Saturday 9 April 2011

जन-लोकपाल : खाने-दिखाने के दांत अलग -अलग तो नहीं होंगे ?

                                                                                                        स्वराज्य करुण
        नदियाँ पहाड़ों से निकलती हैं और उनका पानी ढलानों से होकर  ऊपर से नीचे की ओर बहता है . उसी तरह भ्रष्टाचार  की नदियाँ भी ऊपर से नीचे की तरफ प्रवाहित हो रही हैं .ऊपर के लोग जब नोटों के जादुई  निवेश के ज़रिये हर तरह के ऊंचे-ऊंचे ओहदे हासिल करते हैं और उन ओहदों को अपने निवेश  की पूंजी  वसूलने  का ज़रिया बना लेते हैं , तब उनसे निचले ओहदे वाले उन्हें अपना ' आदर्श ' मान कर उनका अनुकरण करने लगते हैं . समाज-जीवन के हर क्षेत्र में कुछ अपवादों को छोड़ कर आज लगभग यही देखने को मिल रहा है. ग्राम पंचायतों  से  लेकर देश की सबसे बड़ी पंचायत तक होने वाले चुनावों में इसे साफ़ देखा जा सकता है.व्होट के लिए नोट और शराब बाँटना , देश की सर्वोच्च पंचायत  में नोटों के बण्डल उछालना ,  व्होट खरीदकर ऊंचे-ऊंचे ओहदों तक पहुंचकर घोषित-अघोषित अरबों-खरबों की सम्पत्ति बनाना -ऐसा लगता है कि   लोकतंत्र के   बड़े-बड़े- ओहदेदारों का  अब केवल यही काम रह गया है .  इन्साफ के  मंदिरों में न्याय  का तराजू लिए खड़ी  देवी की आँखों में गांधारी की तरह पट्टी शायद इसलिए बंधी  रहती है कि वह अपने सामने न्याय के लिए खुले आम चलती सौदेबाजी को देख कर बेहोश न हो जाए ! वैसे भी आम धारणा बन चुकी है कि इन मंदिरों में न्याय नहीं होता, सिर्फ फैसले होते हैं .
       बड़े से बड़ा  और छोटे से छोटा  हर ओहदेदार अपने छोटे-बड़े हर अधिकार का इस्तेमाल देश को खुल कर लूटने के लिए करता नज़र आ रहा है.इन ओहदेदारों को जनता के टैक्स के रूपयों से  अच्छी खासी  तनख्वाह मिलती है , फिर भी प्रलोभन के मायाजाल से ये मुक्त नहीं हो पाते .  कुछ अपवाद यहाँ भी हो सकते हैं  लेकिन आम तौर पर तस्वीर तो कुछ ऐसी ही नज़र आती है. छोटे ओहदेदार निःसंकोच कहने लगे हैं कि जब हमसे बड़े ओहदेदार  आठ सौ करोड़ का पशुओं का चारा खा सकते हैं ,  कॉमन वेल्थ खेलों में घोटालों के चैम्पियन हज़ारों-हज़ार करोड़ रूपयों का शर्मनाक खेल कर सकते हैं , टू-जी स्पेट्रम मामले में अरबों -खरबों का  गोलमाल  हो सकता है ,  जब देश की राजधानी में यह सब हो सकता है , तो गाँव में क्यों नहीं हो सकता ? इसलिए लोकतंत्र की बुनियादी इकाई ग्राम पंचायत के अधिकाँश पंच-सरपंचों में भी यही विचार विकसित हो रहा है . सरकारी दफ्तरों में ठेका , परमिट , लायसेंस , नजूल पट्टा नवीनीकरण जैसे कई तरह के कार्यों में  बड़े अधिकारी को रिश्वत की बड़ी रकम लेते देख उसके मातहत अपने पद के अनुरूप कुछ न कुछ लेते ही हैं . कई प्रकार के लायसेंस ,परमिट अवैध तरीके से हासिल करने के लिए भी लोग रिश्वत देकर काम ज़ल्द से जल्द करवा लेना चाहते हैं . रिश्वत अगर कोई मजबूरी में दे रहा है , तो देने वाले को माफ किया जा सकता है , जैसे कहीं अचानक ट्रेन में अर्जेंट यात्रा के लिए जाने की ज़ल्दी हो , तो टिकट चेकर को सीट और बर्थ के लिए ऊपरी सहयोग शुल्क देना हमारी मजबूरी हो जाती है , क्योंकि उस वक्त बहसबाजी और शिकायतबाजी में समय नष्ट करना यात्री को ही भारी पड़ सकता है. ऐसे में यहाँ  घूस  देने वाला नहीं ,बल्कि लेने वाला दोषी होता है ,पर कौन उसका क्या बिगाड़ लेता है ? भ्रष्टाचार को जिस  देश  में बड़ी आसानी से शिष्टाचार मान लिया गया हो,  वहाँ उम्मीदों की रौशनी कहाँ नज़र आएगी ?
