Sunday, March 15, 2026

(पुस्तक -चर्चा )हमारे सांस्कृतिक इतिहास की लगभग गुमनाम नायिका पर पहला खण्ड काव्य /आलेख -स्वराज्य करुण

 पुस्तक -चर्चा 

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हमारे सांस्कृतिक इतिहास की लगभग

 गुमनाम नायिका पर पहला खण्ड काव्य 

             (आलेख -स्वराज्य करुण )

भारतीय संस्कृति में पौराणिक पात्रों पर आधारित कहानी, उपन्यास, नाटक और खण्ड -काव्य लिखने की परम्परा तो है, लेकिन ऐसी कृतियाँ कम ही देखने, पढ़ने को मिलती हैं । छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार रूपनारायण वर्मा 'वेणु 'द्वारा रचित अतुकांत शैली का खण्ड -काव्य 'श्रुतकीर्ति' भी ऐसी दुर्लभ कृतियों में से है, जिसका प्रकाशन आज से 44 साल पहले सन 1982 में हुआ था । यह वेणु जी की तीसरी कृति है । यह हमारे देश के सांस्कृतिक इतिहास की एक गुमनाम नायिका पर केंद्रित  पहला खण्ड -काव्य है 


                                          



कवि ने इसे भाव -प्रधान लघु काव्य भी कहा है, जबकि पुस्तक में प्रकाशित कुछ विद्वानों ने अपने अभिमत में इसे मुक्त छंद का खण्ड -काव्य बताया है ।इस भाव प्रधान काव्य के प्रणेता रूपनारायण वर्मा 'वेणु'  अब इस भौतिक दुनिया में नहीं हैं   , लेकिन इस खण्ड -काव्य के माध्यम से वे अपनी एक महत्वपूर्ण कृति को लेकर हमारी यादों में हमेशा बने हुए हैं।वे बहुत सहज -सरल स्वभाव के कवि थे । रायपुर में आज से 105 साल पहले,वर्ष 1921में जन्मे थे । यहीं उनकी साहित्य -साधना 1935 में शुरु हुई थी । आजीवन रायपुर में रहकर ही उन्होंने काव्य सृजन किया। उनकी कई कृतियाँ प्रकाशित हुईं। पहली कृति 'ज्योति निर्झर'  सूक्तियों और लघु कथाओं के संकलन के रूप में वर्ष 1971 में प्रकाशित हुई थी ।इसे नागपुर के विश्वभारती प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया था । दूसरी कृति 'सहस्त्र सुमन ' का प्रकाशन वर्ष 1981 में हुआ था । वेणु जी स्वयं इसके प्रकाशक थे । वेणु जी के गीतों का संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी 'वर्ष 1985 में प्रकाशित हुई थी । उनके खण्ड काव्य 'श्रुतकीर्ति' के साथ ही 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' के प्रकाशक गणेश राम नगर, रायपुर के डॉ. लक्ष्मण बजाज थे । स्थानीय समाचार पत्रों में भी वेणु जी की रचनाएँ समय -समय पर प्रकाशित होती रहती थीं । उनके गीत आकाशवाणी रायपुर से भी प्रसारित हुए. 

   शहर के स्थानीय कवि सम्मेलनों में भी वे शामिल होते थे। गांधी टोपी के साथ खादी का कुरता और खादी की धोती, यही उनका परिधान थाl   वे शहर में पैदल घूमते और अपने मित्रों -परिचितों से, बड़े स्नेह से मिलते जुलते थे । स्थानीय अखबारों के दफ्तरों में भी पैदल जाकर सम्पादकों से मिलते और अपनी कविताएँ दे आते थे  ।   पुस्तक 'श्रुतकीर्ति 'के अंतिम आवरण पृष्ठ में छपे वेणु जी के परिचय में  उनकी तृतीय कृति के रूप में 'श्रुतकीर्ति ' का उल्लेख खण्ड -काव्य के रूप में किया गया है ।यह काव्य -कृति कालजयी महाकाव्य 'रामायण ' के नायक भगवान श्रीराम के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न की धर्मपत्नी श्रुतकीर्ति पर केंद्रित है ।

 पुस्तक में प्रबोधिनी एकादशी, संवत 2038(8 नवम्बर 1981)के दिन अपने 'आत्म -निवेदन 'में वेणु जी ने लिखा -"संस्कृत और हिंदी में रामायण के प्रायः सभी पात्रों पर कवियों ने ग्रंथ -रत्नों की रचना की है, किंतु देवी 'श्रुतकीर्ति' के जीवन और त्याग पर हमारे कविगण मौन रहे । मैंने प्रस्तुत लघुकृति में इसी अभाव की पूर्ति करने का लघु प्रयास किया है ।आशा है, प्रबुद्ध पाठकों को यह रुचिकर ज्ञात होगी ।" आत्म निवेदन में कृति के रचनाकार वेणु जी ने भूमिका लेखन और अपनी सम्मतियाँ देने वाले सभी विद्वानों के प्रति आभार व्यक्त किया है ।

           आवरण के चार पन्नों को मिलाकर यह पुस्तक 54 पेज  की है। इसकी कीमत मात्र चार रूपए रखी गई थी ।प्रथम संस्करण में प्रकाशक द्वारा 1982 में इसकी एक हजार प्रतियाँ क्वालिटी प्रिंटर्स, नया बस स्टैंण्ड, बेमेतरा से छपवाई गईं थीं ।

 इसमें खण्ड -काव्य की नायिका श्रुतकीर्ति से संबंधित कुल 17 सर्ग हैं, जो अतुकांत शैली (मुक्त छंद )की कविताओं में लिखे गए हैं। पहला सर्ग 'वंश -परम्परा' पर है, जिसकी प्रारंभिक पंक्तियों से पता चलता है कि श्रुतकीर्ति राजा जनक के अनुज कुशध्वज नरेश की सुपुत्री थीं।कवि के अनुसार       श्रुतकीर्ति सद्गुण और सत्कर्म, सदधर्म की प्रतीक थी ।

       सीताजी के स्वयंवर के समय राजा जनक ने अपने गुरु ऋषि विश्वामित्र के सामने इच्छा प्रकट की थी कि वे लक्ष्मण का विवाह उर्मिला से, भरत का विवाह मांडवी से और श्रुतकीर्ति का विवाह शत्रुघ्न से करना चाहते हैं।इस पर विश्वामित्र जी ने उन्हें मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद दिया था ।दूसरे सर्ग का शीर्षक 'गुण -वर्णन ' है, इसमें अध्याय में सीता जी के अपहरण के बाद अयोध्या में फैली शून्यता, अशोक वाटिका में राक्षसों के बीच मानवता का प्रतीक बनकर बैठी सीता और उधर अयोध्या में कैकेयी के कृत्य पर कभी -कभी कृद्ध होती श्रुतिकीर्ति और पति -भक्ति में अनुरक्त मांडवी जीवन शैली और मनोदशा का वर्णन है।

 इस अध्याय की अतुकांत रचना के अंत में कवि वेणु जी ने लिखा है -

  *बेचारी श्रुतकीर्ति रात्रि की नीरवता में 

  जीवन की विभीषिका में 

  दीपक की तरह जल रही है.

  उसे अपने कष्ट का कुछ भी 

  अनुभव नहीं है.

  वह लाजवंती की तरह सलज्जा,

  वह चमेली की तरह निर्मला,

  वह चम्पा की तरह तेजस्विनी बनी हुई है*.

तीसरे सर्ग में श्री भरत जी के गुणों की प्रशंसा, चौथे में श्रुतकीर्ति के उदगार, पांचवे में शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति का स्वप्न -वर्णन है  ।चौथे सर्ग में भगवान श्रीराम द्वारा सीता माता के परित्याग की घटना पर श्रुति कीर्ति के उदगार कवि वेणु जी की इन पंक्तियों में व्यक्त हुए हैं -


*आर्य को इस पर विचार करना चाहिए.

जिस सीता ने अग्नि परीक्षा देकर 

अपने सतित्व का प्रखर परिचय दिया,

 उसकी इस तरह की उपेक्षा असहनीय है.

क्या यही न्याय है?

और वह भी आर्य का?

जो सती साध्वी अबला के साथ 

इस तरह का अत्याचार हो ।

राम -राज्य परिषद के सदस्य 

इस दिशा में क्यों मौन बैठे हैं?

जबकि 'मनु स्मृति ' के अनुसार 

बालक, वृद्ध, स्त्री को दण्ड देने का 

विधान नहीं है  ।

फिर सीता ने क्या अपराध किया?

