Friday, September 30, 2022

(आलेख) लगभग उतर चुका है दिमागी बुख़ार !

                                    (आलेख : स्वराज्य करुण   )

क्या कारण है कि जनता में  टेलीविजन चैनलों को देखने की पहले जैसी दिलचस्पी अब कहीं नज़र नहीं आती ? पहले तो  लोग  इस छोटे ,रुपहले पर्दे पर हिलती -डुलती ,बोलती तस्वीरों को टकटकी लगाकर बड़े आश्चर्य से  देखा करते थे अब ऐसे लोग विलुप्त प्रजाति में गिने जाते हैं  ।  ठीक भी है। छोटे परदे  पर बड़े -बड़ों की बड़बड़ाहट और  बड़ी -बड़ी बकवास सुनने,देखने  वाले ऐसे  ऐसे फुर्सत अली अब इक्के-दुक्के ही रह गए हैं ! लोग टी.व्ही. के पर्दे को नहीं ,बल्कि इन फुर्सत अलियों को अब आश्चर्य से देखा करते हैं ! लगता है कि  कुछ ही दशकों में लोगों के दिलों  से टीव्ही चैनलों का दिमागी बुख़ार ,देखते ही देखते , तेजी से उतरने लगा है। लगभग उतर ही चुका है। आप स्वयं अपने घरों में या पास -पड़ोस में इसे महसूस कर सकते हैं। यह एक शुभ संकेत है। पहले क्रिकेट की रनिंग कमेंट्री देखने के लिए छोटे पर्दे के सामने जिस तरह क्रिकेट प्रेमियों का जमावड़ा लगता था , वह भी अब नज़र नहीं आता। अब तो कब ,कहाँ कोई राष्ट्रीय ,अंतरराष्ट्रीय मैच हो रहा है , यह जानने की रुचि भी (जिनके घरों में टीव्ही है) उनमें   नहीं रह गयी है। 

     इसमें दो राय नहीं कि आज के युग में ,  एक स्वस्थ लोकतंत्र में  लोक -अभिव्यक्ति ,मनोरंजन और सूचनाओं तथा विचारों   के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में जनता को अख़बारों के साथ -साथ रेडियो और टीव्ही चैनलों की भी जरूरत होती है।अख़बार और रेडियो तो फिर भी काफी कुछ ठीक हैं ,लेकिन मेरा निजी आंकलन है कि  टेलीविजन चैनलों के प्रति जनता की दिलचस्पी लगातार घटती जा रही है। लोग टीव्ही देखना समय की बर्बादी मानने लगे हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं।मेरे ख़्याल से पहला कारण तो यह है कि पहले की तुलना में अब प्राइवेट चैनलों की भरमार हो गयी है। इक्का -दुक्का से बढ़कर उनकी संख्या सैकड़ों -हजारों में पहुँच गयी है। किसे देखें और किसे न देखें ?  दूसरा कारण है उनमें समाचारों और कार्यक्रमों के दौरान आने वाले अनगिनत अटपटे ,अतिशयोक्तिपूर्ण और अविश्वसनीय विज्ञापनों की भरमार ,जिनकी वजह से दर्शक ऊब जाते हैं और रिमोट बटनों से चैनल बदलने लगते हैं ,लेकिन ऐसे इश्तहारों से उन्हें तब भी राहत नहीं मिलती। सभी चैनलों में कार्यक्रमों के बीच ब्रेकिंग टाइम एक ही वक्त पर शुरू होता है और देर तक चलता है। 

