Thursday, October 30, 2014
देश का रूपया सीधे विदेशी बैंकों में जमा करने पर प्रतिबंध ज़रूरी !
Wednesday, October 29, 2014
सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों की असलियत !
निजी क्षेत्र में सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों के नाम पर लूट-मार जारी है.
हालांकि अपवाद स्वरुप कुछ अच्छे अस्पताल और अच्छे डॉक्टर भी होते हैं , जिनमे परोपकार और समाज सेवा की भावना जीवित है ,लेकिन अधिकाँश अस्पतालों की व्यवस्था देखकर लगता है कि मानवता खत्म हो गई
है .अपने एक मित्र के बीमार पिताजी को देखने एक ऐसे ही स्वनाम धन्य अस्पताल
गया तो मित्र ने बताया --- इस अस्पताल के डॉक्टरों की आपसी बातचीत अगर सुन
लें तो आपको डॉक्टर और हैवान में कोई अन्तर नज़र नहीं आएगा .ये डॉक्टर अपने
लंच टाईम में आपसी चर्चा में मरीजों को क्रिकेट का 'विकेट'
कहते हैं. .एक डॉक्टर दूसरे से कहता है -आज चार विकेट आए थे ,एक विकेट
गिरा है .
दरअसल सुपर स्पेशलिटी में स्पेशल बात ये होती है कि वहाँ किसी गंभीर मरीज को ले जाने के बाद सबसे पहले बिलिंग काऊंटर में बीस-पच्चीस या पचास हजार रूपए जमा करवा लिए जाते हैं . उसके बाद शुरू होता है असली लूट -खसोट का सिलसिला . मरीज को आई.सी. यू .में भर्ती करने के बाद तरह-तरह के मेडिकल टेस्ट करवाने और हर दो -चार घंटे बाद नई -नई दवाइयों की लिस्ट उसके परिजन को थमा दी जाती है .उसी अस्पताल के परिसर में अस्पताल मालिक का मेडिकल स्टोर भी होता है .यह मरीज के घर के लोगों के लिए सुविधा की दृष्टि से तो ठीक है ,लेकिन वहाँ दवाईयां मनमाने दाम पर खरीदना उनकी मजबूरी हो जाती है.मरीज को छोड़कर ज्यादा दूर किसी मेडिकल स्टोर तक जाने -आने का जोखिम उठाना ठीक भी नहीं लगता . खैर किसी तरह अगर दवाई खरीद कर डॉक्टर को दे दी जाए तो उसके बाद यह पता भी नहीं चलता कि उन सभी दवाइयों का इस्तेमाल मरीज के लिए किया गया है या नहीं ?गौर तलब है कि आई.सी. यू. में मरीज के साथ हर वक्त उसके परिजन को मौजूद रहने की अनुमति नहीं होती .उसे बाहर ही बैठकर इन्तजार करना होता है .वह बड़ी व्याकुलता से समय बिताता है. उसे केवल आई.सी.यू. में दाखिल अपने प्रियजन के स्वास्थ्य की चिन्ता रहती है,लिहाजा डॉक्टर से कई प्रकार के मेडिकल टेस्ट का और मरीज के लिए खरीदी गयी दवाइयों के उपयोग का हिसाब मांगने की बात उसके मन में आती ही नहीं. इसका ही बेजा फायदा उठाते हैं कथित सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों के मालिक और डॉक्टर .वैसे इस प्रकार के ज्यादातर अस्पतालों के मालिक स्वयं डॉक्टर होते हैं .सरकार तो जन-कल्याण अच्छे इरादे के साथ गरीब परिवारों को स्मार्ट -कार्ड देकर उन्हें सालाना एक निश्चित राशि तक निशुल्क इलाज की सुविधा देती है यह सुविधा पंजीकृत अस्पतालों में दी जाती है ,लेकिन वहाँ डॉक्टर कई स्मार्ट कार्ड धारक परिवार के किसी एक सदस्य के एक बार के इलाज में ही अनाप-शनाप खर्च बताकर स्मार्ट कार्ड की पूरी राशि निकलवा लेते हैं.
दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी अस्पताल हैं ,जहां गंभीर से गंभीर बीमारियों का मुफ्त इलाज होता है.जैसे - नया रायपुर और पुट्टपर्थी स्थित श्री सत्य साईसंजीवनी अस्पताल ,जहां जन्मजात ह्रदय रोगियों का पूरा इलाज और ऑपरेशन मुफ्त किया जाता है .यह एक ऐसा अस्पताल है ,जहाँ कोई बिलिंग काऊंटर नहीं है. मरीजों के और उनके सहायकों के लिए भोजन और आवास की व्यवस्था भी निशुल्क है .-स्वराज्य करुण
दरअसल सुपर स्पेशलिटी में स्पेशल बात ये होती है कि वहाँ किसी गंभीर मरीज को ले जाने के बाद सबसे पहले बिलिंग काऊंटर में बीस-पच्चीस या पचास हजार रूपए जमा करवा लिए जाते हैं . उसके बाद शुरू होता है असली लूट -खसोट का सिलसिला . मरीज को आई.सी. यू .में भर्ती करने के बाद तरह-तरह के मेडिकल टेस्ट करवाने और हर दो -चार घंटे बाद नई -नई दवाइयों की लिस्ट उसके परिजन को थमा दी जाती है .उसी अस्पताल के परिसर में अस्पताल मालिक का मेडिकल स्टोर भी होता है .यह मरीज के घर के लोगों के लिए सुविधा की दृष्टि से तो ठीक है ,लेकिन वहाँ दवाईयां मनमाने दाम पर खरीदना उनकी मजबूरी हो जाती है.मरीज को छोड़कर ज्यादा दूर किसी मेडिकल स्टोर तक जाने -आने का जोखिम उठाना ठीक भी नहीं लगता . खैर किसी तरह अगर दवाई खरीद कर डॉक्टर को दे दी जाए तो उसके बाद यह पता भी नहीं चलता कि उन सभी दवाइयों का इस्तेमाल मरीज के लिए किया गया है या नहीं ?गौर तलब है कि आई.सी. यू. में मरीज के साथ हर वक्त उसके परिजन को मौजूद रहने की अनुमति नहीं होती .उसे बाहर ही बैठकर इन्तजार करना होता है .वह बड़ी व्याकुलता से समय बिताता है. उसे केवल आई.सी.यू. में दाखिल अपने प्रियजन के स्वास्थ्य की चिन्ता रहती है,लिहाजा डॉक्टर से कई प्रकार के मेडिकल टेस्ट का और मरीज के लिए खरीदी गयी दवाइयों के उपयोग का हिसाब मांगने की बात उसके मन में आती ही नहीं. इसका ही बेजा फायदा उठाते हैं कथित सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों के मालिक और डॉक्टर .वैसे इस प्रकार के ज्यादातर अस्पतालों के मालिक स्वयं डॉक्टर होते हैं .सरकार तो जन-कल्याण अच्छे इरादे के साथ गरीब परिवारों को स्मार्ट -कार्ड देकर उन्हें सालाना एक निश्चित राशि तक निशुल्क इलाज की सुविधा देती है यह सुविधा पंजीकृत अस्पतालों में दी जाती है ,लेकिन वहाँ डॉक्टर कई स्मार्ट कार्ड धारक परिवार के किसी एक सदस्य के एक बार के इलाज में ही अनाप-शनाप खर्च बताकर स्मार्ट कार्ड की पूरी राशि निकलवा लेते हैं.
दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी अस्पताल हैं ,जहां गंभीर से गंभीर बीमारियों का मुफ्त इलाज होता है.जैसे - नया रायपुर और पुट्टपर्थी स्थित श्री सत्य साईसंजीवनी अस्पताल ,जहां जन्मजात ह्रदय रोगियों का पूरा इलाज और ऑपरेशन मुफ्त किया जाता है .यह एक ऐसा अस्पताल है ,जहाँ कोई बिलिंग काऊंटर नहीं है. मरीजों के और उनके सहायकों के लिए भोजन और आवास की व्यवस्था भी निशुल्क है .-स्वराज्य करुण
Monday, October 13, 2014
( ग़ज़ल ) भोली आँखों से दुनिया को ...!
देख रहे भोली आँखों से दुनिया को सीधे-सादे लोग,
समझ न पाएं इस फरेबी महफ़िल के इरादे लोग !