          बहरहाल भ्रष्टाचार के खिलाफ जन-लोकपाल क़ानून की मांग को लेकर देश की राजधानी में सीधे सच्चे गांधीवादी समाज सेवी अन्ना हजारे का  आमरण अनशन   वास्तव में आज की भ्रष्ट व्यवस्था के लिए भूकम्प के  झटकों की तरह साबित हुआ है , जिसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर लगातार  बढ़ती चली गयी  है..सबने देखा कि  देश भर से विशाल जन-सैलाब दिल्ली की तरफ   कैसे  सुनामी की लहरों जैसी तेज गति से दौड़ने लगा था ! अन्ना साहब ने सही समय पर एक सही और ज्वलंत विषय उठाया . भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता में  उन्हें समर्थन देने की होड लग गयी. अच्छा है. किसी भी जन-आंदोलन को ताकत जन-समर्थन से ही मिल सकती है. लेकिन  अन्ना साहब को ध्यान रखना होगा कि  भ्रष्टाचार के जिस सुलगते मुद्दे पर यह जन-सैलाब उमडता नज़र आया , कहीं उसमें लहरों के साथ बह कर तरह-तरह के जहरीले जीव-जंतु तो नहीं चले आ रहे थे  ?
      टेलीविजन पर मैंने कुछ  फ़िल्मी कलाकारों और नामी क्रिकेटर धोनी  को भी अन्ना साहब के अनशन स्थल पर आते और उनके प्रति समर्थन व्यक्त करते देखा है . एक ऐसे फिल्म निर्माता और निदेशक को भी टी.वी पर अन्ना के पक्ष में बोलते देखा ,जिस पर बलात्कार का  आरोप  लग चुका  है. अरबों -खरबों रूपयों की लागत की फिल्म बनाने के लिए रूपया क्या ईमानदारी की कमाई से आता है ? क्या फिल्म इंडस्ट्री में माफिया गिरोहों का पैसा नहीं लगता ?     भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना साहब का समर्थन कर रहे  कुछ  फ़िल्मी कलाकार  क्या  एक-एक फिल्म के लिए करोड़ों रूपयों का पारिश्रमिक नहीं लेते ?   उन्हें पारिश्रमिक देने के लिए निर्माता यह रूपया आखिर कहाँ से लाता है ? क्या ये फ़िल्मी कलाकार नहीं जानते कि उन्हें ठुमके लगाने और कमर मटकाने के लिए करोड़ों की दौलत कहाँ से मिलती है ?फिर वे किस मुंह से भ्रष्टाचार के विरोध में  अन्ना हजारे के सत्याग्रह में आकर घडियाली आंसू बहा रहे हैं ?   इसी तरह सट्टेबाजी का खेल बन चुके क्रिकेट के खिलाड़ी भी करोड़ों रूपए की कमाई कर रहे हैं .यह .विश्व-कप और आई.पी. एल. आखिर क्या है ?  क्या यह शिष्टाचार का धन है ?  अन्ना साहब जिस पवित्र उद्देश्य को लेकर महाराष्ट्र से दिल्ली तक गांधीवादी तरीके से  आंदोलन  अनशन करते रहे हैं , उन्हें ऐसे भ्रष्ट लोगों से अपने आंदोलन को   बचाकर संचालित करने की ज़रूरत है. एक बहुत प्रचलित उदाहरण है कि चोर को पकड़ने 'चोर-चोर 'की आवाज़ लगा कर उसे दौड़ा रहे मोहल्ले वालों की भीड़ में शामिल होकर चोर खुद को आसानी से बचा लेता है. इसलिए अन्ना साहब को ध्यान रखना होगा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध बहुत साफ़ -सच्चे मन से शुरू किया गया उनका यह जन-आंदोलन भी कहीं भ्रष्टाचारियों के लिए  अपना चेहरा बदलने और स्वयम को छुपाने  का ज़रिया और जमावड़ा न बन जाए .  चेहरों  के इस जमावड़े में अन्ना को असली-नकली चेहरों की बारीकी से पहचान करनी होगी .
