Monday, December 22, 2025

(समाचार ) एक साथ मनाई गई छत्तीसगढ़ की तीन महान विभूतियों की जयंती

 एक साथ मनाई गई छत्तीसगढ़ की तीन महान विभूतियों की जयंती 

            विचार-गोष्ठी का भी हुआ आयोजन

 छत्तीसगढ़ प्रदेश की तीन महान विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर राजधानी रायपुर के हाँडीपारा स्थित छत्तीसगढ़ी भवन में कल 21 दिसम्बर को स्थानीय प्रबुद्धजनों की विचार -गोष्ठी आयोजित की गई.इसमें वक्ताओं ने स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक जागरण के  कार्यों में  तीनों विभूतियों की ऐतिहासिक भूमिका को याद किया. इन विभूतियों में से छत्तीसगढ़ के गांधी के नाम से लोकप्रिय  पंडित सुन्दरलाल शर्मा का जन्म 21दिसम्बर 1881 को राजिम में और त्यागमूर्ति के नाम से प्रसिद्ध ठाकुर प्यारेलाल सिंह का जन्म 21दिसम्बर 1891 को ग्राम -दैहान (जिला -राजनांदगांव ) में हुआ था, जबकि संविधान सभा के सदस्य रहे,संविधान पुरुष के नाम से प्रसिद्ध घनश्याम सिंह गुप्त का जन्म 22दिसम्बर 1885 को दुर्ग में हुआ था. स्वतंत्रता संग्राम में भी तीनों विभूतियों की सक्रिय भूमिका थी.विचार -गोष्ठी में तीनों की जयंती  एक साथ मनाई गई.

     तीनों विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर इतिहासकार डॉ. के. के. अग्रवाल, वरिष्ठ रंगकर्मी और लेखक अरविन्द मिश्रा,  संस्कृति कर्मी अशोक तिवारी, साहित्यकार और पत्रकार स्वराज्य करुण और छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण सेनानी, किसान नेता और साप्ताहिक 'किसान वीर 'के सम्पादक  गोवर्धन प्रसाद चंद्राकर ने प्रकाश डाला.सर्वप्रथम तीनों विभूतियों के चित्र पर माल्यार्पण किया गया. लोकतंत्र सेनानी और राज्य निर्माण सेनानी जागेश्वर प्रसाद ने स्वागत भाषण देने के बाद कार्यक्रम का संचालन भी किया.उन्होंने ही आभार प्रदर्शन भी किया. राज्य निर्माण आंदोलनकारी संस्था छसपा द्वारा आयोजित इस विचार -गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए इतिहासकार डॉ. के. के. अग्रवाल ने  स्वतंत्रता संग्राम और अछूतोद्धार के लिए छत्तीसगढ़ में पंडित सुन्दरलाल शर्मा की ऐतिहासिक भूमिका का उल्लेख किया. डॉ. अग्रवाल ने कहा कि उस दौर में पंडित सुन्दरलाल शर्मा ने एक साथ तीन बड़े कार्य किए. उन्होंने समाज में जन -जागरण के लिए खण्ड -काव्य 'दानलीला ' सहित 18 ग्रंथों की रचना की.राष्ट्रीय विद्यालय का संचालन किया. स्वदेशी आंदोलन, किसान आंदोलन, जंगल सत्याग्रह और नहर सत्याग्रह में भी पंडित सुन्दरलाल शर्मा की महत्वपूर्ण भूमिका थी. वे छत्तीसगढ़ में   अछूतोद्धार आंदोलन के प्रणेता थे. स्वतंत्रता आंदोलन में  गिरफ्तार होकर उन्हें जेल में भी रहना पड़ा.                     

                                                              

                                        



त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह को याद करते हुए इतिहासकार डॉ. के. के. अग्रवाल ने कहा कि ठाकुर साहब ने वर्ष 1919 में राजनांदगाँव में  लगभग 36 दिनों तक चले छत्तीसगढ़ के प्रथम मज़दूर आंदोलन का नेतृत्व किया. यह आंदोलन उनकी अगुवाई में सूती कपड़ा मिल के मज़दूरों ने किया था.डॉ. अग्रवाल ने कहा कि त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह छत्तीसगढ़ के इस प्रथम मज़दूर आंदोलन के अग्रदूत और सहकारिता आंदोलन के भी पुरोधा थे.  छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा के लिए रायपुर में पहला कॉलेज उन्हीं के प्रयासों से छत्तीसगढ़ कॉलेज के नाम से शुरु हुआ. इसके लिए ठाकुर साहब की अध्यक्षता में 1937 में छत्तीसगढ़ एजुकेशन सोसायटी का गठन किया गया था.

   विचार -गोष्ठी में अरविन्द मिश्रा ने पंडित सुन्दर लाल शर्मा के सार्वजनिक जीवन के अनेक अनछुए प्रसंगों का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि पंडित सुन्दरलाल शर्मा ने अपने खण्ड -काव्य 'दानलीला 'में तत्कालीन समाज में व्याप्त शोषण के खिलाफ़ जन -जागरण का संदेश दिया था. दूध -दही और खेतों में पैदा होने वाली उपज का उपभोग अकेले कंस द्वारा किए जाने का प्रतीकात्मक  विरोध इस खण्ड काव्य में किया गया है,  तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत द्वारा भी भारत की जनता का तरह -तरह से शोषण किया जा रहा था, जिसका प्रतीकात्मक विरोध इस खण्ड काव्य में प्रकट होता है.

                                                       


   स्वराज्य करुण ने कहा कि तीनों विभूतियों  की जीवन यात्रा किसी महाकाव्य से कम नहीं है. ठाकुर साहब तत्कालीन मध्य प्रांत और बरार की विधानसभा सभा में वर्ष 1952 में रायपुर से विधायक निर्वाचित होकर पहुँचे थे और प्रतिपक्ष के नेता भी बनाए गए थे. त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह तीन बार क्रमशः वर्ष 1936,वर्ष 1940 और वर्ष 1944 में रायपुर नगरपालिका परिषद के निर्वाचित अध्यक्ष रहे और शहर के विकास के लिए अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ठाकुर साहब पत्रकार भी थे. उन्होंने  रायपुर में वर्ष 1950 से 1952 तक राष्ट्रबंधु 'नामक अर्ध -साप्ताहिक समाचार पत्र का सम्पादन और प्रकाशन किया, लेकिन विधायक बनने और नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के बाद अपनी व्यस्तता के कारण उन्हें इसका  प्रकाशन स्थगित करना पड़ा.सहकारिता आंदोलन में उनकी अग्रणी भूमिका को भी विचार -गोष्ठी में याद किया गया. 

घनश्याम सिंह गुप्त को याद करते हुए विचार -गोष्ठी में बताया गया कि गुप्त जी ने संविधान सभा के सदस्य के रूप में स्वतंत्र भारत के संविधान का हिन्दी अनुवाद तैयार करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था. वे भारतीय संविधान के हिन्दी रूपांतरण के लिए बनी समिति के अध्यक्ष भी थे.

अशोक तिवारी ने कहा कि ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने वर्ष 1950 के  दौर में आसाम प्रांत में पीढ़ियों से निवास कर रहे प्रवासी छत्तीसगढ़ियों को जमीन से बेदखल किए जाने की जानकारी मिलते ही तत्काल आसाम का दौरा किया और पचास दिनों तक वहाँ के गाँवों में घूम -घूम कर उनका दुःख -दर्द सुना और उनकी दिक्क़तों को दूर करने के लिए अपनी रिपोर्ट के साथ आसाम तथा तत्कालीन मध्य प्रांत और बरार की सरकारों के स्तर पर सक्रिय पहल की.

 राज्य निर्माण सेनानी गोवर्धन चंद्राकर ने कहा कि  आज़ादी के बाद देश में शिक्षा और संचार सुविधाओं का काफी विकास हुआ है लेकिन किसी न किसी रूप में सामाजिक -आर्थिक शोषण आज भी व्याप्त है. उच्च शिक्षा प्राप्त करके ऊँचे पदों पर पहुँचे अधिकांश लोग अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों से दूर हो गए हैं. गोवर्धन प्रसाद चंद्राकर ने कहा कि हमारी महान विभूतियों ने हमेशा अन्याय और शोषण के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करते हुए समाज को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया है. हमें उनके बताए रास्ते पर चलना होगा.विचार-गोष्ठी में उर्दू शायर सुखनवर हुसैन, छत्तीसगढ़ी गीतकार रामेश्वर शर्मा, रसिक बिहारी अवधिया सहित गोविन्द धनगर, संजीव साहू, डॉ. श्याम लाल साकार, परसराम तिवारी, प् शिवनारायण ताम्रकार,मिनेश चंद्राकर, रघुनंदन साहू, श्यामू राम सेन, गंगाराम साहू, आदर्श चंद्राकर, मुकेश टिकरिहा, हिमांशु चक्रवर्ती, आशाराम देवांगन, उमैर खान, डॉ. छगन लाल सोनवानी ऋतु महंत, रोहित चन्द्रवंशी और रामकुमार देवांगन  आदि उपस्थित थे.


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Sunday, December 21, 2025

( कीर्ति शेष ) अब कहाँ मिलते हैं ऐसे लोग ? /आलेख -स्वराज्य करुण

अब कहाँ मिलते हैं ऐसे लोग ?

ऐतिहासिक संयोग : आज दो महान विभूतियों की जयंती ; 

पंडित सुन्दर लाल शर्मा और त्याग मूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह को विनम्र नमन.

  (आलेख- स्वराज करुण )

भारत माता के पवित्र आँचल को  अनेक महान पुण्यात्माओं ने  अपने जन्म और कर्म से धन्य किया है। लेकिन अब कहाँ मिलते हैं ऐसे लोग ,जिन्होंने सादगीपूर्ण और महान उद्देश्यों से परिपूर्ण अपने सार्वजनिक जीवन से देश और दुनिया के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया है।  देश और समाज के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों की एक लम्बी सूची है।

  आज 21 दिसम्बर को भारत के छत्तीसगढ़ प्रदेश की ऐसी दो महान विभूतियों को याद करने का दिन है। यह एक ऐतिहासिक संयोग है कि दोनों का जन्म आज ही के दिन हुआ था। यहाँ के  सामाजिक ,सांस्कृतिक  साहित्यिक और राजनीतिक इतिहास में उनकी शानदार भूमिकाओं को भी आज याद करने का दिन है । यह एक यादगार  संयोग का दिन है .

पंडित सुन्दरलाल शर्मा और ठाकुर प्यारेलाल सिंह को उनकी जयंती पर विनम्र नमन करते हुए देश और समाज की बेहतरी के लिए उनके द्वारा किए गए कठिन संघर्षों को भी आज याद किया जाएगा।   स्वतंत्रता संग्राम , अछूतोद्धार , किसानों और मज़दूरों के कल्याण से सम्बंधित कार्यो में छत्तीसगढ़ के  दोनों महान सपूतों का  ऐतिहासिक योगदान अतुलनीय और अविस्मरणीय है।   दोनों की गरिमापूर्ण जीवन यात्रा में याद करने लायक अनेक महत्वपूर्ण प्रसंग हैं जिन्हें बहुत विस्तार से लिखा जा सकता है। इस आलेख में उनमें से कुछ  प्रसंगों का उल्लेख किया गया है।


                                                      


                                            पंडित सुन्दरलाल शर्मा -ठाकुर प्यारेलाल सिंह 


पंडित सुन्दरलाल शर्मा 

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  पंडित सुन्दरलाल शर्मा का जन्म तीर्थ नगरी राजिम में 21 दिसम्बर 1881 को हुआ था। उनका निधन 28 दिसम्बर 1940 को हुआ।  राजिम के पास चमसूर (चन्द्रसूर )उनका पैतृक गाँव है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा राजिम में हुई। घर पर ही उन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत ,बांग्ला ,ओड़िया , मराठी ,अंग्रेजी और उर्दू आदि भाषाओं का ज्ञान हासिल किया।। वह छत्तीसगढ़ी और हिन्दी के उच्च कोटि के साहित्यकार थे। किशोरावस्था से ही उनमें साहित्यिक रूझान विकसित होने लगा था। वर्ष 1898 में उनकी रचनाएं 'रसिक मित्र ' नामक पत्रिका में छपने लगी थी। उन्होंने पंडित विश्वनाथ दुबे के साथ मिलकर राजिम में 'कवि समाज ' के नाम से  साहित्यिक संस्था का भी गठन किया था।

  वर्ष 1906 में प्रकाशित शर्माजी की  कृति दानलीला ' को छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला प्रबंध -काव्य माना जाता है।  इसका दूसरा संस्करण वर्ष 1915 में प्रकाशित हुआ था। कवि होने के अलावा वह अच्छे लेखक भी थे। उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की थी।  वर्ष 1904 में उनका लिखा नाटक ' भक्त प्रह्लाद' भी काफी लोकप्रिय हुआ था। उन्होंने राजिम में वर्ष 1904 में सार्वजनिक वाचनालय की भी स्थापना की थी। राजिम से उन्होंने 'श्री राजीव प्रेम पीयूष ' नामक पत्रिका की भी शुरुआत की थी ,तब उनकी आयु मात्र 17 वर्ष थी। अपने निधन से कुछ पहले वर्ष 1940 में उन्होंने 'दुलरुआ ' नामक पत्रिका का प्रकाशन भी शुरू किया था।पंडित सुन्दरलाल शर्मा ने  तत्कालीन समाज में अछूत समझी जाने वाली जातियों के लोगों में स्वाभिमान जगाने के साथ -साथ राजिम में मंदिर प्रवेश का अधिकार दिलाया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक वर्ष की जेल हुई तो जेल से ही 'श्रीकृष्ण जन्म स्थान ' शीर्षक से हस्तलिखित पत्रिका निकालते रहे। वर्तमान धमतरी जिले के कण्डेल में वर्ष 1920 में बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव के नेतृत्व में किसानों का नहर सत्याग्रह हुआ।,जिसमें शामिल होने के लिए सत्याग्रहियों ने महात्मा गाँधी को आमंत्रित किया। 

  किसानों की ओर से पंडित सुन्दरलाल शर्मा   कोलकाता से 20 दिसम्बर 1920 को महात्मा जी को रायपुर लेकर आए। यह महात्मा गाँधी की पहली छत्तीसगढ़ यात्रा थी।  नगरी -सिहावा में हुए आदिवासियों के जंगल सत्याग्रह में भी पंडित सुन्दरलाल शर्मा ने  सक्रिय सहयोग दिया। इस आंदोलन में वह गिरफ्तार भी हुए।  

भारत सरकार ने वर्ष 1990 में शर्माजी के सम्मान में विशेष आवरण और डाक टिकट भी जारी किया। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद उनके नाम पर बिलासपुर में ओपन यूनिवर्सिटी की स्थापना की गयी। उनके नाम पर साहित्य के क्षेत्र में राज्य अलंकरण भी घोषित किया गया ,जो हर साल एक चयनित साहित्यकार को राज्योत्सव के अवसर पर प्रदान किया जाता है।

             ठाकुर प्यारेलाल सिंह 

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         त्यागमूर्ति के नाम से लोकप्रिय समाजवादी चिन्तक और श्रमिक नेता ठाकुर प्यारेलाल सिंह तीन बार ,क्रमशः  वर्ष 1936 , 1940 और 1944 में रायपुर नगरपालिका परिषद के निर्वाचित अध्यक्ष रहे। । रायपुर से ही उन्होंने चार सितम्बर 1950 को अर्ध साप्ताहिक समाचार पत्र 'राष्ट्रबन्धु ' का सम्पादन और प्रकाशन शुरू किया था।  उनका जन्म 21 दिसम्बर 1891 को राजनांदगांव के पास ग्राम दैहान में हुआ था। विनोबा जी के सर्वोदय आंदोलन में भूदान यज्ञ की  पदयात्रा के दौरान ठाकुर साहब का निधन जबलपुर  में 20 अक्टूबर 1954 को हुआ। ठाकुर साहब की मिडिल स्कूल तक पढ़ाई राजनांदगांव में हुई। उन्होंने रायपुर के शासकीय हाई स्कूल (वर्तमान में जे.एन. पाण्डेय शासकीय बहुउद्देश्यीय उच्चतर माध्यमिक शाला ) से मेट्रिक उत्तीर्ण होने के बाद हिस्लाप कॉलेज नागपुर और जबलपुर से बी.ए. और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वकालत की शिक्षा प्राप्त की थी। 

