Friday 12 August 2011

इसे कहते हैं भेड़ -चाल !

   

            इसे ही कहते हैं भेड़-चाल. पहले उत्तरप्रदेश में पाबंदी लगी और अब पंजाब और आंध्रप्रदेश में भी प्रकाश झा की फिल्म 'आरक्षण ' पर प्रतिबंध लगा दिया गया .यह  फिल्म मैंने देखी नहीं है, इसके कुछ फुटेज अलग-अलग प्रसंगों में टेलीविजन -समाचार चैनलों में ज़रूर देखने को मिले हैं, जिनसे ऐसा लगता है कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को लेकर इसमें कुछ ज्वलंत सवाल उठाए गए हैं .
        अगर इतने भर से कुछ लोग बौखला कर फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने लगें और हमारी व्यवस्था उनके आगे झुक कर फिल्म पर पाबंदी लगा दे , तो कहाँ रह गयी अभिव्यक्ति की आज़ादी और कहाँ रह गया हमारा लोकतंत्र  ? क्या लोकतंत्र में जनता के जीवन से ताल्लुक रखने वाले किसी सामाजिक -आर्थिक मुद्दे पर सवाल उठाना गलत है ?  अगर नहीं तो फिर इस प्रकार की फिल्म या किसी किताब को ,किसी नाटक को प्रदर्शन या प्रचलन से रोक देना कहाँ का लोकतंत्र है ?
          अगर किसी सामाजिक समस्या पर फिल्म, कहानी , कविता ,उपन्यास आदि के रूप में कोई रचना  आयी है, तो उसे सबके सामने आने देना चाहिए . इक्कीसवीं सदी की जनता समझदार है. वह खुद फैसला कर सकती है कि इस प्रकार की किसी रचना में उठाए गए सवाल कितने जायज या नाजायज हैं ! फैसला करने का अधिकार फिल्म या नाटक के दर्शकों पर और पुस्तक के पाठकों पर छोड़ देना चाहिए . लेकिन सवालों को सुने बिना और समझे बिना उन पर पाबंदी लगाना आधुनिक कहलाने वाली दुनिया में हास्यास्पद नहीं तो और क्या है ?
           दरअसल लोक-हित की भावना से बनी किसी फिल्म में ,या किसी साहित्यिक रचना में उठाए गए सवालों से जिन्हें तकलीफ होती है, वही लोग उन पर पाबंदी के लिए उठा-पटक करने लगते हैं . उन्हें अश्लील नाच-गाने की फूहड़ फिल्मों, बेतुके ,बेशर्म विज्ञापनों,  या द्विअर्थी  गानों से कोई तकलीफ नहीं होती . आज कल कई फिल्मों में गाली-गलौच से भरे संवाद भी आने लगे हैं . उन पर पाबंदी लगाने की मांग कोई नहीं करता . क्या यह सही नहीं है कि 'आरक्षण ' की समस्या आज इस देश में बहुत गंभीर हो चली है  ? समस्या के समाधान के लिए दरअसल सार्थक बहस की ज़रूरत है, इस विषय पर बनी फिल्म को देख कर ही यह बहस हो सकती है , पाबंदी लगा कर नहीं .लेकिन  नासमझ व्यवस्था को आखिर समझाए कौन ?  कौरवों की भरी सभा में सभी तो हैं मौन !                                                                                                  -  स्वराज्य करुण





 



8 comments:

  1. bahut achchi post main iska poorntah samarthan karti hoon.isko apne face book and twitter par bhi share kar rahi hoon.is post ke liye badhaai.

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  2. आपने बिलकुल सही लिखा है आज कल लोग देखा -देखि ही सब कुछ करते है वो भाग रहा है तो मै क्यों न भागु .....

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  3. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  4. बात आपकी सही है लेकिन जिनके हितों पर चोट पडने का अंदेशा है उन्हें तो बौखलाहट भरे कदम उटाना ही हैं ।

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  5. रक्षाबंधन की आपको बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं !

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति है!
    रक्षाबन्धन के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  7. टिप्पणियों के लिए धन्यवाद .आप सबको रक्षाबन्धन की बहुत-बहुत बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं .

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  8. आपने बिलकुल सही बात कही..जिन चीज़ों पर आपत्ति करनी चाहिए..वहाँ चुप रहते हैं ..डी.के.बोस टाइप चीज़ो के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाते ...अगर हरेक राज्य को तय करना है तो सेंसर बोर्ड की ज़रूरत क्या है..

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