Tuesday, November 11, 2025

(पुस्तक -चर्चा ) रजत कृष्ण साहित्य के स्टीफन हॉकिंग (आलेख ; स्वराज्य करुण )

 जहाँ से मैं आता हूँ 

कविता के इस देश में...

    *****

ये रजत कृष्ण की कविता 'छत्तीस जनों वाला घर 'की प्रारंभिक पंक्ति है.रजत कृष्ण  आधुनिक हिन्दी कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं.उनका जन्म 26 अगस्त 1968 को छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में स्थित ग्राम लिमतरा में हुआ था. 

सिर्फ़ 12 साल की उम्र में वह  मसक्युलर डिस्ट्राफी नामक बीमारी  के शिकार हो गए थे.मांस -पेशियों को बहुत कमजोर बना देने वाली इस लाइलाज बीमारी से उनकी बहन का निधन हो गया था.लेकिन रजत ने हिम्मत नहीं हारी.घर -परिवार की विभिन्न समस्याओं का सामना करते हुए उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की.पिता जोहन राम साहू के निधन के बाद परिवार को भी संभाला.पिताजी ने रजत के बड़े भाई मोहित के लिए जब पान ठेले की व्यवस्था की थी,उन दिनों रजत सातवीं में पढ़ते थे.   स्कूल की छुट्टी होने पर वे शाम के वक़्त इस पान दुकान के संचालन में बड़े भाई का हाथ बँटाते थे .


            


  वर्तमान में रजत छत्तीसगढ़ के महासमुन्द जिले में स्थित शासकीय महाविद्यालय,बागबाहरा में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक हैं.  मोटराराइज्ड व्हील चेयर पर चलते हैं. वह अदम्य साहस के साथ  तमाम चुनौतियों का मुकाबला करते हुए एक रचनात्मक जीवन जी रहे हैं और एक से बढ़कर एक बेहतरीन कविताओं का सृजन कर रहे हैं. इसे देखते हुए उनके साहित्यिक मित्रों ने उनकी तुलना ऑक्सफोर्ड में जन्मे महान खगोल विज्ञानी स्वर्गीय स्टीफन हॉकिंग से की है,  जो 21साल की उम्र में मोटर न्यूरौन की  व्याधि से पीड़ित हो गए थे और जिन्होंने 76 साल की जीवन यात्रा में 55 साल  व्हील चेयर पर बैठकर ही कई बड़े अनुसंधान किए. साहित्यकार नंदन और भास्कर चौधुरी ने 'रजत कृष्ण साहित्य के स्टीफन हॉकिंग'शीर्षक से उन पर केंद्रित 240 पेज की एक पुस्तक का सम्पादन किया है. इसमें रजत के जीवन और साहित्य सृजन  पर उनसे जुड़े देश भर के अनेक साहित्यकारों के आलेख शामिल हैं.इसका विमोचन 2नवंबर 2025 को रजत के गृह नगर बागबाहरा में किया गया.इसे नई दिल्ली के न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है. पुस्तक 399 रूपए की है, लेकिन हिन्दी साहित्य के अध्येताओं के लिए यह एक ज़रूरी किताब है. 

   रजत ने 'सर्वनाम'के सम्पादक रहे स्वर्गीय विष्णु चंद्र शर्मा के सम्मान में 'अंतिम साँसों तक सीखने वाले सर्जक ' शीर्षक से एक आलेख लिखा था,जिसे इस संकलन में प्रकाशित किया गया है. इसके अलावा इसमें रजत की कुछ चयनित कविताओं सहित उनके कुछ लेख और सम्पादकीय भी हैं.   संग्रह में रजत के साहित्य लेखन पर जोधपुर (राजस्थान ) के डॉ. रमाकांत शर्मा ने 'आंचलिक रसगंध के कवि ' शीर्षक से लेख लिखा है.दिल्ली के महेश दर्पण ने 'एक अनिवार्य उपस्थिति', दिल्ली के ही एकांत श्रीवास्तव ने 'छत्तीस पंखुड़ियों वाला फूल ', दुमका (झारखण्ड)के सुशील कुमार ने 'लोकभाषा और कविता' और बाँदा (उत्तर प्रदेश)के केशव तिवारी ने 'रजत एक योद्धा' शीर्षक से कवि के प्रति अपने विचार व्यक्त किए हैं, वहीं जम्मू के अग्निशेखर ने रजत की एक कविता की पंक्ति 'इस बखत सबसे बड़ी सजा है किसान होना ' को अपने लेख का शीर्षक बनाया है. संकलन में कुसमुंडा (कोरबा )के कामेश्वर पाण्डेय का लेख 'रजत कृष्ण : जिसे साहित्य ने संजोया'भी बहुत महत्वपूर्ण है. इनके अलावा दुर्ग के अंजन कुमार, कोमा (राजिम )के निर्मल आनंद, कवर्धा के अजय चंद्रवंशी, रायपुर के इंद्र राठौर, बागबाहरा के पीयूष कुमार,  सुषमा निर्मलकर,कृष्णानंद दुबे और हाथीगढ़ (बागबाहरा)के डॉ. विजय कुमार सहित कई विशिष्ट जनों द्वारा कवि रजत प्रति अपनी -अपनी भावनाएँ व्यक्त की गईं हैं .रजत कृष्ण ने लघु पत्रिकाओं के अर्थशास्त्र पर अपनी बात रखी है, जिसमें उन्होंने  साहित्यिक पत्रिका 'सर्वनाम 'के सम्पादन के दौरान आयी कुछ दिक्क़तों का भी उल्लेख किया है.इसके साथ ही उन्होंने इस लेख में' मुक्तिबोध ' और 'संदर्श'जैसी लघु पत्रिकाओं के प्रकाशन में आयी कठिनाइयों का भी जिक्र किया है.रजत से विजय सिंह और नंदन की आत्मीय बातचीत भी इसमें प्रकाशित है.रजत कृष्ण पर अपनी पाँच छोटी -छोटी कविताओं के साथ भास्कर चौधुरी ने भी एक आलेख लिखा है, जिसका शीर्षक है -अदम्य साहस और इच्छा शक्ति का दूसरा नाम है साहित्यकार रजत कृष्ण उर्फ़ प्रोफेसर डॉ. कृष्ण कुमार साहू. संकलन में रजत कृष्ण का लिखा आलेख -समकालीन कविता में स्त्री स्वर'भी पठनीय और विचारणीय है.

    किताब 'साहित्य के स्टीफन हॉकिंग 'में विजय प्रकाश द्वारा संकलित एक आलेख 'रजत कृष्ण के जीवन संघर्ष पर आधारित सफलता की कहानी के रूप में है,जो राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद की एक पुस्तक में भी प्रकाशित है. इसमें 12साल की उम्र में रजत को मसक्युलर डिस्ट्राफी नामक असाध्य बीमारी होने और और हाई स्कूल तक आते -आते चलने -फिरने और उठने-बैठने में असमर्थ हो जाने का उल्लेख है.इसमें यह भी लिखा गया है कि रजत धैर्य और हिम्मत के साथ पढ़ाई करते रहे और भाइयों के सहयोग से पान ठेला भी चलाते रहे.

       रजत कृष्ण ने जीवन की कठिन परिस्थितियों  में हिम्मत नहीं हारी और  अध्यापन कार्य जारी रखते हुए साहित्य के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपना एक मुकाम बनाया है.उन्हें हिन्दी के अत्यंत सम्मानित और वरिष्ठ साहित्यकार, दिल्ली के विष्णु चंद्र शर्मा ने वर्ष 2002  में अपनी प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका'सर्वनाम'के अतिथि सम्पादक का दायित्व सौंपा, फिर 2006 में उन्हें सम्पादक की जिम्मेदारी दे दी,जिसे उन्होंने छत्तीसगढ़ के बागबाहरा जैसे कस्बे में रहते हुए एक दशक तक  बखूबी निभाया.वर्ष 2004 में रजत ने जगदलपुर (बस्तर) से प्रकाशित, विजय सिंह की साहित्यिक पत्रिका 'सूत्र' का भी उनके आग्रह पर अतिथि सम्पादक के रूप में सम्पादन किया.रजत कृष्ण के साहित्य पर पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर में वर्ष 2010 में पीएच. डी. हो चुकी है, जिसका विषय था -रजत कृष्ण ; रचनात्मकता का जीवन और जीवन की रचनात्मकता. रजत के दो कविता संग्रह(1)वर्ष 2011में 'छत्तीस जनों वाला घर ' और (2) वर्ष 2020 में 'तुम्हारी बुनी हुई प्रार्थना ' प्रकाशित हो चुके हैं. उनके गंभीर साहित्य सृजन से प्रभावित होकर और उनकी शारीरिक व्याधि को देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें वर्ष 2004में मोटराइज्ड व्हील चेयर प्रदान किया था.समय -समय पर उन्हें अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया है.रजत के साथ उनके साहित्यिक मित्रों और आत्मीय जनों द्वारा समय -समय पर किया गया पत्र -व्यवहार इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. रजत द्वारा उन्हें लिखे गए पत्र भी इसमें सम्मिलित हैं. संकलन में शामिल रजत की कई कविताओं में ग्राम्य जीवन और आम जनता की भावनाएँ पूरी संवेदनशीलता के साथ प्रकट होती हैं.उनकी एक कविता के इस अंश में किसानों के दर्द को महसूस कीजिए -    

      *खेतों का मन आज भारी है,

        कुछ और किसानों के 

       बिकने की आज पूरी तैयारी   है / आ रहे हैं सौदागर 

       कहाँ न कहाँ से, 

        धरती मईया का सौदा करने,

          कैसा यह आपद काल,     

          मिट्टी भी जैसे आज हिम्मत हारी है.

     'छत्तीस जनों वाला घर 'शीर्षक कविता  में रजत ने अपना परिचय कुछ इस तरह दिया है -

     छत्तीसगढ़ के 

     एक छोटे -से जनपद 

      बागबाहरा में 

      छत्तीस जनों वाला 

      एक घर है /

     जहाँ से मैं आता हूँ 

     कविता के इस देश में.

रजत निरंतर लिखते रहें,  कविताएँ रचते रहें, जिनमें उनकी संवेदनाओं के रंग खिलें और जिनसे हमारा यह देश और हमारी यह दुनिया ख़ूब रंगीन और खूबसूरत बने.  रजत को बहुत -बहुत शुभकामनाएँ.

आलेख -स्वराज्य करुण 

 '

Sunday, November 2, 2025

(आलेख )साहित्य -सृजन से भी साकार हुआ सबका सपना (लेखक -स्वराज्य करुण )

 (आलेख ; स्वराज्य करुण


छत्तीसगढ़ प्रदेश की स्थापना के 25 साल पूरे हो गए हैं ।  राज्य  निर्माण का यह रजत जयंती वर्ष है ।परस्पर सहमति और सदभावना के वातावरण में मध्यप्रदेश के पुनर्गठन के जरिए छत्तीसगढ़ प्रदेश का अस्तित्व में आना एक ऐतिहासिक घटना है। आज़ादी के लगभग तिरेपन साल बाद भारत के मानचित्र पर एक नवम्बर सन 2000 को इक्कीसवीं सदी के प्रथम नये राज्य के रूप में और देश के 26 वें नये प्रदेश के रूप में छत्तीसगढ़ का उदय हुआ । 

 नये राज्य के निर्माण में यहाँ के राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ  सांस्कृतिक कर्मियों, पत्रकारों, समाचार पत्र -पत्रिकाओं और साहित्यकारों का भी बराबरी का योगदान रहा है। इसमें  समाज के सभी वर्गों की सराहनीय भूमिका थी ।रायपुर में लम्बे समय तक सबकी भागीदारी से अखंड धरना भी हुआ था, जिसे लोग आज भी याद करते हैं ।  साहित्यिक रचनाओं से राजनीति को भी दिशा मिलती है ।राज्य निर्माण के लिए समय -समय पर हुए राजनीतिक जन आंदोलनों को रचनात्मक ऊर्जा और दिशा देने का महत्वपूर्ण कार्य  छत्तीसगढ़ अंचल के साहित्यकारों की रचनाओं ने किया । 

   इस आलेख में हम छत्तीसगढ़ प्रदेश के निर्माण में साहित्यकारों की  सृजनात्मक भूमिका की चर्चा करेंगे ।किसी भी सार्वजनिक विषय के लिए जन -चेतना के विकास और विस्तार में साहित्य उत्प्रेरक की भूमिका में होता है । हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम में इसके कई उदाहरण मिलते हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, लघुकथा, नाटक, निबंध और व्यंग्य जैसी अलग -अलग विधाओं में अपने लेखन के जरिए साहित्यकार जन - भावनाओं को व्यक्त करते हैं ।

 छत्तीसगढ़ पहले  एक भौगोलिक इलाका माना जाता था । यहाँ के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित लोकगीतों, लोकनृत्यों, लोक नाटकों, ग्रामीण त्योहारों, साहित्यिक रचनाओं और अनेक ऐतिहासिक तथ्यों  से यह प्रमाणित हुआ कि देश के अन्य प्रदेशों की तरह छत्तीसगढ़ भी इस विशाल भारत -भूमि की एक सांस्कृतिक इकाई है और  अलग राज्य के रूप में  इसके उभरने की तमाम संभावनाएँ मौज़ूद हैं  ।

    छत्तीसगढ़ को  राज्य का दर्जा दिलाने का सपना सबका था। यह सपना आम जनता के साथ -साथ यहाँ के साहित्यकार भी बहुत समय से देखते आ रहे थे।  आंचलिक कवियों के गीतों में भी यह जन -भावना ख़ूब झलकती थी । यह कहना गलत नहीं होगा कि विभिन्न विधाओं में साहित्य -सृजन के जरिए साहित्यकारों ने भी सकारात्मक जनमत बनाकर अपने और आम जनता के इस सपने को साकार किया है। भले ही उनमें से कई साहित्यकारों की रचनाओं में छत्तीसगढ़ राज्य की मांग अलग से प्रतिध्वनित नहीं हुई, लेकिन उनके साहित्य में इस अंचल की आम जनता के सुख -दुःख को अभिव्यक्ति मिली । 

  अंचल के लोकगीतों पर, यहाँ की लोक संस्कृति और  यहाँ के रीति -रिवाजों पर,यहाँ की सामाजिक -आर्थिक समस्याओं पर और यहाँ के दर्शनीय स्थलों पर भी साहित्यकारों ने ख़ूब लिखा । उनके लेखन से देश और दुनिया में छत्तीसगढ़ को एक विशेष पहचान मिली और यहाँ का मूल्यवान साहित्य भंडार और भी अधिक समृद्ध हुआ ।साहित्यकारों का सृजन रंग लाया और एक नये राज्य के रूप में सबका सपना साकार हुआ । अनेक साहित्यकार अपने  इस सपने के साकार होने के पहले ही इस भौतिक संसार से चले गए, लेकिन उनकी साहित्य -साधना व्यर्थ नहीं गई ।  छत्तीसगढ़ का रंग- बिरंगा साहित्यिक कैनवास बहुत दूर तक फैला हुआ है । इसमें हिन्दी, छत्तीसगढ़ी और आंचलिक बोलियों की रचनाओं के कई रंग खिलते नज़र आते हैं  । 

  'छत्तीसगढ़ -मित्र' का आगमन

   प्रदेश के साहित्यिक संसार में 'छत्तीसगढ़ -मित्र ' के आगमन से एक नया वातावरण बना, जब 125 साल पहले  पहले वर्ष 1900 के जनवरी महीने में  साहित्यकार पंडित माधव राव सप्रे ने अपने साथी रामराव चिंचोलकर के साथ मिलकर पेंड्रा से इस मासिक पत्रिका का सम्पादन  शुरु किया  । इस अंचल में समाचारों और विचारों के प्रकाशन के लिए यह उस दौर की पहली पत्रिका थी ।  इसके माध्यम से छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की बुनियाद रखी गई । इसे हम साहित्यिक -पत्रकारिता भी कह सकते हैं, क्योंकि इसमें  मुख्य रूप से साहित्यिक चिंतन पर आधारित रचनाएँ प्रकाशित की जाती थीं ।स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और सहकारिता आंदोलन के प्रमुख नेता वामन राव लाखे इसके प्रकाशक थे । इस पत्रिका का मुद्रण रायपुर के एक प्रिंटिंग प्रेस में होता था ।

