Monday, October 12, 2026

(आलेख )भाषाओं के त्रिवेणी संगम में उर्दू मिश्रित हिन्दी की मिठास घोलती मज़ीद राही की शायरी/ लेखक -स्वराज्य करुण

 अब तक लगभग गुमनाम रहे शायर मज़ीद राही को जनता के सामने लाने का एक विनम्र प्रयास

भाषाओं के त्रिवेणी संगम में  उर्दू मिश्रित हिन्दी की मिठास घोलती  मज़ीद राही की  शायरी  

                             आलेख -स्वराज्य करुण 

 कविता या शायरी चाहे किसी भी भाषा की हो, वह आम जनता को भावनात्मक रूप से जोड़कर रखती है । यह ख़ासियत  मज़ीद राही की शायरी में भी मिलती है। हालांकि शायर के रूप में उनकी जान - पहचान का दायरा बहुत सीमित है, लेकिन उनकी नज़्मों और ग़ज़लों का कैनवास बहुत बड़ा है  । वे ओड़िशा राज्य के खरियार रोड शहर में एक सँकरी -सी गली के बहुत साधारण मकान में रहते हैं । यह शहर ओड़िशा  की पश्चिमी सीमा पर नुआपाड़ा जिले में छत्तीसगढ़ की सरहद से लगा हुआ है। यहाँ के जन -जीवन पर ओड़िया, छत्तीसगढ़ी और हिन्दी भाषाओं का  मिलाजुला गहरा सांस्कृतिक असर देखा जा सकता है ।  खरियार रोड की आम ज़िन्दगी  भी तीन भाषाओं (ओड़िया, छत्तीसगढ़ी और हिन्दी)  के त्रिवेणी संगम जैसी लगती है , जिसमें मज़ीद भाई की शायरी उर्दू मिश्रित हिन्दी की  मिठास घोल रही है  । यह इलाका ब्रिटिश हुकूमत के दौरान पहले छत्तीसगढ़ के तत्कालीन रायपुर जिले में, महासमुंद तहसील का हिस्सा था । उस दौरान जब अंग्रेजों की सरकार ने वर्ष 1936 में भाषावार प्रांतों का गठन किया, तब उसने खरियार रोड को ओड़िशा में शामिल कर लिया। यही कारण है कि आज के दौर में भौगोलिक और प्रशासनिक दृष्टि से अलग -अलग राज्य होते हुए भी यहाँ की आम ज़िन्दगी में दोनों राज्यों की साझा संस्कृति की खूबसूरत तस्वीर नज़र आती है  जोंक नदी यहाँ दोनों राज्यों की सीमा - रेखा बनकर बहती है। इस नदी पर बने पुल को दोनों तरफ से पार करके दोनों राज्यों के कामकाजी  लोग एक दूसरे के राज्य में रोज आते -जाते हैं।  खरियार रोड इस रास्ते पर  पश्चिम ओड़िशा का अंतिम शहर है । यहाँ के निवासी मज़ीद राही  की उर्दू और हिन्दी  शायरी जोंक नदी के  उस पुल की तरह आम जनता के दिलों को जोड़ने का काम करती है,  जो दोनों राज्यों के बीच नियमित आवागमन के साथ -साथ सामाजिक -सांस्कृतिक और व्यावसायिक सम्पर्को का  महत्वपूर्ण सेतु बनकर शान से खड़ा है । देश को मज़ीद भाई की नज़्मों और ग़ज़लों की तरह आज ऐसे ही भावनात्मक पुलों की ज़रूरत है , जो अपनी रचनाओं से  भारतवासियों को जोड़कर रखें । वे सचमुच कौमी एकता के शायर हैं ।  उनका  पूरा नाम अब्दुल मज़ीद खाँ अशरफी है, लेकिन शायरी वे मज़ीद राही के नाम से ही करते हैं ।उनकी  नज़्में और ग़ज़लें भले ही उर्दू ज़ुबान में हों, लेकिन वे उन्हें देवनागरी (हिन्दी )लिपि में लिखते हैं। वैसे भी आम बोलचाल की उर्दू और हिन्दी के बीच फ़र्क कर पाना बहुत मुश्किल है । दोनों ही भाषाओं में अरबी और फ़ारसी  सहित कुछ अन्य भाषाओं के शब्द भी दूध में शक्कर की तरह घुलमिल गए हैं, जिसकी मिठास मज़ीद राही जैसे शायरों की नज़्मों और ग़ज़लों में भी महसूस की जा सकती है ।



