कहाँ जाएँ सब बेघर पंछी?
(स्वराज्य करुण )
कहाँ जाएँ सब बेघर पंछी धूप और बरसात में
उजड़ गए घरौंदे जिनके, सुबह, दोपहर, रात में.
अब न होगी भिनसारे उनकी प्यार भरी चहक यहाँ
नहीं मिलेगी आंगन में अब मोंगरे की महक यहाँ.
बच्चों की आँखों के आगे उजड़े जिनके गाँव
उन मेहनतकश परिवारों को कहाँ मिलेगी छाँव.
करते थे जो बहा पसीना, कुछ सपनों की खेती,.
पूछ रही माटी -महतारी कहाँ अपनों की खेती.
अंधियारे में तुलसी चौरा, रोये घर की महतारी
जाने किसकी नज़र लगी है शोक में डूबे नर -नारी.
राजाओं के महल बनेंगे खेतों और खलिहानों में,
मजूर किसान की गिनती भी कब होती है इंसानों में.
नहीं छोड़ेंगे गाँव तो उनकी बस्ती में आग लगाएंगे
फिर उनकी खाली जमीन पर वे अपने बाग लगाएंगे.
उनको अपना नौकर समझे, दुत्कारे हर बात में,
आ गया है छल -कपट से पावर जिनके हाथ में.
शहरों से जो सज -धज कर आए अपनी मोटर कार में,
उनका दिल क्यों डूबेगा बोलो यहाँ के हाहाकार में.
-स्वराज्य करुण
29 जून 2026
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