 उनके निधन के लगभग 9 वर्ष बाद विनोबा जी ने रायपुर प्रवास के दौरान ठाकुर साहब की जयंती पर 21 दिसम्बर 1963 को छत्तीसगढ़ बुनकर सहकारी संघ के कार्यालय के सामने  उनकी प्रतिमा का अनावरण किया था।  यह प्रतिमा त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह स्मारक -समिति द्वारा स्थापित की गयी थी। उल्लेखनीय है कि ठाकुर प्यारेलाल सिंह छत्तीसगढ़ में सहकारिता आंदोलन के भी प्रमुख नेता थे । बुनकरों की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए बुनकर सहकारी संघ का गठन 5 जुलाई 1945 को  उनके द्वारा किया गया था। 

       ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने  छत्तीसगढ़ में सहकारिता आंदोलन के विस्तार के लिए और भी कई सहकारी समितियों का गठन किया । इनमें उपभोक्ता सहकारी संघ , मध्यप्रदेश पीतल धातु निर्माता सहकारी संघ ,स्वर्णकार सहकारी संघ ,विश्वकर्मा औद्योगिक सहकारी संघ आदि उल्लेखनीय हैं। श्रमिक नेता के रूप में उनकी ऐतिहासिक भूमिका को आज भी याद किया जाता है। 

   *छत्तीसगढ़ कॉलेज की स्थापना -ठाकुर प्यारेलाल सिंह की अध्यक्षता में वर्ष 1937 में छत्तीसगढ़ एजुकेशन सोसायटी का गठन हुआ। सोसायटी द्वारा उन्हीं दिनों रायपुर में छत्तीसगढ़ कॉलेज की स्थापना की गयी ,जो इस अंचल का पहला कॉलेज था। जे.योगनन्दम इस कॉलेज के प्रथम प्राचार्य थे। ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने वर्ष 1920 में राजनांदगांव में राष्ट्रीय विद्यालय की भी स्थापना की थी।

   उन्होंने वर्ष 1916 में राजनांदगांव स्थित बी.एन. सी.मिल (बंगाल -नागपुर कॉटन मिल ) में श्रमिकों की 37 दिनों की हड़ताल का नेतृत्व किया था। यह सबसे लम्बे समय तक चली भारत की पहली औद्योगिक हड़ताल थी । काम के घंटों में कमी और वेतन वृद्धि की मांग को लेकर यह आंदोलन हुआ था,जो काफी कामयाब रहा। व्ही. व्ही. गिरि जो आज़ादी के बाद भारत के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए, स्वयं इस आंदोलन में श्रमिकों का मनोबल बढ़ाने राजनांदगांव आए थे. बाद में ठाकुर साहब ने  वर्ष 1924 और 1936 में भी राजनांदगांव में श्रमिक आंदोलनों का नेतृत्व किया। वह वर्ष 1917 से 1936 तक ,19 वर्ष राजनांदगांव के मिल मजदूर संघ के सर्वमान्य अध्यक्ष रहे। वर्ष 1936 में ही वह मध्य प्रान्त और बरार (सी.पी.एंड बरार) की विधान सभा के लिए रायपुर से विधायक निर्वाचित हुए।उन दिनों मध्य प्रान्त की राजधानी नागपुर में हुआ करती थी। कुछ दिनों तक वह मध्य प्रांत की सरकार के शिक्षा मंत्री भी रहे।

  आसाम के चाय बागानों में कार्यरत छत्तीसगढ़ के प्रवासी श्रमिकों की समस्याओं के बारे में ख़बर मिलते ही उन्होंने वर्ष 1950 में वहाँ जाकर 50 दिनों तक गाँवों का सघन दौरा किया। कई गाँवों में पैदल घूमे। वहाँ से लौटकर तत्कालीन सी.पी.एंड बरार (सेंट्रल प्रॉविंस एंड बरार ) शासन को अपनी रिपोर्ट सौंपी और श्रमिकों को विस्थापित होने से बचाया।।

    स्वतंत्र भारत में लोकसभा और विधान सभाओं का  पहला आम चुनाव 1952 में हुआ। ठाकुर प्यारेलाल सिंह कृषक मजदूर प्रजा पार्टी के टिकट पर रायपुर से भारी बहुमत से विधान सभा के सदस्य चुने गए। उन्हें विधान सभा का नेता प्रतिपक्ष भी बनाया गया। स्वतंत्रता आंदोलन में  ठाकुर प्यारेलाल सिंह का ऐतिहासिक योगदान रहा। उन्होंने 26 जनवरी 1932 को रायपुर के गांधी चौक मैदान में पंडित रविशंकर शुक्ल की अध्यक्षता में आयोजित आयोजित आम सभा में ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ उत्तेजक भाषण दिया ।इस पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया ।उन्हें जुर्माने का साथ दो साल की सजा हुई। स्वाभिमानी ठाकुर साहब ने जुर्माना नहीं दिया । इस पर सरकार ने उनकी चल  सम्पत्ति कुर्क कर ली। उनकी वकालत का लाइसेंस भी जब्त कर लिया गया। इसे उन्होंने कभी वापस नहीं लिया। 

   वर्ष 1930 में भूमि बंदोबस्त को लेकर किसानों में अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ़ गुस्सा फूट पड़ा था। तब ठाकुर साहब  ने  गाँवों का दौरा किया और किसानों को एक जुट कर 'पट्टा मत लो -लगान मत दो ' आंदोलन चलाया।  उन्होंने वर्ष 1930 -31 में सिहावा के प्रसिद्ध जंगल सत्याग्रह में भी हिस्सा लिया।  गाँधीजी के आव्हान पर वर्ष 1942 में ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ देशव्यापी 'भारत छोड़ो आंदोलन ' में भी  छत्तीसगढ़ में ठाकुर साहब की सक्रिय भूमिका थी। इस आंदोलन में उनके दो बेटे ठाकुर रामकृष्ण सिंह और ठाकुर सच्चिदानंद सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार का लिया। ठाकुर प्यारेलाल सिंह भूमिगत रहकर आंदोलन का संचालन करते रहे। 

    ठाकुर साहब उन दिनों रायपुर के हांडी पारा स्थित राजनांदगांव बाड़ा में रहते थे। उनका मकान भूमिगत आंदोलनकारियों की राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र था। वहीं से आज़ादी के आंदोलन के प्रचार प्रसार के लिए ठाकुर साहब द्वारा हस्तलिखित सायक्लोस्टाइल्ड पर्चे निकाले जाते थे।उनके तीसरे पुत्र हरिनारायण सिंह ठाकुर (हरि ठाकुर )भी स्वतंत्रता के इस आंदोलन में सक्रिय थे  । उन्होंने भूमिगत रहकर आंदोलन को अपना भरपूर सहयोग दिया। 

  छत्तीसगढ़ सरकार ने ठाकुर प्यारेलाल सिंह के सम्मान में सहकारिता के क्षेत्र में राज्य अलंकरण की स्थापना की है ,जो हर साल राज्योत्सव के मौके पर चयनित व्यक्ति अथवा संस्था को प्रदान किया जाता है। राजधानी रायपुर के पास ग्राम निमोरा स्थित प्रदेश सरकार के पंचायत एवं ग्रामीण विकास संस्थान का नामकरण भी ठाकुर प्यारेलाल सिंह के नाम पर किया गया है।

  आलेख  -स्वराज्य करुण 

Wednesday, December 17, 2025

लाला जगदलपुरी ; तिरानवे साल की ज़िन्दगी में 77 साल की सुदीर्घ साहित्य -साधना /आलेख -स्वराज्य करुण

 साहित्य महर्षि लाला जगदलपुरी की आज 17 दिसम्बर को 105वीं जयंती 

तिरानवे साल की ज़िन्दगी में 77साल की सुदीर्घ साहित्य -साधना

(आलेख -  स्वराज्य करुण )

 जिन्होंने 93 साल की अपनी जीवन -यात्रा के 77साल साहित्य -साधना में लगा दिए,ऐसे समर्पित साहित्य महर्षि लाला जगदलपुरी की आज 17 दिसम्बर 2025 को 105वीं जयंती है. उन्हें विनम्र नमन । हिन्दी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर तो वह थे ही, छत्तीसगढ़ और बस्तर के लोक साहित्य के  भी मर्मज्ञ थे। उन्होंने अपनी सुदीर्घ साहित्य साधना से छत्तीसगढ़ और बस्तर के वनांचल को देश और दुनिया में साहित्यिक और सांस्कृतिक पहचान दिलाने का श्रम-साध्य कार्य समर्पित भाव से किया।  उनके जगदलपुर शहर को देश और दुनिया में साहित्यिक पहचान भी उनके नाम  से मिली ।

 अफ़सोस कि उनकी तकरीबन पौन सदी से भी अधिक लम्बी  साहित्य- साधना विगत 14 अगस्त 2013 को अचानक हमेशा के लिए थम गयी ,जब अपने गृहनगर जगदलपुर में उनका देहावसान हो गया। इसी जगदलपुर में उनका जन्म 17 दिसम्बर 1920 को हुआ था।   उन्होंने ऋषि -तुल्य सादगीपूर्ण  जीवन जिया । धोती और कुर्ता उनका लिबास था । हर शाम वह अपने गृह नगर में पैदल घूमते और स्थानीय लोगों और साहित्यकारों से मिलते थे । उन दिनों उर्दू शायर ग़नी आमीपुरी भी जीवित थे, जिनकी ड्रायक्लिनिंग की छोटी -सी दुकान में वह अक्सर आते और बैठा करते थे। कुछ स्थानीय कवि भी लालाजी और ग़नी जी से मिलने वहाँ आ जाते थे ।

                                                              


लाला जगदलपुरी एक समर्पित साहित्य साधक थे। उन्हें तपस्वी साहित्य महर्षि भी कहा जा सकता है । वह पत्रकार भी थे। उन्होंने स्वर्गीय तुषार कांति बोस द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक 'बस्तरिया' का कई वर्षों तक सम्पादन किया, जो हल्बी लोकभाषा का पहला साप्ताहिक समाचार पत्र था ।वर्ष 2020 में उनके सौवें जन्म वर्ष के उपलक्ष्य में  जगदलपुर स्थित शासकीय जिला ग्रंथालय का नामकरण उनके नाम किया गया। उनके सम्मान में  यह निश्चित रूप से यह एक  स्वागत योग्य निर्णय था।   यह  ग्रंथालय जगदलपुर के शासकीय बहुउद्देश्यीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय परिसर में स्थित है।  लाला जी को छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर राजधानी रायपुर में आयोजित राज्योत्सव 2004 में प्रदेश सरकार की ओर से *पंडित सुन्दरलाल शर्मा साहित्य सम्मान*  से नवाजा गया था। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने उन्हें और बिलासपुर के वरिष्ठ साहित्यकार पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी को संयुक्त रूप से यह सम्मान प्रदान किया था।

   लाला जगदलपुरी ने हिन्दी और छत्तीसगढ़ी सहित बस्तर अंचल की हल्बी और भतरी लोकभाषाओं में भी साहित्य सृजन किया। उनकी प्रमुख हिन्दी पुस्तकों में वर्ष 1983 में प्रकाशित  ग़ज़ल संग्रह 'मिमियाती ज़िन्दगी दहाड़ते परिवेश '  वर्ष 1992 में प्रकाशित काव्य संग्रह 'पड़ाव ',वर्ष 2005 में प्रकाशित आंचलिक कविताएं और वर्ष 2011 में प्रकाशित ज़िन्दगी के लिए जूझती गज़लें तथा गीत धन्वा शामिल हैं। मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ कि मुझे भी उनका स्नेह और सानिध्य मिला था और उनके द्वारा सम्पादित तथा  वर्ष 1986 में प्रकाशित छत्तीसगढ़ के  चार कवियों  के सहयोगी काव्य संग्रह 'हमसफ़र 'में उन्होंने मेरी कविताओं को भी शामिल किया था । संकलन में  बहादुर लाल तिवारी , लक्ष्मीनारायण पयोधि और ग़नी आमीपुरी की भी  हिन्दी कविताएं शामिल हैं। 

   मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी भोपाल  द्वारा वर्ष 1994 में प्रकाशित लाला जगदलपुरी की पुस्तक 'बस्तर : इतिहास एवं संस्कृति ' ने छत्तीसगढ़ के इस आदिवासी अंचल पर केन्द्रित एक प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ के रूप में काफी प्रशंसा अर्जित की। वर्ष 2007 में इस ग्रंथ का तीसरा संस्करण प्रकाशित किया गया। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर हरिहर वैष्णव द्वारा सम्पादित एक महत्वपूर्ण पुस्तक " लाला जगदलपुरी समग्र ' का भी प्रकाशन हो चुका है। उनकी हिन्दी ग़ज़लों का संकलन 'मिमियाती ज़िंदगी दहाड़ते परिवेश ', शीर्षक से आंदोलन प्रकाशन जगदलपुर के भरत बेचैन द्वारा वर्ष 1983 में प्रकाशित किया गया था। इसमें शामिल उनकी एक ग़ज़ल इस प्रकार है -


*दुर्जनता की पीठ ठोंकता 

सज्जन कितना बदल गया है !

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दहकन का अहसास कराता,

चंदन कितना बदल गया है , 

मेरा चेहरा मुझे डराता, 

दरपन कितना बदल गया है !

आँखों ही आँखों में  सूख गई 

हरियाली अंतर्मन की ,

कौन करे विश्वास कि मेरा 

सावन कितना बदल गया है !

पाँवों के नीचे से खिसक-खिसक 

जाता सा बात-बात में ,

मेरे तुलसी के बिरवे का 

आँगन कितना बदल गया है ! 

भाग रहे हैं लोग मृत्यु के 

पीछे-पीछे बिना बुलाए,

जिजीविषा से अलग-थलग 

यह जीवन कितना बदल गया है !

प्रोत्साहन की नई दिशा में 

देख रहा हूँ, सोच रहा हूँ ,

दुर्जनता की पीठ ठोंकता

 सज्जन कितना बदल गया है !

