Sunday, September 15, 2019

(आलेख ) रंग क्षितिज पर स्वर्गीय सूरज 'राही '


         
(वर्ष 1980 का एक  संस्मरणात्मक आलेख : स्वराज करुण)

कला के उपवन में कुछ ऐसी भी कलियाँ होती हैं जो खिलने से पहले ही नियति के क्रूर हाथों द्वारा तोड़ ली जाती हैं ।कुछ ऐसी संभावनाएँ भी होती हैं जो समाज के लिए रोशनी की मीनार साबित हो सकती थीं ,पर समय के सागर में वे असमय ही विलीन हो जाती हैं। ऐसी ही महकती कलियों और संभावनाओं  में स्वर्गीय सूरज 'राही' भी शामिल किए जाएंगे ।
  आज से  लगभग एक दशक पूर्व यहाँ (पिथौरा में ) देहली नेशनल ड्रामा पार्टी का आगमन हुआ था ।इस सुप्रसिद्ध व्यावसायिक नाट्य संस्था के प्रमुख कलाकारों में सूरज ' राही' और उनके माता -पिता भी शामिल थे ।पिता श्री मोहम्मद यासीन और माता श्रीमती सरोजा देवी लगभग 20 वर्षों तक इस नाट्य संस्था से सम्बद्ध रहे ।दोनों ही कुशल रंगकर्मी हैं ।इस प्रकार सूरज ' राही ' (पारिवारिक नाम सैय्यद मंसूर अली ) की अभिनय कला     उनको पारिवारिक देन कही जा सकती है। इस ड्रामा पार्टी के सामाजिक नाटकों तथा फिल्मी नाट्य रूपांतरणों में अभिनय , गायन और निर्देशन में प्रमुख भूमिका सूरज राही की ही रहती थी । पार्टी द्वारा खेले गए हिन्दी व उर्दू  के कई सामाजिक ,धार्मिक तथा ऐतिहासिक नाटक आज भी यहाँ याद किए जाते हैं । कुछ दिनों बाद यह पार्टी तो अगले पड़ाव के लिए चल पड़ी लेकिन पिथौरा की मोहक देहाती आबोहवा ने इसके कुछ कलाकारों का मन मोह लिया और वे यहीं के निवासी बन गए । राही के माता -पिता भी सपरिवार यहाँ बस गए । पिता श्री यासीन सम्प्रति यहाँ के मौलवी हैं ।
     छत्तीसगढ़ की लोकप्रिय नाचा मण्डलियों में मचेवा का नाचा भी एक है ।यहाँ बसने के बाद 'राही" शीघ्र ही इस नाचा से सम्बद्ध हो गए । एक मंजे हुए कलाकार की प्रतिभा और उनके अनुभव का लाभ लोक कलाकारों को मिला और मचेवा का नाचा प्रसिद्धि के शिखर की ओर बढ़ने लगा । नाचा में प्रचलित परम्परागत प्रहसनों को सूरज ने आधुनिक सन्दर्भों से जोड़ा ।लोक नाटकों की परम्परागत धारा को उन्होंने एक नयी दिशा दी । उनके निर्देशन में सामाजिक तथा राष्ट्रीय समस्याओं पर आधारित लोक नाटकों का प्रभावशाली मंचन किया जाने लगा ।वे स्वयं नाटकों के प्लॉट तैयार करते और गीत और संगीत का माधुर्य घोलकर दर्शकों का मन मोह लेते। उनके द्वारा तैयार छत्तीसगढ़ी नाटकों में 'छोटे -बड़े मंडल" जहाँ समाज में व्याप्त आर्थिक विषमताओं पर प्रहार करता है , वहीं ' कोर्ट मैरिज ' विवाह की रूढ़ मान्यताओं पर वार करने से नहीं चूकता ।लोक नाटक 'किसान " में एक किसान - विधवा के जीवन संघर्ष का जीवन्त चित्रण हुआ है ,वहीं 'दहीवाली' में पतिव्रता नारी का अपने पथभ्रष्ट पति को  सही रास्ते पर लाने की घटना को सजीव अभिव्यक्ति मिली है। मचेवा नाचा के कलाकारों ने सूरज 'राही' के निर्देशन में इन नाटकों से काफी लोकप्रियता अर्जित की । लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि यह नाचा प्रायः वर्ष भर कहीं न कहीं कार्यक्रमों में व्यस्त रहता ।न केवल छत्तीसगढ़ , वरन सीमावर्ती प्रांत महाराष्ट्र और उड़ीसा में भी इसने छत्तीसगढ़ की कला और संस्कृति का गौरवशाली प्रदर्शन किया ।कुछ वर्षों पूर्व इस्पात नगरी भिलाई में आयोजित लोक कला महोत्सव में भी इसे काफ़ी प्रशंसा मिली ।राही ने कुछ अन्य नाचा मंडलियों को भी अपना रचनात्मक सहयोग दिया ।
       शायद ही किसी वर्ष  वे अपने गृह - ग्राम पिथौरा में दो माह से  अधिक समय लगातार रहे हों ! नाचा के साथ वे सुदूर गाँवों ,कस्बों और शहरों के दौरे पर रहते । वर्ष का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने लोक नाटकों के लिए समर्पित कर दिया था । जब भी उन्हें समय मिलता ,वे अपने गृह -ग्राम पिथौरा के शौकिया कलाकारों का मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन करने में सबसे आगे रहते । नवोदितों के लिए उनके मन में अपार स्नेह था ।स्थानीय किशोरों और नवयुवकों की 'पिथौरा संगीत समिति ' की स्थापना में उनका अविस्मरणीय योगदान रहा । यहाँ 'ताज मटका पार्टी ' की स्थापना भी उन्होंने ही की । मटकों में बंधे घुंघुरुओ की ध्वनि गीत -गज़लों और कव्वालियों की मिठास में दुगुनी वृध्दि कर देती है ।सन 1977 -78 में स्थापित इन दोनों संस्थाओं के शौकिया कलाकारों को सूरज 'राही " ने समर्पित भाव से प्रशिक्षण दिया । वे एक सुयोग्य संगीतज्ञ भी थे । स्थानीय कलाकारों की ये दोनों संस्थाएं आज भी उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की याद दिलाती हैं ।
      चार अगस्त 1947 को कलकत्ते में नेशनल ड्रामा पार्टी के शिविर में जन्मे सूरज 'राही ' की कला यात्रा 28 फरवरी 1980 को यादों के अमिट निशान छोड़कर अचानक समाप्त हो गयी ।नाचा का कार्यक्रम प्रस्तुत करने वे अपने साथियों सहित जा रहे थे कि बागबाहरा के  पास जीप दुर्घटना में घायल हो गए । कई दिनों तक डी. के.अस्पताल रायपुर में इलाज चला ,पर अंततः नियति ने उन्हें हमसे छीन लिया ।इलाज के दौरान ही उनका निधन हो गया । मंच पर  थिरकते पैर थम गए , हवाओं में गीत और संगीत का माधुर्य घोलती आवाज़ थम गयी ,हज़ार - हज़ार दिलों पर छा जाने वाला अभिनेता मौत के  अँधेरे में खो गया । रंग क्षितिज पर तेजी से उभरता एक 'सूरज ' अचानक डूब गया ,छोड़कर अँधेरी रातों के लिए यादों के सितारे ।
      -स्वराज करुण
( मेरा यह आलेख  साप्ताहिक 'चिन्तक ' दुर्ग के दीपावली विशेषांक 1980 में प्रकाशित  )

Saturday, September 14, 2019

(आलेख ) राजभाषा के 70 साल : आज भी वही सवाल ?

                                        - स्वराज करुण 
  स्वतंत्र भारत के हमारे अनेक विद्वान साहित्यकारों और महान  नेताओं ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में महिमामण्डित किया है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय एकता की भाषा भी कहा है ।   उनके विचारों से हम  सहमत भी हैं ।
    किसी भी राष्ट्र को अपने  नागरिकों के लिए एक ऐसी सहज -सरल सम्पर्क  भाषा की ज़रूरत होती है जिसके माध्यम से लोग दिन - प्रतिदिन एक - दूसरे से  बात -व्यवहार कर सकें । निश्चित रूप से 'हिन्दी' में यह गुण  स्वाभाविक रूप से है और यही उसकी ताकत भी है ,जो देश को एकता के सूत्र में  बाँधकर रखती है । आज़ादी के आंदोलन में और उसके बाद भी हमने हिन्दी की इस ताकत को महसूस किया है ,लेकिन लगता है कि जाने -अनजाने हिन्दी की यह ताकत कमज़ोर हो रही है । उसे स्वतंत्र भारत की राजभाषा का दर्जा मिले 70 साल हो गए ,लेकिन राष्ट्रभाषा के रूप में उसके विकास का सवाल आज भी जस का तस है । समय - समय पर दक्षिण के राज्यों का  हिन्दी विरोध इसका ज्वलंत उदाहरण है । त्रिभाषी फार्मूले को भी वो नहीं मानते । इस पर उनके साथ सार्थक संवाद की ज़रूरत है ।
   केन्द्रीय कार्यालयों ,उपक्रमों और राष्ट्रीयकृत बैंकों में  राजभाषा पखवाड़े के साथ  14 सितम्बर को हिन्दी दिवस अवसर पर  तमाम तरह के कार्यक्रम  हो रहे हैं  । कई दफ़्तरों में यह पखवाड़ा एक सितम्बर से 14 सितम्बर तक मनाया जाता है । हिन्दी दिवस के दिन इसका समापन होता है ,वहीं कई कार्यालयों में हिन्दी दिवस यानी 14 सितम्बर से हिन्दी पखवाड़े से इसकी शुरुआत होती है । इस दौरान  प्रतियोगिताएं और विचार गोष्ठियां भी होती हैं । लेकिन हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी दिवस खत्म होते ही सब कुछ पुराने ढर्रे पर चलने लगता है  ।
      विचारणीय सवाल यह है कि हिन्दी को 70 साल पहले  राजभाषा का दर्जा तो मिल गया ,लेकिन वह  आखिर कब देश की सर्वोच्च अदालत सहित  राज्यों के  उच्च न्यायालयों और केन्द्रीय मंत्रालयों के सरकारी काम-काज की भाषा बनेगी ? स्वतंत्र भारत के इतिहास में १४ सितम्बर १९४९ वह यादगार दिन है जब हमारी संविधान सभा ने हिन्दी को भारत की राजभाषा का दर्जा दिया था . इसके लिए  संविधान में धारा ३४३ से ३५१ तक राजभाषा के बारे में ज़रूरी प्रावधान किए  गए .
     अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी से हम पन्द्रह अगस्त १९४७ को आज़ाद हुए और  २६ जनवरी १९५० को देश में हमारा अपना संविधान लागू हुआ ,जिसमे भाषाई प्रावधानों के तहत अनुच्छेद ३४३ से ३५१ के प्रावधान भी लागू हो गए .इसके बावजूद केन्द्र सरकार के अधिकाँश मंत्रालयों से राज्यों को जारी होने वाले अधिकांश पत्र -परिपत्र प्रतिवेदन आज भी केवल अंग्रेजी में होते हैं ,जिसे समझना गैर-अंग्रेजी वालों के लिए काफी मुश्किल होता है ,जबकि राजभाषा अधिनियम १९६३ के अनुसार केन्द्र सरकार के विभिन्न साधारण आदेशों , अधिसूचनाओं और सरकारी प्रतिवेदनों ,नियमों आदि में अंग्रेजी के साथ -साथ हिन्दी का भी प्रयोग अनिवार्य किया गया है.इसके बाद भी ऐसे सरकारी दस्तावेजों में हिन्दी का अता-पता नहीं रहता .केन्द्र  से  जिस राज्य को ऐसा कोई सरकारी पत्र या प्रतिवेदन भेजा जा रहा है , वह उस राज्य की स्थानीय भाषा में भी अनुदित होकर जाना चाहिए । लेकिन होता ये है कि  नईदिल्ली से राज्यों को जो  पत्र -परिपत्र  अंग्रेजी में मिलते हैं ,उन्हें मंत्रालयों के  सम्बन्धित विभाग के अधिकारी सिर्फ़ एक अग्रेषण पत्र  लगाकर और उसमें  'आवश्यक कार्रवाई हेतु ' और  "कृत कार्रवाई से अवगत करावें ' लिखकर  निचले कार्यालयों को भेज देते हैं ।
     दरअसल हिन्दी भाषी राज्यों के मंत्रालयों और सरकारी कार्यालयों में अंग्रेजी जानने -समझने वाले अफसरों और कर्मचारियों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है । इसलिए उन्हें उन पत्रों में प्राप्त दिशा -निर्देशों के अनुरूप आगे की कार्रवाई में कठिनाई होती है ।ऐसे में उनके निराकरण में स्वाभाविक रूप से विलम्ब होता ही है । केन्द्र की ओर से राज्यों के साथ सरकारी पत्र - व्यवहार अगर  राजभाषा हिन्दी और प्रादेशिक भाषाओं में हो तो यह समस्या काफी हद तक कम हो सकती है ।
    सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के तमाम फैसले भी अंग्रेजी में लिखे जाते है ,जिन्हें अधिकाँश ऐसे आवेदक समझ ही नहीं पाते,जिनके बारे में फैसला होता है . ये अदालतें फैसला चाहे जो भी दें ,लेकिन राजभाषा हिन्दी में तो दें ,ताकि मुकदमे से जुड़े पक्षकार उसे आसानी से समझ सकें. अगर उन्हें अंग्रेजी में फैसला लिखना ज़रूरी लगता है तो उसके साथ उसका हिन्दी अनुवाद भी दें . गैर हिन्दी भाषी राज्यों में वहाँ की स्थानीय भाषा में फैसलों का अनुवाद उपलब्ध कराया जाना चाहिए .इस मामले में अब तक की मेरी जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ,बिलासपुर ने अपनी वेबसाइट में अदालती सूचनाओं के साथ - साथ फैसलों का हिन्दी अनुवाद भी देना शुरू कर दिया है ,जो निश्चित रूप से सराहनीय और स्वागत योग्य है ।
       यह अच्छी बात है कि भारत सरकार ने जून १९७५ में राजभाषा से सम्बन्धित संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों पर अमल सुनिश्चित करने के लिए राजभाषा विभाग का गठन किया है ,जिसके माध्यम से हिन्दी को बढ़ावा देने के प्रयास भी किये जा रहे हैं । वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग भी कार्यरत है  लेकिन इस दिशा में और भी ज्यादा ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है । वैसे आधुनिक युग में कम्प्यूटर और इंटरनेट पर देवनागरी लिपि का प्रयोग हिन्दी को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने में काफी मददगार साबित हो रहा है ।
  लेकिन यह देखकर निराशा होती है कि हिन्दी दिवस के बड़े -बड़े आयोजनों में हिन्दी की पैरवी करने वाले अधिकाँश ऐसे लोग होते हैं जो अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम के स्कूलों में पढाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं ।  दुकानों और बाजारों में लेन -देन के समय हिन्दी में बातचीत करने वाले कथित उच्च वर्गीय ग्राहकों को बड़े -बड़े होटलों में आयोजित सरकारी अथवा कार्पोरेटी बैठकों और सम्मेलनों में अंग्रेजी में बोलते -बतियाते देखा जा सकता है । अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में 'हिन्दी दिवस ' मनाया नहीं जाता ,वहाँ 'हिन्दी -डे ' सेलिब्रेट ' किया जाता है । शहरों में  चारों तरफ़ नज़र दौड़ाने पर अधिकांश दुकानों ,होटलों  व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और निजी स्कूल -कॉलेजों के अंग्रेजी नाम वाले बोर्ड देखने को मिलते हैं । उन्हें देखने पर लगता है कि हमारी हिन्दी दम तोड़ रही है । हिन्दी माध्यम के स्कूलों में भी आगन्तुकों के स्वागत में बच्चे ' नमस्ते ' नहीं बोलकर 'गुड मॉर्निंग सर' उठा गुड मॉर्निंग मैडम " कहकर अभिवादन करते हैं । उन्हें ऐसा ही  सिखाया जा रहा है ।  पाठ्य पुस्तकों से देवनागरी के अंक गायब होते जा रहे हैं । उनमें पृष्ठ संख्या भी अंग्रेजी अंकों में छपी होती है । कई  स्कूली बच्चे भारतीय अथवा हिन्दी महीनों और सप्ताह के दिनों के नाम नहीं बोल पाते जबकि अंग्रेजी महीनों और दिनों के नाम धाराप्रवाह बोल देते हैं।   भारतीय बच्चे अगर फटाफट अंग्रेजी बोलें तो माता - पिता और अध्यापक गर्व से फूले नहीं समाते ! हिन्दी अच्छे से बोलना और लिखना श्रेष्ठि वर्ग में पिछड़ेपन की निशानी मानी जाती है । 
कई अख़बारों और टीव्ही चैनलों में अत्यधिक अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी के प्रयोग को देखकर भी निराशा होती है ।
 आम जनता से हिन्दी में बात करने वाले कई बड़े-बड़े नेताओं को संसद में अंग्रेजी में बोलते देखा और सुना जा सकता है . क्या कोई बता सकता है- ऐसे भारतीयों  से भारत की राजभाषा के रूप में बेचारी हिन्दी आखिर उम्मीद करे भी तो क्या ?
      - स्वराज करुण

