Sunday 29 May 2011

(ग़ज़ल) जिंदगी की नदी में !

                                                                                            
                           हमने जिसे  अपने  खून-पसीने से खूब सींचा है ,
                           करीब  उसके जा भी  न सकें , ये कैसा बगीचा है   !

                            कालीन जो तुमने  बनायी, बिछी है  उनके पाँव में ,  
                            घर में तुम्हारे  यहाँ महज  काँटों का  गलीचा है !


                            वो  क्या समझेगा  हमारे दिल के लहू की कीमत ,             
                           जिसने अमन के नाम  दूसरों  का लहू उलीचा है !


                            जिंदगी की  नदी में  थकने लगी  नौका समय की
                            सफर का लम्बा  रास्ता कभी ऊंचा , कभी नीचा है !


                             मुखौटों की  महफ़िल में  असली -नकली कौन यहाँ
                             पहचान कर  न पहचाने कोई , फोटो किसी ने खींचा है !


                              है  किसे परवाह किसी की , इस बेरहम बाज़ार में ,
                              रोने से बताओ  दिल यहाँ कब किसका  पसीजा है !

                           
                                                                                             -- स्वराज्य करुण
                        

15 comments:

  1. है किसे परवाह किसी की , इस बेरहम बाज़ार में ,
    रोने से बताओ दिल यहाँ कब किसका पसीजा है !

    -वाह!! बहुत बढ़िया.

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  2. क्या कहूँ आज की गज़ल पर हर शेर दाद के काबिल है।

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  3. @मुखौटों की महफ़िल में असली -नकली कौन यहाँ
    पहचान कर न पहचाने कोई,फोटो किसी ने खींचा है।

    आज लगता है किसी फ़ोटोग्राफ़र की शामत आई है,
    तभी तो आपने आज इतनी उम्दा गजल बनाई है। :)

    आभार

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  4. है किसे परवाह किसी की, इस बेरहम बाज़ार में ,
    रोने से बताओ दिल यहाँ कब किसका पसीजा है !

    बहुत खूबसूरत गज़ल.

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  5. 'कालीन जो तुमने बनाई, बिछी है उनके पाँव में
    घर में तुम्हारे यहाँ महज ,काँटों का गलीचा है '

    .............वाह , बड़े सहज ढंग से कलाकारों का दर्द उकेरा है , सुन्दर शेर में

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  6. हर शेर दाद के काबिल है। बहुत खूबसूरत गज़ल|

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  7. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 31 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

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  8. कालीन जो तुमने बनायी, बिछी है उनके पाँव में ,
    घर में तुम्हारे यहाँ महज काँटों का गलीचा है !

    बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल ...! खासकर ये शेर अच्छा लगा !

    ग़ज़ल में अब मज़ा है क्या ?

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  9. है किसे परवाह किसी की , इस बेरहम बाज़ार में ,
    रोने से बताओ दिल यहाँ कब किसका पसीजा है !

    aabhaar sir ji
    bahut achchi line hai

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  10. वो क्या समझेगा हमारे दिल के लहू की कीमत ,
    जिसने अमन के नाम दूसरों का लहू उलीचा है

    शेर अच्छा लगा

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  11. है किसे परवाह किसी की , इस बेरहम बाज़ार में ,
    रोने से बताओ दिल यहाँ कब किसका पसीजा है ...

    बहुत खूब .... लाजवाब शेर है ...

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  12. भारत में सरकार ने 10 करोड़ नेटयुजर्स का मुंह बंद करने के लिए 11 अप्रेल से आई टी एक्ट में संशोधन करके संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का गला घोंटने की कवायद शुरु कर दी है। अब तो ब्लॉगर्स को संन्यास लेना पड़ेगा। इसके लिए मदकुद्वीप से अच्छी जगह कोई दुसरी नहीं हो सकती। आईए मद्कुद्वीप में धूनी रमाएं एवं लैपटॉप-कम्पयुटर का शिवनाथ नदी में विसर्जन करें।

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  13. जिंदगी की नदी में थकने लगी नौका समय की
    सफर का लम्बा रास्ता कभी ऊंचा , कभी नीचा है !
    बहुत खुबसूरत ग़ज़ल.

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  14. बुहत बढ़िया अशआरों से सजाई है आपने यह ग़ज़ल!

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