बंद होने के 110 साल बाद फिर 

 शुरु हुआ 'छत्तीसगढ़ मित्र

आर्थिक समस्याओं के कारण 'छत्तीसगढ़ मित्र 'का प्रकाशन तीन साल बाद दिसम्बर 1902 में बंद करना पड़ा, लेकिन छत्तीसगढ़ में साहित्य और पत्रकारिता के विकास की राह पर उनका यह ऐतिहासिक प्रयास मील का पत्थर साबित हुआ । लगभग 110  साल बाद नये सिरे से इसका प्रकाशन रायपुर से सितम्बर 2012 में शुरु हुआ  ।  वर्तमान में इसके सम्पादक डॉ. सुशील त्रिवेदी और प्रबंध सम्पादक डॉ. सुधीर शर्मा हैं ।

अलग राज्य की परिकल्पना आधुनिक युग में विगत एक शताब्दी से कुछ पहले भी 

छत्तीसगढ़ की परिकल्पना एक राज्य के रूप में एक शताब्दी से कुछ पहले भी की जाने लगी थी।उन दिनों अपनी पत्रिका 'छत्तीसगढ़ मित्र' की नियमावली में माधव राव सप्रे जी ने इस विशाल अंचल का उल्लेख  'छत्तीसगढ़ विभाग ' के नाम से किया था। यानी सौ साल से अधिक पहले सप्रेजी जैसे विद्वान लेखक ,साहित्यकार और पत्रकार  इस इलाके की सामाजिक -सांस्कृतिक विशेषताओं को देखते हुए इसे  भारत  के एक अलग भौगोलिक विभाग (शायद राज्य )के रूप में देखने लगे थे।उनकी पत्रिका  के तो शीर्षक में ही 'छत्तीसगढ़ 'नाम  जुड़ा हुआ था । इससे भी यह संकेत मिलता है कि सप्रे जी और 'छत्तीसगढ़ मित्र' के  उनके साथियों के मन में भी कहीं  कहीं छत्तीसगढ़ राज्य की परिकल्पना उमड़ -घुमड़ रही होगी 

सप्रे जी की  मर्मस्पर्शी  कहानी 'एक टोकरी भर मिट्टी ' उनकी इस पत्रिका में वर्ष 1901में प्रकाशित हुई थी, जिसे उन दिनों भारत के हिन्दी जगत में काफी प्रशंसा  मिली  । 

वर्ष 1906 के खंड-काव्य 'दानलीला' में 

           भी छत्तीसगढ़ प्रान्त

ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि अंग्रेजी हुकूमत  के दौरान जब यह इलाका सी.पी .एंड बरार (मध्य प्रान्त एवं बरार ) प्रशासन के अधीन था ,उस समय वर्ष 1906 में राजिम क्षेत्र के ग्राम चमसूर निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ,सामाजिक कार्यकर्ता ,कवि और लेखक स्वर्गीय पंडित सुंदरलाल शर्मा ने अपने खंड  काव्य  'दानलीला' में  प्रकाशन स्थल ' सी.पी.एंड बरार प्रान्त  के बदले ' छत्तीसगढ़ प्रान्त ' अंकित करवाया था । इस प्रकार उन्होंने भी छत्तीसगढ़ की परिकल्पना एक अलग प्रान्त (राज्य )के रूप में की थी ।  ललित मिश्रा द्वारा सम्पादित और वर्ष 2007 में  'युग प्रवर्तक : पंडित सुन्दर लाल शर्मा 'शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक में भी इसका उल्लेख है । पंडित सुन्दरलाल शर्मा ने अछूतोद्धार के लिए  जन जागरण में भी ऐतिहासिक भूमिका निभाई । उनका जन्म ग्राम चमसूर में 21दिसम्बर 1881 को हुआ था । निधन 28 दिसम्बर 1940 को हुआ ।

पहला छत्तीसगढ़ी व्याकरण छपा 140 साल पहले 

 छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला व्याकरण 140 साल पहले छप चुका था  । यह वर्ष 1885 में प्रदेश के धमतरी नगर में लिखा गया था । इसके रचनाकार थे व्याकरणाचार्य हीरालाल काव्योपाध्याय । अपने महाग्रंथ 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' में स्वर्गीय हरि ठाकुर ने प्रदेश की 51 महान विभूतियों के साथ हीरालालजी का भी परिचय दिया है। उन्होंने लिखा है कि छत्तीसगढ़ी व्याकरण की रचना में 'कृष्णायन'  महाकाव्य के रचयिता बिसाहूराम ने भी हीरालालजी को  सहयोग दिया था।  

        लगभग 88 साल पहले आया 

           हल्बी का पहला व्याकरण

   यह भी उल्लेखनीय है कि 'छत्तीसगढ़ी व्याकरण 'के प्रकाशन के  52 साल बाद यानी आज से 88 साल पहले वर्ष 1937 में राज्य के बस्तर अंचल की प्रमुख सम्पर्क भाषा 'हल्बी'का व्याकरण भी सामने आया, जब  'हल्बी भाषा बोध'शीर्षक से इसका प्रकाशन हुआ। जगदलपुर के ठाकुर पूरन सिंह  हल्बी व्याकरण की इस प्रथम पुस्तक के लेखक थे । लगभग आठ दशक बाद वर्ष 2016 में उनके पौत्र और जगदलपुर के वरिष्ठ साहित्यकार विजय सिंह के प्रयासों से इस महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पुस्तक का दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ । 

 पहला छत्तीसगढ़ी नाटक 

 छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष रह चुके, बिलासपुर के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विनय कुमार पाठक के अनुसार पहला छत्तीसगढ़ी नाटक आज से 120 साल पहले छपा था । उन्होंने अपनी पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार 'में लिखा है कि   पंडित लोचन प्रसाद पांडेय के वर्ष 1905 के नाटक 'कलिकाल' को छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला नाटक माना जा सकता है ,जिसकी भाषा में  लरिया बोली की छाप मिलती हैउल्लेखनीय है कि लरिया बोली छत्तीसगढ़ के ओड़िशा से लगे रायगढ़ जिले के कई गाँवों में प्रचलित है ।पंडित लोचनप्रसाद पांडेय रायगढ़ के पास ग्राम बालपुर के निवासी थे ,लेकिन रायगढ़ उनका कर्मक्षेत्र रहा।

छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला उपन्यास

  रायगढ़ के पास महानदी के किनारे ग्राम बालपुर  के  पाण्डेय बंशीधर शर्मा छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रथम उपन्यासकार माने जाते हैं । उन्होंने ' हीरू के कहिनी ' शीर्षक छत्तीसगढ़ी उपन्यास लिखा था, जो आज से लगभग सौ साल पहले वर्ष 1926 में पहली बार प्रकाशित हुआ था ।   उनके इस छत्तीसगढ़ी उपन्यास का  दूसरा संस्करण इसके लगभग 74 साल बाद, वर्ष 2000 में राज्य बनने के सिर्फ़ डेढ़ महीने पहले डॉ. राजू पाण्डेय के सौजन्य से नये स्वरूप में प्रकाशित हुआ। द्वितीय संस्करण का सम्पादन रायगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार ईश्वर शरण पाण्डेय ने किया  । इस छत्तीसगढ़ी उपन्यास में ब्रिटिश युग के गुलाम भारत के छत्तीसगढ़ के गाँवों, किसानों और मज़दूरों की  दुर्दशा का मार्मिक चित्रण है।  छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रथम उपन्यासकार पाण्डेय बंशीधर शर्मा का जन्म वर्ष 1892 में और निधन 1971 में हुआ। उनका पुश्तैनी गाँव बालपुर वर्तमान में जांजगीर -चाम्पा जिले में है।

अमर शहीद वीर नारायण सिंह पर पहला उपन्यास

  वर्ष 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ़ संघर्ष में छत्तीसगढ़ की सोनाखान जमींदारी के वीर नारायण सिंह ने भी अपने प्राणों की आहुति दी थी. उनके वीरता पूर्ण संघर्ष और बलिदान पर पहला उपन्यास '1857 सोनाखान ' शीर्षक से वर्ष 2022 में प्रकाशित हुआ । यह उपन्यास रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार आशीष सिंह ने लिखा था । विगत 7सितम्बर 2025 को रायपुर स्थित जवाहर लाल नेहरू स्मृति मेडिकल कॉलेज अस्पताल (मेकाहारा )में उनका निधन हो गया । उन्होंने कई महत्वपूर्ण पुस्तकों का लेखन और सम्पादन किया था । उनका लेखन मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ की उन महान विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित रहा है ,जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपना भरपूर योगदान दिया था।  आशीष छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय हरि ठाकुर के सुपुत्र थे । 

  पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म 

 नाटकों की तरह आधुनिक युग में कथा साहित्य पर आधारित फिल्मों को भी दृश्य -काव्य माना जाता है । इस अंचल में दृश्य -काव्य के रूप में पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म 'कहि देबे सन्देस' वर्ष 1965 में प्रदर्शित हुई। लेखक और निर्माता -निर्देशक मनु नायक की यह फिल्म छुआछूत के खिलाफ़ जन -जागरण के साथ -साथ सहकारिता के महत्व को रेखांकित करती है ।

प्रदेश का पहला हिन्दी व्यंग्य उपन्यास

       रायपुर जिले के ग्राम सकलोर में जन्मे विश्वेन्द्र ठाकुर का व्यंग्य उपन्यास'किस्सा बहराम चोट्टे का ' भी छह दशक पहले ख़ूब चर्चित और प्रशंसित हुआ था । छत्तीसगढ़  में छपा पहला हिन्दी व्यंग्य उपन्यास था ।वर्ष 1962 में प्रकाशित इस  उपन्यास को कुछ विद्वानों ने  स्वतंत्र भारत में हिन्दी का पहला व्यंग्य उपन्यास माना  है । उपन्यास का दूसरा संस्करण तिरेसठ साल बाद इस वर्ष 2025 में प्रकाशित हुआ है, जिसका विमोचन स्वर्गीय विश्वेन्द्र जी के जन्म दिन पर 25 अक्टूबर को रायपुर में किया गया। 

पहले भी ख़ूब हुआ साहित्य सृजन

 छत्तीसगढ़ में साहित्य सृजन राज्य बनने के पहले भी ख़ूब होता था ,आज भी हो रहा है और आगे भी होता रहेगा।  साहित्यकारों के बिना साहित्यिक वातावरण भला कैसे बन सकता है ? जिस लेखन में समाज और संसार की बेहतरी की सोच हो , वही सच्चा साहित्य है। ऐसा साहित्य ही जनमत का निर्माण करता है, जिसके सार्थक नतीजे मिलते हैं । 

साहित्यिक जनमत के उत्साहजनक नतीजे

  साहित्य सृजन से निर्मित सकारात्मक जनमत के तीन प्रमुख उत्साहजनक नतीजे विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं ।नये राज्य की सरकारों ने भी यहाँ के साहित्यिक -जनमत का सदैव हार्दिक स्वागत किया है । राज्य गठन के सिर्फ़ सात वर्ष बाद विधानसभा में सर्व सम्मति से विधेयक पारित हुआ और प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2007 में छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिया गया । वर्ष 2008 में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का गठन हुआ ।छत्तीसगढ़ सरकार ने वर्ष 2019 में सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय डॉ. नरेंद्र देव वर्मा के लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी गीत 'अरपा पैरी के धार -महानदी हे अपार* को राज्य -गीत का दर्जा दिया  ।डॉ. वर्मा द्वारा वर्ष 1973 में रचित इस गीत में 'छत्तीसगढ़ -महतारी'  की वंदना है । 

राज्य निर्माण आंदोलन में 

साहित्यकारों की भागीदारी

 इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस राज्य के गठन में  राजनीतिक आंदोलनों का अपना ऐतिहासिक महत्व रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के लिए जन आंदोलनों में यहाँ के अनेक साहित्यकारों की सक्रिय भागीदारी थी ।रायपुर के वरिष्ठ साहित्यकार हरि ठाकुर छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के लिए गठित सर्वदलीय मंच के संयोजक बनाए गए थे । राजिम के संत कवि पवन दीवान भी अपनी कविताओं के माध्यम से लगातार जन -जागरण करते रहे । एक बड़ी संख्या उन साहित्यकारों की भी है , जिन्होंने पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के लिए किसी आंदोलन में  प्रत्यक्ष रूप से तो हिस्सा नहीं लिया, लेकिन वे अपनी रचनाओं के माध्यम से, परोक्ष रूप से   भी लगातार जन - जागरण में लगे रहे । इन रचनाकारों ने छत्तीसगढ़ की जन - भावनाओं को, यहाँ के आर्थिक पिछड़ेपन को और संभावित राज्य की  साहित्यिक-सांस्कृतिक पहचान को अपनी लेखनी से लगातार  रेखांकित किया । उन्होंने अपनी कविताओं ,कहानियों ,उपन्यासों  नाटकों और अन्य रचनाओं में अंचल की सामाजिक -सांस्कृतिक विशेषताओं को, जनता की आशाओं और आकांक्षाओं  को उजागर किया। परिणामस्वरूप देश के कर्णधारों को भी यह मानना पड़ा कि आंचलिक अस्मिता के साथ छत्तीसगढ़ में भौगोलिक और प्रशासनिक दृष्टि से भी एक अलग राज्य बनने की  तमाम विशेषताएँ मौज़ूद हैं । 

छत्तीसगढ़ जागरण गीत 

 कविताओं  के माध्यम से   छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन को  दिशा देने का एक महत्वपूर्ण प्रयास वर्ष 1977 में हुआ ,जब वरिष्ठ साहित्यकार, भिलाई नगर निवासी स्वर्गीय विमल कुमार पाठक के सम्पादन में आंचलिक कवियों का सहयोगी संकलन 'छत्तीसगढ़ जागरण गीत ' के नाम से सामने आया।  प्रयास प्रकाशन, बिलासपुर द्वारा प्रकाशित इस गीत - संग्रह की रचनाओं से जन - जागरण का शंखनाद  हुआ। 

सीमावर्ती राज्यों का सांस्कृतिक प्रभाव 

  देश के जिन राज्यों ( मध्यप्रदेश , उत्तरप्रदेश , झारखण्ड ,महाराष्ट्र  ओड़िशा ,आंध्रप्रदेश और तेलंगाना )की सीमाएं छत्तीसगढ़ से लगी हुई हैं ,वहाँ की भाषा ,बोली और संस्कृति का प्रभाव यहाँ के जन -जीवन और लोक साहित्य पर भी स्वाभाविक रूप से देखा जा सकता है। इन लोक भाषाओं और बोलियों में लिखने -रचने वाले साहित्यकार भी बहुत हैं, जिनमें से अधिकांश की अभिव्यक्ति अपने अंचल विशेष में ही सीमित रह जाती है। हालांकि अब रेडियो और टेलीविजन के साथ -साथ इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया के आधुनिक मंचों से उनके लिए अभिव्यक्ति के नये अवसर  उपलब्ध हुए हैं ।हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं के साथ सम्बलपुरी ओड़िया (कोसली),  हल्बी ,भतरी , गोंडी ,कुड़ुख , सादरी (सरगुजिहा)जैसी रंग -बिरंगी बोलियों के सम्मोहक संसार को अपने में समाए छत्तीसगढ़ प्रदेश का साहित्य भी विविधताओं से भरपूर है। लेकिन तमाम विविधताओं के बावज़ूद भारतीय संस्कृति की तरह उसकी आत्मा भी एक है।