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हमारी आज की दुनिया ,आज की समाज व्यवस्था और हमारे आस -पास के आज के वातावरण का वर्णन करती इस ग़ज़ल की हर पंक्ति अपने -आप में बहुत स्पष्ट है। यह ग़ज़ल सकेतों ही संकेतों में हमें बहुत कुछ कह रही है।  

छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी रायपुर द्वारा लाला जी की  पुस्तक 'बस्तर की लोकोक्तियाँ ' वर्ष 2008 में प्रकाशित की गयी। उनकी हल्बी लोक कथाओं का संकलन लोक चेतना प्रकाशन जबलपुर द्वारा वर्ष 1972 में प्रकाशित किया गया। लाला जी ने प्रेमचंद की प्रमुख कहानियों का  भी हल्बी में अनुवाद किया था । यह अनुवाद संकलन 'प्रेमचंद चो बारा कहनी ' शीर्षक से वर्ष 1984 में वन्या प्रकाशन भोपाल ने प्रकाशित किया था।   

                  मरणोपरांत छपी पाँच किताबें 

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 लालाजी के मरणोपरांत उनकी पाँच किताबों का प्रकाशन हुआ है । घर पर उनकी बिखरी पड़ी रचनाओं को सहेजने और सम्पादित कर पुस्तक रूप में प्रकाशित करवाने का सराहनीय कार्य उनके अनुज स्वर्गीय केशव लाल श्रीवास्तव के सुपुत्र विनय कुमार श्रीवास्तव ने किया है ।हाल के वर्षों में विनय जी के सम्पादन में   लाला जी की पाँच किताबें छप चुकी हैं। ये हैं (1) छोटी -छोटी कविताओं का संकलन बूँद -बूँद सागर  (2) बिखरे मोती ( 3)  आंचलिक कविताएँ :समग्र '  (4) बच्चों की कविताओं का संकलन 'बाबा की भेंट ' और (5) अप्रकाशित गद्यात्मक रचनाओं का संकलन 'बस्तर माटी की गूँज

।  इनमें से पाँचवे संकलन 'बस्तर माटी की गूँज' का सम्पादन विनय जी के साथ उनकी छोटी बहन  डॉ. आभा श्रीवास्तव ने भी किया है । साहित्य महर्षि लाला जगदलपुरी को विनम्र नमन ।

   आलेख -स्वराज्य करुण 

Tuesday, December 16, 2025

(पुस्तक -चर्चा ) दूसरों के लिए रास्ता नहीं बन पाने का दर्द / आलेख -स्वराज्य करुण


दूसरों के लिए रास्ता 

नहीं बन पाने का दर्द 

(आलेख- स्वराज्य करुण) 

साहित्य मानवीय भावनाओं का दूसरा नाम है।कहानी, कविता, उपन्यास आदि साहित्य की अनेक विधाएँ हैं।कोई भी कविता, चाहे वह तुकांत हो या अतुकांत, उनमें मनुष्य के सुख -दुःख की, रिश्ते -नातों  की, धरती और आसमान की,अपने आस -पास हो रही हलचलों  की अभिव्यक्ति होती है।वे जो हमारी भाषा या हमारी बोलियों में हमसे कुछ कह नहीं पाते उन ख़ामोश खड़े पेड़ -पौधों की,रंग -बिरंगे फूलों की,फलों की, पशुओं और पंछियों की अमूर्त भावनाओं को भी कवि अपनी रचनाओं में शब्द और स्वर देता है, जिनसे हमें मनुष्य होने की पहचान मिलती है। मनुष्य होने के नाते हमें काव्य रचनाओं में व्यक्त भावनाओं को समझना और उनका सम्मान करना चाहिए।    

       पेशे से पत्रकार और स्वभाव से कवि छत्तीसगढ़ के निकष परमार का पहला कविता संग्रह 'पृथ्वी पर जन्म लेने के बाद ' शीर्षक से प्रकाशित हुआ था । इस वर्ष 2025 में उनकी कविताओं की दूसरी किताब  'हम कोई रास्ता न  बन पाए 'शीर्षक से सामने आई है । इसे वैभव प्रकाशन, रायपुर ने प्रकाशित किया है । पुस्तक 64 पेज की  और 100 रूपए की है । प्रारंभ में 'कविता का निकष और निकष की कवितायें 'शीर्षक से वरिष्ठ लेखक  और पत्रकार पंकज झा ने भूमिका लिखी है, जो सारगर्भित होने के साथ -साथ बहुत महत्वपूर्ण है ।भूमिका में उन्होंने निकष की भावनाओं और संवेदनाओं को रेखांकित किया है, जिससे कवि की रचनाधर्मिता का परिचय मिलता है ।

   निकष के इस संग्रह की रचनाओं में मनुष्य और प्रकृति की, उसके प्राकृतिक परिवेश की और उस परिवेश में उमड़ते -घुमड़ते सुःख -दुःख की ऐसी अभिव्यक्ति है, जो हमारे हृदय को छूने के साथ -साथ उसे झकझोरती भी है। यह संग्रह 26 छोटी -छोटी कविताओं, चार गीतों, पाँच गज़लों और सोलह मुक्तकों से सुसज्जित है।इन कविताओं में सिर्फ़ सपाट बयानी नहीं है । उनमें शब्दों की बाज़ीगरी भी नहीं है । इनकी बुनावट भावनाओं के महीन धागों से हुई है ।  इसलिए इनकी बनावट बेहद कोमलता लिए हुए है, जो  पाठकों के दिलों को छू जाती हैं ।

                                       


  वैसे तो हर कवि भावुक होता है, लेकिन निकष की कविताओं में  भावुकता के बादल घनीभूत होकर बरसते हैं। दुनिया में इंसानियत के नाते दूसरों को रास्ता दिखाना, दूसरों के लिए रास्ता बनाना तो अच्छी बात है, लेकिन उससे भी अच्छी बात तब होगी, जब हम ख़ुद दूसरों के लिए रास्ता बन जाएँ ।कुछ इसी तरह के भाव निकष के इस दूसरे कविता संग्रह के शीर्षक में झलकते हैं। उनमें दूसरों के लिए रास्ता बन जाने की चाहत तो है, लेकिन नहीं बन पाने का दर्द भी है । कवि की यह भावना  संग्रह के 16 मुक्तकों में से आख़िरी मुक्तक में महसूस की जा सकती है -

    *हम कोई रास्ता न बन पाए 

     जिससे होकर कोई गुज़र जाए,

    कब अंधेरा हुआ, पता न चला,

    छोड़ कर कब चले गए साए।*


आधुनिक दुनिया में एक तरफ जहाँ सम्पन्नता की चकाचौंध हैं, लोगों में शहरों का लगातार बढ़ता आकर्षण है,वहीं  दूसरी तरफ बेबसी के चक्रव्यूह में घिरे असंख्य गरीब इंसान मन ही मन बेचैन हैं।ऐसे ही एक बेचैन इंसान की पीड़ा कवि निकष के इस मुक्तक में उभरती है -

   *कार, दौलत, जश्न, आलीशान घर थोड़े ही था,

   प्यार था उसको शहर से, मैं शहर थोड़े ही था.

   मैं दरकता जा रहा था, उसको भी मालूम था,

  उससे क्या उम्मीद करता, उसका घर थोड़े ही था ।*


संग्रह में शामिल सभी कविताएँ,सभी गीत, ग़ज़ल और सभी मुक्तक एक से बढ़कर एक हैं. उनमें जीवन -दर्शन की सुकोमल अभिव्यक्ति है, और है जीवन के यथार्थ का चौंकाने वाला प्रतिबिम्ब ।समाज में खींची जा रही विभाजन की दीवारों के बीच आज मानवता कराह रही है.भले ही उसे दिल को बहलाने के लिए सुन्दर सपने दिखाए जा रहे हों ।कवि निकष 'शुक्रिया' शीर्षक कविता में कहते हैं -

 *जब चारों तरफ 

    खड़ी की जा रही थीं दीवारें,

     मुझे हवा के कंधों पर 

     अपने साथ बिठाने का शुक्रिया ।

     जब हर कोई नज़र फेर कर 

     चला जा रहा था,

     मुझसे नज़रें मिलाने का शुक्रिया ।

     सपने तो टूटते रहते हैं मगर,

     जब सपने देखने की ताकत भी 

      नहीं बची थी,

     मुझे इतने सुन्दर सपने 

     दिखाने का शुक्रिया।*

पिंजरों में तोता-मैना जैसे पंछियों को पालने के शौक़ीन लोगों को उनकी पीड़ा का अनुभव शायद ही होता होगा. एक मैना को बचाने के लिए हो रही क़वायद पर कवि  'मैना ' शीर्षक कविता में लिखते हैं -

    * उन्होंने मैना को बचाने के लिए 

        उसे पिंजरे में कैद कर लिया।

        उनके पास यही एक तरीका था 

        मैना को बचाने का ।

       पिंजरे में रहते -रहते मैना मर गई ।

       मैना तो उसी दिन मर गई थी 

      जिस दिन पिंजरे में कैद हुई थी ।*

 

निर्ममता शहरों की तासीर में होती ही है।तेज रफ़्तार शहरीकरण से भयभीत कवि निकष अपने इस डर को एक बहुत छोटी कविता 'चीतल' में कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं -

       *जंगल से भटक कर 

         शहर में घुस आए चीतल को 

         कुत्तों ने नोचकर मार डाला ।

        बरसों पहले छोड़कर अपना घर 

        मैं भी आया था शहर।*

 निकष की हर कविता में प्रतीकों और बिम्बों का अपना सौन्दर्य है।वे वर्तमान युग की हकीकतों पर संकेतों में अपनी बात कहते हैं ।आदमी जब सूरज हो जाता है, दुनिया के सबसे घने जंगल, 'एक सूरज कितनी जगह डूबता है ' जैसी उनकी कविताओं में यह बात देखने को मिलती है  ।उनकी कविता -'एक मौसम होता है, एक उम्र होती है ' का अंतिम हिस्सा  देखिए -

     एक दौर होता है 

     टूटे हुए ख्वाबों का 

     और उदास खयालों का,

     जब हम तय नहीं कर पाते 

     कि यह मौसम है 

    जो गुज़र जाएगा 

    या उम्र है जो लौट कर नहीं आएगी.*

अपनी कविता -' जब ज्यादातर लोग घर लौट रहे होते हैं ' में कवि ने आमजनों की दिनचर्या को भावनाओं में बहते हुए बहुत सहज -सरल ढंग से रेखांकित किया है-

       *शाम ढले ज्यादातर लोग 

       घर लौट रहे होते हैं,

      पर कुछ लोग घर नहीं लौट रहे होते हैं।

     बच्चों के लिए दाने और तिनके बटोरने वाली 

     चिड़िया आख़िरी खेप के साथ 

      घर लौट रही होती है ।

      कोई नौकरी की तलाश में 

      नए शहर जा रहा होता है ।

       कोई अस्पताल में किसी के पास 

      रात रुकने के लिए जा रहा होता है ।

       जिनका कोई ठिकाना नहीं होता,

       वे पता नहीं कहाँ जा रहे होते हैं ।

       उम्र की शाम भी ऐसी ही होती है.

       जब ज्यादातर लोग घर लौट रहे होते हैं,

       बहुत -से लोग घर नहीं लौट रहे होते हैं ।


  इंसानी फ़ितरत की तस्वीर कवि निकष ने 'कुछ लोग कभी नहीं बदलते ' शीर्षक कविता में कुछ इस तरह खींची है -

       *कुछ लोग होते हैं 

         जो कभी नहीं बदलते ।

         बरसों बाद उनसे मिलो 

       तो वे जहाँ के तहाँ मिलते हैं 

      जस के तस ।

       ऐसे लोगों की हमें

      अक्सर याद नहीं आती ।

      वहीं कुछ लोग होते हैं 

      जो बड़ी तेजी से बदल जाते हैं ।

      कुछ पैसे कमा लेने के 

       बाद बदल जाते हैं ।

      कुछ ओहदे पाकर बदल जाते हैं,

      कुछ मतलब निकल जाने के बाद 

       बदल जाते हैं ।*

   बेतरतीब, बेहिसाब और बेरहम आधुनिकता के इस भयानक दौर में अधिकांश नदियाँ अपनी रेत के अवैध दोहन के साथ -साथ 

प्रदूषण की चपेट में आ गई हैं, लेकिन समाज का एक वर्ग या कहें कि एक सम्पन्न तबका ऐसा है, जिसे नदियों के इस दर्द से कोई लेना -देना नहीं. निकष की कविता 'नदी ' ऐसे ही लोगों पर कटाक्ष करती है-

      *नदी से उन्हें कोई मतलब नहीं होता,

         वे नदी में नहीं नहाते ।

       नदी का पानी उनके घर तक आ जाता है ।

        नदी के पानी से वे अपने घर में नहाते हैं. 

       उन्हें नदी का नाम तक पता नहीं होता,

       वे नहीं जानते कि नदी मौसमी है कि बारहमासी ।

       उन्हें नदी से रेत निकाले जाने से भी 

         फ़र्क नहीं पड़ता, 

         न शहर की गंदगी नदी में जाने से ।

          कारखानों के अपशिष्ट से सड़ चुके 

        नदी के पानी के पास से गुज़रते हुए 

       वे नाक पर रूमाल रख लेते हैं  ।

       हाँ, जब नदी के किनारे मेला लगता है,

       तब वे लाव -लश्कर के साथ 

        नदी तक आते हैं और नदी में नहाने वालों को 

       बताते हैं कि नदी को बचाना क्यों ज़रूरी है ।

        अपने लोगों की चिन्ता में नदी 

        कविताएँ लिखती है 

         जो उन लोगों तक नहीं पहुँचती 

        जिनके घर नदी का पानी 

        पहुँच जाता है ।


निकष की कलम ने गीतों में भी कमाल दिखाया है. संग्रह में शामिल एक गीत 'किसको अच्छा लगता है ' की शुरुआत के दो अंतरों  को देखिए -

    *जब देखो तब खाली -खाली 

    तनहा -तनहा लगता है,

     तुमको खोकर भी ख़ुश रहना 

    किसको अच्छा लगता है ।

   तुम जो साथ नहीं तो सारी 

    दुनिया ही बेमानी है,

    परबत, जंगल, नदिया,झरना

    किसको अच्छा लगता है।* 

लगातार बदलती टेक्नोलोजी के इस दौर में निकष ने अपने इस गीत के साथ एक नया प्रयोग भी किया है । यह ए. आई. जैसी नई टेक्नोलोजी के साथ उनका  नया काव्यात्मक प्रयोग है ।उनके इस गीत को संगीत के साथ ए. आई. के एक अदृश्य गायक ने स्वर दिया है, जो बहुत बेहतरीन बन पड़ा है ।

इस कविता -संग्रह के समर्पण की निकष की बहुत भावुक अभिव्यक्ति है।संग्रह की शुरुआत करते हुए वे लिखते हैं -


समर्पित 

******

*राह के उन पत्थरों को 

जिनकी ठोकर से आह निकली 

और कविता में बदल गई.

