Saturday, January 17, 2026

(आलेख ) अपने गाँव में अपनों के बीच अपनी किताब का विमोचन

 अपने गाँव में अपनों के बीच अपनों के  अपनी किताब विमोचन

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 मेरा वह गाँव अब एक छोटा शहर बन गया है, लेकिन है आज भी है वह गाँव जैसा ही,  जहाँ अधिकांश लोग एक -दूसरे को जानते, पहचानते हैं, जहाँ ग्रामीण परिवेश की हवाओं में आत्मीयता के सुरभित फूल खिलते और तैरते हैं, जिस गाँव में  मेरा बचपन बीता, जहाँ की गलियों की धूल -मिट्टी में मैं पला -बढ़ा, खेला -कूदा,जहाँ के खपैरेलों वाले स्कूल में मुझे अक्षर और शब्द ज्ञान मिला और जहाँ के अन्न जल से मेरा पालन -पोषण हुआ, वहाँ की पावन धरती पर पहली बार मेरी कविताओं की किताब का विमोचन अपनों के बीच, आत्मीय जनों की उपस्थिति में आत्मीय लोगों के हाथों हुआ, यह मेरे लिए एक सुखद और नया अनुभव रहा.  मेरी इच्छा थी कि विमोचन मेरे ही गाँव में हो. श्रृंखला साहित्य मंच के स्थापना के दिनों से ही यानी लगभग 37 वर्षों से मैं इस संस्था का सदस्य हूँ.मंच के साथियों  का भी यह स्नेहिल आग्रह था कि विमोचन पिथौरा में हो.उनके सहयोग से  6 जनवरी 2026 को मेरी 83 कविताओं के संग्रह 'दिलवालों का देश कहाँ ' का विमोचन समारोह सम्पन्न हुआ. यह पुस्तक तो लगभग पाँच महीने पहले अगस्त 2025 में भाई सुधीर शर्मा के सर्वप्रिय प्रकाशन (दिल्ली -रायपुर )में छपकर तैयार थी, लेकिन विमोचन का सुखद संयोग अब जाकर बना. 

                                                          


      

छत्तीसगढ़ के तहसील मुख्यालय पिथौरा (जिला -महासमुन्द )के अग्रसेन भवन में आयोजित इस सादगीपूर्ण समारोह में  वरिष्ठ साहित्यकार,भाषा -विज्ञानी और छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा वर्ष 2025 में पंडित सुन्दरलाल शर्मा राज्य अलंकरण से सम्मानित डॉ. चित्तरंजन कर ने मुख्य अतिथि की आसंदी से मेरी इस पुस्तक का विमोचन किया. स्थानीय अग्रसेन भवन में  आयोजित विमोचन समारोह की अध्यक्षता छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार और उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान से साहित्य भूषण सम्मान प्राप्त कवि, पत्रकार और लेखक गिरीश पंकज ने की. विशेष अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार और छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जन -जाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष जी. आर. राना और पिथौरा निवासी सुप्रसिद्ध कहानीकार तथा उपन्यासकार शिवशंकर पटनायक उपस्थित थे. यह इन साहित्यिक दिग्गजों का बड़प्पन था कि उन्होंने मुझ जैसे एक साधारण कवि के इस संग्रह की तारीफ़ की. उनका उदबोधन मेरे लिए आशीर्वाद स्वरूप रहा. मैं इन सभी दिग्गज साहित्यिक हस्तियों का और साहित्य मंच के अपने सभी सदस्य मित्रों का आभारी हूँ. उन सब स्नेही जनों, साहित्यिक मित्रों का भी आभार मानता हूँ, जो मेरे गाँव सहित अंचल के विभिन्न स्थानों से आकर समारोह में उपस्थित हुए और जिन्होंने मेरा उत्साह बढ़ाया. उन सभी की उपस्थिति से वह दिन यादगार बन गया.

                                        



