Wednesday, August 12, 2020

उम्र मिली सिर्फ़ 34 साल ,लेकिन बने 20 से ज़्यादा भाषाओं के विद्वान


  महान भाषाविज्ञानी  हरिनाथ डे 

  आलेख : स्वराज करुण 

आम तौर पर एक मनुष्य अपनी पूरी ज़िन्दगी में कितनी भाषाएं सीख और समझ सकता है ?  एक तो अपनी मातृभाषा जो उसे अपनी माता और अपने घर -परिवार में प्रचलित बोलचाल  से मिलती है ,दूसरी भाषा वह घर के बाहर के समाज से ग्रहण करता है । यह उसकी स्थानीय दुनिया से दिन -प्रतिदिन के सम्पर्क की भाषा होती है । इसके अलावा अपने कार्यालय अथवा कार्य -स्थल  की भाषा और अगर वह कोई व्यापारी या कारोबारी हुआ तो अपने कारोबार में सुविधा के लिए बाज़ार की भाषा। 

 यानी एक सामान्य मनुष्य अपने पूरे जीवनकाल में चार -पाँच से अधिक भाषाएं नहीं सीख सकता ,लेकिन भारत भूमि पर अनेक ऐसी महान  विभूतियों ने जन्म लिया है ,जिन्होंने अपनी विलक्षण प्रतिभा से एक साथ इससे भी ज़्यादा भाषाओं का ज्ञान अर्जित कर समाज को आश्चर्यचकित कर दिया । इनमें   आज़ाद हिन्द फौज के संस्थापक नेताजी सुभाषचन्द्र बोस  और देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय पी.व्ही .नरसिंहराव जैसी हस्तियां शामिल हैं। लेकिन इन्हीं  दिग्गज प्रतिभाओं में से एक भूली -बिसरी विभूति हैं स्वर्गीय हरिनाथ डे ।  वह कवि ,लेखक और चिन्तक होने के साथ -साथ एक महान भाषाविज्ञानी थे। 

  छत्तीसगढ़  और बंगाल सहित सम्पूर्ण भारत  का गौरव बढ़ाने वाले हरिनाथ डे को ईश्वर ने  सिर्फ 34 साल की ज़िन्दगी दी , लेकिन इतनी कम उम्र में उन्होंने देश -विदेश की बीस से भी ज्यादा भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया था । राजधानी रायपुर को अनेक महान विभूतियों की जन्म और कर्मभूमि होने का  गौरव प्राप्त है । प्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय हरि ठाकुर ने अपने ग्रन्थ 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' में इन विभूतियों की महान उपलब्धियों से सुसज्जित जीवन यात्रा का विस्तृत वर्णन किया है । उल्लेखनीय है कि महान दार्शनिक और समाज सुधारक स्वामी विवेकानन्द ने अपने बाल्यकाल के दो स्वर्णिम वर्ष यहाँ बिताए थे । उन्हीं की तरह विलक्षण प्रतिभा के धनी हरिनाथ डे ने भी अपनी किशोरावस्था के कुछ साल रायपुर में गुज़ारे । हरिनाथ के पिता श्री भूतनाथ डे रायपुर के प्रतिष्ठित वकील और म्युनिसिपल कमेटी के उपाध्यक्ष रह चुके थे । उन्हें अंग्रेज सरकार से राय बहादुर की पदवी मिली थी। वह स्थानीय बूढ़ापारा के निवासी थे। स्वामी विवेकानंद के पिता विश्वनाथ जी रायपुर प्रवास के दौरान कुछ महीने भूतनाथ डे के घर रुके थे। विश्वनाथ जी यहाँ स्वास्थ्य लाभ के लिए आए थे। ।

  वकील भूतनाथ डे के सुयोग्य सुपुत्र  हरिनाथ का  जन्म  बंगाल के एक गाँव आरिया दाबा स्थित अपने ननिहाल में  12 अगस्त 1877 को हुआ था ।  बालक हरिनाथ को अधिक से अधिक भाषाएं सीखने की प्रेरणा शायद अपनी माता एलोकेशी से मिली थी ,जो  हिन्दी ,बांग्ला , मराठी और अंग्रेजी भाषाओं की जानकार थीं। हरिनाथ  अपने वकील पिता राय बहादुर श्री भूतनाथ डे के पास रायपुर (छत्तीसगढ़ )  आने के बाद यहाँ उनकी प्राथमिक शिक्षा मिशन स्कूल में  और मिडिल स्कूल की पढ़ाई गवर्नमेंट हाई स्कूल  में हुई। इस हाई स्कूल को हम आज स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जयनारायण पांडेय के नाम पर प्रोफेसर जे.एन.पांडेय शासकीय बहुउद्देश्यीय उच्चतर माध्यमिक शाला के रूप में   जानते हैं । रायपुर में हरिनाथ ने  मिडिल स्कूल की शिक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की । उन्हें छात्रवृत्ति भी मिली । हरि ठाकुर बताते हैं कि हरिनाथ यहाँ एक ईसाई संगठन के सम्पर्क में आए और उन्होंने बाइबल का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद किया।     इसी दरम्यान उन्होंने लैटिन भाषा का भी ज्ञान प्राप्त कर लिया । उनकी गिनती इस भाषा के विद्वानों में होने लगी । रायपुर में  मिडिल तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए हरिनाथ  कलकत्ता चले गए।,जहाँ सेंट जेवियर कॉलेज में दाख़िला लिया और  वर्ष 1892 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से इंटरमीडिएट की परीक्षा में  प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए । उन्होंने अंग्रेजी और लैटिन भाषाओं में प्रावीण्यता भी दिखाई । उस वर्ष कलकत्ता विश्वविद्यालय में इंटरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले वह इकलौते विद्यार्थी थे । उन्हें छात्रवृत्ति मिली । 

                        

   उन्होंने कलकत्ता के ही प्रेसिडेंसी कॉलेज में एडमिशन लिया और वर्ष 1896 में वहाँ  परीक्षा उत्तीर्ण कर प्रथम श्रेणी में ग्रेजुएट हुए ।  उच्च शिक्षा के लिए केम्ब्रिज  भेजने उनका चयन किया गया । वर्ष 1896 में ही हरिनाथ ने स्वाध्यायी छात्र के रूप में लैटिन भाषा में प्रथम श्रेणी में एम. ए.किया । इस उपलब्धि के लिए उन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया । वर्ष 1897 में उन्होंने इटैलियन कवि दांते की कविताओं पर शोध पत्र प्रस्तुत किया । हरिनाथ ने इंग्लैंड में भी पढ़ाई के दौरान अपनी अदभुत प्रतिभा का प्रदर्शन किया ।

