Sunday 3 April 2011

समस्या नहीं , शक्ति है आबादी !

                                                                                                       स्वराज्य करुण       


                                                                                                                             
                                                                                                                           
       अच्छी कार्य-संस्कृति के साथ अगर बेहतर प्रबंधन हो ,  तो  किसी भी देश की जनसंख्या उसकी सबसे बड़ी ताकत हो सकती है. चीन का उदाहरण हमारे सामने है, जो दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है लेकिन उसके साथ  हर तरह के वैचारिक मतभेद होने के बावजूद  आज की दुनिया उसे एक आर्थिक महाशक्ति ज़रूर मानती है. विज्ञान और तकनीकी विकास में भी वह काफी आगे है . झिनिंग से ल्हासा (तिब्बत ) तक  ऊंचे पहाड़ों की  बर्फीली वादियों में दुनिया का सबसे ऊंचा रेल-मार्ग बनाने का कमाल उसने पांच वर्ष पहले २००६ में  कर दिखाया है. यह रेल मार्ग एक हज़ार ९५६ किलोमीटर लंबा है और तान्घुला में तो यह समुद्र की सतह से पांच हज़ार ०७२ मीटर की ऊंचाई से गुजरता  है , जो दुनिया का सबसे ऊंचा  रेल-ट्रेक है. यह  रेल-पथ  एक विश्व-कीर्तिमान है.  दुनिया की कुल आबादी में एक सौ चौंतीस करोड़ यानी  १९.४ प्रतिशत जनसंख्या अकेले चीन की है . उसके बाद हमारा नम्बर आता है . विश्व की सम्पूर्ण जनसंख्या में हम भारतीयों की आबादी १७.४ प्रतिशत है.
            मै यह बात  हमारे देश में इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक की शुरुआत ,यानी वर्ष २०११ की जन-गणना के प्रारम्भिक रूप से जारी आंकड़ों के संदर्भ में कह रहा हूं .यह आधुनिक युग में विगत वर्ष १८७२ से देश में  शुरू हुई जन-गिनती की प्रत्येक दस वर्षीय परम्परा के हिसाब से पंद्रहवीं जन-गणना थी, जिसके मुताबिक़  हमारी कुल आबादी १२१ करोड़ ०१ लाख ९३ हज़ार ४२२ तक पहुँच गयी है. मोटे तौर पर कहें तो अब हम लोग एक सौ इक्कीस करोड़ की गिनती को पार कर  चुके हैं . इनमे पुरुष जन संख्या ६२ करोड़ ३७ लाख और महिला जन संख्या ५८ करोड़ ६५ लाख है. एक चिंतनीय बात यह है कि वर्ष २००१ की जन-गणना में जहां छह साल के बच्चों की आबादी के हिसाब से हमारे यहाँ जो लैंगिक अनुपात प्रति एक हज़ार पुरुषों पर ९२७ महिलाओं का था , वहीं दस वर्ष बाद २०११ की जन-गिनती में यह घट कर हर एक हज़ार पुरुष आबादी पर ९१४ महिलाओं का रह गया है. लेकिन एक अच्छी  खबर यह भी है कि जन-गिनती २०११ की प्रारम्भिक रिपोर्ट के अनुसार देश की चौहत्तर प्रतिशत आबादी साक्षर हो चुकी है. देश की साक्षरता दर में विगत एक दशक में ९.२ प्रतिशत का इजाफा हुआ है. कुल पुरुष साक्षरता ८२.१४ प्रतिशत और महिला साक्षरता ६५.४६ प्रतिशत हो गयी है. एक राहत वाली खबर यह भी है कि विगत दस वर्ष में हमारी आबादी की रफ्तार में ३.९० प्रतिशत की कमी आयी है , जो शायद परिवार नियोजन और शिक्षा और साक्षरता के प्रसार का एक सकारात्मक नतीजा है. हमारी आबादी अब इतनी हो गयी है, जो अमरीका,इंडोनेशिया , ब्राजील , पाकिस्तान , बंगला देश और जापान की कुल आबादी के लगभग बराबर है. यानी एक तरफ ये आधा दर्जन देश और दूसरी तरफ हम अकेले . भारी तो  हम ही पड़ेंगे . आंकड़े ही आंकड़े गिनाते रहने और आपका कीमती समय नष्ट करने का मेरा  कोई इरादा नहीं है ,लेकिन  जो बात मैं कहना चाहता हूं, उसमें कुछ ज़रूरी  बातें सांख्यिकी के हिसाब से ही कही जा सकती है.