    तीसरा कारण  लगभग सभी चैनलों की ,खास तौर पर न्यूज चैनलों की ,अपनी -अपनी वैचारिक राजनीतिक और व्यावसायिक   प्रतिबद्धता ,जो उनके डिबेट आदि के कार्यक्रमों में साफ़ झलकती है , जिनमें एंकरों की वाणी से ऐसा लगता है कि वे किसी खास रसूखदार व्यक्ति , दल अथवा संस्था के अघोषित प्रवक्ता के तौर पर या प्रचारक के रूप में बातें कह रहे हैं ,जबकि उनका काम मंच -संचालक के रूप में  सिर्फ़ इतना होना चाहिए कि वे उस कार्यक्रम में वक्ताओं अथवा प्रतिभागियों को बारी -बारी से बुलाएं और उन्हें बोलने का मौका दें । पर उनमें यह निष्पक्षता कहीं नज़र नहीं आती । चौथा कारण  मेरे ख़्याल से यह है कि जन सरोकारों से बहुत दूर अमीरों की ऐशोआराम को महिमामंडित करते बेहूदे धारावाहिकों और भोंडे कॉमेडी सीरियलों से जनता बोर हो चुकी है।  कला -संस्कृति के साथ -साथ किसानों ,मज़दूरों ,छात्र -छात्राओं और बेरोजगारों के हितों से जुड़े कार्यक्रम 99 प्रतिशत चैनलों में नज़र नहीं आते।  दूरदर्शन एक अपवाद हो सकता है।इसके अलावा पाँचवा कारण भी बहुत स्पष्ट है।  अब अधिकांश जनता समझने लगी है कि  ये प्राइवेट चैनल अरबों -- खरबों रुपयों की दौलत के मालिक  बड़े -बड़े सेठ -साहूकारों द्वारा खरीदे जा चुके हैं।  इनमें आने वाले कार्यक्रम भी उनके मालिकों की पसंद के होते हैं। एंकरों का रिमोट भी उन्हीं के हाथों में रहता है। स्वाभाविक है ,जो व्यक्ति  पूंजी लगाएगा ,वह अपने व्यावसायिक हितों का ध्यान तो रखेगा ही। 

 छठवां कारण इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया का बढ़ता  मायाजाल भी है। लोग अब टीव्ही के बजाय यूट्यूब चैनलों में दिलचस्पी लेने लगे हैं , हालांकि ख़बरों के मामले में  निष्पक्षता उनमें भी  नहीं है। फूहड़ कार्यक्रम उनमें भी ख़ूब आ रहे हैं। लेकिन  इस बुख़ार से भी  अगले कुछ दशकों में लोगों को मुक्ति मिल सकती है ,ऐसा मेरा मानना है। अगर आपको लगता है कि इन सबके अलावा और भी कई कारण  हैं तो कृपया साझा कीजिए।

-- स्वराज करुण।

Tuesday, September 27, 2022

(आलेख) दलबदलुओं को उनके निर्वाचित पदों से बर्ख़ास्त माना जाए : चुनाव खर्च की भी हो वसूली

(आलेख : स्वराज्य करुण )

दलबदल चाहे व्यक्तिगत हो या सामूहिक , दोनों ही स्थितियों में ,संसद और विधान सभाओं समेत अन्य सभी  निर्वाचित संस्थाओं से दलबदलुओं की सदस्यता स्वयमेव समाप्त हो जानी चाहिए। इसके लिए किसी कानूनी औपचारिक की जरूरत न हो। किसी ने दल बदला यानी उसे उसके निर्वाचित पद से ऑटोमेटिक बर्ख़ास्त माना जाए। जिस निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचित व्यक्ति ने दलबदल किया हो  उस निर्वाचनक्षेत्र में चुनाव करवाने में हुए सरकारी खर्च  की वसूली भी उसी व्यक्ति से  की जाए। ऐसे प्रावधान होने  चाहिए। कुछ लोगों ने लोकतंत्र का मज़ाक बना रखा है ! ऐसे प्रावधानों से उनको सबक मिलेगा।  

 कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि अगर दल बदल रहा है तो  इसका  मतलब  है कि वह व्यक्ति जनता को धोखा दे रहा है , क्योंकि वह किसी दल विशेष का प्रत्याशी बनकर उसके चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ता है ,उस दल और चुनाव चिन्ह के लिए व्होट मांगता है ,मतदाता भी उस पर भरोसा करके उस चिन्ह पर व्होट देकर उसे विजयी बनाते हैं। ऐसे में उस निर्वाचित व्यक्ति के द्वारा अचानक दल बदल करना एक प्रकार से मतदाताओं को धोखा देना नहीं तो और क्या है ?  अगर किसी को दलबदल करना ही है तो वह पहले अपने निर्वाचित पद से इस्तीफ़ा दे और जिस दल में जाना चाहता है ,उसका सदस्य बने , फिर चुनाव लड़कर और जीतकर दिखाए। आम जनता के भी यही विचार हैं।

                      

ललितडॉटकॉम: "मेरे दिल की बात" का विमोचन के बाद चले गुजरात की ओ...