Monday, September 9, 2019

(आलेख) छत्तीसगढ़ी संस्कृति का प्रतिनिधि : मचेवा का ' नाचा '

                                 - स्वराज करुण 
   एक वो भी ज़माना था ,जब हमारे देश के  हर प्रदेश की लोक संस्कृतियों  की  रंग -बिरंगी  दुनिया अपने गाँव या कस्बे की स्थानीय सरहदों तक सीमित रहा करती थी ,लेकिन नये ज़माने  की नयी संचार तकनीक ने उसे 'लोकल ' से 'ग्लोबल' बना दिया है । फ़ोटोग्राफ़ी ,वीडियोग्राफ़ी ,  सिनेमा , रेडियो , टेलीविजन,  इंटरनेट ,  मोबाइल फोन जैसे जनसंचार के अत्याधुनिक संसाधनों  से हमारी आँचलिक  प्रतिभाओं को विश्व रंगमंच पर पहचान और प्रतिष्ठा मिलने लगी है।
      छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को भी नये दौर के इन नये संचार संसाधनों का भरपूर लाभ मिल रहा है । इंटरनेट आधारित यूट्यूब में तो यहाँ के लोक रंगमंचों की रंगारंग नाट्य प्रस्तुतियों की भरमार है । यहाँ के ग्रामीण क्षेत्रों में  अलग -अलग नामों से कई नाट्य अथवा नाचा मण्डलियां  ख़ूब सक्रिय हैं ,जो विभिन्न सामाजिक विषयों पर छत्तीसगढ़ी भाषा में तरह -तरह के गम्मतों  (प्रहसनों ) का मंचन करती हैं ।
                   
         लगभग  चार दशक पहले  छत्तीसगढ़ में अत्याधुनिक संचार माध्यमों का आज की तरह विस्तार नहीं हुआ था ,  लेकिन उस दौर में भी यहाँ मचेवा का  नाचा काफी लोकप्रिय था ,जिस पर मेरा एक आलेख रायपुर के तत्कालीन दैनिक 'युगधर्म' के 10 नवम्बर 1977 के दीपावली पूर्ति अंक में प्रकाशित हुआ था । इस नाट्य मण्डली की मंचीय प्रस्तुतियों का कोई फोटो दुर्भाग्यवश मेरे पास नहीं है।  उस वक्त भी नहीं था । लिहाजा सम्पादक महोदय ने बगैर फोटो के ही  उदारतापूर्वक मेरा यह आलेख प्रमुखता से  प्रकाशित कर दिया । शीर्षक भी यथावत है । सौभाग्य से इसकी क्लिपिंग मेरे पास अब तक सुरक्षित है ।हालांकि  समय के प्रवाह में कागज़ कुछ पीले और अक्षर कुछ धुंधले ज़रूर  पड़ गए हैं ,फिर भी इसे यथासंभव जस का तस उतारने की कोशिश मैंने की है ।
      सिर्फ़ आलेख की सजावट के लिए एक प्रतीकात्मक फोटो   इंटरनेट से  साभार लिया है ,जो ग्राम कचांदुर ,(जिला -बालोद ) की  'तुलसी के माला '  नामक छत्तीसगढ़ी नाचा मण्डली की मंचीय प्रस्तुति का है। बहरहाल ,आप मचेवा के नाचा के बारे में यह आलेख पढ़ें ।
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          छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास की पृष्ठ भूमि मुख्यतः यहाँ का ग्रामीण जनजीवन ही है ।यहाँ की ग्रामीण संस्कृति में लोकनाटकों का प्रारंभ से ही बड़ा महत्व रहा है । छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक सौम्यता के दर्शन यहाँ के देहातों की नाट्य मण्डलियों के सीधे -सादे ,आडम्बरहीन परन्तु रोचक कार्यक्रमों में होते हैं ।ये नाट्य मण्डलियां लोक -जीवन पर आधारित नाटकों के साथ लोक -नृत्यों का  प्रदर्शन भी करती हैं ।लोक नृत्य ,जिसे आँचलिक बोली में 'नाचा कहा जाता है, नाट्य मण्डलियों के प्रदर्शन का प्रमुख अंग है ।अतः ग्रामीण अँचलों में ये नाट्य -मण्डलियां 'नाचा पार्टी ' के नाम से ही जानी जाती हैं ।
इन नाट्य या नाचा मण्डलियों में से एक है -मचेवा की नाचा मण्डली ।मचेवा महासमुन्द के समीप एक छोटा सा गाँव है ।आज से लगभग पन्द्रह -सोलह वर्ष पूर्व इसी गाँव के एक युवक श्री रामसिंह ठाकुर ने इस नाट्य -मण्डली की नींव डाली थी ।तब से लेकर आज तक छत्तीसगढ़ के छोटे -बड़े सभी गांवों और कस्बों में यह मण्डली अपने कार्यक्रमों का प्रदर्शन करती आ रही है ।
  तीन वर्ष पूर्व सन 1974 में इस्पात नगरी भिलाई के सिविक सेंटर में मचेवा नाचा पार्टी ने छत्तीसगढ़ की ग्रामीण कला और संस्कृति का गौरवशाली ,प्रशंसनीय प्रदर्शन किया था ।साथ ही पिछले वर्ष इस मण्डली के प्रमुख अभिनेता ,नाटककार तथा निर्देशक श्री सूरज 'राही ' ने इस्पात नगरी भिलाई में ही आयोजित " छत्तीसगढ़ी लोक कला सम्मेलन ' में अपनी मण्डली का प्रतिनिधित्व किया था । मचेवा नाचा पार्टी (नाट्य मण्डली )  ने न केवल छत्तीसगढ़ , वरन इस अंचल की सीमाओं को लाँघ कर पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के गोंदिया शहर व उसके आस -पास के गाँवों में भी छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति के प्रतीक नाटकों और लोक नृत्यों का प्रदर्शन किया है और ख्याति अर्जित की है । इस मण्डली द्वारा सामाजिक तथा राष्ट्रीय समस्याओं पर आधारित , लोक शैली में आबद्ध अनेक नाटकों का लोक भाषा में प्रभावशाली मंचन किया जाता है ।इनमें एक  प्रमुख नाटक है 'छोटे - बड़े मण्डल' । समाज में व्याप्त आर्थिक विषमताओं तथा वर्ग -भेद की समस्याओं पर आधारित इस लोक नाटक में ग्रामीण प्रेमी युगल द्वारा शहर में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर 'कोर्ट मैरिज'  जैसी  आधुनिक प्रक्रिया के द्वारा परिणय सूत्र में बंधने की घटना का जीवंत चित्रण हुआ है ।प्रेमी युगल का परिणय समाज में व्याप्त कुरीतियों को मिटाने तथा अमीरी और ग़रीबी की खाई को पाटने के उद्देश्यों को लेकर सम्पन्न होता है । यद्यपि 'कोर्ट मैरिज " जैसी आधुनिक घटना (जो मुख्यतः शहरी संस्कृति का प्रतीक है ),का ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित नाटक में समावेश हुआ है ,परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि छत्तीसगढ़ के लोक नाटक अपने ग्रामीण परिवेश का त्याग कर रहे हैं ।'छोटे - बड़े  मण्डल ' में वस्तुतः ग्रामीण युवा वर्ग पर शहरी मानसिकता के प्रभाव का चित्रण हुआ है ,जिसे नकारा नहीं जा सकता ।
       इसी प्रकार इस नाट्य मण्डली के 'किसान ' नामक नाटक में जहाँ एक किसान की असहाय विधवा के व्यथा भरे जीवन का मर्मस्पर्शी चित्रण है ,वहीं 'दही वाली ' नामक नाटक में एक पतिव्रता नारी द्वारा अपने पथभ्रष्ट पति को सही रास्ते पर लाने हेतु किए गये सफल प्रयासों को रोचक अभिव्यक्ति प्रदान की गयी है ।
इन तीनों नाटकों को मचेवा नाचा मण्डली के ही युवा अभिनेता श्री सूरज 'राही" ने लिखा है और इनका निर्देशन भी किया है। उल्लेखनीय है कि श्री सूरज "राही' छत्तीसगढ़ी के कुशल नाटककार होने के अलावा उर्दू के उभरते हुए शायर भी हैं ।मचेवा नाचा मण्डली की एक विशेषता यह है कि इसके सभी कलाकार छत्तीसगढ़ के विभिन्न गाँवों के निवासी हैं । किसी स्थान से कार्यक्रम हेतु आमंत्रण मिलने पर सभी कलाकारों को मण्डली के प्रमुख श्री रामसिंह ठाकुर मचेवा से सूचना भिजवा देते हैं तथा सूचना मिलने पर सभी कलाकार मचेवा (जो मण्डली का प्रमुख केन्द्र है )में एक होकर कार्यक्रम स्थल हेतु रवाना होते हैं ।
    " जब आपके कलाकार बाकी दिनों में अपने -अपने गाँवों में अपने व्यवसायों से सम्बद्ध होते हैं ,तब अचानक किसी कार्यक्रम की  सूचना मिलने पर क्या उन्हें रिहर्सल हेतु  पर्याप्त समय मिल पाता है ? मेरी इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए श्री सूरज 'राही' कहते हैं -बिखराव का हमारे नाटकों के मंचन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता । परन्तु ऐसी बात भी नहीं है कि हमें रिहर्सल नहीं करना पड़ता ।जब हमारी पार्टी कार्यक्रमों के प्रदर्शन हेतु दौरे पर निकलती है ,तब बीच में दो -तीन दिनों का अंतराल मिलने पर हम ख़ूब  रिहर्सल करते हैं ।नये नाटकों का रिहर्सल भी इसी दौरान हो जाता है । स्त्री की भूमिका भी पुरुष पात्र ही करते हैं ।
  मचेवा नाचा मण्डली के अन्य कलाकारों में ग्राम बेलसोंडा के गंगाराम , महासमुन्द के जीवनलाल , मोंगरापाली के राधेलाल , खरोरा के सर्वश्री गुलाबदास मानिकपुरी और किसुन देवांगन , सोनभट्टा के मेहरू सेन , तथा मचेवा के सर्वश्री माखन देवांगन , चैतराम यादव , डेरहा राम ठाकुर तथा रामसिंह ठाकुर हैं । खरोरा के युवा मूर्तिकार तथा चित्रकार श्री गुलाबदास मानिकपुरी मचेवा नाचा पार्टी के प्रमुख संगीतकार हैं ।ये सभी कलाकार प्रायः गाँवों के खेतिहर मजदूर वर्ग से हैं ।इस प्रकार यह नाट्य मण्डली छत्तीसगढ़ के विभिन्न गाँवों के प्रतिनिधि लोक कलाकारों का अत्यंत सादगीपूर्ण सांस्कृतिक संगम स्थल है ।यह इस अंचल के गाँवों के मध्य सौहार्द्रपूर्ण एकता का भी प्रतीक है। इन कलाकारों में प्रतिभा है ,जिसका मूल्यांकन शहरों के अत्याधुनिक चेहरों की भीड़ में न होकर छल -कपट से दूर वनाच्छादित गाँवों की प्यारी - प्यारी धरती पर भोले -भाले चेहरों द्वारा रात्रि के अंतिम प्रहर तक होता रहता है ।
    लोक नाट्य हमारी लोक संस्कृति का प्रमुख अंग है । यद्यपि आधुनिक शहरी सभ्यता के आक्रमण के प्रभाव से ये भी अब अछूते नहीं रहे ,तथापि उनमें प्रतिध्वनित होने वाली ग्रामीण संस्कृति की आँचलिक स्वर लहरी अब भी समाप्त नहीं हुई है ,कभी समाप्त भी नहीं होगी ।ग्राम्य धरातल पर अंकुरित होने वाले लोकगीत , गाँव की सामाजिक समस्याओं पर आधारित नाटक तथा सामाजिक विषमताओं पर व्यंग्यात्मक प्रहार करने वाले प्रहसन , हास्य - व्यंग्य से भरपूर गम्मत , छत्तीसगढ़ की गौरवशाली ग्रामीण कला -संस्कृति को संरक्षण देने में पूर्णतः सक्षम हैं । इस दृष्टि से यह कहना भी गलत न होगा कि लोक नाट्य तथा  'नाचा' छत्तीसगढ़ के गाँवों की मेहनतकश जनता के सांस्कृतिक प्रतिनिधि हैं ।
                   - स्वराज करुण

Friday, September 6, 2019

(आलेख ) विलुप्त हो रही एक पर्यावरण हितैषी परम्परा !

