Saturday 1 October 2011

घोड़े और घास की दोस्ती का अनोखा प्रयोग !

                        



                      अमिताभ बच्चन ,धर्मेन्द्र और हेमामालिनी की सदाबहार फिल्म 'शोले ' में तांगेवाली वसंती का किरदार निभाती हेमा का वह  सदाबहार डायलॉग आज भी  बहुतों को याद होगा , जो उन्होंने रामपुर जाने के लिए आए  जय और बीरू को यानी अमिताभ और धर्मेन्द्र को  तांगे पर बैठाने से पहले कहा था  - यूं कि हम आपको रामपुर तो  मुफ्त में पहुंचा दें ,लेकिन  घोड़ा अगर घास से दोस्ती कर ले ,तो वह खायेगा क्या ? घोड़े और घास की दोस्ती वाली यह कहावत हमारे भारतीय समाज में  दुकानदार और ग्राहक के व्यावहारिक रिश्तों को लेकर प्रचलित  है . कई दुकानदारों ने तो  इस कहावत को  किसी अनमोल वचन की तरह  स्टिकर बनवाकर शो-केस  पर भी चिपका रखा है . मतलब यह कि कोई भी कारोबार कमाने के लिए  ही किया जाता है,   खोने या गंवाने के लिए  नहीं  !
            कारोबार चाहे छोटा हो या बड़ा , कोई भी कारोबारी अपने कारोबार में घोड़े से  घास की दोस्ती करवाने का जोखिम नहीं लेना चाहेगा , लेकिन भारत के नए-नवेले राज्य छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह की सरकार  प्रदेश के करोड़ों लोगों के हित में पोस्टर ,बैनर , होर्डिंग आदि के माध्यम से शराब की बुराई के खिलाफ जन-जागरण अभियान चलाकर यह जोखिम निःसंकोच उठा रही है .सबको मालूम है कि राज्यों की आमदनी का एक प्रमुख स्रोत है शराब ,लेकिन यह भी सबको मालूम है कि यही शराब एक दिन अपने पीने वाले को भी खुद पी जाती है . मानव-जीवन अनमोल है . इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार लोगों को शराब से बचने की सीख देने के साथ-साथ  महिलाओं को एकजुट कर 'भारत माता वाहिनियों का भी गठन करवा रही है  यह अभियान छत्तीसगढ़ को शराब के व्यसन से मुक्त एक स्वस्थ और सशक्त राज्य के रूप में विकसित करने की भावना  पर केन्द्रित है . भारत माता वाहिनियों के होर्डिंग आज शहरों में भी लोगों को नशा मुक्ति के लिए आकर्षित और जाग्रत कर रहे हैं .शराब व्यसन मुक्ति अभियान के रूप में यह एक अनोखा प्रयोग है . इसमें भारत माता का नाम जुड़ने की वजह से इस रचनात्मक और भावनात्मक प्रयोग का सन्देश सम्पूर्ण भारत में जा रहा है .उसकी प्रासंगिकता राष्ट्रव्यापी हो गयी है.
               हर साल दो अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के मौके पर हमे याद आता है कि अहिंसा के  पुजारी और आज़ादी के अहिंसक आंदोलन के   इस  महान नेता  ने शराब को व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के विकास में सबसे बड़ा व्यवधान माना था .अपने सामाजिक आंदोलनों में उन्होंने छुआछूत और शराब के खिलाफ जन-जागृति का भी शंखनाद किया था .हम केवल याद करके रह जाते हैं कि छत्तीसगढ़ में सतनाम पन्थ के प्रवर्तक गिरौदपुरी धाम के गुरु बाबा घासीदास ,सनातन संत समाज के संस्थापक रायगढ़-जशपुर अंचल के गहिरा गुरु और सरगुजा की राजमोहिनी देवी जैसे महान समाज सुधारकों ने  अपने लाखों भक्तों और ग्रामीणों को शराब से दूर रहने की प्रेरणा देकर उन्हें धर्म और आध्यात्म के ज़रिये नेकी के रास्ते पर चलना सिखाया. आज भी राज्य में भारी संख्या में लोग उनके बताए मार्ग पर चलकर  सुखी जीवन जी रहे हैं , मगर यह भी सच है कि इसके बावजूद इस दिशा में अभी बहुत कुछ करना बाकी है .
      राज्य के मुख्यमंत्री  पेशे से  एक आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं और इस नाते मरीजों की नब्ज पर उनकी अच्छी पकड़ है . लोकप्रिय ,लोकहितैषी लोक-नेता के रूप में उभरे डॉ .रमन सिंह ने अपने वर्षों के अनुभवों से जनता की नब्ज पर हाथ रखकर यहाँ की सामाजिक बीमारियों को भी बखूबी पहचाना है और मरीज यानी जनता को विश्वास में लेकर उनका इलाज भी शुरू कर दिया  है . यहाँ गरीबी और भूख दो बड़ी बीमारियाँ थीं, जिनके इलाज के लिए महंगाई के इस दौर में भी   एक और दो रूपए किलो में प्रत्येक गरीब परिवार को हर महीने पैंतीस किलो चावल देने की योजना शुरू की गयी . उन्हें दो किलो आयोडीन नमक निःशुल्क दिया जा रहा है . इस प्रकार अब यहाँ कोई भी मेहनतकश गरीब भूखे पेट सोने को विवश नहीं है . सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दस हजार से ज्यादा राशन दुकानों के ज़रिये बत्तीस लाख से ज्यादा गरीब परिवारों को  इस योजना का लाभ  मिल रहा है .लेकिन देश के अन्य  कई  राज्यों की तरह शराब का व्यसन आज छत्तीसगढ़ में भी आज एक गम्भीर सामाजिक बीमारी है .कोई भी व्यसन किसी से भी जोर-जबरदस्ती नहीं छुडाया जा सकता , इसके लिए व्यसनी को बेहतर समझाइश की ज़रूरत होती है और बात नहीं बनने पर क़ानून की कड़वी दवा भी उसे देनी पड़ती है. दरअसल इसके पीछे  सामाजिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का एक  पवित्र उद्देश्य होता है .छत्तीसगढ़ को शराब की बीमारी से मुक्त करने के लिए  डॉ रमन के हाथों इसका इलाज भी शुरू हो गया है. ब्रेवरेज कार्पोरेशन राज्य सरकार का वह उपक्रम है जो लायसेंसी शराब  का उत्पादन और उसका व्यापार भी करता है .लेकिन अगर यही कम्पनी  ब्रोशर आदि छपवाकर जनता को शराब के खतरों से आगाह करते हुए दारू नही पीने  की नसीहत दे ,तो इससे घोड़े और घास की दोस्ती वाली कहावत साकार होती नज़र नहीं आती ? बुजुर्गों ने एकदम सच कहा है  कि नशा नाश की जड़ है. नशे की इस बीमारी ने कई  घरों को जहां आर्थिक रूप से बर्बाद कर दिया है, वहीं युवाओं में बढती इसकी लत से कई घरों के कुल-दीपक हमेशा के लिए बुझ गए हैं .गाँवों में और शहरी मोहल्लों में भी  इस घातक नशे की वज़ह से सामाजिक पर्यावरण भी बिगड़ने लगा है . राजधानी रायपुर में एक निजी अस्पताल के संस्थापक और संचालक ,अस्थि-रोग विशेषज्ञ डॉ. धीरेन्द्र साव अपने  अस्पताल में आने वाले प्रकरणों के  आधार पर कहते हैं - अधिकाँश सड़क हादसे शराब पीकर वाहन चलाने वालों की वजह से होते हैं . शराबी वाहन चालक  दूसरों के लिए जानलेवा साबित होने के अलावा  स्वयं घायल होकर मौत का भी शिकार हो रहे हैं. इनमे भी ज्यादातर मौतें युवाओं की हो रही है . शराब के आदी हो चुके नौजवानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति चिन्ताजनक रूप  से बढ़ रही है.   शराबियों को लीवर -सिरोसिस की घातक बीमारी आसानी से जकड़ लेती है .इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के ह्रदय रोग  विशेषज्ञ डॉ. गिरीश रमोले के अनुसार शराब पीने वालों में ह्रदय रोग की आशंका दूसरों से कई गुना ज्यादा होती है .