वर्ष 1956 में युवा कवियों की एक नई शुरुआत

  पिछले कुछ दशकों के यहाँ के साहित्यिक परिदृश्य पर अगर निगाह डालें तो हम देख सकते हैं कि छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों ने व्यावसायिकता के मायाजाल से ऊपर उठकर रचनाएँ लिखीं हैं और स्थानीय स्तर के छोटे -छोटे सामूहिक प्रयासों के जरिए किताबें छपवायी हैं। लेखकों का सहकारी संघ बनाकर रायपुर के कुछ युवा कवियों ने वर्ष 1956 में एक नयी शुरुआत की ,जब उन्होंने 'नये स्वर ' शीर्षक से एक संयुक्त काव्य संग्रह निकाला। इसमें अंचल के छह रचनाकारों -- हरि ठाकुर , गुरुदेव काश्यप चौबे , सतीश चंद्र चौबे ,नारायणलाल परमार ,ललित मोहन श्रीवास्तव और देवीप्रसाद वर्मा 'बच्चू जांजगीरी ' की कविताएँ शामिल हैं।इसके बाद इन्हीं रचनाकारों के संगठन लेखक सहयोगी प्रकाशन  द्वारा  नये स्वर -2 और नये स्वर -3 का भी प्रकाशन किया गया । वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विनय कुमार पाठक के अनुसार 'नये स्वर ' को छत्तीसगढ़ का 'तार सप्तक' भी कहा जा सकता है ।स्वर्गीय हरि ठाकुर ने ' नये स्वर ' के प्रथम प्रकाशन की अपनी भूमिका में लिखा है -- " हिन्दी साहित्य के इतिहास निर्माण में छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों का गौरवपूर्ण स्थान रहा है । द्विवेदी युग में छत्तीसगढ़ ने भी हिन्दी साहित्य और भाषा को अपनी लेखनी से पुष्ट किया ।उस युग के कुछ साहित्यिकों और कवियों ने पर्याप्त ख्याति प्राप्त की थी।      नये स्वर (प्रथम ) की भूमिका में स्वर्गीय जगन्नाथ प्रसाद भानु , पंडित लोचन प्रसाद पांडेय , मुकुटधर पांडेय , पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी , माधवराव सप्रे , मेदिनी प्रसाद पांडेय , मावली प्रसाद श्रीवास्तव , बलदेव प्रसाद मिश्र ,सुंदरलाल शर्मा ,सैयद मीर अली मीर  आदि अनेक  कवियों और लेखकों की साहित्य साधना का उल्लेख किया गया गया है।  हरि ठाकुर के अनुसार --" स्वर्गीय पंडित सुंदरलाल शर्मा ने हिन्दी और छत्तीसगढ़ी दोनों में अनेक  काव्य ग्रंथ  लिखे।छायावादी युग में भी छत्तीसगढ़ पीछे नहीं रहा ।स्वर्गीय कुंजबिहारी चौबे के काव्य ने छत्तीसगढ़ के मस्तक को बहुत ऊँचा  उठा दिया। स्वर्गीय चौबे का स्वर प्रखरता और विद्रोह से भरा हुआ था ।उनका मूल स्वर प्रगतिवादी था ।स्वर्गीय महादेव प्रसाद 'अतीत' छत्तीसगढ़ के ' निराला ' थे। प्रकाशन के अभाव ने उनकी रचनाओं को निगल लिया ।"  

छत्तीसगढ़ी साहित्य का क्रमबद्ध इतिहास

  वरिष्ठ साहित्यकार ,  भाषा विज्ञानी और छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय कुमार पाठक ने अपनी पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार ' में छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास को क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक छत्तीसगढ़ी भाषा में है।बिलासपुर के प्रयास प्रकाशन द्वारा इसका पहला संस्करण वर्ष 1971में, दूसरा संस्करण वर्ष 1975 में और तीसरा संस्करण वर्ष 1977में प्रकाशित किया गया था ।लेखक डॉ. पाठक ने इसके गद्य साहित्य खंड में लिखा है कि आरंग मे प्राप्त सन 1724 के शिलालेख को छत्तीसगढ़ी गद्य लेखन का पहला उदाहरण माना  जा सकता है ।यह कलचुरि राजा अमरसिंह का शिलालेख है ।डॉ . पाठक ने अपने इस लघु शोध ग्रंथ  में छत्तीसगढ़ी गद्य साहित्य की विकास यात्रा को कहानी ,उपन्यास , नाटक और एकांकी ,निबंध और समीक्षा,  अनुवाद और छत्तीसगढ़ी कविता  के क्षेत्र में हुए कार्यों को रेखांकित किया है।    छत्तीसगढ़ी भाषा में रचित  डॉ. विनय कुमार पाठक की लगभग 106 पन्नों की यह छोटी -सी पुस्तक एक महत्वपूर्ण संदर्भ -ग्रंथ है।इसमें उन्होंने छत्तीसगढ़ी साहित्य की विकास यात्रा को क्रमशः मौखिक परम्परा(प्राचीन साहित्य ), आदिकाल मध्यकाल ,चारण काल और वीरगाथा काल से लेकर लिखित परम्परा यानी वर्ष 1900 से अब तक के अलग -अलग काल खंडों में प्रस्तुत किया है।

साहित्यकार डॉ. खूबचन्द बघेल की ऐतिहासिक भूमिका*

  स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और साहित्यकार  स्वर्गीय डॉ. खूबचन्द बघेल  ने  गांधीवादी सत्याग्रह के साथ  अपने  साहित्यिक लेखन के जरिए भी आज़ादी के आंदोलन में ऐतिहासिक योगदान दिया। इसके साथ ही साथ उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के लिए भी जन जागरण के उद्देश्य से  ऐतिहासिक भूमिका निभाई ।उन्हें नये राज्य के स्वप्न-दृष्टा के रूप में सम्मान के साथ याद किया जाता है ।उन्होंने देश की आज़ादी के बाद राज्य निर्माण के लिए संघर्ष को गति देने वर्ष 1956 में राजनांदगांव में 'छत्तीसगढ़ी महासभा 'और वर्ष 1967 में रायपुर में 'छत्तीसगढ़ भातृ संघ ' का गठन किया।वह हिन्दी और छत्तीसगढ़ी ,दोनों ही भाषाओं के विद्वान थे। उन्होंने 'ऊंच -नीच ' , 'करम छड़हा' 'जरनैल सिंह ' और 'लेड़गा सुजान के गोठ ' जैसे लोकप्रिय नाटकों की रचना की।  डॉ. बघेल  साहित्यकार होने के अलावा राजनीतिज्ञ भी थे।  देश की आज़ादी के बाद वर्ष 1947 में बनी प्रांतीय सरकार में उन्हें संसदीय सचिव बनाया गया था ,लेकिन कुछ ही समय बाद  वह इस्तीफ़ा देकर छत्तीसगढ़ की जनता के बीच आ गए ।  वह वर्ष 1951 से 1962 तक विधायक और वर्ष 1967 से  1969 तक  राज्यसभा सांसद भी रहे।  रायपुर जिले के ग्राम पथरी में 19 जुलाई 1900 को जन्मे डॉ. बघेल का निधन 22 फरवरी 1969 को हुआ। 

महाग्रंथ 'गांधी मीमांसा 'के रचयिता पंडित  रामदयाल तिवारी

 रायपुर के साहित्यकार स्वर्गीय पंडित रामदयाल तिवारी ऐसे तपस्वी साहित्यकार थे ,जिन्होंने आज़ादी के आंदोलन के दिनों में वर्ष 1935 में  महात्मा गांधी  के विचारों की समालोचना पर आधारित 36 अध्यायों में लगभग 850 पृष्ठों  के विशाल ग्रंथ ' गांधी  मीमांसा ' की रचना की थी और  पूरे देश का ध्यान छत्तीसगढ़ की ओर आकर्षित किया था। इस ग्रंथ में महात्मा गांधी के विचारों की रचनात्मक समालोचना है।   तिवारीजी का जन्म 23 जुलाई 1892 को रायपुर में हुआ था। वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे ।  अपने जन्म स्थान और गृहनगर (रायपुर)  में ही 21 अगस्त 1942 को दाऊ कल्याण सिंह अस्पताल में मात्र 50 वर्ष की आयु में तिवारी जी का निधन हो गया। इतनी अल्पायु में ही वह  हिन्दी संसार को अपनी प्रकाशित ,अप्रकाशित रचनाओं का अनमोल खज़ाना सौंप गए। 

  अविस्मरणीय योगदान

छत्तीसगढ़ की आम जनता के सुख -दुःख को और यहाँ के विभिन्न अंचलों की सामाजिक -सांस्कृतिक विशेषताओं को कविता, कहानी, निबंध, व्यंग्य आदि अलग -अलग विधाओं की अपनी  हिन्दी और छत्तीसगढ़ी रचनाओं के माध्यम से सशक्त अभिव्यक्ति देने और राज्य के रूप में इस अंचल की पहचान बनाने में अनेक  साहित्यकारों का अविस्मरणीय योगदान रहा है ।उन सबकी साहित्यिक भूमिका को इतिहास में रेखांकित किया जाएगा । साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए रायगढ़ के पंडित मुकुटधर पाण्डेय, बिलासपुर के पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी और दुर्ग के डॉ. सुरेन्द्र दुबे  को भारत सरकार द्वारा पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया जा चुका है । दुर्भाग्य से ये तीनों साहित्यिक दिग्गज अब इस दुनिया में नहीं हैं ।

   रायगढ़ के पंडित लोचन प्रसाद पांडेय, बंशीधर पांडेय , बन्दे अली फ़ातमी , आनंदी सहाय शुक्ल , मुस्तफ़ा हुसैन मुश्फिक , गुरुदेव कश्यप, डॉ. राजू पाण्डेय, चिरंजीव दास,डॉ. बलदेव साव और तिलक पटेल , बिलासपुर के हृदय सिंह चौहान,डॉ .पालेश्वर शर्मा ,पण्डित द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्र', कपिलनाथ कश्यप और श्रीकांत वर्मा  ',  बस्तर (जगदलपुर )  के  लाला जगदलपुरी ,सोनसिंह पुजारी, रघुनाथ महापात्र ,गुलशेर खाँ  शानी, और ग़नी आमीपुरी, धमतरी के  नारायणलाल परमार ,  इंदिरा परमार, भगवतीलाल सेन ,मुकीम भारती, त्रिभुवन पांडेय और सुरजीत नवदीप,अम्बिकापुर के अनिरुद्ध नीरव और डॉ. कुंतल गोयल और दुर्ग के कोदूराम दलित , डॉ. हनुमंत नायडू 'राजदीप ', विमल कुमार पाठक ,रघुवीर अग्रवाल 'पथिक'  , मुकुंद कौशल और दानेश्वर शर्मा का साहित्य -सृजन भी बहुत लोकप्रिय रहा है । बागबाहरा के  प्रभंजन शास्त्री,गजेन्द्र तिवारी , हरिकृष्ण श्रीवास्तव और मेहतर राम साहू ,महासमुंद के चेतन आर्य और लतीफ़ घोंघी ,राजिम  के पवन दीवान ,कृष्णा रंजन, पुरुषोत्तम अनासक्त और लक्ष्मण मस्तुरिया  ,रायपुर के  केयूर भूषण ,हरि ठाकुर ,डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा ,आशीष सिंह, बद्रीविशाल परमानंद ,हेमनाथ यदु ,डॉ. मन्नूलाल यदु ,विनोदशंकर शुक्ल , स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी , रूप नारायण वर्मा 'वेणु ', मधुकर खेर , रमेश नैयर,प्रभाकर चौबे ,विभु कुमार ,मायाराम सुरजन,ललित सुरजन ,  देवीसिंह चौहान ,डॉ. राजेन्द्र सोनी और   सुशील यदु भी अपनी हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं की रचनाओं के लिए याद किए जाते हैं ।

 बालोद के सलीम अहमद ' जख़्मी बालोदवी, 'कोंडागांव के हरिहर वैष्णव तथा  पिथौरा के अनिरुद्ध भोई और  मधु धांधी सहित विभिन्न क्षेत्रों के  कई  बेहतरीन रचनाकार हुए, जिनकी रचनाओं की अपनी ही रंगत है ।

 राजनांदगांव जिला  साहित्य के तीन महारथियों की कर्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध है । डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी , डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र और गजानन माधव मुक्तिबोध ने इस कस्बाई शहर में रहकर अपनी सुदीर्घ साहित्य साधना से राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ का नाम रौशन किया। धमतरी जिले के मगरलोड निवासी वरिष्ठ कवि (स्वर्गीय )डॉ. दशरथ लाल निषाद 'विद्रोही' ने आंचलिक खान -पान , रीति -रिवाज और जीवन शैली सहित छत्तीसगढ़ की सामाजिक -सांस्कृतिक विशेषताओं पर  कई पुस्तकों की रचना की है। 

        वर्तमान दौर के साहित्यकार

छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में साहित्य की विभिन्न विधाओं में सृजनशील रचनाकारों की एक लम्बी सूची बन सकती है । इनमें उपन्यास, कहानी, कविता,निबंध, नाटक, लघुकथा और व्यंग्य  आदि सभी विधाओं के साहित्यकार शामिल किए जा सकते हैं ।  वर्तमान दौर के प्रमुख और सक्रिय साहित्यकारों में भिलाई नगर के डॉ. परदेशी राम वर्मा, रवि श्रीवास्तव, कनक तिवारी,विनोद साव, शरद कोकास,ललित कुमार वर्मा, लोक बाबू, नासिर अहमद सिकंदर विनोद मिश्र और मुमताज़, दुर्ग के  अरुण कुमार निगम ,संजीव तिवारी,कमलेश चंद्राकर, दीनदयाल साहू, विजय वर्तमान ,बलदाऊ राम साहू , ठाकुरदास ' सिद्ध ', दीक्षा चौबे,और संजय दानी भी हैं । रा

रायपुर के विनोद कुमार शुक्ल, डॉ. चित्तरंजन कर , संजीव बख्शी, रामेश्वर वैष्णव ,गिरीश पंकज ,डॉ. सुशील त्रिवेदी, डॉ. सुधीर शर्मा,  परमानंद वर्मा ,डॉ. संकेत ठाकुर, शीलकांत पाठक, जीवेश प्रभाकर, अनिल कुमार शुक्ला, जयप्रकाश मानस ,रमेश अनुपम, चेतन भारती,  जागेश्वर प्रसाद ,भगतसिंह सोनी,  राजेन्द्र ओझा, मीर अली 'मीर', रामेश्वर शर्मा , सुशील भोले, अनिल भतपहरी, शकुंतला तरार,अनामिका शर्मा, मृणालिका ओझा, अखतर अली,केवल कृष्ण, आनन्द हर्षुल और डॉ. माणिक विश्वकर्मा 'नवरंग ',खैरागढ़ के डॉ.जीवन यदु 'राही' और संकल्प पहाटिया, महासमुंद के अशोक शर्मा, ईश्वर शर्मा, श्लेष चंद्राकर और बंधु राजेश्वर खरे, तुमगांव के शशि कुमार शर्मा, भाटापारा के बलदेव सिंह भारती, हथबंध (भाटापारा ) के चोवाराम वर्मा 'बादल 'और अभनपुर के ललित शर्मा (कुमार ललित ) की साहित्यिक सृजनशीलता भी प्रभावित करती है  । 

      गंडई पंडरिया के डॉ. पीसीलाल यादव,  कवर्धा के गणेश सोनी 'प्रतीक ' पांडुका के काशीपुरी कुंदन तथा नगरी (जिला -धमतरी )की डॉ. शैल चंद्रा और उसी क्षेत्र की श्रीमती अमिता दुबेराजिम के दिनेश चौहान, प्रिया देवांगन 'प्रियू ', राजिम के पास के ग्राम कोमा मांझी अनंत,  पथिक तारक,  पलारी के पोखन लाल जायसवाल और पूरन जायसवाल, बालको नगर (कोरबा )के जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया ' धमतरी के रंजीत भट्टाचार्य, निकष परमार, सरिता दोशी और डुमनलाल ध्रुव, बिलासपुर के डॉ. विनय कुमार पाठक, राघवेंद्र दुबे, डॉ. विवेक तिवारी, केशव शुक्ला और देवधर दास महंत की साहित्य साधना भी अनवरत चल रही है । 