नकाबपोशों के नगर में नक्कालों का स्वागत खूब ,
दहशत में जाने कहाँ गए इस बस्ती के आधे लोग !
सच्चाई की बात भी करना पागलपन कहलाता है ,
झूठी कसमों के संग करते सौ-सौ झूठे वादे लोग !
उल्टी- सीधी चालें चलती चालबाज की माया है ,
नासमझी में बन जाते हैं सियासतों के प्यादे लोग !
हीरे-मोती के चक्कर में चीर रहे धरती का सीना .
खेती के रिवाज़ को चाहे पल भर में गिरा दें लोग !
उनकी पुस्तक में न जाने दिल वालों का देश कहाँ ,
शायद असली के बदले दिल नकली दिलवा दें लोग !
वक्त आ गया अब चलने का इस मुसाफिरखाने से ,
आने वाले हैं यहाँ भी हुक्कामों के शहजादे लोग !
-- स्वराज्य करुण
Saturday, June 14, 2014
विज्ञापनों के लिए भी बनाया जाए सेंसर बोर्ड !
विज्ञापनों की विश्वसनीयता
का भी कोई क़ानून सम्मत वैज्ञानिक प्रमाण होना चाहिए. मेरे विचार से केन्द्र सरकार को
फिल्म सेंसर बोर्ड की तरह विज्ञापन सेंसर बोर्ड भी बनाना चाहिए .उपभोक्ता
वस्तुओं के प्र्काशित और प्रसारित होने वाले विज्ञापनों में सेंसर बोर्ड का
प्रमाणपत्र भी जनता को दिखाया जाना चाहिए ताकि फूहड़ और अश्लील विज्ञापनों
को समाज में प्रदूषण फैलाने से रोका जा सके .
आजकल टेलीविजन चैनलों में और अखबारों में तरह -तरह की दवाइयों, कई प्रकार के तेल और साबुनों ,विभिन्न प्रकार के सौंदर्य प्रसाधनों ,बिस्किट आदि पैकेट बन्द खाद्य वस्तुओं के विज्ञापनों की भरमार है. होर्डिंग्स में भी बड़े-बड़े दावों के साथ विज्ञापन प्रदर्शित किए जाते हैं . तन्त्र-मंत्र के विज्ञापन भी छपते और प्रसारित होते हैं .बाजारवाद के इस बेरहम और बेशर्म दौर में अधिकाँश विज्ञापनों की भाषा भी सामाजिक-सांस्कृतिक और पारिवारिक मर्यादाओं के खिलाफ नज़र आती है . कई बार टेलीविजन चैनलों में खबरों और कार्यक्रमों के बीच अचानक ऐसे फूहड़ विज्ञापन आने लगते हैं,जिनके शब्दों को किसी भी संस्कारवान भारतीय घर में अशोभनीय माना जाता है .
औषधियों और उपभोक्ता वस्तुओं के विज्ञापनों में किए जाने वाले दावों की विश्वसनीयता जांचने के लिये दर्शकों और पाठकों के पास तत्काल कोई उपाय नहीं होता .ऐसे में प्रत्येक विज्ञापनदाता के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वह अपने विज्ञापन में किए जा रहे दावों का एक विधि सम्मत सरकारी प्रमाण पत्र भी विज्ञापित वस्तु के साथ सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करे ,टेलीविजन के परदे पर भी ऐसे प्रमाणपत्र को प्रसारित किया जाए करे और अगर अखबार में विज्ञापन छपे तो उसके साथ भी ऐसा एक कानूनी प्रमाणपत्र अनिवार्य रूप से छापा जाए..मिसाल के तौर पर अगर किसी टूथ-पेस्ट ,केश-तेल ,दवाई आदि सेहत से जुडी वस्तुओं का विज्ञापन है तो उसके साथ सरकारी मेडिकल बोर्ड का भी प्रमाण-पत्र लगाना अनिवार्य हो.