   वहाँ क्राइस्ट कॉलेज कैम्ब्रिज में अध्ययन करते हुए उन्होंने  प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में ग्रीक भाषा में एम.ए.की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर ली । वर्ष 1900 में वह क्राइस्ट कॉलेज कैम्ब्रिज स्नातक हुए । उसी वर्ष उन्होंने इंडियन सिविल सर्विस (आई .सी एस.) की परीक्षा में भी कामयाबी हासिल की ,लेकिन ब्रिटिश सरकार के  उच्च प्रशासनिक पद की पेशकश को उन्होंने स्वीकार नहीं किया । उन्हें  कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी कॉलेज में प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति दी गयी . वहां से वर्ष 1905 में उन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत ,अरबी और ओडिया भाषाओं में परीक्षाएं उत्तीर्ण की । इस पर उन्हें तीन हजार रूपए का पुरस्कार मिला । सन 1906 में वह हुगली कॉलेज के प्राचार्य के पद पर नियुक्त हुए । प्राचार्य के पद पर कार्य करते हुए उन्होंने स्वाध्याय से पाली भाषा में भी एम.ए. कर लिया । हिन्दी और  बंगला के ज्ञाता तो वह थे ही , उन्होंने  स्वाध्याय से पाली ,संस्कृत ,तिब्बती अरबी ,ओड़िया  ,भाषाओं के साथ -साथ ग्रीक ,स्पेनिश ,लैटिन तिब्बती ,चीनी ,हिब्रू , फारसी ,रूसी ,तुर्की , रुमानियन,रूसी  पोर्तुगीज ,इटैलियन ,स्पेनिश, एंग्लो-सेक्शन , जर्मन, फ्रेंच , डच  आदि कई भाषाओं में  भी दक्षता हासिल की और  कई भाषाओं की साहित्यिक रचनाओं का  अंग्रेजी  ,बांग्ला  आदि भाषाओं में  अनुवाद भी किया । उन्हें  कई अन्य भारतीय और एशियाई भाषाओं में दक्षता हासिल थी।पंद्रह अगस्त 1911 को मोतीझीरा की बीमारी से पीड़ित हुए और 30 अगस्त 1911 को उनका निधन हो गया ।

 स्वर्गीय श्री हरि ठाकुर के अनुसार -हरिनाथ डे जितने बड़े भाषा शास्त्री थे ,भाषाविद् थे ,विभिन्न भाषाओं के साहित्य के जानकार थे ,उतने ही बड़े चिन्तक और धुरंधर लेखक भी थे । हरिनाथ डे को भाषाएँ सीखने का पागलपन की सीमा तक शौक था।किसी भी भाषा को सीखने में उन्हें कुछ महीनों से अधिक समय नहीं लगता था । जिन भाषाओं को उन्होंने सीखा , उनके साहित्य का गहन अध्ययन भी उन्होंने किया । अपने संक्षिप्त जीवन काल में उन्होंने 50 से भी अधिक कृतियों का सफलतापूर्वक सृजन कर अपनी अदभुत लेखन क्षमता और दक्षता का परिचय दिया । उन्होंने  बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के कालजयी बांग्ला उपन्यास 'आनन्द मठ ' और उनकी लोकप्रिय कविता 'वंदेमातरम' का अंग्रेजी और लैटिन भाषाओं में अनुवाद किया था,जो वर्ष 1906 में प्रकाशित हुआ । पाणिनि और बुद्ध घोष पर उनकी व्याख्यात्मक समीक्षा भी वर्ष 1906 में छपी। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा किए गए बौद्ध ग्रंथों के त्रुटिपूर्ण अनुवादों को जहाँ संशोधन सहित प्रस्तुत किया ,वहीं महाकवि कालिदास के संस्कृत महाकाव्य ' अभिज्ञान शाकुंतलम ' के दो खण्डों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया। 

हरिनाथ जी की मौलिक और अनुवादित कृतियों की एक लम्बी सूची है। स्वर्गीय हरि ठाकुर ने 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' में उनके जीवन परिचय के साथ  इन कृतियों का  भी उल्लेख किया है। स्वर्गीय हरि ठाकुर ने 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' में उनके जीवन परिचय के साथ  इन कृतियों का  भी उल्लेख किया है। ठाकुर साहब द्वारा  दी गयी सूची के एक हिस्से की फोटोकॉपी   मैंने  इस पोस्ट में संलग्न की  है।,जिसके अवलोकन से हरिनाथ जी की विलक्षण प्रतिभा का परिचय मिलता है। विलक्षण प्रतिभा के धनी , महान भाषाविद स्वर्गीय हरिनाथ डे को   विनम्र  नमन।

     --स्वराज करुण

Wednesday, August 5, 2020

कितनी रामकथाएं : कितने महाकाव्य ?

          आलेख : स्वराज करुण
भारत के सांस्कृतिक इतिहास में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जीवन -गाथा अनुपम और अतुलनीय है। प्राचीन काल में उनके । महान जीवन संग्राम पर  महाकवियों द्वारा  कई रामायणों की रचना की गयी है । अलग -अलग समय में ,अलग -अलग भाषाओं में अनेक रचनाकारों ने  भगवान श्रीराम की कीर्ति -कथा को  अपने -अपने ढंग से प्रस्तुत किया है।
  भारतीय लोक मानस में भगवान श्रीराम की छवि मानव रूप में एक महान लोक नायक की है। वह हमारे  समाज के 'रोल मॉडल'  हैं । उनकी जीवन यात्रा पर केन्द्रित जितने महाकाव्यों की रचना की गई है ,उतनी कृतियाँ संभवतः किन्हीं  और प्राचीन या पौराणिक नायकों पर विश्व साहित्य में कहीं भी  नहीं मिलती ।  उनका सम्पूर्ण जीवन और चरित्र अपने -आप में एक महाकाव्य था ,है और रहेगा,  जिसमें मनुष्य के पारिवारिक ,सामाजिक ,सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन के कई रंग हैं। मनुष्य रूप में उनके जीवन में समय -समय पर इतने  नाजुक मोड़ और इतने गंभीर उतार - चढ़ाव आए ,जिन्हें देखकर किसी भी भावुक और संवेदनशील व्यक्ति के सहज ही  कवि बन जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता ।
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने  अपने  महाकाव्य 'साकेत '
की दो पंक्तियों में इस भाव को कुछ इस तरह प्रकट किया है ---
   " राम तुम्हारा चरित स्वयं ही महाकाव्य है।
    कोई कवि बन जाए ,सहज संभाव्य है ।।"

  लेकिन मेरे जैसे सामान्य नागरिक रामकथा के नाम से सिर्फ संस्कृत में रचित वाल्मीकीय रामायण और अवधि में गोस्वामी  तुलसीदास जी के 'रामचरितमानस' को ही जानते हैं , जबकि राजेश्री महंत रामसुन्दर दास जी ने अपने ग्रंथ 'श्रीराम संस्कृति की झलक ' में १०८ रामायणों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि यह यथासंभव उपलब्ध सूची है। यानी रामायणों की संख्या इससे भी अधिक हो सकती है । महंत जी के लगभग साढ़े नौ सौ पृष्ठों के इस महा ग्रंथ पर 'पुस्तक चर्चा ' के रूप में मेरा यह आलेख अयोध्या में आज हो रहे श्रीराम मंदिर के भूमिपूजन के अवसर पर शायद मित्रों के लिए प्रासंगिक हो सकता है ।
           
   
 
