा था, जिसके चलते रोजी -रोटी के लिए चाय बागान में काम करने उनके माता -पिता आसाम चले गए थे, जहाँ 15 मार्च 1916 को मिनी माता का जन्म हुआ था । उनके बचपन का नाम मीनाक्षी था ।  मिनी माता वर्ष 1952,1957,1962,1967 और 1972 में लोकसभा की सदस्य रहीं । दिल्ली के पालम हवाई अड्डे के पास 11अगस्त 1972 को विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया । उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में  सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ़ जन चेतना के विकास, बालिका शिक्षा, कृषि और सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के लिए ख़ूब प्रयास किया    ।  उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में  विशाल हसदेव - बांगो बाँध का नामकरण मिनी माता के सम्मान में किया गया है, जहाँ चालीस -चालीस मेगावाट के तीन जल विद्युत इकाइयाँ भी हैं  । छत्तीसगढ़ सरकार ने अनुसूचित जातियों -जनजातियों , अन्य पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यक महिलाओं के सशक्तिकरण के कार्यों को बढ़ावा देने के लिए मिनी माता सम्मान की स्थापना की है । इसके अंतर्गत चयनितों को दो लाख रूपए की सम्मान राशि महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा हर साल छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर रायपुर में आयोजित राज्योत्सव में दी जाती है।

   भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान से विभूषित, सरगुजा की श्रीमती राजमोहिनी देवी ने उस आदिवासी अंचल में समाज सेवा के बहुत -से कार्य किए थे  । वे शराब की सामाजिक बुराई के खिलाफ़ जन जागरण के लिए भी सक्रिय रहीं । खैरागढ़ की महारानी पद्मावती देवी ने खैरागढ़ में इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना करवाई  । वे तत्कालीन मध्यप्रदेश में 1952से 1967 तक विधायक,1956 से 1967 तक मंत्री और 1967 से 1971 तक लोकसभा सांसद भी रह चुकी थीं  । अपनी दानशीलता के लिए नगर माता के नाम से लोकप्रिय  श्रीमती बिन्नी बाई सोनकर रायपुर में सब्जियों की खेती करके जीवन यापन करती थीं ।उन्होंने  1990 के दशक में सब्जियों के विक्रय से मिले आठ लाख रूपए पंडित जवाहर लाल नेहरू शासकीय मेडिकल कॉलेज अस्पताल रायपुर के परिसर में धर्मशाला निर्माण के लिए दान कर दिए थे ,जिसका उदघाटन 7 सितम्बर 1996 को तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह ने किया था । बिन्नी बाई सोनकर ने बाद में उसी धर्मशाला के पास पाँच कमरों की एक और धर्मशाला बनवाने के लिए अपना मकान बेचकर पाँच लाख रूपए का दान अलग से दिया था  । 

      बस्तर जैसे आदिवासी बहुल जिले में रहकर शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय कार्यों के लिए सुश्री नाज खान को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था । उन्हें समाज सेवा के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार भी मिल चुका है ।वर्ष 2002 में जब केयूर भूषण जी की इस पुस्तक का प्रकाशन हुआ, उस दौरान  सुश्री नाज खान द्वारा जगदलपुर में अंध -मूक -बधिर कन्या आश्रम का संचालन किया जा रहा था । समाज सेविका श्रीमती मारग्रेट दास ने समाज के दलित शोषित वर्गों के उत्थान के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया था  ।  छत्तीसगढ़ के घूमन्तु देवार समुदाय के जीवन में स्थायित्व लाने के नेक इरादे से वर्ष 1980 के दशक में महासमुंद में कॉलोनी निर्माण में उनकी सार्थक पहल को लोग आज भी याद करते हैं ।

  पुस्तक की भूमिका छत्तीसगढ़ विधानसभा के अध्यक्ष रहे (स्वर्गीय ) श्री राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला द्वारा लिखी गई थी । उनका शुभकामना संदेश भी इसमें प्रकाशित किया गया है ।प्रस्तावना स्वयं लेखक श्री केयूर भूषण की है।इसमें छत्तीसगढ़ के तत्कालीन राज्यपाल श्री दिनेश नंदन सहाय, तत्कालीन मुख्यमंत्री  श्री अजीत जोगी,  उच्च शिक्षा मंत्री रहे श्री सत्यनारायण शर्मा,  पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री रहे श्री अमितेष शुक्ल,   लोक निर्माण मंत्री रहे तरुण चटर्जी, समाज कल्याण और महिला एवं बाल विकास मंत्री रहीं श्रीमती गीतदेवी सिंह और  जिला पंचायत रायपुर की तत्कालीन अध्यक्ष श्रीमती छाया वर्मा के शुभकामना -संदेश भी प्रकाशित किए गए हैं ।  देश के सुदीर्घ  स्वतंत्रता संग्राम के साथ -साथ सामाजिक जागरण और समाज सेवा के विभिन्न कार्यों में  इन  माताओं और बहिनों के ऐतिहासिक योगदान  को हमारी वर्तमान पीढ़ी के साथ - साथ आने वाली पीढियाँ भी याद रखें, इसके लिए सभी राज्यों में इस प्रकार की पुस्तकों का लेखन और प्रकाशन होते रहना चाहिए । आलेख - स्वराज्य करुण

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