Wednesday, February 18, 2026

(आलेख ) महाकवि कालिदास के 'मेघदूत' से छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी का रिश्ता /लेखक -स्वराज्य करुण

 महाकवि कालिदास के 'मेघदूत' से 

  छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी का रिश्ता 

      (लेखक -स्वराज्य करुण )

                   ******

महाकवि कालिदास की कालजयी कृति 'मेघदूतम ' का उल्लेख किए बिना प्राचीन भारतीय साहित्य अपूर्ण ही माना जाएगा. कई विद्वान छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में उदयपुर के पास खड़े रामगढ़ (रामगिरि) पर्वत को 'मेघदूत ' की रचना -स्थली मानते हैं.इसे लेकर विद्वानों में मत -भिन्नता है, लेकिन अगर कुछ विद्वान इस रामगिरि को ही 'मेघदूत ' की रचना स्थली मानते हैं तो इससे पता चलता है कि महाकवि कालिदास और उनकी इस लोकप्रिय कृति से छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक और भावनात्मक सम्बन्ध प्रारम्भ से ही जुड़ा हुआ है. आधुनिक युग  में प्रदेश के तपस्वी साहित्यकार पद्मश्री पंडित मुकुटधर पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ी भाषा से भी इसका रिश्ता जोड़ दिया .  उन्होंने  'मेघदूत 'का पहला छत्तीसगढ़ी अनुवाद किया था. लेकिन प्रकाशित अनुवाद के प्राक्कथन में पाण्डेय जी ने विनम्रता पूर्वक लिखा है -

"आंचलिक बोलियों में कदाचित छत्तीसगढ़ी में यह सर्वप्रथम अनुवाद है. यह न तो अविकल अनुवाद है और न भावानुवाद, दोनों के मध्य की वस्तु है. कहीं कुछ शब्द या वाक्यांश छूट गये हैं तो कहीं नये जुड़ गये हैं. छूटे हुए अंश कुछ ऐसे नहीं कि उनके बिना मूल भाव में कुछ अधिक अंतर पड़ता हो.प्रस्तुत अनुवाद में मूल का शतांश आनन्द भी पाठकों को प्राप्त हो जाए तो मैं अपना परिश्रम सफल समझूंगा."

             



छत्तीसगढ़ लेखक संघ रायगढ़ ने 'मेघदूत'का छत्तीसगढ़ी अनुवाद वर्ष 1984 में प्रकाशित किया था. यह अनुवाद पाण्डेय जी के प्राक्कथन सहित 55 पृष्ठों में है. कथानक के प्रथम खण्ड में 63 छन्द और द्वितीय खण्ड उत्तर मेघ में 52 छन्द हैं. 

          

        छोटा -सा गीति -काव्य है 'मेघदूत'

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   अनुवादक स्वर्गीय पंडित मुकुटधर पाण्डेय अपने प्राक्कथन में काव्य -कला की दृष्टि से 'मेघदूत ' को कालिदास की एक अनूठी कृति और  एक छोटा -सा गीति -काव्य मानते हैं. उनकी कलम से इसका यह छत्तीसगढ़ी अनुवाद  अत्यंत सम्मोहक बनपड़ा हैं. प्रथम खण्ड (पूर्व मेघ ) के इन अंशों को देखिए -

                     (1)

    यक्ष एक हर अपन काम म गलती कछु कर डारिस 

     तब कुबेर हर शाप छोड़ (अलका ले ओला निकारिस) 

    "बच्छर दिन नारी ले ओला विलग रहे बर परही

     (मोर नगर ला छोड़ कहूँ दुरिहा म बासा करही)

      बूडिस महिमा, यक्ष रामगिरि म जा छाइस छानी,

     जिहाँ जानकी के असनाँधे भरे कुण्ड म पानी.

                       (2)

    ओ पहाड़ म कै महिना कटगे बिछोह दुःख भारी 

    सोनहा चूरा तरी खसकगे, बिसरे कभू न नारी.