इसी तरह अन्य वस्तुओं के विज्ञापनों में भी उनसे संबंधित विषयों के तकनीकी जानकारों की एक सरकारी कमेटी उन्हें प्रमाणित करे और उनका प्रमाणपत्र विज्ञापन के साथ प्रसारित-प्रदर्शित और प्रकाशित हो. वस्तुओं के पैकेटों और डिब्बों में भी यह प्रमाणपत्र लगाया जाना चाहिए .संक्षेप में यह कि चाहे प्रिंट मीडिया में छपने वाले विज्ञापन हों ,या इलेक्ट्रानिक मीडिया में प्रदर्शित या प्रसारित होने वाले विज्ञापन , उनके दावों की सच्चाई और उनकी भाषा की मर्यादा को जांचने और उसे अनुमोदित करने के लिए सेंसर बोर्ड जैसी एक सरकारी संस्था बननी चाहिए .यदि विज्ञापनों के लिए कोई सुस्पष्ट नियम-क़ानून बन सके और उन पर निगाह रखने वाली कोई संस्था बन जाए , तो देश की जनता को भ्रामक विज्ञापनों के मायाजाल से काफी हद तक बचाया जा सकेगा .- स्वराज्य करुण
आजकल टेलीविजन चैनलों में और अखबारों में तरह -तरह की दवाइयों, कई प्रकार के तेल और साबुनों ,विभिन्न प्रकार के सौंदर्य प्रसाधनों ,बिस्किट आदि पैकेट बन्द खाद्य वस्तुओं के विज्ञापनों की भरमार है. होर्डिंग्स में भी बड़े-बड़े दावों के साथ विज्ञापन प्रदर्शित किए जाते हैं . तन्त्र-मंत्र के विज्ञापन भी छपते और प्रसारित होते हैं .बाजारवाद के इस बेरहम और बेशर्म दौर में अधिकाँश विज्ञापनों की भाषा भी सामाजिक-सांस्कृतिक और पारिवारिक मर्यादाओं के खिलाफ नज़र आती है . कई बार टेलीविजन चैनलों में खबरों और कार्यक्रमों के बीच अचानक ऐसे फूहड़ विज्ञापन आने लगते हैं,जिनके शब्दों को किसी भी संस्कारवान भारतीय घर में अशोभनीय माना जाता है .
औषधियों और उपभोक्ता वस्तुओं के विज्ञापनों में किए जाने वाले दावों की विश्वसनीयता जांचने के लिये दर्शकों और पाठकों के पास तत्काल कोई उपाय नहीं होता .ऐसे में प्रत्येक विज्ञापनदाता के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वह अपने विज्ञापन में किए जा रहे दावों का एक विधि सम्मत सरकारी प्रमाण पत्र भी विज्ञापित वस्तु के साथ सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करे ,टेलीविजन के परदे पर भी ऐसे प्रमाणपत्र को प्रसारित किया जाए करे और अगर अखबार में विज्ञापन छपे तो उसके साथ भी ऐसा एक कानूनी प्रमाणपत्र अनिवार्य रूप से छापा जाए..मिसाल के तौर पर अगर किसी टूथ-पेस्ट ,केश-तेल ,दवाई आदि सेहत से जुडी वस्तुओं का विज्ञापन है तो उसके साथ सरकारी मेडिकल बोर्ड का भी प्रमाण-पत्र लगाना अनिवार्य हो.
इसी तरह अन्य वस्तुओं के विज्ञापनों में भी उनसे संबंधित विषयों के तकनीकी जानकारों की एक सरकारी कमेटी उन्हें प्रमाणित करे और उनका प्रमाणपत्र विज्ञापन के साथ प्रसारित-प्रदर्शित और प्रकाशित हो. वस्तुओं के पैकेटों और डिब्बों में भी यह प्रमाणपत्र लगाया जाना चाहिए .संक्षेप में यह कि चाहे प्रिंट मीडिया में छपने वाले विज्ञापन हों ,या इलेक्ट्रानिक मीडिया में प्रदर्शित या प्रसारित होने वाले विज्ञापन , उनके दावों की सच्चाई और उनकी भाषा की मर्यादा को जांचने और उसे अनुमोदित करने के लिए सेंसर बोर्ड जैसी एक सरकारी संस्था बननी चाहिए .यदि विज्ञापनों के लिए कोई सुस्पष्ट नियम-क़ानून बन सके और उन पर निगाह रखने वाली कोई संस्था बन जाए , तो देश की जनता को भ्रामक विज्ञापनों के मायाजाल से काफी हद तक बचाया जा सकेगा .- स्वराज्य करुण
Tuesday, April 15, 2014
लोकतंत्र इसी का नाम है !