                   किसी भी देश की असली छवि वहाँ के साहित्य में देखिए     -डॉ. चित्तरंजन कर 

          समारोह में मुख्य अतिथि डॉ. चित्तरंजन कर ने कहा  कि किसी भी देश की असली छवि अगर देखनी हो, तो वहाँ के साहित्य में देखिए. उन्होंने कहा कि साहित्य रचना कोई शौक नहीं, कोई मौज नहीं, कोई चाय की चुस्की नहीं, बल्कि एक चेतना है, वेदना है, संवेदना है, जो रचनाकार को लिखने के लिए प्रेरित करती है. साहित्यकार समाज रुपी शरीर का मुख है. वह समाज के दर्द को महसूस करके उसे अपने शब्दों से अभिव्यक्ति देता है.उन्होंने कहा कि समय के साथ  देश,  दुनिया में और समाज में परिवर्तन तो ठीक है, लेकिन मानवीय मूल्यों का जो विघटन हो रहा है, वह चिन्ताजनक है. उन्होंने कहा कि करुणा ही कविता रचती है.स्वराज्य करुण के कविता -संग्रह 'दिलवालों का देश कहाँ ' में संकलित उनकी कविताओं में इसे महसूस किया जा सकता है.इन कविताओं की हर पंक्ति सारगर्भित है.संग्रह की हर कविता में देशज भावनाएँ हैं और मानवीय संवेदनाएँ हैं.इनमें वैचारिक रूप से उदात्त भावनाएँ हैं.            

                                               


                                             समारोह को सम्बोधित करते हुए डॉ. चित्तरंजन कर 


कविताओं में संवेदनाओं के साथ 

                                               सामाजिक सरोकार भी ज़रूरी -गिरीश पंकज 

                   अध्यक्षीय आसंदी से राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार गिरीश पंकज ने कहा कि  कविताओं में मानवीय संवेदनाओं के साथ सामाजिक सरोकार का होना भी बहुत ज़रूरी है . ये दोनों विशेषताएँ स्वराज्य करुण की कविताओं में देखने  को मिलती हैं .स्वराज्य करुण के रचना -कर्म से मैं किसी न किसी रूप में विगत लगभग चालीस वर्षों से परिचित हूँ वे लोक मंगल, सामाजिक -सरोकार और लोक जागरण के कवि हैं.उनकी कविताओं में समाज का दर्द दिखाई देता है. उनके कविता -संग्रह 'दिलवालों का देश कहाँ ' का उल्लेख करते हुए गिरीश पंकज ने कहा -कवि चिंतित है कि धीरे -धीरे यह देश धन वालों का देश बनता जा रहा है. इसलिए दिलवालों का देश हाशिए पर चला गया है. कवि उस देश को हाशिए से राष्ट्र के केन्द्र में लाना चाहता है .इस संग्रह की कविताओं में रोमांस नहीं बल्कि समाज की पीड़ा की अभिव्यक्ति है. समाज में जो कुछ भी पीड़ादायक घटित हो रहा है, उसे यह कवि बेबाक तरीके से कहता है. कहीं कोई लुका छिपी नहीं. इसीलिए मुझे स्वराज्य करुण की काव्य -यात्रा शुरु से पसंद है.गिरीश पंकज ने कहा कि उनके इस संग्रह की कविताएँ हमें सोचने के लिए विवश करती हैं. इनमें गीत भी हैं और ग़ज़लें भी. सबसे अच्छी बात ये है कि ये सभी छंदबद्ध रचनाएँ हैं.

                                      

                                                समारोह को सम्बोधित करते हुए गिरीश पंकज 

गिरीश पंकज ने पिथौरा के एक अच्छे और सकारात्मक साहित्यिक वातावरण का उल्लेख करते हुए इसके लिए श्रृंखला साहित्य मंच की तारीफ़ की. उन्होंने कहा कि यहाँ के कवियों में और साहित्य प्रेमियों में कोई बनावटीपन नहीं, बल्कि  सहजता, सरलता और आत्मीयता है.इसलिए पिथौरा आना मुझे अच्छा लगता है.

                    

            खोए हुए गाँव की तरह खोए हुए 

             देश को भी खोजें-जी. आर. राना 

         विशेष अतिथि जी. आर. राना ने आज के समय में गाँवों की जीवन शैली में आ रहे निराशाजनक बदलाव पर चिन्ता प्रकट की. उन्होंने कहा कि बचपन में हम जिस बरगद की शाखाओं में खेलते और झूलते थे,, जो हमें शीतल छाया देती थीं, वे शाखाएँ 'बॉब कट ' की तरह कटती जा रही हैं अब ना तो कहीं दाऊ का बाड़ा है और न ही बरगद और पीपल छाँव. इसी संदर्भ में उन्होंने अपनी एक लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी कविता की भी पंक्तियाँ पढ़कर सुनाई -मोर गाँव गंवागे संगी, मय कहाँ रिपोर्ट लिखाँव?

जी. आर. राना ने कहा कि स्वराज्य करुण के कविता -संग्रह के शीर्षक 'दिलवालों का देश कहाँ ' में हमारे खोए हुए गाँव की तरह खोए हुए देश के लिए चिन्ता झलकती है. आइए, हम सब मिलकर उस देश को खोजें.