बंजर में खिले फूलों को 

जिन्हें रुककर देखा 

तो एक कविता का जन्म हुआ।

उन लोगों को 

जिन्हें मेरा लिखा -बोला 

अच्छा लगा और बताने पर जाना 

कि इसे कविता कहते हैं।*

छत्तीसगढ़ के बागबाहरा कस्बे (जिला -महासमुन्द ) में 25 जून 1967 को जन्मे निकष परमार धमतरी जिले के निवासी हैं। इस जिले का मुख्यालय  धमतरी उनका गृह नगर है । प्राथमिक से लेकर आगे की पढ़ाई लिखाई भी धमतरी में हुई.लेकिन पत्रकारिता के पेशे में होने के कारण वे विगत साढ़े तीन दशकों से  राजधानी रायपुर में हैं।धमतरी निवासी उनके पिता स्वर्गीय नारायण लाल परमार और माता स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा परमार छत्तीसगढ़ के जाने -माने साहित्यकार थे.पत्र -पत्रिकाओं में दोनों की कविताएँ कई दशकों तक छपती रहीं।दोनों ने  अपने साहित्य सृजन से राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ की पहचान बनाई. स्वर्गीय नारायण लाल परमार तो  हिन्दी और छत्तीसगढ़ी दोनों भाषाओं के कवि होने के साथ -साथ कहानीकार और नाट्य लेखक भी थे।उन्होंने हिन्दी में उपन्यास भी लिखे.उनके  प्रकाशित उपन्यासों में प्यार की लाज (वर्ष 1954), छलना (वर्ष 1956)और पूजामयी (वर्ष 1959) उल्लेखनीय हैं। 

    इस प्रकार यह कहना उचित होगा कि निकष परमार को साहित्यिक प्रतिभा विरासत में मिली है। संग्रह के अंतिम आवरण पृष्ठ पर उन्होंने स्वयं इसे स्वीकारा भी है । वे लिखते हैं - "पिता साहित्यकार थे। माँ भी लिखती थीं । घर पर साहित्यिक गोष्ठियां हुआ करती थीं । देश भर की साहित्यिक पत्रिकाएँ घर पर आती थीं । तो साहित्य के संस्कार विरासत में मिले । "

    बहुत ख़ामोशी से साहित्य सृजन में, विशेष रूप से कविताएँ लिखने में लगे निकष से साहित्यिक बिरादरी को अनेक आशाएँ हैं। उनकी कविताओं को पढ़कर मैं भी उन्हें अपनी शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ । 

  -स्वराज्य करुण 

Wednesday, December 10, 2025

(पुस्तक -चर्चा ) अमर शहीद वीर नारायण सिंह पर पहला उपन्यास /आलेख -स्वराज्य करुण

पुस्तक -चर्चा 

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 अमर शहीद वीर नारायण सिंह पर पहला उपन्यास ;सोनाखान 1857 

               (आलेख -स्वराज्य करुण )

वीर नारायण सिंह देश की आज़ादी के लिए संघर्ष की राह पर चलकर 168 साल पहले शहीद हो गए. उनके महान संघर्ष की याद दिलाने के लिए पहला उपन्यास लिखने वाले आशीष सिंह भी अब इस भौतिक संसार में नहीं हैं.  लगभग तीन महीने पहले 7सितम्बर 2025 को उनका निधन हो गया. आज 10 दिसम्बर को छत्तीसगढ़ के अमर शहीद वीर नारायण सिंह की पुण्य स्मृति का दिन है. आज के दिन उनकी संघर्ष -गाथा को याद करते हुए   आशीष सिंह की याद आना भी स्वाभाविक है, जिन्होंने अमर शहीद के जीवन और देश की आज़ादी के लिए उनके संघर्ष पर पहला उपन्यास लिखकर एक महत्वपूर्ण कार्य कर दिखाया.यह उपन्यास हरि ठाकुर स्मारक संस्थान, रायपुर द्वारा वर्ष 2022 में प्रकाशित किया गया था.महान योद्धा वीर नारायण सिंह और उपन्यास लेखक आशीष सिंह, दोनों को आज करबद्ध नमन.आशीष भाई के उपन्यास पर केंद्रित मेरा आलेख यहाँ प्रस्तुत है, जो 10 जुलाई 2023 को मेरे ही कुछ संशोधनों के साथ सांध्य दैनिक 'चैनल इंडिया ' में प्रकाशित हुआ था.

स्वतंत्रता हर देश का मौलिक और मानवीय अधिकार है। विशेष रूप से विगत दो शताब्दियों में दुनिया के विभिन्न देशों में स्वतंत्रता के लिए जनता के अनेक संग्राम हुए हैं। भारत भी इन संग्रामों से अछूता नहीं रहा है। इनमें से कई संग्राम ज्ञात और कई अल्पज्ञात रहे और कुछ संघर्ष गुमनामी के अंधेरे में दबकर रह गए। इन संग्रामों में अनेक वीर योद्धाओं और क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। उनमें छत्तीसगढ़ की  सोनाखान जमींदारी के वीर नारायण सिंह का नाम भी अमिट अक्षरों में दर्ज है ,जो वर्ष 1857 में अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कम्पनी की हुकूमत के ख़िलाफ़ सशस्त्र संघर्ष के नायक बनकर उभरे थे। ऐसे नायकों की गौरव गाथा पर आधारित उपन्यास  लेखन साहित्यकारों के लिए वाकई बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। आज़ादी के आंदोलन में छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद क्रांतिवीर नारायण सिंह के संघर्षों पर आधारित '1857 ;सोनाखान' शीर्षक 144 पृष्ठों की यह पुस्तक उनके समय के छत्तीसगढ़ की सामाजिक -आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का भी सजीव वर्णन करता है। प्रजा हितैषी नारायण सिंह को अपनी अकाल पीड़ित जनता के लिए एक जमाखोर व्यापारी के गोदाम से अनाज निकलवाने और पीड़ितों में वितरित करने के आरोप में कम्पनी सरकार की ओर से राजद्रोह के  मुकदमे का नाटक रचकर 10 दिसम्बर 1857 को रायपुर स्थित सैन्य छावनी में फाँसी पर लटका दिया गया था। 

           

                                        

 

भीषण अकाल के दौर में उपजा विद्रोह 

  दरअसल अंग्रेजों के खिलाफ सोनाखान के नारायण सिंह का  विद्रोह वर्ष 1856 में छत्तीसगढ़ में पड़े भीषण अकाल के दौर में उस वक्त हुआ ,जब प्रजा -वत्सल नारायण सिंह ने मदद के लिए रायपुर स्थित डिप्टी कमिश्नर इलियट को ख़बर भेजी ,लेकिन वहाँ से उन्हें कोई मदद नहीं मिली। तब  नारायण सिंह ने खरौद के एक जमाखोर व्यापारी माखन को उसके  गोदामों में भरे अनाज को सोनाखान जमींदारी की  अकाल पीड़ित जनता के लिए बाँटने को कहा। नारायण सिंह यह अनाज  मुफ़्त में नहीं बल्कि बाढ़ी में यानी मूल धन से डेढ़ गुना ज्यादा कीमत पर उधार में लेने को तैयार थे । वे चाहते थे कि नई फसल के आने पर सोनाखान जमींदारी की ओर से उन्हें उधार लिया गया अनाज बाढ़ी के रूप में लौटा दिया जाएगा।इसके लिए उन्होंने कुछ अन्य व्यापारियों को भी चिट्ठी भिजवाई थी।उनमें से कुछ ने उन्हें मदद का आश्वासन दिया लेकिन खरौद का जमाखोर व्यापारी  माखन इनकार करता रहा। तब नारायण सिंह ने अपने सैनिकों के साथ उसके गोदामों से अनाज निकलवाकर भूख से बेहाल जनता में वितरित करवा दिया । उन्होंने उसे भरोसा भी दिया कि और बाकायदा इसकी लिखित सूचना सम्पूर्ण हिसाब के साथ रायपुर स्थित कम्पनी सरकार के डिप्टी कमिश्नर को भी भेजी। इस बीच माखन ने रोते -कलपते रायपुर पहुँचकर इलियट से नारायण सिंह की शिकायत कर दी। इलियट ने इसे डकैती मान लिया और नारायण सिंह के विरुद्ध कार्रवाई की योजना बनाने लगा। अतंतःएक सैन्य संघर्ष के बाद  नारायण सिंह ने  अंग्रेज अधिकारियों के सामने स्वयं को प्रस्तुत कर दिया था। 

         इस पर  तो फ़िल्म भी बन सकती है  

पुस्तक की विषय -वस्तु ,पृष्ठभूमि , पात्रों के परस्पर संवाद और घटनाओं की  वर्णन शैली को देखते हुए इसे उपन्यास कहना मेरे विचार से  उचित होगा। इस पर तो हिन्दी और छत्तीसगढ़ी मिश्रित भाषा में एक अच्छी देशभक्तिपूर्ण फ़िल्म बन सकती है । इसका नाट्य रूपान्तर करके मंचन भी हो सकता है। इस पुस्तक के  लेखक हैं राजधानी रायपुर निवासी वरिष्ठ पत्रकार आशीष सिंह। मेरी जानकारी के अनुसार पत्रकार होने के नाते आशीष के  लेखन में घटनाओं का  धाराप्रवाह वर्णन मिलता है। विश्लेषण और  वर्णन की उनकी  क्षमता गज़ब की होती है। उन्होंने अब तक न तो कहानियाँ लिखीं और न ही कविताएँ और उपन्यास तो कभी नहीं लिखा । इसके बावज़ूद  उनके भीतर दबा -छिपा एक देशभक्त और भावुक उपन्यासकार  इस कृति के माध्यम से हमारे सामने आया है। 

               शहादत पर पहला उपन्यास 

   जहाँ तक मुझे जानकारी है ,वीर नारायण सिंह के संघर्ष और उनकी  शहादत पर ऐसा कोई उपन्यास अब तक नहीं लिखा गया था। मेरा मानना है कि इस लिहाज से यह उनकी जीवन-गाथा पर आधारित पहला उपन्यास है। यह आशीष सिंह की एक बड़ी उपलब्धि है। आशीष को साहित्यिक प्रतिभा आशीष के रूप में विरासत में मिली है।  उनके पिता हरि ठाकुर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी , गोवा मुक्ति आंदोलन के कर्मठ सिपाही , छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण  आंदोलन के लिए गठित सर्वदलीय मंच के संयोजक तथा हिन्दी और छत्तीसगढ़ी के सुप्रसिद्ध कवि थे।  उन्होंने 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' शीर्षक से एक विशाल ग्रंथ भी लिखा , जिसमें छत्तीसगढ़ के इतिहास और यहाँ की महान विभूतियों के जीवन पर आधारित उनके कई आलेख शामिल हैं।  हरि ठाकुर के पिता जी  यानी आशीष सिंह के दादा जी ठाकुर प्यारेलाल सिंह अपने समय के एक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ,श्रमिक नेता और सहकारिता आंदोलन के प्रमुख स्तंभ थे। उन्होंने वर्ष 1950 के दशक में रायपुर से अर्ध साप्ताहिक 'राष्ट्र-बन्धु' का सम्पादन और प्रकाशन प्रारंभ किया था। ठाकुर प्यारेलाल सिंह 'त्यागमूर्ति' के नाम से भी लोकप्रिय हुए। वे तत्कालीन मध्यप्रान्त की नागपुर विधान सभा में विधायक और नेता प्रतिपक्ष भी रह चुके थे। उन्हें तीन बार रायपुर नगरपालिका अध्यक्ष भी निर्वाचित किया गया था। 

              आशीष सिंह का लेखकीय परिचय 

    इस प्रकार आशीष सिंह विरासत में मिली लेखकीय परम्परा को अपनी सृजनात्मक प्रतिभा के जरिए लगातार आगे बढ़ा रहे हैं।उनकी अनेक पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। चौबीस जनवरी 1963 को जन्में आशीष सिंह  लगभग तीन दशकों से राजधानी रायपुर में पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं।   उनका लेखन मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ की उन महान विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित रहा है ,जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपना भरपूर योगदान दिया था।  आशीष ने उन पर आधारित कई बड़े-बड़े ग्रंथों का सम्पादन भी किया है ,जिनमें स्वर्गीय हरि ठाकुर के शोधपरक आलेखों और निबंधों का संकलन 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' और स्वर्गीय पण्डित रामदयाल तिवारी का विशाल ग्रंथ 'गांधी-मीमांसा' भी शामिल है। इसके अलावा तीन खंडों में प्रकाशित ठाकुर प्यारेलाल सिंह समग्र 'भी शामिल  है। आशीष सिंह ने सम्पादन के अलावा कुछ पुस्तकें अलग से भी लिखी हैं । उनकी प्रकाशित पुस्तकों में महात्मा गांधी की छत्तीसगढ़ यात्रा पर आधारित ' बापू और छत्तीसगढ़' , वरिष्ठ पत्रकार सनत चतुर्वेदी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित 'अर्ध विराम ', छत्तीसगढ़ में वर्ष 1952 से 2014 तक हुए विधान सभा चुनावों का का लेखा-जोखा 'जनादेश' और  छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानियों का हिन्दी, छत्तीसगढ़ी और अंग्रेजी में प्रकाशित जीवन-परिचय और उनका छत्तीसगढ़ी नाट्य रूपांतर  'हमर सुराजी ' आदि भी उल्लेखनीय है। 

     हिन्दी -छत्तीसगढ़ी मिश्रित प्रवाह पूर्ण भाषा 

  अंग्रेजों के ख़िलाफ़ सोनाखान के अमर शहीद वीर नारायण सिंह के संघर्षों को ऐतिहासिक तथ्यों और तारीखों का साथ औपन्यासिक कथा वस्तु की शक्ल देकर आशीष सिंह ने सचमुच एक बड़ा महत्वपूर्ण कार्य किया है। इस पुस्तक में हिन्दी और छत्तीसगढ़ी मिश्रित उनकी भाषा -शैली वाकई बहुत प्रवाहपूर्ण है । भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम और आज़ादी के योद्धाओं के बलिदानों की कहानियों में जिन्हें सचमुच दिलचस्पी है ,ऐसे देशभक्त पाठकों को इस पुस्तक में वर्णित घटनाएँ अंत तक सम्मोहित करके रखती हैं। हर घटना उत्सुकता जगाती है कि आगे क्या हुआ होगा ? किसी भी ऐतिहासिक उपन्यास में घटनाएँ भले ही वास्तविक हों ,लेकिन उन्हें सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने के लिए काल्पनिकता का भी सहारा लेना पड़ता है। इसे देखते हुए कई प्रसंगों में आशीष सिंह ने कल्पनाओं के कैनवास पर शब्दों के रंगों से  इस उपन्यास को सुसज्जित किया है। उन्होंने अपनी यह पुस्तक भारत की आज़ादी के अमृत महोत्सव को और अपने पिता स्वर्गीय हरि ठाकुर को समर्पित की है। यह पुस्तक हरि ठाकुर स्मारक संस्थान ,रायपुर द्वारा प्रकाशित की गयी है।

     लेखक ने  अपनी  इस औपन्यासिक कृति में वीर नारायण सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व में व्याप्त मानवीय संवेदनशीलता को बख़ूबी उभारा है। वे न सिर्फ़ अपनी प्रजा के हर सुख -दुःख का ख़्याल रखते हैं ,बल्कि अपने पशुओं को भी भरपूर स्नेह देते हुए अपने कर्मचारियों के साथ  स्वयं उनकी देखभाल भी करते हैं।  अक्ति यानी अक्षय तृतीया के दिन किसानों के साथ खेतों में बीज बोने के अनुष्ठान में भी शामिल होते हैं। उस दिन वे ग्रामीण परिवारों में होने वाले वैवाहिक समारोहों में भी हिस्सा लेते हैं।वीर नारायण सिंह के  परिवार के सोनाखान की जनता के साथ आत्मीय जुड़ाव को इस औपन्यासिक कृति में बड़ी रोचकता से उभारा गया है। लोक कल्याणकारी ज़मींदार का रहन -सहन आम किसानों जैसा है। उनकी मिट्टी की हवेली का वर्णन भी प्रभावित करता है। 

    उपन्यास में नाटक के तत्वों का प्रयोग 

  पुस्तक की भूमिका छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार और सेवानिवृत्त आई.ए. एस. अधिकारी डॉ. सुशील त्रिवेदी ने लिखी है। उनका कहना है -"आशीष सिंह ने अपनी इस औपन्यासिक कृति में नाटक के तत्वों का प्रयोग कर राष्ट्रीय चेतना को उत्प्रेरित किया  है। उन्होंने अपनी कथा -वस्तु में 1856 और 1857 में सोनाखान और रायपुर से लेकर सम्बलपुर तक चल रही विद्रोह की घटनाओं को एक श्रृंखला में पिरोया है।अलग -अलग घटनाओं के बीच के सम्पर्क शून्य को उन्होंने अपनी साहित्यिक कल्पनाशीलता से भरा है।इस शून्य को भरते हुए आशीष सिंह छत्तीसगढ़ी जीवनशैली को पूरी यथार्थता में उभारते हैं।"

पुस्तक में नवीन रचनाधर्मिता 

   वहीं पुस्तक के आमुख में राज्य के जाने-माने इतिहासकार और श्री शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी भिलाई के कुलपति प्रोफेसर लक्ष्मीशंकर निगम लिखते हैं --" आशीष की इस पुस्तक में एक नवीन रचनाधर्मिता देखने को मिलती है।यह रचना मूलतः नाटक शैली में , छत्तीसगढ़ी में है ,तथापि बीच -बीच में अन्य भाषा-भाषी पात्रों के उपस्थित होने पर  हिन्दी का भी प्रयोग आवश्यकता अनुसार किया गया है।इस रचना के माध्यम से लेखक ने छत्तीसगढ़ के इतिहास ,संस्कृति और लोक व्यवहार का एक विहंगम दृश्य प्रस्तुत किया है और ऐसा करने के लिए ऐतिहासिक पात्रों का समावेश करने के साथ ही अन्य काल्पनिक पात्रों को भी गढ़ा है ,लेकिन ये काल्पनिक पात्र इतिहास से प्रतिद्वंद्विता नहीं करते , बल्कि उसके पूरक रूप में हैं।" पुस्तक में वीर नारायण सिंह की धर्मपत्नी ,उनके सुपुत्र गोविन्द सिंह और कई देशभक्त ग्रामीणों की बातचीत को भी बड़ी भावुकता से प्रस्तुत किया गया है। नारायण सिंह के आत्मीय सहयोगी के रूप में सम्बलपुर रियासत के वीर सुरेंद्र साय और उनके कुछ साथियों के कठिन संघर्षों का  भी इसमें उल्लेख है।