                   अन्ना साहब के आंदोलन में जन-लोकपाल  विधेयक के प्रारूप की काफी चर्चा है.उनके सत्याग्रह का इकलौता एजेंडा भी यही है.  केन्द्र सरकार ने उनकी मांग मान कर इस क़ानून के प्रारूप को अंतिम स्वरुप देने के लिए दस लोगों की एक समिति बनाने का निर्णय लिया है और इसकी अधिसूचना सरकारी राजपत्र में प्रकाशित भी कर दी गयी है . इस कमेटी में सरकार के पांच मंत्री और अन्ना साहब की सिविल सोसायटी के पांच प्रतिनिधि  होंगे. सरकार लोकपाल विधेयक संसद के मानसून स्तर में लाने के लिए भी राजी हो गयी है. अन्ना साहब ने अनशन  खत्म कर दिया है. भ्रष्टाचार के खिलाफ तेजी से आया जन-समुद्र का ज्वार उतर चुका है. हालांकि अन्ना साहब ने कहा है कि एक लम्बी लड़ाई अभी बाकी है .उन्होंने जन-लोकपाल क़ानून संसद में पारित करने के लिए पन्द्रह अगस्त 2011  की समय-सीमा सरकार को दी है .उनके द्वारा समिति में पांच लोगों के नाम दिए गए हैं. उनमें दो नाम कानूनविद के रूप में पिता-पुत्र के भी हैं .यह बात कुछ खटक तो रही है. बेहतर होता ,अगर इसमें स्वामी रामदेव को भी शामिल कर लिया जाता . भ्रष्टाचार की राष्ट्रीय समस्या पर वे पिछले कई वर्षों से देश भर में जन-चेतना जाग्रत करते चले आ रहे हैं .
      आगे क्या होगा ,यह तो समय ही बताएगा . अभी तो अन्ना साहब के  प्रस्तावित जन-लोकपाल विधेयक के बारे में बहुत विस्तार से  कहीं  पढ़ने को नहीं मिला. वैसे लोकपाल क़ानून का एक सरकारी प्रारूप केन्द्र के पास पिछले चालीस वर्षों से रखा हुआ है. अब इस जन-लोकपाल क़ानून का प्रस्ताव किसने कब और कहाँ तैयार कर लिया ? आंदोलन के आयोजकों को इसका विस्तृत प्रारूप मीडिया के सहयोग से जनता के बीच रखना चाहिए. ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग  उस पर अपनी राय दे सकें .वेबसाईट पर  प्रदर्शित किसी भी सामग्री पर कमेन्ट बॉक्स में टिप्पणी करने की सुविधा रहती है. इसलिए  वेबसाईट पर भी इस विधेयक का प्रारूप  प्रदर्शित कर आम जनता की प्रतिक्रिया ली जानी चाहिए . सभी राज्यों में विधेयक का प्रारूप भेज कर विकास खंड ,तहसील ,जिला और राजधानियों के स्तर पर नागरिकों की चर्चा-परिचर्चा का आयोजन किया जा सकता है ,ताकि जो क़ानून बनाया जाने वाला है , उस पर जनता भी अपने सुझाव दे सके . वास्तव में यही लोकतांत्रिक तरीका होगा .
     फिलहाल तो प्रस्तावित क़ानून के बारे में  थोड़ी बहुत जो भी जानकारी मिली है ,   उसके मुताबिक़ इसमें भ्रष्टाचार के संभावित आरोपों में  जिन लोगों पर प्रस्तावित जन-लोकपाल की ओर से कार्रवाई होगी ,उनकी सूची में कई बड़े और सबसे बड़े ओहदों को शामिल नहीं किया गया है . मेरे ख्याल से जब तक भावी  जन-लोकपाल क़ानून के दायरे में  लोकतंत्र के चारों प्रमुख स्तम्भों - विधायिका ,न्यायपालिका  , कार्यपालिका और प्रेस अथवा मीडिया को एक साथ समान रूप से शामिल नहीं किया  जाएगा , तब तक इसकी कामयाबी का सपना साकार नहीं हो पाएगा . जब तक लोकतंत्र के इन चारों  अनिवार्य घटकों की बड़ी से बड़ी कुर्सियों से लेकर छोटे से छोटे  ओहदेदारों तक के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच और सुनवाई तथा सजा सुनाने का अधिकार जन-लोकपाल को नहीं मिलेगा , तब तक उसकी कोई उपयोगिता साबित नहीं होगी . स्वयं जन लोकपाल को भी इसकी परिधि  में आना होगा . अगर एक भी कुर्सी इस क़ानून के दायरे से छूट गयी , तो फिर जनता को यह समझते  देर नहीं लगेगी  कि खाने और दिखाने के दांत अलग-अलग हैं ! 
                                                                                                               --  स्वराज्य करुण

2 comments:

  1. विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और प्रेस अथवा मीडिया को भी लाना चाहिए....

    ReplyDelete
  2. अनवरत सिलसिला जैसा, लेकिन फिलहाल स्‍वागतेय.

    ReplyDelete