        दक्षिण कोसल के नाम से इतिहास प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के ननिहाल के रूप में भी पौराणिक मान्यता प्राप्त है ।यानी यह माता कौशल्या का मायका माना जाता है ।  राजधानी रायपुर के पास ग्राम चंदखुरी को कौशल्या माता का जन्मस्थान माना जाता है ,जहाँ उनका भव्य मंदिर भी है। छत्तीसगढ़ सरकार ने उनके इस मंदिर को और भी अधिक भव्य रूप देने का निर्णय लिया है । राज्य में चिन्हांकित किए गए श्रीराम वन गमन पथ के संरक्षण और संवर्धन के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने प्रोजेक्ट बनाकर काम शुरू कर दिया है।
    छत्तीसगढ़ की  धरती के कण -कण में श्री राम संस्कृति की महिमा व्याप्त है । यहाँ के गाँव-गाँव में ' मानस मण्डलियां ' हैं , जिनमें शामिल बच्चे युवा और बुजुर्ग नवधा रामायण जैसे धार्मिक आयोजनों में और अन्य अवसरों पर उत्साह के साथ  महाकवि तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस ' की  संगीतमय प्रस्तुति देते हैं । यहाँ के प्रसिद्ध मानस मर्मज्ञों में धमतरी जिले के स्वर्गीय दाऊद खान और महासमुन्द जिले के पिथौरा निवासी स्वर्गीय शेख करीम का नाम भी सम्मान के साथ लिया जाता है , जिन्होंने इस अंचल में  कई दशकों तक  मानस प्रस्तुतिकरण के जरिये सामाजिक समरसता और सदभावना का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया  (स्वराज करुण ) भगवान श्रीराम के ननिहाल की इस धरती पर उनके आदर्श जीवन की अमिट छाप है , जिसे लेखक राजेश्री डॉ .महंत रामसुन्दर दास ने अपने महाग्रन्थ  ' श्रीराम संस्कृति की झलक ' में बड़ी ख़ूबसूरती से प्रस्तुत किया है ।  इस महाग्रन्थ में  न सिर्फ राजधानी रायपुर बल्कि छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के प्रमुख और प्राचीन मन्दिरों का अत्यंत सुरुचिपूर्ण शैली में वर्णन किया गया  है । इनमें श्रीराम और श्री हनुमान जी और भगवान शिव के भी अनेक मन्दिर शामिल हैं ।  राजेश्री महन्त रामसुंदर दास वर्तमान में रायपुर शहर के ४६४ साल पुराने दूधाधारी मठ के प्रमुख महन्त हैं । 
    इस मठ की स्थापना स्वामी बलभद्रदास जी द्वारा संवत  १६१०  में की गयी थी । एक  सुरही गाय  हनुमान जी की एक प्राचीन मूर्ति को अपने दूध से  नहलाती थी ।(स्वराज करुण)उस समय  जो दूध बहकर आता था स्वामीजी उसी का सेवन करते थे । इसलिए उनका नामकरण 'दूध आहारी'  हुआ जो आगे चलकर बोलचाल में दूधाधारी उच्चारित होने लगा । मठ का सञ्चालन गुरु - शिष्य परम्परा से हो रहा है ।
     लेखक राजेश्री डॉ. महन्त रामसुंदर दास इस परम्परा के नवमें गुरु हैं । उनकी इस पुस्तक से  पाठकों को यह भी पता चलेगा कि रायपुर में एक हजार साल से भी ज्यादा पुराना एक मन्दिर है ।यह विरंची नारायण मन्दिर शहर के ब्रम्हपुरी इलाके में स्थित है ,जो छत्तीसगढ़ के प्राचीनतम हनुमान मन्दिरों में से एक है । इसका निर्माण अक्टूबर सन् ९७३ ईस्वी में हुआ था । (स्वराज करुण ) पुस्तक के अनुसार इस मन्दिर में शेषशायी भगवान विष्णु और श्री नृसिंहनाथ जी की भी प्रतिमाएं हैं । (स्वराज करुण )हममें से अधिकांश लोग रामायण के नाम पर सिर्फ वाल्मीकीय  रामायण और तुलसीदास जी के रामचरित मानस से परिचित हैं ,जबकि महन्त रामसुंदर दास के इस महाग्रन्थ से हमें १०८ रामायणों की भी जानकारी मिलती है । वह कहते हैं -जिस प्रकार प्रभु श्रीरामचन्द्रजी अनन्त हैं ,उसी प्रकार रामायण भी अनन्त हैं । 
   राजेश्री डॉ .महन्त ने  इस महाग्रन्थ में वाल्मीकीय रामायण और रामचरित मानस जैसे कालजयी महाकाव्यों के साथ इन   रामायणों की सूची दी है और लिखा है कि यह यथा संभव उपलब्ध सूची है। यानी यह सूची और भी लम्बी हो सकती है। वर्तमान में उनके महाग्रंथ में दी गयी १०८ रामायणों की  सूची इस प्रकार है --
 (1)श्रीवाल्मीकीय रामायण ,(2)श्रीरामचरितमानस ,
 (३)अध्यात्मरामायण , (४) योग वशिष्ठ रामायण , 
(५) श्रीहनुमद रामायण (६) श्रीनारद रामायण 
(७) लघु रामायण (८) वृहद रामायण 
(९)अगस्त्य रामायण (१०) सार रामायण
 (११) देह रामायण (१२) वृत्त रामायण 
(१३) ब्रम्ह रामायण (१४ भारद्वाज रामायण 
(१५) शिव रामायण (१६) क्रौंच रामायण 
(१७) भरत रामायण (१८) जैमिनी रामायण 
(१९)आत्म धर्म रामायण (२०) श्वेतकेतु रामायण 
(२१) जटायु रामायण (२२) रवि रामायण 
(२३) पौलस्ति रामायण (२४) देवि रामायण 
(२५) गुह्यक रामायण (२६) मंगल रामायण 
(२७) विश्वामित्र रामायण (२८) सुतीक्ष्ण रामायण 
(२९ ) सुग्रीव रामायण (३०) विभीषण रामायण 
(३१) आनन्द रामायण  (३२) ब्यासोक्त रामायण
(३३) शुक रामायण (३४) शेष रामायण 
(३५) आगम रामायण (३६) कूर्म रामायण 
(३७) स्कंद रामायण    (३८) अरुण रामायण 
(३९) पद्य रामायण      (४०) धर्म रामायण 
(४१) आश्चर्य रामायण (४२) अदभुत रामायण 
(४३) अत्रि रामायण (४४) अम्बिका रामायण 
(४५) अवधूत रामायण (४६) आचार्य रामायण 
(४७) औसनस रामायण (४८) दुर्वासा रामायण 
(४९) नन्दि रामायण  (५०) ईश्वर रामायण 
(५१) कपिल रामायण (५२) कलि रामायण 
(५३) कालिका रामायण (५४) कुमार रामायण 
(५५) गणेश रामायण (५६) गरुड़ रामायण 
(५७) चम्पू रामायण (५८) जैन रामायण 
(५९) जामवन्त रामायण (६०) नल रामायण 
(६१) नील रामायण (६२) नाटक रामायण 
(६३) नरसिंह रामायण (६४) पद्म रामायण 
(६५) परासर रामायण (६६) बकदाल्भ्य रामायण 
(६७) ब्रम्ह वैवर्तक रामायण (६८) ब्रम्हाण्ड रामायण 
(६९) भविष्योत्तर रामायण (७० ) भागवत रामायण 
(७१) भार्गव रामायण (७२) भारत रामायण 
(७३) मैंद रामायण (७४) मरीचि रामायण 
(७५) माहेश्वर रामायण (७८) मारुति रामायण 
(७९) मुदगल रामायण (८०) लिंग रामायण 
(८१) वरद रामायण (८२) वरुण रामायण 
(८३) वायु रामायण (८४) विष्णु रामायण 
(८५) श्रीरंग रामायण (८६) सनत्कुमार रामायण 
(८७) सनकादि रामायण (८८) वामन रामायण 
(८९) सुकन्द रामायण (९०) सूर्य रामायण 
(९१) हरिवंशीय रामायण (९२) शैव रामायण 
(९३) पंचरात्र रामायण (९४) हनुमन्त  रामायण 
(९७)महाकाली रामायण (९८) अग्नि रामायण 
(९९) महाभारत रामायण (१००) शिव भवानी रामायण 
(१०१) आत्म रामायण (१०२) संवृत रामायण 
(१०३) किशोर रामायण (१०४) नरकुटक रामायण
(१०५) प्रसन्न राघव रामायण (१०६) राधेश्याम रामायण 
(१०७) बरवै रामायण (१०८) अभिनव रामायण 

