Sunday, August 16, 2020

अंगारों के हाथ न सौंपो फूलों के संसार को

                  आलेख : स्वराज करुण 

देश और समाज की बेहतरी के लिए एक साथ कई भूमिकाओं का निर्वहन कर  19 साल पहले दुनिया छोड़ गए हरि ठाकुर आज अगर हमारे बीच रहते  तो 93 साल के हो चुके होते। उन्होंने अपनी 74 साल की ज़िन्दगी में कई सार्वजनिक जिम्मेदारियों को बखूबी संभाला।   आज 16 अगस्त को उनकी जयंती है।  हिन्दी और छत्तीसगढ़ी के श्रेष्ठ  कवि तो वह थे ही , छत्तीसगढ़ के पौराणिक , सांस्कृतिक ,सामाजिक , साहित्यिक और राजनीतिक इतिहास के भी वह गहन अध्येता और लेखक थे।  राज्य निर्माण आंदोलन के लिए सर्वदलीय मंच के संयोजक के रूप में उनकी यादगार भूमिका थी। 

               

   इन सबके ऊपर आम जनता के जीवन के सुख -दुःख को शब्द देने वाले  मया ,पीरा के  गीतकार , किसानों , मज़दूरों और सामान्य मनुष्यों के जीवन संघर्षों को अभिव्यक्ति देने वाले कवि के रूप में समाज में उनकी एक खास पहचान थी। वर्ष 1956 में छत्तीसगढ़ के छह युवा कवियों द्वारा  परस्पर सहयोग से अपना एक संयुक्त काव्य संग्रह 'नये स्वर ' का प्रकाशन उस जमाने में इस अंचल के साहित्यिक इतिहास में एक बड़ी महत्वपूर्ण घटना थी। इस संग्रह के कवि थे -हरि ठाकुर , गुरुदेव काश्यप चौबे , सतीशचन्द्र चौबे ,नारायणलाल परमार ,ललित मोहन श्रीवास्तव और देवीप्रसाद वर्मा 'बच्चू जांजगीरी '। लेखक सहकारी संघ के बैनर पर छपे इस काव्य संग्रह के प्रथम कवि हरि ठाकुर थे । इसमें शामिल उनकी कविताओं में से एक गीत की इन पंक्तियों में उनकी भावनाओं को आप भी महसूस कीजिए -    

             

             कभी -कभी दुनिया में ऐसा भी होता है

              पत्थर गल जाते हैं शबनम की आहों से ।

             कोई जब बादल के पंख काट लेता है

              फैली हरियाली की धार चाट लेता है।

              कोई तब आँसू की बरखा से नहला कर 

              धरती के कण -कण को प्यार बाँट देता है ।

               कभी -कभी दुनिया में ऐसा भी होता है,

               पर्वत बँध जाते हैं बचपन की बाँहों से ।


इस काव्य संग्रह में शामिल उनके एक गीत में कवि हॄदय में उमड़ती -घुमड़ती भावनाएं कुछ इस तरह प्रकट होती हैं --

      

       अंगारों के हाथ न सौंपो फूलों के संसार को ।

        लहरों के यौवन को बाँधों मन के मीठे तार से ,

      अरमानों का आँगन  भर दो  पायल की झंकार से

      खुशबू की खामोशी खोलो ,भय की पाँखें काट दो

      जिन पौधों पर  काँटे जन्में , उनकी शाखें काट दो ।

       पतझर के हाथों मत सौंपो कलियों भरी बहार को।

       अंगारों के हाथ न सौंपो फूलों के संसार को 

       आज हवाओं के पाँवों में बारूदी जंजीर है 

       संगीनों की झंकारों में कैद पड़ी मंजीर है।

       नीर भरी सपनों की आँखें , पीर भरी हर रात है 

       धरती के धानी आँचल में लोहू की बरसात है ।

        तलवारों के हाथ न सौंपो जीने के अधिकार को 

        अंगारों के हाथ न सौंपो फूलों के संसार को ।


 उनका  जन्म 16 अगस्त 1927 को रायपुर में और निधन 3 दिसम्बर 2001 को नई दिल्ली में हुआ ,जहाँ वह कैन्सर के इलाज के लिए गए थे।  हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में उनकी 30 से ज्यादा किताबें छपीं  ,जिनमे कविता संग्रह - लोहे का नगर , नये विश्वास के बादल , गीतों के शिलालेख ,जय छत्तीसगढ़ , हँसी एक नाव सी , धान के कटोरा , सुरता के चन्दन  और खण्ड काव्य शहीद वीर नारायण सिंह भी शामिल हैं । छत्तीसगढ़ के इतिहास पर केन्द्रित कई महत्वपूर्ण शोध आलेख और ग्रन्थ भी उन्होंने लिखे । इनमें छत्तीसगढ़ का प्रारंभिक इतिहास और छत्तीसगढ़ गौरव गाथा उल्लेखनीय हैं ।  इनमें से 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' का प्रकाशन उनके मरणोपरांत वर्ष 2003 में हुआ । स्वतंत्रता संग्राम के दौरान छत्तीसगढ़ के तत्कालीन रायपुर  जिले के ग्राम तमोरा (तहसील-महासमुन्द ) में सितम्बर 1930 में अंग्रेजों के जंगल कानून को तोड़ने के लिए कांग्रेस कमेटी ने ग्रामीणों को संगठित कर 'जंगल सत्याग्रह ' किया था।  हरि ठाकुर इस सत्याग्रह के इतिहास से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने 'तमोरा सत्याग्रह ' शीर्षक से हिन्दी में एक नाटक  लिखा। उनका लिखा एक अन्य  नाटक है 'परबुधिया', जो छत्तीसगढ़ी में है। दोनों नाटक स्वर्गीय डॉ. राजेन्द्र सोनी द्वारा सम्पादित साहित्यिक पत्रिका 'पहचान यात्रा ' के हरि ठाकुर विशेषांक में वर्ष 2002 में प्रकाशित हुए हैं। यह विशेषांक हरि ठाकुर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित है ।