 ललित भाई की यह पोस्ट लगभग ग्यारह साल पुरानी यादों को ताज़ा कर रही है। 

ललितडॉटकॉम: "मेरे दिल की बात" का विमोचन के बाद चले गुजरात की ओ...: छत्तीसगढ के यशस्वी ब्लॉगर साहित्यकार स्वराज्य करुण का नाम परिचय का मोहताज नहीं है,लगभग-35-40 वर्षों से उनकी सतत साहित्य साधना जारी है। एक द...

Monday, September 26, 2022

(आलेख) हम नहीं कहते ,ज़माना कहता है ...

   (आलेख : स्वराज्य करुण )

दलबदल चाहे व्यक्तिगत हो या सामूहिक , दोनों ही स्थितियों में ,संसद और विधान सभाओं समेत अन्य सभी  निर्वाचित संस्थाओं से दलबदलुओं की सदस्यता स्वयमेव समाप्त हो जानी चाहिए।कुछ लोगों ने लोकतंत्र का मज़ाक बना रखा है ! कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि अगर दल बदल रहा है तो  इसका  मतलब  है कि वह व्यक्ति जनता को धोखा दे रहा है , क्योंकि वह किसी दल विशेष का प्रत्याशी बनकर उसके चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ता है ,उस चुनाव चिन्ह के लिए व्होट मांगता है ,मतदाता भी उस पर भरोसा करके उस चिन्ह पर व्होट देकर उसे विजयी बनाते हैं। ऐसे में उस निर्वाचित व्यक्ति के द्वारा अचानक दल बदल करना एक प्रकार से मतदाताओं को धोखा देना नहीं तो और क्या है ?  अगर किसी को दलबदल करना ही है तो वह पहले अपने निर्वाचित पद से इस्तीफ़ा दे और जिस दल में जाना चाहता है ,उसका सदस्य बने , फिर चुनाव लड़कर और जीतकर दिखाए। आम जनता के भी यही विचार हैं। 

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Friday, September 23, 2022

(आलेख) आज़ादी के 75 वर्षों में रेल सेवाओं में पहली बार इतनी रुकावटें !

                                           (आलेख : स्वराज्य  करुण )

कोरोना काल में करीब पौने तीन साल पहले बाधित रेल सेवाओं की बहाली  अब तक ठीक से नहीं हो पायी है। भले ही कोरोना संकट काफी हद तक टल चुका है । लेकिन इसके बाद भी रेल यातायात में पहले जैसी सामान्य स्थिति नहीं लौट पायी है। ज़िम्मेदार लोग बताएँ - क्या अब भी इसके लिए  कोरोना ज़िम्मेदार है ? किसी एक रेल्वे जोन में ट्रेनों के रद्द होने का प्रतिकूल असर देश के अन्य इलाकों की रेल सेवाओं पर भी पड़ता है।  आवागमन का सस्ता साधन होने के कारण काफी संख्या में लोग ट्रेनों में यात्रा करते हैं। लेकिन  हर हफ़्ते अचानक  दर्जनों  यात्री ट्रेनों के कैंसिल होने से उन हजारों -,लाखों यात्रियों में हाहाकार मच रहा है ,जो अपने रोज के कामकाज के सिलसिले में पैसेंजर ट्रेनों से आना जाना करते हैं । इनमें वाणिज्यिक कारोबार , सरकारी और प्राइवेट नौकरी ,  तरह -तरह की मेहनत मज़दूरी आदि के लिए अपने क्षेत्र के   एक शहर से दूसरे शहर रोज अप-डाउन करने वाले भी बड़ी संख्या में शामिल हैं। अन्य प्रयोजनों से रेल यात्रा करने वाले मुसाफ़िर भी परेशान हैं। अचानक किसी ट्रेन के स्थगित होने या निरस्त होने की ख़बर आती है तो  यात्रियों में बेचैनी के साथ भारी हताशा का आलम देखा जाता हैंम यात्री रेलगाड़ियों के रद्द होने पर स्टेशनों के कुलियों की भी कमाई मारी जा रही है। 