मज़ीद राही की कविताएँ  सामान्य उर्दू और सामान्य हिन्दी में होती हैं।हालांकि उन्होंने अपनी कुछ रचनाएँ उर्दू लिपि में भी लिखी हैं, लेकिन अपनी शायरी देवनागरी लिपि में लिखना उन्हें ज़्यादा अच्छा लगता है ।  खरियार रोड  के पास छत्तीसगढ़ के ग्राम नर्रा (वर्तमान जिला -महासमुंद )में 6नवम्बर 1956 को उनका जन्म हुआ था। यह गाँव जोंक नदी के पुल के उस पार है।मज़ीद भाई नर्रा में ही आठवीं तक पढ़ाई करने के बाद आगे चलकर जीवन-यापन के लिए  दर्जी बन गए। वे बताते हैं कि  उन्होंने बचपन में रायपुर के एक मदरसे में उर्दू की भी पढ़ाई की थी ।कुछ साल उन्होंने महासमुन्द जिले के पिथौरा कस्बे में रहकर टेलरिंग का काम किया, फिर वहाँ से लगभग 57 किलोमीटर दूर खरियार रोड आ गए और परिवार सहित यहीं के होकर रह गए। वे स्थानीय मस्जिद के मौलवी भी हैं ।  घर -गृहस्थी संभालते हुए  बड़ी खामोशी से काव्य -सृजन में  लगे हुए हैं। पिथौरा में कुछ साल रहने की वज़ह से वहाँ के लोगों  से उनका आत्मीय रिश्ता जुड़ गया है।इसीलिए जब हम लोगों ने सुना  कि मज़ीद भाई बहुत बीमार हैं,  शायद उन्हें लकवा हो गया है और वे बिस्तर से उठ नहीं पा रहे हैं, तो मुझे और मेरे कवि मित्र प्रवीण प्रवाह को भी बड़ी चिन्ता हुई ।

   हमने सोचा कि खरियार रोड जाकर उन्हें देख आएँ। रास्ते में प्रवीण ने मोबाइल से उन्हें कॉल किया।मज़ीद भाई ने ही कॉल रिसीव किया।उन्हें पता लगा कि हम उनसे मिलने खरियार रोड आ रहे हैं, तो वे बहुत ख़ुश हुए।फोन पर संक्षिप्त बातचीत से हमें कुछ तसल्ली हुई कि मज़ीद भाई स्वस्थ हैं ।खरियार रोड पहुँचकर हमने उन्हें साइकिल चलाते देखा और भला चंगा पाया तो और भी अच्छा लगा।  घर के पास गली के सामने रुककर उन्होंने हमारा स्वागत किया। फिर  घर ले गए।चाय -नाश्ता करवाया। बातचीत में उन्होंने बताया कि वाकई वे बहुत बीमार हो गए थे,लेकिन  ओड़िशा के  बरगढ़ जिले में गोड़भग्गा नामक गाँव के एक वैद्य से इलाज करवाया और ठीक हो गए  ।  

     मुस्कुराहट मज़ीद भाई के व्यक्तित्व की विशेषता है, लेकिन उस मुस्कान के पीछे देश और दुनिया के आम इंसानों का दर्द भी छिपा हुआ है, जिसे वे अपनी कविताओं में आवाज़ देते हैं । उन्होंने शायरी करना  वर्ष 1995 से शुरू किया था ।विगत तीन दशकों से  वे उर्दू और हिन्दी साहित्य की सेवा कर रहे हैं।अपनी कविताओं की डायरी और कापियों को वे अपने पलंग के नीचे  टीन की पुराने किस्म की पेटी में सुरक्षित रखते हैं, जिसे उन्होंने  खोला और अपनी हस्तलिखित रचनाओं की बेशकीमती धरोहर हमारे सामने रख दी  ।वे अपनी अधिकांश रचनाओं में लेखन तिथि और समय भी  ज़रूर अंकित करते हैं । उनकी रचनाओं में  जहाँ आज के मनुष्य का दुःख -दर्द  छलकता नज़र आता है, वहीं  उनमें देशभक्ति की भावनाएँ भी  महसूस की जा सकती हैं । उनकी कई रचनाएँ निराशा के स्याह अंधेरे में भटकते इंसानों को राह दिखाने वाली रौशनी की तरह लगती हैं ।आज से 25 साल पहले, वर्तमान युग की कड़वी सच्चाई बयान करती एक अक्टूबर 2001 को दिन के दो बजे लिखी 'हक़ीक़त' शीर्षक रचना में उनकी इन पंक्तियों को देखिए -