जिन्हें बिना सूचित किए

निर्वासित कर रहे हैं?*


इस अध्याय की अंतिम पंक्तियाँ और भी अधिक मर्मस्पर्शी हैं -


*एक साधारण स्त्री भी 

अपराधिनी क्यों न हो,

उसे भी बिना सूचित किए 

दण्ड नहीं दिया जाता  ।

फिर गर्भवती स्त्री को इस तरह 

दण्ड देना कहाँ का न्याय है?*

श्रुतिकीर्ति इतना कहकर मौन हो गई  ।


मुझे लगता है कि हैण्ड कंपोर्जिंग पद्धति से प्रिंटिंग के दौरान खण्ड काव्य के अध्यायों की नम्बरिंग में थोड़ी असावधानी हो गई होगी, जिससे दो सर्गों -'श्रुतकीर्ति के उदगार' और 'शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति का स्वप्न -वर्णन 'दोनों में एक ही सर्ग का क्रमांक 4 छप गया है, जबकि 'शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति का स्वप्न -वर्णन 'में  सर्ग क्रमांक 5 होना चाहिए । हालांकि *अनुक्रमणिका* में सभी सर्गों के क्रमांक ठीक हैं ।

इस खण्ड -काव्य का छठवाँ सर्ग 'अयोध्या का संताप'शीर्षक से है, जिसे पढ़कर मुझे तो समझ में नहीं आया कि कवि ने ऐसा शीर्षक क्यों दिया है?

इसमें तो इंद्रधनुषी कल्पना श्रुतकीर्ति की तरह सजीव हो उठने, उर्मिला को आनंद की मूर्ति प्राप्त होने, मांडवी की सदभावना भी श्रुतकीर्ति बनकर आने, स्वर्ग का नंदनवन, भारत का कानन -उपवन सौन्दर्य की राज्य -लक्ष्मी को पाकर धन्य होने जैसी पंक्तियाँ हैं । अंतिम पंक्तियों में भी संताप जैसी कोई भावना प्रकट नहीं होती ।

बहरहाल सभी सर्ग पठनीय हैं । सातवाँ सर्ग 'श्रुतकीर्ति के आराध्य देव -शत्रुघ्न ', आठवाँ सर्ग 'उर्मिला -श्रुतकीर्ति संवाद ' और नवमाँ सर्ग 'विश्व -दर्शन ' शीर्षक से है । दसवें सर्ग का शीर्षक  -'भगवान श्री राम और सीता के जीवन पर श्रुतकीर्ति के विचार -दर्शन ', 11वें  का शीर्षक 'श्रुतकीर्ति की तपश्चर्या ', 12वें का शीर्षक 'लक्ष्मण का स्वप्न ', 13 वें का शीर्षक 'उर्मिला का वियोग', 14वें सर्ग का शीर्षक 'गृहस्थ जीवन पर श्रुतकीर्ति के विचार ' 15 वें का शीर्षक अरूंधती -श्रुतकीर्ति संवाद, 16वें का शीर्षक 'जीवन -दर्शन ' और 17वें का शीर्षक 'अंतिम -प्रश्न 'है।

'गृहस्थ जीवन पर श्रुतकीर्ति के विचार 'शीर्षक अध्याय में दरअसल शत्रुघ्न के ही विचार हैं, जो उन्होंने श्रुतकीर्ति के प्रश्नों के उत्तर में व्यक्त किए थे।उदाहरण स्वरूप जब श्रुतकीर्ति ने अपने स्वामी से प्रश्न किया -

"गृहस्थ जीवन कैसे सुखी हो सकता है 

और पत्नी कैसी हो?

तब शत्रुघ्न ने कहा -

देवि! जो स्त्री अपने पति की अभिरुचि का 

रखकर ध्यान कार्य करती है और अभ्यागतों 

एवं अतिथियों का स्वागत -सम्मान करती है,

वही श्रेष्ठ है.

उससे गृहस्थ जीवन सुखी हो सकता है ।

जिस स्त्री और पुरुष के 

विचार और वाणी में एकरूपता हो,

रूप और गुण में समन्वय हो,

उसी का जीवन सुखी हो सकता है,

अन्यथा नहीं ।

विवाह स्त्री और पुरुष के 

जीवन को सुन्दर बनाता है, विकृत नहीं ।

श्रुतिकीर्ति स्वामी के विचारों

 को हृदयंगम कर रही थी ।"

खण्ड काव्य  के अंतिम सर्ग यानी 17वें सर्ग में  श्रुतकीर्ति के मन में उठता यह 'अंतिम प्रश्न'  पाठकों को व्यथित और विचलित करते हुए सोचने विवश सकता है -

   "क्या स्त्री वरदान है 

    या देव और महापुरुषों की जन्म दात्री?

    फिर क्यों उसे अग्नि में दग्ध होना पड़ता है?

    यही एक विचारणीय प्रश्न है,

   जो बार -बार आकाश में 

   प्रतिध्वनित हो रहा है ।


 कवि रूपनारायण वर्मा 'वेणु' ने अपनी यह कृति हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती महादेवी वर्मा को साहित्य, संगीत और कला की त्रिवेणी बताते हुए उन्हें समर्पित की है । 

 वेणु जी की इस काव्य -कृति की भूमिका वरिष्ठ साहित्यकार और छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर के तत्कालीन प्राचार्य सरयूकांत झा ने तीन जून 1980 को लिखी थी,जबकि रायपुर के एडवोकेट श्री जमालुद्दीन  ने 19अक्टूबर 1974 को वेणु जी का परिचय लिखा था ।उनके शब्दों में -"श्री रूपनारायण वर्मा 'वेणु' छत्तीसगढ़ की साहित्य सेवी बिरादरी के एक शोधपरक रचनाकार हैं ।प्रस्तुत रचना उनके अथक परिश्रम का प्रतिफल है।"

वेणु जी की इस काव्य -कृति में केन्द्रीय महाविद्यालय, सारणी, बैतूल (मध्यप्रदेश )के प्राचार्य डॉ. नत्थूलाल गुप्त द्वारा 20 फरवरी 1982 को प्रेषित विचार भी शामिल हैं ।दैनिक 'नवभारत ', नागपुर के साहित्य सम्पादक शिवनारायण द्विवेदी ने 25 फरवरी 1982 को  लिखा -

"बन्धुवर रूपनारायण वर्मा 'वेणु'ने श्रुतकीर्ति ' एक भावप्रधान काव्य मुक्तक छंद में रचकर निःसंदेह हिंदी साहित्य पर बड़ा उपकार किया ।रामायण के नारी पात्रों में 'उर्मिला' को जो महत्व पहले नहीं मिला था, उसे स्वर्गीय राष्ट्रकवि मैथिली शरण जी गुप्त ने तथा उनके बाद डॉ. बल्देव प्रसाद जी मिश्र ने अपनी बहुप्रशंसित रचनाओं में उन महीयसी नारियों का वर्णन कर, सुधी पाठकों के समक्ष उनके शील आदि सदगुणों को खूब उजागर किया था 

।किंतु वीर शत्रुघ्न एवं उनकी जीवनसंगिनी 'श्रुतकीर्ति' के संबंध में अभी तक किसी कवि ने कुछ नहीं लिखा । इसे ध्यान में रखकर श्री 'वेणु 'जी का यह सदप्रयास स्वागत योग्य है ।इस खण्ड काव्य के प्रोढ़ कवि 'वेणु ' ने इस खटकते अभाव की पूर्ति की है। "

इसी तरह बूढ़ापारा रायपुर के डॉ. रविशंकर व्यास नेश्री कृष्ण जन्माष्टमी संवत 2039, मध्यप्रदेश  साहित्य सम्मेलन, रायपुर के उपाध्याय शा. प्र. तिवारी ने 12अप्रैल 1982 को अपने अभिमतों में इस खण्ड -काव्य की प्रशंसा की है । स्टेशन रोड, रायपुर निवासी डॉ. कैलाशचंद्र दास ने लिखा था -" 'श्रुतकीर्ति ' एक भाव प्रधान खण्ड -काव्य है  । यह मुक्त छंद में लिखा गया है।... इस खण्ड -काव्य के द्वारा कवि ने हमारे सामने एक उत्तम नारी -चरित्र को प्रस्तुत किया है, जिससे राम -काव्य की समृद्धि को एक विश्वसनीय बल मिला है ।" 

  पुस्तक के तीसरे आवरण पृष्ठ पर हिन्दी साहित्य परिषद, बेमेतरा के सचिव ठाकुर लव सिंह दीक्षित की सम्मति भी छपी है ।उन्होंने लिखा है -" श्री रूपनारायण वर्मा 'वेणु ' द्वारा रचित 'श्रुतकीर्ति' की पांडुलिपि मैंने पढ़ी ।इसमें अंतर्निष्ठ दार्शनिक विचार अत्यंत अनूठे व अभिनव हैं । श्री वेणु जी का यह प्रयास रामकथा के प्रकाशन में एक नई कड़ी है । भगवान श्रीराम के चरित्र एवं लीला में जितने भी पात्रों ने भाग लिया, उनमें से एक 'श्रुतकीर्ति ' है 

। इनके महान प्रयास 'श्रुतकीर्ति' के पठन से यह स्पष्ट है कि 'श्रुतकीर्ति रामकथा रुपी विशाल भवन में नींव के पत्थर की भांति महत्वपूर्ण किंतु गुप्त है । अत्यंत अभावों में भी सद -साहित्य के सृजन में संलग्न 'वेणु 'जी की 'श्रुतकीर्ति' इनकी भी कीर्ति को अवश्य ही बढ़ाएगी, ऐसा मेरा विश्वास है ।"