                                                                  


हमने अपनी आज़ादी का अमृत महोत्सव भी मना लिया ,लेकिन इसके 75 वर्षों में अपनी रेल सेवाओं में इतनी बड़ी -बड़ी रुकावटें पहले कभी नहीं देखी ।  अगर अंग्रेजों के ज़माने को शामिल करके देखें तो भारत में रेल सेवाओं का इतिहास लगभग 185 साल का हो चुका है। इन 185 वर्षों में भी देश के रेल यातायात में ऐसी रुकावटें नहीं आयी होंगी। इंटरनेट को खंगालें तो भारत में रेल सेवाओं की विकास यात्रा के बारे में  कई रोचक तथ्य मिलते हैं।  हमारे देश में पहली रेल एक मालगाड़ी थी , जो वर्ष 1837 में मद्रास (वर्तमान तमिलनाडु) में रेड हिल्स से चिंता द्रिपेट पुल तक चलाई गयी थी। इसका निर्माण  1836 में आर्थर कॉटन नामक अंग्रेज ने करवाया था। मकसद था -ग्रेनाइट पत्थरों का परिवहन।उन दिनों गोदावरी नदी पर एक बाँध बन रहा था ,जिसके लिए पत्थरों की सप्लाई इस रेलमार्ग से की जाती थी। 

     हमारे यहां  यात्री रेल सेवाओं की शुरुआत 16 अप्रैल वर्ष 1853 को हुई  ,जब मुम्बई के बोरीबंदर से ठाणे के बीच 34 किलोमीटर में  400 यात्रियों की क्षमता और तीन वाष्प इंजनों वाली पैसेंजर ट्रेन का परिचालन किया गया था । यानी यात्री ट्रेनों का इतिहास 169 साल का और मालगाड़ियों का इतिहास  वर्ष 1837 में मद्रास में चली मालगाड़ी को मिलाकर देखें तो 185 साल का हो चुका है। बाद के दशकों में रेल सेवाओं का लगातार विस्तार हुआ और 15 अगस्त 1947 को मिली आज़ादी के बाद इन सेवाओं का दायरा और भी बढ़ता चला गया। स्वतंत्र भारत की सभी सरकारों और रेल्वे के हमारे लाखों  मेहनतकश कामगारों का इसमें महत्वपूर्ण योगदान है। देश को चारों दिशाओं से एकता के सूत्र में बाँध कर रखने में भी हमारे रेल नेटवर्क की बड़ी भूमिका है।                                        


   आज भारत में  रेलमार्गों का नेटवर्क 67 हजार किलोमीटर  से भी ज्यादा विस्तृत हो चुका है,जिनमें हर दिन 8700 यात्री ट्रेनों और् 7हजार 349  मालगाड़ियों का परिचालन होता है।  रेल्वे स्टेशनों की संख्या 8, 338  हो चुकी है। हर दिन लगभग 2 करोड़ 30 लाख यात्रियों को आवागमन और उद्योगों तथा कारोबारियों को 33 लाख मीट्रिक टन माल परिवहन की सुविधाएँ देने की क्षमता भारतीय रेल मंत्रालय के पास है। करीब 15 लाख कर्मचारियों के साथ यह दुनिया की चौथी सबसे बड़ी रेल सेवा है। हो सकता है कि आंकड़ों में कुछ त्रुटियाँ हों ,लेकिन मोटामोटी यही तथ्य हैं।