बदनामी कोई नहीं चाहता . इंसान अपनी आजीविका के लिये चाहे छोटा-बड़ा कोई भी काम क्यों न करता हो, समाज में हर इंसान की दिली इच्छा होती है कि दूसरे लोग उसके कार्यों की तारीफ़ करें,लेकिन कई बार ऐसा हो नहीं पाता और जाने-अनजाने अपने बिगड़े कार्यों की वजह से वह अपयश का शिकार हो जाता है. ठीक उसी तरह आज के युग में दुनिया भर की तमाम सरकारें भी जनता के लिये अच्छे से अच्छा काम करके दिखाना चाहती हैं , भला कौन सी सरकार अपने ही देश के लोगों के बीच अपनी बदनामी चाहेगी ? लेकिन सरकारों के विशाल कुनबे में कहीं न कहीं , किसी न किसी से कुछ न कुछ ऐसा गलत-सलत हो जाता है कि कुनबे के मत्थे बदनामी आ ही जाती है और जनता उस कुनबे से यानी सरकार से हाथ जोड़कर कहती है - माई-बाप ,अब आप जाओ, घर बैठो और आराम करो ! हम आपको शोभा-यात्रा के साथ ससम्मान आपके घर तक पहुंचा आएँगे .अब किसी और को आने दो, अगर वह भी अच्छे कार्य करके नहीं दिखाएगा ,तो उसे भी हम गाजे-बाजे के साथ उसके घर तक छोड़ आएँगे ! यह सिलसिला चलता रहता है ! लोकतंत्र इसी का नाम है !
-स्वराज्य करुण
Saturday, April 12, 2014
मौसमी यारों का मौसम !
-स्वराज्य करुण
भीड़-भाड़ , शोरगुल , नारों का मौसम,
आ गया फिर चुनावी बहारों का मौसम !
मंचों में थिरक रहे सिंहासन के सपने ,
आ गया लो मौसमी यारों का मौसम !
मोहक मुस्कान लिये चेहरों का सैलाब है ,
वादों की नदियों के किनारों का मौसम !
कातिल भी आज हमदर्द नज़र आ रहे ,
मुखौटों से सजी -धजी दीवारों का मौसम !
दिन में हर कोई अपने को सूरज कहता है ,
हर रात यहाँ चुनावी सितारों का मौसम !
कहते हैं अपने आप को हम हैं देश-रक्षक ,
लगता है ये नकली पहरेदारों का मौसम !
चैनलों के नलों से बयानों की बौछार है ,
भाषणों की थाल सजे अखबारों का मौसम !
-स्वराज्य करुण
Tuesday, April 8, 2014
सार्वजनिक संचार कम्पनी को जिन्दा चबा जाने की साजिश !
-- स्वराज्य करुण
बी.एस.एन.एल दफ्तर के बाहर लंच टाइम में चाय की दुकान पर इस सार्वजनिक कम्पनी के कुछ कर्मचारी चर्चा कर रहे थे . उनमे से एक कह रहा था -
हमारे देश में सार्वजनिक कम्पनियों को जिन्दा चबाकर खा जाने के लिए निजी कम्पनियां तरह-तरह के घटिया हथकंडे अपना रही हैं .साजिश का ताजा निशाना केन्द्र सरकार की कम्पनी भारत संचार निगम लिमिटेड ( बी.एस. एन .एल) को बनाया जा रहा है . देश के बड़े-बड़े धन-पशुओं की निजी संचार कम्पनियों ने इस सार्वजनिक प्रतिष्ठान को आर्थिक प्रतिस्पर्धा में पीछे धकेलने की ऐसी साजिश रची है कि अब बी.एस.एन .एल के संचार नेटवर्क में हमेशा कई तरह की तकनीकी रुकावटें आने लगी हैं ..अगर आपके मोबाइल फोन में बी.एस .एन .एल का सिम लगा है और आप कमरे के भीतर हैं,तो कई बार उसमे बातचीत के दौरान बीच-बीच में नेट-वर्क का ऐसा व्यवधान होता है कि आप और जिसका फोन आया है वह दोनों परेशान हो जाते हैं , सरकारी संचार कम्पनी (बी.एस.एन.एल ) की छवि धूमिल करने के लिए निजी संचार कम्पनियों के अफसरों ने उच्च स्तर पर उसके कुछ अफसरों को मोटी रकम देकर अघोषित रूप से खरीद लिया है .