   परथम दिन असाढ़ के देखिस (बड़ीहन)बादर छाए,

    परबत छत ला खीसा मारत हाँथी कस बौराए.


                   (3) 

जे बादर ला देख काम -कौतुक हर मन  में जागे 

ओकर आगू केसनो करके ठाढ़े रस म पागे.

बहुत बेर ले सोंचत रहिगे (मगन भाव म होके ),

यक्ष राज के अनुचर हर आँखी म आँसू रोके.

मेघ देख के सुखिया के मन घलो बदल जब जाथे, 

 विरही मन के का कहना, दुरिहा म जी अकुलाथे.

          (4)

सावन लकठाइस, बिरहिन हर जेमाँ प्रान बचाए 

बादर हाथ संदेसा भेजे के विचार ठहराए.

फूल कोरिया अंजुरा म लेके अरघ बनाए,

कुशल -क्षेम पूछ के यक्ष हर स्वागत ओकर गाए.

         (5)

बादर बन थे धूँका, धूआँ, मिल के आगी -पानी 

कहाँ संदेसा ले जा सकथे जीयत-जागत प्रानी.

व्याकुल जी म यक्ष नि बूझिस, बादर दूत बनाइस,

कामी हर जड़ -चेतन मा भेद कहाँ कर पाइस?

             (6) 

जग -जाहिर पुष्कर आवर्तक, कुल म तैं जनमे, 

इन्दर राजा के मंत्री अस, (दया बहुत तोर मन में ).

अइसे जान गोहारौँ तोला, बिपद परे है भारी,

दूर देश म परे आज हौँ, छोड़ पियारी नारी.

जो माँगै तो गुनवन्ता ला माँगै, भले नि पावै,

फेर अधम ला कभू न, पूरन माँग भले हो जावै.

         (7)

मैं बिरहा के सरन लगे है हिरदे म मोर आगी,

धनपति के रिस कारन बिछुरे हौँ, मैं बड़े अभागी.

पहुँचा दे सन्देस पियारी ला अलका म जाके,

(जेहर राजधानी कुबेर के ) नगर यक्ष राजा के.

पुर बाहिर है बाग -बगइचा, लगे बहुत फुलवारी,

चन्द्रचूड़ के चन्द्र किरन म धोए महल -अटारी.


अनुवाद के प्राक्कथन में पंडित मुकुटधर पाण्डेय लिखते हैं -

*संसार की अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है. हिन्दी में तो इसके कई अनुवाद हुए हैं. ब्रज भाषा में राजा लक्ष्मण सिंह और राय देवी प्रसाद 'पूर्ण 'के अनुवाद प्रसिद्ध हैं.

   *मैंने अनुवाद में मल्लीनाथ की टीका से सहायता ली है. पाठ भी उन्हीं का रखा है सिर्फ़ एक जगह 'क्षण मुख पट ' का अर्थ मल्लीनाथ से भिन्न मिलेगा.

* अनुवाद की भाषा छत्तीसगढ़ी का वह रूप है, जो रायगढ़, सारंगढ़ और चन्द्रपुर अंचल में प्रयुक्त होता है. कहीं कारक प्रत्ययों के रूप में आधुनिकीकरण भी दृष्टिगत होगा.उदाहरण के लिए तृतीय करण कारक के चिन्ह 'से' को ले लीजिए. छत्तीसगढ़ी में 'से' की जगह कहीं 'में ', कहीं 'मँ' या 'माँ' तो कहीं 'ले' का प्रयोग होता है. इसमें एकाध जगह 'से' भी मिलेगा, जैसा कि आजकल पढ़े -लिखे लोग बोलते हैं. 

 *रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग की छत्तीसगढ़ी से इसमें अन्तर स्वाभाविक है, क्योंकि कहा जाता है कि चार -चार कोस के अन्तर में बोली में कुछ न कुछ फ़र्क आ जाता है.