नारायण सिंह में देशभक्ति और मानवीय संवेदनशीलता

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 नारायण सिंह को रायपुर में डिप्टी कमिश्नर इलियट के सामने मुकदमे के लिए पेश करने पर उसके सवालों का जवाब देते हुए वे कहते हैं -

 "मैंने आग्रहपूर्वक माखन से अनाज की मांग की थी।अन्य व्यापारियों ने तो मुझे यथा शक्ति मदद की ,मगर माखन ने अनाज न होने का बहाना बनाया।मैंने जाँच की तो ज्ञात हुआ कि उसके गोदामों में अनाज भरा है।अकाल की इस विपत्ति में वह जमाखोरी कर ऊँचे भाव में अनाज बेच रहा है।भूख से बिलबिला रहे  लोगों  के बर्तन ,आभूषण ,पशु और खेत गिरवी रख रहा है।क्या यह अन्याय नहीं है?क्या यह अपराध नहीं है ? मुकदमा तो उस पर चलना चाहिए।सारी स्थिति का ब्यौरा हमने तुम्हें भेजा था , पर तुमने अकाल की विभीषिका से जनता को बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया।यह तो कम्पनी का दायित्व था ।दोषी तो तुम भी हो।" नारायण सिंह इलियट के एक प्रश्न के उत्तर में माखन के गोदाम से अनाज लूटने के आरोप को ख़ारिज करते हुए कहते हैं -"माखन के गोदाम से ज़रूरत के मुताबिक ही अनाज लिया गया है।वह भी बाढ़ी में। मैंने उससे करारनामा में हस्ताक्षर करवाया है।कि अगली फसल आने के बाद लिए गए अनाज का डेढ़ गुना लौटा दिया जाएगा। करारनामा की नकल तुम्हें भी भेजी गई है।" इलियट पूछता है -क्या किसी की मर्जी के बिना ऐसा किया जा सकता है? इस पर नारायण सिंह कहते हैं -- जब हजारों जन भूख से तड़प रहे हों ,तो किसी जमाखोर व्यापारी की मर्जी का कोई मतलब नहीं । मैंने अपनी प्रजा की प्राण -रक्षा के लिए अनाज लिया है।न्याय तो तब होगा ,जब तुम माखन के गोदाम का सारा अनाज जब्त करो और भूखों मर रही जनता में बाँट दो। " लेकिन मुकदमे और न्याय का नाटक कर रहे कम्पनी सरकार के अंग्रेज अफ़सर पर वीर नारायण सिंह की इन दलीलों का कोई असर नहीं हुआ ।उन्हें जेल में बंद रखा गया । 

इसके बावजूद अपने देशभक्त जेल कर्मचारियों की मदद से  नारायण सिंह 28 अगस्त 1857 को वार्ड की दीवार पर बनाए गए एक बड़े छेद से निकलकर सोनाखान पहुँच गए। लेकिन दो दिसम्बर 1857 को अंग्रेज कैप्टन स्मिथ और नेपियर की फौज के साथ हुए युद्ध में नारायण सिंह ने विवश होकर स्वयं को अंग्रेजों के सामने प्रस्तुत कर दिया। 

   कैप्टन स्मिथ की  फौज ने 

   सोनाखान को राख में तब्दील कर दिया था 

  इस बीच एक दिसम्बर की रात कैप्टन स्मिथ ने अपनी फौज से सोनाखान की निर्जन बस्ती में आग लगवा दी और गाँव को राख में तब्दील कर दिया।उसने देवरी के जमींदार महाराज साय से कहा -लो ,महाराज साय अपना इनाम। ये रहा सोनाखान।अब तुम हो सोनाखान के जमींदार। " गिरफ़्तार हुए नारायण सिंह पर अंग्रेज हुकूमत की ओर से रायपुर में डिप्टी कमिश्नर इलियट की अदालत में फिर एक बार मुकदमे का नाटक हुआ।स्मिथ  उनसे कहता है -" व्यापारी के गोदाम से अनाज लूटने के आरोप में तुम्हे गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया जा रहा था।ट्रायल के दौरान तुम जेल से फरार हो गए और 500 लोगों की सेना तैयार कर ली।जब तुम्हें गिरफ्तार करने पलटन पहुँची ,तो तुमने उस पर आक्रमण कर दिया।कम्पनी सरकार ने तुम्हारी इन हरकतों को राजद्रोह करार दिया है। "इलियट उनसे पूछता है -तुम्हें अपनी सफाई में कुछ कहना है? 

   विदेशियों की इस अदालत को मैं मान्य नहीं करता 

 इस पर वीर नारायण सिंह का जवाब था - "पहली बात तो यह कि तुम विदेशियों की इस अदालत को मैं मान्य नहीं करता।"स्मिथ फिर बोला-यह कोर्ट की तौहीन है।तुम्हें अदालत का सम्मान करना होगा।" नारायण सिंह ने उसे जवाब दिया -"तुम फिरंगी हमारे देश में व्यापार करने आए थे न?लूट-खसोट और फूट डालकर राज्यों और जमींदारियों पर अवैध कब्जा जमा रहे हो ।तुम किस आधार पर मुझे देशद्रोही करार देते हो? क्या यह देश तुम्हारा है ? रहा सवाल सम्मान का ,तो वह हम तुम्हें अवश्य देते ,यदि तुम्हारा आचरण अतिथि जैसा होता। ये देश तुम्हारा नहीं ,हमारा है।हम तुम्हें राजा नहीं मानते तो राजद्रोह का प्रश्न ही उपस्थित नह होता।" अंततः उनकी  देशभक्तिपूर्ण सभी दलीलों को अमान्य करते हुए   इलियट की अदालत ने नारायण सिंह को फाँसी की सजा सुना दी।

      अंतिम इच्छा ;फिरंगी मेरा देश छोड़कर चले जाएँ 

 इलियट ने 10 दिसम्बर 1857 को सुबह फाँसी देने के पहले वीर नारायण सिंह से पूछा -माफी के अलावा तुम्हारी कोई इच्छा है,तो कह सकते हो।इस पर नारायण सिंह बोले -मेरे सिर पर पड़ा यह चोंगा उतार दिया जाए,ताकि मैं अपनी धरती और अपनी मातृभूमि के अंतिम दर्शन कर सकूं।इलियट ने फिर पूछा -और कोई इच्छा ? नारायण सिंह ने कहा -मेरी अंतिम इच्छा है कि फिरंगी मेरा देश छोड़कर चले जाएँ । आखिर अंग्रेजों ने नारायण सिंह को फाँसी पर लटका दिया।वीर नारायण सिंह अपनी प्रजा और अपने देश के लिए शहीद हो गए।

        छिपा हुआ साम्राज्यवादी एजेंडा लेकर 

            आयी थी ईस्ट इंडिया कम्पनी 

     हमारे देश को गुलाम बनाना भले ही अंग्रेजों का  दूरगामी और छिपा हुआ साम्राज्यवादी  एजेंडा रहा होगा , लेकिन इसमें दो राय नहीं कि वे  सबसे पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी बनाकर इस महादेश में व्यापार करने आए थे। उन्होंने  अपनी कपट नीति और कूटनीति से भारत में कारोबार का ऐसा मायाजाल फैलाया कि उस ज़माने की छोटी -बड़ी अधिकांश  रियासतों के राजे -महाराजे उसमें उलझ कर अंग्रेजों की इस 'कम्पनी सरकार' के सामने नतमस्तक होते चले गए। तत्कालीन युग का विशाल अखण्ड भारत अंग्रेजों का गुलाम बन गया। भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए देश के विभिन्न इलाकों में वर्षों तक रह-रहकर कई स्थानीय और व्यापक विद्रोह भी हुए ।झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के वर्ष 1857 की महान संघर्ष गाथा इतिहास में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के रूप में दर्ज है। इस विद्रोह के बाद इंग्लैंड की हुकूमत ने भारत का शासन और प्रशासन ईस्ट इंडिया कम्पनी से अपने हाथों में ले लिया। 

          परलकोट के गैंद सिंह की शहादत 

   वैसे नारायण सिंह की शहादत के 32 साल   पहले छत्तीसगढ़ अंचल में भी अंग्रेजों की 'कम्पनी सरकार 'के ख़िलाफ़ संघर्ष का वीरतापूर्ण इतिहास मिलता है ,जिसमें परलकोट यानी वर्तमान बस्तर राजस्व संभाग के कांकेर जिले में पखांजूर का इलाका भी इसका साक्षी रहा है ,जहाँ वर्ष 1825 में परलकोट के जमींदार गैंद सिंह को अंग्रेजों ने उनके महल के सामने 20 जनवरी को फाँसी पर लटका दिया था। सोनाखान के नारायण सिंह की शहादत 10 दिसम्बर 1857 को हुई।

     आज़ादी मिलने के दस साल बाद 

    शहीद घोषित हुए वीर नारायण सिंह 

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असंख्य वीरों के  महान संघर्षों से देश को 15 अगस्त 1947 को आज़ादी मिली और उसके लगभग 10 साल बाद 1957 में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शताब्दी वर्ष के दौरान तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने सोनाखान के  नारायण सिंह को छत्तीसगढ़ का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और पहला शहीद घोषित किया । यानी पूरे सौ साल बाद उन्हें यह सम्मान मिला  वरिष्ठ साहित्यकार और इतिहासकार हरि ठाकुर ने नारायण सिंह के बलिदान पर एक आलेख भी लिखा था ,जिसके छपने के बाद तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने इसका संज्ञान लिया और  बलौदाबाजार के तत्कालीन तहसीलदार से जाँच प्रतिवेदन मंगवाया । नारायण सिंह को शहीद और स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा हरि ठाकुर के इसी आलेख के आधार पर दिया गया। 

      हरि ठाकुर ने दिया 'वीर 'विशेषण 

      हरि ठाकुर के सुपुत्र और उपन्यास के लेखक आशीष सिंह ने पुस्तक की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए प्रारंभिक पन्नों में इस प्रसंग का उल्लेख किया है। उन्होंने यह भी लिखा है कि नारायण सिंह को 'वीर' विशेषण मेरे पिता (हरि ठाकुर) के द्वारा दिया गया था ,जो अब नारायण सिंह के साथ अटूट रूप से जुड़ गया है।

    रायपुर की सैन्य छावनी में हुए 17 शहीद 

 दिसम्बर 1857 में  वीर नारायण सिंह की शहादत के बाद जनवरी 1858 में रायपुर की सैन्य छावनी में अंग्रेज अफसरों के ख़िलाफ़ मैग्जीन लश्कर हनुमान सिंह के नेतृत्व में एक सैन्य विद्रोह भड़क उठा था,जिसमें हनुमान सिंह ने तीसरे नियमित रेजिमेंट के सार्जेंट मेजर सिंडवेल की उसके बंगले में घुसकर तलवार से हत्या कर दी थी। हनुमान सिंह अंग्रेजो के शस्त्रागार को कब्जे में लेना चाहते थे ,लेकिन उनका और उनके साथियों का यह विद्रोह विफल हो गया। इस घटना के बाद हनुमान सिंह अज्ञातवास में चले गए और उनका कोई पता नहीं चला ।लेकिन उनके 17 साथियों को पकड़ लिया गया ,जिन्हें 22 जनवरी 1858 को फाँसी पर लटका दिया गया। यह उपन्यास वर्ष 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौर में छत्तीसगढ़ में घटित ऐसी कई भूली -बिसरी  घटनाओं की  याद दिलाता है ।

-स्वराज्य करुण 

Sunday, December 7, 2025

(स्मृति शेष ) तपस्वी साहित्यकार और पत्रकार पण्डित श्यामलाल चतुर्वेदी / आलेख -स्वराज्य करुण

 तपस्वी साहित्यकार और पत्रकार पण्डित श्यामलाल चतुर्वेदी 

  ( आलेख : स्वराज्य करुण )

पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित पण्डित श्याम लाल चतुर्वेदी  ने  लगभग 92 साल की अपनी जीवन -यात्रा में 77साल साहित्य को और 70 साल पत्रकारिता को समर्पित कर दिए । चतुर्वेदी जी ने साहित्य और पत्रकारिता को एक तपस्वी की तरह जिया ।चतुर्वेदी जी छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के प्रथम अध्यक्ष भी रहे ।छत्तीसगढ़ी और हिंदी ,दोनों ही भाषाओं में उन्होंने ख़ूब लिखा। 

वे  एक ऐसे साहित्यकार और पत्रकार थे, जिनके व्यक्तित्व में  छत्तीसगढ़ के सहज -सरल किसान की छवि झलकती थी ,वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन किसानों और मज़दूरों की भावनाओं से जुड़ी अपनी कविताओं और ग्राम्य जीवन से जुड़ी अपनी कहानियों में हमेशा हमारे साथ हैं । छत्तीसगढ़ी एक मीठी भाषा है,जिसकी मधुरता उनकी वाणी में हमेशा महसूस की जा सकती थी । छत्तीसगढ़ का बिलासपुर उनका गृहनगर था, जहाँ नगर निगम ने एक प्रमुख रास्ते का नामकरण उनके नाम पर किया है, जो साहित्यकार और पत्रकार के रूप में पण्डित जी की लोकप्रियता का प्रतीक है । 

   हमें अपने उन पूर्वज साहित्यकारों और पत्रकारों को उनके जन्म दिवस या उनकी पुण्यतिथि पर याद करके उनके प्रति नतमस्तक होना  चाहिए , जिनका हृदय  आजीवन  देश ,दुनिया और मानव समाज की भलाई के लिए धड़कता रहा, जिन्होंने कलम को औजार बनाकर समाज को अपनी रचनाओं के अनमोल रत्नों से समृद्ध किया ,जिन्होंने साहित्य और पत्रकारिता को तपस्वियों की तरह जिया।   चतुर्वेदी जी की सातवीं पुण्यतिथि पर 7 दिसम्बर 2025 को उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी जीवन यात्रा के अनेक महत्वपूर्ण प्रसंग याद आ रहे हैं। सहजता ,सरलता और सौम्यता  , कृषक पृष्ठभूमि के साहित्यकार पण्डित चतुर्वेदी जी के व्यक्तित्व की  सबसे बड़ी पहचान थी ।  

छत्तीसगढ़ ही नहीं ,बल्कि तत्कालीन अविभाजित मध्यप्रदेश के साहित्यकारों और पत्रकारों के बीच भी वे काफी लोकप्रिय थे।छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें वर्ष 2008 में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का अध्यक्ष मनोनीत किया था ।  वे  इस आयोग के प्रथम अध्यक्ष थे । एक  समर्पित साहित्य साधक और छत्तीसगढ़ी भाषा के कवि के रूप में पण्डित श्यामलाल चतुर्वेदी को  राज्य के सभी क्षेत्रों में भरपूर लोकप्रियता मिली । 


                                    