                                     - स्वराज करुण 
   प्राकृतिक दोना - पत्तलों की पर्यावरण हितैषी परम्परा तेजी से  विलुप्त होती जा रही है । पहले इन्हें पेड़ों के हरे  पत्तों से और अपने  हाथों से बनाया जाता था । सत्यनारायण की कथा का प्रसाद और विवाह आदि समारोहों में नाश्ता और भोजन इनमें परोसा जाता था । 
        उपयोग के बाद लोग इन प्राकृतिक दोना - पत्तलों को किसी एक जगह पर एकत्रित करके रख देते थे या किसी गड्ढे में डाल देते थे ,जहाँ ये मिट्टी में घुल जाते थे । अगर जानवर भी इन पत्तों को खा लें तो उनको कोई नुकसान नहीं होता था । लेकिन अब प्राकृतिक दोना -पत्तल गाँवों से भी गायब होते जा रहे हैं ।

 विभिन्न कारणों से जंगलों का कम होते जाना भी इसका प्रमुख कारण है । पहले  वनों में साल ,सरई ,परसा आदि के वृक्ष काफी संख्या में होते थे ,जिनके पत्तों से  दोना -पत्तल बनाया जाता था । लोगों के घरों के आँगन में या पीछे बाड़ियों में पर्याप्त जगह होती थी ,जहाँ कुँओं के आस -पास केले के भी पौधे लगाए जाते थे ।  बड़े होने पर केले के पत्ते भी भोजन परोसने के काम आते थे ।
                       

     दोना -पत्तल   बनाने की मशीनें आ गयी हैं ,जिनमें मोटे कागजों पर प्लास्टिक ,  पॉलीथिन या कृत्रिम सिल्वर की बारीक परतें चढ़ाकर इन्हें बनाया जा रहा है ,जो स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक हैं । उपयोग के बाद लोग  इन्हें लापरवाही से इधर -उधर फेंक देते हैं। मिट्टी में घुलनशील नहीं होने के कारण ये जमीन में खुले पड़े रहते हैं ।  इससे मिट्टी प्रदूषित होती है और इनमें बचे हुए या  चिपके रह गए  जूठन के सड़ने पर वातावरण में असहनीय  बदबू फैलती है । पर्यावरण भी  दूषित होता है । इस प्रकार के  प्लास्टिक या कृत्रिम सिल्वर कोटेड आधुनिक दोना -पत्तलों को अगर कोई जानवर खा ले तो उसकी मौत भी हो सकती है । 
     दोना -पत्तल बनाने की इन मशीनों की कीमत ज्यादा नहीं होती । इसलिए कोई भी व्यक्ति इस कुटीर उद्योग की स्थापना कर सकता है । स्वरोजगार की दृष्टि से इसमें कोई  बुराई नहीं ,बशर्ते  दोना -पत्तल प्राकृतिक पत्तों से तैयार किए जाएं ।
        -स्वराज करुण
(फोटो : इंटरनेट से साभार )

Monday, September 2, 2019

(आलेख ) अनुकम्पन : रायगढ़ कथक पर बनी पहली फ़िल्म

                       - स्वराज करुण 
    छत्तीसगढ़ की तत्कालीन रायगढ़ रियासत के महान संगीतज्ञ राजा चक्रधर सिंह की स्मृति में इस वर्ष  2 सितम्बर को रायगढ़ में 35 वें अखिल भारतीय चक्रधर नृत्य एवम संगीत समारोह का शुभारंभ होने जा रहा है । दरअसल 2 सितम्बर को गणेश चतुर्थी है और इसी दिन 19 अगस्त 1905 को रायगढ़ में चक्रधर सिंह का जन्म हुआ था । उनका निधन रायगढ़ में ही   7 अक्टूबर 1947 को हुआ।       

  उनके सम्मान में हर साल गणेश चतुर्थी के दिन  राज्य शासन और जिला प्रशासन द्वारा जन सहयोग से   दस दिनों के इस  राष्ट्रीय समारोह का आयोजन विगत 34 वर्षों से किया जा रहा  है । प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल कल 2 सितम्बर को इस आयोजन का शुभारंभ करेंगे ।
     राजा चक्रधर सिंह न सिर्फ़ कला रसिक , बल्कि एक महान कला मर्मज्ञ और नृत्य गुरु भी थे । उन्होंने पारम्परिक छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य 'नाचा' के कलाकारों को लेकर उन्हें अपने सानिध्य में रखा और इन गुमनाम और अल्पज्ञात कलाकारों को शास्त्रीय नृत्य कथक का कठोर प्रशिक्षण दिया और दिलाया ,फिर इन्हीं कलाकारों को लेकर उन्होंने कथक नृत्य की रायगढ़ शैली का प्रवर्तन किया । वास्तव में राजा चक्रधर सिंह को  समय - समय पर 'नाचा' कलाकारों के मंचन को देखकर उनके पैरों की थिरकन में कथक नृत्य का अमिट प्रभाव नज़र  आया , तो उन्होंने इन लोक कलाकारों की प्रतिभा को सँवारा और रायगढ़ घराने के नाम से कथक की एक अलग भाव -धारा विकसित कर दी ।
   उनके सानिध्य में प्रशिक्षित कई कथक नर्तकों ने आगे चलकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि प्राप्त की ,जिनमें नृत्याचार्य बर्मन लाल , कार्तिक राम ,कल्याणदास  फिरतूदास वैष्णव  और रामलाल आदि उल्लेखनीय हैं ।  राजा चक्रधर सिंह ने नृत्य और संगीत पर कई ग्रन्थ लिखे ,जिनमें ' नर्तम -सर्वस्वम ' और 'तलतोय निधि' भी शामिल हैं ।  उनका लिखा  'बैरागढ़िया राजकुमार' नाटक भी  काफी चर्चित और लोकप्रिय रहा है ।
    रायगढ़ घराने के शास्त्रीय नृत्य कथक के विकास में  राजा चक्रधर सिंह के योगदान पर  वर्ष 1993 में एक घण्टे के एक वृत्तचित्र 'अनुकम्पन ' का निर्माण कोलकाता की सुश्री वलाका घोष द्वारा श्री नीलोत्पल मजूमदार के निर्देशन में किया गया था । रायगढ़ घराने के कथक नृत्य पर यह पहली डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म थी । सेल्यूलाइड पर 16 एमएम की इस  डॉक्यूमेंट्री  को भारत सरकार ने वर्ष 1993 के सर्वश्रेष्ठ सांस्कृतिक वृत्त चित्र की श्रेणी में राष्ट्रपति के रजत कमल एवार्ड से सम्मानित किया था । इस फ़िल्म में नृत्याचार्य बर्मन लाल , राजा साहब के ग्रन्थों को विशेष प्रकार के कीमती कागजों पर अपने हाथों से सुडौल अक्षरों में  लिपिबद्ध करने वाले चिंतामणि कश्यप और राजा चक्रधर सिंह के सुपुत्र भानुप्रताप सिंह के दिलचस्प साक्षात्कार  हैं ,वहीं छत्तीसगढ़ी नाचा के वरिष्ठ कलाकारों के गायन वादन सहित  रायगढ़ कथक की नृत्यांगना सुश्री वासन्ती वैष्णव , बाल कलाकार शरद वैष्णव और संगीता नामदेव की भी  नृत्य प्रस्तुतियों को भी इसमें शामिल किया गया है ।
       जनवरी 1994 में कोलकाता में केन्द्र सरकार द्वारा आयोजित भारत के 24 वें  अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव के दौरान वहाँ के गोर्की सदन में यह फ़िल्म भी प्रदर्शित की गयी थी ।   मुझे भी वरिष्ठ साहित्यकार ,बिलासपुर निवासी पण्डित श्यामलाल चतुर्वेदी, रायगढ़ घराने की नयी पीढ़ी की  कथक नृत्यांगना सुश्री वासन्ती वैष्णव और तबला वादक श्री सुनील वैष्णव के साथ इस फ़िल्म समारोह में शामिल होने और  'अनुकम्पन ' के प्रदर्शन का साक्षी बनने का सौभाग्य मिला था ।
    दरअसल रायगढ़ कथक पर बनी इस पहली डॉक्यूमेंट्री में मेरा भी एक छोटा -सा योगदान था ,वो यह कि निर्माता ,निर्देशक के आग्रह पर मैंने  इसकी पटकथा का हिन्दी रूपांतर करते हुए नेपथ्य से उसकी एंकरिंग भी की थी।  वर्ष 1994 में यह डॉक्यूमेंट्री दूरदर्शन के राष्ट्रीय नेटवर्क पर भी प्रसारित की गयी थी ।
     शायद  वो वर्ष  1996 का चक्रधर समारोह था ,जब आयोजन समिति की ओर से  रायगढ़ के गोपी टॉकीज  में  'अनुकम्पन ' का प्रदर्शन किया गया था ,जिसे देर तक गूँजती  करतल ध्वनि के साथ दर्शकों का  उत्साहजनक प्रतिसाद मिला था । जन्म जयंती पर राजा चक्रधर सिंह को शत -शत नमन और उनकी स्मृति में 2 सितम्बर 2019 से शुरू हो रहे अखिल भारतीय  चक्रधर समारोह की सफलता के लिए मेरी ओर से भी हार्दिक शुभेच्छाएँ । राजा साहब की अतुलनीय और अनुकरणीय कला साधना को यादगार बनाए रखने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य अलंकरण  'चक्रधर सम्मान' की भी स्थापना की है ,जो वर्ष 2001 से हर साल राज्योत्सव के मौके पर  संगीत और कला के क्षेत्र में एक चयनित कला साधक को  प्रदान किया जाता है ।
         -स्वराज करुण

Thursday, August 29, 2019

(व्यंग्य) माटी -पुत्र , डामर -पुत्र या सीमेंट -पुत्र ?

                             - स्वराज करुण            
   क्या शब्द अपनी भावनाओं को खो चुके हैं ?  कुछ दशक पहले तक  अगर किसी मंच से किसी को 'माटी पुत्र ' या 'माटी के लाल' कहकर संबोधित किया जाता था ,तो ये शब्द  श्रोताओं की संवेदनाओं को छू जाते थे ,लेकिन आज के समय में  इन भावनात्मक शब्दों से किसी की तारीफ की जाए तो सुनने वालों को हँसी आती है  और उन पर इन लफ्जों का  कोई असर नहीं होता ,बल्कि ये लफ्ज़ महज लफ्फाजी की तरह लगते हैं ..
       इसकी एक ख़ास वजह मेरे ख़याल से ये है कि आज इस धरती पर माटी खत्म होती जा रही है  माटी की छाती पर सीमेंट और डामर की मोटी-पतली चादरें बिछ रही हैं .समय के भारी-भरकम पांवों से माटी की ममता को रौंदा जा रहा है ! खेतों में भी सीमेंट-कांक्रीट के जंगल खड़े हो रहे हैं .माटी के घड़ों और माटी के बर्तनों  का स्थान क्रमशः वाटर-कूलरों और स्टेनलेस स्टील के घड़ोंऔर बर्तनों  ने ले लिया है . हम लोग बचपन में गाँवों की धूल-माटी में ही पले-बढ़े हैं ,लेकिन आज के बच्चे तो सीमेंट -कांक्रीट की बस्तियों में बड़े हो रहे हैं . माटी की ममता उन्हें छू भी नहीं पा रही है .हर तरफ सीमेंट की या डामर की सडकें , हर तरफ सीमेंट कांक्रीट के मकान !             पहले मिट्टी के मकानों में गोबर से लिपा-पुता माटी का ही आँगन होता था !  ये मकानऔर  आंगन प्राकृतिक रूप से  काफी सुकून देते थे.  अब सीमेंट के मकानों में होता है सीमेंट का आँगन ,जो गर्मियों में अपनी आंच से तन-मन को झुलसाने लगता है     . 
        तो अब माटी है कहाँ ? किसी इंसान को 'माटी पुत्र' या 'माटी पुत्री' या 'माटी के लाल' कहना तो दूर ,उसे 'माटी का पुतला' या 'माटी की पुतली' भी कहना उचित नहीं होगा . मेरे विचार से तो अगर किसी के दिल में किसी शख्स के लिए कुछ ज्यादा ही श्रद्धा या भक्ति हो तो वह उसे  सीमेंट-पुत्र ,सीमेंट-पुत्री ,डामर पुत्र , डामर-पुत्री , सीमेंट के लाल या डामर के लाल कहकर सम्बोधित और सम्मानित कर सकता है !
                             --   स्वराज करुण

Saturday, August 24, 2019

(आलेख ) ये कहानी है दीये की और तूफ़ान की ..!

                                   - स्वराज करुण 
आधुनिकता की आँधी और मशीनीकरण के तूफान  में कई परम्परागत व्यवसाय तेजी से विलुप्त हो रहे हैं । दीये और तूफान की इस कहानी में दीया बुझता हुआ नजर आ  रहा है । जैसे कुम्हारों का माटी शिल्प , चर्मकारों का चर्म शिल्प ,  हाथकरघा बुनकरी और  दर्जियों की  सिलाई कला । सरकारों के तमाम अच्छे प्रयासों के बावजूद इन शिल्प कलाओं में  दक्ष  हुनरमंद हाथों की रचनाओं को बेहतर बाज़ार नहीं मिल पा रहा है । 
        जैसे - मिट्टी के कुल्हड़ों का स्कोप अब नहीं के बराबर रह गया है । उनके बदले प्लास्टिक के कप और गिलास खूब चल रहे हैं ,जिन्हें इस्तेमाल करने के बाद  लोग इधर -उधर लापरवाही से फेंक देते हैं ,जो नालियों के जाम होने और प्रदूषण का कारण बनते हैं ।ऐसे में अगर ट्रेनों में कुल्हड़ का चलन बन्द हो जाए तो  रही -सही कसर भी नहीं रह जाएगी ।
       मिट्टी के कुल्हड़ तो पर्यावरण हितैषी होते हैं ।   ट्रेनों में ,शादी -ब्याह में , दफ्तरों में , चाय ठेलों और होटलों में , जलसों और सभाओं में उनका चलन बढ़ाया जाए तो कुम्हारों को  साल भर काम मिलता रहेगा और प्लास्टिक प्रदूषण भी कम होने लगेगा । कुम्हारों के इस पारम्परिक शिल्प को  बचाने का मेरे विचार से एक ही उपाय है कि इन हुनरमंद हाथों से बने मिट्टी के कुल्हड़ों को बढ़ावा दिया जाए । 
      कुछ साल पहले तक आप अपने घर में  महीने भर  संकलित दैनिक अखबारों के अनुपयोगी  बंडल पड़ोस की किराना दुकान वाले के पास पांच -छह रुपएकिलो के हिसाब से बेच देते थे ,जिनमें दुकानदार जीरा ,धनिया ,मेथी आदि चिल्हर वस्तुओं की पुड़िया बनाकर बेच लेते थे । अखबारों को पढ़ने के बाद वह कागज  इस तरह उपयोग में आ जाता था ।  किराना दुकानों में कागज के ठोंगे का चलन था । प्लास्टिक के कैरीबैग नहीं थे  ,जो आज धरती की परत को पर्यावरण की दृष्टि से गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं ।     
       दोना पत्तल तो अब भी बनते और बिकते हैं ,उनके लिए मशीनें आ गयी हैं , लेकिन उन्हें चमकदार ,टिकाऊ और आकर्षक बनाने के लिए उन पर प्लास्टिक या पॉलीथिन की हल्की परत चढ़ाकर उन्हें प्रति सैकड़ा के हिसाब से बेचा जाता है । शादियों के रिसेप्शन में लोग उनमें भोजन करते हैं और उसके बाद उन्हें फेंक दिया जाता है ।  ऐसे प्लास्टिक आवरण वाले  दोना पत्तलों की वजह से  परम्परागत दोना पत्तल बनाने वाले ग्रामीणों की अब कोई पूछ -परख नहीं होती ।
   चर्मकार अपने हाथों से  जो जूते बनाते हैं  ,उन्हें अगर वे अपनी गुमटीनुमा दुकानों में सौ -दो सौ रूपए में बेचते हैं तो शहरी दुकानदार  उसी तरह के जूते उन्हीं से बनवाकर और उन पर ब्रांडेड कम्पनी का लेबल लगाकर  ऊंची दुकानों में काँच के शो -केस में सजाकर 500 से 1500 रुपए तक  या उससे भी ज्यादा कीमत का लेबल लगाकर बेचा रहे हैं । 
           अगर किसी सरकारी योजना में गरीबों को जूते वितरित किए जा रहे हों तो उनकी खरीदी इन परम्परागत चर्मशिल्पियों से या उनकी सहकारी समितियों से  की जा सकती है । इससे इन शिल्पियों  को साल भर रोजगार की गारन्टी रहेगी ।  अकेले सरकार नहीं बल्कि समाज को भी इस बारे में सोचने की जरूरत है । सरकारों ने समय -समय पर  हाथकरघा बुनकरों को बाज़ार दिलाने की सराहनीय पहल की है । जैसे - हर सरकारी दफ्तर के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वे अपने कार्यालय के  पर्दे , टेबिल क्लॉथ आदि  के लिए जरूरी कपड़े हाथकरघा बुनकरों की सहकारी समितियों से खरीदें ।   इस नियम का गंभीरता से पालन होना चाहिए ।  स्कूली बच्चों की  गणवेश सिलाई का काम  महिलाओं के स्वसहायता समूहों को दिया जा सकता है । यह भी एक अच्छी पहल होगी  । इससे  महिलाएं  दर्जी के काम में दक्ष होकर आत्म निर्भर बनेंगी । बच्चों के लिए स्कूली गणवेश की सरकारी खरीदी से इन समूहों   को  अच्छा बाज़ार और व्यवसाय मिलेगा । देश में छोटे -छोटे व्यवसायों में युवाओं के अल्पकालीन  प्रशिक्षण के लिए कौशल उन्नयन  की जो  योजनाएं चल रही हैं ,उनमें ऐसे परम्परागत व्यवसायों को अधिक से अधिक संख्या में जोड़ा जाना चाहिए । नागरिकों को भी चाहिए वे अपने घरेलू उपयोग के लिए जरूरी सामानों की खरीदी परम्परागत शिल्पकारों से या उनकी सहकारी समितियों की दुकानों से करें ।  खादी ग्रामोद्योग की दुकानों में  या एम्पोरियमों में ऐसे सामान खूब मिलते हैं ,लेकिन नये ज़माने की चमक -दमक वाले विज्ञापनों का मायाजाल फैलाने की कला उन्हें  नहीं मालूम ,इस वजह से  उन्हें हमेशा  ग्राहकों का इंतज़ार रहता है ।
    मुझे अभी जितना ख़्याल आया ,मैंने लिख दिया ।  इस विषय पर  चर्चा -परिचर्चा के और भी कई बिन्दु , और भी कई पहलू हो सकते हैं ,जिन पर  मित्रगण अगर चाहें तो विमर्श को  आगे बढ़ा सकते हैं ।
          -   स्वराज करुण

Tuesday, August 20, 2019

(आलेख) हीराकुद बाँध और अँधेरे में गाँधी मीनार की स्वर्णिम रौनक !

