Wednesday 6 January 2016

मायावी शिकारी फेंक रहे जाल !

कभी नज़र आता था
नीला आकाश ,
अब नज़र आते है खूंखार चेहरे !
न जाने किसकी लगी नज़र
झील के शांत स्वच्छ पानी को ,
गुनगुनाती लहरों को ,
हरे-भरे किनारों को ,
वसंत की बहारों को !
अब न पंछियों के गीत हैं ,
न भौरों का संगीत ,
बागों की तितलियाँ
झील की मछलियाँ
काँप रही भयभीत !
मायावी शिकारी फेंक रहे जाल
तितलियों और मछलियों को
को पता नहीं उनकी चाल
इंसानियत की झीलों को
भला कौन बचाएगा ,
जो भी यहाँ आएगा ,
बटोरकर सब कुछ ले जाएगा !

                       -- स्वराज्य करुण

No comments:

Post a Comment