    अम्बिकापुर के विजय गुप्त, श्याम कश्यप 'बेचैन'  श्रीश मिश्रा और उमाकांत पाण्डेय,रायगढ़ के कस्तूरी दिनेश, बसंत राघव,हरकिशोर दास, रमेश शर्मा,  सनत कुमार और प्रकाश गुप्ता 'हमसफ़र '  कोसीर (सारंगढ़)के लक्ष्मीनारायण लहरे 'साहिल ',खैरागढ़ के डॉ.जीवन यदु 'राही ', संकल्प पहटिया,  जांजगीर के सतीश कुमार सिंह और विजय राठौर ,बागबाहरा के रजत कृष्ण,  पीयूष कुमार, रूपेश तिवारी और धनराज साहू, बसना के बद्रीप्रसाद पुरोहितऔर मीनकेतन दास, पिथौरा के शिवशंकर पटनायक,स्वराज्य करुण तथा प्रवीण प्रवाह भी अपनी -अपनी विधाओं में साहित्य सृजन में लगे हुए हैं। इन रचनाकारों के अलावा भी प्रदेश के विभिन्न इलाकों के अनेक कवि और  लेखक  छत्तीसगढ़ के जन-  जीवन को, यहाँ की जनभावनाओं को और  माटी की महिमा को विभिन्न विधाओं की अपनी रचनाओं में लगातार स्वर दे रहे हैं ।मगरलोड के वरिष्ठ  साहित्यकार पुनुराम साहू 'राज ' विगत कई दशकों से छत्तीसगढ़ी साहित्य सृजन के लिए समर्पित हैं ।  मगरलोड के पास ग्राम बोड़रा निवासी वीरेन्द्र सरल व्यंग्य लेखन में सक्रिय हैं और 'कार्यालय तेरी अकथ कहानी 'जैसे अपने कई प्रकाशित व्यंग्य संग्रहों के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुए हैं ।जगदलपुर (बस्तर )के विजय सिंह, हिमांशु शेखर झा और सुभाष पाण्डेय ने हिंदी नई कविताओं के सृजन में अपनी नई पहचान बनायी है।जगदलपुर के ही जोगेन्द्र महापात्र जैसे कई वरिष्ठ रचनाकार अपनी साहित्य साधना से हल्बी और भतरी सहित वहाँ की  लोकभाषाओं को लगातार  समृद्ध बना रहे हैं  । राजिम के पास ग्राम कोमा में पले-बढ़े एकांत श्रीवास्तव ने हिन्दी नई कविताओं में राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की है  । बस्तर संभाग की लौह अयस्क नगरी  बचेली में जन्मे राजीव रंजन प्रसाद  वर्तमान में फ़रीदाबाद स्थित भारत सरकार के उपक्रम राष्ट्रीय जल विद्युत निगम (एन. एच. पी. सी.)में वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने बस्तर अंचल की पृष्ठ भूमि पर 'आमचो बस्तर'जैसे प्रसिद्ध उपन्यासों की रचना की है । 

       सपना तो साकार हुआ, लेकिन अब आगे क्या?

  छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों ने वर्षों पहले जो सपना देखा था , पच्चीस वर्ष पहले  राज्य निर्माण के साथ ही वह साकार हो गया है।लेकिन साकार हुए इस सपने को सार्थकता तभी मिलेगी ,जब हम इस प्रश्न पर विचार करेंगे कि यह सपना आख़िर किसके लिए था ?निश्चित रूप से यह उस विशाल जन समुदाय का सपना था ,जिसमें लाखों -लाख किसानों और मज़दूरों सहित जनता का हर वह मेहनतकश तबका शामिल है ,जिसे मिलाए बिना छत्तीसगढ़ प्रदेश का नक्शा बन ही नहीं सकता था। छत्तीसगढ़ महज एक राज्य नहीं , बल्कि एक बहुरंगी संस्कृति है।बस्तर से सरगुजा तक , दुर्ग से सरायपाली तक , महानदी से इन्द्रावती तक ,राजिम से रतनपुर तक ,रायपुर से रामानुजगंज तक , महासमुंद से मनेन्द्रगढ़ तक ,  और मैनपाट से बैलाडीला तक  हजारों -हजार रंगों से सुसज्जित है  इस विशाल धरती का  आंचल ।  रंग -बिरंगी बोलियाँ हैं ,इन्द्रधनुषी लोकगीत हैं ,सबका अपना -अपना लोक साहित्य है,सम्मोहक छटा बिखेरते लोकनृत्य हैं ,मेले -मड़ई हैं, तीज -त्यौहार हैं । हर गाँव के अपने ग्राम देवता और ग्राम देवियां हैं । आधुनिकता की अंधाधुंध रफ़्तार वाली हृदय विहीन पाषाण -संस्कृति के फैलते मायाजाल के बावज़ूद ,छत्तीसगढ़ की यह बहुरंगी मानवीय संस्कृति हम सबकी एक अनमोल धरोहर है ।इसे संभाल कर रखने और पहले से भी ज़्यादा सजाने और संवारने की जरूरत है ।

आलेख -स्वराज्य करुण 

Wednesday, March 5, 2025

(आलेख ) एक जैसे नामों के अनेक गाँव -शहर ; लेखक - स्वराज्य करुण

(आलेख - स्वराज्य करुण ) हमारे आस-पास एक जैसे नाम वाले कई इंसान मिल जाते हैं. ठीक उसी तरह कई गावों, कसबों, शहरों और कॉलोनियों के भी एक जैसे नाम होते हैं. बाकी दुनिया का तो मुझे नहीं मालूम ,लेकिन हमारे भारत में एक ही नाम के या उनसे मिलते -जुलते नामों के कई गाँवों और शहरों की एक लम्बी सूची बन सकती है। जैसे छत्तीसगढ़ में भिलाई ,भंडारपुरी , भंडार , बोन्दा, बोड़सरा ,बोड़ेसरा सरायपाली ,नवापारा ,नयापारा , सांकरा , देवगांव , बम्हनी ,गुढ़ियारी ,बिलासपुर ,रायपुर ,आरंग ,लक्ष्मीपुर ,रायपुर ,जगदीशपुर , पिरदा , बलौदा , सीतापुर ,कंचनपुर , पदमपुर ,भाटापारा ,  बागबाहरा ,टेमरी , हरदी , परसापाली , परसाडीह , चारभांठा ,मोंगरापाली , बिराजपाली , पिपरौद ,जगदलपुर ,सम्बलपुर , विश्रामपुर ,चरौदा आदि । हमारे देश में एक ही नाम के कई जिले भी हैं। जैसे -बिलासपुर और रायगढ़ । एक बिलासपुर जिला छत्तीसगढ़ में तो दूसरा हिमाचल प्रदेश में है । वहीं एक रायगढ़ जिला महाराष्ट्र में तो दूसरा छत्तीसगढ़ में है। ओड़िशा में रायगढ़ा जिला है। ओड़िशा में सम्बलपुर एक जिला और जिले का मुख्यालय है ,जबकि इसी नाम के एक से अधिक गाँव छत्तीसगढ़ में मिल जाएंगे । रायपुर छत्तीसगढ़ की राजधानी है ,लेकिन इसी नाम का एक गाँव पंजाब के मणासा जिले के अंतर्गत शार्दुलगढ़ तहसील में है। एक रायपुर सुदूरवर्ती बांग्लादेश के लक्ष्मीपुर जिले और चित्तागोंग संभाग में भी है। बांग्लादेश का रायपुर वहाँ का एक उप -जिला है। बरगढ़ और देवगढ़ ओड़िशा के जिला मुख्यालय हैं तो छत्तीसगढ़ में इन नामों के दो गाँव रायगढ़ जिले में है। जगदलपुर जहाँ छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले का संभागीय और जिला मुख्यालय है ,वहीं छत्तीसगढ़ के महासमुन्द जिले में बसना से होकर ओड़िशा की तरफ जाने वाले मार्ग पर जगदलपुर नामक एक गाँव है जो ओड़िशा राज्य में है।बसना से इसकी दूरी लगभग 20 किलोमीटर है। गाँवों , शहरों और जिलों के नामों की यह समानता जहाँ काफी रोचक है ,वहीं कई बार इससे कुछ परेशानियां भी पैदा होती हैं। जैसे अगर आप किसी को चिट्ठी भेज रहे हैं और उसमें गाँव के नाम के साथ उसके डाकघर , तहसील और जिले और राज्य का नाम न लिखें तो आपकी चिट्ठी दिग्भ्रमित हो जाएगी। छत्तीसगढ़ के ग्राम अथवा जिला बिलासपुर की चिट्ठी राज्य का नाम न होने पर हिमाचल के बिलासपुर जिले में पहुँच सकती है। छत्तीसगढ़ में वर्ष 2012 में गठित बलरामपुर जिले के साथ रामानुजगंज का भी नाम जोड़ा गया ,वरना बलरामपुर उत्तरप्रदेश के भी एक जिले का नाम है। एक बीजापुर छत्तीसगढ़ का जिला मुख्यालय है तो दूसरा बीजापुर महाराष्ट्र का। श्रीनगर जम्मू -कश्मीर की राजधानी है तो इसी नाम के कई गाँव और कस्बे देश के अन्य राज्यों में भी देखे जा सकते हैं। इस नाम की कॉलोनी भी मिल जाती है. पटना कहने से हमें बिहार की राजधानी का ख़्याल आता है ,जबकि इस नाम का एक बड़ा गाँव आपको छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में भी मिल जाएगा। यह गाँव ,अब तो शायद बड़ा कस्बा बन गया होगा ,जो अम्बिकापुर (सरगुजा ) से बैकुंठपुर (कोरिया ) जाने वाले मार्ग पर है। बैकुंठपुर के नाम से याद आया कि देश में इस नाम के भी कई गाँव और शहर हैं। छत्तीसगढ़ के जिला मुख्यालय रायगढ़ के एक मोहल्ले का नाम भी बैकुंठपुर है। सुन्दर नगर और कृष्णा नगर के नाम से देश के अनेक शहरों में कई कॉलोनियां भी बनी हुई हैं। लेकिन यह भी दिलचस्प है कि सरगुजा नामक जो राजस्व संभाग और जिला छत्तीसगढ़ में है ,उस नाम का कोई गाँव या शहर वहाँ नहीं है। इस संभाग और जिले का मुख्यालय अम्बिकापुर है। याद करें और खोजें तो यह सूची और भी लम्बी हो सकती है। अगर एक जैसे नामों वाले गाँवों ,शहरों और जिलों की सूची उनके नामकरण के इतिहास के साथ सुव्यवस्थित रूप से बन सके तो एक अच्छा दस्तावेज तैयार हो सकता है । - स्वराज्य करुण -

Friday, February 28, 2025

पुस्तक चर्चा ; अतीत से वर्तमान तक एक शहर की निरंतर जारी यात्रा ; रायपुर

(आलेख ; स्वराज्य करुण ) ********** दुनिया के प्रत्येक गाँव, प्रत्येक शहर, प्रत्येक राज्य और प्रत्येक देश का अपना इतिहास होता है. भारत के प्रमुख राज्य छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का भी अपना इतिहास है, जो छत्तीसगढ़ के इतिहास से अलग नहीं है. लेखक आशीष सिंह ने 'रायपुर ' शीर्षक से प्रकाशित 194 पेज की किताब में रायपुर शहर के इतिहास को अपनी धारा प्रवाह लेखन शैली में बहुत रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है. उन्होंने इस शहर के वर्ष 1867-68 के नक्शे और यहाँ के वरिष्ठ गीतकार Rameshwar Sharma की कविता 'रायपुर महिमा ' से की है. नक्शे में 158 साल पहले के रायपुर के नागरिक क्षेत्रों और सैन्य छावनी के क्षेत्र भी दर्शाए गए हैं.यह पुस्तक रायपुर के सुदूर अतीत से लेकर उसके वर्तमान स्वरूप तक की झाँकियाँ प्रदर्शित करती है. आशीष ने वर्ष 1987 में 'रायपुर नगर का इतिहास ' शीर्षक से एक लघु शोध -प्रबंध लिखा था. उन्होंने इसे पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर के M. A. (इतिहास ) के चतुर्थ प्रश्नपत्र के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया था.
अपनी नई किताब 'रायपुर ' के प्राक्कथन में आशीष सिंह ने लिखा है -- "रायपुर का अपना इतिहास रहा है. लगभग एक हजार वर्ष पूर्व का हमें विवरण ज्ञात हो सकता है. रायपुर के राजाओं की वंशावली तो ज्ञात हो जाती है, किन्तु उनके कार्यकाल की किसी विशेष घटना का विवरण नहीं मिलता.".....फिर भी लेखक ने जिस तरह गंभीरता से और मेहनत से विभिन्न ऐतिहासिक अभिलेखों को संकलित करने और उन्हें खंगालने का जो प्रयास किया है, वह निश्चित रूप से सराहनीय है. आशीष ने प्राक्कथन में आगे एक जगह लिखा है कि ' रायपुर' शुद्ध रूप से रायपुर का इतिहास है, ऐसा मैं नहीं कहता , किंतु इतिहास के बहुत करीब है, इतना कह सकता हूँ. कुल 40 अध्यायों की इस पुस्तक की भूमिका छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ इतिहासकार Ram Kumar Behar ने लिखी है. छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम कोसल और दक्षिण कोसल भी रहा है. आशीष सिंह ने पुस्तक के प्रथम अध्याय में कोसल यानी छत्तीसगढ़ का सामान्य परिचय दिया है, जिसमें यहाँ के पौराणिक इतिहास से लेकर तत्कालीन भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति का भी उल्लेख है. उन्होंने इस अध्याय में 'छत्तीसगढ़ 'के नामकरण के ऐतिहासिक घटनाक्रमों का भी विवरण दिया है. दूसरे अध्याय में रायपुर नगर की ऐतिहासिकता, तीसरे अध्याय में 'मराठाकालीन रायपुर 'और चौथे अध्याय में 'ब्रिटिश कालीन रायपुर' पर प्रकाश डाला गया है. पुस्तक के अगले अध्यायों में कई विवरण मिलते हैं. जैसे रायपुर शहर में 54 ऐतिहासिक तालाबों के विलुप्त होने की जानकारी उनकी सूची सहित दी गई है.
आशीष सिंह अंग्रेजी राज के खिलाफ़ यहाँ हुए जन विद्रोह की घटनाओं का भी उल्लेख है.जिनमें 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सोनाखान मेंlllवीर नारायण सिंह के नेतृत्व में हुए संघर्ष और उस संघर्ष के बाद 10 दिसम्बर 1857 को रायपुर में उन्हें दी गई फाँसी, फिर उनकी शहादत के बाद 18 जनवरी 1858 को रायपुर की ब्रिटिश सैन्य छावनी में सैनिक हनुमान सिंह के नेतृत्व में हुए विद्रोह, उनके द्वारj सिंडवेल की हत्या और इस घटना के बाद 22जनवरी 1858 को रायपुर में ही 17 भारतीय सिपाहियों को दी गई फाँसी की सजा का भी विवरण शामिल है.बाद के वर्षो में महात्मा गांधी, जैसे महान नेताओं के नेतृत्व में देश भर में चले अहिंसक स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों के दौरान रायपुर में हुई घटनाओं की जानकारी भी पुस्तक में दी गई है इसके अंतर्गत वर्ष 1920 के असहयोग आंदोलन, 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन, 1932 के संग्राम, वर्ष 1942 में रायपुर में सशस्त्र क्रांति के प्रयास का विवरण भी पुस्तक में समाहित है. राष्ट्रीय आंदोलनों के उस दौर में महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे दिग्गज नेताओं के रायपुर प्रवास की यादगार घटनाओं को भी इसमें दर्ज किया गया है.महान दार्शनिक और समाज सुधारक स्वामी विवेकानंद ने अपनी किशोरावस्था के कुछ वर्ष रायपुर में बिताए थे. स्वतंत्र भारत के दो बार कार्यवाहक राष्ट्रपति रहे, तथा बाद में 25 फरवरी 1968 को भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने जस्टिस एम.हिदायतुल्लाह ने वर्ष 1922 में रायपुर के शासकीय स्कूल से मेट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी. आचार्य रजनीश, जिनका मूल नाम चन्द्रमोहन जैन था, वर्ष 1957 में रायपुर के शासकीय संस्कृत महाविद्यालय में दर्शन शास्त्र के प्राध्यापक थे. महान भाषाविद हरिनाथ डे ने भी मिडिल स्कूल तक शिक्षा रायपुर में प्राप्त की थी. ऐसी अनेक महत्वपूर्ण और दिलचस्प जानकारियाँ आशीष ने अपनी पुस्तक 'raypur' में संकलित की हैं.ग्यारहवाँ अध्याय 'गोवा मुक्ति संग्राम' शीर्षक से है. इसमें गोवा को पुर्तगाल से मुक्ति दिलाने के आंदोलन में छत्तीसगढ़ से भी कई सत्याग्रही सम्मिलित हुए थे, जिनमें प्रसिद्ध साहित्यकार हरि ठाकुर के साथ रामाधार तिवारी, केयूर भूषण (बाद में दो बार रायपुर से लोकसभा सांसद निर्वाचित हुए ) और नंदकुमार पाठक भी शामिल थे. पुस्तक का बारहवाँ अध्याय छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के लिए चले लम्बे आंदोलन पर केंद्रित है.आशीष सिंह स्वतंत्रता संग्राम में शामिल रायपुर की अनेक महान विभूतियों और शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता तथा सार्वजनिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले वरिष्ठजनों का उल्लेख करना भी नहीं भूलते. पुस्तक में 'जिनसे रायपुर गौरवान्वित है ' शीर्षक बीसवें अध्याय में उन्होंने छत्तीसगढ़ के प्रथम पत्रकार पंडित माधव राव सप्रे, सहकारिता आंदोलन के प्रमुख नेता पंडित वामन राव लाखे,अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल, महान श्रमिक नेता, सहकारिता आंदोलन के अगुआ, रायपुर नगरपालिका के तीन बार निर्वाचित अध्यक्ष रहे त्याग मूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह, मौलाना रऊफ खान, संत यति यतन लाल, महंत लक्ष्मी नारायण दास, डॉ. खूबचंद बघेल, डॉ. राधाबाई, डॉ. बघेल की माता केकती बाई, डॉ.बघेल की पत्नी राजकुंवर, रोहिणी बाई, बेलाबाई और महा ग्रंथ 'गांधी मीमांसा 'के लेखक और साहित्य के समर्थ समालोचक पंडित रामदयाल तिवारी का परिचय काफी विस्तार से दिया है.देश की रक्षा के लिए सीमाओं पर शहीद हुए भारतीय सेना के अनेक वीरों में से रायपुर शहर के शहीदों का परिचय भी लेखक ने दिया है, जिनमें मेजर यशवंत गोरे,अरविन्द दीक्षित, अरुण सप्रे, राजीव पांडेय और लेफ्टिनेंट पंकज विक्रम शामिल हैं. पुस्तक के 31वें अध्याय में उन महान दानवीरों का परिचय दिया गया है, जिनकी दानशीलता से शहर में कई बड़े संस्थान और उनके भंवन तैयार हुए. इनमें दाऊ कल्याण सिंह, दाऊ कामता प्रसाद अग्रवाल, पंडित नारायण प्रसाद अवस्थी, खुदादाद डुंगाजी, रामनारायण दीक्षित, नगर माता बिन्नी बाई शामिल हैं. पुस्तक का 32वाँ अध्याय चंबल के बागियों का आत्म समर्पण करवाने में अहम भूमिका निभाने वाले छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में जन्मे स्वाधीनता सेनानी पंडित रामानन्द दुबे को समर्पित है.रायपुर शहर की ऐतिहासिक इमारतों, यहाँ के प्राचीन तालाबों आदि का ब्यौरा भी अलग -अलग अध्यायों में है. यह पुस्तक हरि ठाकुर स्मारक संस्थान के लिए मीडिया लिंक 413, सुन्दर नगर, रायपुर द्वारा स्वर्गीय श्री हरि ठाकुर के जन्म दिन 16अगस्त 2024 को प्रकाशित की गई है. हरि ठाकुर छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पत्रकार और छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन के प्रमुख नेता रहे हैं.पुस्तक 'रायपुर 'के लेखक आशीष सिंह उनके सुपुत्र हैं.