           मैं देश को संचालित करने वाला  कोई अर्थ-शास्त्री नहीं हूं , जिनके महंगाई घटाने के सारे दावे एक-एक कर ध्वस्त होते जा रहे हैं ,लेकिन एक सामान्य भारतीय नागरिक के नाते निजी और सामाजिक जिंदगी के धरातल पर महंगाई ,बेरोजगारी और  भ्रष्टाचार की ज्वलनशील समस्याओं से आमना -सामना करते हुए कहीं न कहीं कुछ न कुछ  टोका-टाकी या फिर कुछ न कुछ टीका -टिप्पणी करने की आदत मेरी भी है . लिहाजा मै यह कहना चाहता हूं कि दुनिया में  आबादी का बढ़ना एक स्वाभाविक और प्राकृतिक  प्रक्रिया है. जन-संख्या नियंत्रण के उपायों के ज़रिये इसकी गति को कम ज़रूर किया जा सकता है .लेकिन एकदम से रोका नहीं जा सकता. अगर रोका जा सकता ,तो इस जन-गिनती में देश की आबादी की रफ़्तार में ३.९० प्रतिशत की गिरावट के बावजूद विशेषज्ञ यह दावा नहीं करते कि अगली दो जन-गणना में ,वर्ष २०३१ तक भारत आबादी के मामले में चीन से आगे हो जाएगा .
                      बहरहाल , बढ़ती आबादी को समस्या मानने और उसे जन-संख्या विस्फोट जैसा कोई डरावना नाम देने वालों को अपनी इस धारणा पर कुछ तथ्यों के साथ दोबारा विचार करना चाहिए . तब उन्हें लगेगा कि यह उनका वहम था उन्हें यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि देश में मंहगाई , बेरोजगारी और रोटी,कपड़ा और मकान के  लगातार .गहराते संकट के लिए  जन-संख्या उस हद तक ज़िम्मेदार नहीं है ,जितना कि उसे बढ़-चढ़ कर बताया जाता है. बाबा रामदेव और दूसरे नामी-गिरामी विद्वानों की मानें तो देश की अरबों-खरबों रूपयों की जितनी दौलत काले धन के रूप में देश के भीतर छुपा कर रखी गयी है, उतना ही  बेहिसाब धन विदेशी बैंकों में छुपाया गया है. यह सारा का सारा पैसा आम जनता का है ,जिसे कुछ सफेदपोश डाकुओं ने बड़ी सफाई से लूट कर देश -विदेश में छुपा रखा है. इस तथ्य की पुष्टि के लिए सिर्फ एक उदाहरण के तौर पर पुणे के हसन अली खान नामक व्यक्ति की काली करतूतों को देखा जा सकता है , जिसके नाम पर  स्विस बैंक के एक खाते में आठ सौ करोड़ डालर जमा होने का पता चला है और जिस पर भारत सरकार का चालीस हज़ार करोड़ से बहत्तर हज़ार करोड़ रूपयों का भारी आय कर बकाया है ,जबकि हमारी ताज़ा जन-संख्या केवल १२१ करोड़ है.  अगर इस आठ सौ करोड़ डालर में से १२१ करोड़ डालर हमारी १२१ करोड़ की ताज़ा जन-संख्या में बराबर-बराबर बाँट दिए जाएँ , तो प्रत्येक भारतीय को एक करोड़  डालर यानी पचास करोड़ रूपए मिल सकते हैं .  फिर भी  हसन अली के खाते में ६७९ करोड़ डालर शेष रह जाएंगे . अगर उसके खाते को जब्त कर प्रत्येक भारत वासी को एक करोड़ डालर दे दिए जाएँ , तो देश में हर नागरिक करोड़पति हो जाएगा .
     सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की वज़ह से फिलहाल घोड़ा व्यापारी के नाम से कुख्यात यह टैक्स-चोर जेल में है,लेकिन मीडिया की ख़बरों पर यकीन करें तो इस आदमी के काले धन के घिनौने धंधे में देश की अनेक नामी हस्तियाँ भी हिस्सेदार हैं. हसन अली के गुप्त बैंक खाते न्यूयार्क और दुबई के बैंकों में होने का पता लगा है. यह तो एक हसन अली है. इसके जैसे कई टैक्स-चोरों के अरबों-खरबों रूपयों का काला धन  यूनाईटेड बैंक ऑफ स्विट्ज़रलैंड (यूं.बी.एस. ) सहित कई विदेशी बैंकों में जमा हैं .पंद्रहवीं जन-गणना के तदर्थ आंकड़ों में हम भारतीयों की आबादी एक सौ इक्कीस करोड़ बतायी गयी है , जबकि अकेले टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला एक लाख ७६ हज़ार करोड़ रूपयों का बताया जा रहा है . कहाँ १२१ करोड़ इंसान और कहाँ एक लाख ७६ हज़ार करोड़  रूपए  ! इसी तरह कॉमन-वेल्थ खेल घोटाले की रकम भी बहुत भारी -भरकम है, जो अस्सी हज़ार करोड़ से भी ज्यादा का बता जाता है. कहाँ हम १२१ करोड़ भारतीय और कहाँ अस्सी हज़ार करोड़ रूपयों का विशाल महा सागर ! अगर टू-जी स्पेक्ट्रम और कॉमन-वेल्थ खेल घोटाला नहीं हुआ होता , अगर हसन अली जैसे टैक्स चोर देश की  अथाह  दौलत को बेरहमी से लूटकर बेशर्मी से विदेशी बैंकों में नहीं छुपाते ,तो ज़रा सोचिए , आज १२१ करोड़ भारतीयों में से हर एक के पास कितना धन होता !