 लेखक राजेश्री डॉ. महन्त अपने महाग्रंथ 'श्रीराम संस्कृति की झलक ' में 'आत्म निवेदनम' के अंतर्गत  लिखते हैं -
  " छत्तीसगढ़ राज्य का यह सौभाग्य है कि इस पावन धरा को मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राघवेन्द्र सरकार जी का ननिहाल होने का गौरव प्राप्त है ।इसीलिए इस क्षेत्र को कोसल प्रान्त के नाम से  जाना जाता था ।छत्तीसगढ़ के निवासियों में यह भाव आज भी स्पष्ट देखा जा सकता है कि अपनी बहन की संतानों को भगवान श्रीरामजी के रूप में ही भांजा -भांजी मानकर पूजा जाता है ।"
   राजेश्री डॉ .महन्त जी के इस महाग्रन्थ में 53 अध्याय हैं ।  इसके चौथे  अध्याय में जहाँ श्री राम राज्य की विशेषताएं बतायी गयी हैं ,वहीं अध्याय 7 में भारत भूमि के महात्म्य और अध्याय 8 में प्रभु श्री राघवेन्द्र सरकार जी और रावण के युध्द का वर्णन है। इसके अलावा अध्याय 13 में छत्तीसगढ़ प्रदेश के विभिन्न  व्रत ,उत्सवों और त्यौहारों में तथा लोगों के दैनिक जीवन में श्रीराम भक्ति की झलक दिखायी गयी है । 
 अध्याय १४ से अध्याय ४६ तक (पृष्ठ ३२८ से ३७८ तक )छत्तीसगढ़ के प्राचीन और पुरातात्विक महत्व के मंदिरों  सहित विगत कुछ दशकों में स्थापित मंदिरों की  जिलेवार सूची  उनमें से प्रत्येक मंदिर के प्रमुख विवरणों सहित प्रकाशित की गयी  है ,जिनमें कहीं न कहीं ,किसी न किसी रूप में श्रीराम संस्कृति की झलक मिलती है । इनमें अधिकांश श्रीराम जी और हनुमानजी के मंदिर शामिल हैं । राजधानी रायपुर के ऐतिहासिक श्रीदूधाधारी मंदिर के बारे में उन्होंने लिखा है कि इसकी स्थापना का काल सम्वत १६१० माना जाता है। यह स्थान श्रीस्वामी बलभद्र दास जी द्वारा स्थापित है।
     यह भी उल्लेखनीय है कि श्री दूधाधारी मंदिर न्यास ने  छत्तीसगढ़ को शिक्षा के प्रकाश  से आलोकित करने के लिए अपना सराहनीय योगदान दिया है। लेखक ने  पुस्तक में जानकारी दी है कि  इस मंदिर के तत्कालीन प्रमुख राजेश्री महंत वैष्णवदास ने  रायपुर में वर्ष १९५५ में श्री दूधाधारी वैष्णव संस्कृत महाविद्यालय और वर्ष १९५८ में   श्री दूधाधारी बजरंगदास महिला महाविद्यालय और वर्ष १९५८ में ही अभनपुर में बजरंग दास उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की स्थापना की थी। बजरंगदास जी उनके गुरु थे। रायपुर में श्रीदूधाधारी वैष्णव संस्कृत महाविद्यालय का शुभारंभ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की जयंती पर 2 अक्टूबर १९५५ को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद  के हाथों हुआ था। महंत वैष्णव दास जी ने संस्कृत महाविद्यालय और महिला महाविद्यालय के सुचारू संचालन के लिए आर्थिक स्रोत के रूप में बलौदाबाजार और भाटापारा इलाके में पर्याप्त कृषि योग्य भूमि भी दान की गयी थी। उनके द्वारा बलौदाबाजार के विधि महाविद्यालय को भी आर्थिक दृष्टि से सक्षम बनाने के लिए पलारी के पास कृषि भूमि दान में दी गयी थी।
    मेरे विचार से यह महाग्रन्थ छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक इतिहास का एक विशाल अभिलेख है ,जिसे अपने -आप में एक शोध -ग्रन्थ भी माना जा सकता है ।लेखक ने  यह  पुस्तक अपने गुरु राजेश्री महन्त वैष्णवदास जी को समर्पित की है । रामनवमी के दिन संवत २०७४ यानी ५अप्रेल सन् २०१७ ईस्वी को इसका प्रकाशन हुआ । इस महाग्रन्थ के रचनाकार राजेश्री डॉ.महन्त वर्ष २००८ से २०१३तक  जांजगीर जिले के मालखरौदा से विधायक भी रह चुके हैं और वर्तमान में भी वह उस क्षेत्र के विधायक हैं  ,लेकिन मूल रूप में उनका व्यक्तित्व राजनीतिक  नहीं बल्कि आध्यात्मिक है । उन्होंने अपनी पुस्तक के माध्यम से छत्तीसगढ़ के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक इतिहास को सामने लाने का सराहनीय प्रयास  किया है ।
       -स्वराज करुण

Thursday, July 30, 2020

(कविता) दाल में कुछ काला तो नहीं ?

                    - स्वराज करुण 
देश और  दुनिया में
जिसको देखो ,उसको कोरोना ,
जहाँ देखो ,वहाँ कोरोना !
कहीं कोई  गड़बड़ झाला तो नहीं ?
दाल में कुछ काला तो नहीं ?
राजा हो या रंक ,
सब पर छाया है
कोरोना का आतंक !
गाँव -गाँव ,पाँव -पाँव ,
नगर -नगर ,डगर -डगर
सिर्फ़ कोरोना का रोना ?
सुबह से रात तक 
टी .व्ही. चैनलों के पर्दे पर
देखते रहो कोरोना का ओढ़ना ,
कोरोना का बिछौना !
ऐसा कैसे हो रहा है कि
हर गली ,हर मोहल्ले में
आनन -फानन में निकल रहे हैं
कोरोना के मरीज  ?
कहीं टेस्ट में तो कोई गड़बड़ी तो नहीं ?
पूछ रहा है यह नाचीज़ !
जिसको  न सर्दी ,न खाँसी ,न बुखार ,
उसे भी पकड़ कर कह रहे -
टेस्ट करवा लो मेरे यार !
कहीं ऐसा तो नहीं कि
कोरोना है अरबों ,ख़रबों डॉलर का
कोई अंतर्राष्ट्रीय व्यापार ?
          -स्वराज करुण

Wednesday, July 29, 2020

(कविता ) शहर में बारिश

          -- स्वराज करुण 


                       काले ,घुंघराले बादलों 
                       के बीच सूर्योदय और सूर्यास्त !
                       उनकी रिमझिम बरसती
                       जल बूंदों की सरसराहट से भरा 
                       एक भीगा हुआ दिन ! 
                       जब दोपहर को भी लगता है जैसे
                      अभी तो सुबह के छह बजे हैं !
                      शहर की सीमेंट -कांक्रीट वाली
                      उबड़ -खाबड़ सड़कों से टकरा कर
                       टपकती ,उछलती बूंदें भी नहीं बुझा पातीं
                       धरती की प्यास !
                       सोख लेता है उन्हें 
                       वन ,टू ,थ्री ,फोर बी.एच.के.वाला 
                       पथरीला बेजान -सा जंगल , 
                       या फिर पी जाते हैं  बहुमंजिले फ्लैट्स के
                       गगनचुंबी पहाड़ !
                      कभी बहुत ज़्यादा पड़ी बौछारें 
                     तो निचली बस्तियों की 
                     बजबजाती नालियों से सैलाब बनकर 
                    ग़रीबों की झुग्गियों में 
                    घुस जाती हैं आषाढ़ ,सावन और 
                   भादो  के काले ,घुंघराले बादलों की बूंदें 
                   और कर देती हैं उनका जीना मुहाल !
                   झुग्गियाँ  पीढ़ी -दर -पीढ़ी  देख रही हैं -
                   इस तरह होती है शहर में बारिश 
                    बहुत कुछ बदल गया देश में ,
                   लेकिन नहीं बदला तो 
                   शहरों में होने वाली 
                   बारिश का यह सालाना मंज़र !

