Wednesday, June 15, 2011

दागी चेहरे ओझल होंगे सत्याग्रहों के सैलाब में

                  
         बाबा ने नौ दिनों से जारी अपना अनशन जूस पी कर  तोड़ दिया  अन्ना भाऊ ने  जन लोकपाल विधेयक तैयार करने के लिए १५ अगस्त तक का वक्त देते हुए  राजघाट पर बापू की समाधि पर अपना एक दिन का अनशन यह कह कर तोड़ा है कि अगर १५ अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस तक इस क़ानून की स्पष्ट घोषणा नहीं होगी तो वे अगले दिन १६ तारीख से फिर अनशन शुरू कर देंगे . बाबा का आमरण अनशन काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ था, उन्होंने अनशन तोड़ते हुए यह घोषणा भी की है कि राष्ट्र-हित के इन मुद्दों पर उनका आंदोलन जारी रहेगा ,लेकिन फिलहाल तो उन्होंने एक विराम लिया है ,जो स्वाभाविक है. आगे वे कब दोबारा ऐसी कोई शुरुआत करेंगे ,इस बारे में अभी उनकी तरफ से कुछ भी नहीं कहा गया है . अन्ना साहब ने भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए जन-लोकपाल क़ानून बनाने दो माह का वक्त दिया .है.
      काला धन बटोरने वाले और भ्रष्टाचार करने वाले खुश हैं कि चलो कुछ दिनों के लिए ही सही ,बला तो टली . ऐसे लोग राहत की सांस ले रहे हैं . वे बहुत प्रसन्न हैं कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है . लेकिन मेरा दिल कहता है किआज की दुनिया में यह उनकी भारी गलतफहमी  है . बाबा  और अन्ना के आंदोलनों का स्वरुप चाहे जैसा भी रहा हो,  दोनों इस मायने में कामयाब कहे जा सकते हैं कि इन सत्याग्रहों के जरिये देश के हर गाँव और हर शहर के प्रत्येक घर-परिवार तक इनका सन्देश तो पहुँच ही गया.. देशवासी समझने  लगे हैं कि देश की दौलत को लूट कर देश-विदेश में अपने गुप्त बैंक-खातों को लबालब करने वाले देशद्रोही आखिर कौन हैं . सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद भले ही उनका नाम बताने से परहेज़ किया जा रहा हो, लेकिन जनता को यह संकेत तो मिल ही गया है कि ये सफेदपोश डाकू आखिर हैं कौन ? पहले की तुलना में आज शिक्षा और साक्षरता काफी बढ़ गयी है .इससे जनता में समझदारी  भी  काफी विकसित हो चुकी है. इसलिए सफेदपोश डाकुओं को भी यह समझ लेना चाहिए कि उनके सर से बला अभी टली नहीं है,बल्कि वह तो इन डाकुओं के  लिए शामत बनकर  अभी आने वाली है.
                       दुनिया में जहां अच्छाई और सच्चाई का साथ देने वालों की संख्या बहुत विशाल है, वहीं कुछ ऐसे भी लोग हैं , जो किसी भी अच्छे और सच्चे मकसद से किए जाने वाले कार्यों का मजाक उड़ाने से नही चूकते भले ही उनकी संख्या मुट्ठी भर क्यों न हो, पर उन्हें हर नेक इरादे में खोट नज़र आता है. क्या बाबा रामदेव और अन्ना साहब अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए सत्याग्रह कर रहे थे ? क्या देशवासियों की मेहनत की कमाई को मुट्ठी भर लुटेरों के हाथों में जाने से रोकने और काले धन की वापसी की बाबा रामदेव की मांग अनुचित है ? क्या काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने की उनकी मांग  राष्ट्र-हित में नहीं है ? क्या अन्ना साहब जन-लोकपाल विधेयक में देश के शीर्ष पदों को भी इस प्रस्तावित क़ानून के दायरे में लाने की मांग करके कोई गुनाह कर रहे हैं ? क्या शीर्ष  पदों को सुशोभित करने वाले लोग ऐसे आसमानी  फ़रिश्ते हैं ,जो इस धरती पर कभी कुछ गलत कर ही नहीं सकते ? अगर वे इतने पाक-साफ़ हैं तो जन-लोकपाल के दायरे में आने में संकोच क्यों कर रहे हैं ? जब देश की १२१ करोड़ जनता संविधान के अनुरूप हर प्रकार के क़ानून के दायरे में  है,  तो इन ऊंचे पदों पर काबिज इक्का-दुक्का लोग स्वयम को जनता से अलग क्यों मानते हैं ? फिर वे जनता के मतों से जीतकर शीर्ष पदों को धारण करने से पहले उस संविधान की शपथ क्यों लेते हैं, जिसकी नज़रों में राजा हो , या रंक, लोकतंत्र में क़ानून सबके लिए एक बराबर है !
       बहरहाल योग ऋषि स्वामी रामदेव और समाजसेवी अन्ना हजारे साहब का सत्याग्रह आंदोलन भले ही अलग-अलग समय में हुआ, कुछ वैचारिक मतभेद भी उभरे , लेकिन मेरा दिल कहता है कि .दोनों के लक्ष्य और दोनों की भावनाएं लगभग एक हैं. दोनों इस महान देश को भ्रष्टाचार और कालेधन की काली छाया से मुक्त करवाना चाहते हैं . अपने इस लक्ष्य तक दोनों अकेले नहीं,बल्कि आम जनता के साथ आगे बढ़ रहे हैं . भले ही अभी उन्होंने थोड़ा विराम लिया है. लेकिन बहुत जल्द उनकी  सत्याग्रह यात्रा फिर शुरू होगी. मेरा दिल कहता है कि बाबा और अन्ना अगर एक साथ कदम से कदम मिलाकर और सबको साथ लेकर आगे बढ़ें ,तो उनके इस सात्विक सत्याग्रह को और भी ज्यादा ताकत मिलेगी
       कौरवों की भरी सभाओं  में कई बार पांडवों का मजाक बनाया गया था .  ठीक उसी तर्ज पर आज भले ही कुछ लोग बाबा और अन्ना के  अहिंसक आंदोलनों  का मजाक उड़ा रहे हैं ,  लेकिन दुनिया देख रही है कि उन्हें और उनके सत्याग्रह  को उपहास का विषय बनाने वालों के चाल.चरित्र और चेहरे बेनकाब  हो चुके हैं .जनता ऐसे दागदार चेहरों को नफरत से देख रही है. इन बदनुमा चेहरों  को राष्ट्रीय परिदृश्य से अब खुद-ब-खुद ओझल हो जाना चाहिए .नहीं तो अच्छाई और सच्चाई पर आधारित सत्याग्रहों का सैलाब उन्हें दृश्य-पटल से स्वयम ओझल कर देगा .                                                                 स्वराज्य करुण