  पुस्तक में छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर के तत्कालीन प्राचार्य प्रोफेसर सरयूकांत झा  द्वारा लिखी गई भूमिका के कुछ अंश  इस प्रकार हैं -

*श्री 'वेणु' साकार साधना हैं. इनसे हुई प्रथम भेंट को एक चतुर्थ शती से भी अधिक समय बीत चुका है, पर मैंने इन्हें सदा एक -सा पाया ।जीवन के अतिशय ग्रीष्म के आतप इन्हें झुलसा नहीं पाये और न शीत -लहरों के झोंके इन्हें किसी सुरक्षित स्थान की ओर दौड़ा सके ।सदैव एक रस, शांत! जीवन की कोई निश्चित राह नहीं । कोई बात नहीं, कोई -न -कोई रास्ता तो है । जहाँ तक पृथ्वी है, वहाँ तक चलने वाले व्यक्ति के लिये राह भी है ।कदाचित 'वेणु 'जी का यही विश्वास है ।

*श्री 'वेणु' जी की रचनायें अनंत साधना -पथ को आलोकित करने वाले प्रकाश स्तम्भ हैं । 'श्रुतिकीर्ति ' उनमें से एक है ।निरंतर गतिमान 'वेणु 'जी के काव्य -प्रवाह की अगली सीमा का विश्वास मैंने इनमें पाया है ।कवि मन की सत्याभिव्यक्ति के लिये छटपटाहट मैंने इनमें देखी है ।कवि कोई बड़ी बात कहना चाह रहा है, भाषा अभी उस बात की गहराई को नापने का प्रयास कर रही है ।

* 'श्रुतिकीर्ति ' में अनेक ऐसे स्थल मुझे मिले, जहाँ पहुँचकर पाठक मन अपने में अभिनव कल्पना का स्फुरण पाता है ।वह चिंतन -मनन के लिये विवश हो जाता है । छंदमुक्त सूत्रात्मक शैली में 'वेणु 'जी ने 'श्रुतिकीर्ति ' को लिखा है।मुझे विश्वास है कि सुधी पाठक इसमें मन के विस्तार में प्रवेश पाने का मार्ग अवश्य पायेंगे ।

* अपने सीमित साधन में 'वेणु ' जी जो कुछ करते जा रहे हैं, उस पर हमें बड़ी आस्था है ।उनकी लेखनी अभी चल रही है । मुझे यह आभास मिल रहा है कि कुछ अनुपम, कुछ अनूठा उनके द्वारा निर्मित होने की प्रतीक्षा में है ।*

 

लेकिन अफ़सोस... 'वेणु' जी की इस महत्वपूर्ण कृति के भूमिका -लेखक प्रोफेसर सरयूकांत झा भी  अब इस दुनिया में नहीं हैं और उनकी तरह 'वेणु 'जी की जीवन -यात्रा भी बहुत पहले थम चुकी है। इसलिए 'वेणु 'जी की लेखनी से "कुछ अनुपम, कुछ अनूठा निर्मित होने "  की भूमिका लेखक की प्रतीक्षा अब कभी पूरी नहीं हो पायेगी, लेकिन 'वेणु 'जी की अन्य छपी हुई कृतियाँ हमें ज़रूर उनकी याद दिलाती रहेंगी। 

  उन्होंने मुझे अपने गीत -संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी 'के साथ अपने खण्ड -काव्य 'श्रुतकीर्ति ' की एक सौजन्य प्रति भी 6सितम्बर 1986 के दिन सस्नेह भेंट की थी। इन काव्य -कृतियों से मुझे भी उनकी याद आने लगती है । लगता है कि हमेशा गांधी टोपी और खादी का धोती -कुर्ता पहने, बगल में अपनी किताबों का झोला लटकाए, शहर की सड़कों पर पैदल घूमते हमारे 'वेणु 'जी मुझे भी कहीं न कहीं दिख जाएँगे और मिल जाएँगे ।  लेकिन काश! ऐसा हो पाता! 

      -स्वराज्य करुण 


Saturday, March 14, 2026

( पुस्तक चर्चा )आज़ादी के योद्धाओं की वीर गाथाएँ ; छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर / आलेख -स्वराज्य करुण

       आज़ादी के योद्धाओं की वीर गाथाएँ ;छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर 

                  (आलेख ; स्वराज्य करुण )

छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के लिए  सुशील यदु  आजीवन समर्पित रहे। उन्होंने अपने साहित्यिक मित्रों के सहयोग से वर्ष 1981में रायपुर में छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति की स्थापना की और समिति के कई अधिवेशन तहसील मुख्यालयों और जिला मुख्यालयों में आयोजित किए  ।सुशील यदु की प्रकाशित पुस्तकों में 'लोकरंग' दो भागों में है ।इसमें से पहला भाग छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों पर और दूसरा भाग छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों पर केंद्रित है। सुशील यदु ने 'लोक रंग ' शीर्षक से ही दैनिक 'नवभारत ' में 8 वर्षों तक नियमित रूप से लिखा ।

उनका  छत्तीसगढ़ी व्यंग्य संग्रह 'घोलघोला बिन मंगलू नइ नाचय ' भी काफी चर्चित और प्रशंसित हुआ था ।उनके द्वारा सम्पादित कृतियों में (1)स्वर्गीय हेमनाथ यदु :व्यक्तित्व एवं कृतित्व(2) छत्तीसगढ़ी कविता -संग्रह 'बन फुलवा ' (3) बद्री विशाल परमानंद का गीत -संग्रह 'पिंवरी लिखे तोर भाग ' और स्वर्गीय उधोराम 'झखमार' की हास्य कविताओं का संग्रह 'ररूहा सपनाय दार भात 'भी शामिल है । सुशील व यदु का जन्म 10 जनवरी 1956 को रायपुर में हुआ था और यहीं 23सितम्बर 2017 को उनकी जीवन -यात्रा हमेशा के लिए थम गई ।

                                                

 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इस राज्य के योद्धाओं के योगदान को उन्होंने 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर ' शीर्षक से वर्ष 1989में प्रकाशित अपनी किताब   में कविताओं के रूप में संकलित किया था  ।  छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति रायपुर द्वारा इस पुस्तक के दो संस्करण क्रमशः अगस्त 1989 और नवम्बर 2001में प्रकाशित किए गए थे । यह कवर पेज सहित 60 पेज की है  । मूल्य है 50 रूपए। यह हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्पित छत्तीसगढ़ के वीरों की काव्य गाथा है ।

सुशील यदु के इस छत्तीसगढ़ी कविता -संग्रह में 33 रचनाएँ स्वतंत्रता सेनानियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित हैं, जबकि 34वीं कविता 'बियालिस के आंदोलन ' शीर्षक से है, जिसमें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ़ वर्ष 1942 में हुए भारत छोड़ो आंदोलन में छत्तीसगढ़ के सेनानियों के योगदान को याद किया गया है, वहीं 34वीं और अंतिम कविता 'वंदना गीत ' है, जिसमें भारत माता की वंदना है. छत्तीसगढ़ के जिन स्वतंत्रता सेनानियों की वीरता का वर्णन सुशील यदु ने इस संकलन में किया है उनमें कवि ने सबसे पहले अमर शहीद वीर नारायण सिंह और क्रांतिवीर हनुमान सिंह की संघर्ष गाथाओं को याद किया है  । तीसरी कविता 'सत्रह शहीद साथी ' शीर्षक से है,को 22जनवरी 1858 को रायपुर की सैन्य छावनी में हनुमान सिंह के नेतृत्व में हुए विद्रोह के वीर योद्धाओं को समर्पित है, जिन्हें उनकी देशभक्ति के लिए फाँसी दे दी गई थी । आगामी पन्नों में चौथी रचना उदयपुर (सरगुजा )के क्रांतिवीर शिवराज सिंह, सम्बलपुर (ओड़िशा )के वीर सुरेन्द्र साय को समर्पित की गई है, जबकि छठवीं रचना 'बस्तर विप्लव'में वर्ष 1910 में वहाँ हुए आदिवासी विद्रोह के वीरों का उल्लेख है  । इस विद्रोह को बस्तर के लोकप्रिय राजा रुद्रप्रताप सिंह देव, राजवंश की दीवा पदवी के दावेदार लाल कालेन्द्र सिंह, ग्राम नेतानार के गुण्डाधुर आदि का भरपूर सहयोग मिला था ।ब्रिटिश हुकूमत की गोलिबारी से कई आदिवासी शहीद हो गए थे.इस छंदबद्ध कविता के कुछ अंश देखिए -

   *सन उन्नीस सौ दस साल लड़िन बस्तर के आदिवासी मन,

     विप्लव खातिर हथियार धरिन बस्तर के आदिवासी मन.

     हलबा, भतरा, मुरिया, माड़िया, बड़ शांत, सरल, सीधा -सादा, 

    शोसन, अनीत, अनियाव, अति, उन भड़क गइन अड़बड़ जादा.