                         - स्वराज करुण
छत्तीसगढ़ और ओड़िशा राज्यों की जीवन -रेखा महानदी पर ओड़िशा के जिला मुख्यालय सम्बलपुर के पास है  दुनिया के  सबसे लम्बे  बाँधों में से एक हीराकुद जलाशय  ।  यूं तो इस बीच पारिवारिक यात्राओं में सम्बलपुर कई बार  आता -जाता रहा ,लेकिन वहाँ से हीराकुद महज़ 15 किलोमीटर होने के बावज़ूद समय की कमी के कारण हर यात्रा में  ' चलो अगली बार देखेंगे' ,सोचकर हम  घर लौट आए ।
     इस बार करीब 8 साल बाद उस दिन मुझे दूसरी बार सपरिवार इसे देखने का मौका मिला ,हालांकि समय की कमी के कारण पूरा नहीं देख पाए । अस्ताचलगामी सूरज की सिन्दूरी आभा के बीच मेरे मोबाइल कैमरे की आंखों में  विहंगम दृश्यों की कुछ तस्वीरें आ ही गयीं । यह विशाल बाँध हमारे देश की एक अनमोल धरोहर है ।
                     
      सिंचाई और बिजली उत्पादन के उद्देश्य से इसका निर्माण  वर्ष 1947 में स्वतंत्रता के  तत्काल बाद 1948 में शुरू हुआ और करीब एक  दशक बाद वर्ष 1957 में   पूर्ण कर  लिया गया  । मिट्टी और कांक्रीट से बने इस बाँध के तटबंध की लम्बाई 4801 मीटर यानी चार किलोमीटर और 801 मीटर है ,जबकि तटबंध सहित  इसकी कुल लम्बाई 26 किलोमीटर और ऊँचाई 61 मीटर  है । जानकारों के अनुसार यह एशिया महाद्वीप की सबसे बड़ी मानव निर्मित झील है । इसकी जलग्रहण क्षमता 810करोड़ घन मीटर है । बाँध के तटबंध के कारण 743 किलोमीटर की एक मानव निर्मित झील बन गयी है ।   
     बाँध में दो जलविद्युत परियोजनाएं चिपलिमा के नज़दीक स्थित हैं ,जिनकी कुल क्षमता 307 .5 मेगावाट है । इस परियोजना से सार्वजनिक क्षेत्र के राउरकेला इस्पात संयंत्र को भी बिजली दी जाती है ।  परियोजना का जलग्रहण क्षेत्र 83 हज़ार 400 वर्ग किलोमीटर है । इस बाँध से किसानों को खरीफ़ में एक लाख 56 हज़ार हेक्टेयर  और रबी मौसम में एक लाख 08हज़ार हेक्टेयर के रकबे में फसलों के लिए पानी मिलता है ।बाँध के जल विद्युत गृहों से निकलने वाले पानी से करीब 4 लाख 36 हज़ार हेक्टेयर खेतों को पानी मिल सकता है । हाल के कुछ वर्षों में यहाँ पर्यटकों के लिए दो ऊँचे मीनार भी बनाए गए हैं -राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के नाम पर गाँधी मीनार और आज़ाद भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू के नाम पर नेहरू मीनार।। उस दिन  सपरिवार वहाँ हमारे पहुँचने तक शाम हो गयी थी और टिकट काउंटर बन्द होने में कुछ ही मिनट बाकी थे । काउंटर वाले ने चिल्ला कर कहा -जल्दी कीजिए । गेट बन्द होने वाला है ।  हमने आनन -फानन में टिकट करवाया और गाड़ी में सर्पाकार  पहाड़ी रास्ते से  होकर  गाँधी मीनार तक पहुँच गए । कई पर्यटक पहले से वहाँ मौजूद थे ।
     मीनार की चक्करदार सीढ़ियों से ऊपर पहुँचकर सूर्यास्त का दृश्य भी  मैंने  अपने मोबाइल कैमरे में दर्ज कर लिया । फिर जैसे ही नीचे आए ,मीनार का गेट बन्द करने की सीटी बज गयी ।  वहाँ से उतर कर पहाड़ी के नीचे टैक्सी स्टैण्ड पर चाय पान और  भुट्टे आदि के ठेलों में आकर सबने हल्का नाश्ता किया और घर वापसी की शुरुआत हुई । इस बीच मैंने पहाड़ी के नीचे से ही मीनार की फोटो मोबाइल से खींच ली ।
       
 
शाम ढल चुकी थी । पहाड़ी पर अँधेरा छा  गया था,  लेकिन महात्मा गाँधी के सत्य और अहिंसा के मूल्यवान विचारों की तरह हीराकुद का  गाँधी मीनार उस वक्त बिजली की स्वर्णिम रौशनी की रौनक  में सोने जैसा  दमक  रहा था ।
      - स्वराज करुण

Friday, August 16, 2019

(स्मृति आलेख ) क्या -क्या नहीं थे हरि ठाकुर ?

                                     - स्वराज करुण 
व्यक्तित्व एक ,लेकिन कृतित्व अनेक ।  स्वर्गीय हरि ठाकुर के संदर्भ में यह बात बिल्कुल सटीक  बैठती है । सोच रहा हूँ -आज उनकी जयंती पर हम उन्हें किस रूप में याद करें ? क्या -क्या नहीं थे वह ?
      हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं के  एक ऐसे कवि थे  ,जिनकी कविताओं में और जिनके गीतों में  अन्याय और शोषण की जंजीरों से माटी -महतारी  की मुक्ति की बेचैन अभिव्यक्ति मिलती है । वह एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी , इतिहासकार , पत्रकार , लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के अग्रणी नेता भी थे । छत्तीसगढ़ के इतिहास और यहाँ की कला -संस्कृति , बोली और भाषा का उन्होंने गहन अध्ययन करते हुए कई गंभीर आलेख भी लिखे ।  छत्तीसगढ़ में  वर्ष 1857 के  अमर शहीद वीर नारायण सिंह सहित यहाँ की अनेक  महान विभूतियों की प्रेरणादायी जीवन गाथा उनकी लेखनी से जनता के सामने आयी ।
     उनका जन्म 16 अगस्त 1927 को रायपुर में हुआ था । उनके पिता स्वर्गीय प्यारेलाल सिंह ठाकुर   एक महान श्रमिक नेता ,आज़ादी के आंदोलन के महान योद्धा , सहकारिता आंदोलन के कर्मठ नेता , पत्रकार , विधायक और रायपुर नगरपालिका के तीन बार निर्वाचित अध्यक्ष रह चुके थे ।  स्वर्गीय हरि नारायण सिंह ठाकुर (हरि ठाकुर ) को देश और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा अपने क्रांतिकारी पिता जी से विरासत में मिली थी।  हरि ठाकुर का निधन तीन दिसम्बर 2001 को हुआ ।  ।   
अपने इस आलेख के साथ मैं स्वर्गीय डॉ. राजेन्द्र सोनी द्वारा सम्पादित साहित्यिक पत्रिका 'पहचान -यात्रा ' के   जून 2002 के 'हरि ठाकुर विशेषांक ' का मुखपृष्ठ भी प्रस्तुत कर रहा हूँ ,जिसमें उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर साहित्यकारों और पत्रकारों के आलेख शामिल हैं ।  इसी विशेषांक में छत्तीसगढ़ी भाषा मे  हरि ठाकुर द्वारा रचित दो नाटक भी प्रकाशित किए गए हैं ।इनमें से एक नाटक का  शीर्षक है ' पर बुधिया ' ।दूसरा नाटक स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में छत्तीसगढ़ में हुए  'तमोरा सत्याग्रह'  पर आधारित है ।
     उनके देहावसान  के अगले  दिन राजधानी रायपुर के मारवाड़ी श्मशान घाट में सैकड़ों लोगों ने अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें अंतिम बिदाई दी । उसी दिन छत्तीसगढ़ विधान सभा की बैठक  में उन्हें विशेष रूप से श्रद्धाजंलि दी गयी ।  तबके अध्यक्ष स्वर्गीय श्री राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल ने निधन उल्लेख करते हुए सदन में उनका जीवन परिचय प्रस्तुत किया । तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अजीत जोगी और तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष श्री नन्द कुमार साय समेत अनेक सदस्यों ने स्वर्गीय श्री हरि ठाकुर की  संघर्षपूर्ण और गौरवपूर्ण जीवन यात्रा पर प्रकाश डाला । उन सभी के वक्तव्य भी इस विशेषांक में संकलित हैं। श्री अजीत जोगी ने सदन में शोक उदगार कुछ इन शब्दों में व्यक्त किए थे -

 "माननीय अध्यक्ष महोदय , आज प्रातः 10 बजे जब कंचन की काया को चंदन की चिता पर लिटाकर अग्नि दी गयी ,तो उस चिता के सामने खड़ा मैं स्वर्गीय हरि ठाकुर को प्रणाम करते हुए यह याद कर रहा था  कि उनके रूप में मानो एक युग का अंत हो गया  , पटाक्षेप हो गया ।एक ऐसे छत्तीसगढ़ के सपूत को हमने खोया ,जो एक साथ न जाने क्या -क्या था ? कवि था ,साहित्यकार था ,इतिहासकार था और छत्तीसगढ़ के संदर्भ में ,छत्तीसगढ़ के  इतिहास के संदर्भ में ,छत्तीसगढ़ के गौरवशाली रत्नों के संदर्भ में एक चलते फिरते ग्रन्थ थे । लिविंग इनसाइक्लोपीडिया थे ,यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी ।...श्री हरि ठाकुर ने छत्तीसगढ़ की अस्मिता से हम  छत्तीसगढ़ियों को अवगत कराया । मेरा अनेक संदर्भो में उनके साथ सम्पर्क रहा ,सानिध्य रहा ।  मुझे याद आ रहा है एक दिन मैंने दुःखी होकर उनसे पूछा था -" छत्तीसगढ़ के इतने आंदोलन चलते हैं ।आप सबमें शामिल हो जाते हैं । आप वास्तव में हैं किसके साथ ? उन्होंने जवाब दिया - " मैं तो छत्तीसगढ़ राज्य बनाने वाले के साथ हूँ। कोई भी आंदोलन चलाएगा ...हरि ठाकुर उसके साथ रहेगा,तब तक साथ रहेगा ,जब तक छत्तीसगढ़ राज्य नहीं बन जाता ।"

         साहित्यिक पत्रिका 'पहचान यात्रा ' के इस विशेषांक में  छत्तीसगढ़ी भाषा के क्रमिक विकाश पर भी स्वर्गीय श्री  हरि ठाकुर का एक आलेख शामिल है ,जिसका शीर्षक है  'छत्तीसगढ़ी का प्राचीन नाम कोसली या महाकोसली ?' उनके निधन के बाद रायपुर में गठित हरि ठाकुर स्मारक संस्थान ने   छत्तीसगढ़ के इतिहास और राज्य की संस्कृति तथा महान विभूतियों से जुड़े उनके विभिन्न आलेखों का एक वृहद संकलन 'छत्तीसगढ़ गौरव गाथा ' शीर्षक से प्रकाशित किया । यह विशाल ग्रन्थ उनके जन्म दिन 16 अगस्त 2003 को प्रकाशित हुआ । ग्रन्थ का सम्पादन डॉ. विष्णुसिंह ठाकुर, डॉ. देवीप्रसाद वर्मा 'बच्चू जाजगीरी ' और आशीष सिंह ने किया है ।
     हरि ठाकुर सन १९४२ में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गांधीजी के आव्हान पर असहयोग आन्दोलन में भी शामिल हुए . देश की आज़ादी के बाद वर्ष १९५५ में उन्होंने गोवा मुक्ति आन्दोलन में हिस्सा लिया .इसके पहले वह  विनोबाजी के सर्वोदय और भूदान आन्दोलन से जुड़े और १९५४ में  उन्होंने नागपुर से  प्रकाशित भूदान आन्दोलन की पत्रिका '  साम्य  योग ' का सम्पादन किया .उन्होंने वर्ष १९६५ में छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की .
       रायपुर में उन्होंने वर्ष १९६७ में अपने  पिताजी के साप्ताहिक समाचार पत्र 'राष्ट्रबन्धु' के प्रकाशन और सम्पादन का दायित्व संभाला .नब्बे के दशक में वह  छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आन्दोलन के लिए सर्वदलीय मंच के  संयोजक रहे . एक नवम्बर २००० को छत्तीसगढ़ राज्य बना ,लेकिन अफ़सोस कि वह अपने सपनों के छत्तीसगढ़ को एक राज्य के रूप में विकसित होते ज्यादा समय तक नहीं देख पाए और राज्य बनने के सिर्फ लगभग तेरह  महीने  में ३ दिसम्बर  २००१ को उनका देहावसान हो गया . अगले दिन चार दिसम्बर को  छत्तीसगढ़ विधान सभा के  शीत कालीन सत्र पक्ष-विपक्ष के सभी सदस्यों ने  शोक-प्रकट करते हुए उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि दी .
        स्वर्गीय हरि ठाकुर  छत्तीसगढ़ की पुरानी और नयी ,दोनों ही पीढ़ियों के बीच सामान रूप से लोकप्रिय साहित्यकार थे वर्ष १९९५ में उनकी प्रेरणा से रायपुर में नये-पुराने लेखकों और कवियों ने मिलकर साहित्यिक संस्था 'सृजन सम्मान ' का गठन किया . उन्हें इस संस्था का अध्यक्ष बनाया गया था  . छत्तीसगढ़ के इतिहास , साहित्य और यहाँ  की कला -संस्कृति का उन्होंने गहरा अध्ययन किया था  । वर्ष १९७० -७२ में बनी दूसरी छत्तीसगढ़ी फिल्म 'घर-द्वार ' में लिखे उनके  के गीतों को  अपार लोकप्रियता मिली .इनमें से  मोहम्मद रफ़ी की दिलकश आवाज़ में  एक गीत ' गोंदा फुलगे मोरे राजा ' तो आज भी कई लोगों की जुबान पर है.
  हरि ठाकुर के  हिन्दी  कविता संग्रहों में 'लोहे का नगर ' और  नये विश्वास के बादल ' छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रहों में 'सुरता के चन्दन '   हिन्दी शोध-ग्रन्थों  में 'छत्तीसगढ़  राज्य का प्रारंभिक  इतिहास' ,  'उत्तर कोसल बनाम दक्षिण कोसल' विशेष रूप  से उल्लेखनीय हैं .उन्होंने   अपनी  कविताओं  में हमेशा आम जनता के दुःख-दर्द  को अभिव्यक्ति दी । उन्होंने गीत विधा के साथ -साथ अतुकांत कविताएँ भी लिखीं । अपनी कविताओं के माध्यम से उन्होंने  देश की  सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों पर तीखे प्रहार  किए . बानगी  देखिये -

नदी वही है ,नाव वही है
लेकिन वह मल्लाह नहीं है ।
धन बटोरने की चिन्ता में ,
जनहित की परवाह नहीं है ।।
       
  वस्तुतः स्वर्गीय हरि ठाकुर का सुदीर्घ साहित्यिक और सार्वजनिक जीवन उन हजारों , लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का प्रकाश पुंज है ,जो अपने देश और अपनी धरती के लिए कुछ करना चाहते हैं । वरना यह मनुष्य देह भी क्या है ,जो जन्म लेकर यूँ ही निरुद्देश्य मर -खप जाती है ,लेकिन जिन लोगों के जीवन का पथ उतार -चढ़ाव से  भरे दुर्गम पर्वतों से  होकर गुजरता है और जिनकी जीवन यात्रा उस पथरीले पथ पर मानवता के कल्याण का मकसद लेकर चलती है , वो  इतिहास बनाकर  लोगों के दिलों में हरि ठाकुर की तरह हमेशा के लिए यादगार बनकर रच -बस जाते हैं ।
  - स्वराज करुण

Thursday, August 15, 2019

(आलेख )प्राइवेट बनाम सरकारी : शिक्षा में किसका पलड़ा भारी ?

