हम तो चलते जाएंगे नया सवेरा होने तक !
पर्वत -पत्थर आएँगे ही
बहती नदियों के पथ पर ,
लेकिन हम गतिमान रहेंगे
अपने संकल्पों के रथ पर !
रात भले कितनी ही लम्बी क्यों न हो ,
हम नहीं जाएंगे निंदिया के नरम बिछौने तक !
कितनी दूर चले हैं साथी
देखो ज़रा तुम पीछे मुड़ कर ,
गुज़र गयी कितनी ही सदियाँ
इस लम्बे सफर से जुड़ कर !
उत्साह जागने और अलस के सोने तक ,
हम तो चलते जाएंगे नया सवेरा होने तक !
धर्म -जाति की ऊंची-नीची
दीवारों को तोड़ चलें ,
इक-दूजे से मानवता का
आओ नाता जोड़ चलें !
समता के धागे में ममता के मोती पिरोने तक ,
हम तो चलते जाएंगे नया सवेरा होने तक !
स्वराज्य करुण