     मान भी लें कि इस धन का प्रति व्यक्ति वितरण संभव नहीं है, पर सरकार इसे जनता की भलाई के लिए प्रति-व्यक्ति निवेश तो कर ही सकती थी !  गरीबी आसानी से दूर हो जाती और देश खुशहाल होता . इसलिए मेरे विचार से तो गरीबी की समस्या का जन-संख्या वृद्धि से कोई लेना -देना नहीं है. महंगाई का भी जन-संख्या के बढ़ने से कोई सीधा संबंध नहीं है. काले धन के हज़ारों-लाखों करोड़ रूपयों की चोरी और जमाखोरी को सख्ती से रोका जाए, देश के कुछ शातिर किस्म के व्यापारियों के बीच  ज़ुबानी जमा-खर्च से हो रहे  वायदा -कारोबार और हवाला -कारोबार को कठोरता से खत्म किया जाए , तो क्या मजाल कि महंगाई सिर उठा ले ! देश में बढ़ती शहरी  आबादी के लिए आवास की ज़रूरत भी आसानी से पूरी हो सकती है, बशर्ते किसी भी परिवार  को उसकी सदस्य संख्या के हिसाब से मकान के लिए दो -चार हज़ार वर्ग फुट से ज्यादा जमीन खरीदने की अनुमति किसी भी हालत में न दी जाए !
    सरकारी अफसरों और सरकारी नेताओं के लंबे-चौड़े , विशाल भू-खंडों में निर्मित बंगलों का  इस लोकतंत्र के युग में भला क्या औचित्य है ? इनमे से एक-एक बंगला जितने रकबे में फैला होता है, उतने में तो कई सरकारी लोगों  के लिए पर्याप्त आकार के मकान बन सकते हैं और सबका गुज़ारा आसानी से हो सकता है . गाँवों में भी मकानों के  लिए प्रति परिवार ज़मीन का आकार तय कर दिया जाए . खेती की ज़मीन का बटवारा भी उसी हिसाब से किया जा सकता है .यह तय हो जाना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति अधिकतम कितनी  कृषि -भूमि अपने लिए रख सकता है. हज़ारों एकड बेनामी ज़मीन रखने वालों की गहराई से निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.  उनके कब्जे से अतिरिक्त भूमि राजसात कर भूमिहीनों को दी जानी चाहिए.  सीलिंग क़ानून तो है, लेकिन समय और आबादी के हिसाब से राष्ट्र-हित में उसे संशोधित कर उसका कठोरता से पालन होना चाहिए .
                            जहां तक बेरोजगारी का सवाल है , तो मेरे ख़याल से बढ़ती आबादी इसके लिए भी कहीं  ज़िम्मेदार नहीं है. वास्तव में हम कभी यह साफ़-साफ़ आंकलन करते ही नहीं हैं कि अगले पांच-दस या पन्द्रह वर्षों में हमारे देश को कितने डॉक्टर , कितने पैरा-मेडिकल कर्मचारी ,कितने इन्जीनियर ,कितने कृषि-विशेषज्ञ ,  कितने प्रशिक्षित टेक्निशियन , कितने शिक्षक , और   अन्य प्रकार के कितने कर्मचारी  चाहिए ?  अगर स्कूल-कॉलेजों में, तकनीकी शिक्षण-संस्थाओं में  देश की  दूरगामी ज़रूरतों के अनुपात में छात्र-छात्राओं का दाखिला हो ,तो पढाई पूरी करने और पास-आऊट होने के बाद वे सब अपने-अपने रोजगार से लग जाएंगें . तब कोई भला कैसे बेरोजगार रहेगा ? अगर बढ़ती जन-संख्या को इन उपायों के ज़रिये रोजी-रोजगार और रोटी, कपड़ा और मकान का बंदोबस्त हो जाए , तब तो कोई भौतिक समस्या ही नहीं रह जाएगी .सबकी भौतिक ज़रूरतें पूरी होंगी तो लोगों का मानसिक स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा और देश और समाज में सुख-शान्ति का वातावरण बनेगा . लोग देश के विकास के लिए मन लगा कर काम करेंगे . इसलिए हम अपनी जन-संख्या को समस्या नहीं ,बल्कि राष्ट्रीय -जीवन की शक्ति मानें और आबादी के साथ-साथ संसाधनों का भी बेहतर प्रबंधन करें .इसमें ही सबका भविष्य बेहतर होगा .
                                               
                                                                                                                  स्वराज्य करुण                    

3 comments:

  1. ''अपनी जन-संख्या को समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जीवन की शक्ति मानें और आबादी के साथ-साथ संसाधनों का भी बेहतर प्रबंधन करें'' शायद ऐसा ही कुछ डॉ. एपीजे कलाम ने कहा था.

    ReplyDelete
  2. हर मुश्किल का ज़िम्मेदार
    अपने देश का भ्रस्टाचार
    इसको दूर करे इन्सान
    ताकि जीना हो आसान.

    ReplyDelete
  3. एक परिवार को कितने रोजगार ? आयकर व्यक्तिगत या पारिवारिक ?
    मुद्दे बहुतेरे हैं क्या किया जाए ?

    ReplyDelete