               ---स्वराज करुण 
              
     
   
   
  


  

Tuesday, July 28, 2020

(कविता ) कहीं न कहीं तो होगा ऐसा कोई देश

कहीं न कहीं  तो होगा कोई  ऐसा देश !
       ****
इस धरती पर नहीं तो
इस ब्रम्हांड में
और इस  ब्रम्हांड में नहीं तो
सुदूर आकाश गंगाओं में
कहीं न कहीं  तो होगा 
ऐसा देश ,
जहाँ इंसानों को सिर्फ़ और सिर्फ
इंसान समझा जाता हो ,
हिन्दू या मुसलमान नहीं ,
सिक्ख या ईसाई नहीं !
जहाँ न होते हों
मन्दिर , मस्ज़िद के झगड़े ,
किसी बीमार बच्चे का लाचार पिता
अस्पताल के दरवाज़े पर जहाँ
मज़बूरी में अपना माथा न रगड़े !
कहीं तो होगा कोई ऐसा देश
जहाँ मुट्ठी भर लोग खुद को
न समझें मुल्क का मालिक
और विशाल जन समूह को
अपना नौकर !
जहाँ कोई किसी को
न मारे अपने अहंकार की ठोकर !
जहाँ इंसान की हैसियत उसके
ओहदे से न तौली जाती हो ,
जहाँ धर्म , जाति और दौलत के नाम पर
ओहदों की नीलामी न बोली जाती हो !
जहाँ न हो खदानों की खतरनाक धूल,
जहाँ खिलते हों खेतों में
फसलों के रंगबिरंगे फूल !
मैं देख रहा हूँ ऐसे किसी अपने
वतन का सपना
जहाँ हम एक -दूसरे को
कह सकें अपना !
         - स्वराज करुण
   
      

Saturday, July 25, 2020

महाग्रंथ 'गांधी मीमांसा ' के भूले -बिसरे रचनाकार पं. रामदयाल तिवारी


               
                    आलेख : स्वराज करुण 

"राष्ट्र अपना मुख साहित्य के दर्पण में ही देखता है। साहित्य राष्ट्र के दिल का खजाना है।"  - ये पंक्तियां छत्तीसगढ़ के महान लेखक और चिन्तक स्वर्गीय पण्डित रामदयाल तिवारी के हैं ,जो उन्होंने वर्ष 1930 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में नागपुर में आयोजित अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन में प्रमुख वक्ता की आसंदी से व्यक्त किए थे।
     महात्मा गांधी के जीवन काल में उनके सम्पूर्ण जीवन -दर्शन की गहन समीक्षा करके हिन्दी में  'गांधी मीमांसा ' और अंग्रेजी में 'गांधीज्म एक्सरेड ' जैसे विशाल ग्रंथों की रचना करने वाले तिवारीजी का जन्म 23 जुलाई 1892 को छत्तीसगढ़ की वर्तमान राजधानी रायपुर में हुआ था और निधन भी अपने गृह नगर रायपुर में हुआ। यहाँ के दाऊ कल्याण सिंह अस्पताल में 21 अगस्त 1942 को जब उनका देहावसान हुआ ,उस समय वह सिर्फ़ 50 वर्ष के थे। लेकिन इतनी अल्पायु में ही वह देश के हिन्दी जगत को अपनी प्रकाशित ,अप्रकाशित रचनाओं की विशाल और  अनमोल धरोहर सौंप गए। उन्हें हिन्दी साहित्य के' समर्थ समालोचक'  जैसी अघोषित उपाधि उस जमाने की लोकप्रिय पत्रिका 'माधुरी ' से मिली थी।
       इस महान  लेखक के जन्म स्थान रायपुर में उनसे जुड़ी एक मात्र स्मृति 'आर .डी .तिवारी शासकीय स्कूल " के नाम से शेष रह गयी है। उनके सुपुत्र लखनलाल तिवारी वर्ष 1973 में रायपुर छोड़कर मुम्बई चले गए । अब रायपुर में उनके परिवार का कोई नहीं रहता । रामदयाल तिवारी अब सिर्फ  एक भूले -बिसरे लेखक का नाम है।  हरि ठाकुर और उनके सुपुत्र आशीष सिंह के अलावा शायद विगत कई दशकों में उन्हें किसी ने शिद्दत से  याद किया हो ,मुझे याद नहीं! हरि ठाकुर  तो 3 दिसम्बर 2001 को दुनिया छोड़ गए ,लेकिन उन्होंने अपने विशाल  ग्रंथ 'छत्तीसगढ़  गौरव गाथा ' में  छत्तीसगढ़ की महान विभूतियों पर अपनी लेख माला में रामदयाल तिवारी पर भी एक विस्तृत लेख लिखा है। यह ग्रंथ ठाकुर साहब के।मरणोपरांत वर्ष 2003 में प्रकाशित हुआ ।इसके अलावा आशीष सिंह ने बड़ी मेहनत से वर्ष 2012 में तिवारी जी के चर्चित महा ग्रंथ 'गांधी मीमांसा" का एक संक्षिप्त संस्करण प्रकाशित करवाया और 2017 में उनकी 125 वीं जयंती पर स्मारिका प्रकाशित की।
     हरि ठाकुर लिखते हैं ---   तिवारीजी के पिता रामबगस तिवारी प्राथमिक स्कूल के अध्यापक थे। रामदयाल तिवारी का  बाल्यकाल अत्यंत गरीबी में बीता । ट्यूशन करके वे अपनी फीस और किताबों के लिए  पैसे जुटा पाते थे। गरीबी का यह आलम था कि उन्हें रात्रि में घर के पास लगे म्युनिसिपल के लैम्प पोस्ट के नीचे बैठ कर उसके उजाले में अध्ययन करना पड़ता था। तब कौन जानता था कि म्युनिसिपल के लैम्प पोस्ट के उजाले में पढ़ने वाला बालक एक दिन हिन्दी समालोचना का अत्यंत प्रकाशवान लैम्प पोस्ट बन जाएगा ?
                           