                                -- स्वराज करुण 
 अगर कोई पूछे कि सरकारी और प्राइवेट शिक्षा संस्थानों में पढ़ाई और रिजल्ट के मामले में  किसका पलड़ा भारी है तो मुझ जैसे अधिकतर लोग सरकारी संस्थाओं के पक्ष में होंगे । लेकिन आज की स्थिति में समाज का मानसिक झुकाव सिर्फ़ 'शो-बाजी'  के कारण प्राइवेट संस्थाओं की ओर बढ़ता जा रहा है ,जो हमारी नयी और भावी पीढ़ियों के लिए घातक हो सकता है ।
     गंभीरता से विचार करें और देखें तो मालूम होगा कि देश के उच्च और सर्वोच्च  पदों पर आसीन 99 प्रतिशत  वर्तमान और भूतपूर्व महानुभावों ने अपनी प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा सरकारी स्कूलों और सरकारी कॉलेजों में हासिल की है ,जिनमें राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों सहित बड़ी संख्या में केंद्रीय मंत्री , राज्यों के मुख्यमंत्री और मंत्रीगण ,सांसद और विधायकगण , कई प्रसिद्ध वैज्ञानिक ,शिक्षाविद , प्रसिद्ध डॉक्टर और इंजीनियर ,  साहित्यकार ,कलाकार आदि शामिल हैं । प्रशासनिक सेवाओं के उच्च पदस्थ अधिकारियों में से भी कम से कम 90 प्रतिशत अफसरों की प्रारंभिक शिक्षा सरकारी स्कूलों में हुई है ।
      वहीं दूसरी तरफ़ हम देखते हैं कि प्राइवेट शिक्षा संस्थानों ने देश को अब तक  कोई उल्लेखनीय प्रतिभाएं नहीं दी हैं । इसके बावज़ूद  हमारे यहाँ प्राइवेट स्कूल -कॉलेजों ,कोचिंग संस्थाओं और प्राइवेट विश्वविद्यालयों की मनमानी विज्ञापन बाजी से  समाज में उनका भ्रामक आकर्षण बढ़ता जा रहा है ,जो गहरी  चिन्ता और चिन्तन का विषय  बन गया है !  उनमें से अधिकांश तो कई बड़े -बड़े करोड़पति और अरबपति रसूखदारों के संस्थान होते हैं और कई तो ऐसी संस्थाएं खोलकर शिक्षा की दुकान चलाते हुए करोड़पति और अरबपति बन जाते हैं ।
    प्राइवेट स्कूल -कॉलेजों और निजी विश्वविद्यालयों के नाम भी या तो अंग्रेजीनुमा होते हैं या फिर उनका नामकरण ऐसा लगता है मानो उनके  मालिकों के नाम या  सरनेम पर हुआ है । इससे उन संस्थाओं के प्रति आम जनता और विद्यार्थियों में आत्मीयता की भावना नहीं होती , जबकि सरकारी शिक्षण संस्थाओं के नाम प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों , अमर शहीदों और  अन्य कई महान विभूतियों और दानदाताओं के नाम पर रखे जाते हैं , ताकि विद्यार्थी उनसे प्रेरणा ग्रहण कर सकें।
                अगर स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता पर विचार करें तो सरकारी स्कूलों में जितने प्रशिक्षित अध्यापक होते हैं ,उतने प्राइवेट में कहाँ होते हैं ?  कई राज्यों के सरकारी स्कूलों में बच्चों को  मध्यान्ह भोजन और  गणवेश के साथ -साथ पाठ्य पुस्तकें भी मुफ़्त मिलती हैं ,जबकि प्राइवेट स्कूलों में नहीं । बोर्ड परीक्षाओं की मेरिट सूची में  भी सरकारी स्कूलों के बच्चों का पलड़ा भारी रहता है ,जबकि प्राइवेट स्कूलों के इने गिने बच्चे ही मेरिट में आते हैं । यही स्थिति विश्वविद्यालयों की मेरिट सूचियों में भी देखी जा सकती है ।
   दरअसल प्राइवेट स्कूल -  कॉलेजों में  सितारा होटलनुमा भवनों और उसी तरह की  होटलनुमा सुविधाओं के अलावा कुछ  रहता भी नहीं । जैसे -एयरकंडीशनरों से सुसज्जित क्लास रूम , जलपानगृह और एसी वाले डायनिंग हॉल ,  स्कूल बसों की सुविधाएं आदि । फीस भी उनकी काफी तगड़ी होती है ।  इनके झूठे  ग्लैमर के मायाजाल में फँसकर  पैसे वाले अभिभावक  तो अपने बच्चों को वहाँ दाखिल करवा लेते हैं ,जबकि गरीब,मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय अभिभावकों और उनके बच्चों में हीन भावना पैदा होती  है  । 
     हमने सुना है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में ऐसी विसंगतियों को दूर करने का अच्छा प्रयास किया है । यह भी बताया जाता है कि दिल्ली सरकार ने शासकीय स्कूलों को निजी क्षेत्र के स्कूलों की तरह शानदार भवनों और शैक्षणिक उपकरणों की भी व्यवस्था की है ।
       सरकारी क्षेत्र में  जवाहर नवोदय विद्यालयों को ' रोल मॉडल'  के रूप लिया जा सकता है ,लेकिन ये मात्र अपवाद हैं । काश कि सभी सरकारी स्कूल सुविधाओं के मामले में निजी क्षेत्र के सितारा होटल जैसे स्कूलों की तरह न सही ,कम से कम  जवाहर नवोदय विद्यालयों जैसे तो  हो जाएं ।
       -- स्वराज करुण

((ग़ज़ल ) आज़ादी ...?

सभी मित्रों को आज़ादी के महापर्व और रक्षाबन्धन  की हार्दिक शुभेच्छाएँ ।   स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर 36 साल पहले दैनिक ' देशबन्धु ' में प्रकाशित मेरी एक रचना । कृपया इसे देश की तत्कालीन सामाजिक -आर्थिक परिस्थितियों के  परिप्रेक्ष्य में देखें और पढ़ें । निश्चित रूप से इन 36 वर्षों में परिस्थितियाँ काफी कुछ बदली हैं और पहले की तुलना में लोगों के जीवन स्तर में भी सुधार आया है । इसके बावज़ूद  विकास की तीव्र गति वाली दौड़ में करोड़ों लोग पीछे रह गए हैं । देश के कई कोनों में  आर्थिक विषमताओं  का अँधेरा आज भी कायम है ।उन्हीं विषमताओं के अँधकार से घिरे लोगों के दर्द को अभिव्यक्त करने की कोशिश  है मेरी यह रचना ।

Tuesday, August 13, 2019

(आलेख) चाँदनी को है रौशनी का इंतज़ार !


                              - स्वराज करुण
  जिस चिकने -चौड़े  राष्ट्रीय राजमार्ग पर चमचमाती मोटर गाडियाँ तूफ़ानी रफ़्तार से दिन - रात  भागती -दौड़ती रहती हैं ,उसके ठीक  एक किनारे पर कभी -भी आ धमकने वाले हादसों से बेपरवाह  कुछ गरीब परिवार झोपड़ियाँ बनाकर मेहनत -मज़दूरी करते हुए  किसी तरह गुज़र - बसर कर रहे हैं ।  इन्हीं में से एक है चाँदनी का परिवार । वह छत्तीसगढ़ के  घुमन्तू देवार समुदाय की है ।
      नाम चाँदनी ,लेकिन घर में भी और जीवन में भी अँधेरा  ही अँधेरा । उसे इंतज़ार है -विकाश की उस रौशनी का ,जो  उसके परिवार को   छोटा ही सही   लेकिन एक पक्का मकान दिलवा दे ,जिसमें बिजली की भी  रौशनी हो ,पानी की उचित व्यवस्था हो । चाँदनी की तरह ज्योति भी अपने परिवार के लिए वर्षो से यह सपना देख रही है । यहाँ पर देवार समुदाय के अलावा  कुछ अन्य समुदायों के गरीब परिवार भी  झुग्गी बनाकर वर्षों से बसे हुए हैं । इन सबका सपना है कि उनका अपना एक मकान हो ।
       देवार परिवारों के पुरुष अपनी सायकलों के कैरियर के दोनों ओर प्लास्टिक की बड़ी - बड़ी थैलियाँ बाँधकर शहर में दिन भर टिन -टप्पर और दूसरी तरह के कबाड़ ,प्लास्टिक की पन्नी आदि बीनते हैं और कबाड़ियों के पास बेचकर कुछ कमाई कर लेते हैं । ऐसा करके ये लोग शहर की साफ़ -सफ़ाई में भी अप्रत्यक्ष रूप से ही सही ,मददगार तो साबित हो रहे हैं । कुछ पुरुष पेंटर और मोटर मिस्त्री भी हैं । इस झोपड़ -पट्टी में लगभग चालीस -पचास परिवारों का बसेरा है । कुछ के मकान कच्चे और कुछ  अधपके हैं । कुछ घरों में बिजली का कनेक्शन है तो कुछ में नहीं ।  निस्तारी सुविधा का कोई ठिकाना नहीं ।
     चाँदनी की  छोटी -सी झोपड़ी में बिजली कनेक्शन का तो सवाल ही नहीं उठता ।जहाँ पैर फैलाकर सोना या फिर कुछ आराम से बैठ पाना हमारे - आपके लिए मुमकिन नहीं ,उसी झोपड़ी में चाँदनी अपने पति बुधारू और बच्चों के साथ रहती है । अगर भारी बरसात हुई तो बहुत तकलीफ़ हो जाती है । झोपड़ी में पानी भर जाता है ।तब  ये लोग बाजू में नगर निगम के शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के बरामदे में शरण लेते हैं ।
    चाँदनी बताती हैं -  बरसात की रातें  तो उस परछी में किसी तरह कट जाती हैं ,लेकिन सुबह होते ही जब  कॉम्प्लेक्स की दुकानों के शटर उठाए जाते हैं ,तब दुकानदार उन्हें डपट कर भगा देते हैं । इस कॉम्प्लेक्स में मोटर मैकेनिक और ऑटोपार्ट्स बेचने वालों की छोटी -छोटी दुकानें हैं ।  अपनी दुकान के चबूतरे या बरामदे में किसी परिवार को आश्रय देने पर कारोबार में रुकावट आती है ।इसलिए उन्हें  वहाँ से हटाना उनकी  मज़बूरी है।
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    श्रमजीवी गरीबों की यह झुग्गी बस्ती रायपुर नगर निगम के मठपुरैना वार्ड में सरकारी स्कूलों के बगल में ही है ,लेकिन यहाँ के अधिकांश बच्चे स्कूल नहीं जाते ।  मेरी मुलाकात जिन दस -पन्द्रह बच्चों से हुई ,उनमें  दो भाई - बहन राहुल और सानिया नेताम भी थे ।  राहुल सातवीं और सानिया पाँचवी कक्षा में है । दोनों की तमन्ना इंजीनियर बनने की है। उनके पिता श्यामलाल नेताम किसी मोटर गैरेज में काम करते हैं । बातचीत में सानिया काफी होशियार लगी । उसने बताया कि चौथी कक्षा वह प्रथम श्रेणी याने कि  ए -ग्रेड में पास हुई है ।  स्कूल में दोपहर का भोजन मिलता है । एक पुस्तक स्कूल से मिली है बाकी किताबें हमने दुकान से खरीदी है ।
    यह पूछने पर कि उसके अगल-बगल की झुग्गियों में रहने वाले बहुत - से बच्चे स्कूल क्यों नहीं जाते ,सानिया कहती है -इन्हें कितना भी समझाओ ,पढ़ने में इनका मन लगता ही नहीं । दिन भर स्कूल के पास ही खेलते -टहलते रहते हैं ।  इनके माता -पिता भी ध्यान नहीं देते ।सानिया का एक कमरे का   घर हालांकि कुछ कच्चा है लेकिन दूसरों से कुछ ठीक है ,फिर भी उसके बताए अनुसार बरसात में छत टपकती है  और कमरे में पानी भर जाने पर रात भर जागना पड़ता है । सानिया यह भी बताती है कि इस बस्ती को ' डेरा पारा ' बोला जाता है । यह नाम 'देवार डेरा'   के कारण पड़ा है ।
  सानिया के पास खड़ी एक नन्हीं -सी बच्ची वर्षा पहली कक्षा में है ।  उसके सपनों के बारे में पूछने पर मुस्कुराते हुए बोली -बड़ी होकर मैं पुलिस बनूंगी। तीसरी कक्षा की रुखसाना भी पुलिस बनना चाहती है ।वर्षा के पिता समारू नेताम भी कचरा बीनने का काम करते हैं । गोली का ग्यारह साल का बेटा करण और दुकालू का दस साल का बेटा नियम स्कूल नहीं जाते । मेरे ख़्याल से अगर अध्यापक गण इस झुग्गी बस्ती में नियमित रूप से आकर बच्चों के अभिभावकों को समझाएं तो सभी बच्चे स्कूल जाने लगेंगे ।  शिक्षकों को उनसे सम्पर्क करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए ,क्योंकि गरीबों की यह बस्ती उनके स्कूल से बमुश्किल 50 कदम पर  है ।  बशर्ते अध्यापक इसे अपनी एक नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी मानकर ऐसा करें ।
     झोपड़ पट्टी की महिलाओं ने बताया कि  वहाँ निवास कर रहे  परिवारों में से कुछ के राशन कार्ड हैं ,वोटर कार्ड और  आधार कार्ड भी बन गए हैं। इन्हें सरकारी आवास योजना का लाभ मिल जाए तो ये इस बदतर स्थिति से उबर सकते हैं ।  कई महिलाओं ने बताया कि एक बार तहसील ऑफिस से कोई अधिकारी आए थे ।उन्होंने  पट्टे के लिए  फार्म भी भरवाया था ,लेकिन अब तक  कुछ नहीं हुआ ।
      -स्वराज करुण

Monday, August 12, 2019

(आलेख ) गौमाता को मिलना चाहिए ' राष्ट्रीय पशु ' का दर्जा

                           -स्वराज करुण 
            हमें अत्यंत शांत ,शालीन , सौम्य और अहिंसक 'गौमाता'को राष्ट्रीय पशु घोषित करना चाहिए । अभी तो हमारे यहाँ बेहद बेरहम और खूँखार जानवर बाघ को राष्ट्रीय पशु का दर्जा प्राप्त है ।  इस हिंसक जानवर को यह सम्मान वर्ष 1973 से मिला हुआ है । इसके पीछे बाघ को विलुप्तप्राय वन्य जीव मानकर उसके संरक्षण की दलील दी जाती है ।  जहाँ तक संरक्षण का सवाल है ,आप उसे जंगलों  में, अभयारण्यों में  संरक्षण देते रहिए ।
     