Sunday, June 12, 2011

पत्थरों से टकराने नुकीले पत्थरों की ज़रूरत

                        
             देहरादून के हिमालयन अस्पताल में दाखिल कराने के बावजूद  बाबा रामदेव का आमरण अनशन आज नवमें दिन भी जारी है. काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने ,विदेशी बैंकों में जमा भारतीयों के काले धन को वापस लाने, उनका नाम उजागर करने ,देश के बच्चों को स्वदेशी भाषा में शिक्षा दिलाने जैसी उनकी मांगों पर भला किसी को क्यों कोई ऐतराज होना चाहिए  ?
   ये सभी मांगें राष्ट्र-हित और जन-हित से सम्बन्धित हैं.इसलिए आम-जनता को तो इन पर कोई आपत्ति नहीं है,लेकिन जिन लोगों के हाथों में  इन मांगों को पूरा करने की ताकत है, वे ज़रूर ' किन्तु-परन्तु' करते हुए इन्हें नज़रअंदाज़ कर रहे हैं ,क्योंकि अगर ये मांगें पूरी कर दी गयी ,तो उन्हें जनता के सामने बेनकाब होना पड़ेगा  .फिर जनता  उनका क्या हाल करेगी ,यह सोच कर ही उनकी रूह काँप रही होगी . शायद इसीलिए वे योग-गुरु रामदेव के आमरण-अनशन और उनकी हालत चिंताजनक होने के बावजूद बेशर्मों और बेरहमों की तरह  चुप्पी साधे हुए हैं. राष्ट्रीय स्तर के एक अर्ध-विक्षिप्त व्यक्ति  द्वारा अपने पागलपन का नमूना पेश करते हुए आज भी यह कहा गया कि अनशनरत बाबा को मनाने कोई नहीं नहीं जाएगा ,जबकि पूरी  दुनिया देख रही है कि बाबा के गिरते सेहत की फ़िक्र करने वालों ने ही उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया है  और बाबा से मिलने प्रसिद्ध संत श्रीश्री रविशंकर महाराज कल ११ जून से वहाँ मौजूद हैं .आज एक और लोकप्रिय संत मोरारी बापू के देहरादून जाने की खबर है. देश भर से कई राष्ट्रीय नेता और लाखों लोग उनसे आमरण-अनशन तोड़ने की अपील कर रहे हैं .निश्चित रूप से राष्ट्र-हित के मुद्दों को लेकर बाबा के सत्याग्रह से देश में भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ जन-जागरण की एक नयी लहर पैदा हुई है, जो आगे चल कर धन-पशुओं के खिलाफ एक भयानक सुनामी में बदल सकती है.इस संभावित जन- सुनामी का नेतृत्व भी बाबा और उनके सहयोगियों को करना होगा .
        इसलिए मेरा दिल भी यह कहता है कि बाबा को अब अपना आमरण अनशन तोड़ देना चाहिए .जिन लोगों से अपनी सार्वजनिक मांगों को मनवाने के लिए वे अनशन कर रहे हैं ,ऐसे तमाम लोग बेहद पत्थर दिल हैवान हैं. बाबा को इन हैवानों से इंसानियत की उम्मीद नहीं करनी  चाहिए .इन पत्थर-दिल पत्थरों से टकराने के लिए अपने हाथों में नुकीले पत्थर लेकर आगे आना होगा .अगर आप आमरण अनशन पर यूं ही बैठे रहे , तो यह कैसे हो पाएगा ? देश के लिए और देशवासियों के लिए आपका जीवन बहुत कीमती है . इसे व्यर्थ न जाने दें .
                                                                                                            -  स्वराज्य करुण