भारत सरकार द्वारा उन्हें 2 अप्रैल 2018 को नई दिल्ली में पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया गया था।  राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में तत्कालीन  राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें देश के इस प्रतिष्ठित अलंकरण से नवाज़ा था ।  पण्डित चतुर्वेदी जी  को साहित्य के क्षेत्र में उनके सुदीर्घ और महत्वपूर्ण योगदान के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने वर्ष 2004 में पण्डित सुन्दरलाल शर्मा राज्य अलंकरण से सम्मानित किया था। राज्योत्सव 2004 के अवसर पर मुख्य अतिथि पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के हाथों  यह सम्मान पण्डित श्यामलाल चतुर्वेदी  और स्वर्गीय लाला जगदलपुरी को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया था।      

कोटमी से शुरु हुआ ज़िन्दगी का सफ़र

 पण्डित श्यामलाल चतुर्वेदी का जन्म फाल्गुन शुक्ल अष्टमी के दिन ,2 फरवरी 1926 को छत्तीसगढ़ के ग्राम कोटमी (वर्तमान जिला -जांजगीर ) में हुआ था। उनका देहावसान 7 दिसम्बर 2018 को अपने  गृहनगर बिलासपुर में हुआ। 

 पाँचवीं से एम. ए. तक  प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में उत्तीर्ण हुए 

  वह 8 वर्ष की उम्र में चौथी कक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए ,लेकिन कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों में आगे की पढ़ाई रुक गयी ।इसके बावज़ूद उन्होंने पाँचवीं कक्षा से लेकर एम.ए. तक की प्रत्येक परीक्षा में  स्वाध्यायी छात्र के रूप में उत्तीर्ण  होकर एक नया कीर्तिमान बनाया। वर्ष 1941 में प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में अकलतरा के मिडिल स्कूल से सर्वाधिक अंकों के साथ  पाँचवीं उत्तीर्ण हुए। प्राइवेट छात्र के रूप में ही वर्ष 1956 में बनारस से मेट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की ।इस परीक्षा में उन्होंने  संगीत विषय में प्रावीण्यता  हासिल की। पण्डित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर से वर्ष 1968 में बी.ए. और वर्ष 1976 में हिन्दी साहित्य में  एम. ए. पास हुए । स्नातक और स्नातकोत्तर की दोनों डिग्रियाँ भी चतुर्वेदी जी ने स्वाध्यायी छात्र के रूप में हासिल की ।  बी.ए. की परीक्षा देते समय वह लगभग 42 वर्ष के थे ,जबकि  एम.ए.की परीक्षा के समय उनकी उम्र 50 वर्ष के आस-पास थी ।   

    एम. ए. की परीक्षा में 

     अपनी ही कविताओं पर आए   

    सवालों का लिखा जवाब

         चतुर्वेदी जी  एम.ए.की परीक्षा का अपना एक दिलचस्प अनुभव कभी -कभार कोई प्रसंग आने पर मुझे  अक्सर सुनाया करते थे । हुआ यह कि  इस परीक्षा के लिए स्वैच्छिक विषय के अंतर्गत छत्तीसगढ़ी के पाठ्यक्रम में स्वयं चतुर्वेदी जी की कुछ कविताएँ भी शामिल थीं और परीक्षा  के प्रश्नपत्र में उनकी इन रचनाओं से जुड़े कुछ सवाल भी किए गए थे। परीक्षार्थी के रूप में  अपनी कविताओं के बारे में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर लिखना उनके लिए एक रोचक अनुभव रहा। देश के किसी भी साहित्यकार के जीवन में ऐसा संयोग बहुत कम देखने में आता है। 

  *वर्ष 1941 से शुरु हुआ था साहित्य सृजन*

   चतुर्वेदी जी का साहित्य सृजन वर्ष 1941 से शुरू हुआ था। वर्ष 1949 में पहली बार आकाशवाणी के नागपुर केंद्र से उनकी छत्तीसगढ़ी कविताओं का प्रसारण हुआ।वर्ष 1963 में जब रायपुर में आकाशवाणी केन्द्र की स्थापना हुई , उनकी रचनाएँ वहाँ से भी नियमित अंतराल पर प्रसारित होने लगी । रायपुर के अलावा भोपाल और बिलासपुर के आकाशवाणी केन्द्रों  से और दूरदर्शन के रायपुर और भोपाल केन्द्रों से  भी समय -समय पर उनके काव्य पाठ  का प्रसारण हुआ। दिल्ली दूरदर्शन केन्द्र ने  उनके छत्तीसगढ़ी  कहानी -पाठ का प्रसारण किया । 

           प्रकाशित पुस्तकें 

 पण्डित श्याम लाल चतुर्वेदी जी की प्रकाशित पुस्तकों में छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह 'भोलवा भोलाराम बनिस ' और कविता संग्रह 'पर्रा भर लाई ' शामिल है । कविता -संग्रह 'पर्रा भर लाई 'में उनकी वर्ष 1949 से 1965 के बीच लिखी गयी छत्तीसगढ़ी कविताएँ शामिल हैं। इसमें उन्होंने 'बेटी के विदा ','आइस जब बादर करिया', 'धरती रानी हरियागे' सहित अपनी 20 लोकप्रियता रचनाओं को शामिल किया है। भारतेन्दु साहित्य समिति ,बिलासपुर ने अपनी स्वर्ण जयंती के अवसर पर वर्ष 1985 में इस कविता -संग्रह का पहला संस्करण प्रकाशित किया था। समिति ने वर्ष 2000 में तीसरा संस्करण भी प्रकाशित किया।  

  पत्रकारिता में 70 वर्षों का योगदान

  पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उनका लगभग 70 वर्षों का सुदीर्घ योगदान रहा। अपने संस्मरणों को साझा करते हुए वह अक्सर बताया करते थे - वर्ष 1955 तक महज़ पांचवीं पास थे ,लेकिन पत्रकार के रूप में भी पहचाने जाते थे । वर्ष 1948 से ही वह पत्रकारिता में सक्रिय हो गए थे । सबसे पहले 'कर्मवीर ' और  साप्ताहिक 'महाकोशल' के संवाददाता रहे।  बाद के वर्षों में उन्होंने अपने गृहनगर बिलासपुर में नागपुर के दैनिक नवभारत ,लोकमत और युगधर्म , कलकत्ता के दैनिक नवभारत टाइम्स ,दिल्ली के दैनिक जनसत्ता और इन्दौर के दैनिक नईदुनिया  के   पत्रकार के रूप में भी लम्बे समय तक अपनी सेवाएँ दी। ग्रामीण पत्रकारिता में उनकी विशेष दिलचस्पी थी ।उन्होंने  वर्ष 1952 से लगातार कई वर्षों तक राष्ट्रीय समाचार एजेंसी ' हिन्दुस्थान समाचार ' के बिलासपुर जिला प्रतिनिधि  के रूप में भी पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना योगदान दिया  । 

ग्राम पंचायत के सरपंच भी रहे                         

    पण्डित श्यामलाल चतुर्वेदी वर्ष 1967 से 1972 तक अपनी ग्राम पंचायत कोटमी सुनार के निर्विरोध निर्वाचित सरपंच भी रहे । उन्होंने सरपंच के रूप में गाँव में मद्य निषेध ,स्वच्छता ,साक्षरता और शिक्षा के क्षेत्र में बहुत कुछ करने का प्रयास किया । उनके नेतृत्व में ग्राम पंचायत कोटमी सुनार को   तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने महात्मा गांधी जन्म शताब्दी वर्ष 1969 में बिलासपुर जिले की सर्वश्रेष्ठ ग्राम पंचायत का पुरस्कार से सम्मानित किया था । चतुर्वेदी जी छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के उपाध्यक्ष भी रहे। वे अपने गृहनगर बिलासपुर की भारतेन्दु साहित्य समिति सहित अनेक साहित्यिक ,सांस्कृतिक और सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए थे

  मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूँ कि  उनके जैसे साहित्य मनीषी के साथ  मेरा भी लगभग तीन  दशकों का लम्बा सम्पर्क रहा । इस आलेख में उनके साथ बिलासपुर में उनके घर 22 नवम्बर 2015 की अपनी मुलाकात की एक तस्वीर भी मैं साझा कर रहा हूँ । सरकारी नौकरी के दौरान जहाँ कहीं भी मेरी पदस्थापना रही , वहाँ लगभग हर साल किसी न  किसी कार्यक्रम में  एक -दो बार उनका आगमन होता ही रहता था। रायगढ़ में महाराजा चक्रधर सिंह की स्मृति में होने वाले नृत्य और संगीत के अखिल भारतीय आयोजन चक्रधर समारोह में भी वह हर साल आते ही थे । सरकारी गेस्ट हाउस को छोड़कर उन्हें मेरे घर पर ही रुकना अच्छा लगता था । वे कहते थे - "मुझे तुम्हारे यहाँ घर जैसी आत्मीयता मिलती है। किसी सरकारी रेस्ट हाउस में ऐसा अपनत्व कहाँ?"मेरी खुशकिस्मती थी कि मुझे अपने घर में   उनके आतिथ्य सत्कार का अवसर मिलता था ।   मेरे दोनों बच्चों के वह प्रिय 'दादाजी' हुआ करते थे । ठण्ड के मौसम में उनके आगमन पर मेरी पत्नी सुप्रिया उनके नहाने के लिए मिट्टी के चूल्हे को फूँकनी से सुलगाकर पानी गरम करके देती थी  वह उन्हें अपनी बेटी जैसा स्नेह और आशीर्वाद  दिया करते थे । मेरा पुत्र विक्की तीन - चार साल का था । वह तखत पर लेटे अपने दादाजी के पैर दबाया करता था ।

     चतुर्वेदी जी अब हमारे बीच नहीं हैं ,लेकिन जब कभी और जहाँ कहीं भी हिन्दी और छत्तीसगढ़ी साहित्य और आंचलिक  पत्रकारिता पर कोई औपचारिक या अनौपचारिक चर्चा होती है या कोई आयोजन होता है ,वहाँ मौज़ूद  हर व्यक्ति की यादों में  वह  अनायास चले आते हैं।

   आलेख  - स्वराज्य करुण 

Saturday, December 6, 2025

(पुस्तक -चर्चा) सुरता के संसार :यादों की दुनिया में छत्तीसगढ़ी रत्नों का अनमोल खज़ाना/ आलेख -स्वराज्य करुण

 सुरता के संसार :यादों की दुनिया में छत्तीसगढ़ी रत्नों का अनमोल खज़ाना

(आलेख - स्वराज्य करुण ) 

साहित्य की दुनिया में संस्मरण लेखन एक रोचक विधा है ,जिसमें लेखक अपनी यादों की दुनिया में घूमते हुए, अपने अनुभवों के माध्यम से माध्यम से पाठकों को ज्ञान और विचारों का अनमोल खज़ाना सौंपने की कोशिश करते हैं।हर इंसान की  जीवन यात्रा में उतार -चढ़ाव के साथ कई तरह के पड़ाव आते -जाते हैं ,जिनमें अच्छे लोगों से मुलाकात और अच्छी संस्थाओं से जुड़े कई यादगार प्रसंग भी होते हैं। संस्मरण लेखन एक ऐसी विधा है ,जिसमें लेखक अपनी स्मृतियों के साथ अपने विचार भी पाठकों से साझा करते हुए आगे बढ़ता है। यात्रा वृत्तांत भी यादों का एक दिलचस्प दस्तावेज होता है। छत्तीसगढ़ी साहित्य में संस्मरण लेखन की विधा को आगे बढ़ाने वाले गिने-चुने रचनाकारों में सुशील भोले भी शामिल हैं । 


भोले जी छत्तीसगढ़ी कविता ,कहानी और निबंध विधाओं के भी जाने -माने रचनाकार हैं। वे छत्तीसगढ़ी साहित्य के लिए समर्पित हस्ताक्षर हैं। उन्होंने हिन्दी में भी खूब लिखा है। अस्वस्थ होने के बावज़ूद उनका लेखन निरन्तर जारी है। अपने लिखे हुए को वे इन दिनों  सोशल मीडिया में साझा कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा में उनके संस्मरणो का संकलन  'सुरता के संसार' (यानी यादों का संसार)  हाल ही में प्रकाशित हुआ है।इसमें उनके 39 संस्मरणात्मक आलेख शामिल हैं। उनकी यादों की इस गठरी में साहित्य ,कला और संस्कृति से जुड़े छत्तीसगढ़ महतारी के  एक से बढ़कर एक रत्नों के व्यक्तित्व और कृतित्व का अनमोल खज़ाना है। उस दिन सुशील भोले के 'सुरता के संसार को पढ़ने लगा तो बस ,उनकी प्रवाहपूर्ण छत्तीसगढ़ी  भाषा के सागर में तैरता  ही चला गया।पुस्तक में  पहला आलेख छत्तीसगढ़ में स्वर्णिम विहान का स्वप्न देखने और दिखाने वाले कवि और लेखक डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा को समर्पित है। इस आलेख का शीर्षक है --'छत्तीसगढ़ म सोनहा बिहान के सपना देखइया डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा '। उल्लेखनीय है कि डॉ. वर्मा एक बड़े भाषा विज्ञानी भी थे। वे छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मंच 'सोनहा विहान ' के भी कुशल उदघोषक हुआ करते थे।उन्हें वर्ष 1973 में 'छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास' विषय पर अपने शोध प्रबंध के लिए पण्डित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर से पी-एच.डी. की उपाधि मिली थी । इसके पहले उन्होंने 'प्रयोगवादी काव्य और साहित्य चिन्तन'विषय पर वर्ष 1966 में सागर विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट किया था। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी गीत 'अरपा पैरी के धार -महानदी हे अपार' को छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य गीत का दर्जा दिया है। यह छत्तीसगढ़ महतारी की वंदना का गीत है।सुशील भोले ने अपनी किताब 'सुरता के संसार' में डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के साहित्यिक ,सांस्कृतिक और पारिवारिक जीवन के प्रेरक प्रसंगों को अपने आलेख में सहेजा है। 

  संग्रह में उनका दूसरा आलेख  प्रथम छत्तीसगढ़ी व्याकरण के रचयिता और धमतरी के अध्यापक काव्योपाध्याय हीरालाल चन्द्रनाहू के बारे में है। वे 'पण्डित हीरालाल काव्योपाध्याय' के नाम से भी लोकप्रिय हैं। उन्होंने वर्ष 1885 में छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला व्याकरण लिखा था ,जिसे सर जार्ज ग्रियर्सन ने छत्तीसगढ़ी और अंग्रेजी के साथ वर्ष 1890 में प्रकाशित किया था सुशील भोले ने पण्डित हीरालाल काव्योपाध्याय पर केन्द्रित अपना आलेख मानक रेखाचित्र के रूप में प्रस्तुत किया है। 

    भोले की कृति 'सुरता के संसार ' में छत्तीसगढ़ के महान आध्यात्मिक चिन्तक स्वामी आत्मानंद पर केन्द्रित आलेख में जानकारी दी है कि स्वामीजी छत्तीसगढ़ी लेखन को अध्यात्म से जोड़ने पर विशेष बल दिया करते थे। स्वामी जी ने  भारत के महान समाज सुधारक स्वामी विवेकानंद और उनके आध्यात्मिक गुरु रामकृष्ण परमहंस के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का आजीवन अथक प्रयास किया। रायपुर में उनके द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन -विवेकानंद आश्रम और बस्तर अंचल के जिला मुख्यालय नारायणपुर में स्वामी विवेकानंद जी के नाम से संचालित शैक्षणिक संस्थाएं और कई सेवा प्रकल्पों से स्वामी आत्मानंद जी की भी यादेंजुड़ी हुई हैं जो  सदैव जुड़ी रहेंगी। पुस्तक में चौथा संस्मरण छत्तीसगढ़ में शब्दभेदी बाण चलाने वाले कोदूराम वर्मा के बारे में है। वहीं भोले के कुछअन्य संस्मरणों के शीर्षक देखिए  - पंडवानी के पुरोधा नारायण प्रसाद वर्मा ,छत्तीसगढ़ी साँचा म पगे साहित्यकार टिकेन्द्र नाथ टिकरिहा, सुराजी वीर अनंत राम बर्छिहा । इन शीर्षकों से ही स्पष्ट हो जाता है कि संस्मरण किन महान विभूतियों पर केन्द्रित है।