   पण्डित रामदयाल तिवारी ने वर्ष 1911 में  बी.ए. की परीक्षा पास की। वह वकालत की पढ़ाई करना चाहते थे ,लेकिन  उसी वर्ष  उनके पिता का निधनहो जाने पर ।परिवार का दायित्व उनके कंधों पर आ गया। उन्होंने रायगढ़ के स्टेट हाई स्कूल में अध्यापन किया। वेतन से थोड़ी -थोड़ी राशि बचाकर उन्होंने वकालत की पढ़ाई पूरी की और वर्ष 1915 से रायपुर में वक़ालत का अपना व्यवसाय शुरू किया। यहाँ उन्हें पण्डित माधवराव सप्रे ,ठाकुर प्यारेलाल सिंह और मावली प्रसाद श्रीवास्तव जैसे विद्वान साहित्यिकों का  सानिध्य मिला। उनके लेख हितवाद , मॉडर्न रिव्यू और हिन्दू आदि पत्र -पत्रिकाओं में छपने लगे। हरि ठाकुर के अनुसार  हिन्दी ,अंग्रेजी , संस्कृत , ओड़िया ,बांग्ला , मराठी और उर्दू भाषाओं पर तिवारीजी का समान अधिकार था।वे मूलतः अंग्रेजी के लेखक थे । हिन्दी में लिखना उन्होंने बहुत बाद में आरंभ किया था। वर्ष 1930 के बाद उन्होंने अपना सारा ध्यान हिन्दी लेखन पर केन्द्रित किया।
    वक़ालत के साथ -साथ तिवारीजी रायपुर के सावर्जनिक जीवन में भी सक्रिय रहते  थे। स्वतन्त्रता संग्राम के उस दौर में  यहाँ वर्ष 1930 से 1932 के बीच राष्ट्रीय आंदोलनों में भी तिवारीजी काफी   सक्रिय थे । जून 1930 के अंतिम सप्ताह में आंदोलन के दौरान  ठाकुर प्यारेलाल सिंह और कई अन्य नेताओं को गिरफ़्तार किया गया । इन गिरफ्तारियों के विरोध में हजारों की संख्या में लोगों ने प्रदर्शन किया।। शाम को धारा 144 के बावजूद आम सभा हुई ,जहाँ तिवारीजी ने जनता को सम्बोधित करते हुए अंग्रेज हुकूमत की दमनात्मक कार्रवाई की कड़े शब्दों में निन्दा की। वर्ष 1930 में ही बंदी सत्याग्रहियों के स्वागत के लिए रायपुर रेल्वे स्टेशन पर इकट्ठा हुए हजारों लोगों पर पुलिस ने बेरहमी से  लाठीचार्ज किया , जिसकी जांच के लिए गठित नागरिकों की समिति में तिवारीजी प्रमुख सदस्य थे।उन्होंने नगर में घूम - घूमकर घायलों के बयान लिए ,उनके इलाज का। इंतज़ाम किया और समिति को अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी। रायपुर में 15 अप्रैल 1930 को आयोजित प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में पण्डित रामदयाल तिवारी ने स्वागताध्यक्ष का दायित्व बखूबी निभाया।
    पण्डित रामदयाल तिवारी ने   सड़क दुर्घटना में घायल होने के बावज़ूद बिस्तर पर बैठ कर महात्मा गाँधी के जीवन -दर्शन की समीक्षा करते हुए  वर्ष 1935 में लगभग 850 पन्नों के विशाल ग्रन्थ गांधी -मीमांसा ' की रचना की थी । आज भले ही वर्तमान पीढ़ी  के स्मृति पटल पर उनकी यादें धुँधली पड़ गयी हों ,लेकिन वर्ष 1941में 36 अध्यायों के  इस महा ग्रंथ  के  प्रकाशित होते ही  छत्तीसगढ़ के ये लगभग अल्प ज्ञात लेखक  देश भर के विद्वानों के बीच चर्चा का केंद्र बन गए थे , क्योंकि हरि ठाकुर के शब्दों में -- "इस ग्रंथ  की रचना के समय गाँधीजी अपनी ख्याति के चरम शिखर पर थे । उनको लेकर लोक -जीवन में अनेक दंतकथाएं प्रचलित थीं । उस समय जो भी लिखा जा रहा था , अधिकांश रचनाएं स्तुति परक थीं ।उनके विचारों को लेकर तर्क -वितर्क करने का साहस किसी नेता या लेखक में नहीं था ।ऐसे समय में तिवारीजी ने 'गांधी-मीमांसा'  की रचना इस दावे के साथ की कि अंध श्रद्धा और अनुदारता ,दोनों से परे होकर विचार करने वाले गांधी साहित्य का निर्माण होने को है। प्रस्तुत ग्रन्थ इस दिशा में किया गया पहला प्रयास है।
     तिवारीजी की 125 वीं जयंती पर 23 जुलाई 2017 को हरि ठाकुर स्मारक संस्थान रायपुर द्वारा आशीष सिंह के सम्पादन में उन पर  केन्द्रित स्मारिका प्रकाशित की गयी थी। स्मारिका के प्रकाशकीय वक्तव्य में आशीष सिंह ने लिखा है - " गांधी मीमांसा महात्मा गांधी के सिद्धांतों ,आदर्शों और कार्यक्रमों का ऐसा विवेचन है ,जिसमें पण्डित रामदयाल तिवारी ने जहाँ एक ओर गांधीजी की दिल खोलकर प्रशंसा की है ,वहीं वे जहाँ कहीं महात्मा जी से असहमत हुए ,बिना भय के अपनी बेबाक राय रखी। गांधी मीमांसा में कुछ स्थानों पर पूरी श्रद्धा और शालीनता के साथ महात्मा गांधी की कटु आलोचना भी है। " आशीष आगे लिखते हैं -" राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त को भला कौन नहीं जानता ? पर उन्हें जानने योग्य जिस पण्डित रामदयाल तिवारी ने बनाया ,वे आज अनजान हैं।गुप्तजी की 'साकेत' और 'यशोधरा ' की समालोचना  तिवारी जी ने की थी ,जो 'माधुरी" में प्रकाशित हुई थी। उस समीक्षा ने ही हिन्दी साहित्य जगत का ध्यान गुप्तजी की ओर आकृष्ट किया था।"
  स्मारिका के अपने प्रकाशकीय आलेख में आशीष ने बहुत व्यथित होकर लिखा है -"
  सच में पण्डित रामदयाल तिवारी का समुचित मूल्यांकन आज तक नहीं हो पाया है।इसमें दुर्भाग्य उनका नहीं है।दुर्भाग्य हमारा है। हमने उनके लिए ऐसा कुछ भी नहीं किया कि उनकी ख्याति देशव्यापी हो सके। अपने समय के दिग्गज अख़बार 'मॉडर्न रिव्यू' के सम्पादक ने  तिवारीजी की अनमोल कृति 'गांधीज्म एक्सरेड' (अब लुप्त )की पांडुलिपि को पढ़कर पत्र लिखा था कि  यदि यह छप जाए तो इंग्लैंड और अमेरिका का दृष्टिकोण बदल जाएगा।अर्थात वो मानते थे कि तिवारीजी की लेखनी में वो दम -खम है ,जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित होने की क्षमता रखती है।।कैसा दुर्भाग्य है कि ऐसे सामर्थ्यवान विद्वान को आज छत्तीसगढ़ नहीं जानता !"
