Saturday, February 28, 2026

(आलेख )अलविदा भाई सुशील भोले.../लेखक -स्वराज्य करुण

 अलविदा भाई सुशील भोले 

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छत्तीसगढ़ी भाषा के जाने -माने कवि, चिंतक, लेखक और पत्रकार, सबके चहेते भाई सुशील भोले अत्यंत शोकाकुल वातावरण में पंचतत्व में विलीन हो गए । कल 27 फरवरी 2026 को पूर्वान्ह राजधानी रायपुर के मारवाड़ी श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार हुआ । ज्ञातव्य है कि  स्वर्गीय सुशील भोले स्थानीय संजय नगर (टिकरा पारा ) के निवासी थे । उनका 26 फरवरी 2026 को रायपुर शहर के एक अस्पताल में  निधन हो गया था ।उन्हें अंतिम विदाई देने  उनके परिजनों सहित बड़ी संख्या में नागरिक और अनेक साहित्यकार और पत्रकार श्मशान घाट पहुँचे । शोक सभा में दिवंगत आत्मा के सम्मान में दो मिनट का मौन धारण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई । लोगों ने छत्तीसगढ़ी साहित्य को समृद्ध बनाने में उनके लगभग चार दशकों के सुदीर्घ योगदान को याद  करते हुए उनसे जुड़ी अपनी स्मृतियों को साझा किया ।


                                                  


अंतिम संस्कार में पहुँचे लोगों में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा, साप्ताहिक 'छत्तीसगढ़ी सेवक' रायपुर के पूर्व सम्पादक जागेश्वर प्रसाद,खेतिहर मजदूर किसान मोर्चा के छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष ठाकुर रामगुलाम सिंह तथा वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार ग़ुलाल वर्मा, परमानंद वर्मा,स्वराज्य करुण,  रसिक बिहारी अवधिया,सुखदेवराम साहू 'सरस ' छत्तीसगढ़ी फिल्मों के निर्माता और अभिनेता चन्द्रशेखर चकोर और राजिम के साहित्यकार दिनेश चौहान सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन शामिल थे ।

    उल्लेखनीय है कि कवि, लेखक और पत्रकार के रूप में स्वर्गीय सुशील भोले छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के विकास के लिए विगत लगभग चालीस वर्षों से सक्रिय थे।कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ की महान विभूतियों से जुड़े संस्मरणों  पर आधारित उनकी पुस्तक 'सुरता के संसार 'भी काफी चर्चित और प्रशंसित हुई थी।इसमें उनके 39 छत्तीसगढ़ी आलेख शामिल हैं । सुशील भोले (पूर्व नाम -सुशील वर्मा ) ने  दिसम्बर  1987 में छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका ' मयारू माटी ' का सम्पादन और प्रकाशन शुरु किया था । आर्थिक कठिनाइयों के कारण इसके 13 अंक ही प्रकाशित हो पाए। वर्ष 1989 में  उनके काव्य संग्रह 'छितका कुरिया ' और वर्ष 2009 में छत्तीसगढ़ी कहानी -संग्रह 'ढेंकी' का प्रकाशन हुआ । सुशील भोले की अन्य छत्तीसगढ़ी कविता -पुस्तकों में 'दरस के साध' और 'जिनगी के रंग' भी उल्लेखनीय हैं। मूल संस्कृति पर आधारित उनका आलेख -संग्रह 'आखर अंजोर' भी खूब चर्चित हुआ था । वर्ष 2018 के माह नवम्बर में उन्हें पक्षाघात हो गया था, लेकिन वे इस गंभीर शारीरिक समस्या का हिम्मत के साथ मुकाबला करते हुए निरंतर साहित्य सृजन में लगे रहे।मेरा -उनका लगभग चार दशकों तक साथ रहा 

  मुझे सांध्य दैनिक 'चैनल इंडिया ' के साहित्य सम्पादक के रूप में अख़बार के साप्ताहिक साहित्य परिशिष्ट में समय -समय पर  उनकी अनेक रचनाओं के प्रकाशन का सौभाग्य मिला । उनकी अधिकांश रचनाओं में छत्तीसगढ़ी लोक जीवन और लोक संस्कृति की सोंधी महक हुआ करती थी।उन रचनाओं को पढ़कर आज भी इसे महसूस किया जा सकता है ।  विगत कुछ वर्षों से वे कुछ अखबारों में 'कोंदा -भैरा के गोठ ' शीर्षक से सम -सामयिक विषयों पर छत्तीसगढ़ी में व्यंग्यात्मक स्तंभ लेखन भी कर रहे थे। अपनी वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए वे सोशल मीडिया का भी उपयोग कर रहे थे  ।  यूट्यूब पर भी छोटी -छोटी छत्तीसगढ़ी कविताओं के साथ अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। स्वर्गीय सुशील भोले ने 'मयारू माटी ' के नाम से प्रदेश के छत्तीसगढ़ी और हिन्दी  कवियों और लेखकों का एक वाट्सएप ग्रुप भी बनाया था । वे कुछ वर्षों तक वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार के सांध्य दैनिक 'छत्तीसगढ़ ' के साप्ताहिक 'इतवारी अख़बार ' में सहायक सम्पादक भी रहे। 

-स्वराज्य करुण 

 

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