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नदियाँ रेगिस्तान हो गयी
पार कहीं भी नांव नहीं है .
नदियाँ रेगिस्तान हो गयी
पार कहीं भी नांव नहीं है .
कोयल की खामोशी देखो
कौए की कांव-कांव नहीं है .
गोधूली की धूल कहाँ अब ,
धूल भरे कहीं पाँव नहीं हैं .
दूध-दही की बात न पूछो
दारू का अभाव नहीं है .
बात-बात पे होते झगड़े
बोल-चाल बर्ताव नहीं है .
लोक -गीत अब नहीं हवा में
चौपालों में अलाव नहीं है.
कहाँ बजे कान्हा की बंशी ,
गोकुल जैसा गाँव नहीं है .
गौरैया भी गायब घर से
आँगन में सदभाव नहीं है .
कब लौटेंगे दिन वो पुराने ,
जिनमें कोई टकराव नहीं है .
स्वराज्य करुण