* अनुवाद की भाषा क्रिया -पदों को छोड़कर कहीं -कहीं संस्कृत -शब्द -बहुल हो गई है. बिना संस्कृत शब्दों की सहायता लिए जब हिन्दी में ही अनुवाद नहीं हो सकता तब छत्तीसगढ़ी में होना तो और भी कठिन है. दूसरी बात गद्यनुवाद की अपेक्षा पद्यानुवाद में एक और कठिनाई छन्द और तुकों की सामने आती है. 

 पाण्डेय जी कहते हैं -"अनुवाद की भाषा क्रिया -पदों को छोड़कर कहीं -कहीं संस्कृत -शब्द -बहुल हो गई है. बिना संस्कृत शब्दों की सहायता लिए जब हिन्दी में ही अनुवाद नहीं हो सकता तब छत्तीसगढ़ी में होना तो और भी कठिन है. दूसरी बात गद्यनुवाद की अपेक्षा पद्यानुवाद में एक और कठिनाई छन्द और तुकों की सामने आती है." 

   उल्लेखनीय है कि साहित्य ऋषि पंडित मुकुटधर पाण्डेय हिन्दी कविता में छायावादी भावधारा के प्रवर्तक माने जाते हैं. वर्ष 1920 में जबलपुर की पत्रिका 'श्रीशारदा'  में छायावाद पर उनके 4निबंध धारावाहिक प्रकाशित हुए थे.हिन्दी साहित्य के इतिहास में उन्हें द्विवेदी युग का महत्वपूर्ण कवि माना जाता है.

 भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1976 में पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया था.पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर से उन्हें डी. लिट. की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया था.

उनकी पहली कविता 14साल की उम्र में आगरा की पत्रिका स्वदेश बांधव में छपी, पहला कविता -संग्रह 'पूजा के फूल ' वर्ष 1919 में, एक निबंध संग्रह 'छायावाद और अन्य निबंध 1983 में और मेघदूत का छत्तीसगढ़ी अनुवाद 1984 में प्रकाशित हुआ.

पंडित मुकुटधर पाण्डेय का जन्म 30 सितम्बर 1895 को महानदी के किनारे ग्राम -बालपुर (तत्कालीन जिला बिलासपुर, वर्तमान जिला जांजगीर चाम्पा)में हुआ था.  उनका निधन अपने गृह नगर रायगढ़ में 6 नवम्बर 1989 को हुआ. वे वर्ष 1919 से 1929 तक अध्यापक रहे. वर्ष 1931 से 1937 तक उन्होंने नटवर हाई स्कूल रायगढ़ में अध्यापन किया.वर्ष 1937 से 1940 रायगढ़ रियासत के मजिस्ट्रेट, द्वितीय श्रेणी दंडाधिकारी रहे. 

                

मेघदूत के छत्तीसगढ़ी अनुवाद पर

 पंडित मुकुटधर पाण्डेय के विचार -

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उन्होंने प्राक्कथन में जो लिखा, उनमें से कुछ बिंदुवार इस प्रकार है -

*मेघदूत के कवि कालिदास का परिचय देना सूर्य को दीपक दिखाना है. कालिदास 473 ईस्वी के पहले हुए हैं.(मंदसौर में प्राप्त वत्सभट्टी लिखित एक शिलालेख )

* कालिदास के लिखे निम्न लिखित ग्रंथ कहे जाते हैं -

(1)ऋतु संहार (2) विक्रमोंर्वशीयम (3) मालविका अग्नि मित्रम 

(4) अभिज्ञान शाकुंतलम (5) कुमार संभव (6)रघुवंशम (7) मेघदूतम (8)श्रृंगारतिलकम (9)श्रुतबोध (10)नलोदय (11) राक्षस काव्यम.इनमें से प्रथम सात सुप्रसिद्ध हैं.'ऋतु संहार ' उनकी प्रारम्भिक रचना कही जाती है. शेष ग्रंथों के कालिदास -रचित होने में विद्वानों को संदेह है.