Friday, June 10, 2011

अन्ना का अनशन और भ्रष्ट अधिकारी के ठिकानों पर छापा !

        यह वाकई एक अनोखा संयोग नहीं तो और क्या है कि   जिस दिन काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर दिल्ली के राजघाट में समाजसेवी अन्ना हजारे साहब का एक दिवसीय सत्याग्रह और अनशन चल रहा था,ठीक उसी दिन  यानी आठ जून को छत्तीसगढ़ सरकार  भष्टाचार के विरुद्ध अपने छापामार अभियान को तेज करते हुए राज्य के एक सहायक आबकारी अफसर के महासमुंद, रायपुर, भिलाई नगर और   राजनांदगांव समेत   कुनकुरी (जिला_जशपुर ) स्थित उसके ठिकानों पर दबिश देकर लगभग तीन करोड़ १८ लाख रूपए की अनुपातहीन संपत्ति का मामला उजागर कर रही थी. निश्चित रूप से मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह की सरकार इसके लिए जनता की ओर से सराहना और धन्यवाद की पात्र है . कि वह राज्य में भ्रष्ट अफसरों की काली कमाई को उजागर करने के लिए लगातार छापे डलवा रही है. इससे सरकार की सदाशयता भी उजागर होती है कि वह शासकीय सेवाओं में शुचिता की हिमायती है.
      स्थानीय अखबारों के अनुसार   भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो यानी ए.सी.बी .के छापामार दल ने इस अधिकारी की पत्नी के नाम पर भिलाई नगर के एक बैंक में रखा लॉकर खुलवाया तो सब उस वक्त भौचक रह गए जब इस लॉकर से करीब दस फीट लंबी सोने की चैन मिली ,जिसकी कीमत साढ़े आठ लाख रूपए होने का अनुमान लगाया जा रहा है.इस लॉकर से सोने के दो बिस्किट भी मिले हैं .  मामूली मासिक वेतन वाले द्वितीय श्रेणी के  अधिकारी के यहाँ छापे की कार्रवाई में मिली चल-अचल संपत्ति पर ज़रा एक नज़र आप भी डालिए तो सही-
     मैत्री कुञ्ज भिलाई नगर में नौ हजार वर्ग फीट ज़मीन पर एक करोड़ तीस लाख रूपए का एक मकान,  राजनांदगांव के बन सांकरा में सोलह एकड़ के रकबे में एक विशाल फ़ार्म हाऊस और दोमंजिला मकान , जशपुर जिले के कुनकुरी में १८ हजार वर्ग फीट भूमि पर चालीस लाख रूपए का मकान, ग्राम खल्लारी के पास तेलीबांधा में १५ लाख रूपए की छह एकड़ ज़मीन, तीन मोटर कारें , लगभग तेरह लाख ६१ हजार रूपए मूल्य के सोने-चांदी के आभूषण ,और भी न जाने क्या-क्या !
                         भ्रष्ट अधिकारी पर यह कार्रवाई एक ऐसे मौके पर चल रही थी ,जब भारत स्वाभिमान मंच ने काले धन और भ्रष्टाचार के विरोध में बाबा रामदेव के सत्याग्रह और उनके  हजारों सत्याग्रहियों पर दिल्ली में चार जून को हुए अत्याचार के खिलाफ छत्तीसगढ़ बंद का आव्हान किया था ,जो काफी शांत और सफल रहा .  एक  भ्रष्ट अधिकारी की काली कमाई का यह सरकारी खुलासा  और उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई मेरे ख़याल से अन्ना साहब के सत्याग्रह और बाबा रामदेव के आंदोलन की भावनाओं के अनुरूप  है.  अधिकारी पर भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम १९८८ के प्रावधानों के अनुसार जुर्म दर्ज कर लिया गया है.   देश के सभी राज्यों में आर्थिक अपराध और भ्रष्टाचार  निरोधक ब्यूरो हैं .अगर वे भी छत्तीसगढ़ सरकार की तरह ठान लें कि भ्रष्ट लोगों की करतूतों को उजागर करना है,और उन्हें क़ानून के हवाले करना है, तो  प्रशासन  में भ्रष्टाचार काफी हद तक कम हो सकता है.      
                                                                                                                          स्वराज्य करुण