चाय की चुस्कियां लेते हुए एक कर्मचारी ने कहा --बी.एस.एन .एल के माइक्रोवेब मोबाइल टावर पहले अधिकाँश शहरों में लगे हुए थे,आज भी हैं, गाँवों में भी इस सरकारी संचार कम्पनी के टावर हुआ करते थे ,आज भी हैं,लेकिन अब निजी संचार कंपनियों के अफसर इस सरकारी संचार कम्पनी के टावरों में तकनीकी खराबी लाने की जुगत में रहते हैं और इसके लिए बी.एस एन.एल के कुछ छोटे-बड़े अफसरों को अप्रत्यक्ष रूप से खरीद लिया जाता है साजिश के तहत बी.एस.एन.एल के नेटवर्क में सर्वर डाउन करवा दिया जाता है .या सर्वर में कुछ खराबी पैदा कर दी जाती है इस वजह से बी.एस.एन.एल के सिम धारक मोबाईल फोन उपभोक्ता को नेटवर्क नहीं मिलता और किसी से बात करते वक्त कट-कट कर बातें होती हैं .झुंझलाहट में वह बी.एस.एन एल को गालियाँ देता है और किसी निजी कम्पनी के सिम लेने की सोचने लगता है और ले भी लेता है .सरकारी संचार कम्पनी के फोन-केबल्स को सडक खोदकर निजी कम्पनियों के लोग खुले आम काट देते है और उस वजह से सरकारी फोन और इंटरनेट सेवाएं ठप्प हो जाती हैं शिकायत दर्ज करवाने पर केबल्स जोड़ने के लिए बी.एस.एन.एल के कई लापरवाह अधिकारी और कर्मचारी धीमी गति से काम करते हैं या कई दिनों तक ध्यान भी नहीं देते .मजबूर होकर सामान्य ग्राहक अथवा सरकारी ग्राहक भी निजी कम्पनियों की तरफ जाने लगता है . इस प्रकार निजी संचार कम्पनियों का मुनाफे का कारोबार तेजी से चलने ही नहीं ,बल्कि दौड़ने लगता है और बी.एस.एन.एल जैसी सार्वजनिक कम्पनी को साल-दर -साल घाटा उठाना पड़ता है .
बगल में बैठे एक अन्य कर्मचारी का कहना था - यह साजिश इस सार्वजनिक कम्पनी के निजीकरण की राह को आसान बनाने के लिए रची गयी है,ताकि करोड़ों -अरबों रूपयों का घाटा दिखाकर सरकारी कम्पनी को किसी निजी कम्पनी के हाथों बेच दिया जाए . सरकारी कम्पनियाँ जनता की धरोहर होती हैं.उन्हें निजी हाथों में सौंपने का अधिकार किसी को भी नहीं होना चाहिए . भारत संचार निगम के कर्मचारी संगठन इस साजिश को और भी ठीक ढंग से बेनकाब करने की तैयारी में हैं .चाय की दुकान पर सुनी गयी इस चर्चा में कितनी सच्चाई है इसका अंदाजा तो बी.एस.एन.एल. की टेलीफोन और मोबाईल फोन सेवाओं की क्वालिटी देखकर आसानी से लगाया जा सकता है. हाथ कंगन को आरसी क्या ? लंच टाइम खत्म हुआ और सभी कर्मचारी अपपने दफ्तर की ओर जाने लगे .