 *कालिदास के काव्यों की काव्य -मर्मग्यों ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की है.भारतीय ही नहीं, विदेशी विद्वान भी उनके काव्य के सौन्दर्य पर मुग्ध हैं. वास्तव में जर्मन कवि गेटे के कथनानुसार यदि कोई स्वर्ग लोक और मर्त्य लोक के एश्वर्य को एकत्र देखना चाहता हो तो उसे कालिदास का 'अभिज्ञान शाकुंतलम 'देखना चाहिए.

* कालिदास ने अपने काव्य में बाह्य प्रकृति और अंतः प्रकृति, दोनों का चित्रण किया है. उनके काव्य में जड़ प्रकृति चेतन का सा व्यवहार करती है वह मनुष्य के प्रत्येक सुःख -दुःख में भाग लेती है. निर्वासिता सीता का रुदन सुनकर मयूर नृत्य करना छोड़ देते हैं. वृक्ष फूलों का परित्याग कर देते हैं  और हरिण अपने मुख में लिए तृण कंवल को गिरा देते हैं.रामगिरि केवल प्रस्तर-खण्डों का ढेर नहीं है, वह एक मित्र का ह्रदय रखता है. एक वर्ष की दीर्घ अवधि के बाद मेघ से मिलने पर उसके नेत्र उश्न वाष्प से सजल हो उठते हैं..

 *कालिदास के काव्य में देशकाल का कोई व्यवधान नहीं है. दो हजार वर्ष बीत जाने पर भी उनकी कविता पुरानी नहीं हुई है. उसमें वैसी ही ताजगी है. कालिदास सार्वकालिक एवं सार्वभौम कवि हैं.

  *मेघदूत काव्य कला की दृष्टि से कालिदास की एक अनूठी कृति है. यह एक छोटा -सा गीति -काव्य है, पर इसके संबंध में पंडितों में यह उक्ति प्रसिद्ध है -"मेघे माघे गतं वयः " कहा जाता है कि संसार की किसी भी भाषा के साहित्य में इसके समान सुन्दर काव्य नहीं है. जैसा कि पहिले ही कहा जा चुका है, देशी -विदेशी सभी विद्वान इसके सौन्दर्य पर मुग्ध हैं 

*मेघदूत के पहिले वाल्मीकि रामायण को छोड़कर कदाचित कहीं दूत प्रेषण की परम्परा नहीं पाई जाती.रामायण में भगवान राम का सन्देश लेकर हनुमान सीता जी के पास लंका गए थे. कालिदास के ध्यान में यह बात अवश्य रही होगी. उत्तरमेघ में उन्होंने इसका उल्लेख भी किया है.

 *मेघदूत के बाद फिर हंसदूत, पवनदूत आदि कई काव्यों की रचना हुई.भारत में ही नहीं, विदेश में भी उसके अनुकरण में काव्य -रचना की गई. शीलर (Schillar)ने 'Maria Stuart' लिखा, जिसमें स्काट लैंड की बंदिनी रानी मेघोँ को देखकर उनसे अपने देश होकर जाने के लिए निवेदन करती हैं.

   * यक्ष ने मेघ के द्वारा जो सन्देश भेजा, वह शाश्वत सन्देश है. आज भी आषाढ़ के आरम्भ में नवीन मेघोँ को आकाश में मंडराते देखकर विरहिणी स्त्रियाँ अपने प्रियतमों से मिलने को आतुर हो उठती हैं. मेघ अपनी मधुर मन्द्रध्वनि से उन्हें ढाढ़स बँधाता और उनके प्रियतमों के शीघ्र प्रत्यागमन की सूचना देता है.