Wednesday, June 8, 2011

(गीत) किस दुनिया के जन्तु ?

                               
                                   काले धन के धंधे वाले किस दुनिया के जन्तु ,
                                   नाम बताने में शर्माते ,कहते किन्तु-परन्तु  !

                                               देश की दौलत लूट -लूट कर  
                                               भरते अपनी तिजोरी ,
                                               गुप्त-बैंक शाखाओं में   
                                               करते  हिसाब चोरी-चोरी !

                                     हवाई जहाज़  में  रोज  घूमते ये डकैत घुमन्तू   ,       
                                     काले धन के धंधे वाले किस दुनिया के जन्तु !

                                               हिसाब मांगने पर चलवाते  ,
                                               आधी रात को लाठी ,
                                               अगली बार करेंगे छलनी 
                                               जन-गण-मन की छाती !

                                       ये रावण हैं,इनका वध करने चल  राम बन तू ,
                                       काले धन के धंधे वाले किस दुनिया के जन्तु  !
                                     
                                                खून-पसीने से जनता 
                                                देती है  इनको टैक्स ,
                                                उसी रकम से मौज -मजा कर
                                                ये होते रिलैक्स !
                                            
                                      माया जाल है इनका ऐसा दिखे न कोई तन्तु,
                                      काले धन के धंधे वाले किस दुनिया के जन्तु !
                                                   
                                               भ्रष्ट आचरण से  है खूब
                                               याराना  जिनका ,
                                               उन चोरों के चेहरों पर 
                                               नजर आ रहा तिनका !      
                                     
                                      इनकी बातों में न बहकना मेरे भोले मन तू ,
                                      काले धन के धंधे वाले किस दुनिया के जन्तु !      

                                                                                            --- स्वराज्य करुण                       

Monday, June 6, 2011

(ग़ज़ल ) चालबाज की चालाकी !

                              
                              
                                    जिनके कपड़े जितने उजले ,जितना उजला तन है ,
                                    उनके उतने ही भीतर  कोई  स्याह  फरेबी  मन है  !

                                    जिनके जितने ऊंचे महल और विशाल आँगन हैं,
                                    उनकी तिजोरियों में उतना  लूट-मार का धन है !

                                    धन-धान्य से पुण्य धरा थी , क्या से क्या कर डाला ,
                                    उनकी  करतूतों  से घायल देश का  हर एक  जन है   !

                                     चारों ओर  खूब चल रही लीपा-पोती , हेरा-फेरी
                                     सफेदपोश हाथों में कैद अब भारत का ये चमन है !

                                     चालबाज ने चालाकी से बेची  वतन की अस्मत
                                      जन्म-भूमि के कण-कण में बस अब केवल क्रन्दन  है  !

                                      रिश्वत के ही  दम पे जिनकी मनती रोज  दीवाली  ,
                                      बेशर्मों  की  बस्ती में  आज उन्हीं का अभिनन्दन है !