                 वास्तव में शराब मानव-जीवन की सामाजिक -आर्थिक और शारीरिक तबाही  का एक बड़ा कारण है .  शराब से अगर किसी  को सबसे ज्यादा परेशानी होती है तो वे हैं महिलाएं, क्योंकि गृहलक्ष्मी होने के नाते चूल्हे-चौके से लेकर घर के भीतर की सारी जवाबदारी उन्हीं पर टिकी होती है .शराब के नशे में चूर होकर देर रात घर आने और लड़ने-झगड़ने वाले पतियों को झेलना उनकी मजबूरी हो जाती है . डॉ.रमन सिंह को गाँवों के दौरे में कई बार महिलाओं से उनकी इन  तकलीफों  के बारे में काफी कुछ सुनने और समझने को मिला .उन्होंने महिलाओं का हौसला बढाया और नारी -शक्ति को 'भारत माता वाहिनी ' के रूप में संगठित करने की एक नई शुरुआत की . भारत माता वाहिनी की सदस्य महिलाएं स्थानीय स्तर पर अवैध शराब की बिक्री रोकने की ठोस पहल कर रही हैं और शराबियों को नशा छोड़ने की नसीहत भी दे रही हैं . इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पन्द्रह अगस्त से भारत माता वाहिनियों के गठन का सिलसिला शुरू हो गया है .रायपुर,राजनांदगांव , जांजगीर-चाम्पा ,महासमुंद ,कबीरधाम .रायगढ़ और बिलासपुर जिलों में लगभग नब्बे गाँवों में महिलाओं ने इन  वाहिनियों का गठन कर लिया है .
  शराब-मुक्ति के अपने लक्षित अभियान के  पहले दौर में राज्य सरकार ने नई आबकारी नीति बना कर अवैध शराब के जहरीले कारोबार पर कठोरता से अंकुश लगाया और एक ऐतिहासिक निर्णय लेकर इस वित्तीय वर्ष की शुरुआत होते ही विगत एक अप्रेल से  दो हजार तक आबादी वाले लगभग ढाई सौ गाँवों में शराब के सरकारी ठेके बंद कर दिए गए , यानी इन देशी-विदेशी मदिरा दुकानों के दरवाजे अब हमेशा के लिए बंद हो गए हैं .भले ही यह आंशिक शराबबंदी है .लेकिन .राजस्व की परवाह न करते हुए सीमित संख्या में क्यों न हो , शराब दुकानों को बंद करने का यह सरकारी फैसला भी समाज के हित में 'घोड़े और घास की दोस्ती ' वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा है . नई आबकारी नीति से छत्तीसगढ़  में जहां शराब के अवैध कारोबार पर काफी हद तक अंकुश लग चुका है, वहीं अब कोई भी व्यक्ति किसी सार्वजनिक जगह पर बैठ कर शराब पीने की हिमाकत नहीं कर पा रहा है.  नहीं तो इसके पहले कहीं पर भी ढाबों और चाट-पकौड़े और अण्डे बेचने वालों के ठेलों के आस-पास शराबियों का जमावड़ा  आसानी से देखा जा सकता था . बोझिल सा लगने वाला वह अप्रिय दृश्य अब ओझल हो गया है.  इस वित्तीय वर्ष के प्रथम तीन माह में यानी अप्रेल २०११ से जून २०११ तक अवैध शराब बेचने वाले २७० कोचियों को गैर-जमानती धारा में गिरफ्तार  किया गया और सार्वजनिक जगहों पर शराब पीने वाले दो हजार से ज्यादा लोगों को पकड़ कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गयी.
                            लोकतंत्र में  सरकारी पहल अपनी जगह है और निश्चित रूप से उसका अपना महत्व भी है लेकिन जन-हित में हो रहा कोई भी सरकारी प्रयास अकेले सरकार के भरोसे सफल नहीं हो सकता . उसमें जनता की भागीदारी भी ज़रूरी है . लोकतंत्र में  तो यह और भी ज़रूरी हो जाता है ,क्योंकि इसमें सरकार जनता की ,जनता के लिए और जनता के द्वारा बनायी जाती है. बहरहाल शराबबंदी की दिशा में योजनाबद्ध और चरणबद्ध तरीके से सकारात्मक पहल कर रही छत्तीसगढ़ सरकार की प्रारम्भिक कामयाबी एक आस जगाती है  उम्मीद की इस पहली किरण से नई सुबह के आने का संकेत मिल रहा है .
                                                                                                    स्वराज्य करुण