Friday, November 1, 2024

छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य ;कितना पुराना है इतिहास? आलेख --- स्वराज्य करुण

छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य ;कितना पुराना है इतिहास? *तथ्यों और तर्कों के आईने में तीन महत्वपूर्ण पुस्तकें ( आज एक नवम्बर को छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस पर विशेष .यह आलेख स्थापना दिवस के एक दिन पहले 31 अक्टूबर 2022 को दैनिक 'चैनल इंडिया 'में प्रकाशित हुआ था) भारत के प्रत्येक राज्य और वहाँ के प्रत्येक अंचल की अपनी भाषाएँ ,अपनी बोलियाँ ,अपना साहित्य ,अपना संगीत और अपनी संस्कृति होती है । ये रंग -बिरंगी विविधताएँ ही भारत की राष्ट्रीय पहचान है ,जो इस देश को एकता के मज़बूत बंधनों में बांध कर रखती है। छत्तीसगढ़ भी एक ऐसा भारतीय राज्य है , जो अपनी भाषा ,अपने साहित्य और अपनी विविधतापूर्ण लोक संस्कृति से सुसज्जित और समृद्ध है। भाषाओं और बोलियों का भी अपना एक प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास होता है। छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य का भी अपना एक समृद्ध इतिहास है ,लेकिन यह इतिहास कितना पुराना है, इसे जानने और समझने के लिए मेरे विचार से प्रदेश के तीन विद्वान लेखकों की महत्वपूर्ण पुस्तकों का अध्ययन बहुत ज़रूरी हो जाता है , जो लगभग आधी सदी पहले लिखी गयी थीं । पहली पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास' हिंदी भाषा में डॉ. नरेंद्र देव वर्मा की महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल एक मूल्यवान धरोहर है। हिंदी में दूसरी पुस्तक है श्री नंदकिशोर तिवारी द्वारा लिखी गयी 'छत्तीसगढ़ी साहित्य ,दशा और दिशा तथा तीसरी किताब है डॉ. विनय कुमार पाठक द्वारा रचित 'छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार' जो शीर्षक से ही स्पष्ट है कि सरल छत्तीसगढ़ी में लिखी गयी है। तीनों लेखकों ने अपनी इन पुस्तकों में छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के क्रमिक विकास पर गहन अध्ययन प्रस्तुत किया है। उन्होंने विषय प्रवर्तन , विश्लेषण और प्रस्तुतिकरण बहुत परिश्रम के साथ अपने -अपने तरीके से किया है। तीनों के अपने -अपने तर्क हैं और संकलित तथ्यों को देखने का अपना -अपना नज़रिया है। लेकिन यह तय है कि तीनों किताबों में प्रस्तुत तथ्यों और तर्को के आईने में छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के इतिहास को उसकी प्राचीनता के अलग -अलग रंगों के साथ बड़ी खूबसूरती से उभारा गया है। किसी भी राज्य ,देश और वहाँ के साहित्यिक -सांस्कृतिक इतिहास को लेकर विद्वानों में अलग -अलग अभिमतों का होना कोई नयी बात नहीं है। ऐसा होना बहुत स्वाभाविक है। ये मत -विभिन्नताएँ इन पुस्तकों में भी झलकती हैं। श्री तिवारी और डॉ. पाठक ने अपनी पुस्तकों में उल्लेखित कुछ तथ्यों में डॉ. नरेंद्र देव वर्मा का भी संदर्भ दिया है। लेकिन दोनों ही डॉ. वर्मा के कुछ तथ्यों से सहमत नज़र नहीं आते। डॉ. वर्मा और डॉ. पाठक अपनी पुस्तकों में छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के इतिहास को एक हज़ार साल से ज्यादा पुराना मानते हैं । उनकी यह मान्यता छत्तीसगढ़ी के मौखिक और लिखित साहित्य को लेकर है। डॉ. वर्मा और डॉ. पाठक के दृष्टिकोण से कबीरपंथ के संत धरम दास छत्तीसगढ़ी भाषा के (लिखित साहित्य) के प्रथम कवि थे जबकि श्री नंदकिशोर तिवारी ऐसा नहीं मानते। उनका कहना है कि सन 1472 में बांधो गढ़ (विंध्यप्रदेश) में जन्मे संत धरमदास छत्तीसगढ़ के कवर्धा आकर कबीरपीठ की स्थापना की थी ,लेकिन उनके पदों में बघेली और अवधी का प्रभाव है ,छत्तीसगढ़ी का नहीं। मेरे विचार से तीनों विद्वानों की राय चाहे जो भी हो ,लेकिन इसमें दो राय नहीं कि उनकी तीनों पुस्तकें छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की प्राचीनता का गंभीर और व्यापक विश्लेषण करती हैं । उनका यह विश्लेषण मुख्य रूप से मध्यवर्ती छत्तीसगढ़ में प्रचलित भाषा और उसके साहित्य पर केन्द्रित है। छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास **************** डॉ. नरेंद्र देव वर्मा हिंदी साहित्य और भाषा विज्ञान में एम.ए. होने के साथ इन विषयों में पी-एच.डी. भी थे। उनकी पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास' एक शोध -प्रबंध है। उन्होंने 1973 में पण्डित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर में पी-एच.डी. की उपाधि के लिए भाषा वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर इसे लिखा था। पुस्तक के रूप में इसे छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा वर्ष 2009 में प्रकाशित किया गया। यह पुस्तक लगभग 380 पृष्ठों की है।अपने इस शोध-प्रबंध में डॉ. वर्मा ने अनेक प्रसिद्ध भाषाविज्ञानियों को संदर्भित करते हुए पूर्वी हिंदी समूह के अंतर्गत जहाँ अवधी और बघेली के साथ छत्तीसगढ़ी की तुलना की है ,वहीं छत्तीसगढ़ी भाषा का वर्गीकरण करते हुए उन्होनें यहाँ प्रचलित आंचलिक बोलियों का भी व्याकरणिक अध्ययन प्रस्तुत किया है। पूर्वी हिंदी क्षेत्र की प्रमुख भाषा ****************** डॉ. वर्मा छत्तीसगढ़ी ,अवधी और बघेली के तुलनात्मक अध्ययन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि छत्तीसगढ़ी पूर्वी हिंदी क्षेत्र की एक प्रमुख भाषा है । उन्होंने यह शोध -प्रबंध 32 अध्यायों में लिखा है। इनमें छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि छत्तीसगढ़ी का विकास ,छत्तीसगढ़ की बोलियाँ, छत्तीसगढ़ी का शब्द -समूह ,छत्तीसगढ़ी विषयक साहित्य , छत्तीसगढ़ी के स्वर , स्वर-परिवर्तन, छत्तीसगढ़ी स्वरों की उतपत्ति ,व्यंजन -परिवर्तन, छत्तीसगढ़ी व्यंजनों की उतपत्ति ,संज्ञा की रचना ,समास ,कारक-रचना जैसे अध्याय शामिल हैं ,जो छत्तीसगढ़ी भाषा , व्याकरण और साहित्य से जुड़े तथ्यों पर क्रमबद्ध रौशनी डालते हैं। डॉ. वर्मा लिखते कि छत्तीसगढ़ी से उनका तात्पर्य रायपुर ,बिलासपुर और दुर्ग में बोली जाने वाली छत्तीसगढ़ी से है ।रायपुर और बिलासपुर की छत्तीसगढ़ी में उच्चारण एवं कतिपय शब्द-प्रयोगों का ही भेद है। उन्होंने छत्तीसगढ़ी के अलावा प्रदेश में प्रचलित खल्ताही,सरगुजिहा, लरिया,सदरी कोरवा ,बैगानी, बिंझवारी ,कलंगा ,भूलिया, बस्तरी(हल्बी) बोलियों की भी व्याकरणिक विवेचना की है। नवीं-दसवीं शताब्दी में हुआ था छत्तीसगढ़ी और अवधी का जन्म ********* अध्याय -5 में डॉ. नरेंद्र देव वर्मा लिखते हैं - छत्तीसगढ़ी और अवधी ,दोनों का जन्म अर्ध -मागधी के गर्भ से आज से लगभग 1156 वर्ष पूर्व नवीं- दसवीं शताब्दी में हुआ था।इस एक सहस्त्र वर्ष के सुदीर्घ अंतराल में छत्तीसगढ़ी और अवधी पर अन्य भाषाओं के प्रभाव भी पड़े तथा इनका स्वरूप पर्याप्त परिवर्तित हो गया। डॉ. वर्मा ने छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास को तीन चरणों में विभाजित किया है -(1) गाथा युग : 1000 से 1500 ईस्वी (2)भक्ति युग : 1500 से 1900 ईस्वी और आधुनिक युग :1900 ईस्वी से आज तक। उन्होंने भक्ति युग के प्रमुख कवियों में संत धरम दास और सतनाम पंथ के प्रवर्तक संत गुरु घासीदास जी की कुछ रचनाओं का भी उल्लेख किया है। इसी अध्याय में डॉ. वर्मा ने आधुनिक युग के अंतर्गत छत्तीसगढ़ी कविता और गद्य साहित्य के विकास की भी चर्चा की है। हीरालाल काव्योपाध्याय थे छत्तीसगढ़ी के प्रथम कथा -लेखक *********** पुस्तक के 5वें अध्याय में गद्य-खण्ड के अंतर्गत डॉ. नरेंद्र देव वर्मा ने अनेक प्रमुख साहित्यकारों की छत्तीसगढ़ी कहानियों ,उपन्यासों और नाटकों का भी उल्लेख किया है। गद्य साहित्य के अंतर्गत डॉ. वर्मा लिखते हैं -" छत्तीसगढ़ी गद्य का सक्रिय इतिहास हीरालाल काव्योपाध्याय द्वारा लिखित छत्तीसगढ़ी व्याकरण से प्रारंभ होता है,जिसे सन 1890 में जार्ज ए. ग्रियर्सन ने सम्पादित और अनूदित कर कलकत्ता के बैप्टिस्ट मिशन प्रेस से छपवाया। "डॉ. वर्मा के अनुसार -- "छत्तीसगढ़ी में हीरालाल काव्योपाध्याय ने ही सर्वप्रथम कथा -लेखन का श्रीगणेश किया था।उनके व्याकरण -ग्रंथ में 'श्रीराम की कथा ',ढोला की कहानी' और 'चंदैनी की कहानी 'निबद्ध है । काव्योपाध्याय के इस ग्रंथ ने छत्तीसगढ़ी गद्य के इतिहास का ही सूत्रपात नहीं किया, प्रत्युत छत्तीसगढ़ी कथा का भी पौरोहित्य किया ,तथा छत्तीसगढ़ी नाटक के आरंभ के सूत्र भी उक्त पुस्तक के संवादों में छिपे हुए हैं।" उपन्यासकार और कवि भी थे डॉ. नरेंद्र देव वर्मा ************** छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. नरेंद्र देव वर्मा का जन्म महाराष्ट्र के वर्धा में 4 नवम्बर 1939 को और निधन 8 सितम्बर 1979 को गृहनगर रायपुर (छत्तीसगढ़) में हुआ। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण परिवेश पर केन्द्रित उनका उपन्यास 'सुबह की तलाश ' 1970 के दशक में राष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चित रहा। उनकी लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी रचना 'अरपा पैरी के धार ..महानदी हे अपार' को छत्तीसगढ़ सरकार ने 'राज्य गीत' का दर्जा देकर सम्मानित किया है । डॉ. वर्मा छत्तीसगढ़ के साहित्यिक भण्डार को अपनी रचनाओं की अनमोल धरोहर से समृद्ध करते हुए मात्र 40 वर्ष की अल्पायु में ही इस भौतिक संसार से चले गए। छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास को हिंदी में समझने के लिए डॉ. वर्मा द्वारा लिखित 'छत्तीसगढ़ी साहित्य का उद्विकास ' एक ज्ञानवर्धक पुस्तक है। छत्तीसगढ़ी साहित्य : दशा और दिशा *********** छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के उत्थान के लिए समर्पित बिलासपुर निवासी श्री नंदकिशोर तिवारी ने भी अपनी पुस्तक में छत्तीसगढ़ी काव्य -साहित्य की विकास यात्रा को प्रथम ,द्वितीय और तृतीय उन्मेष में वर्गीकृत करते हुए अपना सारगर्भित विश्लेषण प्रस्तुत किया है। लेकिन वह डॉ. नरेंद्र देव वर्मा द्वारा छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास के काल निर्धारण से सहमत नहीं लगते। श्री तिवारी ने 215 पृष्ठों की अपनी इस पुस्तक की शुरुआत 'छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य :प्रथम उन्मेष ' शीर्षक से की है। हम इसे पुस्तक का पहला अध्याय कह सकते हैं। उन्होंने इसमें लिखा है कि छत्तीसगढ़ में देर से आयी मातृभाषा प्रेम के नवजागरण की चेतना ने कई भूलें की। उनके अनुसार पहली भूल थी - डॉ. नरेंद्र देव वर्मा ने छत्तीसगढ़ी साहित्य का हिंदी की तर्ज पर गाथा युग -विक्रम संवत 1000 से 1500,भक्ति युग विक्रम संवत 1500 से 1900 और आधुनिक युग 1900 से आज तक में विभाजित किया है।इस विभाजन काल की रचनाओं में छत्तीसगढ़ी लोक - गाथाओं को शामिल किया गया । संवत 1100 से 1500 तक छत्तीसगढ़ी में अनेक गाथाओं की रचना हुई ,जिनमें प्रेम तथा वीरता का अपूर्व विन्यास हुआ है।यद्यपि इन गाथाओं की लिपिबद्ध परम्परा नहीं रही है तथा ये पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से अभिरक्षित होती आयी हैं। श्री तिवारी लिखते हैं --तर्क किया जा सकता है कि हिंदी साहित्य के इतिहास में भी लोक -गाथाओं को शामिल किया गया है । इस तरह तर्क करने वालों को समझना चाहिए कि हिंदी 'रासो' काव्य की अपनी परम्परा थी। 'रासो' राज दरबारों से जन -दरबार में आए।इस परम्परा की सभी रचनाओं के साथ लेखक का नाम जुड़ा है। वे लोक-कंठ से निः सृत न होकर कवियों की लेखनी से निःसृत हुईं और लोक -कंठ में समा गयीं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि वाचिक परम्परा में निःसृत लोक -गाथाओं को लिखित शिष्ट साहित्य की परम्परा में कैसे परिगणित किया जा सकता है? और कंठ-दर-कंठ गूँजते व गायक की मानसिकता ,स्थान आदि के प्रभाव से नित -नित परिवर्तित होते किस रूप को हम साहित्य में मान्यता देंगे?हमें शिष्ट-साहित्य और लोक- साहित्य में उनकी मर्यादा और परम्परा को समझना होगा। छत्तीसगढ़ी कविता के विकास को श्री तिवारी ने ' छत्तीसगढ़ का काव्य साहित्य 'के अंतर्गत क्रमशः प्रथम ,द्वितीय और तृतीय उन्मेष में वर्गीकृत किया है ।