                                      गाँव रौंद कर शहर बसाते कदम-कदम पर माफिया ,
                                      मानव-जिस्मों की नींव पर बनते जिनके भवन हैं !

                                       लोकतंत्र के नाम चल रही  ये  कैसी धींगा-मस्ती,
                                        न्याय की लेकर आस अदालत में कटता जीवन है  !
                     
                                       संविधान की कसमें खा कर बैठ गए जो कुर्सी पर
                                       उनसे पूछो कहाँ खो गए उनके जो 'मधुर 'वचन हैं  !

                                       बेईमानों से उम्मीद  करे क्यों  कोई किसी ईमान की  ,
                                       जिनके लिए वतन का मतलब केवल एक  'सिंहासन' है  !

                                                                                             --  स्वराज्य करुण

Sunday, June 5, 2011

अंतिम विजय 'राम' की होगी !

                                 
                                                                             --  स्वराज्य करुण

                                    राम तो हर युग में
                                    शाश्वत और अजर-अमर हैं
                                    लेकिन रावण का पुनर्जन्म
                                    लगता है इस घोर
                                    कलियुग का असर है /
                             
                                    भारत माता के धन-वैभव की
                                    सीता का अपहरण कर
                                    स्विस -बैंकों के सोने की लंका में
                                    कैद कर लिया जिसने
                                     देश की संसद में
                                    अट्टहास करता है
                                    आज का वह रावण ,
                                    तभी तो अब हर दिन आँसू
                                    बहाती है मेरे देश की धरती पावन /

                                    बर्दाश्त नहीं हुई जब
                                    जननी -जन्म -भूमि की वेदना
                                    राम के साथ जाग उठी लाखों -लाख
                                    भारतवासियों की संवेदना /
                                    सहा नहीं गया जब
                                    स्विस-बैंक में बंधक
                                    सीता का क्रन्दन
                                    राम की सेना में शामिल हुआ
                                     देश का जन-जन /
                
                                    आज का रावण चूंकि लंका में नहीं
                                    दिल्ली में राज करता है ,
                                    इसलिए उसके खिलाफ राम-भक्तों का
                                    गुस्सा वहाँ की सड़कों पर
                                    हुंकार भरता है /
                              
                          
                                   रामलीला के मैदान में
                                   उस दिन भी यह कोई
                                   नाटक नहीं था ,सच्चाई थी
                                   रावणों से देश को बचाओ ,
                                   सीता को स्विस-बैंक  की
                                   जंजीरों से छुड़ाओ ,
                                   आवाज़ यह देश के
                                    कोने-कोने से आयी थी /
                                   राम और रावण के बीच
                                   यह एक और बड़ी लड़ाई थी /
                             
                                  राम की निहत्थी सेना
                                  सत्य ,अहिंसा और नैतिकता के
                                  हथियारों से सुसज्जित थी ,
                                  जबकि रावण की सेना के
                                   कायरता पूर्ण हमलों से
                                   मानवता लज्जित थी /

                                   रामदेव को और राम के देवों को
                                   रावण और रावण के दानवों ने
                                   कर लिया गिरफ्तार रातों-रात ,
                                   देश की इज्जत पर किया
                                   बेरहमी से बार-बार आघात /
                                  
                                    दिल्ली के सिंहासन का
                                    सुख भोग रहे रावण
                                    सत्ता के नशे में शायद
                                    यह भूल गए कि यह राम का देश है /
                                    सीता मैय्या की मुक्ति के लिए
                                    प्राण देने को तत्पर
                                    यहाँ राम की सेना अनंत और अशेष है /
                                  
                                     कलियुग के रावणों !
                                     याद नहीं त्रेता युग का 
                                     अपना इतिहास
                                     तो पढ़ लो ध्यान से फिर एक बार /
                                     चाहे जितना भी कर लो जोर-ज़ुल्म  ,
                                      तुम हारोगे बार-बार  /
                                      फिर तुम्हारी यह सोने की लंका
                                      किस काम की होगी  ?
                                      अंतिम विजय तो राम की होगी  !
                                                                         स्वराज्य करुण
                                                            

                                                  (तस्वीर google से साभार )
                           