    लेकिन जो पशु हमें दूध ,घी ,दही ,मही जैसे पौष्टिक द्रव्यों से उत्तम स्वास्थ्य और ऊर्जा प्रदान करे , जिसकी सन्तान के रूप में बैल हमारी खेती के काम आते हों और इन सब कारणों  से हमारे देश में हजारों साल से गौमाता के रूप में जिसकी पूजा होती चली आ रही है  , आम जन मानस में जिसकी छवि एक माता के रूप में है , जिसके बारे में हमने अपने बचपन की स्कूली किताबों में पढ़ा है कि 'गाय  हमारी माता है ' क्या उस  गौ माता' को राष्ट्रीय पशु का दर्जा नहीं मिलना चाहिए ?  अगर नहीं तो क्यों ? कोई ठोस कारण तो बताए ?
        मेरे खयाल से गौमाता को राष्ट्रीय पशु घोषित कर हमें उसके संरक्षण के लिए हर संभव कदम उठाना चाहिए । अगर सरकारी तौर पर गौ माता को राष्ट्रीय पशु के रूप में मान्यता मिल जाए तो उसे  कचरे के ढेर पर प्लास्टिक ,पॉलीथिन और इस प्रकार के नुकसानदायक पदार्थों को खाने से बचाया जा सकेगा । उसके लिए चारे -पानी की उचित व्यवस्था हो सकेगी ।
     चूंकि तब वह राष्ट्रीय पशु होगी ,इसलिए  उसके संरक्षण के भी ठीक वैसे ही कठोर  कानूनी  प्रावधान  होंगे ,जैसे  वर्तमान में 'बाघ ' के लिए है । इससे गोवंश का भी समुचित संरक्षण और संवर्धन हो सकेगा । गोवंश के गोबर से जैविक खाद बनेगी ,जिससे खेतों की उर्वरकता बढ़ेगी और  शुद्ध अनाज पैदा होगा । रसोईघरों के लिए बायोगैस मिलेगी और  गोमूत्र से पर्याप्त मात्रा में स्वास्थ्यवर्धक औषधियाँ बनायी जा सकेंगी ।
          -स्वराज करुण
(फोटो : इंटरनेट से साभार )
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Wednesday, July 3, 2019

(आलेख ) गजराज आख़िर क्यों बन रहे यमराज ?

                                 - स्वराज करुण 

      हाथी जब किसी गाँव ,कस्बे या शहर  में अपने महावत के साथ घूमता है ,तो  लोगों के और विशेष रूप से बच्चों के आकर्षण का केन्द्र होता  है। ।
       उस समय लगता है इससे सीधा जानवर और कहीं नहीं मिलेगा , लेकिन बिना महावत का वही जंगली हाथी गाँवों में आतंक और उपद्रव का पर्याय बन जाता है ।   जैसा कि इन दिनों हमारे देश के कई राज्यों में देखा जा रहा है । जन -जागरण के तमाम अच्चेव प्रयासों के बावज़ूद जंगल घटते जा रहे हैं और वन्य प्राणियों के लिए चारे - पानी की समस्या बढ़ती जा रही है !
      ऐसे में   किसी जंगली हाथी को या उसके झुण्ड को जंगल में खाने को कुछ न मिले तो वह  गाँवों में आकर किसानों की खड़ी फ़सल को  चट कर जाते हैं और तोड़फोड़ में भी पीछे नहीं रहते । इतना ही नहीं ,बल्कि कई बार तो ये जंगली हाथी निरीह इंसानों को  बड़ी बेरहमी से कुचलकर मार डालते हैं ।  इंसानों को तब समझ में आता
 है कि गजराज आख़िर क्यों इस तरह  'यमराज '  बनते जा रहे हैं !
    बहरहाल , मुझे उस दिन  शहर के एक बाज़ार में महावत के साथ स्थानीय बच्चों को अपनी पीठ पर बैठकर  चहलकदमी करता एक हाथी मिल गया ,तो मेरे मोबाइल  ने उसे अपने कैमरे में कैद कर लिया । बाकी दो तस्वीरें  सर्च इंजन Google से साभार ।
        --स्वराज करुण

Tuesday, June 25, 2019

(आलेख) दुनिया को जल्द नज़र आएगा एक भूला -बिसरा जमींदोज़ शहर !

                          -स्वराज करुण 
      दुनिया को बहुत जल्द दो हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराने एक ऐसे भारतीय शहर का पता चल जाएगा ,जो अभी धरती माता के गर्भ से धीरे -धीरे बाहर आ रहा है ।  यह भूला -बिसरा शहर भारत के प्राचीन इतिहास में दक्षिण कोशल के नाम से प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ के ग्राम रींवा में ज़मीन के नीचे दबा हुआ था ,जो निकट भविष्य में हमें नज़र आएगा ।  राज्य सरकार ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से अनुमति लेकर यहाँ उत्खनन शुरू करवाया है ।   रायपुर जिले में आरंग तहसील के इस गाँव 40 ऐसे टीले हैं जो पुरातत्व की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं ।फिलहाल इनमें से दो टीलों में उत्खनन चल रहा है ,जो राज्य सरकार के पुरातत्व सलाहकार   डॉ .अरुण कुमार शर्मा के मार्गदर्शन में  करीब तीन हफ़्ते पहले शुरू हुआ है ।


     भारत सरकार द्वारा वर्ष 2017 में पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित 86 साल के  डॉ .शर्मा को छत्तीसगढ़ सहित देश के लगभग 20 राज्यों में पुरातात्विक उत्खनन का 45 वर्षों का लम्बा तजुर्बा है ।  वह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग में वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं । हाल के वर्षों में उन्होंने छत्तीसगढ़ के दो प्राचीन शहर सिरपुर और राजिम में भी उत्खनन कार्यो का नेतृत्व किया है ।
 भारतीय पुरातत्व पर अंग्रेजी में  उनकी 52 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । वयोवृद्ध डॉ  शर्मा इस उम्र में भी पूरे जोश और जज़्बे के साथ रींवा गाँव में दक्षिण कोशल के भूमिगत इतिहास को खोदने और खँगालने में लगे हुए हैं । वह छत्तीसगढ़ के ही धरतीपुत्र हैं ।शायद यह भी 86 साल की उम्र में उनके युवा जोश और जज़्बे का एक प्रमुख कारण है । वह रोज सुबह 8 बजे साइट पर पहुँच जाते हैं और अपने विभागीय सहयोगियों और स्थानीय मजदूरों के साथ शाम 5 बजे तक उत्खनन गतिविधियों में  लगे रहते हैं ।
              डॉ. शर्मा कहते हैं -रींवा गाँव में 40 ऐसे टीले हैं ,जिनमें भारत और दक्षिण कोशल के वैभवशाली इतिहास के अनेक मूल्यवान तथ्य दबे हुए हैं । इन सबके उत्खनन में कम से कम 5 साल का वक्त लग सकता है ।फिलहाल हम लोगों ने  20 टीलों के उत्खनन का लक्ष्य रखा है ।  पुरातात्विक उत्खनन बहुत सावधानी से और वैज्ञानिक पद्धति से  करना होता है ।   इन 20 टीलों में से वर्तमान में दो टीलों पर उत्खनन  चल रहा है ।इनमें से एक टीला मुम्बई -कोलकाता राष्ट्रीय राजमार्ग 53 के किनारे स्थित है । यह किसी बौद्ध स्तूप के आकार का है । इसकी 9 परतों में से 7 का उत्खनन हो चुका है । इसमें किसी महात्मा की अस्थियाँ हो सकती हैं । इसे मौर्यकालीन बौद्घ स्तूप माना जा रहा है ,जो मिट्टी का बना हुआ है । डॉ. अरुण कुमार शर्मा बताते हैं कि यह छत्तीसगढ़ में अब तक के उत्खनन में प्राप्त मिट्टी का पहला बौद्ध स्तूप है। इसके पहले सिरपुर में  पत्थरों से और भोंगपाल (बस्तर )में ईंटों से निर्मित स्तूप मिल चुके हैं  ।रींवा में दूसरा उत्खनन एक विशाल तालाब के पास हो रहा है ,जहाँ आसपास आम और पीपल आदि के कई बड़े -बड़े वृक्ष और बबूल की कँटीली झाड़ियाँ भी हैं । छिन्द के भी कुछ पेड़ वहाँ पर हैं ।
      अब तक के उत्खनन में इस टीले से कुछ स्वर्ण , कुछ रजत और कुछ ताम्र मुद्राएं भी मिली हैं । इनके अलावा मिट्टी के दीये और बर्तन तथा हाथी दांत से बनी सजावटी वस्तुओं के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं । स्वर्ण मुद्राओं में से एक पर ब्राम्ही लिपि में "कु' शब्द अंकित है । डॉ .शर्मा इसे कुमारगुप्त के समय का मानते हैं । सजावटी मालाओं में गूँथने के लिए उपयोग में लायी जाने वाली छोटी -छोटी मणि कर्णिकाओ का ज़खीरा भी मिला है । डॉ. शर्मा के अनुसार ये तमाम अवशेष ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के याने लगभग 2200 वर्ष पुराने हैं । वह कहते हैं -सुदूर अतीत में रींवा कोई गाँव नहीं ,बल्कि एक बड़ा शहर और प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था ।महानदी इसके नज़दीक से बहती थी । तत्कालीन समय में पेड़ों की अत्यधिक कटाई होने के कारण नदी के किनारों पर भी कटाव हुआ । इस वज़ह से महानदी यहाँ से 8 किलोमीटर दूर खिसक गयी ।  रींवा से 50 किलोमीटर पर छठवीं -आठवीं सदी में शैव ,वैष्णव और बौद्ध मतों के त्रिवेणी संगम के नाम से प्रसिद्ध सिरपुर भी महानदी के किनारे स्थित है । छत्तीसगढ़ के प्रयाग राज के नाम से मशहूर राजिम  महानदी ,पैरी और सोंढूर नदियों के संगम पर है। पुरातत्व वेत्ता डॉ .अरुण कुमार शर्मा बताते हैं कि प्राचीन काल में राजिम और सिरपुर से ओड़िशा के समुद्र तटवर्ती  शहर कटक  तक जल मार्ग से व्यापार होता था । इतना ही नहीं ,सिरपुर से सूरत (गुजरात) तक कारोबार स्थल -मार्ग से भी होता था । सिरपुर में हुए उत्खनन में दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार भी मिला है ,जहाँ दोमंजिला दुकानें हुआ करती थीं ।एक ऐसी मुहर (सील ) भी वहाँ मिली है ,जिस पर फ़ारसी लिपि में 'बन्दर-ए-मुबारक सूरत ' लिखा हुआ है । उल्लेखनीय है कि सूरत गुजरात का बंदरगाह शहर है ।
       बहरहाल हम एक बार फिर लौट आते हैं रींवा गाँव की ओर । डॉ .अरुण कुमार शर्मा  अपनी यादों में दर्ज इतिहास के पन्ने  पलटते हुए कहते हैं - रींवा गाँव दरअसल वीर भूमि है । इसे रींवा गढ़ के नाम से भी जाना जाता है । गढ़ याने किला । यहाँ पर भी  मिट्टी से  निर्मित एक बड़ा किला (मडफ़ोर्ट )था , जिसके सुरक्षा घेरे के रूप में मिट्टी की मज़बूत दीवारें थीं । आधुनिक ज्ञान -विज्ञान के इस दौर में दूर संवेदी भू -उपग्रह  के जरिए भी इसकी पुष्टि हो चुकी है । रींवा गढ़ का उल्लेख अंग्रेज अधिकारी लॉर्ड कनिंघम ने भी अपने अभिलेखों में किया है ।
      अगर यह इतना बड़ा शहर था तो जमींदोज क्यों हो गया ? इस सवाल पर डॉ .अरुण शर्मा कहते हैं - पुराने समय में भयानक  बाढ़ ,भूकम्प और महामारी जैसी आपदाओं के समय लोग अपने गाँव या शहर छोड़कर अन्यत्र पलायन कर जाते थे और बस्तियां वीरान हो जाती थीं ।यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा ।समय के प्रवाह में इस बस्ती के भवनों पर  सैकड़ों वर्षों तक धूल और मिट्टी की परतें चढ़ती गयीं और वो जमींदोज हो गयीं ।
            फ़िलहाल उत्खनन जारी है ।  भूमिगत इतिहास के पन्नों पर जमी सैकड़ों वर्षों की धूल  हटाई जा रही है । डॉ .अरुण कुमार शर्मा जैसे वरिष्ठतम पुरातत्ववेत्ता की पारखी आंखें अपनी गहन इतिहास दृष्टि से उन्हें पलटने और  पढ़ने में लगी हैं ।  उम्मीद की जानी चाहिए कि  उनके गहन अध्ययन ,उत्खनन और अनुसंधान से एक बहुत पुराना भूला -बिसरा शहर फिर हमारे सामने होगा । टाइम मशीन भले ही काल्पनिक हो, लेकिन प्रत्यक्ष में हो रहे इस कार्य  से शायद हम दो हज़ार साल से भी ज्यादा पुराने ज़माने को  और उस दौर की इंसानी ज़िन्दगी को महसूस तो कर सकेंगे ! वह एक रोमांचक एहसास होगा ।
         -स्वराज करुण

Friday, June 14, 2019

आलेख : प्राचीन इतिहास पर नयी रौशनी !