*मैं ये नहीं कहता हूँ कि ईमान नहीं है,

 लेकिन यहाँ सच बोलना आसान नहीं है ।

 हर एक आदमी से ये सवाल करूंगा,

 वो कौन है यहाँ जो परेशान नहीं है  ।

पश्चिमी हवा ने हमें कुछ ऐसा बिगाड़ा,

लगता है  मेरा देश हिन्दुस्तान नहीं है ।

कुछ हद से गुजरे जा रही है बेहयाइयाँ,

शर्म -ओ -हया किसी के दरम्यान नहीं है ।

मतलब परस्त लोगों से है दफ़न कायदा,

रिश्ते हैं, मगर रिश्तों में पहचान नहीं है । *


लेकिन जहाँ वे देश के वर्तमान माहौल से व्यथित हैं, वहीं अपने वतन का गुणगान करना भी नहीं भूलते । वे कहते हैं -


*ये ऊँचों में ऊँचा है आसमान की तरह,

  कोई नहीं है मेरे हिन्दुस्तान की तरह ।

  कुन्दन की मानिन्द मेरे देश के ज़र्रे ,

  हर किरण फूटती है  परवान की तरह ।

 चमचमाती जगमगाती गंगा की लहरें,

 शान पे हिमालय है सुल्तान की तरह ।

 इस मुल्क पे टिकी हैं सारे मुल्क की नज़रें,

 सारे ग़रीबों में जैसे धनवान की तरह ।

 'राही' की औकात से बाहर की बात है,

 तारीफ़ क्या करेगा, है नादान की तरह।* 


आत्मीय मुलाकात में उन्होंने बहुत भावुक होकर हमें अपनी इस ग़ज़ल की पहली दो पंक्तियाँ गाकर भी सुनाई । श्रृंखला साहित्य मंच ने एक बार उन्हें  पिथौरा में हुए अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में  आमंत्रित किया था, जहाँ  'शाने हिन्द ' शीर्षक उनकी  इस देशभक्तिपूर्ण  रचना को उनसे तरन्नुम में सुनकर कविगण और श्रोता दोनों झूम उठे  ।अपनी इस ग़ज़ल से मज़ीद भाई कवि सम्मेलन में छा गए थे ।उन्होंने अपनी यह ग़ज़ल 15 दिसम्बर 2001 को सुबह 7बजे लिखी थी ।मज़ीद भाई ओड़िशा के अपने शहर खरियार रोड की गंगा -जमुनी संस्कृति से भी बहुत प्रभावित हैं । यहाँ सभी समुदायों के लोग मिलजुल कर रहते हैं ।  यहाँ की मिट्टी की इस प्यार भरी तासीर को महसूस करते हुए मज़ीद राही ने 27 फरवरी 2001 को रात 2 बजे लिखा -

   *लाखों में एक शहर -ए -हिन्दुस्तान है,

     खरियार रोड नाम है, अम्नो आमान है ।

     अजीब असर है यहाँ की आबो मिट्टी में,

      सब एक रहते हैं जैसे ज़िस्मो जान हैं ।*


  मज़ीद भाई के शहर की तरह  साझा संस्कृति और सदभावना के कुछ शहर और कुछ गाँव अपवाद स्वरूप ज़रूर हो सकते हैं,लेकिन अफ़सोस की बात हैं कि आज  समय ऐसा आ गया है जब देश और दुनिया के अधिकांश के इंसानों में एक -दूसरे के प्रति प्रेम की भावना कम होती रही है और नफ़रत का माहौल बढ़ता जा रहा है, तब ऐसे नाजुक़ वक़्त में शायर मज़ीद राही लोगों को अपनी इन पंक्तियों में  मोहब्बत का पैगाम देते हैं -

*नफरत निकालिये, सभी नफरत निकालिये,

  मिलकर रहें ऐसी कोई सूरत निकालिये.

  आदमी ही आदमी के काम आता है,

   रहने दें आदमी को,दिल से मत निकालिये.