बी.एस.एन.एल दफ्तर के बाहर लंच टाइम में चाय की दुकान पर इस सार्वजनिक कम्पनी के कुछ कर्मचारी चर्चा कर रहे थे . उनमे से एक कह रहा था -
हमारे देश में सार्वजनिक कम्पनियों को जिन्दा चबाकर खा जाने के लिए निजी कम्पनियां तरह-तरह के घटिया हथकंडे अपना रही हैं .साजिश का ताजा निशाना केन्द्र सरकार की कम्पनी भारत संचार निगम लिमिटेड ( बी.एस. एन .एल) को बनाया जा रहा है . देश के बड़े-बड़े धन-पशुओं की निजी संचार कम्पनियों ने इस सार्वजनिक प्रतिष्ठान को आर्थिक प्रतिस्पर्धा में पीछे धकेलने की ऐसी साजिश रची है कि अब बी.एस.एन .एल के संचार नेटवर्क में हमेशा कई तरह की तकनीकी रुकावटें आने लगी हैं ..अगर आपके मोबाइल फोन में बी.एस .एन .एल का सिम लगा है और आप कमरे के भीतर हैं,तो कई बार उसमे बातचीत के दौरान बीच-बीच में नेट-वर्क का ऐसा व्यवधान होता है कि आप और जिसका फोन आया है वह दोनों परेशान हो जाते हैं , सरकारी संचार कम्पनी (बी.एस.एन.एल ) की छवि धूमिल करने के लिए निजी संचार कम्पनियों के अफसरों ने उच्च स्तर पर उसके कुछ अफसरों को मोटी रकम देकर अघोषित रूप से खरीद लिया है .
चाय की चुस्कियां लेते हुए एक कर्मचारी ने कहा --बी.एस.एन .एल के माइक्रोवेब मोबाइल टावर पहले अधिकाँश शहरों में लगे हुए थे,आज भी हैं, गाँवों में भी इस सरकारी संचार कम्पनी के टावर हुआ करते थे ,आज भी हैं,लेकिन अब निजी संचार कंपनियों के अफसर इस सरकारी संचार कम्पनी के टावरों में तकनीकी खराबी लाने की जुगत में रहते हैं और इसके लिए बी.एस एन.एल के कुछ छोटे-बड़े अफसरों को अप्रत्यक्ष रूप से खरीद लिया जाता है साजिश के तहत बी.एस.एन.एल के नेटवर्क में सर्वर डाउन करवा दिया जाता है .या सर्वर में कुछ खराबी पैदा कर दी जाती है इस वजह से बी.एस.एन.एल के सिम धारक मोबाईल फोन उपभोक्ता को नेटवर्क नहीं मिलता और किसी से बात करते वक्त कट-कट कर बातें होती हैं .झुंझलाहट में वह बी.एस.एन एल को गालियाँ देता है और किसी निजी कम्पनी के सिम लेने की सोचने लगता है और ले भी लेता है .सरकारी संचार कम्पनी के फोन-केबल्स को सडक खोदकर निजी कम्पनियों के लोग खुले आम काट देते है और उस वजह से सरकारी फोन और इंटरनेट सेवाएं ठप्प हो जाती हैं शिकायत दर्ज करवाने पर केबल्स जोड़ने के लिए बी.एस.एन.एल के कई लापरवाह अधिकारी और कर्मचारी धीमी गति से काम करते हैं या कई दिनों तक ध्यान भी नहीं देते .मजबूर होकर सामान्य ग्राहक अथवा सरकारी ग्राहक भी निजी कम्पनियों की तरफ जाने लगता है . इस प्रकार निजी संचार कम्पनियों का मुनाफे का कारोबार तेजी से चलने ही नहीं ,बल्कि दौड़ने लगता है और बी.एस.एन.एल जैसी सार्वजनिक कम्पनी को साल-दर -साल घाटा उठाना पड़ता है .
बगल में बैठे एक अन्य कर्मचारी का कहना था - यह साजिश इस सार्वजनिक कम्पनी के निजीकरण की राह को आसान बनाने के लिए रची गयी है,ताकि करोड़ों -अरबों रूपयों का घाटा दिखाकर सरकारी कम्पनी को किसी निजी कम्पनी के हाथों बेच दिया जाए . सरकारी कम्पनियाँ जनता की धरोहर होती हैं.उन्हें निजी हाथों में सौंपने का अधिकार किसी को भी नहीं होना चाहिए . भारत संचार निगम के कर्मचारी संगठन इस साजिश को और भी ठीक ढंग से बेनकाब करने की तैयारी में हैं .चाय की दुकान पर सुनी गयी इस चर्चा में कितनी सच्चाई है इसका अंदाजा तो बी.एस.एन.एल. की टेलीफोन और मोबाईल फोन सेवाओं की क्वालिटी देखकर आसानी से लगाया जा सकता है. हाथ कंगन को आरसी क्या ? लंच टाइम खत्म हुआ और सभी कर्मचारी अपपने दफ्तर की ओर जाने लगे .
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