      लेकिन मैं इंटरनेट खंगाल कर आपको  यह सब क्यों बता रहा हूँ ? मुझसे अधिक जानकारी तो आपके पास होगी !  मैं तो सिर्फ़ इसलिए याद दिला रहा हूँ  कि आज़ादी के पहले और बाद के 185 वर्षों को मिलाकर देखें तो लगेगा कि हमारी रेल सेवाओं में शायद ही कभी  इतनी बड़ी बड़ी रुकावटें आयी होंगी ,जितनी आज देखने को मिल रही है। आज़ादी के 75 वर्षों में भी ऐसा कभी नहीं हुआ ,जब आये दिन बिना किसी पूर्व सूचना के बिना कोई ठोस कारण बताए , बड़ी संख्या में रेलगाड़ियाँ रद्द हो रही हैं। क्या ज़िम्मेदार लोग देख  रहे हैं जनता की तकलीफ़?क्या नागरिकों का दर्द उन्हें महसूस हो रहा है ? अब तक  66 प्लस 38 ,यानी 104 ट्रेनें रद्द ?  भारी वर्षा ,  बाढ़ ,तूफ़ान ,भूकम्प  या रेल दुर्घटना की वजह से ट्रेनें कैंसिल हों तो बात समझ मे आती है , लेकिन यहाँ तो जनता की समझ में आने लायक  कोई स्पष्ट कारण भी नहीं बताया जा रहा है । सामान्य दिनों में अचानक घोषणा होती है कि ट्रेन कैंसिल। कई बार तो यात्रियों को  स्टेशन पहुँचने पर पता चलता है कि उनकी ट्रेन आज नहीं आएगी। क्या कम से कम एक सप्ताह पहले मीडिया के जरिए और यात्रियों के मोबाइल पर एसएमएस के जरिए इसकी सूचना नहीं दी जा सकती ?(आलेख - स्वराज्य करुण )

Thursday, September 22, 2022

(आलेख) आख़िर क्या हो सामान्य ज्ञान की कसौटी ?

                                                 (आलेख : स्वराज करुण)

सामान्य ज्ञान के मूल्यांकन का मापदंड आख़िर क्या होना चाहिए ? क्या कुछ देशों और राज्यों की राजधानियों के बारे में , कुछ तत्कालीन और कुछ वर्तमान  राजनेताओं , कुछ विशेष प्रकार के खेलों और  खिलाड़ियों , कुछ लेखकों ,कुछ कवियों  और कुछ विशेष किताबों के बारे में और खेती -किसानी के बारे में  जानकारी रखना और उनके बारे में पूछे गए सवालों के सटीक जवाब देना सामान्य ज्ञान है ? क्या  महंगाई और बेरोज़गारी के ताजातरीन  आंकड़ों के बारे में , अंतरिक्ष यात्राओं के बारे में ,  नदियों ,पहाड़ों , धर्मों , सम्प्रदायों और समुदायों की विशेषताओं के बारे में प्रश्नों के सही उत्तर देना सामान्य ज्ञान है ?

      अगर कोई इन्हें ही सामान्य ज्ञान की कसौटी मानता है तो भले ही आप उससे सहमत हों ,लेकिन मैं  नहीं हो सकता ! मेरे ख़्याल से अलग --अलग विषयों में हर व्यक्ति का सामान्य ज्ञान एक जैसा नहीं हो सकता ।  अगर आप किसान से किसी बहुचर्चित खेल और खिलाड़ी के बारे में या फिर किसी अंतरिक्ष यान और अंतरिक्ष यात्री के बारे में सवाल पूछेंगे तो ज़रूरी नहीं कि वो उसका सही जवाब दे , क्योंकि उसका कार्यक्षेत्र खेती -किसानी है ,खेल का मैदान या इसरो अथवा नासा की प्रयोगशाला नहीं । आपकी श्रीमतीजी रसोई कला में  में जितनी निपुण होंगी ,ज़रूरी नहीं कि उसमें आप भी उतने ही निपुण हों । इस दृष्टि से देखें तो रसोई कला में उनका सामान्य ज्ञान आपसे कहीं ज़्यादा है । अपने परिवेश में होने वाली दिन -प्रतिदिन की प्रमुख घटनाओं की ,अपने समाज और संस्कृति की कुछ न कुछ सामान्य जानकारी हर किसी को होनी चाहिए ,लेकिन अगर नहीं है तो सिर्फ़ इतने भर से उसका जीवन व्यर्थ नहीं हो जाता ।