अपनी इस पुस्तक में श्री तिवारी ने छत्तीसगढ़ी भाषा के उपन्यास ,कहानी और नाट्य लेखन सहित महिलाओं के लेखन और छत्तीसगढ़ी के अनुवाद साहित्य की भी चर्चा की है। श्री नंदकिशोर तिवारी का जन्म 19 जून 1941 को बिलासपुर में हुआ था। हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त श्री तिवारी सम्प्रति अपने गृहनगर बिलासपुर में विगत कई वर्षों से 'छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर'नामक त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ी साहित्य और साहित्यकारों पर केन्द्रित उनकी कई पुस्तकें छप चुकी हैं । इनमें 'छत्तीसगढ़ी साहित्य का ऐतिहासिक अध्ययन' भी शामिल है।उन्होंने पण्डित मुकुटधर पाण्डेय और हरि ठाकुर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर पुस्तकें लिखी हैं ,वहीं डॉ. नरेंद्र देव वर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित एक पुस्तक का सम्पादन भी किया है। उनके सम्पादन में पण्डित लोचन प्रसाद पाण्डेय के पुरातात्विक लेखों का एक प्रामाणिक संग्रह 'कौशल -कौमुदी ' शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है। श्री तिवारी की पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी साहित्य :दशा और दिशा' वैभव प्रकाशन रायपुर द्वारा वर्ष 2006 में प्रकाशित की गयी थी। छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार *********************** डॉ. विनय कुमार पाठक की पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार' लगभग 106 पृष्ठों की 17 सेंटीमीटर लम्बी और 11 सेंटीमीटर चौड़ी यह पुस्तक आकार में छोटी जरूर है ,लेकिन प्रकार में यह हमें आचार्य रामचंद्र शुक्ल की याद दिलाती है ,जिन्हें हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन के लिए भी याद किया जाता है। उनकी एक पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार' का पहला संस्करण वर्ष 1971 में प्रकाशित हुआ था। प्रयास प्रकाशन बिलासपुर द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के क्रमिक विकास का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है । छपते ही उन दिनों आंचलिक साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों के बीच इसकी मांग इतनी बढ़ी कि दूसरा और तीसरा संस्करण भी छपवाना पड़ा। दूसरा संस्करण 1975 में और तीसरा वर्ष 1977 में प्रकाशित हुआ था। पुस्तक का तीसरा संस्करण उन्होंने मुझे 18 अगस्त 1977 को भेंट किया था ,जब वह आरंग के शासकीय महाविद्यालय में प्राध्यापक थे।वहाँ रहते हुए उन्होंने स्थानीय कवियों की रचनाओं का एक छोटा संकलन 'आरंग के कवि ' शीर्षक से सम्पादित और प्रकाशित किया था। बिलासपुर में 11 जून 1946 को जन्मे डॉ. पाठक छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष रह चुके हैं। वह हिन्दी और भाषा-विज्ञान में पी-एच . डी. तथा ङी. लिट् की उपाधियाँ प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार हैं। इन दिनों वह अपने जन्म स्थान और गृहनगर बिलासपुर में साहित्य साधना और समाज-सेवा में लगे हुए हैं। उनके शोध -ग्रंथों में 'छत्तीसगढ़ी साहित्य का सांस्कृतिक अनुशीलन ' और छत्तीसगढ़ी में प्रयुक्त परिनिष्ठित हिंदी और इतर भाषाओं के शब्दों में अर्थ -परिवर्तन' भी उल्लेखनीय हैं। डॉ. पाठक ने अपनी पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार' में छत्तीसगढ़ी साहित्य के क्रमबद्ध विकास को अलग -अलग कालखण्डों में रेखांकित किया है। आत्माभिव्यक्ति के तहत डॉ. पाठक ने लिखा है कि इस कृति में स्पष्ट रूप से दो खण्ड हैं, जिसमें पहला खण्ड साहित्य का है और दूसरा साहित्यकारों का। वह लिखते हैं --"कई झन बिदवान मन छत्तीसगढ़ी साहित्य ल आज ले दू-तीन सौ बरिस तक मान के ओखर कीमत आंकथे। मय उन बिदवान सो पूछना चाहूं के अतेक पोठ अउ जुन्ना भाषा के साहित्य का अतेक नवा होही ? ए बात आने आए के हम ला छपे या लिखे हुए साहित्य नइ मिलै,तभो एखर लोक साहित्य ल देख के अनताज (अंदाज ) तो लगाए जा सकत हे के वो कोन जुग के लेखनी आय ! छत्तीसगढ़ी के कतकोन कवि मरगें ,मेटागें ,फेर अपन फक्कड़ अउ सिधवा सुभाव के कारन ,छपास ले दूरिया रहे के कारन रचना संग अपन नांव नइ गोबिन। उनकर कविता ,उनकर गीत आज मनखे -मनखे के मुंहूं ले सुने जा सकत हे। उनकर कविता म कतका जोम हे ,एला जनैयेच मन जानहीं।" शब्द सांख्यिकी नियम से हुआ काल निर्धारण ************** डॉ. पाठक ने लिखा है कि शब्द सांख्यिकी का नियम लगाकर ,युग के प्रभाव और उसकी प्रवृत्ति को देखकर कविता लेखन के समय का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। 'डॉ. नरेंद्र देव वर्मा' ने शब्द सांख्यिकी नियम लगा कर बताया है कि पूर्वी हिन्दी (अवधी)से छत्तीसगढ़ी 1080 साल पहले नवमी -दसवीं शताब्दी में अलग हो चुकी थी । पुस्तक में डॉ. वर्मा को संदर्भित करते हुए छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास का काल निर्धारण भी किया है,जो इस प्रकार है -- मौखिक परम्परा (प्राचीन साहित्य )--आदिकाल (1000 से 1500वि) -- चारण काल (1000 से 1200 वि)-- वीरगाथा काल (1200 से 1500 तक ),फिर मध्यकाल(1500 से 1900 वि),फिर लिखित परम्परा यानी आधुनिक साहित्य (1900 से आज तक )फिर आधुनिक काल में भी प्रथम उन्मेष (1900 से 1955 तक )और द्वितीय उन्मेष (1955 से आज तक )। आदिकाल के संदर्भ में डॉ. विनय पाठक लिखते हैं --इतिहास के पन्ना ल उल्टाये ले गम मिलथे के 10 वीं शताब्दी ले 12वीं शताब्दी तक हैहयवंशी राजा मन के कोनो किसिम के लड़ाई अउ बैर भाव नइ रिहिस।उनकर आपुस म मया भाव अउ सुमता दिखथे। ए बीच बीरगाथा के रचना होना ठीक नई जान परै।ओ बखत के राजा मन के राज म रहत कवि मन के जउन राजा के बीरता ,गुनानवाद मिलथे (भले राजा के नांव नइ मिलै)।ओ अधार ले एला चारण काल कहि सकत हन । बारहवीं शताब्दी के छेवर-छेवर मा इन मन ल कतको जुद्ध करना परिस ।ये तरह 12 वीं शताब्दी के छेवर -छेवर ले 1500 तक बीर गाथा काल मान सकत हन।ये ही बीच बीरता ,लड़ाई ,जुद्ध के बरनन होइस हे, एमा दू मत नइये। डॉ. पाठक वर्ष 1000 से 1500 तक को आदिकाल या वीरगाथा काल के रूप में स्थापित किए जाने के डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के विचार को आधा ठीक और आधा गलत मानते हैं। उन्होंने आगे लिखा है --"गाथा बिसेस के प्रवृति होय के कारण ये जुग ल गाथा युग घलो कहे जा सकत हे।एमा मिलत प्रेमोख्यान गाथा म अहिमन रानी ,केवला रानी असन अबड़ कन गाथा अउ धार्मिक गाथा म पंडवानी, फूलबासन ,असन कई एक ठो गाथा ल ए जुग के रचना कहे अउ माने जा सकत हे। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ह 1000 ले 1500 तक के जुग ल आदिकाल या बीरगाथा काल कहे हे ,जउन ह आधा ठीक अउ आधा गलत साबित होथे। " छत्तीसगढ़ी के प्रथम कवि धरम दास ************ आगे डॉ. पाठक ने छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास क्रम में मध्यकाल और आधुनिक साहित्य से जुड़े तथ्यों की चर्चा की है। उन्होंने मध्यकालीन साहित्य में भक्ति धारा के प्रवाहित होने के प्रसंग में लिखा है कि संत कबीरदास के शिष्य धरम दास को छत्तीसगढ़ी का पहला कवि माना जा सकता है। डॉ. पाठक लिखते हैं -- "राजनीति के हेरफेर अउ चढ़ाव -उतार के कारन समाज म रूढ़ि ,अंधविश्वास के नार बगरे के कारन ,मध्यकाल म लोगन के हिरदे ले भक्ति के धारा तरल रउहन बोहाये लागिस।वइसे तो इहां कतको भक्त अउ संत कवि होगे हें ,फेर उंकर परमान नइ मिल सके के कारन उनकर चरचा करना ठीक नोहय।कबीरदास के पंथ ल मनैया कवि मन के अतका परचार-परसार होय के कारन इहां कबीरपंथ के रचना अबड़ मिलथे। एही पंथ के रद्दा म रेंगइया कबीरदास के पट्ट चेला धरम दास ल छत्तीसगढ़ी के पहिली कवि माने जा सकत हे।घासीदास के पंथ के परचार के संग संग कतको रचना मिलथे ,जउन हर ये जुग के साहित्य के मण्डल ल भरथे। " छत्तीसगढ़ी में कहानी ,उपन्यास ,नाटक और एकांकी ,निबंध और समीक्षात्मक लेख भी खूब लिखे गए हैं। अनुवाद कार्य भी खूब हुआ है। पुस्तक की शुरुआत डॉ. पाठक ने 'छत्तीसगढ़ी साहित्य' के अंतर्गत गद्य साहित्य से करते हुए यहाँ के गद्य साहित्य की इन सभी विधाओं के प्रमुख लेखकों और उनकी कृतियों का उल्लेख किया है। डॉ. पाठक के अनुसार कुछ विद्वान छत्तीसगढ़ी गद्य का सबसे पहला नमूना दंतेवाड़ा के शिलालेख को बताते हैं ,जबकि यह मैथिली के रंग में रंगा हुआ है। आरंग का शिलालेख छत्तीसगढ़ी गद्य का पहला नमूना ************ अपनी इस पुस्तक में डॉ. पाठक ने लिखा है कि आरंग में मिले सन 1724 के शिलालेख को छत्तीसगढ़ी गद्य लेखन का पहला नमूना माना जा सकता है।इसका ठोस कारण ये है कि यह (आरंग)निमगा (शुद्ध )छत्तीसगढ़ी की जगह है और यह कलचुरि राजा अमर सिंह का शिलालेख है। सन 1890 में हीरालाल काव्योपाध्याय का 'छत्तीसगढ़ी व्याकरण ' छपकर आया ,जिसमें ढोला की कहानी और रामायण की कथा भी छपी है ,जिनकी भाषा मुहावरेदार और काव्यात्मक है।अनुवादों के प्रसंग में डॉ. पाठक ने एक दिलचस्प जानकारी दी है कि सन 1918 में पंडित शुकलाल प्रसाद पाण्डेय ने शेक्सपियर के लिखे 'कॉमेडी ऑफ एरर्स ' का अनुवाद 'पुरू झुरु' शीर्षक से किया था । पंडित मुकुटधर पाण्डेय ने कालिदास के 'मेघदूत' का छत्तीसगढ़ी अनुवाद करके एक बड़ा काम किया है।डॉ. पाठक की पुस्तक में 'छत्तीसगढ़ी साहित्य म नवा बिहान 'शीर्षक ' के अंतर्गत प्रमुख कवियों की कविताओं का भी जिक्र किया गया है। लिखित परम्परा की शुरुआत **************** छत्तीसगढ़ी साहित्य में आधुनिक काल की चर्चा प्रारंभ करते हुए अपनी इस पुस्तक में डॉ. पाठक कहते हैं-"कोनो बोली ह तब तक भाषा के रूप नइ ले लेवै ,जब तक ओखर लिखित परम्परा नइ होवै।" इसी कड़ी में उन्होंने आधुनिक काल के अंतर्गत छत्तीसगढ़ी के लिखित साहित्य के प्रथम और द्वितीय उन्मेष पर प्रकाश डाला है। प्रथम उन्मेष में उन्होंने सन 1916 के आस -पास राजिम के पंडित सुन्दरलाल शर्मा रचित 'छत्तीसगढ़ी दानलीला 'सहित आगे के वर्षों में प्रकाशित कई साहित्यकारों की कृतियों की जानकारी दी है। सुराज मिले के पाछू नवा-नवा प्रयोग ***************** डॉ. पाठक ने पुस्तक में द्वितीय उन्मेष के अंतर्गत लिखा है - --"सुराज मिले के पाछू हिन्दी के जमों उप -भाषा अउ बोली डहर लोगन के धियान गिस।ओमा रचना लिखे के ,ओमा सोध करेके ,ओमा समाचार पत्र अउ पत्रिका निकारे के काम धड़ाधड़ सुरू होगे। छत्तीसगढ़ी म ए बीच जतका प्रकाशन होइस ,साहित्य म जतका नवा -नवा प्रयोग होइस ,ओखर ले छत्तीसगढ़ी के रूप बने लागिस,संवरे लागिस।अउ आज छत्तीसगढ़ी ह आने रूप म हमार आघू हावै। छत्तीसगढ़ी डहर लोगन के जउन रद्दी रूख रहिस ,टरकाऊ बानी रहिस ,अब सिराय लागिस। छत्तीसगढ़ी साहित्य ह अब मेला -ठेला ले उतरके लाइब्रेरी ,पुस्तक दुकान अउ ए .एच. व्हीलर इहां आगे। लाउडस्पीकर म रेंक के बेंचई ले उठके रेडियो, सिनेमा अउ कवि सम्मेलन तक हबरगे।गंवैहा मन के चरचा ले असकिटिया के 'काफी हाउस' अउ 'साहित्यिक गोष्ठी ' के रूप म ठउर जमा लिस। लोगन के सुवाद बदलगे, छत्तीसगढ़ के भाग पलटगे। " उन्होंने 'छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार' में 'द्वितीय उन्मेष' के तहत वर्ष 1950 से 1970 के दशक में प्रकाशित छत्तीसगढ़ी के अनेक कवियों के कविता -संग्रहों का उल्लेख करते हुए यह भी लिखा है कि वर्ष 1955 से एक वर्ष तक छपी और मुक्तिदूत द्वारा सम्पादित 'छत्तीसगढ़ी' मासिक पत्रिका ने एक अंक छत्तीसगढ़ी कविताओं का भी प्रकाशित किया था ,जिसमें 21 कवियों की रचनाएँ शामिल थीं। डॉ. पाठक ने' द्वितीय उन्मेष ' में छत्तीसगढ़ी भाषा के अनेक कवियों की चर्चा की है। साथ ही उन्होंने इनमें से 25 प्रमुख कवियों के काव्य गुणों का उल्लेख करते हुए उनकी एक -एक रचना भी प्रस्तुत की है । छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की विकास यात्रा ने इतिहास के दुर्गम पथ पर चलते हुए अपने हर पड़ाव पर छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाया है। इसका श्रेय उन सभी ज्ञात ,अल्प ज्ञात और अज्ञात कवियों और लेखकों को दिया जाना चाहिए ,जिनकी रचनाओं ने देश के साहित्यिक मानचित्र पर इस प्रदेश का नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित किया है।