    तब गाँव -गाँव जुवाला सुलगिस अउ बस्तर में धधकिस आगी,

    जब रार मचिस विप्लव के, तब जम्मो बस्तर बनगे बागी,*


इस कविता में आगे के एक छंद में बस्तर के निहत्थे बागियों को हथियारबंद फिरंगियों द्वारा गोलियों से भून दिए जाने की घटना की तुलना कवि ने पंजाब के जलियांवाला बाग में हुए हत्याकांड से की है ।

सातवीं कविता छत्तीसगढ़ के गांधी के नाम से लोकप्रिय हुए राजिम के पंडित सुन्दरलाल शर्मा को, आठवीं कविता राजनांदगांव और रायपुर के त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह पर केंद्रित है ।अगले पन्नों में क्रमशः पंडित रविशंकर शुक्ल, शहीद मिन्टू कुम्हार, शहीद रामाधीन गोंड, मौलाना अब्दुल रऊफ 'महवी ', यति यतनलाल, महंत लक्ष्मीनारायण दास और कुंज बिहारी चौबे की गौरव गाथाएँ लिखी गई हैं। इसी कड़ी में 'सिहावा के सिंह -सुखराम नागे' 'बालोद के बाघ -नरसिंह अग्रवाल ', और 'वानर सेना कप्तान -बलिराम 'आज़ाद ' शीर्षक कविताओं में इन वीरों को याद किया गया है।

कवि ने स्वतंत्रता आंदोलन में रायपुर के डॉ. खूबचंद बघेल और धमतरी के बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव सहित नारायण राव मेघावाले और नत्थू राव जगताप के योगदान को भी अपने छंदों में लिपिबद्ध किया है । सुशील यदु की लेखनी ने अपने इस कविता -संग्रह में मदन ठेठवार, बलौदा बाज़ार के राज महंत नैनदास जी, दुर्ग जिले के रामप्रसाद देशमुख,  घनश्याम सिंह गुप्त और विश्वनाथ यादव तामस्कर के सत्याग्रही जीवन को भी अपनी रचनाओं में रेखांकित किया है । 'छत्तीसगढ़ के सुराजी वीरों ' की इन गौरव गाथाओं में शंकर राव गनौदवाले,ग्राम चंदखुरी के अनंत राम बरछिहा,रायपुर के पंडित वामनराव लाखे, यहीं की डॉ. राधाबाई, महासमुन्द तहसील की वीरांगना दयाबाई और अकलतरा (वर्तमान जिला -जांजगीर -चाम्पा )के बैरिस्टर छेदीलाल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भी काव्यात्मक प्रकाश डाला गया है ।

    प्रदेश के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पत्रकार और इतिहासकार स्वर्गीय हरि ठाकुर ने 18मई 1989 को सात पेज में 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर ' की भूमिका लिखी थी । भूमिका की शुरुआत करते हुए वे लिखते हैं - 

-"छत्तीसगढ़ की मिट्टी बड़ी उपजाऊ है । सिंचाई सुविधाओं के अभाव में भी वह धान उपजा सकती है, तो विप्लव के लिए भी उसमें कम उर्वरता नहीं है ।स्वाधीनता के दीर्घकालीन आंदोलन में छत्तीसगढ़ का योगदान, त्याग और बलिदान किसी से कम नहीं है ।प्रस्तुत पुस्तक में श्री सुशील यदु ने ऐसे ही स्वातंत्रय -वीरों की गाथाओं की गूँथकर काव्य -माला तैयार की है ।"

हरि ठाकुर आगे लिखते हैं - त्यागवीर और संघर्षशील पुरुष ही वीर -गाथाओं के नायक होते हैं । किन्तु वीर -गाथाओं के गायक भी किसी नायक से कम नहीं होते ।चंदबरदाई और भूषण इसी श्रेणी के नायक हैं ।छत्तीसगढ़ी लोक -काव्य में वीर गाथाएँ राउतों और देवारों के गीतों में संरक्षित हैं ।वीर काव्य हमें त्याग, बलिदान, निर्भयता और साहस की प्रेरणा देते हैं ।छत्तीसगढ़ के सुराजी वीरों ने स्वतंत्रता के लिए जो संघर्ष किया, उसके पीछे उनका महान त्याग और बलिदान है ।उनके महान चरित्रों का गुणगान ही इस काव्य -कृति का लक्ष्य है ।जो जाति अपने पुरखों के पुरुषार्थ को विस्मृत कर देती है, उसे आत्मग्लानि और हीन भावना का शिकार बनना पड़ता है । अपने महान पुरुषों को स्मरण करने के लिए यह कृति हमें अवसर प्रदान करती है ।

    अपनी लम्बी भूमिका में हरि ठाकुर ने छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुई महत्वपूर्ण क्रांतिकारी घटनाओं का भी उल्लेख किया है ।उन्होंने अंत में लिखा है -"इतिहास को काव्यबद्ध करना आसान काम नहीं है । इस कठिन काम को श्री सुशील यदु ने अंजाम दिया है, वह सराहनीय है ।अपने विषय के प्रति उनका अध्ययन गहरा, दृष्टिकोण स्पष्ट तथा राष्ट्रीयता से ओत -प्रोत है । छत्तीसगढ़ी में अपने ढंग का यह पहला प्रयास है ।मुझे विश्वास है कि अन्य कवि भी इस दिशा में आगे आयेंगे और काव्य के सुरुचिपूर्ण माध्यम से अपने गौरवपूर्ण इतिहास को अमरत्व प्रदान करेंगे ।" हरि ठाकुर ने भूमिका में सुशील यदु को उनकी काव्य प्रतिभा और उत्कृष्ट विषय चयन के लिए बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की थी, लेकिन अफ़सोस कि वे दोनों ही हमारे बीच नहीं हैं ।

  सुशील यदु की काव्य -कृति 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर ' में 'दू शब्द ' शीर्षक से स्वर्गीय ललित मोहन श्रीवास्तव के विचार भी प्रकाशित हैं । उन्होंने लिखा था -"इस छत्तीसगढ़ी काव्य गाथा की भूमिका हम सबके परिचित भाई हरि ठाकुर ने लिखी है उन्होंने लिखा था -"इस छत्तीसगढ़ी 'काव्य गाथा ' की भूमिका हम सबके परिचित भाई हरि ठाकुर ने लिखी है । यह भूमिका इस पुस्तक की कुंजी है, जो इस क्षेत्र के स्वातंत्रय -समर के इतिहास में हमें 'प्रवेश 'दिलाती है  ।  1947 के उपरांत जन्मी पीढ़ी को यह भूमिका वह सब याद दिलाजीव, जो वह भूलती जा रही है  ।इसके बाद आती है श्री सुशील यदु की अपनी बात  ।स्वाधीनता संग्राम के इतिहास की जानकारियों के लिये श्री हरि ठाकुर उनके प्रमुख प्रेरणा स्रोत रहे  ।सुशील यदु का अपना योगदान स्वतन्त्रता संग्रामियों के पद्यात्मक प्रस्तुतिकरण में है ।जाहिर है कि ऐसे प्रयास में कुछ योद्धा (जैसे नगरी के श्याम लाल सोम )छूट जा सकते हैं  ।किन्तु लेखक ने अधिकांश स्वतंत्रता सेनानियों के साथ न्याय किया है  ।प्रथम प्रयास की दृष्टि से यह इस पुस्तक की उपलब्धि है । मैं सुशील यदु को बधाई देना चाहता हूँ कि उन्होंने मिन्दू कुम्हार, रामाधीन गोंड जैसे उपेक्षित नामों को शीर्षकों में जगह दी"

   आज सुशील यदु इस दुनिया में मौज़ूद नहीं हैं, हरि ठाकुर और ललित मोहन श्रीवास्तव भी इस भौतिक संसार से जा चुके हैं, लेकिन इस कृति में उनका लिखा हुआ बहुत कुछ हमारे सामने है, जिसे पढ़कर हमें उनकी याद आती रहेगी  ।  इन तीनों सरस्वती -पुत्रों को विनम्र नमन  ।  बहुत पहले ही 'छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर 'भी अपनी -अपनी यादगार भूमिकाएँ निभा कर इस धरती को छोड़ चुके हैं । उन वीरों को भी विनम्र श्रद्धांजलि  ।  सुशील यदु ने इसी शीर्षक की अपनी इस काव्य -कृति में उनसे जुड़ी स्मृतियों को हमसे जोड़कर रखने का सार्थक प्रयास किया है   ।   किसी भी देश या प्रदेश के इतिहास और साहित्य को, वहाँ की संस्कृति को हमेशा याद रखने के लिए ऐसा रचनात्मक प्रयास बहुत महत्वपूर्ण होते हैं  ।

-स्वराज्य करुण 

Tuesday, March 10, 2026

(कविता ) बोलो, तानाशाह ! तुम कब मरोगे (कवि -स्वराज्य करुण )

 बोलो तानाशाह ! तुम कब मरोगे ?