      मोटर मैकेनिक , दर्जी , कारपेंटर ,लोहार , मोची , डॉक्टर , इंजीनियर , राजनेता , अभिनेता ,अभिनेत्री , फ़िल्म निर्माता ,फ़िल्म निर्देशक ,  गीतकार ,संगीतकार , साहित्यकार , अंतरिक्ष वैज्ञानिक , कृषि वैज्ञानिक  आदि   हर क्षेत्र के हर व्यक्ति का सामान्य ज्ञान एक जैसा नहीं हो सकता ।वो सब अपने -अपने कार्यों के और अपने -अपने  कार्यक्षेत्र के अच्छे जानकार और विशेषज्ञ हो सकते हैं ,अपने काम में माहिर हो सकते हैं , लेकिन यह आवश्यक नहीं कि वो अपने से भिन्न किसी कार्य में पारंगत हों अथवा अपने से इतर किसी कार्यक्षेत्र के जानकार हों । किसी व्यक्ति की सिर्फ इस वज़ह से खिल्ली नहीं उड़ानी चाहिए कि उसे कम्प्यूटर चलाना नहीं आता । हो सकता है वह किसी दूसरे कार्य में दक्ष हो । जो काम आप कर सकते हैं ,उसे कोई दूसरा नहीं कर सकता और जो काम दूसरा कर सकता है ,उसे आप नहीं कर सकते । दोनों का सामान्य ज्ञान अलग-अलग होगा ।

    एक व्यक्ति बहुत अच्छा दर्जी हो सकता है और कलात्मक ढंग से हमारे कपड़े सिल सकता है , लेकिन वो डॉक्टरी का भी ज्ञान रखे ,उससे ऐसी उम्मीद नहीं करनी चाहिए । इसी तरह एक व्यक्ति कुशल डॉक्टर या कुशल इंजीनियर हो सकता है ,लेकिन उससे दर्जीगीरी के ज्ञान की उम्मीद करना उचित नहीं । दर्जी का काम कोई डॉक्टर या इंजीनियर नहीं कर सकता और डॉक्टर और इंजीनियर  का काम कोई दर्जी नहीं कर सकता ,लेकिन समाज में  दोनों को एक -दूसरे की ज़रूरत होती है । 

   आप कितने ही धनवान और रसूखदार क्यों न हों ,लेकिन किसी यात्रा में अगर कहीं सड़क पर आपकी गाड़ी में कोई तकनीकी ख़राबी आ जाए तो उसकी मरम्मत के लिए तत्काल उसकी निर्माता कम्पनी का सूटेड -बूटेड इंजीनियर नहीं आने वाला ,आपको आसपास के किसी  निरक्षर या अल्प साक्षर  'छोटू मिस्त्री ' की ही शरण में  जाना होगा और वही उसकी मरम्मत करेगा ।अब आप बताइए ! वहां पर किसका सामान्य ज्ञान सबसे अधिक और सबसे अच्छा है ? आपका या छोटू मिस्त्री का ? आप कितने ही बड़े  तुर्रमखां क्यों न हों ,अगर आपके जूते फट गए हों तो उन्हें सिलने के लिए आपको मोची के पास ही जाना पड़ेगा ।

 किसी  रसायनशास्त्री से या किसी भौतिक विज्ञानी से हम और आप उम्मीद करें कि वह रामायण ,महाभारत ,वेद -पुराण ,कुरान ,बाइबल जैसे धर्मग्रन्थों की  भी व्यापक जानकारी रखे ,तो क्या यह उसके साथ ज्यादती नहीं  होगी ? हाँ ,कुछ अपवाद ज़रूर हो सकते हैं ,लेकिन आम तौर पर  इस दुनिया में हर कोई हर किसी के कामकाज का ज्ञाता नहीं हो सकता ,लेकिन इस मानव समाज में सबको एक -दूसरे की ज़रूरत होती है ।इसलिए किसी के भी सामान्य ज्ञान का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए । सबका अपना -अपना सामान्य ज्ञान होता है  ।अपने -अपने कार्यों में सभी पारंगत होते हैं । ऐसे में यह प्रश्न विचारणीय है कि सामान्य ज्ञान की कसौटी आख़िर क्या होनी चाहिए ? 