Sunday, September 8, 2024

(पुस्तक- चर्चा ) माटी-महतारी से जुड़ी कविताएँ

एकान्त श्रीवास्तव का कविता -संग्रह 'अँजोर' ****** आलेख - स्वराज करुण **** छत्तीसगढ़ी नई कविताओं के हिंदी अनुवाद सहित एकान्त श्रीवास्तव का नया संग्रह 'अँजोर' अपने शीर्षक के अनुरूप कविता की दुनिया में नई रौशनी लेकर आया है। संग्रह में 42 छत्तीसगढ़ी कविताओं के साथ -साथ उनके हिन्दी अनुवाद भी दिए गए हैं। यानी एक पृष्ठ पर छत्तीसगढ़ी तो दूसरे पृष्ठ पर उसका हिंदी अनुवाद। देखा जाए तो यह उनका एक नया प्रयोग है।इन छत्तीसगढ़ी नई कविताओं का हिंदी अनुवाद भी स्वयं कवि एकान्त श्रीवास्तव ने किया है। हिंदी की सुप्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका 'वागर्थ ' के नौ साल तक सम्पादक रहे एकान्त छत्तीसगढ़ में ही जन्मे और पले-बढ़े हैं। राजिम के पास ग्राम कोमा में उनका बचपन बीता। आगे चलकर वह भारत सरकार के राजभाषा विभाग में अधिकारी बने । फरवरी 2024 में सेवानिवृत्त हो चुके हैं। अभी दिल्ली में रहते हैं। हिंदी जगत के प्रसिद्ध कवि होने के साथ -साथ वह कहानीकार और समीक्षक भी हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा में आधुनिक शैली की अतुकांत कविताएँ लिखने वालों की संख्या काफी कम है । ऐसे में एकान्त श्रीवास्तव की ये कविताएँ अनायास पाठकों का ध्यान आकर्षित करती हैं ,जो हमारी माटी-महतारी से जुड़ी हुई हैं।
प्रकाशन संस्थान ,नईदिल्ली द्वारा पिछले वर्ष 2023 में प्रकाशित उनका यह संग्रह 'अँजोर' 168 पृष्ठों का है, जिसे उन्होंने उन्हीं के शब्दों में कवि त्रिलोचन (शास्त्री ) की अवधी में रचित काव्य -कृति 'अमोला' को और छत्तीसगढ़ की मिट्टी ,जिसका नाम कन्हार है और इसके सीधे-सच्चे रहवासियों को और कोरोना काल में खो गए तमाम प्रियजनों और कवि -लेखक बंधुओं को याद करते हुए समर्पित किया है। चूंकि एकान्त छत्तीसगढ़ में जन्मे और यहाँ के ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े हैं , इसलिए उनके इस संग्रह में छत्तीसगढ़ के गाँवों की और यहाँ के लोकजीवन की सोंधी महक महसूस की जा सकती है। संग्रह में 'मनुख के गीत गाओ ' शीर्षक से 21 पृष्ठों की भूमिका जयप्रकाश ने लिखी है, जिसमें उन्होंने एकान्त की इन कविताओं के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला है। कवि एकांत 'इन कविताओं के बारे में' शीर्षक अपने आत्मकथ्य में कहते हैं -"इनमें झाँक रहा गाँव एक भूला-बिसरा गाँव है ,जो अब आधा ही बचा है।कला या कविता उस आधे खो गये गाँव की खोज का ही रचनात्मक प्रयत्न है। उस गाँव और उस जीवन के साथ मूल्य भी पीछे छूट गये हैं,जो जीवन और सभ्यता के प्रत्येक समय आधार स्तंभ हैं।इस तरह परम्परा अधुनातन होती है । भारतीय संस्कृति के 'अग्राह्य' को त्यागकर ग्राह्य को स्वीकार करना ही कविता और समाज का धर्म है ।" कवि एकान्त के शब्दों में -"हिंदी की बड़ी कविता बोली की कविता है । " संग्रह में एकान्त की पहली छत्तीसगढ़ी कविता 'पियास ' (प्यास) का एक अंश देखिए - "फूल के रस ल फुलचुहकी पीथे /आँसू ल पीथे महतारी , मइनसे के लहू ल टोनही चुहकथे / गौंटिया ह पी थे गरीब के पछीना । कोन पानी ल पियँव के /माढ़ जाए मोरो पियास , कोन रद्दा जाँव / तैं मोला बता दे , कोन गाँव ,कही दे संगवारी । कुँवार के घाम म देहे करियागे /भुंजागे सब्बो बन -कांदी, अंतस के दोना म मया के पानी / एक घुटका पी लेतेंव त तर जातेंव । कवि ने वर्ष 2002 की अपनी इस कविता की इन पंक्तियों का हिंदी अनुवाद इस तरह किया है - "फूल के रस को फूलचुहकी पीती है , आँसू को पीती है माँ , जादूगरनी पीती है मानुष का रक्त , साहूकार पीता है गरीब का पसीना । कौन -सा जल पियूँ कि बुझ जाए मेरी भी प्यास , किस रास्ते जाऊँ कौन -सा गाँव ? मुझे तुम बता दो ओ संगी मेरे । कुँवार की धूप में काली पड़ गयी काया, जल गई घास और जंगल , तर जाता यदि एक घूँट पी लेता , हॄदय के दोने में प्रेम का जल ।" संग्रह 'अँजोर ' की कविताओं में हमारी ग्राम्य संस्कृति के साथ छत्तीसगढ़ के गाँवों की ज़िन्दगी जीवंत हो उठी है। इसमें एक छत्तीसगढ़ी कविता है 'मड़ई ' , यह किसी मड़ई की चहल -पहल के बीच खाली जेब घूमते ग्रामीण की सहज -सरल अभिव्यक्ति है ,जिसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं - "मड़ई म सकलाए हें गाँव भर के मइनखे, आए हें आन गाँव ले घलो , भंडार के गाँव अउ रकसहूँ के गाँव, उत्ती के गाँव अउ बुड़ती के गाँव, जुरे हें सब दिसा ले। कोदो के पाना ल चबाए हों अइसे, जानो, मानो खाए हों पान , लाली -लाली रचे हे मुँहु, मड़ई म घूमथौं अउ अइसे मेछराथंव कोनहो पार नइ पाही के एक्को ठन पइसा नइ हे खिसा म।" कवि ने इन पंक्तियों का हिंदी अनुवाद किया है- "मेले में एकत्र हुए हैं गाँव भर के लोग , आए हैं दूसरे गाँवों से भी , उत्तर के गाँव और दक्षिण के गाँव, पूरब के गाँव और पश्चिम के गाँव, एकत्र हुए हैं यहाँ सब दिशाओं से । कोदो की पत्तियों को चबाया है इस तरह , जैसे मैंने खाया है पान लाल -लाल रचे हैं होंठ , मेले में घूमता इतरा रहा ऐसे किसी को पता नहीं चलेगा कि एक भी पैसा नहीं जेब में।" संग्रह में 'भुंइया के फूल' शीर्षक कविता की प्रारंभिक पंक्तियों में एक छत्तीसगढ़िया मनुष्य की अभिव्यक्ति को महसूस कीजिए - खर नइ हे पानी खारून के , करू नइ हे जाम चंदना -चमसूर के ,फेर काबर जाबो ठंइया ला छोड़ के , इही भूँइया के फूल हन , इही भूँइया म झर बो। " एकांत ने अपनी इस रचना का हिंदी अनुवाद इस तरह किया है - "खारा नहीं है पानी 'खारून 'का , कड़ुए नहीं हैं अमरूद चंदना -चमसूर के फिर क्यों जाएँ अपनी जगह को छोड़ कर , इस धरती के फूल हैं , इसी धरती में झड़ेंगे ।" यह कविता अपनी धरती के प्रति मनुष्य के मोह की सहज ,लेकिन भावुक अभिव्यक्ति है।संग्रह में एक छोटी -सी कविता है 'मया म ' यानी प्यार में। मूल छत्तीसगढ़ी में देखिए - "तैं कुँवा ले पानी नइ, मोला हेर लेथस , तैं ढेंकी म धान नइ, मोला कूट देथस, तैं जाँता म दार नइ, मोला दर देथस । तैं चूँदी म फूल नइ, मोला खोंच लेथस । का-का होवत रथे मया म अमारी के फूल ह सुरुज म बदल जाथे।" एकान्त ने इसका हिंदी अनुवाद किया है ,वह भी बहुत मोहक है " तुम कुँआ से पानी नहीं मुझे निकालती हो , तुम ढेंकी में धान नहीं , मुझे कूटती हो , तुम चक्की में दाल नहीं , मुझे पीसती हो , तुम वेणी में फूल नहीं, मुझे खोंसती हो , क्या -क्या होता रहता है प्यार में , अमारी का फूल सूर्य में बदल जाता है।" यह कविता ग्राम्य जीवन में प्यार की निर्मल ,निश्छल अभिव्यक्ति के साथ हमें गाँवों की हमारी विलुप्तप्राय कुँआ संस्कृति और अनाज कूटने की ढेंकी संस्कृति की भी याद दिलाती है। हैण्डपम्पों और नलकूपों के इस आधुनिक युग में गाँवों में भी कुँआ लगभग अदृश्य हो गया है।साथ ही अदृश्य हो गयी है कुँओं के आसपास होने वाली चहल -पहल। ठीक उसी तरह गाँवों के घरों में अलसुबह महिलाओं द्वारा ढेंकी में अनाज कूटने की आवाज़ भी अब कहीं गुम हो गयी है ,क्योंकि उनका स्थान गाँवों में स्थानीय स्तर पर या आस- पास धान कूटने की हॉलर मशीनों ने ले लिया है। संग्रह की शीर्षक -कविता 'अँजोर' हमें उस युग की याद दिलाती है ,जब घरों में रात के समय कंदील(लालटेन)और अंगीठी की रौशनी से काम चलाया जाता था। उस दौर में भी गाँव के सम्पन्न व्यक्ति के घर में रात भर कंदील की रौशनी हुआ करती थी। यानी वह भी आर्थिक विषमता का दौर था। कवि एकान्त की कलम ने उस माहौल का छत्तीसगढ़ी में शब्द चित्र कुछ इस तरह खींचा है - "हमर गाँव म तीन कोरी छानी एक कोरी घर म कंडील बरथे। दू कोरी घर म अंगेठा के अँजोर , माटी तेल बर नइ हे पइसा कोनहो -कोनहो घर म बरथे कुसुम अउ टोरी तेल के दियना , गौंटिया के घर रात भर बरथे कंडील, उज्जर काँच के उज्जर अँजोर । बन म फेंकारी मारथे कोलिहा , दूरिहा ले दिखथे अँधियार म गौंटिया के घर के अँजोर। गौंटिया के घर म उगे हे चंदा हमर कर नइ हे कोनहो तारा ।" कवि की कलम से ही 'उजाला'शीर्षक से इसका हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह हुआ है - "हमारे गाँव मे हैं साठ घर , बीस घरों में जलती है लालटेन , चालीस घरों में अँगीठी का उजाला, मिट्टी तेल के लिए नहीं है पैसा किसी-किसी घर में जलता है कुसुम और टोरी के तेल का दीया । साहूकार के घर में रातभर जलती है लालटेन, उजले काँच की उजली रौशनी , जंगल में उतरता है अंधकार पहाड़ में हुँआ-हुँआ करते हैं सियार दूर से दिखता है अँधेरे में साहूकार के घर का उजाला । साहूकार के घर में उगा है चंद्रमा हमारे पास कोई तारा नहीं।" हालाँकि इस आधुनिक युग में गाँवों तक बिजली पहुँच जाने से लालटेन अब इक्का -दुक्का ही नज़र आते हैं। ग़रीबों के कच्चे मकानों में भी बिजली के बल्ब जलते हैं। लेकिन एक वह भी दौर था ,जब रात में अपने घरों से अँधेरा दूर करने के लिए ग़रीबों को कितनी जद्दोजहद करनी पड़ती थी ,उसका चित्रण इस कविता में है। संग्रह की अपनी छत्तीसगढ़ी कविताओं में एकान्त छत्तीसगढ़ के जन -जीवन से और यहाँ की जनभावनाओं से जितने घुलमिल गए हैं ,वहीं इनका हिंदी अनुवाद करते हुए भी वे अपने छत्तीसगढ़िया अहसास के साथ उतने ही एकाकार नज़र आते हैं।कोई भी कवि स्वभाव से ही भावुक और संवेदनशील होता है। एकान्त श्रीवास्तव की इन कविताओं में भी अपनी धरती से जुड़ी भावुकता और संवेदनशीलता बहुत गहराई से रची -बसी है। -स्वराज करुण

Thursday, May 30, 2024

(आलेख) हिन्दी पत्रकारिता की जन्म -भूमि है बंग -भूमि (लेखक -स्वराज्य करुण )