 (कविता : स्वराज्य करुण )

        *****

जब मरोगे तब 

कितनी ज़मीन, कितने जंगल 

कितनी नदियाँ, कितने पहाड़ 

कितनी खदानें और कितने 

देश अपने साथ लेकर 

दुनिया से जाओगे?

बोलो,  तानाशाह!

क्या  तुम्हें शर्म नहीं आती ,

जो निरीह ,निःशस्त्र मनुष्यों की हत्या 

करवाके भी बड़ी बेशर्मी से  

अपनी पथराई आँखों और 

ख़ून के प्यासे होठों  से

मुस्कुराते रहते हो ? 

तुम्हारी सेनाएं छोटे -छोटे देशों के 

शहरों ,कस्बों और गाँवों पर बमों की 

बरसात करके मासूम बच्चों को

अनाथ कर जाती हैं ।

हवाई हमलों के जरिए 

चहल -पहल से भरी मानव बस्तियों 

को बदल देती हैं श्मशानों में!

तुम्हारे सैनिक आकाश मार्ग से

जमीन पर उतरकर तुम्हारे आदेश पर 

महिलाओं ,बच्चों ,जवानों और 

बुजुर्गों को बेरहमी से मार डालते हैं! 

वो जब मनुष्यों पर इतना ज़ुल्म ढाते हैं 

तो फिर वहाँ उनके जुल्मों के 

आगे  मूक ,निरीह जानवरों ,

चहकते पंछियों और 

हरे भरे वृक्षों , जल से भरी नदियों , 

का क्रंदन कौन सुनेगा ?

तुम्हारे हमलावर फौजियों के 

खूनी पंजों में छटपटाती 

प्रकृति का रुदन कौन सुनेगा ?

तानाशाह फिर भी अपने 

वातानुकूलित 'वार रूम ' में 

बैठ कर तबाही के खूनी नज़ारों को , 

कत्ल होती इंसानियत को 

ठंडी हवाओं के बीच

शराब की चुस्कियों के साथ 

रुपहले स्क्रीन पर देखते हुए 

मुस्कुराते रहते हो,

नाचते, गाते, मस्ती करते रहते हो !

बमों के धमाकों और बारूद से 

भरे आसमान को देखकर भी 

नहीं दहलता तुम्हारा दिल !

रोते बिलखते बच्चों और

बदहवास माताओं को स्क्रीन पर 

देखकर भी नहीं पसीजता तुम्हारा दिल !

बोलो तानाशाह !

क्या तानाशाहों को 

कभी रोना नहीं आता ? 

क्या तानाशाहों के माँ -बाप,

बीवी -बच्चे,भाई -बहन और 

घर -परिवार नहीं होते?

दुनिया से इंसानी ज़िन्दगी को  

मिटाने पर आमादा तानाशाह ! 

क्या तुम्हें आत्मग्लानि नहीं होती ?

तुम्हें तो शर्म से और पीड़ितों की 

आहों से मर जाना चाहिए !

बोलो ,तानाशाह!तुम कब मरोगे ?

जल्दी मरो...!

हम तुम्हारी मौत की कामना करते हैं।

-- स्वराज्य करुण

Sunday, March 8, 2026

(आलेख )भूले -बिसरे कवि वेणु जी से जुड़ी कुछ यादें /लेखक -स्वराज्य करुण

 'तुम वीणा मैं बांसुरी' और 'श्रुति कीर्ति' 

 जैसी कई कृतियों के रचनाकार थे वेणु जी 

       आलेख  - स्वराज्य करुण 

क्या आप रूपनारायण वर्मा 'वेणु 'को जानते हैं? छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बिरादरी में नई पीढ़ी के अधिकांश कवियों और साहित्यिक अभिरुचि के लोगों ने उनका नाम भी शायद नहीं सुना होगा । वे बहुत सहज -सरल और सौम्य स्वभाव के कवि थे । रायपुर में आज से 105 साल पहले,वर्ष 1921में जन्मे थे । यहीं उनकी साहित्य -साधना 1935 में शुरु हुई थी । आजीवन रायपुर में रहकर ही उन्होंने काव्य सृजन किया। उनकी कई कृतियाँ प्रकाशित हुईं. शहर के साहित्यिक आयोजनों में भी वे शामिल होते थे। उन दिनों शहर इतना अधिक फैला हुआ नहीं था । सड़कों पर आज की तरह लोगों की और तरह -तरह की तेज रफ्तार मोटर गाड़ियों की भयंकर भीड़ नहीं होती थी। 

सड़कें चौड़ी भले ही कम थी, लेकिन खुली -खुली -सी लगती थीं।लोग एक मोहल्ले से दूसरे या तीसरे मोहल्ले तक बड़े आराम से साइकिलों पर या पैदल ही आया -जाया करते थे।मुझे कुछ -कुछ याद है,नाटे कद के वेणु जी गांधी टोपी और खादी का धोती -कुर्ता पहनकर पैदल ही  शहर का भ्रमण करते हुए अपने मित्रों और परिचितों से बड़ी आत्मीयता से मिलते थे।वे पैदल ही स्थानीय दैनिक अख़बारों के दफ्तरों में जाकर सम्पादकों को अपनी कविताएँ दे आते थे। स्थानीय वरिष्ठ जनों में भी उनका बड़ा सम्मान था, लेकिन समय की तेज रफ़्तार ने उन्हें भुला दिया ।


                                             


ऐसे समर्पित साहित्य साधक,  भूले -बिसरे कवि रूपनारायण वर्मा 'वेणु ' के 52 छोटे -बड़े गीतों का संकलन 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' का प्रकाशन 41साल पहले विजयादशमी के दिन 23अक्टूबर 1985 को हुआ था। उन्होंने  6 सितम्बर 1986 के दिन मुझे यह किताब और  अपने खण्ड काव्य 'श्रुतिकीर्ति 'की एक सौजन्य प्रति भी सस्नेह अपने हस्ताक्षर के साथ भेंट की थी । इस खण्ड काव्य के अंतिम आवरण पृष्ठ पर वेणु जी के फोटो के साथ उनका साहित्यिक परिचय भी प्रकाशित हुआ है ।सूक्तियों और लघु कथाओं का उनका संकलन 'ज्योति निर्झर'  वर्ष 1971 में प्रकाशित हुआ. यह उनकी पहली प्रकाशित कृति थी, जिसे नागपुर के धनवटे चेम्बर्स, सीतावर्डी स्थित विश्व भारती प्रकाशन ने प्रकाशित किया था।

उनकी दूसरी कृति ' सहस्त्र सुमन ' वर्ष 1981 में छपी , जिसके प्रकाशक वे स्वयं थे ।

वेणु जी की तीसरी पुस्तक खण्ड काव्य 'श्रुति कीर्ति 'का प्रकाशन वर्ष 1982 में हुआ, जिसके प्रकाशक गणेशराम नगर, रायपुर के डॉ.लक्ष्मण बजाज थे।कवि ने इसे भाव प्रधान काव्य के रूप में लिखा है। उनके परिचय में इसे  खण्ड -काव्य भी बताया गया है, जो भगवान श्रीराम के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न की धर्मपत्नी श्रुतिकीर्ति पर केंद्रित है और मुक्त छन्द में है. उस पर फिर कभी  अलग से लिखूँगा ।अभी तो वेणु जी के गीत -संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' की चर्चा करना चाहता हूँ ।

     वेणु जी ने अपना यह गीत -संग्रह  गुरुदेव  रवीन्द्र नाथ ठाकुर की पावन स्मृति को समर्पित किया है।   इस गीत -संकलन के प्रकाशक, प्रचारक और वितरक 'वेणु' जी के मित्र गणेशराम नगर, रायपुर के डॉ. लक्ष्मण बजाज थे । यह पुस्तक 60 पेज की है । उन दिनों इसकी कीमत केवल छह रूपए थी । 

    

  *वेणुजी रस सिद्ध कवि थे* 

                     ******

     उनके इस गीत -संकलन  में 'पुरोवाच ' लिखा है पीएच -डी. और डी. लिट. की उपाधि प्राप्त डॉ. विष्णुप्रसाद पाण्डेय ने,  जो  उन दिनों शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, दुर्ग में हिन्दी के प्राध्यापक हुआ करते थे। उन्होंने  लिखा है -"वेणु जी ने छायावादी रोमांटिक कविता के माध्यम से साहित्य -संसार में प्रवेश किया और प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, रहस्यवाद तथा मांसलवाद की धाराओं में अपनी कविता का ताना -बाना बुनते आ रहे हैं ।.... वेणु जी में जनजीवन की ज्योति का चितेरापन है। उनके अन्तः करण में भावमयी सरिता की स्नातकता है ।.... वेणु जी रस सिद्ध कवि हैं।वेणु जी की इन कविताओं में जान है और वे उदात्त संरचनाओं की परम्परा की रक्षा करती हैं । 

        *मैं अपना परिचय क्या दूँ?*

         गीत -संग्रह 'तुम वीणा मैं बांसुरी ' में अपने परिचय के अंतर्गत वेणु जी लिखते हैं -