 विशेष अतिथि वरिष्ठ कहानीकार और उपन्यासकार शिवशंकर पटनायक ने भी कविता संग्रह की प्रशंसा की. महासमुन्द के कवि अशोक शर्मा ने संग्रह का उल्लेख करते हुए इस अवसर पर कहा कि साहित्यिक रचनाओं के शब्दों से समाज को ऊर्जा मिलती है. उन्होंने कहा कि साहित्य सदैव शाश्वत होता है.

                         कहाँ मिलेगा दिलवालों का देश?

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  मैंने अपने कविता -संग्रह की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला और कहा कि साहित्यिक रचनाएँ मानव हृदय की भावनाओं का प्रतिबिम्ब होती हैं.अपने कविता -संग्रह के शीर्षक *दिलवालों का देश कहाँ * का उल्लेख करते हुए  कहा - यह सवाल अक्सर मेरे मन -मस्तिष्क को विचलित करता रहता है कि आधुनिकता की तेज आँधी में दिनों -दिन बेदिल और बेरहम होते जा रहे इस संसार में,  स्नेह, ममता, दया और करुणा से भरे दिलवाले संवेदनशील इंसान कहाँ  मिलेंगे?यह प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है कि  दुनिया के नक्शे में  ऐसे दिलवाले इंसानों का देश कहाँ है, ऐसा कोई देश अगर कहीं है भी तो वह कहाँ मिलेगा ? अगर नहीं है तो क्या हमें अपने ही देश को दिलवालों का देश बनाने का प्रयास नहीं करना चाहिए? 

  विशेष अतिथि की आसंदी से शिवशंकर पटनायक  ने भी कविता संग्रह की प्रशंसा की. महासमुन्द के वरिष्ठ कवि अशोक शर्मा ने संग्रह का उल्लेख करते हुए इस अवसर पर कहा कि साहित्यिक रचनाओं के शब्दों से समाज को ऊर्जा मिलती है. उन्होंने कहा कि साहित्य सदैव शाश्वत होता है.प्रारंभ में स्वराज्य करुण ने अपने कविता -संग्रह की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला. 

                               


  स्वागत भाषण श्रृंखला साहित्य मंच के अध्यक्ष प्रवीण प्रवाह ने दिया.समारोह का संचालन साहित्य मंच के पूर्व अध्यक्ष उमेश दीक्षित ने किया.इस अवसर पर श्रृंखला साहित्य मंच के सचिव संतोष गुप्ता, पूर्व अध्यक्ष अनूप दीक्षित,वरिष्ठ सदस्य शशि कुमार डड़सेना,एफ. ए. नंद, माधव तिवारी, डॉ. जीतेश्वरी साहू, गुरप्रीत कौर सहित स्थानीय पत्रकार सर्व श्री मनोहर साहू, रजिन्दर खनूजा, जाकिर कुरैशी, नंदकिशोर अग्रवाल, राजेन्द्र सिन्हा और मनमीत छाबड़ा तथा पार्षद मन्नू ठाकुर भी उपस्थित थे. महासमुन्द के बन्धु राजेश्वर खरे, बागबाहरा के रुपेश तिवारी, धनराज साहू और हबीब समर, कोमाखान के डॉ.विजय शर्मा और किसान दीवान बसना के बद्री प्रसाद पुरोहित, अभनपुर के ब्लॉगर ललित शर्मा, सांकरा (जोंक )के जवाहर लाल नायक, रायपुर की श्रीमती माधुरी कर, पिथौरा के सर्वश्री मधुसूदन महान्ति, रितेश महान्ति, आकाश महान्ति, विवेक दीक्षित,गुरुचरण सिंह सलूजा,अनंत सिंह वर्मा,रमेश भोई, रमाशंकर पाण्डेय, श्रीमती सविता डे, श्रीमती सुप्रिया दास, नरेन्द्र जोशी,ग्राम खुटेरी के पूर्व सरपंच घनश्याम धांधी, सरायपाली के डॉ. पीतांबर साहू तथा बड़ी संख्या में आंचलिक साहित्यकारों और साहित्य प्रेमी नागरिकों की भी उत्साह जनक उपस्थिति रही. 

       समारोह के अंत में डॉ. चित्तरंजन कर ने इस कविता संग्रह के कुछ गीतों के साथ प्रवीण प्रवाह की एक ग़ज़ल को भी अपनी मधुर आवाज़ में संगीत के साथ प्रस्तुत किया .उनके साथ तबले पर सरायपाली के डॉ. प्रदीप साहू ने संगत की. आभार प्रदर्शन श्रृंखला साहित्य मंच के पूर्व अध्यक्ष अनूप दीक्षित ने किया.

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