       तिवारी जी को समर्थ समालोचक के नाम से प्रसिद्धि क्यों मिली ,इस बारे में हरि ठाकुर ने अपने एक आलेख में लिखा है --"सन 1932 -33 और 1934 में उनके अनेक समालोचनात्मक निबन्ध 'माधुरी " में प्रकाशित हुए ।उनमें से एक निबन्ध का शीर्षक 'समर्थ समालोचक' था  उनका यह निबन्ध 'माधुरी' के दो अंकों में 15 पृष्ठों में प्रकाशित हुआ था।। इसके पूर्व समालोचना विधा पर इतनी गंभीरता और विस्तार से कभी चर्चा नहीं हुई थी  । यह सच है कि पण्डित माधवराव सप्रे ने 'छत्तीसगढ़ मित्र ' में हिन्दी समालोचना की बुनियाद रखी ,किन्तु उनके पास समालोचना के मानदंडों पर विस्तारपूर्वक विचार करने का अवसर न था। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए कार्य को पूरा करने का कार्य पण्डित रामदयाल तिवारी ने किया। प्रेमचंद और निराला जैसे शीर्षस्थ साहित्यकार जिसकी समालोचना का लोहा मानते थे ,उन्हें यदि 'माधुरी 'जैसी उत्कृष्ट पत्रिका ने 'समर्थ समालोचक' की  उपाधि से विभूषित किया ,तो यह अत्यंत स्वाभाविक ही था ।"
        पण्डित रामेश्वर शुक्ल 'अंचल' के अनुसार तिवारीजी का यह लेख आदर्श साहित्य समालोचना धर्म का दस्तावेज है। माधुरी ने उन्हें समर्थ समालोचक की उपाधि दे ही  दी थी ,निराला भी पण्डित रामदयाल तिवारी के उन लेखों की विवेचनात्मक पकड़ के प्रशंसक थे।। प्रेमचंद ने बनारसीदास चतुर्वेदी को  अपने एक इंटरव्यू में 'भविष्य किनका है ' प्रश्न के उत्तर में भविष्यवान समालोचक के रूप में तिवारी जी की बड़ी प्रशंसा की थी। यह इंटरव्यू अंग्रेजी दैनिक 'लीडर ' में प्रकाशित हुआ था।
     तिवारी जी ने हिन्दी में 'गांधी मीमांसा' के बाद अंग्रेजी में एक महाग्रन्थ 'गांधीज्म एक्सरेड' लिखा ,जो 6 खण्डों ,35 अध्यायों और 80 शीर्षकों में था। हरि ठाकुर के अनुसार गांधी मीमांसा का लेखन समाप्त कर तिवारीजी को  संतोष नहीं हुआ। गांधीजी और उनके विचारों को
लेकर वे अधिक व्यापक धरातल पर उन्हें प्रतिष्ठित करना चाहते थे।अतः उन्होंने अंग्रेजी में गांधीज्म एक्सरेड नामक अति विशाल ग्रंथ का निर्माण किया ,जो 'गांधी मीमांसा 'का अंग्रेजी अनुवाद नहीं , बल्कि उसका स्वतंत्र रूप से किया गया विकसित रूप  है। यह विशाल ग्रंथ तिवारी जी के निधन के बाद दुर्भाग्यवश   प्रकाशित नहीं हो पाया। हरि ठाकुर का मत है कि छपने पर 'गांधीज्म एक्सरेड ' एक हज़ार पृष्ठों से भी अधिक आकार ग्रहण करता किन्तु तिवारी जी के असमय निधन के कारण यह महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाश में नहीं आ सका ।
        लेकिन इस पुस्तक की पांडुलिपि पर दादा धर्माधिकारी ,आचार्य काका कालेलकर, आचार्य पी.सी.राय , पण्डित जवाहर लाल नेहरू और बाबू राजेन्द्र प्रसाद जैसी महान विभूतियों ने जो  सकारात्मक टिप्पणियाँ भेजी थीं ,वे बहुत महत्वपूर्ण हैं । नेहरू जी ने लिखा था --"यह पुस्तक गांधीजी के विभिन्न रुचिपूर्ण पक्षों  पर प्रकाश डालती है। ऐसी पुस्तकों का हम स्वागत करते हैं।यह पुस्तक यदि मैं लिखता तो सर्वथा भिन्न ढंग से लिखी जाती ।मैं यह मानता हूँ कि गांधीजी पर विभिन्न दृष्टिकोणों से लिखा जाना चाहिए । यह पुस्तक हमारे विचारों को उत्तेजित करती है। "
   दादा धर्माधिकारी ने लिखा --" गांधीजी के मूल्यांकन को लेकर अनेक स्थलों पर मेरी आपसे मतभिन्नता हो सकती है।किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि  गांधीजी के प्रति आपके हॄदय में कोई दूषण या पूर्वाग्रह है। आपके गांधीजी के साथ जो मतभेद हैं ,वे सैद्धांतिक हैं।आश्चर्य  इस तथ्य में नहीं कि आपने गांधीजी के दृष्टिकोण का निर्भयता के साथ विश्लेषण और आलोचना की है,बल्कि इसमें है कि आपने गांधीजी के प्रति अगाध प्रेम व्यक्त करते हुए उन्हें इस युग का सबसे बड़ा मसीहा माना है। इन सुन्दर पृष्ठों को पढ़ने वाला कोई भी व्यक्ति  आपकी स्पष्टवादिता ,निष्पक्षता  और शालीनता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। इस भावना से की गयी आलोचना का मैं न केवल स्वागत करता हूँ ,बल्कि उसमें सहयोग भी देने को तैयार हूँ।कुल मिलाकर गांधीजी के विचारों तथा कार्यक्रमों को लेकर उनके सैद्धांतिक आधारों की आपकी उदारतापूर्ण आलोचना अपने प्रकार का अकेला प्रयास है।   
    काका कालेलकर का अभिमत था  -" गांधीज्म एक्सरेड की पांडुलिपि पढ़कर लगा कि यह एक शानदार प्रस्तुति है।एक समाज शास्त्री की दृष्टि से  आपने विषय का प्रतिपादन किया है।यदि आलोचना मैत्रीपूर्ण हो और मित्र आलोचक हों तो गांधीजी भारत की बेहतर सेवा कर सकते हैं।"
    बाबू राजेन्द्र प्रसाद की टिप्पणी थी -- लेख अत्यंत सुंदर और वैज्ञानिक ढंग से लिखे गये हैं।आपने बहुत ही ध्यानाकर्षक और विचारोत्तेजक पुस्तक लिखी है।"
      वर्ष 1936 -37 में तिवारी जी ने विद्यार्थियों के लिए 'हमारे नेता '  और 'स्वराज्य प्रश्नोत्तरी ' शीर्षक से दो किताबें लिखीं । इनका प्रकाशन तो हुआ ,लेकिन उन्होंने 'कांग्रेस का इतिहास ' नामक ग्रंथ भी लिखा था ,जो छपने के लिए इलाहाबाद के दीक्षित प्रेस में दिया गया था ,लेकिन उनके  के देहावसान के बाद वह ग्रंथ भी लापता हो गया।
        तिवारीजी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए हरि ठाकुर लिखते हैं - गांधीजी और उनके कार्यक्रमों पर उन्हें अटूट श्रद्धा थी।कोहनी पर लटकती आस्तीन वाली कमीज या कुरता और खादी की धोती ,यही उनकी वेशभूषा थी।श्यामल किन्तु पानीदार चेहरे से गंभीरता टपकती थी।घनी  मूंछों ने उनके चेहरे को रुआबदार बना दिया था।सब मिलाकर उनका व्यक्तित्व सरल ,किन्तु आकर्षक था।उनके व्यक्तित्व से मोहित होकर सुप्रसिद्ध चित्रकार पण्डित गणेशराम मिश्र ने उनका एक जीवंत चित्र बनाया था।वही एक मात्र चित्र है ,जो उपलब्ध है।तिवारीजी को कभी फोटो खिंचवाने की न फिक्र थी ,न  फ़ुरसत ।
                आलेख -स्वराज करुण
(यह आलेख स्वर्गीय हरि ठाकुर की पुस्तक "छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' और 'समर्थ समालोचक रामदयाल तिवारी 125 वीं जयंती स्मारिका  के तथ्यों और आलेखों पर आधारित है ।)