    "मैं अपना परिचय क्या दूँ ? मैं उस वीणा वादिनी की वीणा का तार हूँ, जिसमें जीवन के स्वर निकलते हैं।तुम उस युग की वंशी हो, जिसमें कई छिद्र हैं। उस जगत जननी भगवती माँ भारती की सेवा का ही प्रत्यक्ष फल है, जो मैं आप लोगों के बीच रहकर प्रति वर्ष उस कल्याणी माँ को एक पुष्प चढ़ाता हूँ, जिसके रजकण के प्रताप से मेरे  निरगंध फूल सुरभित हो उठते हैं ।....कवि  लिखते हैं -मेरे जीवन की अंतिम इच्छा यह है कि मेरे जीते जी मेरी सभी कृतियाँ प्रकाश में आ जाएँ।भारतीय परम्परा के अनुसार जीवित व्यक्ति का मूल्यांकन बहुत कम होता है, लोग मृत्यु होने की बाट देखते रहते हैं ।मेरी कृतियाँ मेरी हृदयतंत्री की आवाज़ है, जिसमें जीवन के सूक्ष्म तत्वों के दर्शन होंगे । वीणा बजाने वाला कुशल होना चाहिए । हे जगत नियन्ता! तुम वीणा हो और मैं श्याम सुन्दर की हूँ वेणु, जिसमें गोपियाँ तथा गोप भी हृदय तंत्री निहित हैं ।' तुम वीणा मैं बांसुरी' मानव जीवन को विकसित करने में समर्थ होगी, ऐसा पूर्ण विश्वास है ।   

-विनयावत -रूपनारायण वर्मा वेणु "

 वहीं ' उन्होंने स्वयं को 'माँ भारती के कंठहार का पुष्प' बताते हुए 'आत्म निवेदन ' शीर्षक एक अन्य वक्तव्य में लिखा है -"उस वीणा वादिनी के श्रीचरणों से सुवासित 'तुम वीणा मैं बांसुरी '(भाव प्रधान गीत संकलन )रख रहा हूँ, जिसमें जीवन के तथ्य एवं सूक्ष्म तत्वों पर विचार किया गया है ।  मेरी इस भाव प्रधान कृति में जीवन दर्शन और प्रकृति सौन्दर्य के सूक्ष्म तत्व विद्यमान हैं । उन्होंने इस पुस्तक में भूमिका लेखन के लिए डॉ. विष्णु प्रसाद पाण्डेय, परिचय लेखन के लिए प्रतिभा गुप्ता, सम्मति लेखन के लिए प्रतिभा तिवारी, आवरण और चित्र सज्जा के लिए अपने मित्र दीनदयाल सोनी सहित सभी सहयोगियों और मार्ग प्रदर्शक साहित्यकारों के प्रति आभार व्यक्त किया है ।

   बहरहाल, अब हम वेणुजी के इस गीत -संकलन में प्रकाशित  रचनाओं को देखें । इनमें कवि ने अपने मनोभावों के जरिए आशा -निराशा और हर्ष -विषाद सहित मानव जीवन के अनेक रंगों का समावेश किया है ।उनका पहला गीत 'वीणा वादिनी 'शीर्षक से देवी सरस्वती को समर्पित है । 

पृष्ठ 2पर प्रकाशित उनके दूसरे गीत में छायावादी स्वर की अनुगूंज है -

*मैं तुम्हारा दीप बनकर जल रहा हूँ । 

  निशा जाती मुझको लेकर,

  मैं तड़फता तुमको देखकर,

  तुम चले हो अस्ताचल को,

  मैं भी बुझता जा रहा हूँ । *


आगे की रचनाओं में से एक आज के समाज में व्याप्त नारी -उत्पीड़न और भूख से तड़फते इंसानों को लेकर है. इन गंभीर समस्याओं से आहत वेणु जी का कवि -हृदय अपने  संकलन के पृष्ठ 3पर कहता है -

     *मानव मिला न अब तक कोई 

       जो मानव कहलाए । 

       एक नारी की लाज लुट रही,

       एक खड़ी मुस्काये । 

       हँस -हँस फूल लुटाये साजन,

       एक पड़ा कुम्हलाये । 

       एक दारुण दुःख से तड़फे,

       एक खड़ा मुस्काये । 

        एक तरसता दाने -दाने,

       एक अन्न को ठुकराये । 

        जो जग की आँखों का काँटा था,

        वह फूल बन मुस्काये । 


संकलन के पृष्ठ 16 में एक छोटा -सा गीत हमें जीवन के संघर्षो को, दुःख -दर्दो को हँसते हुए झेल जाने की सीख देता है -

    *मैंने तो हँसना सीखा है । 

     दुःख -दर्दों को झेल -झेल कर 

      आगे बढ़ना सीखा है । 

      आई आँधी मुझे गिराने 

     आया शीत मुझे कँपाने,

     गिर -गिर उठना सीखा है ।* 

  

वेणु जी का कवि इस संसार को छल से भरा मानता है । पृष्ठ 19 में प्रकाशित गीत में यह भावना प्रकट होती है -

*छल भरा संसार तेरा,

 रूप में छल, मृत्यु में छल,

 जीवन हो गया मेरा गरल,

  दुःख भरा संसार तेरा । 

 मैं तुम्हारे रूप में मिल रहा हूँ,

 मैं तुम्हारी याद में घुल रहा हूँ,

  छल भरा अभिसार तेरा । 


गीत संग्रह के पृष्ठ 17 में छपी अपनी रचना में कवि की भावनाओं को महसूस कीजिए -

   * तुम मुझे पाषण रहने दो । 

    मुझे जीवन न दो,

     मुझे सूरत न दो,

    मेरा अभिमान रहने दो । 

    मेरा संसार है मंगल,

    मेरा व्यवहार है उज्ज्वल,

    मेरी वाणी है निश्छल,

   उसे तुम रस में भरने दो । 

    तुम्हारे प्यार में छल है,

    तुम्हारा जीवन छलमय है,

    मुझे तुम दूर रहने दो । 

     मुझे वरदान नहीं होना,

     मुझे श्रृंगार नहीं होना,

     मैं उस रूप का अनुगामी,

    मुझे तुम उसमें मिलने दो । *


संकलन के पृष्ठ 28 में 'गोस्वामी तुलसीदास जी के प्रति' और पृष्ठ 30 में  महाकवि 'निराला 'जी के प्रति ' शीर्षक गीत में दोनों महाकवियों के सम्मान में वेणु जी ने अपनी भावनाएँ व्यक्त की हैं । पृष्ठ 33 में  'बसंत के प्रति 'शीर्षक से प्रकाशित गीत में विरह वेदना से पीड़ित नायिका बसंत के वातावरण में अपनी सखी से बातचीत करते हुए अपनी मनोव्यथा प्रकट करती है  । इस गीत का प्रारंभिक अंश -

*नभ में लाली क्यों दौड़ रही,

बताओ सखी मुझको आकर,

मैं दिन -रात सुखूं हे आली,

वे आये न अपने निज गृह पर । 

सखी बोली -सुन हे तू प्यारी,

है जंगल में ऋतु बसंत,

चंदा जो हँसता आज यहाँ,

वह भी भूला है राग -रंग  । *


वेणु जी पृष्ठ 35 पर प्रकाशित  अपने 40 वें गीत में हताश -निराश मनुष्य का मनोबल बढ़ाते हुए कहते हैं -

  *अमृत पुत्र होकर भी तुम 

     क्यों अंगारों से डरते हो । 

     कितने युद्ध तुम देख चुके,

     कितने देखोगे जीवन में  । 

     कितने कंटक पथ पार किये,

     कितनी विपदा आई मग में  । 

     मैं उसी भस्म का बना हुआ,

     जिसको शिव रोज चढ़ाते हैं  । 

     मरघट में खुशी मनाते हैं,

    तुम उसी शिवा के अग्नि नेत्र,

    फिर क्यों उनसे डरते हो  । *


कवि रूपनारायण वर्मा 'वेणु ' के गीत आकाशवाणी रायपुर से भी प्रसारित हुए थे।समय -समय पर अनेक पत्र -पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें दैनिक नवभारत, नईदुनिया,देशबन्धु, युगधर्म, महाकोशल, अक्षत, मध्यप्रदेश संदेश, आयुर्वेद -विकास, धन्वंतरि, सुधा निधि, आयुर्वेद महासम्मेलन पत्रिका आदि शामिल हैं, जिनमें उनके गीतों, लघु कथाओं और लेखों का प्रकाशन हुआ।आयुर्वेद से संबंधित पत्रिकाओं में उनकी रचनाओं के प्रकाशन से ऐसा लगता है कि देश की इस अत्यंत प्राचीन चिकित्सा पद्धति में भी उनकी गहरी दिलचस्पी रही होगी, हालांकि इस बारे में उनसे पूछने का मौका मुझे नहीं मिला।

   छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बिरादरी  उम्मीद की जानी चाहिए कि वह अपने भूले -बिसरे कवि वेणु जी को याद रखने के लिए उनकी अप्रकाशित रचनाओं की खोज -ख़बर लेकर उन्हें प्रकाशित करने का प्रयास करेगी।जो समाज अपने साहित्यकारों को और उनके साहित्य को याद रखता है, उस समाज की मानवीय संवेदनाएँ भी बनी रहती हैं और सामाजिक समरसता के साथ उसकी संस्कृति भी सुरक्षित रहती है।

-स्वराज्य करुण 

Saturday, March 7, 2026

(आलेख ) श्री राम चरित मानस के 'अरण्य काण्ड ' और 'सुन्दर काण्ड 'का हुआ उड़िया अनुवाद /लेखक -स्वराज्य करुण )

 

छत्तीसगढ़ के बाबा विष्णु शरण 65 साल पहले 

कर चुके थे  उड़िया भाषा में सम्पूर्ण 'मानस 'का अनुवाद 

           (आलेख  -स्वराज्य करुण )

गोस्वामी तुलसीदास के अवधी में रचित महाकाव्य श्रीरामचरित मानस की लोकप्रियता बहुत दूर तक फैली हुई है. छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार स्वर्गीय बाबा विष्णु शरण ने इस महाकाव्य के तृतीय सोपान 'अरण्य काण्ड ' और पंचम सोपान 'सुन्दर काण्ड ' का ओड़िया भाषा में अनुवाद किया था, जो उनके निधन के लगभग 37 साल बाद वर्ष 2024 में प्रकाशित हुआ. दोनों अनुवाद देवनागरी लिपि में छपे हैं. वैसे तो बाबा विष्णु शरण ने आज से 65 साल पहले वर्ष 1961में श्री रामचरित मानस का उड़िया में शाब्दिक अनुवाद कर लिया था, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के कारण प्रकाशन संभव नहीं हो पा रहा था.

                              

               


इसमें से इन दो सोपानों को बसना (जिला -महासमुन्द )स्थित मानव मंगल संस्थान ने प्रकाशित किया है.बाबा के प्रमुख शिष्य और संस्थान के अध्यक्ष नारायण प्रसाद नैरोजी ने दोनों पुस्तकों में 'दो शब्द ' शीर्षक अपने वक्तव्य में लिखा है कि बसना क्षेत्र से बाबा (विष्णु शरण जी )का विशेष लगाव रहा, बाबा ने इस क्षेत्र की उड़िया भाषा भाषी जनता को श्रीमद गोस्वामी तुलसीदास विरचित रामचरित मानस के जीवन दर्शन, भक्ति और ज्ञान से लाभान्वित करने के लिए उड़िया भाषा में सन 1961में उसका शब्दशःछन्दबद्ध अनुवाद किया था, जिसे प्रकाशित कर आम जनता में वितरित करनाचाहते थे.परन्तु अर्थाभाव के कारण यह संभव नहीं हो सका. अब उनकी स्मृति में स्थापित मानव मंगल संस्थान, बसना द्वारा छत्तीसगढ़ सर्व उड़िया समाज के अध्यक्ष एवं रायपुर उत्तर के विधायक श्री पुरन्दर मिश्रा जी के सौजन्य से सिर्फ़ ' सुन्दर काण्ड ' का प्रकाशन किया जा रहा है. हमें विश्वास है कि उड़िया भाषा भाषी भक्तगण इसे गाकर, पाठ कर हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त कर सकेंगे. इसी कड़ी में 'अरण्य काण्ड' में ' दो शब्द 'शीर्षक अपने वक्तव्य में श्री नैरोजी ने लिखा है कि डॉ. संध्या राजेन्द्र राघवेन्द्र भोई, सरायपाली तथा नैरोजी परिवार, देवरी (पिलवापाली )एवं गणेशपुर के सौजन्य से सिर्फ़ 'अरण्य काण्ड ' का प्रकाशन किया जा रहा है. हमें विश्वास है कि उड़िया भाषा भाषी भक्तगण इसे गाकर, पाठकर भक्ति पथ पर अग्रसर होंगे.

         

                                                     



                                     *कवि, लेखक और पत्रकार भी रहे विष्णु शरण*

                                                     *****

      उल्लेखनीय है कि बाबा विष्णु शरण छत्तीसगढ़ के धीर -गंभीर सर्वोदयी विचारक,अध्यापक, वरिष्ठ कवि,लेखक और पत्रकार थे. उनका जन्म बसना क्षेत्र के ग्राम पझरापाली में 19 सितम्बर 1919 को हुआ था. अपनी 69 वर्षीय जीवन यात्रा को अपने साधना कुटीर बसना में 7नवम्बर 1988 को पूर्ण विराम देकर वे ब्रम्हलीन हो गए .  उनके हिन्दी कविता संग्रहों में वर्ष 1986 में प्रकाशित 'पंचविंशिका', वर्ष 1988में प्रकाशित 'युगे -युगे ' और ' प्राणाधिके' शामिल है. इन तीनों संग्रहों के प्रकाशक श्री गोपेश्वर प्रसाद नैरोजी हैं.बाबा विष्णु शरण के देहावसान के कुछ महीनों बाद मई 1989 में 'यमुना तीरे 'का प्रकाशन हुआ, जबकि 35 साल बाद वर्ष 2023 में उनका एक और हिन्दी कविता -संग्रह 'धीर -समीरे ' वैभव प्रकाशन, रायपुर द्वारा प्रकाशित किया गया.बाबा जी के गहन दार्शनिक और आध्यात्मिक आलेखों के संकलन 'ज्ञान गंगा ' का प्रकाशन  उनके निधन के करीब 5साल बाद सितम्बर 1993 में मानव मंगल साधना संस्थान, बसना द्वारा किया गया. इसमें प्रकाशित जीवन परिचय में उनके शिष्य नारायण प्रसाद नैरोजी ने बताया  है कि बाबा विष्णु शरण वैष्णव वंशी थे. उनके पिता भरत दास उड़िया भाषा के कुशल कवि और हिन्दी साहित्य के विदग्ध मर्मज्ञ थे. अनुताप तरंग, गौर संकीर्तन, मंगलास्तव, संबलेश्वरी जणाण, कृष्ण -सुदामा पांडवंकर भातृ -प्रेम आदि उड़िया में इनकी जन -प्रिय पुस्तकें हैं. 

      हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से साहित्य रत्न की उपाधि प्राप्त बाबा विष्णु शरण रायपुर के शासकीय नार्मल स्कूल में अध्यापक भी रहे. उन्हें   महात्मा गांधी की बुनियादी शिक्षा योजना का रायपुर जिला संयोजक भी बनाया गया था. अध्यापन कार्य के प्रशिक्षण के लिए वे गांधीजी के सेवाग्राम वर्धा में भी रहे, जहाँ महात्मा गांधी के जीवन -दर्शन का उन पर गहरा असर हुआ. सेवाग्राम में उन्हें महात्मा गांधी सहित दादा कृपलानी, आर्य नायकम, कुमारप्पा आदि कई विद्वानों का भी सानिध्य मिला. 

         बाबा विष्णु शरण ने रायपुर में वर्ष 1950 में  ठाकुर प्यारेलाल सिंह  के अर्ध -साप्ताहिक 'राष्ट्रबन्धु' में सहयोगी सम्पादक के रूप में पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपनी अहम भूमिका निभाई. वर्ष 1959 -60 में बाबा विष्णु शरण को रायपुर जिला सर्वोदय मंडल का जिला संयोजक बनाया गया. इस महत्वपूर्ण दायित्व का भी उन्होंने बखूबी निर्वहन किया. उनकी लोकप्रियता सिर्फ़ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं थी, बल्कि मध्यप्रदेश के इंदौर, उज्जैन और सोनकच्छ तक उनकी प्रसिद्धि का विस्तार हुआ.उनके कविता -संग्रहों 'प्राणाधि के ' और 'युगे -युगे ' का लोकार्पण 21 मई 1988 को इंदौर में हुआ. लोकार्पण समारोह विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के हिन्दी विभाग और हिन्दी साहित्य समिति इंदौर द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था.बाबाजी अपने शिष्यों के आग्रह पर 29 नवम्बर 1986 से 16 जनवरी 1987 तक इंदौर प्रवास पर थे. इस दौरान उनके प्रथम कविता -संग्रह 'पंचविंशिका'का लोकार्पण हिन्दी विभाग,विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के सौजन्य से सम्पन्न हुआ.

   छत्तीसगढ़ का बसना उनका कार्यक्षेत्र रहा.  वे बसना के अपने 'साधना कुटीर ' में  आम जनता की समस्याओं को सुनकर उन्हें हल करने के लिए मार्ग दर्शन देते हुए मददगार की भूमिका में भी रहते थे. उनका साहित्य सृजन भी इसी 'साधना कुटीर ' में चलता रहता था, जो आज भी उनके चाहने वालों के लिए आस्था का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है.