                                     -स्वराज करुण 
       छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सिर्फ़ 25 किलोमीटर की दूरी पर दो हजार साल से भी ज्यादा पुरानी मौर्यकालीन बौद्ध संस्कृति की एक नयी बसाहट का पता चला है । रायपुर जिले  के  तहसील मुख्यालय आरंग के पास ग्राम रींवा में एक टीले पर राज्य शासन के पुरातत्व विभाग द्वारा  उत्खनन जोर -शोर से किया जा रहा है । माना जा रहा है इस उत्खनन में  दक्षिण कोशल के नाम से प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास पर नयी रौशनी पड़ सकती है ।
         

         यह स्थान मुम्बई -कोलकाता राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 53 के बिल्कुल किनारे पर है । विभागीय अधिकारियों ने बताया कि इस टीले से एक बौद्ध स्तूप निकलने की प्रबल संभावना है । यह भी माना जा रहा है कि सुदूर अतीत में वहाँ एक विकसित बसाहट भी रही होगी ।उत्खनन के दौरान वहां स्तूप की दीवारों की बुनियाद और ईंटें  भी नज़र आने लगी है । पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार यह  मौर्यकालीन स्तूप  ईसा  पूर्व तीसरी  शताब्दी का हो सकता  हैं । याने आज से कोई तेईस सौ साल पुराना । जिस आकार -प्रकार की ईंटें वहां मिल रही हैं ,उन्हें देखकर यह अनुमानित काल निर्धारण किया गया है ।  इस आलेख के लेखक ने उस दिन देश के मशहूर पर्यटन ब्लॉगर ललित शर्मा के साथ वहाँ  धरती के गर्भ से निकलते इतिहास को देखा ।
    वैसे तो पुरातत्व की दृष्टि से सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ ही अत्यंत समृद्ध है । आरंग तहसील भी इस मामले में कम नहीं है। पौराणिक इतिहासकारों के अनुसार आरंग शहर को  राजा मोरध्वज की राजधानी माना जाता है । वहां का भांड देवल मन्दिर प्रसिद्ध है ,जो  भारत सरकार द्वारा  संरक्षित ऐतिहासिक  स्मारक है । छत्तीसगढ़ और ओड़िशा की जीवन रेखा महानदी आरंग के नजदीक से बहती है । पुराणों में चित्रोत्पला गंगा के नाम से वर्णित इस नदी का उदगम भी छत्तीसगढ़ में है. ।यहाँ के सिहावा पर्वत से निकलकर करीब आठ सौ किलोमीटर का लम्बा सफ़र तय करते हुए यह बंगाल की खाड़ी के विशाल समुद्र में समाहित हो जाती है ।  महानदी के किनारे छत्तीसगढ़ से ओड़िशा तक अनेक प्रसिद्ध तीर्थ और ऐतिहासिक स्थान हैं ।
         दक्षिण कोशल (प्राचीन छत्तीसगढ़ )में शैव ,वैष्णव और बौद्ध संस्कृतियों के त्रिवेणी संगम के नाम से प्रसिद्ध सिरपुर भी महानदी के किनारे स्थित है ।  सिरपुर को हमारे प्राचीन भारतीय इतिहास में  'श्रीपुर' के नाम से भी जाना जाता है । इतिहासकार बताते हैं कि यहाँ प्राप्त स्मारक सातवीं -आठवीं शताब्दी के हैं ।  सिरपुर में गन्धरेश्वर महादेव और लक्ष्मण मन्दिर के अलावा प्राचीन बौद्ध विहार भी हैं ,जिन्हें केन्द्र तथा राज्य सरकारों के द्वारा  संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है ।
   ब्लॉगर ललित शर्मा कहते हैं कि ग्राम रींवा ,जहां अभी टीले का उत्खनन हो रहा है ,महानदी पहले वहाँ से होकर भी  बहती रही होगी । हजारों साल के समय प्रवाह में नदियाँ अपना रास्ता बदलती रहती हैं । रींवा के तालाब की मेड़ों को देखकर उन्होंने कहा कि इस जगह पर किसी राजा का मृदा भित्ती दुर्ग (मड फोर्ट ) रहा होगा ।बहरहाल ,पुरातत्व विभाग के अधिकारी स्थानीय श्रमिकों के साथ पूरी गंभीरता और तत्परता से वहाँ उत्खनन में  लगे हुए हैं और  भूमिगत हो चुके भारतीय इतिहास के धुंधले पन्नों की धूल झाड़कर उन्हें पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं ।
        - स्वराज करुण
 (तस्वीरें : मेरे 'मोबाइल' की आंखों से ) 

Thursday, June 13, 2019

( कहानी ) क्या था उस रहस्यमयी आवाज़ का रहस्य ?


                                 - स्वराज करुण 
छपाक  ...छपाक ..छपाक !   रात एक  बजे हॉस्टल के थर्ड फ्लोर में  दक्षिणी कॉरिडोर के अंतिम छोर पर बने बाथरूम के भीतर से यह कैसी आवाज़ आ रही है ? पूरा कॉरिडोर गूँज रहा है !
       मैं परीक्षाओं के उस  मौसम में बीए फाइनल के  तीसरे पर्चे की तैयारी के लिए अपने रूम पार्टनर महेन्द्र के साथ रतजगा कर रहा था । थर्ड फ्लोर  में  तीन कॉरिडोर  और  तीस कमरे थे ,लेकिन  अधिकांश कमरे खाली थे । जिनकी परीक्षाएं हो चुकी थी, वो सब विद्यार्थी अपने -अपने घर चले गए थे ।  छात्रों की इतनी कम संख्या को देखते हुए मेस की व्यवस्था भी अस्थायी रूप से बन्द कर दी गयी थी ।  भोजन बाहर किसी होटल से करके आना पड़ता था।     हमारी लाइन के  दस कमरों में से तो  सिर्फ हमारा ही कमरा हम दोनों मित्रों से आबाद था। बाकी पूरे कॉरिडोर में सन्नाटा पसरा हुआ था ।
             उस गहराती हुई रात में सिर्फ़ छपाक -छपाक की आवाज़ बीच -बीच में  इस ख़ामोशी को तोड़ रही थी ।  (स्वराज करुण)  मैंने महेन्द्र से कहा -   लगता है कि हमारा कोई साथी बाथरूम में अपने कपड़े काछ रहा है ।वह रहस्यमयी आवाज़ हर बीस सेंकेंड के अंतराल पर आ रही थी । बीच में बीस सेकेंड का गैप हमारे मन में रह -रह कर एक सवाल खड़ा करता जा रहा  था ।
          महेन्द्र ने हैरानी जताई और कहा -इतनी रात भला कौन बाथरूम में कपड़े धोएगा ?  हमारी लाइन के तो बाकी सभी कमरे खाली हैं ।फिर भी चलो देखकर आते हैं ,लेकिन दबे पाँव चलना है । चप्पल से चटाक -चटाक की ध्वनि निकलती है । कोई बाहरी व्यक्ति बेजा तरीके से हॉस्टल में घुसकर कपड़े काछ रहा होगा ,तो वह सतर्क हो कर भागने की कोशिश करेगा । हो सकता है कि वह  पिस्तौल न सही ,चाकू रखा हो और भागने की  कोशिश में हमसे उलझ कर  हम पर हमला कर दे । मैंने महेन्द्र से  कहा -तुम्हारा सोचना ठीक है । चलो ,खाली पैर चलते हैं ।  हालांकि कॉरिडोर में बिजली की पर्याप्त रौशनी थी । एक मटमैला  बल्ब बाथरूम में भी था ,फिर भी हमने ऐहतियात के तौर पर बैटरी वाला टॉर्च रख लिया  था ।
    हमारे कमरे से  दक्षिणी कॉरिडोर के आख़िरी छोर पर बाथरूम की  दूरी करीब 100 फुट  रही होगी । हम दोनों 
हल्के -हल्के कदमों से उस दिशा में बढ़ने लगे ।  बाथरूम के नज़दीक पहुंचकर हमने देखा कि भीतर अंधेरा था । महेन्द्र ने मेरे कानों में धीमे स्वर में कहा -शायद बल्ब  फ्यूज हो गया है । मैंने कहा -हो सकता है । हम दोनों बाथरूम के सामने खड़े हो गए ।कपड़े काछने की आवाज़ हर बीस सेकेंड के अन्तराल पर  आ ही रही थी और पहले के।मुकाबले और भी तेज़ होती जा रही थी । ऐसा लगा  नल भी खुला हुआ था ।
मैंने दबी आवाज़ से महेन्द्र के कानों में कहा -दरवाज़े पर दस्तक दें  क्या ?  उसने कहा -ठीक है ।
       मैंने  दरवाजे को  ढकेला तो लगा कि भीतर से  कुंडी लगी हुई है । महेन्द्र ने चिल्लाकर कहा -कौन है ? दरवाज़ा खोलो !  मैंने खटखटाया तो    छपाक ..छपाक की आवाज़ बन्द हो गयी । कुछ ही पलों में दरवाज़ा भी खुल गया और मोंगरे की ख़ुशबू वाले इत्र की  भीनी महक  के साथ हवा का एक झोंका हमें छूकर निकल गया । पूरे बदन में सिहरन दौड़ गयी । हम यह देखकर हैरत में पड़ गए कि भीतर कोई नहीं था और एक बाल्टी में निचुड़े हुए कपड़े रखे हुए थे । टॉर्च जलाकर देखा तो  उनमें  था एक सफ़ेद  पैजामा ,एक सफ़ेद कुर्ता , सफ़ेद  बनियान और एक टर्किश टॉवेल । हम उल्टे पाँव अपने कमरे में लौट आए ।
     रात के दो बजे गए थे । हमें नींद नहीं आयी । सुबह होने तक कौतूहल मिश्रित चर्चा में मशगूल रहे कि आख़िर वह कौन था ?  दूसरे दिन  चौकीदार से पूछने पर मालूम हुआ कि हर बुधवार  आधी रात के बाद उस बाथरूम में किसी  निराकार शख्स के हाथों कपड़े धोने की और मेस में बर्तनों के  टकराने की आवाज़ आती है । जिस ज़मीन पर  इस प्रायवेट हॉस्टल की यह बहुत बड़ी  बिल्डिंग खड़ी है ,वह पहले इस शहर के बाहरी इलाके में  एक गाँव के किसी ग़रीब किसान की थी ,जो अब बढ़ती आबादी और शहरी बसाहटों के फैलाव की वजह से नगरीय क्षेत्र में आ गयी है ।उस ज़मीन पर  वह  धान की खेती करता था । दूसरे किसानों की तरह उसकी खेती भी सिर्फ़ बारिश के  भरोसे  थी ।
        लगभग 30 साल पहले एक बार  कमजोर मानसून की वज़ह से भयानक सूखा पड़ गया । उसके एक साल पहले  किसान ने अपनी  बेटी की शादी के लिए एक महाजन से  ब्याज़ में 20 हजार रुपए का कर्ज़ लिया था ।  ब्याज़ की रकम बढ़ते -बढ़ते मूलधन से  कई गुना ज्यादा हो गयी । । वह  महाजन के  लगातार तगादे से तंग आ गया था । एक दिन महाजन ने उससे कहा -अगर कर्ज़ पटा नहीं सकते तो दो  एकड़ का अपना यह खेत   मेरे नाम कर दो । तुम्हारा पूरा कर्जा माफ़ हो जाएगा । तगादे की वज़ह से मानसिक संताप झेल रहे किसान को  कुछ नहीं सूझा ,तो उसने महाजन की बातों में आकर अपनी ज़मीन उसके नाम कर दी । वह खेत जो उसकी और उसके  परिवार की रोजी -रोटी का एक मात्र सहारा था ,वह भी किसान के हाथों से चला गया । शहर में कॉलेजों की संख्या बढ़ती जा रही थी ।महाजन ने अपनी व्यावसायिक बुद्धि से  सुदूर भविष्य की सोचकर इस ज़मीन पर  हॉस्टल बनवा लिया । किसान अपने  परिवार के भरण -पोषण के लिए अपनी ही  ज़मीन पर मज़दूरी करने के लिए मज़बूर हो गया । महाजन उससे अपने बंगले की साफ-सफ़ाई से लेकर कपड़े धुलवाने का भी काम करवाने लगा । रसोई का काम भी करवाता था ।
        एक दिन वह किसान गले के कैन्सर से पीड़ित हो गया । उसने महाजन के आगे हाथ फैलाया ,लेकिन सिर्फ़ निराशा हाथ लगी । किसान की आँखों मे अंधेरा छा गया । उसने एक बुधवार इसी जगह पर  ज़हर ख़ाकर अपनी ज़िन्दगी खत्म कर ली । एक वो दिन था और ये आज का दिन । तब से लेकर अब तक उसकी आत्मा एक निराकार शख्स के रूप में इस हॉस्टल की बिल्डिंग में मंडरा रही है । वह प्रत्येक बुधवार  कभी  रसोईघर में पहुँचकर बर्तनों को खंगालती रहती है तो कभी  बाथरूम में कपड़े धोने के लिए आ जाती है ।  किसी को नुकसान नहीं पहुँचाती ।  पिछले बीस साल से  ये सिलसिला बदस्तूर जारी है ।  पता नहीं आगे कब तक चलता रहेगा ? 
             चौकीदार की बातें सुनकर हम तनाव में आ गए । उसने हम दोनों के माथे पर चिन्ता की लकीरों को पढ़ लिया था ।बुजुर्ग चौकीदार ने  हमसे कहा -डरने की कोई बात नहीं । वह निराकार शख्स  हॉस्टल के  विद्यार्थियों के  कमरों में कभी  नहीं जाता ।  उसकी अदृश्य गतिविधियाँ सिर्फ किचन और  बाथरूम तक सीमित रहती हैं । बीती रात की उस रहस्यमयी घटना के बाद हम दोनों ने  हॉस्टल छोड़ने और शहर में  ही किसी बैचलर्स  होम में कमरा लेने का मन बना लिया था ,लेकिन चौकीदार ने हौसला बढ़ाया   तो हमारी भी हिम्मत बढ़ी  और हम दोनों दोगुने उत्साह के साथ परीक्षा की तैयारी में जुट गए ।  कुछ हफ़्तों बाद जब रिजल्ट आया तो  बीए अंतिम की मेरिट लिस्ट के टॉप टेन में  हम  दोनों का भी नाम शामिल था ,जो अखबारों में भी छपा हुआ था । बीए की पढ़ाई कम्प्लीट होने के बाद हमने हॉस्टल छोड़ दिया और नौकरी की तलाश में इधर -उधर हो गए ।
            --स्वराज करुण

Friday, June 7, 2019

(आलेख ) हाथी अब नहीं इंसानों के साथी !

                                          - स्वराज करुण 
         बिना महावत के  हाथी उद्दंड तो होंगे ही । महावत हाथी की पीठ पर बैठकर उसे शहरों और गाँवों सड़कों पर आसानी से घुमाता है और बच्चे , युवा और बुजुर्ग ,सभी उसे बड़ी उत्सुकता से और बड़े उत्साह से देखते हैं । कई बार तो महावत नन्हें बच्चों को  हाथी पर बैठाकर कुछ दूर तक सैर भी करवा देता है । हाथी पहले राजा -महाराजाओं की फ़ौज में भी हुआ करते थे । चूंकि कुशल महावत उन्हें नियंत्रित करता था , इसलिए वो कंट्रोल में रहते थे । सर्कस के विशाल तंबुओं में भी हमने उन्हें रिंग मास्टर या महावत  के हंटर और इशारों पर तरह -तरह के करतब करते देखा है ।
      लेकिन बगैर महावत का हाथी आतंक का पर्याय बन जाता है । यही कारण है कि जंगली हाथियों का उपद्रव बिहार ,झारखण्ड ,उत्तरप्रदेश,उत्तराखण्ड  ,छत्तीसगढ़,ओड़िशा  और मध्यप्रदेश में तेजी से बढ़ता जा रहा है । अब समस्या ये है कि इतने महावत लाएँ कहाँ से ? एक पुरानी हिन्दी  फ़िल्म है -हाथी मेरे साथी । लेकिन अब हालत ये है कि हाथी मेरे साथी न होकर मेरे , यानी इंसानों के जानी दुश्मन बन गए हैं । सरकारों के तमाम गंभीर प्रयासों के बावज़ूद इन आवारा हाथियों का बेकाबू होते जाना चिन्ता और चिन्तन का विषय बन गया है ।
     इंसानों को ये जंगली हाथी सूंड़ से पटक -पटक कर और पैरों से कुचल -कुचल कर जान से मार रहे हैं । अभी छत्तीसगढ़ से एक भयानक समाचार आया कि खेत में झोपड़ी बनाकर फसल की रखवाली कर रहे एक किसान को  हाथियों ने कुचल कर मार डाला ।  हालांकि ऐसे दुःखद प्रकरणों में मृतकों के परिवारों को सरकार पूरी सहृदयता और संवेदनशीलता के साथ उचित मुआवजा भी देती है । लेकिन मानव जीवन अनमोल होता है। जो चला गया ,वो तो लौटकर आने वाला नहीं ।  सरकारी मदद से उसके परिवार को तत्काल कुछ राहत मिल जाती है । फिर भी हमारी कोशिश हो कि हाथियों का उपद्रव इंसानों के लिए प्राणघातक न होने पाए । 
          इंटरनेट पर सर्च करें तो पता चलता है कि  जंगली हाथियों का  आतंक देश के बहुत से राज्यों में फैल  चुका है । उत्तराखंड  के  हरिद्वार में भी उनकी धमक  महसूस  की गयी है । देश के नये --नये इलाकों में इनकी बेकाबू   घुसपैठ बढ़ती जा रही है । कई बार तो ये शहरी बसाहटों के आसपास भी देखे जा रहे हैं ।  हरे -भरे जंगलों  का कम होते जाना और बचे -खुचे जंगलों में इनके लिए पर्याप्त चारे -पानी का नहीं होना इसकी  एक प्रमुख वज़ह मानी जा रही है ।
         आख़िर क्या , कब और कैसे  हो सकता है  इस गंभीर समस्या का समाधान ?
           -- स्वराज करुण
 (तस्वीर : Google से साभार )

Wednesday, June 5, 2019

(व्यंग्य ) श्वान -संस्कृति के स्वामी -भक्त पहरेदार !