Friday, July 24, 2020

पुस्तक चर्चा : हल्बी लोकभाषा का पहला व्याकरण

                      आलेख : स्वराज करुण 
जब कभी साहित्यिक -सांस्कृतिक दृष्टि से सम्पन्न   लोकभाषाओं को सम्पूर्ण भाषा के रूप में स्वीकार करने की बात होती है ,तो अक्सर कुछ लोग इस तरह की चर्चा को यह कह कर ख़ारिज कर देते हैं कि इनका  न तो कोई व्याकरण है और न ही इनकी कोई लिपि । लेकिन वो भूल जाते हैं कि जहाँ तक सम्पूर्ण कही जाने वाली भाषाओं की लिपि का सवाल है तो हमारे पड़ोसी देश नेपाल की राजभाषा नेपाली  भी देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती है। हमारे देश की मराठी भाषा की वर्णमाला भी मामूली अंतर से देवनागरी ही है। 
   भले ही इन सम्पूर्ण मानी जाने वाली भाषाओं का अपना व्याकरण है ,लेकिन लिपि वही है जो हम लोग अपनी  राष्ट्रभाषा हिन्दी के लिए इस्तेमाल करते हैं। यानी देवनागरी । छत्तीसगढ़ प्रदेश में भी छत्तीसगढ़ी सहित अनेक आंचलिक लोक भाषाएं प्रचलित हैं। अलग से कोई लिपि न होने के बावज़ूद उनका अपना व्याकरण है ,  अपना लोक साहित्य है  , अपने लोकगीत हैं और अपना लोक संगीत है ,अपने लोकनृत्य हैं। इन लोकभाषाओं को भी देवनागरी वर्णमाला में ही लिखा जाता है।
                         
 वर्ष  2000 में राज्य बनने के बाद वर्ष 2007 में विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर  छत्तीसगढ़ी को तो  इस प्रदेश की राजभाषा का भी दर्जा दिया जा चुका है। छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला व्याकरण आज से 135 साल पहले वर्ष 1885 में  धमतरी में व्याकरणाचार्य हीरालाल काव्योपाध्याय द्वारा लिखा गया था। वह शिक्षक थे और अपनी लोकप्रियता के कारण बाद में धमतरी नगरपालिका के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए  थे। उनके छत्तीसगढ़ी व्याकरण के प्रकाशन के लगभग 52 साल बाद  बस्तर जैसे उस समय के बेहद पिछड़े  अंचल में  वहाँ की प्रमुख लोक भाषा हल्बी का व्याकरण तैयार करने का ऐतिहासिक कार्य हुआ । वर्ष 1937 में जगदलपुर के ठाकुर पूरनसिंह की पुस्तक 'हल्बी भाषा बोध ' का पहला प्रकाशन हुआ था  । बस्तर के इतिहास की इस महत्वपूर्ण घटना के लगभग आठ दशक बाद इसका द्वितीय संस्करण वर्ष  2016 में प्रकाश में आया।  ठाकुर पूरनसिंह के  पौत्र और जगदलपुर निवासी कवि विजय सिंह ने  अपनी साहित्यिक संस्था 'सूत्र प्रकाशन" के बैनर पर नये कलेवर में  इसे पुनः प्रकाशित किया  है। विजय सिंह कहते हैं कि ' हल्बी भाषा -बोध ' दरअसल इस लोकभाषा का पहला व्याकरण है।  
     इसमें दो राय नहीं कि छत्तीसगढ़ का आदिवासी बहुल वनांचल बस्तर  अपनी समृद्ध लोक संस्कृति के लिए देश और दुनिया में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस राजस्व संभाग का भौगोलिक क्षेत्रफल 39 हजार 171 वर्ग किलोमीटर है । क्षेत्रफल की  दृष्टि से यह केरल राज्य के क्षेत्रफल से कुछ अधिक है। केरल का क्षेत्रफल 38 हजार 863 वर्गकिलोमीटर है ।  यानी छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग केरल प्रदेश से भी बड़ा है।  बस्तर राजस्व संभाग में  7 जिले हैं - उत्तर बस्तर (कांकेर ), कोंडागांव , बस्तर (जगदलपुर), दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा ), बीजापुर , सुकमा और नारायणपुर । देश की आज़ादी के पहले यह  सम्पूर्ण इलाका रियासती शासन के अंतर्गत आता था।  वैसे तो बस्तर अंचल में मुख्य रूप से पांच जनजातीय बोलियां (लोक भाषाएं ) प्रचलित हैं -हल्बी ,भतरी ,गोंडी ,दोरली और धुर्वी ।  इन सबमें हल्बी यहाँ की प्रमुख सम्पर्क भाषा है। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान  तब वहाँ नियुक्त  और पदस्थ होने वाले बाहर के सरकारी अधिकारी और कर्मचारी हल्बी सीख सकें ,ताकि उनके द्वारा जनता से जुड़े शासकीय काम-काज सुगमता से हो सकें , इस  उद्देश्य को अपनी किताब 'हल्बी भाषा बोध ' के माध्यम से  पूरा किया ठाकुर पूरनसिंह ने । हम कह सकते हैं कि जिस तरह व्याकरणाचार्य हीरालाल काव्योपाध्याय ने छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला व्याकरण लिखा ,उसी तरह बस्तर में सबसे पहले ठाकुर पूरनसिंह  ने  हल्बी भाषा -बोध के नाम से हल्बी व्याकरण की पहली किताब  लिखी ।
      वरिष्ठ साहित्यकार जगदलपुर निवासी   स्वर्गीय लाला जगदलपुरी ने अपनी पुस्तक 'बस्तर इतिहास एवं संस्कृति ' में ठाकुर पूरनसिंह की इस पुस्तक का  जिक्र किया है। लालाजी लिखते हैं --"हल्बी यद्यपि बस्तर -स्टेट में 'राजभाषा ' के पद पर आसीन रह चुकी थी , फिर भी उसमें आंचलिक लेखन का अभाव था।हल्बी में आंचलिक लेखन का शुभारंभ सन 1937 में हुआ था।स्वर्गीय  ठाकुर पूरनसिंह और स्वर्गीय पण्डित गणेश प्रसाद सामंत ने हल्बी में लेखन -प्रकाशन का सूत्रपात किया था । ठाकुर पूरनसिंह ने 'हल्बी भाषा -बोध' की रचना की थी और पण्डित गणेश प्रसाद सामंत ने 'देवी -पाठ ' नामक एक पद्य -पुस्तिका  लिखी थी। सन 1945 में मेजर आर.के.एम .बेट्टी लिखित 'ए हल्बी ग्रामर ' का प्रकाशन हुआ था।सन 1950 में स्वर्गीय पण्डित गंभीरनाथ पाणिग्रही लिखित एक छोटा -सा हल्बी कविता संग्रह ' गजामूँग' प्रकाशित हुआ था।" 
     हल्बी लोकभाषा का प्रारंभिक ज्ञान अर्जित करने की दृष्टि से ठाकुर पूरनसिंह की यह किताब काफी उपयोगी है। जैसा कि बताया गया है -रियासत कालीन बस्तर में यह पुस्तक बस्तर के बाहर के क्षेत्रों से नौकरी में आने  वाले सरकारी कर्मचारियों और अफसरों को हल्बी सिखाने के लिए प्रकाशित की गई थी , तो इसकी जरूरत आज के समय में भी महसूस की जा रही है । अन्य नागरिक भी इस पुस्तक से हल्बी सीख सकते हैं।   यह पुस्तक हल्बी लोकभाषा के शिक्षण और  प्रशिक्षण के लिए पहली प्रामाणिक पुस्तक मानी जाती है। लगभग 70 पृष्ठों के इसके द्वितीय संस्करण के प्रकाशन से बस्तर में निश्चित रूप से हल्बी लोकभाषा के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक ऐतिहासिक काम हुआ है।
           आलेख : स्वराज करुण