            


   करीब पांच दशक पहले छत्तीसगढ़ी भाषा में बनी दूसरी फीचर फ़िल्म ' घर द्वार 'में हरि ठाकुर के लिखे गीत  काफी लोकप्रिय हुए । जमाल सेन के संगीत निर्देशन में इन गीतों को मोहम्मद रफ़ी और सुमन कल्याणपुर जैसे सुप्रसिद्ध कलाकारों ने अपना स्वर दिया था  । फ़िल्म में हरि ठाकुर के लिखे 'गोंदा फुल गे मोर राजा ,गोंदा फुल गे मोर बैरी,छाती म लगे बान गोंदा फुल गे  ,' 'सुन -सुन मोर मया पीरा के संगवारी रे ,आजा नयना तीर ,आजा रे ' और 'झन मारो गुलेल , झन मारो गुलेल ,बाली उमर मोर सईंया , जैसे गीतों को लोग आज भी गुनगुनाते हैं।

     हरि ठाकुर छत्तीसगढ़ के महान श्रमिक नेता और स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर प्यारेलाल सिंह के सुपुत्र थे । लिहाज़ा लोकहित और देश हित में काम करने का जज्बा उन्हें स्वाभाविक रूप से विरासत में मिला था । उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ़ 1942 के भारत छोडो आंदोलन में हिस्सा लिया । आज़ादी के बाद 1955 में गोवा मुक्ति आंदोलन में भी शामिल हुए ।आचार्य विनोबा भावे के सर्वोदय और भूदान आंदोलन से भी वह काफी प्रभावित थे । हरि ठाकुर  1955 मे नागपुर से प्रकाशित भूदान आंदोलन की पत्रिका ' साम्य योग ' के  सम्पादक भी रहे । डॉ. खूबचन्द बघेल ने वर्ष 1956 में राजनांदगांव में छत्तीसगढ़ी महासभा का गठन करते हुए छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन की बुनियाद रखी। उन्होंने हरि ठाकुर को महासभा के संयुक्त सचिव बनाया। डॉ.बघेल ने  वर्ष 1967 में रायपुर में छत्तीसगढ़ भातृ संघ की स्थापना की और हरि ठाकुर को इसमें महासचिव पद की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी सौंपी। कवि और लेखक होने के नाते ठाकुर साहब वरिष्ठ और युवा रचनाकारों के भी चहेते  साहित्यकार  थे। उन्होंने वर्ष 1995 में स्थानीय युवा साहित्यकारों को लेकर साहित्यिक संस्था   'सृजन सम्मान ' का भी गठन किया।

    अपने गृह नगर रायपुर में उन्होंने वर्ष 1966 में पिता ठाकुर प्यारेलाल सिंह के समाचार पत्र साप्ताहिक ' राष्ट्रबन्धु ' के सम्पादन और प्रकाशन का दायित्व संभाला । उनके पिताजी ने इस साप्ताहिक का प्रकाशन वर्ष 1950 में शुरू किया था । हरि ठाकुर वर्ष 1966 से 1978 तक इसका नियमित सम्पादन और प्रकाशन करते रहे।छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन को गति देने के लिए  वर्ष 1992 में रायपुर मेंउनके घर पर प्रबुद्धजनों की बैठक हुई ,जिसमें  सर्वदलीय मंच बनाने का निर्णय लिया गया। हरि ठाकुर इस मंच के संयोजक बनाए और उन्हें अध्यक्ष मंडल में भी शामिल किया गया ।

 उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर में शोध कार्य भी हुआ है ।  विश्व विद्यालय से  ' हरि ठाकुर के साहित्य में राष्ट्रीय चेतना ' विषय पर  अपने शोध के लिए मेरी भाँजी श्रीमती अनामिका पाल को वर्ष 2011 में पीएचडी की उपाधि मिली है ।   हरि ठाकुर वर्ष 1965 - 66 में छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के भी अध्यक्ष रहे । उन्होंने वर्ष 1965 में साहित्यिक पत्रिका ' संज्ञा ' का भी सम्पादन किया ।नई दिल्ली में 3 दिसम्बर 2001 को उनके निधन के बाद अगले दिन गृहनगर रायपुर में 4 दिसम्बर को उनका अंतिम संस्कार हुआ। छत्तीसगढ़ विधान सभा का शीतकालीन अधिवेशन चल रहा था। तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी सहित पक्ष और विपक्ष के अनेक नेता और बड़ी संख्या में नागरिक ठाकुर साहब को  अंतिम बिदाई देने मौज़ूद थे। उसी दिन विधान सभा  की बैठक में उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी।मुख्यमंत्री अजीत जोगी और नेता प्रतिपक्ष नन्दकुमार साय सहित अनेक सदस्यों ने शोक उदगार  व्यक्त किए।

   स्वर्गीय हरि ठाकुर के  बहुआयामी सार्वजनिक व्यक्तित्व और उनकी 74 वर्षीय जीवन यात्रा के  विभिन्न पहलुओं पर किसी एक आलेख में विस्तार से प्रकाश डालना संभव नहीं है। सार्वजनिक जीवन की उनकी हर भूमिका पर  अलग -अलग आलेख बन सकते हैं। इसलिए  आज तो सिर्फ इतना ही । उनकी जयंती पर एक बार फिर उन्हें विनम्र नमन । 

    आलेख   -स्वराज करुण

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