                      - स्वराज करुण 
     मुझे 'श्वान -संस्कृति ' वालों से बहुत डर लगता है । मॉर्निंग और इवनिंग भ्रमण में ले जाना , सड़क पर ही छी -छी और सू -सू कराना ,फिर घर आकर खूब नहलाना ,फिर  सोफ़े पर  बैठाना  ,उनके बाल संवारना , अपने साथ उन्हें भी खिलाना ,पिलाना , रात को बिस्तर पर  साथ सुलाना ...!  क्या इन्हें घिन नहीं लगती ?
   श्वान -संस्कृति के   इन ' स्वामी -भक्त पहरेदारों ' को इंसानों से जितना प्यार नहीं ,उससे ज्यादा श्वानों से क्यों ? श्वान -संस्कृति के एक कट्टर समर्थक ने अपने घर में 'डबरा मेन'   पाल रखा है तो दूसरे ने अल्सेशियन ।  दोनों खतरनाक प्रजातियों के कुत्ते हैं ।  उनके घर जाने में हमारी रूह काँपती है । हमने तो जाना ही छोड़ दिया !
        वैसे  किसकी मज़ाल है ,जो उनके इन प्यारे 'बेटों' को 'कुत्ता ' कह दे ? एक दिन उनमें से एक मुझे बाज़ार में मिल गया ।  मैंने कहा -यार ! तुम्हारा कुत्ता  बड़ा  ख़तरनाक हैं ! वह मुझ पर भड़क गया ! बोला -ख़बरदार ! जो मेरे 'डॉगी' को  'कुत्ता ' कहा ! उसका नाम 'किम जोंग ' है ! मैंने कहा -ये तो उत्तर कोरिया के खूँखार तानाशाह का नाम है ,जो हज़ारों निर्दोष लोगों का क़ातिल है !
       मित्र ने कहा -  यह क़ातिलों का ज़माना है !  इस ज़माने में सिर्फ़ और सिर्फ़ क़ातिलों की ही चलती है !   क़ातिल ही क़ानून बनाते हैं ,क़ातिल ही क़ानून की रखवाली करते हैं और क़ातिल ही इंसाफ़ भी करते हैं । इसीलिए मैंने इसका नाम  इस युग के मशहूर क़ातिल के नाम पर रखा है ।
       मैंने 'श्वान -संस्कृति ' के इस  स्वामी - भक्त पहरेदार मित्र के  'श्वानोचित ज्ञान और विवेक को मन ही मन प्रणाम किया और हाथ जोड़कर वहाँ से दफ़ा हो गया ।
      - स्वराज करुण

Sunday, June 2, 2019

(आलेख ) ओड़िया महानाटक 'धनुजात्रा ' में उभरती है कंस की प्रजा -वत्सल छवि

                                -स्वराज करुण 
     भारतीय जन मानस में प्रचलित कृष्ण -कथाओं में  कंस  एक अत्याचारी राजा के रूप में कुख्यात है । यह उसकी नकारात्मक छवि है ,लेकिन उसकी एक सकारात्मक छवि  भी है ।
      छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्य ओड़िशा की लोक -संस्कृति में प्रचलित ओड़िया  महानाटक 'धनुजात्रा ' में  एक  प्रजा -वत्सल राजा के रूप में कंस की सकारात्मक छवि देखने को मिलती है । जब वह हाथी पर सवार होकर नगर भ्रमण करते हुए लोगों की समस्याओं का जायजा लेता है और दरबार लगाकर अपने अधिकारियों को तलब करता है , कंस की ओर से दरबार में जन प्रतिनिधियों को भी बुलाया जाता है । वर्तमान युग के हिसाब से क्षेत्रीय  विधायक और सांसद भी वहाँ आते हैं ।जन -शिकायतों और समस्याओं को अपनी प्रजा से सुनकर कंस जन प्रतिनिधियों और अपने अफसरों को उनके त्वरित निराकरण का आदेश देता है ,तब उसकी यह प्रजा - वत्सल छवि उभरती है । वह अपने परिजनों के लिए जरूर आततायी था ,लेकिन अपनी प्रजा के लिए नहीं । 
       
   -यह कहना है ' धनुजात्रा 'में कंस की भूमिका निभाने वाले ओड़िशा के प्रसिद्ध मंचीय अभिनेता और लोक गायक सोनपुर जिले के ग्राम बिनका निवासी गोपालचंद्र पण्डा का । वो कहते हैं -- जैसे त्रेतायुग में रावण ने राम के हाथों मोक्ष की चाहत से सीताहरण किया था ,उसी तरह कंस ने कृष्ण के हाथों अपनी मुक्ति के लिए सारा प्रपंच रचा था । गोपालचंद्र कहते हैं -  द्वापर युग में युधिष्ठिर ने धर्मशास्त्र का और कंस ने न्याय शास्त्र का अध्ययन किया था । लेकिन  कंस में राक्षसी प्रवृत्ति कहाँ से आयी ,इसकी जानकारी के लिए हमें पौराणिक आख्यानों में जाना होगा । कंस के पिता उग्रसेन मथुरा के राजा थे । वह भी अत्यंत प्रजा -हितैषी थे । उनकी रानी पद्मावती  स्नान करने नदी गयी थीं ,जहाँ ध्रुमिलासुर नामक राक्षस ने उनके साथ दुराचार किया ।  इससे कंस का जन्म हुआ । उसे यह बात मालूम नहीं थी । राक्षसी स्वभाव के कारण वह अपने परिजनों और देवी -देवताओं पर  भी अत्याचार करने लगा । कुछ पौराणिक आख्यानों में ध्रुमिलासुर को आसुरी प्रवृत्ति का  गन्धर्व बताया गया है ,जिसने मायके गयी  रानी पद्मावती को बागीचे में सम्मोहित कर लिया था ।
                     
     राक्षसी स्वभाव के प्रभाव में आकर कंस ने अपने पिता महाराज उग्रसेन को राजगद्दी से उतार कर सिंहासन पर आधिपत्य जमा लिया और अपनी बहन देवकी का विवाह सुरकुल के राजा। देवमीढ़ के पुत्र वासुदेव से करवाया ।एक दिन आकाशवाणी हुई कि देवकी के गर्भ से उतपन्न होने वाली आठवीं सन्तान कंस की मृत्यु का कारण बनेगी । यह आठवीं सन्तान भगवान कृष्ण के रूप में आने वाली थी । तभी से कंस भयभीत और सशंकित रहने लगा । उसने देवकी और वासुदेव को बन्दी बनाकर कारागार में डाल दिया ।
          देवकी के छह पुत्रों  का तो उसने वध कर दिया ,लेकिन सातवें पुत्र के रूप में देवकी के गर्भ में जब स्वयं भगवान बलराम अवतरित हुए तो योगमाया ने उन्हें ब्रज (गोकुल )में नन्द बाबा के घर रहने वाली रोहिणी जी के गर्भ में भिजवा दिया । इस प्रकार कंस के प्रकोप से बलराम जी बच गए ।  फिर कृष्णजी के जन्म ,  जेल के लौह द्वारों के स्वयं खुल जाने और भारी वर्षा के बीच उफनती जमुना को पार करके वसुदेवजी द्वारा उन्हें वृंदावन में नन्द बाबा और यशोदा माता के घर सुरक्षित पहुंचाए जाने की कथा हम सबको मालूम ही है ।  पौराणिक कथाओं के अनुसार  हमें यह भी ज्ञात है कि आततायी कंस ने कृष्ण और बलराम की हत्या करने के इरादे से नन्द बाबा और गोपों के साथ उन्हें अक्रूरजी के हाथों धनुर्योग मेले का न्यौता भिजवाया था ,जहाँ कृष्णजी के हाथों कंस का वध हुआ । संभवतः धनुर्योग मेले  शामिल होने के लिए वृंदावन (गोकुल ) से मथुरा नगरी तक उनकी यात्रा का विशाल नाट्य -रूपांतरण ही धनुजात्रा है ।
     इसमें कृष्ण जन्म से लेकर कंस वध तक पूरी कहानी का नाट्य मंचन चलित रंगमंच पर होता है । चाहे गाँव हो , कोई कस्बा हो या कोई शहर , जहाँ भी इसका मंचन होता है ,वह स्थान अपने -आप में एक विशाल रंगमंच में परिवर्तित हो जाता है । बड़ी संख्या में स्थानीय लोग भी इस महानाटक के पात्र बन जाते हैं । उपलब्धता के अनुसार आस -पास की किसी नदी को त  बरसाती नाले को ,या नहीं तो तालाब को ही यमुना नदी मान लिया जाता है , जिसके इस पार और उस पार क्रमशः मथुरा और वृंदावन के दृश्य मंचित होते हैं । पौष -माघ के महीने में यह आयोजन कहीं दस दिनों तक तो कहीं पंद्रह दिनों तक चलता है.
      पश्चिम ओड़िशा के जिला मुख्यालय बरगढ़ की धनुजात्रा देश -विदेश में प्रसिद्ध है । वहाँ से प्रेरित और उत्साहित होकर अब ओड़िशा के कई गाँवों में भी लोगों ने  धनुजात्रा महोत्सव समितियों का गठन कर  इस चलित नाटक का आयोजन शुरू कर दिया है ।      गोपालचंद्र पण्डा कहते हैं -मेरी जानकारी के अनुसार बरगढ़ में पिछले 70 या 72 वर्षो से धनुजात्रा हो रही है ,वहीं बलांगीर जिले के ग्राम भालेर में यह वार्षिक आयोजन  लगभग एक सौ वर्षों  से किया जा रहा है ।  इधर बरगढ़ जिले के  ही  चिचोली और लेलहेर नामक गाँवों में भी 'धनुजात्रा ' की धूम  रहती है । लेलहेर निवासी पूर्व सरपंच श्री हीराधर साहू ने बताया कि लेलहेर में  ग्राम देवता की पूजा -अर्चना के बाद धनुजात्रा का शुभारंभ होता है। कंस के मुकुट की भी पूजा होती है । पड़ोसी गाँव चण्डी पाली को वृंदावन (गोपपुर )और लेलहेर को मथुरा मानकर महानाटक का मंचन किया जाता है ।  सम्पूर्ण आयोजन के दौरान दस -पन्द्रह दिनों तक दोनों गाँवों में भारी चहल -पहल बनी  रहती है ।
    गोपालचन्द्र  पण्डा को हर साल 14 से 18 धनुजात्राओं में कंस की भूमिका निभाने का न्यौता मिलता है ।  वह सम्बलपुरी लोकगायक भी हैं । इन गीतों में अभिनय के साथ उनके दस -पन्द्रह एलबम भी आ चुके हैं । वह  रावण और अन्य कई  असुरों का भी किरदार निभाते हैं । गोपाल अच्छे कॉमेडियन भी हैं । सीमावर्ती राज्यों की कला -संस्कृति एक -दूसरे से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती ।  पश्चिम ओड़िशा की लोकप्रिय ' धनुजात्रा ' ने अब अपनी सरहद से लगे छत्तीसगढ़ के सरायपाली इलाके में भी रंग जमाना शुरू कर दिया है । तहसील मुख्यालय सरायपाली में दिसम्बर 2017 में पहली बार इसका भव्य आयोजन हुआ ।
   इस अंचल के वरिष्ठ साहित्यकार ग्राम तोषगाँव निवासी  सुरेन्द्र प्रबुद्ध के अनुसार - यह एक प्रदर्शनकारी मुक्ताकाशी महानाटक है ।  कृष्ण कथा के रूप में मंचित होने वाले इस महानाटक का नाम धनुजात्रा क्यों ? श्री प्रबुद्ध कहते हैं - यह  एक जटिल प्रश्न है ,क्योंकि कृष्ण के व्यक्तित्व के विभिन्न प्रतीकों में मथुरा ,वृंदावन ,द्वारिका , यशोदा ,  राधा , दूध ,दही , गोप ;गोपिकाएँ , मोर पंख ,बाँसुरी ,सुदर्शन -चक्र और पांचजन्य शंख आदि तो हैं ,लेकिन उनमें धनुष नहीं है ,जबकि यह राम के व्यक्तित्व में रूढ़ हो गया है । तलाशने पर भी 'धनुजात्रा" में कृष्ण और धनुष के अंतर -सम्बन्ध नहीं मिलते ।
          धनुजात्रा में व्यवहृत 'जात्रा" शब्द को स्पष्ट करते हुए सुरेन्द्र  प्रबुद्ध कहते हैं - हिन्दी मे 'यात्रा 'शब्द की जो अमिधा है ,  भारत की पूर्वी भाषाओं ;ओड़िया ,बांग्ला और असमिया में उसका अर्थ अलग है ।जात्रा एक सामूहिक सांस्कृतिक मेला है। यह धर्म और प्राचीन साहित्य ,कला और संगीत का सम्मिश्रण है ,जो पूरे गाँव या कस्बे को चलित मंच बना देता है और दर्शक भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस महानाटक में भागीदार बन जाते हैं । पौराणिक राज पोशाक में सुसज्जित होकर महाराज कंस का  नगर भ्रमण भी जनता के आकर्षण का केन्द्र बन जाता है ।  सुरेन्द्र प्रबुद्ध भारतीय नाट्य साहित्य के इतिहास के  तथ्यात्मक अध्ययन के आधार पर यह भी कहते हैं कि ओड़िशा की 'धनुजात्रा" का इतिहास पांच सौ वर्षों से अधिक पुराना नहीं है ।
              वो कहते हैं - भरत मुनि भारतीय नाट्य साहित्य के आदि पुरुष और प्रवर्तक थे ।संस्कृत भाषा में नाटकों का विशाल और बहुरंगी भण्डार है ।,जिसकी समृद्ध परम्परा में भारतीय भाषाओं के नाटकों की परम्परा लगातार विकसित हो रही है । उत्तरप्रदेश की रामलीला रामायण का वैश्विक नाट्य रूप है ।किसी भी नाटक के सफल मंचन के लिए मंच अनिवार्य तत्व है ,जिसका अधिकतम विस्तार रूसी नाटकों में देखा गया है । रूस में एक -डेढ़ फर्लांग लम्बे -चौड़े रंगमंच हुआ करते थे । पारसीनाटकों पर भी इसका असर देखा गया,लेकिन धनुजात्रा जैसे महानाटक का मुक्ताकाशी विस्तार शहरों और गाँवों में मंच के रूप में कब और कैसे परिवर्तित हो गया ,उसका सम्यक विवरण भारतीय नाट्य शास्त्र में नहीं मिलता,लेकिन अनुमानों के आधार पर यह नयी अवधारणा 500 वर्षो से अधिक पुरानी नहीं लगती ।
         बहरहाल , मेरे विचार से कलियुग में ओड़िशा की  'धनुजात्रा' भारत के द्वापर युगीन इतिहास में कृष्ण जन्म ,कृष्ण लीला और कंस वध जैसी घटनाओं का ऐसा सजीव चित्रण करती है ,जिसे देखकर हम बहुत कुछ सीख सकते हैं । टेलीविजन चैनलों और  इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया के इस युग में  आधुनिक समाज आत्म केन्द्रित होता जा रहा है । ऐसे समय में  इस महानाटक में जनता की उत्साहजनक ,सक्रिय और  सामूहिक भागीदारी से भारतीय रंगमंच  की विकास यात्रा को अंधेरे में रोशनी की किरण नज़र आती है ।
   -- स्वराज करुण
   दो तस्वीरें  : कंस की भूमिका में  गोपालचंद्र पण्डा 
  और ग्राम लेलहेर की धनुजात्रा में कंस वध का दृश्य
  फोटो सौजन्य : गोपालचंद्र पण्डा और हीराधर साहू )