     सुशील भोले ने वर्ष 1987 में छत्तीसगढ़ी भाषा में मासिक साहित्यिक पत्रिका 'मयारू माटी'का भी सम्पादन और प्रकाशन शुरू किया था।इसके विमोचन समारोह के संस्मरण को उन्होंने 'प्रकाशन मयारू माटी के ' शीर्षक आलेख में साझा किया है। विमोचन 9 दिसम्बर 1987 को रायपुर के कुर्मी छात्रावास में हुआ था। हालांकि कुछ कठिनाइयों के कारण उन्हें 13 अंकों के बाद इसका प्रकाशन स्थगित करना पड़ा ,लेकिन छत्तीसगढ़ी साहित्य ,कला और संस्कृति के प्रचार प्रसार और विकास में 'मयारू माटी ' का योगदान आज भी याद किया जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन में यहाँ की विभूतियों के योगदान को सुशील भोले ने अपने आलेख 'राज आंदोलन म आहुति 'शीर्षक आलेख में याद किया है। अपने गृहग्राम से जुड़ी यादों को उन्होंने 'मोर गाँव नगरगाँव'के नाम से बड़ी भावुकता के साथ प्रस्तुत किया है।।   

         सुशील भोले पहले सुशील वर्मा के नाम से जाने जाते थे। उनकी जीवन यात्रा में एक ऐसा भी पड़ाव आया,जब वे आध्यात्म की दिशा में मुड़ गए और भगवान शिव के भक्त बनकर उन्होंने 21 वर्षो तक साधना की। इसके बाद वे साहित्य के क्षेत्र में 'सुशील भोले 'के नाम से सक्रिय हुए। अपने इस संस्मरण को उन्होंने 'अध्यात्म के रद्दा'(आध्यात्म का रास्ता)शीर्षक आलेख में शामिल किया है।

      छत्तीसगढ़ तालाबों का प्रदेश रहा है।भोले ने अपनी यादों की गठरी में इसे 'छै आगर छै कोरी तरिया'शीर्षक से लिखा है। उनके कुछ आलेख छत्तीसगढ़ी नाचा और कला संस्कृति के पुरातन स्वरूप की भी याद दिलाते हैं।जैसे - रतिहा के वो अलकर नाचा,इसमें वह अपने बचपन और किशोरावस्था के दिनों में अपने पैतृक गाँव 'नगर गाँव'में हुए 'किसबिन नाच' को याद करते हैं। उन्होंने सिमगा के पास हरिनभट्टा गाँव मे एक बार हुए कवि सम्मेलन का दिलचस्प वर्णन 'सुरता वो कवि नाचा'के शीर्षक आलेख में किया है । शादी ब्याह के मौसम में जब देश के अन्य ग्राम्यांचलों की तरह छत्तीसगढ़ के गाँवों में भी बारातें बैल गाड़ियों से आती -जाती थीं ,उन बारातों से जुड़ी मधुर स्मृतियों को सुशील भोले ने 'बइला गाड़ी के बरात'में संजोया है। छात्र जीवन में फिल्में देखने की चाहत हर किसी को होती है। लेखक सुशील भोले को भी होती थी।उनका आलेख 'छात्र जीवन के  मेटनी शो'  में उनकी यह दिलचस्पी प्रकट होती है। अपने एक आलेख में वह किन्नर के कठिन  जीवन  पर प्रकाश डालते हुए उनकी प्रतिभाओं को समाज में सम्मान दिलाने की मांग करते हैं। 

     उन्होंने अपने आलेखों में छत्तीसगढ़ी साहित्यकार डॉ. बलदेव ,डॉ. दशरथ लाल निषाद 'विद्रोही',सन्त कवि पवन दीवान,डॉ. परदेशी राम वर्मा,डॉ. सीताराम साहू ,संगीत शिल्पी खुमान साव ,छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्न दृष्टा डॉ. खूबचन्द बघेल , छत्तीसगढ़ी लोक नृत्य नाचा के पुरोधा मदन निषाद और गेड़ी नृत्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का सपना देखने वाले सुभाष बेलचंदन की रचनात्मक प्रतिभा को भी रेखांकित किया है। सुशील ने अपनी प्राथमिक शाला की पढ़ाई और नदी -पहाड़ , घाम -छाँव ,रेस -टीप ,पिट्ठूल, बाँटी ,भौंरा ,डंडा -पचरंगा , गिल्ली डंडा ,केंऊ -मेऊँ जैसे बचपन के परम्परागत खेलों से जुड़ी मधुर यादों को भी लिपिबद्ध करते हुए सुरूचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है।

    उनका एक आलेख 'ममा गाँव के सुरता'को पढ़कर हर पाठक को अपने मामा के गाँव की याद अनायास आने लगेगी।  सुशील ने 'जिनगी के संगवारी' शीर्षक आलेख अपनी जीवन संगिनी बसंती देवी को समर्पित किया है।वहीं अपने एक अन्य आलेख में वह साहित्यकारों के साथ गिरौदपुरी धाम की एक यात्रा को भी याद करते हैं ,जो  अठारहवीं सदी के छत्तीसगढ़ के महान समाज सुधारक तपस्वी और सतनाम पंथ के प्रवर्तक गुरु घासीदास जी की जन्म स्थली और कर्मभूमि है।

     पुस्तक के सभी आलेख सहज ,सरल और प्रवाहपूर्ण छत्तीसगढ़ी भाषा में लिखे गए हैं । सुशील भोले की छत्तीसगढ़ी भाषा शैली में सरलता के साथ -साथ तरलता और लेखकीय तल्लीनता भी है। वैसे भी वे एक सिद्धहस्त लेखक ,सवेदनशील कवि और कहानीकार हैं। उन्हें छत्तीसगढ़ी के साथ -साथ हिन्दी लेखन में भी महारत हासिल है।साहित्य के साथ -साथ पत्रकारिता में भी सक्रिय रहे हैं।  उनकी नवीनतम कृति 'सुरता के संसार ' हमें छत्तीसगढ़ की  सामाजिक ,साहित्यिक और सांस्कृतिक दुनिया के रंग -बिरंगे संसार में ले चलती है। लेखन और प्रकाशन के लिए सुशील भोले को हार्दिक बधाई और उनके उत्तम स्वास्थ्य के लिए अनेकानेक आत्मीय शुभकामनाएँ।

      - स्वराज करुण

Friday, December 5, 2025

(पुस्तक -चर्चा ) दिल की गहराइयों से निकली आवाज़ -सीढ़ियों का समीकरण /आलेख -स्वराज्य करुण

 दिल की गहराइयों से निकली आवाज़ ; सीढ़ियों का समीकरण 

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(आलेख  -स्वराज्य करुण )


वरिष्ठ पत्रकार और लेखक डॉ.महेश परिमल  के 42 ललित निबंधों का संकलन 'सीढ़ियों का समीकरण' हमारे समय और समाज का एक महत्वपूर्ण  दस्तावेज है। ये निबंध हम सबके आस -पास के जन-जीवन को बहुत नज़दीक  से देखकर और परख कर लिखे गए हैं। संग्रह के निबंधों में हमारे  समाज और मानव जीवन की छोटी -बड़ी हर घटना  का चित्रण  लेखक ने बड़ी संज़ीदगी  से किया है ,जो उनके गहन अनुभवों के साथ उनकी लेखकीय विश्लेषण क्षमता को भी प्रकट करता है। महेश कई दशकों से मध्यप्रदेश के भोपाल में रहते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ प्रदेश से भी उनका दशकों पुराना आत्मीय जुड़ाव आज भी बना हुआ है ।

   उनके इस संग्रह के  हर निबंध का  शीर्षक जितना  सम्मोहक है ,उसकी  अंतर्वस्तु उतनी ही भावनात्मक । निबंधों में व्यक्त भावनाएँ लेखक के दिल की गहराइयों से निकली आवाज़ है।  प्रांजलता लिए हुए  प्रवाहपूर्ण छोटे -छोटे वाक्य  उनके निबंधों को और भी ख़ूबसूरत बनाते हैं।  समाज को देखने का हर लेखक का अपना नज़रिया होता है। लेखक अगर पत्रकार  है तो उसका यह नज़रिया और भी व्यापक हो जाता है। संयोगवश महेश परिमल  के निबंधों में उनकी इन दोनों भूमिकाओं की छाप मिलती है। इक्कीसवीं सदी की इस  दुनिया में भारतीय समाज में हो रहे अच्छे -बुरे कई बदलावों की झलक भी इनमें से कई निबंधों में मिलती है। महेश  के निबंध हमें  तेजी से बदलते समाज में मानवीय संवेदनाओं को संजोकर रखने का भी संदेश देते हैं । 


                                              



संग्रह के निबंध  हमारे समाज का दर्पण भी हैं और मार्ग प्रदर्शक भी। यह आधुनिकता की  चकाचौंध में  समाज की सुप्त हो  रही चेतना को  जगाने और उसे सही राह दिखाने वाला निबंध संग्रह है। 

   देश में तेजी से हो रहे शहरीकरण की त्रासदी 'हम धूप बेचते हैं' शीर्षक निबंध में महसूस की जा सकती है।  शहरों और विशेष रूप से महानगरों की बहुमंजिली अपार्टमेंट संस्कृति मेंआप अगर कोई ऐसा फ्लैट खरीदना चाहें तो उसके लिए आपको लाखों रुपए अलग से देने होंगे।  महेश लिखते हैं --" क्या आपने कभी सुना है कि किसी ने धूप को 5 से 10 लाख रुपए में बेचा ?भले ही न सुना हो ,पर इस ज़माने में ऐसे भी लोग हैं जो न केवल धूप ,बल्कि उजास और हवा भी बेचते हैं। आप खुशी से खरीदते भी हैं । प्रकृति ने हरियाली , धूप ,हवा और उजास सभी के लिए भरपूर मात्रा में दी है । इसे बेचने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।पर शहर में बनने वाली ऊँची-ऊँची इमारतों के बीच कांक्रीट के जंगल में हमारे सपनों का घर दिलाने के लिए बिल्डर्स यही कर रहे हैं।"

संग्रह में एक निबंध है --' सीढ़ियों का समीकरण ' जो दार्शनिक अंदाज़ में   मनुष्य को जीवन में   आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। लेखक के शब्दों में --"पहाड़ के नीचे खड़े होकर हम सीढ़ियों को दूर तक जाता देखते हैं ।पर जब हम उन सीढ़ियों पर कदम रखकर आगे बढ़ते हैं ,,तब सीढ़ियाँ नीचे होती जाती हैं और हम ऊपर। सीढ़ियों के इस समीकरण को समझा आपने ?सफलता जब तक हमसे दूर होती है ,तब तक वह हमें काफी कठिन लगती है। वैसे सफलता को कठिन होना भी चाहिए,क्योंकि परिश्रम से प्राप्त सफलता अपनी कहानी स्वयं कहती है।" संग्रह में कुछ इसी तरह की भावनाओं से परिपूर्ण एक निबंध है -'गति और ठहराव ',लेकिन इसमें समाज की प्रचलित धारणाओं के विपरीत गति के साथ -साथ ठहराव को भी जरूरी बताया गया है।महेश लिखते हैं -- "लोग कहते हैं कि गति ही जीवन है।इसका आशय यही हुआ कि यदि जीवन में गति नहीं है आपका जीवन संतुलित नहीं है। आप यदि ठहर गए,तो जीवन भी ठहर जाता है।ठहरने या थम जाने को ठहरे हुए पानी की संज्ञा देते हुए कहा गया है कि ठहरा हुआ पानी गंदा होता है,जबकि बहता हुआ पानी हमेशा निर्मल होता है ।पर क्या गति हमेशा ही होनी चाहिए ? क्या ठहराव में जीवन नहीं होता ?जीवन में कई पल ऐसे भी आते हैं ,जब हम कहते हैं कि काश ...समय कुछ ठहर जाता। यानी उस वक्त भी गति होती है। लेखक ने एक  छत्तीसगढ़ी शब्द 'अगोरना ' का उदाहरण दिया है ,जिसका अर्थ है प्रतीक्षा करना। महेश इस निबंध में लिखते हैं--रास्ते पर कुछ दूरी से दो लोग जा रहे होते हैं ,तो पीछे वाला उसे 'अगोरने ' के लिए कहता है। यानी तुम कुछ ठहर जाओ तो मैं भी तुम्हारे साथ हो लूंगा। इस तरह से कुछ पल का यह ठहराव व्यक्ति को एक साथी दिला देता है।"

'लौटना जरूरी है 'निबंध में भी लेखक ने हमारे समाज की मान्यता धारणाओं के प्रतिकूल अपने विचार दिये हैं ,जो पाठकों को सोचने के लिए मज़बूर करते हैं। महेश कहते हैं --कहा जाता है कि सदैव आगे बढ़ते रहने का नाम ही जीवन है। देखा जाए तो,यह पूरा सच नहीं है।जीवन में लौटना भी उतना ही आवश्यक है ,जितना आगे बढ़ना।" अपने इस विचार पर बल देने के  लिए  वह पक्षियों की उड़ान और फिर अपने घरौंदे (घोंसले )में उनके लौटकर आने का उदाहरण देते हैं।वह महाभारत युद्ध में अभिमन्यु के आगे बढ़ने और (चक्रव्यूह)से नहीं लौट पाने के प्रसंग का भी जिक्र करते हैं और लिखते हैं --"आधे ज्ञान ने उसकी जान ले ली। लौटने में एक सुकून है।जिसे लौटना आता है ,वही ज़िंदगी को अच्छी तरह से जी सकता है।"

  मनुष्य केवल पारिवारिक नहीं ,बल्कि सामाजिक प्राणी भी है। वह समाज में रहता है। एक -दूसरे से जान -पहचान और संबंधों का नेटवर्क ही समाज है। लेखक ने 'संबंधों के पिरामिड' शीर्षक अपने निबंध में इन संबंधों की सुरुचिपूर्ण व्याख्या की है।

     पहाड़ ,नदी और जंगल किसी भी देश और वहाँ लोगों के दिलों की धड़कन होते हैं। इनसे बनने वाला पर्यावरण हमारे जीवन को गतिशील बनाता है ,लेकिन आधुनिक विकास के इस दौर में हमारी इन बहुमूल्य प्राकृतिक सम्पदाओं का जिस बेरहमी से दोहन हो रहा है , लेखक ने  'पहाड़ के आँसू' शीर्षक निबंध में उसका मर्मस्पर्शी चित्रण किया है।  हालांकि लेखक ने बहुत स्पष्ट जिक्र तो नहीं किया है ,लेकिन पूरा पढ़ने पर यह साफ हो जाता है कि उनका हृदय  उत्तराखंड में हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने से फरवरी 2021 में चमोली में हुई भारी तबाही और इसके पहले 2013 में केदारनाथ में हुए हादसे से काफी आहत हुआ है। उनके शब्दों में 'पहाड़ के आंसुओं' को आप भी महसूस कीजिए --

"इस बार पहाड़ फिर जी भरकर रोया है।पहाड़ को रोना क्यों पड़ा ? यह समझने को कोई तैयार नहीं है।बस, लोग पहाड़ द्वारा की गई तबाही के आंकड़ों में ही उलझे हैं। संसद में प्रधानमंत्री के आँसू सभी को दिखे ,पर पहाड़ के आँसू किसी की नज़र में नहीं आए।बरसों से रो रहे हैं पहाड़।पर कोई हाथ उनकी आँखों तक नहीं पहुँचा। पहाड़ के सिर पर प्यार भरा हाथ फेरने वाले लोग अब गुम होने लगे हैं।आख़िर रोने की भी एक सीमा होती है।इस बार यह दुःख नाराजगी के रूप में बाहर आया है। पहाड़ों को अब गुस्सा आने लगा है।"