8 comments:

  1. शराबबंदी की दिशा में डॉ रमन सिंह की पहल सराहनीय है। पूर्ण रुप से शराबबंदी तो होना कठिन है, लेकिन जो असामाजिक तत्वों का जमावड़ा सड़क और ढाबों में होता था उस पर काफ़ी हद तक विराम लग चुका है। गणेश शंकर मिश्रा जी भी तारीफ़ होनी चाहिए, उन्होने शराबबंदी आदेश को कड़ाई से लागु किया है।

    आभार

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  2. शराबबंदी तो सारे हिंदुस्तान में होनी चाहिए|

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  3. चलिए .....कहीं से तो शुरुआत हुई

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो
    चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  5. बहरहाल शराबबंदी की दिशा में योजनाबद्ध और चरणबद्ध तरीके से सकारात्मक पहल कर रही छत्तीसगढ़ सरकार की प्रारम्भिक कामयाबी एक आस जगाती है उम्मीद की इस पहली किरण से नई सुबह के आने का संकेत मिल रहा है .


    सच कहा आपने .धन्यवाद !

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  6. गाँधी जयंती के समय आपकी पोस्ट अच्छा और वांछित चर्चा है। सरकार की शराब बंदी योजना व्यावहारिक नहीं लगती क्योंकि उत्पाद शुल्क तथा वोट दोनों के दृष्टिकोण से शराब उत्पादन को बंद करना सरकारों के लिए श्रेयस्कर नहीं लगता है। फिर भी आपने सही कहा कि शराब की लत प्रेरणा से छुड़ाई जा सकती है सख़्ती से नहीं।
    महाराष्ट्र में तो अधिक समय तक गाँधीवादी सरकार रही है और वर्धा में भी शराब नहीं बंद कर पाई है। आज महाराष्ट्र में ही सबसे ज़्यादा शराब की खपत है और किसान शराब पीकर मर रहे हैं। कर्ज़ तो इसका प्रतिफल है।

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  7. शानदार सराहनीय कदम. हिम्मत चाहिये ऐसे निर्णय लेने के लिये. सभी राज्यों को ऐसे कदम उठाने चाहिये. धन्यबाद.

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  8. हरियाणा मे कई बार ये बंदी हुयी कई बार खुली ... नेता लोग अपने फायदे के लिए कुछ भी करते रहते हैं ...

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