      -स्वराज्य करुण 

Wednesday, September 21, 2022

(आलेख) ये कहानी है दीये की और तूफ़ान की

                        (आलेख - स्वराज्य करुण)

आधुनिकता की आँधी और मशीनीकरण के तूफान  में कई परम्परागत व्यवसाय तेजी से विलुप्त हो रहे हैं । दीये और तूफान की इस कहानी में दीया बुझता हुआ नजर आ  रहा है । जैसे कुम्हारों का माटी शिल्प , चर्मकारों का चर्म शिल्प ,  हाथकरघा बुनकरी और  दर्जियों की  सिलाई कला । सरकारों के तमाम अच्छे प्रयासों के बावजूद इन शिल्प कलाओं में  दक्ष  हुनरमंद हाथों की रचनाओं को बेहतर बाज़ार नहीं मिल पा रहा है ।   

जैसे - मिट्टी के कुल्हड़ों का स्कोप अब नहीं के बराबर रह गया है । उनके बदले प्लास्टिक के कप और गिलास खूब चल रहे हैं ,जिन्हें इस्तेमाल करने के बाद  लोग इधर -उधर लापरवाही से फेंक देते हैं ,जो नालियों के जाम होने और प्रदूषण का कारण बनते हैं ।ऐसे में अगर ट्रेनों में कुल्हड़ का चलन बन्द हो जाए तो  रही -सही कसर भी नहीं रह जाएगी । मिट्टी के कुल्हड़ तो पर्यावरण हितैषी होते हैं ।   ट्रेनों में ,शादी -ब्याह में , दफ्तरों में , चाय ठेलों और होटलों में , जलसों और सभाओं में उनका चलन बढ़ाया जाए तो कुम्हारों को  साल भर काम मिलता रहेगा और प्लास्टिक प्रदूषण भी कम होने लगेगा । कुम्हारों के इस पारम्परिक शिल्प को  बचाने का मेरे विचार से एक ही उपाय है कि इन हुनरमंद हाथों से बने मिट्टी के कुल्हड़ों को बढ़ावा दिया जाए ।   इससे कुम्हारों की आमदनी बढ़ेगी और उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर होगी।

कुछ साल पहले तक आप और हम अपने घर में  महीने भर  संकलित दैनिक अखबारों के अनुपयोगी  बंडल पड़ोस की किराना दुकान वाले के पास पांच -छह रुपए किलो के हिसाब से बेच देते थे ,जिनमें दुकानदार जीरा ,धनिया ,मेथी आदि चिल्हर वस्तुओं की पुड़िया बनाकर बेच लेते थे । अखबारों को पढ़ने के बाद वह कागज  इस तरह उपयोग में आ जाता था ।  किराना दुकानों में कागज के ठोंगे का चलन था । कम आमदनी वाले परिवारों की महिलाएं घरों में इनके ठोंगे बनाकर कुछ अतिरिक्त आमदनी हासिल कर लेती थीं। प्लास्टिक के कैरीबैग नहीं थे  ,जो आज धरती की परत को पर्यावरण की दृष्टि से गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं ।                                                 