 उजड़ते ,बिगड़ते पर्यावरण की गहरी चिन्ता आप  'पेड़ों का अनसुना क्रंदन ' में भी महसूस कर सकते हैं।लेखक ने इसमें कोरोना काल की  बारिश के दौरान जड़ों से उखड़ गए 70 वर्ष और 100 वर्ष पुराने पेड़ों से अपनी संवेदनाओं को जोड़ते हुए लिखा है --"अब पेड़ उखड़ रहे हैं तो लोग उजड़ेंगे ही।आज हमारे सामने जो भी पेड़ हैं ,वे हमारे पूर्वजों की ही निशानी हैं।उसे हम पूर्वजों का पराक्रम भी कह सकते हैं ।हमारा पराक्रम यह है कि हमने बेतहाशा पेड़ों की कटाई तो की है ,पर उस स्थान पर नये पौधे रोपने की ज़हमत नहीं उठाई।... शहरों में कई पेड़ ऐसे हैं ,जो अब हाँफ रहे हैं।प्राणवायु देने वाले को अब प्राणवायु की आवश्यकता है।वे भीतर से टूट रहे हैं,छीज रहे हैं ,उनका तन -मन झुलस रहा है।वे जीना चाहते हैं ,पर उनके सीने पर कांक्रीट का जंगल उग आया है।उनके पाँवों से पसीना और चेहरे से ख़ून निकलने लगा है।वे पेड़ कुछ कहना चाहते हैं इस मानव जाति से ,कौन है जो सुनेगा उनकी गुहार ?कहीं ये गुहार चीत्कार न बन जाए ,इसलिए हमें ही चेतना होगा। हमें ही सुननी होगी उन अनसुनी चीख़ों को ,जो हमारे आस -पास गूंज रही हैं।"

     हमारे जीवन में सूचना क्रांति के उपकरणों की घुसपैठ कितनी दूर तक हो चुकी है ,इसे हम महेश के निबंध 'जीवन में अदृश्य ताकतों की दखल 'को पढ़कर महसूस कर सकते हैं । लेखक के अनुसार ये अदृश्य ताकतें हैं -इंटरनेट और मोबाइल ।

संग्रह के कुछ निबंध आधुनिक जीवन शैली में दिनों- दिन आत्म केन्द्रित हो रहे समाज की विसंगतियों को भी रेखांकित करते हैं । इनमें से एक है  'अकेलेपन को भुनाने की कोशिश', जिसमें लेखक के अनुसार -- "किसी चिंतक ने कहा है कि किसी के अकेलेपन का मज़ाक मत उड़ाओ। आपके पास जो भीड़ खड़ी है ,वह किसी स्वार्थ की वजह से खड़ी है। आजकल इस अकेलेपन को भी लोगों ने व्यापार बना लिया है।आपको अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए धन -राशि खर्च करनी होगी।इसके लिए कई वेबसाइट्स हैं,जो यह काम करती हैं। कई नामों से यह डेटिंग साइट हमारे सामने आती है।वास्तव में अकेलापन एक ऐसी भावना है ,जिसमें लोग बहुत तीव्रता से खालीपन और एकांत अनुभव करते हैं।"

 वर्तमान  समाज मे  वृद्धजनों की दयनीय हालत को  'वृद्धाश्रमों में कैद युवाओं का पराक्रम'शीर्षक निबंध से समझा जा सकता है।लेखक इन बुजुर्गों की पीड़ा को कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं --कई शहर बदनसीब भी होते हैं।बदनसीब इस मायने में कि जिस शहर में जितने वृद्धाश्रम होंगे ,वह शहर उतना ही अधिक बदनसीब होगा। वास्तव में शहर में वृद्धाश्रम का होना ही किसी कलंक से कम नहीं।...आज हमारे देश के युवाओं का पराक्रम इन्हीं वृद्धाश्रमों में कैद है ,जहाँ की दीवारों पर कलियुगी संतानों की गाथाएँ अंकित हैं।"

  कोरोना के निष्ठुर समय में वर्ष 2020 में  औरंगाबाद के पास थकान मिटाने के लिए रेल्वेट्रैक पर सोये श्रमिकों की एक मालगाड़ी से हुई मौत ने लेखक को भी झकझोर कर रख दिया था। अपनी भावनाओं को उन्होंने 'पटरी से बेपटरी होती ज़िंदगी' में वाणी दी है। समाज में कई तरह के दुःख हैं , हादसे हैं , समस्याएँ हैं ,लेकिन  ऐसा भी नहीं है कि सब कुछ नकारात्मक है। कई सकारात्मक पहलू भी हैं।  महेश की लेखनी ने उन्हें भी स्पर्श किया है। उनका एक निबंध है - ठिठुरती सुबह में सिकुड़ते लोग '।  ठंड के मौसम में सुबह की सैर के दौरान हमारे आस -पास होती जीवन की हर छोटी -से -छोटी उन हलचलों  पर भी लेखक की नज़र गई है ,जिन्हें हम अक्सर सामान्य मानकर नज़रंदाज़ कर जाते हैं। लेखक की वर्णन शैली देखिए -- " बहुत सुहानी होती है ,सुबह की सैर। कभी देखी है आपने सुबह होने से पहले प्रकृति की तैयारी ?कहते हैं प्रकृति अपना संतुलन बनाए रखती है। जो अपनी सेहत के प्रति सजग रहते हैं ,उनकी सुबह बहुत ही फलदायी होती है। अलसभोर आप निकलें तो पाएंगे -कुछ बुजुर्गों की चहल -कदमी , मंद गति से दौड़ते युवा ,बतियाती महिलाएँ ,इक्का -दुक्का वाहनों का गुज़रना ,रेल्वे या बस स्टैंड जाते लोग ,दूध वाली वैन ,कोई भजन मंडली , दूर मस्ज़िद से उठती अज़ान की आवाज़ ,सड़क पर पसरे लावारिस पशु ,कभी कोई कुत्ता या फिर कोई अन्य उपेक्षित पशु।सच में ,ठंड की सुबह या अलसभोर में हमारे सामने कुछ ऐसा होता है ,जिसे हमने पहले कभी महसूस ही नहीं किया होता है।उसे महसूस करना हो तो सुबह से अच्छा कोई समय हो ही नहीं सकता।"सभी कहते हैं कि बच्चे ही देश और समाज का भविष्य होते हैं ,लेकिन उनके मनोविज्ञान को हममें से अधिकांश लोग नहीं समझ पाते।  लेखक ने  -'मासूमों की सुनो' , अनुभवों से गुजरता बचपन ' और 'अकुलाता बचपन 'शीर्षक अपने निबंधों में बच्चों के प्रति परिवार और समाज की ज़िम्मेदारियों को समझाने की कोशिश की है।देश और दुनिया में दो साल पहले  कोरोना भले ही एक भयानक त्रासदी लेकर आया था ,लेकिन इन्हीं त्रासदियों के बीच मनुष्य के पारिवारिक  संबंधों को नया जीवन भी मिला। रिश्तों की दूरियाँ कम हुईं।

    महेश परिमल ने अपने निबंध 'मीठे होते रिश्ते ' में लिखा है कि हम अपनी उन जड़ों की ओर लौटने लगे हैं ,जिन्हें हम छोड़ चुके थे। इसी कड़ी में जीवन के सकारात्मक पक्ष पर केन्द्रित उनका  एक निबंध है --'कम हुआ पीढ़ियों का अंतर '।कोरोना काल में देश के  शहरों से बेरोजगार होकर लाखों श्रमिक  अपने गाँवों की ओर लौट गए थे। हालात सामान्य हुए तो वे फिर अपने कर्म क्षेत्र की ओर चल पड़े।  इस परिदृश्य को महेश परिमल ने अपने निबंध 'घरौंदों से आशियाने की ओर 'में मार्मिक अभिव्यक्ति के साथ उभारा है। 

    संग्रह के सभी निबंध पठनीय हैं और  उनमें अंतर्निहित संदेश हर किसी के लिए विचारणीय । 

     आलेख -स्वराज्य करुण 


Thursday, December 4, 2025

(पुस्तक -चर्चा )विमर्श के केन्द्र में छत्तीसगढ़ी साहित्य की 18पुस्तकें / आलेख -स्वराज्य करुण

(पुस्तक -चर्चा )

विमर्श के केन्द्र में छत्तीसगढ़ी साहित्य की 18 पुस्तकें 

आलेख -स्वराज्य करुण 

छत्तीसगढ़ी भाषा में साहित्यिक रचनाओं का लेखन और प्रकाशन पहले भी होता रहा है, लेकिन वर्ष 2000 में राज्य निर्माण के बाद इसमें काफी तेजी आयी है.वर्ष 2007 में छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिलने के बाद इस भाषा के साहित्यकारों में भी रचनात्मक उत्साह का संचार हुआ है.नये, पुराने रचनाकार साहित्य की विभिन्न विधाओं में लगातार सृजन कर रहे हैं.नये दौर में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं सहित आकाशवाणी और दूरदर्शन तथा प्रचार -प्रसार के अन्य आधुनिक माध्यमों की संख्या में भी काफी वृद्धि हुई है,जिनमें छत्तीसगढ़ी रचनाकारों को अपनी साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए मंच मिलने लगा है. सूचना क्रांति के इस युग में कम्प्यूटर और इंटरनेट आधारित फेसबुक, वाट्सएप और यूट्यूब आदि सोशल मीडिया के मंचों का भी अनेक छत्तीसगढ़ी साहित्यकार अच्छा उपयोग कर रहे हैं.कहानी,उपन्यास, कविता,खण्ड काव्य, निबंध और लघुकथा जैसी साहित्यिक विधाओं में छत्तीसगढ़ी रचनाओं का लेखन और प्रकाशन जारी है, लेकिन नाट्य विधा में पुस्तकों का प्रकाशन या तो नहीं हो रहा है, या ये भी हो सकता है कि मेरी जानकारी में नहीं है.छत्तीसगढ़ी भाषा में साहित्यिक समीक्षाएँ भी बहुत कम लिखी गयी हैं. 

                                              


बहरहाल,विगत 12वर्षो में छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रकाशित विभिन्न विधाओं की पुस्तकों की छत्तीसगढ़ी भाषा में समीक्षा करने का एक सराहनीय कार्य पोखनलाल जायसवाल ने किया है. वे बलौदा बाज़ार -भाटापारा जिले के ग्राम पठारीडीह (तहसील -पलारी )के निवासी हैं. उनकी समीक्षात्मक पुस्तक 'विमर्श के कसौटी म समकालीन छत्तीसगढ़ी साहित्य ' शीर्षक से इस वर्ष 2024में प्रकाशित हुआ है. यह छत्तीसगढ़ी साहित्य की पाँच अलग -अलग विधाओं में साहित्यकारों द्वारा रचित 18 पुस्तकों पर केंद्रित  जायसवाल जी के समीक्षात्मक आलेखों का संकलन है.हिन्दी में इस पुस्तक की भूमिका लिखी है राज्य के बिलासपुर निवासी व्याकरणविद, कहानीकार और समीक्षक डॉ.  विनोद कुमार वर्मा ने. पुस्तक पर और पोखनलाल की साहित्यिक रचना प्रक्रिया पर दुर्ग निवासी साहित्यकार अरुण कुमार निगम का छत्तीसगढ़ी आलेख भी इसमें शामिल है, वहीं पोखन लाल ने 'अपन गोठ 'शीर्षक से छत्तीसगढ़ी में अपनी बात रखी है. 

   जिन रचनाकारों की पुस्तकों पर समीक्षात्मक आलेख इस संग्रह में शामिल हैं उनमें से वसंती वर्मा की पुस्तक 'मोर अँगना के फूल 'का प्रकाशन वर्ष 2012 में हुआ था. यह उनकी कविताओं का संकलन है. छत्तीसगढ़ी साहित्य के विमर्श की इस पुस्तक में जायसवाल जी का पहला आलेख मनीराम साहू के खंड काव्य 'हीरा सोनाखान के 'शीर्षक से है, जो वर्ष 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ से नायक बनकर उभरे शहीद वीर नारायण सिंह पर केंद्रित है, जो तत्कालीन अविभाजित रायपुर जिले के अंतर्गत सोनाखान के प्रजा वत्सल जमींदार थे. मनीराम की यह पुस्तक वर्ष 2018 में प्रकाशित हुई थी. स्वतंत्रता संग्राम में ही वर्ष 1857 में छत्तीसगढ़ की वर्तमान राजधानी रायपुर में एक बड़ा सैन्य विद्रोह हुआ था, जिसके नायक थे वीर हनुमान सिंह. उन पर केंद्रित प्रबंध काव्य भी मनीराम साहू ने लिखा है, जिसका प्रकाशन वर्ष 2023 में हुआ है. इस पुस्तक पर भी पोखन लाल जायसवाल ने विमर्श आलेख अपनी पुस्तक में शामिल किया है. 

अपने इस विमर्श -संकलन में उन्होंने जिन अन्य रचनाकारों की कृतियों की विस्तार से चर्चा की है, उनमें रामनाथ साहू का कहानी संग्रह 'गति मुक्ति ' (प्रकाशन वर्ष 2016), शोभा मोहन श्रीवास्तव का कविता संग्रह 'तैं तो पूरा कस उतर जाबे '(प्रकाशन वर्ष 2021) भी शामिल है. वर्ष 2022 में प्रकाशित चन्द्रहास साहू के कहानी संग्रह 'तुतारी ', वर्ष  2023 में प्रकाशित वीरेंद्र सरल के लोक कथा संग्रह 'ठग अउ जग ', वर्ष 2022 में प्रकाशित दुर्गा प्रसाद पारकर के उपन्यास 'बहू हाथ के पानी ', वर्ष 2020 में प्रकाशित डॉ. पीसी लाल यादव के कविता -संग्रह 'बेरा -बेरा के बात 'वर्ष 2022 में प्रकाशित कन्हैया साहू के छंदबद्ध काव्य 'जयकारी जनउला ', वर्ष 2023 में प्रकाशित मनीराम साहू के गीत -संग्रह 'गजा मूँग के गीत ' वर्ष 2022 में प्रकाशित चोवा राम वर्मा के कहानी संग्रह 'बहुरिया ', वर्ष 2020 में प्रकाशित सुशील भोले के कहानी संग्रह 'ढेकी ' और वर्ष 2019में प्रकाशित बलदाऊ राम साहू के निबंध संग्रह 'मोटरा संग मया नंदागे 'की भी चर्चा की गयी है.

      इसी कड़ी में पोखन लाल जायसवाल ने अपने विमर्श में वर्ष 2022 में प्रकाशित राजकुमार चौधरी के ग़ज़ल संग्रह 'पाँखी काटे जाही ', वर्ष 2022 में प्रकाशित कन्हैया साहू 'अमित 'के बालगीतों के संग्रह 'फुरफुंदी ', वर्ष 2023 में प्रकाशित स्वामी आत्मानंद पर केंद्रित चोवा राम वर्मा के चम्पू काव्य 'हमर स्वामी आत्मानंद ', वर्ष 2016 में प्रकाशित जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया 'के कविता संग्रह 'मोर गाँव गँवागे 'को भी शामिल किया है. 

          वैसे देखा जाए तो इन वर्षो में  और भी कई साहित्यकारों की छत्तीसगढ़ी पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, लेकिन पोखन लाल जायसवाल ने अपने पास जितनी पुस्तकें उपलब्ध हैं, उन्हें पढ़कर काफी मनोयोग और मेहनत से उन पर आलेख तैयार किए हैं. वैभव प्रकाशन रायपुर द्वारा वर्ष 2024 में प्रकाशित 'विमर्श के कसौटी म समकालीन छत्तीसगढ़ी साहित्य 'के लेखक पोखन लाल जायसवाल को इस उपलब्धि के लिए हार्दिक बधाई.

(आलेख -स्वराज्य करुण )