   फिज़ूल ख़र्च से बचें, कुछ फ़ायदा नहीं,

   हर नेक काम के लिये दौलत निकालिये.*


मज़ीद भाई के दिल की ये भावनाएँ उनकी कलम से 21 मार्च 2001 को दिन के दो बजे  निकली थीं, जो आज भी प्रासंगिक हैं। हर सच्चे कवि को जीवन के संघर्षों में घिरे इंसानों का दुःख -दर्द व्यथित और विचलित करता रहता है।मज़ीद राही  भी उन कवियों में से एक हैं ।उन्होंने अपने लेखन के शुरुआती दिनों में,तीन जुलाई 1995 को शाम 7बजे अपनी कविताओं की डायरी में लिखा -

*सागर का छलकना देखकर 

  ये दिल का छलकना हो न सका,

 लोगों से भरी इस दुनिया में

 कोई भी अपना हो न सका ।*


मज़ीद राही की शायरी में व्यंग्य भी है । वे आज के दौर के नेताओं पर तंज कसते हुए लिखते हैं -

     *मज़ाक समझ लिया है देश का नेता बनना,

     पहले आदमी तो बन, फिर देवता बनना ।

     कुछ बनना है तो माँ -बाप का सपूत बन,

    तब कहीं जाके भारत माता का बेटा बनना ।

     जरा बता दो हवस के पुजारियों को यहाँ 

     इतना आसाँ नहीं, शहीदों का सपना बनना ।*

    

 दुनिया में ऐसा कौन शायर होगा , जिसे ग़रीबों की पीड़ा महसूस नहीं होती ? मेहनतकश  ग़रीबों की दयनीय हालत देखकर मज़ीद राही के भीतर का शायर भी कराह उठता है और 'ग़रीबी ' शीर्षक रचना में 25 फरवरी 2001 को शाम छह बजे उनके दिल से निकलती हैं ये पंक्तियाँ -

   *दुनिया में ग़रीबों को आराम नहीं मिलता,

   रोते हैं तो  रोने का अंजाम नहीं मिलता ।

   सच्ची लगन से मेहनत करें, फिर भी ग़म ही ग़म है,

   कभी मेरी वफ़ाओं का इनआम नहीं मिलता ।

   बूँदों की तरह आना, धरती में समा जाना,

   तवारीख़ में कभी हमारा कहीं नाम नहीं मिलता।*

ग़रीब इंसान  अपने ग़मों से  भी हिम्मत नहीं हारता  ।  वह दुःखों के अंधेरे में भी तारों की मानिन्द चमकता रहता है  । कुछ इसी तरह के जज़्बात मज़ीद भाई के इस मुक्तक में भी उतर आए हैं -

   * तूफ़ाने ग़म में ग़रीबों का ठहरना देखो, 

      काँटों के बीच फूलों का महकना देखो।

      चाँदनी चाँद से होती है ये माना मैंने,

      अंधेरी रात में तारों का चमकना देखो ।*


ग़रीबों के दर्द को अपने दिल की गहराइयों से महसूस करते हुए शायर मज़ीद राही ने 27 मई 2002 को दिन के दस बजे 'गुरबत ' शीर्षक रचना में लिखा था - 

   *ज़मीं झाँकती है, गगन झाँकता है,

    वो देखो, किसी का बदन झाँकता है ।

    ग़रीबों से गुरबत का यूँ देखा रिश्ता,

    मैय्यत को जैसे कफ़न झाँकता है ।

    हिकारत से देखो न राही किसी को, 

    तुम्हें जब ग़रीबों का मन झाँकता है ।*

रोजी -रोटी के चक्कर में उलझा हर इंसान अपने आस -पास के माहौल को देखकर कुछ न कुछ सोचता ज़रूर है ।  कुछ न कुछ भावनाएँ उसके दिल में भी उमड़ती -घुमड़ती रहती हैं ।  यह अलग बात है कि ज़िन्दगी की भागदौड़ में व्यस्त रहने की वज़ह से वह उन भावनाओं को शब्द नहीं दे पाता और उसके जज़्बात दिल में ही रह जाते हैं, लेकिन एक शायर या कवि आम इंसान की उन भावनाओं को अपने दिल की गहराइयों से महसूस करता है और अपने चिंतन और लेखन से उन्हें शब्दों के साँचे में ढालकर  दुनिया के सामने रख देता है । मज़ीद राही की रचनाओं को भी हमें उसी नज़रिए से देखना चाहिए ।

आलेख -स्वराज्य करुण,