Friday 24 June 2011

(ग़ज़ल ) ये किसकी रात है ?

                                                                                              
  कुछ हसरतें हैं दिल में ,कुछ ख्वाहिश की रात है
तुमको भला बताएं क्या ,  बारिश की रात है !

मेरी नहीं,तेरी भी  नहीं , इसकी नहीं, न उसकी
  सितारों से  झिलमिल चूनर में  किसकी रात है !
                                     
                          कुछ दीवानगी  में कट रहे , कुछ वीरानगी में पल   ,                
    कहीं  दिन हैं दीवानों के ,   लावारिस की रात है !

     रौशन हो किसी की जिंदगी भी यहाँ  किस तरह ,
 हाथों में अपने   भीगी हुई माचिस की रात है !

        दो वक्त की रोटी के लिए बेस्वाद गुजरता  मौसम ,
         नमकीन ,कहीं  काजू ,कहीं किशमिश की रात है  !
                                          
        हमसफ़र न जाओ छोड़ के   सपनों  को अधूरा  ,
      आज तुम्हारे दर पे सुनो , गुजारिश की रात है !
                                         
                                                                               - स्वराज्य करुण
  

15 comments:

  1. दो वक्त की रोटी के लिए बेस्वाद गुजरता मौसम,
    नमकीन ,कहीं काजू ,कहीं किशमिश की रात है!


    बहुत खूब संसार के नजारे है,
    कहीं खुशियाँ कहीं आंसू खारे हैं।

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  2. kya bat!!!!!!badhiya prastuti

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  3. दो वक्त की रोटी के लिए बेस्वाद गुजरता मौसम ,
    नमकीन ,कहीं काजू ,कहीं किशमिश की रात है !


    अच्छी प्रस्तुति

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  4. दो वक्त की रोटी के लिए बेस्वाद गुजरता मौसम ,
    नमकीन ,कहीं काजू ,कहीं किशमिश की रात है !
    bahut sateek bhavabhiyakti.

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  5. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (25.06.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  6. वाह बहुत ही मनमोहक प्रस्तुति।

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  7. दो वक्त की रोटी के लिए बेस्वाद गुजरता मौसम ,
    नमकीन ,कहीं काजू ,कहीं किशमिश की रात है

    बहुत उम्दा गज़ल.....
    सादर...

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  8. बहुत सुन्दर ग़ज़ल प्रस्तुत की है आपने!

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  9. अच्छी प्रस्तुति ,बधाई !

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  10. दो वक्त की रोटी के लिए बेस्वाद गुजरता मौसम ,
    नमकीन ,कहीं काजू ,कहीं किशमिश की रात है !

    कही जगामगती रोशनियों में जश्न मानते लोग
    कही फूटपाथ पर कोने में सिकुड़ते लोग है ...
    एक बहुत बड़ी खाई है एक इंसान और दूसरे इंसान के बीच !
    बेहतरीन !

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  11. अच्छी रचना ,बधाई

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  12. रौशन हो किसी की जिंदगी भी यहाँ किस तरह ,
    हाथों में अपने भीगी हुई माचिस की रात है !

    दो वक्त की रोटी के लिए बेस्वाद गुजरता मौसम ,
    नमकीन ,कहीं काजू ,कहीं किशमिश की रात है !
    behu khubsurti se ukera hai aapne apne jajbat ko...jo khi na kahi hamare zivan ka ek hissa hai....badhai

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  13. दो वक्त की रोटी के लिए बेस्वाद गुजरता मौसम ,
    नमकीन ,कहीं काजू ,कहीं किशमिश की रात है !


    समसामयिक विमर्श करती कविता के लिए हार्दिक बधाई...

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  14. बहुत उम्दा गज़ल....

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  15. प्रभावी अभिव्यक्ति .......

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