   *जहाँ तक कथानक का सम्बन्ध है, कालिदास की अन्यान्य कृतियों में पौराणिक या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पाई जाती है, पर 'मेघदूत 'का ऐसा कोई आधार नहीं पाया जाता. यह एकमात्र उनकी कल्पना की उपज है. यक्ष ने अपने काम में गलती की तो यक्षराज कुबेर ने उसे शाप दिया कि वह एक वर्ष तक अपनी पत्नी से अलग रहे. कहा जाता है कि कर्तव्य में प्रमाद का कारण उसका पत्नी -प्रेम था. इसलिए उसे वर्ष भर पत्नी -वियोग सहने का दण्ड दिया गया था.

*अलका (अलकापुरी ) छोड़ उसने रामगिरि में आश्रय लिया. वहाँ आठ माह किसी प्रकार काटने के बाद एक दिन आषाढ़ के आरम्भ में उसने पर्वत -शिखर पर बादलों को छाए हुए देखा. उसे अपनी पत्नी की याद आ गई. उसे विश्वास था कि मेरे विरह में मेरी पत्नी की भी यही दशा होगी. उसने सोचा, आषाढ़ के बाद श्रावण का महीना लग जाएगा, वर्षा -ऋतु में वियोग -व्यथा बढ़ जाती है, कहीं ऐसा न हो कि मेरे वियोग में मेरी पत्नी प्राण ही त्याग दे. इस आशंका से उसने मेघ को दूत वरण कर पत्नी को सन्देश भेजा कि मैं जीवित हूँ, तुम धैर्य धारण कर चार महीना किसी प्रकार और काटो, देवोत्थान के बाद फिर हम दोनों का मधुर मिलन होगा. 

    *यक्ष की प्रेमिका उसकी विवाहिता धर्म -पत्नी है, परकीया स्त्री नहीं. वह पतिव्रता है, विरह -काल में एक वेणी, मलिन -वसना और भूमि -शयना होकर काल -यापन करती है. उसी प्रकार यक्ष भी एक पत्नी व्रती था.

* मेघदूत यद्यपि एक प्रेम -काव्य है, तथापि उसमें कवि की धर्म -परायणता पद -पद पर परिलक्षित होती है.

*मेघदूत में कालिदास का प्रकृति -चित्रण दर्शनीय है. पूर्व मेघ को तो आप विन्ध्य से लेकर हिमालय तक सारे उत्तर भारत की प्राकृतिक -सुषमा का दर्पण ही समझिये. पर्वत -शिखर का आलिंगन करने वाले मेघ से लेकर गाँव के पेड़ पर नीड़ निर्माण करने वाले कौआ तक उनके प्रकृति -वर्णन के दायरे में आते हैं 

     कहाँ था कालिदास के मेघदूत का रामगिरि  पर्वत?

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पंडित मुकुटधर पाण्डेय ने प्राक्कथन में रामगिरि की अवस्थिति को लेकर भी अपने अभिमत दिए हैं.  उनके अभिमत बिंदुवार कुछ इस प्रकार हैं -

 *रामगिरि की अवस्थिति के सम्बन्ध में मतभेद पाया जाता है. कोई चित्रकूट तो कोई रामटेक (नागपुर ) तो कोई रामगिरि (सरगुजा )को 'मेघदूत' का रामगिरि मानता है. हाल ही में जिला बस्तर से लगे हुए कोरापुट जिले में भी एक रामगिरि होने की बातसुनी गई है .

*सभी तर्क -वितर्क द्वारा अपने -अपने पक्ष का समर्थन करते हैं. मैं इस सम्बन्ध में स्वयं कुछ न कहकर 'मेघदूत 'में कथित रामगिरि की स्थिति तथा मेघ के मार्ग से पाठकों को परिचित करा दे रहा हूँ, ताकि वे स्वयं इस पर विचार कर सकें.

* 'मेघदूत' में रामगिरि की पहचान के सम्बन्ध में मुख्य तीन बातें पाई जाती हैं -(पाण्डेय जी ने संस्कृत श्लोक भी दिए हैं )

(1) वहाँ जल -कुण्ड या जलाशय या जल स्रोत होना चाहिए, जहाँ जानकी ने स्नान किया था.

