- स्वराज्य करुण
कल तक जोड़ रहे थे रिश्ता, आज तोड़ रहे हैं,सब्ज़-बाग की नैया बीच भंवर में छोड़ रहे हैं !
खूब दिखाया सपना रोटी का , आज़ादी का ,
हमको सपनों में छल कर वो चेहरा मोड़ रहे हैं !
अभागन भारत माता के वो ही भाग्य-विधाता ,
वर्षों से हम मृग-तृष्णा के पीछे दौड़ रहे हैं !
भूमि अपनी भूखी और प्यासी इसकी नदियाँ ,
भूमि-पुत्र अब घर की खाली हंडिया फोड़ रहे हैं .
देश को ठेके पर बेचने लगे हैं नेता -अफसर
सात पीढ़ियों से दोनों कमीशनखोर रहे हैं !
चौराहों में खूब वसूली ,दफ्तर-दफ्तर रिश्वत
चूक गए जो लेन-देन में , वो कमजोर रहे हैं !
दिल्ली के दरबार में देखो, मेला है मतवालों का ,
जब से आए हैं मेले में , सब करते शोर रहे हैं !
कुर्सी की उर्वशी के वश में हो गए दोषी कौन ,
प्रश्न-चिन्ह को इक-दूजे के दामन से जोड़ रहे हैं !
बाहर दिखती फूट-परस्ती ,भीतर लेकिन एक
आपस में सब भाई-बन्धु हरदम चोर रहे हैं !
- स्वराज्य करुण