     पहले गाँवों में सरई आदि  वृक्षों के पत्तों से   दोना पत्तल बनाए जाते थे। शादी ब्याह और अन्य सामाजिक आयोजनों में सामूहिक भोज में पंगत में बैठे मेहमानों को इन्हीं दोना पत्तलों में भोजन परोसा जाता था। लोग बड़े चाव से उनमें भोजन किया करते थे। देश के कई राज्यों में तो केले के पत्तों पर भी भोजन परोसने का रिवाज था। केले के पत्ते हों या वृक्षों के पत्तों से बने दोना पत्तल ,ये हमारे लिए प्राकृतिक थाली और कटोरी हैं ,जिनका प्रचलन धीरे -धीरे कम होता जा रहा है । ये कहना शायद गलत नहीं होगा कि ये विलुप्त होने की स्थिति में हैं। वरना पहले तो सरकारें भी ग्रामीणों को प्राकृतिक दोना पत्तल बनाने के लिए स्वरोजगार योजना के तहत आसान शर्तो पर बैंकों से लोन भी दिलवाती थीं। लेकिन आधुनिकता के तूफ़ान ने हमारी कई प्राचीन परम्पराओं को ध्वस्त कर दिया है। फलस्वरूप हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं। दोना पत्तल तो अब भी बनते और बिकते हैं ,उनके लिए मशीनें आ गयी हैं , लेकिन उन्हें चमकदार ,टिकाऊ और आकर्षक बनाने के लिए उन पर प्लास्टिक या पॉलीथिन की हल्की परत चढ़ाकर उन्हें प्रति सैकड़ा के हिसाब से बेचा जाता है । इनमें अज़ीब सी बदबू भी आती है।  फिर भी शादियों के रिसेप्शन में लोग उनमें भोजन करते हैं और उसके बाद उन्हें फेंक दिया जाता है ।  ऐसे प्लास्टिक आवरण वाले  दोना पत्तल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं  और पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचाते हैं। गाय ,बैल आदि जानवर भी इन्हें चबाकर बीमार हो जाते हैं। इन हानिकारक दोना पत्तलों की वजह से  परम्परागत दोना पत्तल बनाने वाले ग्रामीणों की अब कोई पूछ -परख नहीं होती ।

   चर्मकार अपने हाथों से  जो जूते बनाते हैं  ,उन्हें अगर वे अपनी गुमटीनुमा दुकानों में सौ -दो सौ रूपए में बेचते हैं तो शहरी दुकानदार  उसी तरह के जूते उन्हीं से बनवाकर और उन पर ब्रांडेड कम्पनी का लेबल लगाकर  ऊंची दुकानों में काँच के शो -केस में सजाकर 500 से 1500 और 2000 रुपए तक  या उससे भी ज्यादा कीमत का लेबल लगाकर बेच रहे हैं । अगर किसी सरकारी योजना में गरीबों को जूते वितरित किए जा रहे हों तो उनकी खरीदी इन परम्परागत चर्मशिल्पियों से या उनकी सहकारी समितियों से  की जा सकती है । इससे इन शिल्पियों  को साल भर रोजगार की गारन्टी रहेगी ।  अकेले सरकार नहीं बल्कि समाज को भी इस बारे में सोचने की जरूरत है । सरकारों ने समय -समय पर  हाथकरघा बुनकरों को बाज़ार दिलाने की सराहनीय पहल की है । जैसे - हर सरकारी दफ्तर के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वे अपने कार्यालय के  पर्दे , टेबिल क्लॉथ आदि  के लिए जरूरी कपड़े हाथकरघा बुनकरों की सहकारी समितियों से खरीदें ।   इस नियम का गंभीरता से पालन होना चाहिए । छत्तीसगढ़ सरकार ने स्कूली बच्चों के लिए  गणवेश सिलाई का काम  महिलाओं के स्वसहायता समूहों को दिया है । यह भी एक अच्छी पहल है । इससे  महिलाएं  दर्जी के काम में दक्ष होकर आत्म निर्भर बनेंगी । बच्चों के लिए स्कूली गणवेश की सरकारी खरीदी से इन समूहों   को  अच्छा बाज़ार और व्यवसाय मिलेगा । देश में छोटे -छोटे व्यवसायों में युवाओं के अल्पकालीन  प्रशिक्षण के लिए कौशल उन्नयन  की जो  योजनाएं चल रही हैं ,उनमें ऐसे परम्परागत व्यवसायों को अधिक से अधिक संख्या में जोड़ा जाना चाहिए । 

     नागरिकों को भी चाहिए वे अपने घरेलू उपयोग के लिए जरूरी सामानों की खरीदी परम्परागत शिल्पकारों से या उनकी सहकारी समितियों की दुकानों से करें ।  खादी ग्रामोद्योग की दुकानों में  या एम्पोरियमों में ऐसे सामान खूब मिलते हैं ,लेकिन नये ज़माने की चमक -दमक वाले विज्ञापनों का मायाजाल फैलाने की कला उन्हें  नहीं मालूम ,इस वजह से  उन्हें हमेशा  ग्राहकों का इंतज़ार रहता है । 

        आलेख -स्वराज्य करुण