Saturday, June 4, 2011

अनिवार्य मतदान के साथ वायदा निभाना भी हो अनिवार्य

                
             पहले अन्ना हजारे और अब बाबा रामदेव के आमरण अनशन से जहां दिल्ली के तमाम दबंग और दलाल देशद्रोही घबराए हुए हैं, वहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की जनता में जागरण की एक नयी लहर भी देखी जा रही है. बाबा की मांगों में चार सौ लाख करोड रूपयों के काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने ,  पांच सौ और हजार रूपए के नोटों को बंद करने ,  देश के सभी बच्चों की पढ़ाई भारतीय भाषाओं में करवाने ,भ्रष्टाचार के खिलाफ एक प्रभावी लोकपाल क़ानून बनवाने जैसी कई ऐसी मांगें शामिल हैं ,जिनसे कोई भी सच्चा देशभक्त असहमत नहीं हो सकता ,लेकिन मेरे विचार से बाबा अगर देश में मतदान अनिवार्य करने की मांग कर रहे हैं ,तो उन्हें इसके दूसरे पहलू पर भी विचार करना चाहिए . अगर देश के प्रत्येक मतदाता के लिए चुनावों में मतदान करने की बाध्यता लागू कर दी जाएगी ,तो यह तो एक प्रकार से तानाशाही जैसा  आचरण होगा. मतदान में 'दान' शब्द भी सम्मिलित है और कोई भी दान स्वप्रेरणा से और निजी सहमति से ही दिया जाता है. जोर-जबरदस्ती किसी से दान नहीं लिया जा सकता ,चाहे वह   'मतदान'  ही क्यों न हो ?
               हाँ ,अगर बाबा यह भी मांग करें कि मतदान की अनिवार्यता के साथ-साथ विजयी प्रत्याशियों के लिए चुनावी वायदों को समय-सीमा में पूर्ण करने की भी अनिवार्यता हो, और वायदा नहीं निभाने वाले प्रत्याशी अथवा दल पर धोखाधड़ी का मामला दर्ज हो, तब तो अनिवार्य मतदान की मांग वाजिब हो सकती है . अक्सर देखा गया है कि चुनावों में प्रत्याशी और दल  जनता से कई लुभावने वायदे करते हैं .जैसे महंगाई खत्म करने का वायदा , बेरोजगारी दूर करने का वायदा , भ्रष्टाचार मिटाने का वायदा ,लेकिन चुनाव निपटते ही आगे क्या होता है, सबको मालूम है .जनता को भी मालूम हो जाता है कि उसे धोखा दिया गया है. लेकिन वह अपने नसीब को कोसने के अलावा  कुछ नहीं कर पाती .ऐसे में यह भी अनिवार्य होना चाहिए कि चुनावों में प्रत्याशियों और दलों के वायदों को किसी भी सक्षम अदालत में शपथ-पत्र के रूप में दाखिल करवाया जाए ,ताकि अगर वायदे पूरे नहीं होते तो ,सम्बन्धित प्रत्याशी अथवा दल पर जूठे शपथ-पत्र देने के आरोप में कोई भी मतदाता मुकदमा दायर कर सके .. यदि मतदान करना मतदाता के लिए अनिवार्य होगा ,तो उसके मतों से चुनाव जीतने वाले के लिए चुनावी घोषणाओं और वायदों को पूरा करने की भी बाध्यता होनी चाहिए .आखिर ताली तो दोनों हाथों से ही बजती है
             .चुनावों में मतपत्रों पर केवल प्रत्याशियों के नाम और उनके प्रतीक छपे होते है,.इनमे से किसी एक पर मतदाता को मुहर लगाना होता है. अगर मतदाता की निगाह में कोई भी प्रत्याशी योग्य नहीं है, तो वह अपनी नापसंदगी मतपत्र पर तो ज़ाहिर नहीं कर सकता . फिर ऐसे में उस अनिवार्य मतदान का भला क्या औचित्य होगा जिसमे मतदाता को अपनी स्पष्ट राय ज़ाहिर करने का अधिकार न हो ? अब तो सूचना -प्रौद्योगिकी के आविष्कार इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन ने चुनाव में वोटिंग और मतगणना की प्रक्रिया को बहुत आसान बना दिया है .इस मशीन में और परम्परागत मतपत्रों में भी एक कॉलम नापसंदगी का भी होना चाहिए ,ताकि मतदाता अगर किसी भी प्रत्याशी को पसंद नहीं करता ,तो वह उस कॉलम में अपनी मुहर लगा सके .इससे यह भी पता चल जाएगा कि कौन सा प्रत्याशी कितने पानी में है. यह  मांग अन्ना हजारे साहब भी लगातार कर रहे हैं .
                                                                                                           स्वराज्य  करुण