      -स्वराज करुण


Thursday, March 5, 2026

(कविता ) यह कोई देशभक्ति नहीं / कवि -स्वराज्य करुण

 यह कोई देशभक्ति नहीं 

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( स्वराज करुण )

हम और आप मनाते रहे 

रंगों का त्यौहार होली 

और उधर कोई ख़ून की होली 

खेल कर उजाड़ता रहा 

हम जैसे करोड़ों लोगों की 

रंग -बिरंगी ज़िन्दगी.

हमसे बहुत दूर उस देश की

धरती पर सिसकती रही मानवता 

बिलखती रही माताएँ,

बिलखती रही बहनें,

बिलखते रहे पिता.

जलते रहे मकान,

जलती रही बस्तियाँ. 

युद्ध ने उजाड़ा करोड़ों लोगों 

का जीवन. 

इसलिए तो कह रहा हूँ,

किसी दूसरे देश पर जबरन 

हमला कोई देशभक्ति नहीं है,

मानवता के खिलाफ़ अपराध है.

इसीलिए तो कह रहा हूँ...

हो सके तो 

इतना ज़रूर करना, 

उन परमाणु बमों को 

नष्ट कर देना, जिनसे 

हमारी इस हरी -भरी 

धरती और उस पर 

रंग -बिरंगे फूलों की तरह 

खिलते जन -जीवन के 

हमेशा के लिए नष्ट हो 

जाने का खतरा है, 

नष्ट हो भी रहा है.

हो सके तो रोक लेना 

उस  बेरहम युद्ध को, जो 

स्कूलों और अस्पतालों पर 

बम बरसा रहा है.

हो सके तो याद कर लेना 

ईरान की उन 165 नन्हीं बेटियों को 

जो गईं थीं स्कूल 

कुछ सीखने और अपनी 

ज़िन्दगी संवारने का 

सपना लिए, लेकिन

फिर कभी घर नहीं लौट पाईं 

अपने सपनों के साथ. 

उनके स्कूल पर हुआ हमला 

उनके मासूम सपनों पर आक्रमण था.

नष्ट कर देना इंसानियत के दुश्मन 

उन घातक बमों को,

जिनसे फिर न झुलसे कोई 

हिरोशिमा और कोई नागासाकी,

घायल न हों किसी बच्चे के,

किसी बेटी के फूलों जैसे कोमल सपने.

हो सके तो 

नष्ट कर देना उन वैक्यूम बमों को 

जिनसे भाप बनाकर

उड़ा दिए गए गज़ा पट्टी 

के हजारों इंसान.

नष्ट कर देना उन 

निर्मम हृदयों के पथरीले 

इरादों को, जिन्होंने 

इंसानियत के खिलाफ़ युद्ध में उजाड़ा 

इराक, अफगानिस्तान,

सीरिया और फिलिस्तीन सहित 

और भी कई देशों को, 

तबाह कर दी

वहाँ के लोगों की ज़िन्दगी.

हो सके तो नष्ट कर देना 

उन प्रयोग शालाओं को 

जहाँ बनते हैं मानवता को 

मटियामेट करने के इरादे से 

ऐसे घातक हथियार,

बनती हैं  दरिंदगी करने वाली 

मिसाइलें,

हो सके तो नष्ट 

कर देना  उन बेरहम दिमागों को,

जिनमें जन्म लेते हैं 

पृथ्वी को नष्ट करने के 

विनाशकारी इरादे, 

जिनमें पैदा होते हैं 

ऐसे घातक हथियार बनाने के विचार 

हो सके तो 

नष्ट कर देना उन हाथों को 

जो बनाते हैं मानवता के खिलाफ़ 

ऐसे हथियार.

इन सबके नष्ट होने पर ही 

बची रहेगी हमारी धरती,

बचे रहेंगे हम और तुम 

और हमारे जैसे 

करोड़ों -अरबों इंसान

एक खुशनुमा ज़िन्दगी के लिए.

     -स्वराज्य करुण


Saturday, February 28, 2026

(आलेख )अलविदा भाई सुशील भोले.../लेखक -स्वराज्य करुण

 अलविदा भाई सुशील भोले 

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छत्तीसगढ़ी भाषा के जाने -माने कवि, चिंतक, लेखक और पत्रकार, सबके चहेते भाई सुशील भोले अत्यंत शोकाकुल वातावरण में पंचतत्व में विलीन हो गए । कल 27 फरवरी 2026 को पूर्वान्ह राजधानी रायपुर के मारवाड़ी श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार हुआ । ज्ञातव्य है कि  स्वर्गीय सुशील भोले स्थानीय संजय नगर (टिकरा पारा ) के निवासी थे । उनका 26 फरवरी 2026 को रायपुर शहर के एक अस्पताल में  निधन हो गया था ।उन्हें अंतिम विदाई देने  उनके परिजनों सहित बड़ी संख्या में नागरिक और अनेक साहित्यकार और पत्रकार श्मशान घाट पहुँचे । शोक सभा में दिवंगत आत्मा के सम्मान में दो मिनट का मौन धारण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई । लोगों ने छत्तीसगढ़ी साहित्य को समृद्ध बनाने में उनके लगभग चार दशकों के सुदीर्घ योगदान को याद  करते हुए उनसे जुड़ी अपनी स्मृतियों को साझा किया ।


                                                  


अंतिम संस्कार में पहुँचे लोगों में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा, साप्ताहिक 'छत्तीसगढ़ी सेवक' रायपुर के पूर्व सम्पादक जागेश्वर प्रसाद,खेतिहर मजदूर किसान मोर्चा के छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष ठाकुर रामगुलाम सिंह तथा वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार ग़ुलाल वर्मा, परमानंद वर्मा,स्वराज्य करुण,  रसिक बिहारी अवधिया,सुखदेवराम साहू 'सरस ' छत्तीसगढ़ी फिल्मों के निर्माता और अभिनेता चन्द्रशेखर चकोर और राजिम के साहित्यकार दिनेश चौहान सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन शामिल थे ।

    उल्लेखनीय है कि कवि, लेखक और पत्रकार के रूप में स्वर्गीय सुशील भोले छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के विकास के लिए विगत लगभग चालीस वर्षों से सक्रिय थे।कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ की महान विभूतियों से जुड़े संस्मरणों  पर आधारित उनकी पुस्तक 'सुरता के संसार 'भी काफी चर्चित और प्रशंसित हुई थी।इसमें उनके 39 छत्तीसगढ़ी आलेख शामिल हैं । सुशील भोले (पूर्व नाम -सुशील वर्मा ) ने  दिसम्बर  1987 में छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका ' मयारू माटी ' का सम्पादन और प्रकाशन शुरु किया था । आर्थिक कठिनाइयों के कारण इसके 13 अंक ही प्रकाशित हो पाए। वर्ष 1989 में  उनके काव्य संग्रह 'छितका कुरिया ' और वर्ष 2009 में छत्तीसगढ़ी कहानी -संग्रह 'ढेंकी' का प्रकाशन हुआ । सुशील भोले की अन्य छत्तीसगढ़ी कविता -पुस्तकों में 'दरस के साध' और 'जिनगी के रंग' भी उल्लेखनीय हैं। मूल संस्कृति पर आधारित उनका आलेख -संग्रह 'आखर अंजोर' भी खूब चर्चित हुआ था । वर्ष 2018 के माह नवम्बर में उन्हें पक्षाघात हो गया था, लेकिन वे इस गंभीर शारीरिक समस्या का हिम्मत के साथ मुकाबला करते हुए निरंतर साहित्य सृजन में लगे रहे।मेरा -उनका लगभग चार दशकों तक साथ रहा 

  मुझे सांध्य दैनिक 'चैनल इंडिया ' के साहित्य सम्पादक के रूप में अख़बार के साप्ताहिक साहित्य परिशिष्ट में समय -समय पर  उनकी अनेक रचनाओं के प्रकाशन का सौभाग्य मिला । उनकी अधिकांश रचनाओं में छत्तीसगढ़ी लोक जीवन और लोक संस्कृति की सोंधी महक हुआ करती थी।उन रचनाओं को पढ़कर आज भी इसे महसूस किया जा सकता है ।  विगत कुछ वर्षों से वे कुछ अखबारों में 'कोंदा -भैरा के गोठ ' शीर्षक से सम -सामयिक विषयों पर छत्तीसगढ़ी में व्यंग्यात्मक स्तंभ लेखन भी कर रहे थे। अपनी वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए वे सोशल मीडिया का भी उपयोग कर रहे थे  ।  यूट्यूब पर भी छोटी -छोटी छत्तीसगढ़ी कविताओं के साथ अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। स्वर्गीय सुशील भोले ने 'मयारू माटी ' के नाम से प्रदेश के छत्तीसगढ़ी और हिन्दी  कवियों और लेखकों का एक वाट्सएप ग्रुप भी बनाया था । वे कुछ वर्षों तक वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार के सांध्य दैनिक 'छत्तीसगढ़ ' के साप्ताहिक 'इतवारी अख़बार ' में सहायक सम्पादक भी रहे। 

-स्वराज्य करुण