(आज 30 मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस ) आलेख- स्वराज्यं करुण 
समय के प्रवाह में तरह -तरह की चुनौतियों से भरे सफ़र के 198 साल पूरे करने के बाद आज हिन्दी पत्रकारिता अपने 199 वें पड़ाव की ओर बढ़ने लगी है। आज ( 30 मई )का दिन हमारे देश की हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में एक यादगार दिवस के रूप में दर्ज है। इसी दिन सन 1826 को देश के प्रथम हिन्दी समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड ' का प्रकाशन बंगाल की राजधानी कोलकाता से शुरू हुआ था। यह दिन हिन्दी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। 'उदन्त मार्तण्ड' प्रत्येक मंगलवार को छपने वाला साप्ताहिक अख़बार था। भारत की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक एकता का यह भी एक बड़ा उदाहरण है कि यहाँ हिन्दी पत्रकारिता की जन्म भूमि होने का गौरव बंग -भूमि ,अर्थात बांग्लाभाषी राज्य (बंगाल ) को मिला । हिन्दी भाषी राज्य वर्तमान उत्तरप्रदेश के कानपुर से आए वकील पण्डित युगल किशोर शुक्ल ने वहाँ इसकी बुनियाद रखी । उन्होंने कोलकाता के कोलूटोला स्थित 37 ,अमरतल्ला लेन से 'उदन्त मार्तण्ड' का प्रकाशन प्रारंभ किया।
नारद जयंती के दिन आया उदन्त मार्तण्ड यानी उगता हुआ सूरज 
   वह नारद जयंती का दिन था। हम भारतीय लोग अपने पौराणिक आख्यानों के अनुसार देवर्षि नारद को दुनिया का पहला पत्रकार मानते हैं ,जो देवताओं और दानवों के बीच एक दूसरे के समाचार पहुँचाया करते थे। इसीलिए शायद पण्डित शुक्ल ने नारद जयंती को शुभ अवसर मानकर उस दिन ' उदन्त मार्तण्ड ' का प्रकाशन प्रारंभ किया ।इस शीर्षक का आशय उगते हुए सूर्य से है । हालांकि तरह -तरह की कठिनाइयों ,विशेष रूप से आर्थिक समस्याओं के कारण लगभग डेढ़ साल बाद इसका प्रकाशन बन्द हो गया ,लेकिन देश के प्रथम हिन्दी अख़बार के रूप में 'उदन्त मार्तण्ड' का नाम इतिहास में अमिट अक्षरों में दर्ज हो गया । यह साप्ताहिक अख़बार था। इसका अंतिम अंक 4 दिसम्बर 1827 को प्रकाशित हुआ था । प्रथम अंक की 500 प्रतियाँ छपी थीं। कुल 79 अंक प्रकाशित हुए थे। वह हिन्दी भाषा के विकास का शैशव काल था ,जिसकी गहरी छाप 'उदन्त मार्तण्ड ' के अंकों में मिलती थी।भारतीय प्रिंट मीडिया के इतिहास की इस महत्वपूर्ण घटना को याद करने के लिए हर साल 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। सभी पाठकों और पत्रकार साथियों को हिन्दी पत्रकारिता दिवस की बधाई और शुभकामनाएँ । हिन्दी भाषा के विकास में 'उदन्त मार्तण्ड' की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन दिनों कोलकाता से अंग्रेजी ,पारसी और बांग्ला में कई समाचार पत्र छपते थे। हिन्दी का कोई अख़बार नहीं था। ऐसे में पण्डित युगल किशोर मिश्र ने 'उदन्त मार्तण्ड ' का प्रकाशन प्रारंभ कर हिन्दी भाषियों की एक बड़ी ज़रूरत को पूरा करने का प्रयास किया। उन्होंने प्रवेशांक के सम्पादकीय में अपने इस मंतव्य को स्पष्ट कर दिया था.                  
पत्रकारिता और प्रिंटिंग टेक्नॉलॉजी 
पत्रकारिता और प्रिंटिंग टेक्नॉलॉजी का एक -दूसरे के साथ अटूट रिश्ता है। इसलिए आज के दिन हमें देश और दुनिया में मुद्रण तकनीक की विकास यात्रा को भी ज़रूर याद करना चाहिए। पंद्रहवीं शताब्दी में यूरोप में मुद्रण तकनीक के विकास से मनुष्य को अपने विचारों को छपे हुए शब्दों में देखने और प्रकाशित करने का एक नया माध्यम मिल गया। कालांतर में यह तकनीक दुनिया के अन्य देशों में भी पहुँच गयी। इसके जरिए विभिन्न प्रकार की पुस्तकों के अलावा पत्र -पत्रिकाओं के प्रकाशन का सिलसिला भी शुरू हो गया। वह दौर हैण्ड कम्पोजिंग का था। अलग -अलग भाषाओं की लिपियों के टाइप यानी अक्षर साँचे में ढलने लगे ,जिन्हें पांडुलिपियों को देख कर कम्पोजिटर अपने हाथों से शब्दों के रूप में जमाया करते थे ,जिन्हें गैली बनाकर,प्रूफ रीडिंग के बाद ट्रेडल मशीनों में छापा जाता था। बाद में सिलेंडर मशीनें भी आयीं । बीसवीं सदी में कम्प्यूटरों के आने से छपाई कार्य बहुत आसान हो गया है। इक्कीसवीं सदी में तो कम्प्यूटर तकनीक का विकास और भी आगे पहुँच गया है। आधुनिक संचार क्रांति के इस दौर में अब तो लोग मोबाइल फोन या स्मार्ट फोन पर ही अपनी भावनाएँ स्वयं कम्पोज कर लेते हैं। इंटरनेट और उस पर आधारित सोशल मीडिया के विभिन्न तकनीकी माध्यमों से सूचनाओं ,समाचारों और विचारों का आदान-प्रदान हथेली में रखे मोबाइल फोन के जरिए बड़ी सरलता से होने लगा है। हैण्ड कम्पोजिंग वाले प्रिंटिंग प्रेस लगभग विलुप्त हो चुके हैं और ज़माना अब ऑफसेट प्रिंटिंग और कलर प्रिंटिंग का है। अब तो कम्प्यूटर आधारित छपाई की अत्याधुनिक मशीनें भी आ चुकी हैं । लेकिन हमें कुछ पल के लिए इतिहास के उस दौर की भी कल्पना ज़रूर करनी चाहिए ,जब किसी पुस्तक या पत्र -पत्रिका की छपाई के लिए तकनीकी दृष्टि से कितनी दिक्कतें हुआ करती थीं ! बहरहाल लगभग चार -पाँच शताब्दियों तक मनुष्य ने इन्हीं दिक्कतों के बीच ज्ञान -विज्ञान , साहित्य ,कला और संस्कृति से जुड़ी हजारों पुस्तकें लिखीं और छापीं , अख़बार भी निकाले। भारत में उस ज़माने की प्रिंटिंग टेक्नॉलॉजी के अनुरूप पहला प्रिंटिंग प्रेस पुर्तगालियों ने गोवा में सन 1556 में लगाया था । वहाँ सेंट पॉल कॉलेज में इसकी स्थापना की गयी थी। बताया जाता है कि इसका उपयोग ईसाई पादरियों द्वारा धार्मिक पुस्तकों के प्रकाशन के लिए किया जाता था। इसके ठीक 127 साल बाद 1684 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भारत में अपने कार्यालयीन उपयोग के लिए प्रिंटिंग प्रेस की शुरूआत की। 
  भारत का पहला अंग्रेजी अख़बार भी बंग -भूमि से 
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि हिन्दी पत्रकारिता की जन्म भूमि कोलकाता से ही भारत का पहला समाचार पत्र अंग्रेजी भाषा में 29 जनवरी 1780 को प्रकाशित हुआ था। इसके सम्पादक और प्रकाशक थे जेम्स ऑगस्ट हिक्की । यह साप्ताहिक अख़बार द हिक्कीज गजट केलकेटा जर्नल एडवरटाइजर के नाम से छपता था । पत्रकारिता का मार्ग उस ज़माने में भी काँटों से भरा हुआ था। हिक्की साहब एक सजग पत्रकार थे। उन्होंने अपने अख़बार के शीर्षक के नीचे लिखवा रखा था-- A Weekly Political and Commercial Paper ,Open for all ,but Influenced by none. (यह एक राजनीतिक और वाणिज्यिक साप्ताहिक पेपर है ,जो सबके लिए खुला हुआ है ,लेकिन किसी के भी प्रभाव में नहीं है) । लेकिन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स , सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश , ईस्ट इंडिया कम्पनी और अंग्रेज अधिकारियों की कारगुजारियों के ख़िलाफ़ खुलकर ख़बरें छापने के कारण उन्हें उनका कोपभाजन बनना पड़ा । यहाँ तक कि हेस्टिंग्स ने उन पर मानहानि का मुकदमा चलाया । हिक्की साहब को 9 माह की जेल हो गयी ,लेकिन जेल में रहते हुए भी जब उन्होंने अख़बार छापना जारी रखा तो मुख्य न्यायाधीश के आदेश पर उनके प्रेस को सील कर दिया गया । हिक्कीज गज़ट का छपना बंद हो गया। बताया जाता है कि हिक्की साहब की खबरों का असर ब्रिटिश संसद पर भी हुआ। इन ख़बरों को गंभीरता से लेकर वारेन हेस्टिंग्स और मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ पार्लियामेंट में महाभियोग लाया गया था । वैसे कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि भारत में पहला अंग्रेजी समाचार पत्र ईस्ट इंडिया कम्पनी के पूर्व अधिकारी विलियम बॉल्ट्स ने वर्ष 1776 में शुरू किया था ,जिसमें कम्पनी और ब्रिटिश सरकार की खबरें प्रकाशित की जाती थी , शायद यह ईस्ट इंडिया कम्पनी का मुखपत्र रहा होगा ,लेकिन वैचारिक रूप से भारत में पहला स्वतंत्र अंग्रेजी अख़बार प्रकाशित करने का श्रेय जेम्स ऑगस्ट हिक्की को दिया जाता है। वर्ष 1780 में इसके प्रकाशन के 46 साल बाद भारत में हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत 'उदन्त मार्तण्ड ' के माध्यम से हुई । भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में उस दौर में देश की विभिन्न भाषाओं के कई समाचार पत्रों का उल्लेख मिलता है।राजा राम मोहन राय जैसे महान समाज सुधारक ने वर्ष 1819 में बांग्ला भाषा के प्रथम समाचार पत्र 'संवाद कौमुदी ' का प्रकाशन प्रारंभ किया था।
  भारत का पहला हिन्दी दैनिक छपा था 170 साल पहले 
 बंग -भूमि कोलकाता को हिन्दी के प्रथम साप्ताहिक (उदन्त मार्तण्ड ) के अलावा भारत के प्रथम हिन्दी दैनिक के प्रकाशन का भी श्रेय मिलता है । उदन्त मार्तण्ड के प्रकाशन के 28 साल बाद वर्ष 1854 में दैनिक 'समाचार सुधावर्षण' की शुरूआत हुई ,जो हिन्दी और बांग्ला भाषाओं में छपता था। इस द्विभाषी दैनिक के सम्पादक थे श्याम सुंदर सेन। वर्ष 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 'समाचार सुधावर्षण ' ने भी राष्ट्रीय चेतना के विकास में अपनी अहम भूमिका निभाई। अख़बार ने आज़ादी के योद्धाओं का खुलकर समर्थन किया। फलस्वरूप सम्पादक श्याम सुंदर सेन को अंग्रेज हुकूमत की नाराजगी झेलनी पड़ी । उन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर मुकदमा चलाया गया ,लेकिन वे अदालत से निर्दोष बरी हो गए। हमारे स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दी सहित विभिन्न भाषायी समाचार पत्रों का ऐतिहासिक योगदान रहा है। भारतेंदु हरिश्चन्द्र , लोकमान्य पण्डित बालगंगाधर तिलक , महात्मा गांधी ,पण्डित जवाहरलाल नेहरू , गणेश शंकर विद्यार्थी और पण्डित माखन लाल चतुर्वेदी जैसे अनेक दिग्गज सेनानियों ने समाचार पत्र -पत्रिकाओं के प्रकाशन और सम्पादन के जरिए जनता में विदेशी दासता के ख़िलाफ़ लड़ने का हौसला जगाया ।
  छत्तीसगढ़ में 124 साल पुरानी है पत्रकारिता की परम्परा 
छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं था। यहाँ हिन्दी पत्रकारिता की परम्परा 124 साल पुरानी है ,जो निरन्तर विकसित हो रही है। संसाधनों की दृष्टि से उस ज़माने में यह बेहद पिछड़ा इलाका था ,लेकिन इसके बावज़ूद चुनौतियों का सामना करते हुए जनवरी 1900 में इस अंचल के प्रथम समाचार पत्र 'छत्तीसगढ़-मित्र ' का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। दिग्गज साहित्यकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पण्डित माधवराव सप्रे इसके सम्पादक और रामराव चिंचोलकर उनके सहयोगी थे। प्रकाशक थे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पण्डित वामन राव लाखे। यह समाचार पत्र रायपुर से छपता और पेंड्रा से प्रकाशित होता था। सप्रे जी उन दिनों पेंड्रा में वहाँ के राजकुमार के अंग्रेजी शिक्षक थे।वह पेंड्रा से ही इस पत्रिका का सम्पादन करते थे। उनकी लिखी कहानी 'एक टोकरी भर मिट्टी ' को हिन्दी की पहली मौलिक कहानी माना जाता है। उन्होंने' छत्तीसगढ़ मित्र ' के माध्यम से सामाजिक सुधारों से जुड़े विषयों के साथ -साथ छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय चेतना के विकास में भी अपना उल्लेखनीय योगदान दिया। लेकिन आर्थिक समस्याओं के कारण 'छत्तीसगढ़ मित्र ' का प्रकाशन तीन साल बाद दिसम्बर 1902 में बंद करना पड़ गया। देश 15 अगस्त 1947 को आज़ाद हुआ । गुलामी के दिनों में आज़ादी की लड़ाई में भारतीय पत्रकारिता भी एक मिशन भावना से अपना योगदान दे रही थी। आज़ादी के बाद उसकी यह भूमिका और भी चुनौतीपूर्ण हो गयी है। उसे एक तरफ स्वतंत्र भारत की जन भावनाओं को ,जनता की आशाओं ,आकांक्षाओं और समस्याओं को स्वर देना है तो दूसरी तरफ एक आज़ाद मुल्क की विकास यात्रा की उपलब्धियों को भी जनता तक पहुँचाना है। हिन्दी पत्रकारिता भी अपनी इस दोहरी जिम्मेदारी का बख़ूबी निर्वहन कर रही है। अत्याधुनिक संचार सुविधाओं से अब छत्तीसगढ़ सहित देश के सभी राज्यों में जिला मुख्यालयों और तहसील मुख्यालयों से भी समाचार पत्र प्रकाशित होने लगे हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन केंद्रों के अलावा कई प्राइवेट टेलीविजन न्यूज चैनल भी पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना योगदान दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ में पण्डित माधव राव सप्रे द्वारा 124 साल पहले विकसित हिन्दी पत्रकारिता की गौरवशाली परम्परा को बाद के दशकों में दिग्गज लेखक , पत्रकार हुए ,जिन्होंने सप्रे जी द्वारा विकसित हिन्दी पत्रकारिता की परम्परा को अपने चिन्तन ,मनन ,लेखन और परिश्रम से विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं के जरिए ख़ूब आगे बढ़ाया।इनमें रायपुर के पण्डित रविशंकर शुक्ल, पण्डित स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी, केशव प्रसाद वर्मा , ठाकुर प्यारेलाल सिंह ,हरि ठाकुर, मायाराम सुरजन , रमेश नैयर, गोविन्दलाल वोरा , मधुकर खेर , कुमार साहू ,ललित सुरजन , प्रभाकर चौबे , राजनारायण मिश्र , अकलतरा (जिला -जांजगीर -चाम्पा )के बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल ,राजनांदगांव के पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी , गजानन माधव मुक्तिबोध और शरद कोठारी , जगदलपुर (बस्तर)के तुषार कांति बोस और लाला जगदलपुरी , जांजगीर के कुलदीप सहाय ,बिलासपुर के यदुनन्दन प्रसाद श्रीवास्तव और पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी, दुर्ग के चन्दूलाल चन्द्राकर , रायगढ़ के किशोरी मोहन त्रिपाठी और गुरुदेव काश्यप सहित कई बड़े नाम शामिल हैं। 
  समाचार पत्रों का संग्रहालय 
 हिन्दी सहित भारतीय पत्रकारिता के समग्र इतिहास को संरक्षित करने का एक ऐतिहासिक कार्य भोपाल में 'माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय के जरिए किया गया है। वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर के प्रयासों से इसकी स्थापना लगभग 40 वर्ष पहले 19 जून 1984 को सप्रे जी की जयंती के दिन हुई थी । यह देश में समाचार पत्र -पत्रिकाओं का अपने किस्म का पहला संग्रहालय है ,जहाँ विभिन्न भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों के प्रथम अंकों से लेकर उनकी अनेक दुर्लभ प्रतियों को सुव्यवस्थित रूप से प्रदर्शित किया गया है। छत्तीसगढ़ के प्रथम पत्रकार पण्डित माधवराव सप्रे की याद में समाचार पत्रों का यह संग्रहालय मध्यप्रदेश में सफलतापूर्वक संचालित हो रहा है। गंभीर पत्रकारिता के अध्येताओं और शोधकर्ताओं के लिए एक बड़े अध्ययन केन्द्र के रूप में आज पूरे देश में इस संग्रहालय की अपनी एक विशेष पहचान है। ---स्वराज करुण