(2)वहाँ किसी शिला या चट्टान पर राम के चरण -चिन्ह अंकित होने चाहिए.

(3) वहाँ बेत -वृक्षों की झाड़ी होनी चाहिए 

   *रामगिरि के उत्तराभिमुख से यात्रा आरम्भ होती है.

सर्वप्रथम 'मालक्षेत्र 'पड़ता है.'मालक्षेत्र ' को कृषि -प्रधान होना चाहिए. 'मालक्षेत्र' से फिर उत्तराभिमुख प्रस्थान करने पर पहिले आम्रकूट आता है. आम्रकूट के उपान्त भाग में जंगली आम के पेड़ों की बहुलता थी.

* मतभेद रामगिरि, मालक्षेत्र और आम्रकूट, इन तीनों स्थानों को लेकर ही है.

*आम्रकूट से आगे बढ़ने पर विन्ध्य के पाद -देश में बहती हुई रेवा (नर्मदा ) के दर्शन होते हैं 

*विंध्याचल में जंगली हाथियों और जामुन के वृक्षों की विपुलता रही होगी.

*उसके बाद दशार्ण देश आता है, जिसकी राजधानी 'विदिशा ' है. निकट ही वेत्रवती (बेतवा ) नदी बहती है.विदिशा से उत्तराभिमुख जाते हुए उज्जयिनी (उज्जैन ) जाने को मार्ग का कुछ घुमाव पड़ता है. मार्ग में निविंध्या नदी पड़ती है तब

अवंति देश आता है, जिसकी राजधानी उज्जयिनी है.

*उज्जयिनी में महाकाल के दर्शन होते हैं. 

* इसके बाद गंभीरा नदी मिलती है. फिर देवगिरि (देवगढ़ )आता है, जहाँ स्कंद का निवास है. फिर चर्मणवती (चम्बल ) नदी मिलती है. दशपुर आता है.

*ब्रम्हावर्त जनपद, फिर कुरुक्षेत्र आता है. सरस्वती नदी मिलती है.कनखल आता है, जहाँ गंगाजी हिमालय से नीचे उतरती हैं. इसके बाद हिमालय, फिर कैलाश के दर्शन होते हैं. कैलाश में ही अलकापुरी की अवस्थिति बतलाई गई है 

*ऐसा जान पड़ता है कि कालिदास ने जिन -जिन स्थानों का वर्णन किया है, वहाँ वे अवश्य गए रहे होंगे. जिस बारीकी से और जिस ख़ूबी के साथ उन्होंने उन स्थानों का वर्णन किया है, वह प्रत्यक्ष देखे बिना संभव नहीं था.

  छत्तीसगढ़ लेखक संघ, रायगढ़ ने पंडित मुकुटधर पाण्डेय की इस कृति को प्रकाशित करके सराहनीय कार्य किया था.वर्ष 1984 में इलाहबाद के एक प्रिंटिंग प्रेस से मुद्रित इस पुस्तक की सामान्य कीमत 10 रूपए और सजिल्द कीमत 15 रूपए थी.उन दिनों छत्तीसगढ़ लेखक संघ रायगढ़ के संरक्षक ठाकुर जीवन सिंह और प्रो. दिनेश पाण्डेय, अध्यक्ष डॉ. बिहारी लाल साहू, उपाध्यक्ष प्रो. मेदिनी नायक, सचिव डॉ. बलदेव, सह -सचिव शिखा नन्दे, कोषाध्यक्ष प्रो. धनीराम पटेल, सम्पर्क सचिव रामलाल निषाद और प्रबंध सचिव मीनकेतन प्रेमिल हुआ करते थे.  प्रकाशक के रूप में उन्होंने "आपकी वस्तु आपको ही समर्पित सादर "लिखकर पाण्डेय जी की यह कृति उन्हें ही समर्पित की है.

-स्वराज्य करुण 

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